August 25, 2026
Hindi Hindi

Login to your account

Username *
Password *
Remember Me
    शौर्य की बाते ( सम्पादकीय )

    शौर्य की बाते ( सम्पादकीय ) (232)

      दुर्ग / शौर्यपथ / देश की आजादी के लिए अनगिनत वीरो ने अपने प्राणों की आहुति दी देश की स्वतंत्रता के वीरो की अगर तुलना की जाए तो ये अतिश्योक्ति ही होगी . वीरो की इस पावन भूमि में शहीदों ने स्वतंत्र भारत के लिए हस्ते हस्ते फांसी के फंदे को भी गले लगा लिया ऐसे ही वीरो में शहीद हेमू कालाणी का भी नाम इतिहास के पन्नो में स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज है . दुर्ग शर के मुख्य मार्ग पर शासकीय पोलिटेक्निक कालेज के समीप आज शहीद हेमू कालाणी की प्रतिमा का लोकार्पण शहर विधायक गजेन्द्र यादव ने किया .

     जीवन सारांश : भारत में ब्रिटिश हुकूमत के दौरान हेमू कालाणी का जन्म 23 मार्च 1923 को बाम्बे प्रेसीडेंट के सिंध डिवीजन के सुक्कूर में एक सिंधी जैन परिवार में हुआ था। सुक्कूर अब पाकिस्तान में है। वे देश के लिए शहीद होने वाले सबसे कम उम्र के क्रांतिकारियों में से एक थे। उनके 20 वें जन्मदिन से दो महीने पहले केवल 19 वर्ष की आयु में उन्हे अंग्रेजी हुकूमत के आदेश पर फांसी दी गई थी। हेमू कालाणी को सिंध का भगत सिंह भी कहा जाता है। हेमू बचपन से साहसी थे और विद्यार्थी  जीवन से ही क्रांतिकारी गतिविधियों में सक्रिय रहे। हेमू जब मात्र 7 वर्ष के थे, तब वह तिरंगा  लेकर अंग्रेजो की बस्ती में अपने दोस्तों के साथ क्रांतिकारी गतिविधियों का नेतृत्व करते थे। 1942 में 19 वर्षीय किशोर क्रांतिकारी ने अंग्रेज भारत छोड़ो नारे के साथ अपनी टोली के साथ सिंध प्रदेश में तहलका मचा दियाा था। हेमू समस्त विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार करने के लिए लोगों से अनुरोध किया करते थे। अत्यचारी फिरंगी सरकार के खिलाफ छापामार गतिविधियों और उनके वाहनों को जलाने में हेमू कालाणी सदा अपने साथियों का नेतृत्व करते थे। अंग्रेजो की एक ट्रेन जिसमें क्रांतिकारियों का दमन करने के लिए हथियार और अंग्रेजी अफसरों का खूखार दस्ता था, उसे हेमू सक्खर पुल में पटरी की फिश प्लेट खोलकर गिराने का प्रयास कर रहे थे। पुलिस ने उन्हे गिरफ्तार कर लिया। कोर्ट में हेमू को फांसी की सजा सुनाई।  हेमू को जेल में अपने साथियों का नाम बताने पर फांसी की सजा न देने का प्रलोभन दिया गया। लेकिने उन्होने किसी का नाम नही बताया। 21 जनवरी 1943 को उन्हे फांसी की सजा दी गई। जब फांसी से पहले उनसे आखिरी इच्छा पूछी गई तो उन्होने भारतवर्ष में फिर से जन्म लेने की इच्छा जाहिर की। इकलाब जिंदाबाद और भारत माता की जय के नारे लगाते हुए वे फांसी के फंदे पर झूल गए।

    शौर्यपथ लेख / नीति निर्माण में साक्ष्य मायने रखता है। लेकिन जीवंत अनुभव भी ऐसा ही है। और उस युवा लड़की का अनुभव क्या कहेगा जिसने अपने पिता को कैंसर के कारण खो दिया है? कैंसर सिर्फ एक व्यक्ति को नहीं बल्कि पूरे परिवार को प्रभावित करता है। इसका परिवारों पर विनाशकारी प्रभाव पड़ता है, और आने वाली पीढ़ियाँ पीड़ित होती हैं। कई मामलों में पाया गया कि कैंसर का इलाज परिवार को दिवालिया बना देता है, संसाधन सूख जाते हैं, भविष्य खतरे में पड़ जाता है। इसलिए, जीवन बचाने के लिए नीति स्तर पर हस्तक्षेप और बदलाव की सख्त जरूरत हो जाती है।
        सितंबर 2022 में, स्वास्थ्य पर संसद की स्थायी समिति ने कैंसर देखभाल योजना और प्रबंधन पर एक समयबद्ध, प्रासंगिक और व्यापक रिपोर्ट प्रस्तुत की जिसमें उसने भारत में कैंसर के कारणों का विस्तृत अध्ययन किया और आवश्यक नीतिगत बदलावों के लिए सिफारिशें कीं। रिपोर्ट में तंबाकू के सेवन से होने वाले कैंसर पर विशेष जोर दिया गया है। समिति ने चिंता जताते हुए कहा कि भारत में, "तंबाकू के कारण होने वाले मुंह के कैंसर के कारण सबसे ज्यादा लोगों की जान जाती है, इसके बाद फेफड़े, ग्रासनली और पेट का कैंसर होता है।" इसमें यह भी कहा गया कि तम्बाकू का उपयोग कैंसर से जुड़े सबसे प्रमुख जोखिम कारकों में से एक है। विशेष रूप से, भारत के उत्तर पूर्व क्षेत्रों के लिए, रिपोर्ट में कहा गया है कि तम्बाकू कैंसर का प्रमुख कारण है, पुरुषों में कैंसर के सभी मामलों में 50-60% और महिलाओं में 20-30% मामले होते हैं।
    राज्यसभा में प्रस्तुत कैंसर संबंधी जवाब में कहा गया है कि छत्तीसगढ़ में कैंसर के मामलों में उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई (2019- 27113 मामले) जो बढ़कर (2022-29253) हो गए।
       इन चिंताजनक टिप्पणियों को ध्यान में रखते हुए, समिति ने सरकार को तम्बाकू की खपत को हतोत्साहित करने की सिफारिश की है, विशेष रूप से इस तथ्य के कारण तम्बाकू पर कर बढ़ाकर कि तम्बाकू की कीमतें भारत में सबसे कम हैं।भारत में तम्बाकू की कीमतें सस्ती रखने से इसकी आबादी पर भारी लागत आती है।भारत में तंबाकू की खपत का स्वास्थ्य और आर्थिक बोझ 2017 में 1.77 लाख करोड़ रुपये या भारत के सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 1.04% होने का अनुमान लगाया गया था।कैंसर के अलावा, तंबाकू का उपयोग कई एनसीडी से जुड़ा है, जिससे हर साल लगभग 13.5 लाख मौतें होती हैं।हालाँकि, भावनात्मक आघात और वित्तीय संकट के कारण वास्तविक जीवन पर प्रभाव बहुत अधिक और गणना से परे होगाI
    यह दिखाने के लिए पर्याप्त सबूत हैं कि तंबाकू उत्पादों पर कर बढ़ाना इसकी खपत को कम करने के सबसे प्रभावी तरीकों में से एक है।शोध से पता चलता है कि सिगरेट की कीमत में 10% की वृद्धि से भारत जैसे निम्न और मध्यम आय वाले देशों में धूम्रपान को 8% तक कम किया जा सकता है और बीड़ी की खुदरा कीमत में समान 10% की वृद्धि से इसकी खपत 9% तक कम हो सकती है।विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने तंबाकू उत्पादों के खुदरा मूल्य पर न्यूनतम 75% कर लगाने की सिफारिश की है और दुनिया भर के 40 देशों ने 75% या उससे अधिक कर लगाया है, जिसमें श्रीलंका (77%) और थाईलैंड (78.6) शामिल हैं।हमारे क्षेत्र में %)।इसकी तुलना में, भारत में सबसे अधिक धूम्रपान किए जाने वाले उत्पाद बीड़ी पर कर की दर केवल 22% है।यदि भारत को 2025 तक तंबाकू की खपत में 30% की कमी का लक्ष्य हासिल करना है, जो उसने राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति 2017 में निर्धारित किया है, तो अब कार्रवाई करने और तंबाकू करों को बढ़ाने का समय आ गया हैI
       इस स्तर पर, यह बताना प्रासंगिक है कि किसी भी कराधान नीति के कई उद्देश्य हो सकते हैं। जबकि कराधान सरकार के लिए देश के स्वास्थ्य और विकास एजेंडे में निवेश करने के लिए राजस्व का एक महत्वपूर्ण स्रोत है, यह एक महत्वपूर्ण प्रोत्साहन या हतोत्साहित करने वाला उपाय भी हो सकता है। जब भारत सरकार ने बीड़ी और धुआं रहित तंबाकू सहित सभी तंबाकू उत्पादों को जीएसटी के उच्चतम 28% कर स्लैब में डालने का फैसला किया, तो इसने एक स्पष्ट संदेश दिया कि तंबाकू एक पाप उत्पाद है और इसकी खपत को हतोत्साहित किया जाना चाहिए। जीएसटी-पूर्व युग (2017 से पहले) में तम्बाकू की खपत को कम करने के लिए कई महत्वपूर्ण उपाय किए गए, जिनमें केंद्र सरकार द्वारा उत्पाद शुल्क करों में क्रमिक और लगातार वृद्धि और राज्य सरकारों द्वारा पूर्ववर्ती मूल्य वर्धित कर (वैट) शामिल थे। सरकार के अपने वैश्विक वयस्क तंबाकू सर्वेक्षण के अनुसार, इन निरंतर प्रयासों के कारण 2010 और 2017 के बीच तंबाकू उपभोक्ताओं में 81 लाख की कमी आई।
       जीएसटी के बाद, तंबाकू उत्पादों के करों या कीमतों में कोई उल्लेखनीय वृद्धि नहीं हुई है।दरअसल, सरकार के आंकड़ों से पता चलता है कि तंबाकू उत्पाद अधिक किफायती हो गए हैं क्योंकि उनकी कीमतें अन्य आवश्यक वस्तुओं की तरह उसी दर से नहीं बढ़ी हैं।इससे क्या संदेश जाता है?पोषण पर खर्च करना अब कैंसर पैदा करने वाले उत्पादों पर खर्च करने से महंगा है I
    साभार :लेखक - डॉ. रविन्द्र के.ब्रह्मे
    प्रोफेसर एंड हेड एसओएस इन इकोनॉमिक्स
    पंडित रविशंकर शुक्ल यूनिवर्सिटी, रायपुर

    रायपुर / शौर्यपथ / देश के पूर्व प्रधानमंत्री एवं भारतरत्न स्व. श्री अटल बिहारी वाजपेयी की जयंती 25 दिसंबर प्रतिवर्ष देशभर में सुशासन दिवस के रूप में मनाया जाता है। इस वर्ष यह दिन छत्तीसगढ़ के लिए विशिष्ट होगा। इस अवसर पर छत्तीसगढ़ की नई सरकार नई पहल करते हुए अपनी नीतियों और योजनाओं को धरातल पर उतार रही है। इसी दिन राज्य सरकार यहां के 13 लाख किसानों को धान के दो वर्ष के बकाया बोनस का उपहार देगी। अनेक जनहितैषी योजनाओं के रूप में भी जनता को सौगात मिलेगी।
        यह सुखद संयोग ही है कि नई राज्य सरकार के गठन की औपचारिक प्रक्रिया के पहले पखवाड़े का कामकाज सुशासन दिवस से शुरू होगा। पूरे छत्तीसगढ़वासियों के लिए यह गर्व और स्वाभिमान की बात है कि स्व. श्री अटल जी ने ही अपने प्रधानमंत्रित्व काल में छत्तीसगढ़ राज्य की संकल्पना को मूर्त रूप दिया था। छत्तीसगढ़ राज्य की स्थापना अटल जी की ही देन है। उनके जन्मदिवस पर नई सरकार के कार्यक्रमों का शुभारंभ माननीय अटल जी के स्वप्नों को साकार करने की दिशा में एक सार्थक कदम है।
      सुशासन से आशय सक्षम, न्यायशील और पारदर्शी शासन व्यवस्था से है। अटल जी का जन्मदिन सेवा, त्याग व समर्पण के लिए याद किया जाता है। वर्ष 2014 से इसे देशभर में मनाया जाता है। सुशासन दिवस के दिन कर्तव्य के शुचितापूर्ण पालन की शपथ भी ली जाती है। अटल जी के पदचिन्हों पर चलकर छत्तीसगढ़ सरकार शासन-प्रशासन में शुचिता, पारदर्शिता, जवाबदेही का विकास करने की दिशा में अग्रसर है।
      छत्तीसगढ़ अपनी युवावस्था के दौर में है। इस ऊर्जा का उपयोग तीव्र गति से  समन्वित विकास में किए जाने की आवश्यकता है। राज्य की नई सरकार ने यहां की जरूरतों और आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए विकास के लक्ष्य निर्धारित किए हैं। किसानों से 3100 रुपए की दर पर धान की खरीदी, युवाओं को रोजगार, महिलाओं की आर्थिक उन्नति व स्वावलंबन के लिए महतारी वंदन योजना आदि ऐसे सोपान हैं जो समाज की तरक्की के पायदान तय करेंगे।
      अनुसूचित जनजााति बहुल प्रदेश को श्री विष्णुदेव साय के रूप में आदिवासी मुख्यमंत्री मिले हैं। उनके राज्य के मुखिया बनने से प्रदेश की पारंपरिक तथा सांस्कृतिक विरासत को नवीन आयाम मिलने की आशा की है। अनुसूचित जातियों तथा अन्य पिछड़ा वर्ग के कल्याण की प्राथमिकता की भावना सरकार के कामकाज में प्रतिध्वनित हो रही है। सुशासन की अवधारणा यही है कि सभी वर्गों खासकर वंचित तबकों को न्याय तथा सम्मान दिलाने की पहल की जाए।
      सुशासन की स्थापना में सूचना प्रौद्योगिकी की अहम भूमिका रही है। प्रशासनिक व्यवस्था में इंटरनेट क्रांति से शुचिता और पारदर्शिता में वृद्धि, सार्वजनिक वितरण प्रणाली का सुदृढ़ीकरण, मजदूरों और कृषकों के बैंक खाते में सीधे राशि का भुगतान, राजस्व और अन्य विभागों के आनलाइन पोर्टल, जनोपयोगी सुविधाओं की आनलाइन व्यवस्था से न सिर्फ व्यवस्था में पारदर्शिता आई है बल्कि प्रशासन से जनता की दूरी भी घटी है।
      इस वर्ष सुशासन दिवस छत्तीसगढ़ की जनता को अनेक सौगातें देकर जाएगा। यह दिवस सबका साथ सबका विकास का मंत्र भी याद दिलाएगा। नई सरकार के कार्यकाल का यह दिवस राज्य में खुशहाली और विकास की ठोस बुनियाद रखेगा।

    साभार : छत्तीसगढ़ जनसंपर्क संचनालय

    शौर्य की बाते। प्रदेश में कांग्रेस जो पूर्ण बहुमत से सरकार चल रही थी एवं चुनाव के पहले तक आम जनता में यह चर्चा का विषय था कि एक बार फिर से भूपेश सरकार दोबारा सत्ता में वापसी करेगी परंतु परिणाम के बाद जो सामने आया सभी ने देखा कि किस तरह से कांग्रेस बहुमत से 11 सीट पीछे हो गई कांग्रेस की इस बड़ी हार में कहीं ना कहीं कांग्रेस के नेताओं का ही बड़ा हाथ रहा है वैसे तो कांग्रेस संगठन हार की समीक्षा कई स्तर पर कर रही होगी किंतु आम जनों में जिस तरह से चर्चा का विषय है उसके आधार पर यह कहा जा सकता है कि दुर्ग विधानसभा क्षेत्र और दुर्ग ग्रामीण विधानसभा क्षेत्र में हार का एक प्रमुख कारण बेमेतरा विधायक आशीष छाबड़ा भी शामिल है ।

       वैसे तो बेमेतरा विधायक आशीष छाबड़ा का राजनीतिक स्तर पर दुर्ग शहर एवं  ग्रामीण क्षेत्र में कोई हस्तक्षेप नहीं है परंतु अगर इसे दूसरे तरफ से देखा जाए तो प्रदेश के पीडब्ल्यूडी मंत्री के रूप में कार्यरत तात्कालिक पीडब्ल्यूडी मंत्री ताम्रध्वज साहू के बेहद करीबी माने जाने वाले आशीष छाबड़ा के पारिवारिक कंपनी को कई सौ करोड़ का ठेका विभाग से मिला हालांकि किसी भी कंपनी में आशीष छाबड़ा का नाम नहीं परंतु यह सभी जानते हैं कि पारिवारिक कंपनी होने के कारण कहीं ना कहीं बेमेतरा विधायक आशीष छाबड़ा भी दुर्ग शहर और दुर्ग ग्रामीण विधानसभा क्षेत्र में हार के जिम्मेदार हैं हार की जिम्मेदार इसलिए भी कहा जा सकता है कि दुर्ग शहर में सड़क चौड़ीकरण एवं सौंदरीकरण में आशीष छाबड़ा की पारिवारिक कंपनी को लगभग ढाई सौ एक करोड़ का ठेका मिला था जिसमें नेहरू नगर चौक से पुलगांव चौक पुलगांव चौक से अंडा चौक एवं पुलगांव चौक से अंजोरा चौक तक सड़क चौड़ीकरण एवं सौंदर्य करण का कार्य करना था किंतु तय समय पर यह कार्य नहीं हो सका सरकार बनने के बात से शुरू हुआ यह कार्य आज पर्यंत तक पूर्ण नहीं हो सका वर्तमान समय में पुलगांव चौक से अंडा चौक तक का कार्य अभी भी प्रगति पर है ।

       दुर्ग शहर की जनता एवं ग्रामीण क्षेत्र की जनता ने सड़क निर्माण के दौरान हो रही अनियमित के कारण काफी तकलीफों का सामना किया है कई बार विपक्षी पार्टी भारतीय जनता पार्टी ने इसकी शिकायत भी की परंतु आशीष छाबड़ा की पारिवारिक कंपनी होने के कारण और गृह मंत्री पीडब्ल्यूडी मंत्री  साहू से निकटता के कारण अधिकारी भी कार्यवाही करने में कोताही बरतने लगे कई बार विवादित स्थिति होने के बावजूद भी एजेंसी पर पीडब्ल्यूडी विभाग के अधिकारी मेहरबान रहे इस बीच कई बार दुर्घटनाओं के कारण कई परिवारों के सदस्यों की मौतें भी हुई और कई घायल भी हुए इन सबके जिम्मेदार निर्माण एजेंसी की लापरवाही कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी निर्माण में भ्रष्टाचार का आरोप भी भारतीय जनता पार्टी द्वारा कई बार लगाया गया अब देखना यह है कि सरकार बदलने के बाद भारतीय जनता पार्टी नीत सरकार के पीडब्ल्यूडी मंत्री के द्वारा क्या इन मार्गों पर हुए भ्रष्टाचार पर कड़ी से कड़ी कार्रवाई की जाएगी या फिर सप्ताह के खेल में पूर्व विधायक आशीष छाबड़ा की कंपनी पर वर्तमान सरकार भी मेहरबान रहेगी। 

     दुर्ग / शौर्यपथ / दुर्ग विधानसभा क्षेत्र में एक बार फिर कांग्रेस प्रत्याशी अरुण वोरा की हार एक यादव से ही हुई है पूर्व में भी लगातार है तीन बार कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में अरुण वोरा भाजपा के हेमचंद यादव से हारे वही इस बार फिर से भाजपा प्रत्याशी गजेंद्र यादव से बड़े अंतर से चुनाव हार गए .यह चुनाव कांग्रेस प्रत्याशी अरुण वोरा के लिए काफी महत्वपूर्ण था 50 साल की दुर्ग कांग्रेस में स्व. मोतीलाल वोरा की विरासत को संभालने की जिम्मेदारी अरुण वोरा के कंधों पर थी किंतु देश के कद्दावर नेताओं में गिने जाने वाले स्व.मोतीलाल वोरा की विरासत को अरुण वोरा 3 साल से ज्यादा नहीं संभाल पाए इस बार दुर्ग विधानसभा क्षेत्र से अरुण वोरा का जबरदस्त विरोध हुआ हर वार्ड में ( तीन वार्ड छोडकर )अरुण वोरा की करारी हार हुई .शहर के 57 वार्ड में अरुण वोरा को हार का सामना करना पड़ा .
      भले ही कांग्रेस नेता और उनके समर्थक यह सोचे कि उनके विरुद्ध कांग्रेसियों ने कार्य किया किंतु कहीं से भी यह तथ्यात्मक नजर नहीं आता अगर विरोध में काम होता तो जीत हार का अंतर 2-5 हजार से ज्यादा नहीं होता किंतु यहां लगभग 40000 मतों से कांग्रेस प्रत्याशी अरुण वोरा की हार हुई .हार के बाद भले ही अरुण वोरा समीक्षा करते रहे किंतु शहर में अब खुलकर अरुण वोरा के हार की समीक्षाएं होने लगी .
      कुछ बातें ऐसी निकल कर आई जो की सोचने पर मजबूर कर देती है कि यह बात कहीं से भी गलत नहीं है ..
    संगठन को कमजोर कर दिया कांग्रेस नेता अरुण वोरा  ने
      दुर्ग शहर विधानसभा क्षेत्र में कांग्रेस संगठन में पूरी मर्जी पूर्व विधायक अरुण वोरा की चलती रही उनके अनुशंसा से ही संगठन के पदाधिकारी तय होते थे परंतु दुर्ग शहर कांग्रेस में संगठन नाम का अस्तित्व ही नाम मात्र का रह गया था संगठन में कहने को तो कई ब्लॉक अध्यक्ष थे परंतु ब्लॉक अध्यक्षों का वर्चस्व शहर कांग्रेस में उतना नहीं था जितना होना चाहिए वही दुर्ग शहर में कांग्रेस कार्यालय होने के बावजूद भी संगठन विधायक निवास से संचालित होना भी यह साफ दर्शाता है कि पूर्व विधायक अरुण वोरा संगठन को अपने इशारों पर चलाना हते थे इसी निष्क्रिय संगठन का परिणाम रहा की दुर्ग शहर में कांग्रेस की करारी हार हुई . शहर अध्यक्ष गया पटेल जो संगठन के कार्यो को समझने और चलाने में वर्तमान समय तक नाकाम ही रहे सिर्फ एक मोहरे के रूप में पहचान बनी रही .वहीं युवाओं को साथ लेकर चलना और चुनावी माहौल में युवाओं की महत्वपूर्ण भूमिका तय करने में भी संगठन को आगे रहना चाहिए परंतु दुर्ग शहर कांग्रेस में युवा कांग्रेस के अध्यक्ष के रूप में आयुष शर्मा को जिम्मेदारी तो दे दी गई परंतु आयुष शर्मा की अनुभवहीनता और कम उम्र के साथ पारिवारिक जिम्मेदारी के परिपेक्ष में उनके द्वारा संगठन में भी वह समय नहीं दिया गया और ना ही संगठन को मजबूत करने की दिशा में कोई खास पहल की गई बावजूद इन सबको देखते हुए भी अरुण वोरा ने संगठन को मजबूत करने का कोई सार्थक कदम कभी नहीं उठाया जिसका परिणाम यह रहा की कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में अरुण वोरा की दुर्ग शहर में बड़े अंतर से हार हुई
    ब्राह्मणवाद का भी है अरुण बड़ा पर समय-समय पर लगता रहा आप
      यूं तो किसी ने खुलकर नहीं कहा कि अरुण वोरा के द्वारा ब्राह्मणवाद को बढ़ावा दिया जाता है परंतु अधिकतर कांग्रेसी और राजनितिक क्षेत्र से जुड़े लोगो द्वारा लगातार यह आरोप लगता ही रहा साथ ही जिन तथ्यों के आधार पर बात कही जा रही वह भी कही ना कही इस ओर इशारा भी कर रही . सभी को ज्ञात है कि पिछले निगम चुनाव जीतने के बाद तात्कालिक विधायक अरुण वोरा ने कांग्रेसियों से कहा था कि जिस जिस परिवार के सदस्यों को पार्षद का टिकट मिला है उसे परिवार के किसी भी सदस्य को एल्डरमैन के लिए अनुशंसा नहीं की जाएगी परंतु राजेश शर्मा के मामले में अरुण बोरा अपने वादों से अपनी बातों में झूठ साबित हुए यह सभी को मालूम है कि राजेश शर्मा का शहर के परिवार से पूर्व में पार्षद टिकिट दिया गया वो भी लीलाधर पाल का टिकिट काट कर जिसका परिणाम इस चुनाव में स्थानीय वार्ड से हार का सामना करना पडा . राजेश शर्मा की माता जी को पार्षद प्रत्याशी का टिकट मिला एवं अपनी बातों से ही मुखरते हुए आदमी बोलते राजेश शर्मा को एल्डरमैन बना दिया जिसे काफी विरोध भी हुआ परंतु विधायक की मर्जी के आगे सब बेबस थे और उसे समय उनके खिलाफ विरोध के स्वर तो थे परंतु वह मनमर्जी के आगे पीछे पड़ गए वहीं पर अंशुल पांडे को भी एल्डरमैन के रूप में नामित किया गया जिनका कोई लंबा राजनीतिक अनुभव भी नहीं था तथा उसे ही निगम के दर्ज़न भर शौच्ल का ठेका देना , अन्य कार्यो का डमी नाम (फार्म) से ठेकों की बरसात .वहीं जिला अध्यक्ष के रूप में आयुष शर्मा को महत्व दिया गया साथ ही नगर निगम के कार्यों में एवं पीडब्ल्यूडी के कार्यों की एक लंबी श्रृंखला उनकी झोली में डाल दी गई इन सब के बाद भूपेश सरकार की महत्वपूर्ण योजना राजीव मितान क्लब में शासन की तरफ से संयोजक के नाम में सुशील भारद्वाज का नाम था जिन्हें दरकिनार करते हुए अरुण वोरा ने विवेक मिश्रा को जो पिछले चुनाव में जोगी कांग्रेस के लिए कार्य कर रहे थे राजीव मितान क्लब का सर्वे सर्वा बना दिया राजीव युवा मितान क्लब में हुए भ्रष्टाचार के बारे में अब पूरा दुर्ग शहर जानता है कि किस तरह राजीव मितान क्लब के पैसों से का भ्रष्टाचार हुआ है जिसमे सामने विवेक मिश्रा का नाम आता है परंतु विवेक मिश्रा के नाम के पीछे पूरा आदेश राजनीति के क्षेत्र में अनुभवहीन सुमित वोरा की मनमर्जी ही चली जिसका परिणाम चुनावी संचालन के समय स्पष्ट देखने को मिला ।
    शासन के पैसों का खुलकर हुआ दुरुपयोग
       ऐसा हो नहीं सकता कि विधायक के रूप में अरुण वोरा के द्वारा शासन के पैसे का दुरुपयोग हो रहा हो और उन्हें जानकारी ना हो विधायक अरुण वोरा द्वारा शासन के पैसे कभी अपने स्वार्थ और अपने चाटुकारों के लिए खुलकर प्रयोग किया गया और जरूरतमंदों को दरकिनार किया गया . स्वैक्षिक अनुदान राशि की बात करें या फिर मुख्यमंत्री अनुदान राशि की हर राशि को विधायक अरुण वोरा द्वारा सिर्फ उन्हीं लोगों को वितरित किया गया जो उनके बंगले में रोजाना हाजिरी देते हैं साल में दो-दो बार यह राशि बंगले में रोजाना हाजिरी देने वालों को लगता है एक परितोष के रूप में वितरित की जाती थी जो की हार का एक बड़ा कारण बना ।
        ऐसे कई अनेक कारण हैं जो अरुण वोरा कि हार में जो अहम भूमिका निभाते हैं और उनमें हुए  भ्रष्टाचार की बाते भी सामने आ रही है जो की हो सकता है भाजपा सरकार द्वारा जांच कर सामने लाई जाएगी चाहे संगठन की बात करें या फिर शासकीय राशियों की या फिर निगम के ठेके के कार्य वितरण की हर जगह अरुण वोरा की मनमानी खूब चली और जरूरतमंदों को उनके कार्यालय से निराश होकर आना पड़ा जिसका परिणाम यह रहा की एक दो वार्ड ही नहीं 57 वार्ड में विधायक अरुण वोरा की जबरदस्त हार हुई और जिले में एक बड़े हार के रूप में आम जनता ने अपना विरोध कांग्रेस प्रत्याशी अरुण वोरा के ऊपर दर्शा दिया . अब देखना यह है कि स्वैक्षिक अनुदान में सूची बदलना ,राजीव मितान क्लब के पैसों का बिना अध्यक्षों की जानकारी के निकालना ,ठगड़ा बाँध में सैकड़ो गाड़ी मुरुम निकालकर बेचना देना जैसे कई मामले जो विवादों में रहे हैं एक-एक व्यक्तियों को दर्जन दर्जन पर शौचालय / राशन दूकान / ठेका कार्य देना मामलों पर भारतीय जनता पार्टी की सरकार और नगरी निकाय मंत्रालय द्वारा किस तरह से संज्ञान लेकर कार्यवाही की जाती है .

    दुर्ग। शौर्यपथ । दुर्ग जिले के सबसे ज्यादा चर्चित विधानसभा सीटों में अगर नाम आएगा तो भिलाई नगर विधानसभा सीट का ही नाम सामने आता है भिलाई नगर विधानसभा क्षेत्र में चुनाव आरंभ होने से मतदान खत्म होने के बाद तक लगातार विवाद की स्थिति निर्मित होती रही है झूठे वादों और सही कम्युनिकेशन का अभाव इसका प्रमुख कारण रहा है । 

    भिलाई नगर से भारतीय जनता पार्टी के विधानसभा प्रत्याशी पूर्व मंत्री प्रेम प्रकाश पांडे एक अच्छे नेता तो हैं परंतु उनके समर्थकों का व्यवहार 5 साल सत्ता से बाहर रहने के बाद भी नहीं बदला चुनाव प्रचार के प्रथम दिन से लेकर अंतिम दिन तक समर्थकों द्वारा व्यवहार में लगातार बदलाव देखने को मिलता रहा जैसे-जैसे मतदान की तारीख नजदीक आती रही वैसे-वैसे उन्होंने मिठास की मात्रा बढ़ती रही चुनाव में मतदान के दिन तक मिठास की मात्रा इस कदर बढ़ गई की आम जनता को अगर मिठास के कारण शुगर भी हो जाए शुगर की बीमारी होने का भी खतरा मंडराने लगा लगातार बदलते व्यवहार से कहीं ना कहीं आम जनता अचंभित भी थी और कशमकश में भी थी मतदान के बाद भाजपा प्रत्याशी पूर्व मंत्री प्रेम प्रकाश पांडे के समर्थकों के व्यवहार में फिर बदलाव देखने को मिलने लगा यहां तक की मीडिया जो कि किसी भी चुनाव में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है जिसके कम्युनिकेशन की जिम्मेदारी जिस नेता/ कार्यकर्ता को थी वह भी मतदान के पहले तक लगातार शब्दों के चयन में बदलाव करते रहे वही मतदान के बाद हुए आमूल चूल परिवर्तन और बातचीत में रूखापन से यह तो निश्चित हो गया कि आज भी यदि पूर्व मंत्री प्रेम प्रकाश पांडे विधानसभा चुनाव में जीत हासिल करते हैं तो यही समर्थक एक बार फिर अपने पुराने ठर्रे पर चलने लगेंगे जैसा की 2018 के चुनाव के पहले चलते थे जिसके कारण आम जनता पूर्व मंत्री के सफल कार्यकाल के बावजूद भी उनके पक्ष में मतदान न कर कांग्रेस के पक्ष में मतदान कर युवा प्रत्याशी देवेंद्र यादव को जीत दिलाई ऐसी ही स्थिति कुछ इस बार भी नजर आने लगी है । अब देखना यह है कि इस बार यदि भाजपा प्रत्याशी प्रेम प्रकाश पांडे चुनावी मैदान में जीत दर्ज करते हैं तो आम जनता से उनका संपर्क सीधे होगा या फिर एक बार फिर बिचौलिए के रूप में अन्य नेता समर्थक अपने पुराने दिनचर्या को लागू करेंगे परिणाम आने में अब 12 दिन ही शेष रह गए हैं और परिणाम के बाद ही यह फैसला होगा की भिलाई विधानसभा क्षेत्र की जनता किसे अपना जनप्रतिनिधि चुनती है।

    नोट:भाजपा प्रत्याशी प्रेम प्रकाश पांडे के चुनावी ज़िम्मेदारी निभाने वाले नेता से बातचीत के आधार पर 

    शौर्य की बाते। भारत एक हिंदू प्रधान देश है ।  भारत में प्रभु श्री राम एक आदर्श शासक के रूप में माने जाते हैं वहीं रामराज्य को एक आदर्श राज्य के रूप में देश की बाहुल्य जनता जानती है । यह तो असंभव सा प्रतीत होता है कि भारत में कभी राम राज्य नहीं आ सकता परंतु उम्मीद ही जिंदगी की बड़ी आस है आज भी आम इंसान जब कहीं बात करता है तो एक अच्छे सुशासन की बात करते समय यह जरूर कहता है कि काश राम राज्य आ जाए और राम राज्य की बात का अर्थ यह है कि एक ऐसा शब्द है जहां पर आम जनता की मूलभूत सुविधाएं और आर्थिक सामाजिक शैक्षिक स्वास्थ्य विभाग पर सरकार मजबूती से काम करें या एक ऐसा शब्द है जिसके द्वारा इंसान यह जताना चाहता है कि उसकी भावना है कि उसके समाज में क्षेत्र में शहर में प्रदेश में और देश में ऐसा सुशासन है जिसे राम राज्य की संज्ञा दी जा सके किंतु सोशल मीडिया में एक फोटो ऐसा वायरल हो रहा है जिसमें एक व्यक्ति द्वारा यह कहा जाना कि जब तक छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की सरकार है राम राज्य की कल्पना बेकार है एक सुशासन के विरोध की बात की ओर इशारा कर रही है रामराज्य का अर्थ सुशासन और खुशहाली से जोड़ा जाता है धार्मिक ग्रंथो में राम राज्य की कल्पना और उसके सार्थकता पर सदा ही बल दिया जाता है परंतु व्यक्ति विशेष द्वारा कांग्रेस की छवि को कहीं ना कहीं इन शब्दों के साथ खराब की जा रही है क्या यह कांग्रेस के लिए एक प्रकार से विरोध के स्वर नहीं है और आम जनता में कांग्रेस के प्रति नफरत फैलाने की मंशा तो नहीं । कई बार पक्ष में की हुई बातें भी आम जनता के लिए गलत संदेश देती है मेरी नजर में व्यक्ति विशेष द्वारा वॉल राइटिंग या लिखा जाना कि छत्तीसगढ़ सरकार में जब तक प्रदेश में छत्तीसगढ़ की सरकार है रामराज्य जी का कल्पना बेकार है । कहीं से भी उचित नहीं है किसी की भावनाओं को ठेस पहुंचाना । भारत में राम राज्य की कल्पना का अर्थ आज आम जनता यह सोचती है कि सभी वर्ग जाति समाज के लोग खुशहाल तरीके से रहे किंतु व्यक्ति विशेष द्वारा इस कल्पना को निरर्थक बताना और वह भी कांग्रेस की सरकार में कांग्रेस के लिए ही वोट प्रतिशत में नुकसान पहुंचा पहुंचने का एक बड़ा कारण बन सकता है या मेरा निजी विचार है कि ऐसे वॉल लाइटिंग पर घड़ी से कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए इसमें सुशासन का विरोध खुलकर किया जा रहा है और इसमें विशेष दल ही नहीं सभी दलों को इस पर कड़ी आपत्ति उठानी चाहिए । 

    यह मेरा निजी विचार है ।

    शौर्य की बाते। छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव की उल्टी गिनती शुरू हो चुकी है ऐसे में सभी दल अपने-अपने पक्ष में मतदान के लिए प्रजा प्रसार में पुरजोर तरीके से लग चुके हैं । छत्तीसगढ़ के साजा विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस का मुख्य मुकाबला है जहां भारतीय जनता पार्टी ने प्रत्याशी के रूप में ईश्वर साहू को चुनावी मैदान में उतारा है वही भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने मंत्री रविंद्र चौबे को अपना प्रत्याशी बनाया है । 

       जहां एक तरफ चुनाव में विकास की बातें महंगाई रोजगार स्वास्थ्य यह मुद्दा होना चाहिए किंतु भारतीय जनता पार्टी के द्वारा इन दिनों सोशल मीडिया पर एक ऐसा वीडियो चलाया जा रहा है जो आने वाले समय में इस नफरत के बीच को एक बड़े पेड़ के रूप में विकसित कर सकता है कहते हैं बाल मन एक कच्ची मिट्टी की तरह होता है इसे जिस रूप में डाला जाए उसके रूप में ढल सकता है इस चुनाव में भारतीय जनता पार्टी के द्वारा एक वीडियो वायरल किया जा रहा है जिसमें मासूम बच्चे धर्म की बात करते हुए नजर आ रहे हैं कहते हैं राजनीतिक धर्म होना चाहिए ताकि राजनीति एक सही दिशा में आगे बढ़ सके परंतु साजा विधानसभा क्षेत्र में इस प्रकार से वीडियो चल रहा है उसमें राजनीति में धर्म नहीं धर्म की राजनीति नजर आ रही है । वीडियो में एक व्यक्ति बच्चों से यह सवाल पूछ रहा है कि साजा विधानसभा में कौन जीतेगा जिसमें बच्चे जवाब देते हैं कि ईश्वर साहू जीतेगा तब पूछने वाला व्यक्ति रविंद्र चौबे के बारे में सवाल करता है कि रविंद्र चौबे क्यों नहीं जीतेगा तब बच्चे यह जवाब देते हैं कि पठान डाहर सपोर्ट करते है । फिर जय श्री राम के नारे लगते है । बच्चो में धर्म की आस्था होनी चाहिए किंतु दूसरे के धर्म के प्रति नफरत के बीच पैदा करना कहां की राजनीति है ऐसे बच्चों से इस तरह के सवाल पूछना और उनकी बातों को सोशल मीडिया में डालकर प्रचार करना कहीं तक भी मेरी नजर में सही नहीं है आज बच्चों को शिक्षा की स्वास्थ्य की अच्छे समाज की आवश्यकता है क्या भारतीय जनता पार्टी की सरकार आ जाएगी तो पूरे प्रदेश के और देश के मुसलमान को इस देश से बाहर भगा सकती है ।  झूठे वादों , नफरती बातो के साथ आखिर कब तक इस प्रकार से नफरत के माहौल को बढ़ाया जाएगा आज देश में मुसलमान को ही नहीं ईसाइयों को जैनियों को पंजाबियों को या अन्य धर्म मानने वालो को  संविधान  यह अधिकार देता है कि वह भारत के नागरिक हैं और भारत की तरक्की में निर्माण में उनका भी पूरा योगदान है फिर इस तरह की नफरत भरी बातों को बच्चों के द्वारा कहलवाकर सोशल मीडिया में प्रचारित करना कहीं से भी सही नहीं है ऐसे वीडियो पर निर्वाचन आयोग को स्वयं संज्ञान लेना चाहिए भारत में नफरत नहीं एकता के साथ ही आगे बढ़ा जाता है और यही कोशिश रही तो ही प्रदेश ही नहीं देश भी आगे बढ़ेगा आखिर कब तक हिंदू मुसलमान की बातें चुनावी मुद्दा बनती रहेंगे ।

    Link  देखने के लिए क्लिक करें

    https://fb.watch/nUd7PF5-WG/?mibextid=Nif5oz

     

    बच्चे ईश्वर का रूप है उन्हे अच्छे संस्कार देने की जिम्मेदारी समाज के सभी वर्ग की है उन्हे राजनीति में इस्तमाल न करे । 

    यह लेखक के निजी विचार है । 

    दुर्ग । शौर्यपथ । दुर्ग कांग्रेस में इन दिनों चर्चा का विषय है कि क्या दुर्ग शहर में ऐसा कोई भी कांग्रेसी नहीं है जो इतना काबिल हो कि विधायक प्रत्याशी के चुनाव का संचालन की भूमिका बखूबी निभा सके और जो पूरे शहर के कांग्रेसी कार्यकर्ताओं को एकजुट कर सके । इन दिनों इस तरह की चर्चा का महत्वपूर्ण कारण यह है कि पिछले कुछ दिनों से एक बार फिर पिछले दो-तीन चुनाव की तरह रायपुर से वोरा परिवार के करीबी दुर्ग कर दुर्गा कांग्रेसियों की मीटिंग ले रहे हैं और चुनावी रणनीति समझा रहे हैं यह भी सुनने को मिल रहा है कि दुर्ग जिला अध्यक्ष वोरा परिवार के करीबी जो रायपुर से आकर कांग्रेसी कार्यकर्ताओं को जिम्मेदारी दे रहे हैं उसे पर मौन रहकर उनके लिए फैसलो पर मुहर लगा रहे हैं । महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दे रहे हैं स्थिति तो यहां तक आ गई कि जो शख्स दुर्ग कांग्रेस का सदस्य भी नहीं है वह पदाधिकारियों की नियुक्ति एवं चुनावी जिम्मेदारियां दे रहा है जिस पर जिला अध्यक्ष गया पटेल द्वारा मुहर भी लगाया जा रहा है एवम कई पदाधिकारियों को संगठन के पद से मुक्त कर दिया गया है । वहीं कई पदाधिकारी दबी जुबान में कह रहे हैं कि संगठन में अगर बाहरी व्यक्ति की ही चलानी है तो फिर हम पदाधिकारी के राय और सहमति का कोई अस्तित्व ही नहीं रह गया। कई कांग्रेसी कार्यकर्ता और पदाधिकारी इसे अपने आत्म सम्मान के साथ जोड़ रहे हैं और अंदर ही अंदर उनके मन में एक विरोध की भावना भी पनप रही है पूर्व में हुए चुनाव में स्थिति जुदा थी उस समय कांग्रेस के सूत्रधार गांधी परिवार के करीबी के रूप में स्वर्गीय मोतीलाल वोरा पूरे चुनावी प्रक्रिया के समय दुर्ग में रहते थे एवं पुराने कार्यकर्ताओं का हौसला बढ़ाते थे परंतु वर्तमान समय में पुराने कार्यकर्ताओं और सक्रिय कार्यकर्ताओं की उपेक्षा दुर्ग में कांग्रेस प्रत्याशी के लिए एक बड़ी चिंता का विषय है । अगर इस विषय में प्रदेश संगठन गंभीरता से संज्ञान ले विचार नहीं किया तो दुर्ग में कांग्रेसी प्रत्याशी को भाजपा के साथ साथ असंतुष्ट कांग्रेसियों से भी मुकाबला करना पड़ेगा । वैसे भी कांग्रेस के वरिष्ठ पार्षद मदन जैन वोरा हटाओ कांग्रेस बचाओ का नारा दे रहे है वही विधायक वोरा के अलावा सभी दावेदार एकजुट है ऐसे में इस बार दुर्ग में चुनावी जंग जोरदार होने की संभावना है ।

     दुर्ग / शौर्यपथ / विधानसभा क्षेत्र में अगर दुर्ग विधानसभा की बात करें तो दुर्ग विधानसभा में दुर्ग की जनता किसे विधायक के रुप में देखना चाहती है इसके लिए आम जनता को भाजपा के उम्मीदवारों की तरफ  ही देखना पड़ेगा जैसा कि पिछले 5-6 विधानसभा चुनाव से कांग्रेस के प्रत्याशी के रूप में बिना किसी दावेदारी के स्वर्गीय मोतीलाल वोरा के पुत्र एवं वर्तमान विधायक अरुण वोरा ही कांग्रेस से एकमात्र दावेदार एवं प्रत्याशी रहते थे वही स्थिति इस विधानसभा चुनाव में भी होने वाली है कांग्रेस से कांग्रेस से विधायक पद के दावेदार के रूप में कोई भी सामने नहीं आ रहा और ना ही आने वाले समय में सामने आएगा ऐसी चर्चा आम जनता में जोरों पर है वही आम जनता की अब निगाहें विपक्षी पार्टी भारतीय जनता पार्टी के ऊपर टिकी है कि भारतीय जनता पार्टी से कौन सा उम्मीदवार है मैदान में उतरेगा . चुनाव रोचक होगा या नहीं इसका सारा दारोमदार अब भारतीय जनता पार्टी के घोषित प्रत्याशी के ऊपर ही टिकी हुई है ।
          यह तो सर्व विदित है कि दुर्ग भारतीय जनता पार्टी में अंदरुनी जंग के कारण विधानसभा चुनाव और नगरी निकाय चुनाव में हार का सामना करना पड़ा है किंतु इस बार जिस तरह से संगठन में सक्रियता से जितेंद्र वर्मा का कार्यकाल चल रहा है और संगठन में रूठे हुए लोगों को मना कर एक बार फिर भाजपा एकजुट होने का प्रयास कर रही है उसमें कितनी सफलता मिलेगी या तो आने वाला समय ही बताएगा .
    बंगले की पसंद का या संगठन की पसंद का होगा उम्मीदवार ....
       दुर्ग की जनता ने सांसद सरोज पाण्डेय का भरपूर सहयोग किया किन्तु पाण्डेय गुट के उम्मीदवार पर आज भी दुर्ग की जनता विश्वास नहीं कर पा रही.. दुर्ग में पाण्डेय गुट के कार्यकर्त्ता पार्टी के प्रति समर्पित तो है किन्तु आम जनता की पहुँच से काफी दूर कुछ सालो से दुर्ग की जनता के बीच सांसद सरोज पाण्डेय की आम जनता से दुरी चर्चा का विषय है . पूर्व अध्यक्ष उषा टावरी और शिव तमेर के कार्यकाल में संगठन निष्क्रिय रहा जो कि जितेन्द्र वर्मा के कार्यकाल के बाद सक्रीय हुआ जिससे एक बार फिर संगठन में अंदरूनी जंग आरम्भ हो गयी जो केन्द्रीय गृह मंत्री के दुर्ग आगमन पर खुलकर सामने दिखने लगी . ऐसे में दुर्ग में भारतीय जनता पार्टी से प्रत्याशी चयन और घोषित उम्मीदवार पर एक बार फिर गुटीय द्वन्द चुनावी परिणाम में असर डाल सकती है पिछले विधान सभा चुनाव में निष्क्रिय महापौर और गुटीय मतभेद से भाजपा प्रत्याशी की बुरी तरह हार हुई थी , निगम चुनाव में भी इसका असर देखने को मिला .  
          किंतु कहते हैं कि चुनाव के पहले दावेदार पोस्टर के माध्यम से सक्रिय हो जाते हैं वैसा ही नजर अब भारतीय जनता पार्टी के तरफ से भी देखने को मिल रहा है अचानक से दुर्ग शहर में तीन-चार नाम लगातार सामने आते जा रहे हैं और यह पोस्टरो के माध्यम से भी साफ नजर आ रहा है इसलिए नगर निगम चुनाव में कांग्रेस के तात्कालिक सभापति राजकुमार नारायण से वार्ड पार्षद का चुनाव हारने के बाद संगठन में अपनी सक्रियता से दुर्ग जिला उपाध्यक्ष तक का सफर करने वाले के.एस चौहान के बारे में भी ऐसी चर्चा चल रही है कि वह भी दावेदारी के लिए प्रयासरत हैं शहर के प्रतिष्ठित व्यक्ति और व्यापारी चतुर्भुज राठी की सक्रियता भी बढ़ती जा रही है आम जनता के बीच में चर्चा का विषय है कि क्या चतुर्भुज राठी भी विधायक की दावेदारी के रूप में अपने आप को पेश कर रहे हैं सोशल मिडिया में राइजिंग पोल में पसंद के विधायक में चतुर्भुज राठी एवं अरुण वोरा के नाम से पोलिंग सर्वे भी शुरू हो गया किसने ये सर्वे शुरू किया यह तो ज्ञात नहीं किन्तु राजनीती में बिना आग के धुवा नहीं उठता .इसी प्रकार पोस्टर  की राजनीति से दूर रहने वाले भारतीय जनता पार्टी के नेता एवं राज्यसभा सांसद व भारतीय जनता पार्टी की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष सरोज पांडे के करीबी कांतिलाल बोथरा भी अचानक पोस्टर  की राजनीति में सक्रिय हो गए हैं आज 5 अगस्त को उनके जन्मदिन है और सालों बाद ऐसा पहली बार देखने को मिलना है कि जगह-जगह उनके जन्मदिन के बधाई के पोस्टर लगे हुए हैं वही राज्य सभा सांसद डॉक्टर सरोज पांडे के उपाध्यक्ष बनने की बधाई के भी पोस्टर उनके द्वारा शहर भर में लगाए गए । आज के राजनीतिक परिवेश में दावेदारी का जो प्रथम चरण रहता है वह पोस्टर  की राजनीति से ही आरंभ होता है आम जनता अपने पुराने अनुभव के अनुसार चौक चौराहों में आजकल इसी चर्चा में व्यस्त रहती है कि कौन सा व्यक्ति कितने पोस्टर लगा रहा है और क्या वह विधायक प्रत्याशी का दावेदार के रूप में अपने नेताओं को खुश कर रहा है ।
       अभी विधानसभा चुनाव होने में 3 महीने का समय है आने वाले समय में अचानक ऐसे और नेता 15 अगस्त,नवरात्रि ,दशहरा ,दिवाली के समय बधाई संदेशों से पोस्टरों के माध्यम से अपनी दावेदारी को मजबूत करने की जुगत में रहेंगे पर टिकट किसे मिलेगी यह तो पार्टी आलाकमान ही तय करती है किंतु यह भी सत्य है कि छत्तीसगढ़ के वर्तमान परिपेक्ष में दुर्ग में अगर भारतीय जनता पार्टी को जीत हासिल करनी है तो छत्तीसगढ़िया मूल के किसी नेता को सामने लाना होगा उसके साथ यह भी जरूरी होगा कि उस प्रत्याशी को सभी गुटों का साथ मिले वरना हर बार की तरह आंतरिक जंग की वजह से एक बार फिर  भाजपा की हार होगी.
      डॉ.सरोज पाण्डेय के राष्ट्रिय उपाध्यक्ष बनने के बाद नई चर्चा ने जन्म ले लिया कि इस बार भी प्रत्याशी का चयन पाण्डेय गुट के ही किसी व्यक्ति का होगा ऐसे में संगठन का और आम जनता का कितना साथ मिलता है प्रत्याशी को यह संशय का विषय है . भूपेश सरकार के अस्तित्व में आने के बाद छत्तीसगढ़ के अधिकतर विधानसभा क्षेत्र में जनता छत्तीसगढ़िया उम्मीदवार कि तरफ रुख करने का मन बना रही है यही कारण है कि सालो से छत्तीसगढ़ की राजनीती करने वाले नेता चाहे वो किसी भी दल के हो अपने आप को ठेठ छत्तीसगढ़िया बताने की असफल कोशिश कर रहे है .
    लेख आम जनता से चर्चो के आधार पर ...

    हमारा शौर्य

    हमारे बारे मे

    whatsapp-image-2020-06-03-at-11.08.16-pm.jpeg
     
    CHIEF EDITOR -  SHARAD PANSARI
    CONTECT NO.  -  8962936808
    EMAIL ID         -  shouryapath12@gmail.com
    Address           -  SHOURYA NIWAS, SARSWATI GYAN MANDIR SCHOOL, SUBHASH NAGAR, KASARIDIH - DURG ( CHHATTISGARH )
    LEGAL ADVISOR - DEEPAK KHOBRAGADE (ADVOCATE)
    © 2015 Shouryapath. All Rights Reserved. Designed By Global Vision