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22 जून 1968 – 22 जून 2025
लेखक: शौर्यपथ विशेष प्रतिनिधि
परिचय: धरती से शीर्ष तक की यात्रा
छत्तीसगढ़ की राजनीति में यदि किसी महिला नेता ने जमीनी राजनीती से लेकर राष्ट्रीय मंच तक अपने व्यक्तित्व, नेतृत्व और दृष्टिकोण से गहरी छाप छोड़ी है, तो वह हैं सुश्री सरोज पांडे। 22 जून 1968 को जन्मी सरोज पांडे आज भारतीय जनता पार्टी की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं, और संगठन में एक मजबूत, भरोसेमंद स्तंभ के रूप में पहचानी जाती हैं।
उनकी राजनीतिक यात्रा दुर्ग से आरंभ हुई, लेकिन उनकी सोच और संगठनात्मक कौशल ने उन्हें देशव्यापी पहचान दिलाई। उनके जन्मदिवस के इस अवसर पर उनके द्वारा किए गए महत्वपूर्ण कार्यों और उनके जीवन के प्रेरणादायी प्रसंगों को स्मरण करना न केवल श्रद्धांजलि है, बल्कि प्रेरणा का स्रोत भी है।
राजनीतिक सफर: संघर्ष, समर्पण और सफलता
➤ दुर्ग नगर निगम से राष्ट्रीय मंच तक
वर्ष 2000: दुर्ग नगर निगम की महापौर निर्वाचित, जहां उन्होंने अपने कुशल प्रशासन से स्वच्छता, पेयजल, सड़कों और सामुदायिक विकास में मील के पत्थर स्थापित किए।
वर्ष 2008: दुर्ग विधानसभा सीट से विधायक चुनी गईं।
वर्ष 2009: दुर्ग लोकसभा सीट से सांसद निर्वाचित होकर दिल्ली की संसद तक पहुंची।
यह रिकॉर्ड उन्हें विशेष बनाता है — एक साथ महापौर, विधायक और सांसद बनने वाली महिला नेता।
संगठन में महत्वपूर्ण भूमिकाएं और कार्यभार
राष्ट्रीय पदों पर विश्वस्त जिम्मेदारी
सरोज पांडे भारतीय जनता पार्टी की उन नेताओं में हैं जिन पर पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने संगठन को विस्तार देने के लिए प्रभारी, सहप्रभारी और पर्यवेक्षक के रूप में कई राज्यों में जिम्मेदारियां सौंपीं, जिनमें प्रमुख हैं:
उत्तर प्रदेश: महिला मोर्चा की प्रभारी और संगठन सशक्तिकरण की जिम्मेदारी।
झारखंड और उत्तराखंड: चुनावी रणनीति, संगठन विस्तार और महिला सशक्तिकरण योजनाओं के लिए पर्यवेक्षक।
बिहार, ओडिशा एवं महाराष्ट्र: प्रभारी के रूप में नियुक्त होकर पार्टी को नई दिशा दी।
छत्तीसगढ़: संगठन में कई बार पुनः सक्रिय भूमिका में, जहां उन्होंने चुनावी प्रबंधन में उत्कृष्ट भूमिका निभाई।
महिला मोर्चा की राष्ट्रीय अध्यक्ष
भारतीय जनता पार्टी के महिला मोर्चा की राष्ट्रीय अध्यक्ष रहते हुए उन्होंने महिला कार्यकर्ताओं के बीच संवाद, प्रशिक्षण और नेतृत्व विकास की एक नई संस्कृति की शुरुआत की।
भाजपा की राष्ट्रीय महासचिव और राष्ट्रीय उपाध्यक्ष
पार्टी ने उन्हें संगठन के शीर्ष पद — राष्ट्रीय महासचिव और वर्तमान में राष्ट्रीय उपाध्यक्ष जैसे पदों पर आसीन किया।
इन पदों पर रहते हुए उन्होंने नीति निर्धारण, संवाद और कार्यकर्ता जुड़ाव जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में उल्लेखनीय कार्य किया।
प्रभावशाली वक्ता और मीडिया की प्रिय नेत्री
सरोज पांडे की पहचान एक तेजस्वी वक्ता और तर्कसंगत प्रवक्ता के रूप में भी है।
वे समाचार चैनलों, जनसभाओं, पार्टी फोरम्स पर गंभीर विषयों को सहज भाषा में रखती हैं।
उनके भाषणों में साफ सोच, स्पष्ट उद्देश्य और संगठन की दृढ़ता झलकती है।
कार्यकर्ताओं की नेता, संगठन की शक्ति
सरोज पांडे की राजनीति केवल पद आधारित नहीं रही, बल्कि कार्यकर्ताओं के साथ जमीन पर खड़ी राजनीति रही है।
वे लगातार बूथ स्तर से लेकर मंडल, जिला और प्रदेश स्तर तक कार्यकर्ता संवाद करती रही हैं।
संगठनात्मक प्रशिक्षण, संवाद यात्रा और कार्यकर्ता सम्मान समारोहों में उनका उत्साह प्रेरणादायक रहा है।
कुछ विशेष उपलब्धियां और स्मरणीय घटनाएं
2010 में "21वीं सदी की प्रभावशाली महिला नेता" पुरस्कार प्राप्त।
2014 और 2019 के लोकसभा चुनावों में भाजपा के स्टार प्रचारक के रूप में कई राज्यों में जनसभाएं लीं।
छत्तीसगढ़ में भाजपा के रणनीतिक चुनावी प्रबंधन की थिंक टैंक सदस्य रहीं।
महिला अधिकार, शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में उन्होंने संसद में कई मुद्दों को पुरजोर ढंग से उठाया।
जन्मदिवस पर संदेश
शौर्यपथ परिवार की ओर से सुश्री सरोज पांडे जी को जन्मदिवस की हार्दिक शुभकामनाएं।
ईश्वर से प्रार्थना है कि उन्हें उत्तम स्वास्थ्य, दीर्घायु और निरंतर जनसेवा का अवसर मिलता रहे।
उनका जीवन न केवल एक प्रेरणा है, बल्कि आज की राजनीति में नैतिकता, नारी नेतृत्व और निष्ठा का प्रतीक है।
"सरोज पांडे — एक नाम, एक पहचान, एक आंदोलन।"
"जहां महिला शक्ति, विचार और संगठन के संगम से उठता है विश्वास का सूरज।"
भिलाई/दुर्ग । शौर्यपथ विशेष।
इंसानियत का कोई धर्म नहीं होता, और मदद का कोई वक़्त नहीं — इस सोच को वास्तविकता में जीने वाले लोगों की सूची में इंद्रजीत सिंह उर्फ ‘छोटू’ का नाम पूरे सम्मान के साथ लिया जाता है। दुर्ग-भिलाई क्षेत्र ही नहीं, बल्कि पूरे छत्तीसगढ़ में इंद्रजीत सिंह छोटू एक ऐसा नाम है, जिसने ट्रांसपोर्ट व्यवसाय को सिर्फ व्यापार नहीं, बल्कि सेवा का माध्यम बना दिया। शौर्यपथ समाचार द्वारा शहर के ऐसे गणमान्य व्यक्तियों का एक संक्षिप्त जीवन परिचय एवं उनके द्वारा समाज के उठान के लिए किये कार्यो का उल्लेख करते हुए उनके द्वारा समाज के लिए किये कार्यो की एक छोटी सी झलक प्रस्तुत कर रहे है उम्मीद है सम्मानित पाठको को यह लेख पसंद आएगा .
परिचय से परे – व्यक्तित्व की गरिमा
भिलाई के निवासी इंद्रजीत सिंह छोटू ट्रांसपोर्ट सेक्टर में एक स्थापित नाम हैं, लेकिन उनके लिए पहचान का असली मानक है – सामाजिक कार्यों के लिए उनकी निःस्वार्थ प्रतिबद्धता।
ड्राइवर, क्लीनर, मजदूर, खिलाड़ी, बेसहारा बच्चे, गरीब परिवार – कोई भी तबका हो, इंद्रजीत सिंह ‘छोटू’ हर बार आगे आते हैं। उनकी सोच हमेशा यही रही है कि “जिस समाज से मिला है, उसे लौटाना भी हमारा कर्तव्य है।”
ड्राइवर-क्लीनर के लिए सुरक्षा कवच
इंद्रजीत सिंह के प्रयासों से सैकड़ों ट्रक ड्राइवरों और क्लीनरों को बीमा सुरक्षा, हेलमेट, मेडिक्लेम, और सड़क सुरक्षा संबंधित प्रशिक्षण दिए गए। उन्होंने ट्रांसपोर्टरों की समस्याओं को लेकर प्रशासन से लेकर सरकार तक सुनियोजित संवाद बनाए रखा है, जिससे नीतिगत सुधार की मांग बार-बार उठती रही।
खिलाड़ियों को मिलता है हौसला
छोटू खुद एक खेल-प्रेमी हैं। उन्होंने स्थानीय स्तर के अनेक क्रिकेट, कबड्डी, फुटबॉल टूर्नामेंट में आर्थिक सहयोग और मंच देकर ग्रामीण खिलाड़ियों को उभरने का मौका दिया है। कई बार राष्ट्रीय स्तर पर चयनित खिलाड़ियों को ट्रेवल और किट सहयोग देकर प्रेरणा दी।
गरीब बेटियों के विवाह की जिम्मेदारी
यहां सिर्फ आर्थिक मदद नहीं, बल्कि पिता समान भावनात्मक जुड़ाव भी देखने को मिलता है। अब तक 40 से अधिक निर्धन परिवारों की बेटियों के विवाह में सहयोग, पूरी शादी की व्यवस्था, कपड़े, गहने, भोजन, और वर-वधू की विदाई तक की पूरी ज़िम्मेदारी निभा चुके हैं।
आपदा में सेवा – जब सब पीछे हटते हैं, छोटू आगे होते हैं
चाहे कोरोना काल हो या सड़क हादसा, इंद्रजीत सिंह छोटू ने एम्बुलेंस, भोजन, मेडिकल किट और ऑक्सीजन सिलेंडर तक उपलब्ध करवाए। लॉकडाउन में भूखे ट्रक ड्राइवरों के लिए भोजन वितरण का उनका नेतृत्व आज भी याद किया जाता है।
ट्रांसपोर्ट सेक्टर के मसीहा
ट्रांसपोर्टरों के हक के लिए प्रभावी यूनियन प्रतिनिधि की भूमिका निभाते हुए उन्होंने माल ढुलाई दरों की पारदर्शिता, पथ कर में छूट, और अनुचित चालान के खिलाफ अभियान चलाए हैं।
समाज को संदेश
इंद्रजीत सिंह जैसे लोग हमें यह सिखाते हैं कि नाम कमाने के लिए मंच नहीं, नीयत चाहिए। उन्होंने यह सिद्ध किया है कि अगर आपका दिल सच्चा है तो समाज खुद आपकी पहचान बन जाता है।
आज जब समाज में स्वार्थ और दूरी बढ़ती जा रही है, ‘छोटू भैया’ जैसे लोग उम्मीद का वह दीपक हैं जो बिना कहे सबके लिए जलता है।
उपसंहार
इंद्रजीत सिंह उर्फ छोटू आज सिर्फ एक नाम नहीं, बल्कि समर्पण, सेवा और सजग नागरिकता का प्रतीक बन चुके हैं। युवा पीढ़ी को उनसे प्रेरणा लेनी चाहिए कि व्यवसाय के साथ-साथ समाजसेवा भी पूरी तन्मयता से की जा सकती है।
दुर्ग। शौर्यपथ। राजनितिक व्यंग
कभी कांग्रेस की गूंज से गूंजने वाला दुर्ग शहर अब सन्नाटे की गिरफ्त में है। कांग्रेस के कार्यकर्ता खुद को सत्ता में रहकर भी यतीम महसूस कर रहे हैं और मंच पर बैठे नेता कुर्सी गिनने में व्यस्त हैं। जंबो कमेटी बनी, पर आंदोलन में दिखते हैं बस कुछ ‘फिक्स’ चेहरे—जैसे कोई बासी फिल्म का री-रन।
“विरोध” अब पोस्टर तक सीमित रह गया है, जबकि कार्यकर्ता सिर्फ व्हाट्सएप ग्रुप में सक्रिय दिखाई देते हैं।
कांग्रेस की दुर्ग शहर इकाई, कभी जोश और जूनून की मिसाल मानी जाती थी, आज निष्क्रियता और गुटबाजी की भेंट चढ़ चुकी है। चुनावी हारें—विधानसभा, लोकसभा और निगम—कह रही हैं कि संगठन में कहीं कुछ बहुत ज्यादा ‘ठहर’ गया है।
इसी राजनीतिक जड़ता के बीच दुर्ग ग्रामीण कांग्रेस के अध्यक्ष राकेश ठाकुर एक अपवाद की तरह उभरे हैं। उनके नेतृत्व में संगठन की हलचलें दिखती हैं, विरोध प्रदर्शन होते हैं, नारे लगते हैं और कार्यकर्ताओं में आत्मबल लौटता दिखता है। ऐसे में कार्यकर्ताओं की यह मांग तेजी से उभर रही है कि अब दुर्ग शहर को भी एक राकेश ठाकुर चाहिए।
जिन्होंने सत्ता में मलाई खाई, वो संगठन की लड़ाई में गायब क्यों हैं?
कार्यकर्ता अब सवाल करने लगे हैं। जब सत्ता थी, तब स्टेज पर हीरो बनकर चमकने वाले नेता अब आंदोलन में “साइलेंट मोड” पर क्यों हैं? क्या कांग्रेस अब भी “अनुमोदन” और “चाटुकारिता” की राजनीति से बाहर नहीं निकल पाई?
राहुल गांधी का बयान—“बारात में नाचने वाले घोड़े नहीं, ज़मीन पर लड़ने वाले कार्यकर्ता चाहिए”—शहर कांग्रेस पर सटीक बैठता है। अब जरूरत है एक ऐसे अध्यक्ष की जो सोशल मीडिया के नेता नहीं, सड़कों के सिपाही हों। जो सिर्फ फोटो खिंचवाने के लिए नहीं, पार्टी के लिए पसीना बहाने के लिए तैयार हों।
देखना दिलचस्प होगा कि प्रदेश कांग्रेस नेतृत्व अब भी “कठपुतली अध्यक्ष” के भरोसे चलता है या एक सक्रिय कार्यकर्ता नेता को संगठन की कमान सौंपता है।
कांग्रेस की वापसी सिर्फ नारों से नहीं, नेतृत्व में बदलाव से ही संभव है।
संपादकीय समाचार
लेखक – शरद पंसारी | शौर्यपथ समाचार
दुर्ग।
छत्तीसगढ़ की राजनीति में इन दिनों फिर से हलचल तेज हो गई है। भारतीय जनता पार्टी की सरकार में मंत्री पद के दो स्थान अभी भी रिक्त हैं, और इसी बीच दुर्ग विधायक गजेंद्र यादव के समर्थकों द्वारा उनके जन्मदिन पर लगाए गए बधाई पोस्टरों ने सियासी चर्चाओं को एक नई दिशा दे दी है।
दुर्ग विधानसभा क्षेत्र के चौक-चौराहों पर लगे इन विशाल बधाई पोस्टरों ने जहां एक ओर विधायक की लोकप्रियता को दिखाने का प्रयास किया है, वहीं दूसरी ओर यह सवाल भी खड़ा कर दिया है कि क्या यह पोस्टर राजनीति मंत्री पद की दौड़ में कोई असर डाल पाएगी?
गौर करने वाली बात यह है कि पोस्टरों में शामिल कई चेहरे ऐसे लोगों के हैं जो न तो भाजपा संगठन की मूलधारा से जुड़े रहे हैं और न ही पूर्ववर्ती कांग्रेस शासन काल में किसी विरोध प्रदर्शन या जन आंदोलन में सक्रिय नजर आए। चुनाव के पहले जिन कार्यकर्ताओं ने सड़कों पर संघर्ष किया, वे चेहरे अब इन बधाई पोस्टरों में कहीं नहीं दिखते।
यह स्थिति केवल दुर्ग तक सीमित नहीं रही है। कुछ महीनों पहले वैशाली नगर विधायक रिकेश सेन के जन्मदिन पर भी ऐसा ही नजारा देखने को मिला था, जब उनके पोस्टरों से न केवल वैशाली नगर बल्कि भिलाई नगर क्षेत्र भी पट गया था। उस समय भी राजनीतिक गलियारों में यही चर्चा थी कि क्या लोकप्रियता का यह दिखावा मंत्रिमंडल तक पहुंच का साधन बन सकता है?
प्रदेश भाजपा में यह सवाल अब प्रमुखता से उभर रहा है कि क्या संगठन की असली शक्ति – वह समर्पित कार्यकर्ता वर्ग जिसने वर्षों तक पार्टी की नींव को सींचा है – को दरकिनार कर, केवल बाहरी समर्थन और पोस्टरबाज़ी के आधार पर किसी को मंत्री बनाया जाएगा?
इस सियासी पटल पर मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के लिए यह एक महत्वपूर्ण निर्णय होगा कि वह मंत्री पद के लिए चयन में संगठन की गहराई और निष्ठावान कार्यकर्ताओं की भूमिका को प्राथमिकता दें या फिर सोशल मीडिया और बधाई पोस्टरों में दिखाई दे रही लोकप्रियता को।
फिलहाल, दुर्ग में गजेंद्र यादव के जन्मदिन को भव्य बनाने के लिए समर्थकों की फौज पूरी तरह सक्रिय है। शहर में हर चौराहे पर लगे पोस्टर यही संदेश देने की कोशिश कर रहे हैं कि गजेंद्र यादव न केवल जनता के बीच लोकप्रिय हैं, बल्कि अगला मंत्री बनने की दौड़ में भी मजबूत दावेदार हैं।
राजनीति के इस पोस्टर युद्ध में अंतिम निर्णय तो भारतीय जनता पार्टी के संगठन और मुख्यमंत्री के विवेक पर निर्भर करेगा, परंतु यह तय है कि आने वाले दिनों में छत्तीसगढ़ की सियासत में यह मुद्दा और भी गर्माने वाला है।
शौर्यपथ समाचार की यह कोशिश हमेशा रहेगी कि वह राजनीतिक घटनाओं के हर पहलू को निष्पक्ष रूप से अपने सम्मानित पाठकों तक पहुंचाए।
सम्पादकीय विश्लेषण (शरद पंसारी )
रायपुर। शौर्यपथ। छत्तीसगढ़ की राजनीति एक बार फिर मंत्रिमंडल विस्तार की संभावनाओं को लेकर गर्म है। वर्तमान भाजपा सरकार में 11 मंत्री कार्यरत हैं, जबकि दो पद रिक्त हैं। ऐसे में दावेदारों की लंबी सूची और राजनीतिक हलकों में गूंजती चर्चाओं के बीच एक बड़ा सवाल फिर से खड़ा हो गया है—क्या मंत्री चयन में जातिगत संतुलन ज़रूरी है, या फिर योग्यता, अनुभव और विकास के प्रति सोच को प्राथमिकता मिलनी चाहिए?
जनता ने कई बार दिया है जाति से ऊपर उठकर फैसला
राजनीति में जातीय समीकरण लंबे समय से एक निर्णायक भूमिका निभाते आए हैं, लेकिन हालिया चुनाव परिणाम बताते हैं कि जनता अब धीरे-धीरे इस सीमित सोच से ऊपर उठ रही है। रायपुर दक्षिण से वर्षों तक विधायक रहे बृजमोहन अग्रवाल के सांसद बनने के बाद हुए उपचुनाव में सुनील सोनी ने बड़ी जीत दर्ज की, यह दिखाता है कि जातिगत फैक्टर नहीं, बल्कि कार्य और छवि ही निर्णायक भूमिका में थे।
इसी तरह, दुर्ग विधानसभा सीट से गजेंद्र यादव की जीत भी यह स्पष्ट करती है कि जनता ने सिर्फ जातीय समीकरण नहीं, बल्कि मजबूत जनसंपर्क और विकास के मुद्दों पर मतदान किया।
मंत्रिमंडल में अनुभव बनाम नवाचार
प्रदेश की प्रशासनिक व्यवस्था में एक मंत्री पर पूरे विभाग का भार होता है। ऐसे में अनुभवहीनता कई बार निर्णय क्षमता को प्रभावित करती है। वर्तमान मंत्रिपरिषद में कुछ मंत्री ऐसे हैं जिन्होंने अपनी सक्रियता और कार्यशैली से जनता का विश्वास अर्जित किया है, परंतु अनुभव की दृष्टि से कई विभागों में शून्यता भी देखी गई है।
अब जब विस्तार की घड़ी नजदीक है, तो यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि पार्टी नेतृत्व अनुभव और प्रशासनिक दक्षता को प्राथमिकता देगा या फिर सिर्फ क्षेत्रीय और जातीय संतुलन को ध्यान में रखकर निर्णय करेगा।
अनुभवी नामों की चर्चा जो हो सकते हैं मंत्रिमंडल का हिस्सा
राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज़ है कि यदि अनुभव को महत्व दिया गया, तो अमर अग्रवाल, अजय चंद्राकर, लता उसेंडी और राजेश मूणत जैसे वरिष्ठ विधायक मंत्रिपरिषद में वापसी कर सकते हैं। इन सभी नेताओं का प्रशासनिक अनुभव और जनता के बीच अच्छी पकड़ रही है।
जनता को चाहिए परिणाम, न कि पदों की बाजीगरी
सवाल सीधा और सटीक है — आम जनता को इससे फर्क नहीं पड़ता कि कौन मंत्री बनता है, फर्क इससे पड़ता है कि उनके क्षेत्र में सड़क बनेगी या नहीं, पानी आएगा या नहीं, अस्पताल और स्कूल कितने मजबूत होंगे।
मंत्रिमंडल विस्तार में अगर यही मूल भावना प्राथमिक होगी, तो न सिर्फ सरकार की छवि मजबूत होगी, बल्कि जनता का भरोसा भी नई ऊंचाई पर पहुंचेगा।
निष्कर्ष:
अब निर्णय सत्ता के केंद्र में बैठे नेताओं के हाथ में है — क्या वे विकास को प्राथमिकता देंगे, या समीकरणों में उलझकर मौके गंवा देंगे? आने वाला वक्त इसका जवाब जरूर देगा, लेकिन जनता को अब सिर्फ एक चीज़ चाहिए — परिणाम।
दुर्ग / शौर्यपथ / दुर्ग नगर पालिक निगम में गत दिवस विशेष सामान्य सभा सत्र का आयोजन किया गया था विशेष सामान्य सभा का आयोजन एक राष्ट्र एक चुनाव के समर्थन के लिए किया गया था किंतु नगर पालिका निगम में एक राष्ट्र एक चुनाव का प्रस्ताव सर्वसम्मति से न होकर बहुमत के आधार पर पास हुआ .
बता दे कि दुर्गा नगर पालिक निगम में बाघमार सरकार पूर्ण बहुमत से है ऐसे में प्रस्ताव का पूर्ण बहुमत से पास होना मात्र औपचारिकता ही थी किंतु वही विशेष सामान्य सभा सत्र काफी गहमागहमी के बीच हुआ सामान्य सभा का विशेष सत्र में विपक्ष की भूमिका निभा रहे हैं कांग्रेस से कांग्रेस पार्षद एवं पूर्व महापौर आर एन वर्मा ने एक राष्ट्र एक चुनाव का प्रस्ताव नगर निगम में लाने की बात का पुरजोर विरोध किया कांग्रेस के नेता आर एन वर्मा ने कहा कि नगर पालिका निगम नियमत: इस प्रकार के किसी भी प्रस्ताव को सदन के पटल पर नहीं रख सकती और इसका कोई औचित्य नहीं रह जाता. ऐसे में जब शहर में भिन्न-भिन्न समस्याओं का अम्बार लगा हुआ है निगम के राजस्व की बर्बादी का औचित्य ही नहीं बनता.
वहीं दूसरी तरफ अगर दुर्ग निगम की बाघमार सरकार की बात करें तो एक तरफ शहरी सरकार एक राष्ट्र एक चुनाव की बात कर रही है परंतु दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में अपनी पहचान बन चुकी भारतीय लोकतंत्र में पक्ष के साथ-साथ विपक्ष की भी बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका होती है ऐसे में दुर्ग नगर निगम की शहरी सरकार के द्वारा विपक्ष को महत्व न देना एक बड़ा ही गंभीर विषय नजर आ रहा है लाखों रुपए खर्च कर बड़े-बड़े विज्ञापन देकर सत्ता संभालने और प्रभारी के पदभार ग्रहण करने के बाद शहरी सरकार ने अपना काम काज आरंभ किया परंतु लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका निभा रहे कांग्रेस को उनका हक नहीं मिला .
सत्ता परिवर्तन के बाद विपक्ष नेता की भूमिका निभा रहे हैं संजय कोहले ने कक्ष की मांग की परंतु शहरी सरकार को अस्तित्व में आये हुए दो माह से भी ज्यादा का समय हो चुका है उन्हें सिर्फ आश्वासन ही मिल रहा है कक्ष नहीं .
पूर्व की बाकलीवाल सरकार ने लोकतंत्र की खूबसूरत तस्वीर पेश करते हुए रूढ्ढष्ट भवन का विस्तार किया और सभागृह तथा दो अतिरिक्त कक्ष का निर्माण करवाया जो नेता प्रतिपक्ष के लिए एवं पार्षदों के लिए आरक्षित था . यह बात अलग है कि पिछली सरकार में भाजपा विपक्ष में थी और नेता प्रतिपक्ष की भूमिका में अजय वर्मा थे अजय वर्मा को पूर्व की बाकलीवाल सरकार के द्वारा कक्ष आवंटन किया गया था परंतु अजय वर्मा ने कक्ष नहीं लिया वहीं वर्तमान की बाघमार सरकार के द्वारा ऐसी कोई लोकतंत्र की खूबसूरत तस्वीर पेश नहीं की गई और ना ही वर्तमान समय तक नेता प्रतिपक्ष को कक्ष देने की पहल की गई .
ऐसे में शहरी सरकार द्वारा एक राष्ट्र एक चुनाव की बात लोकतंत्र की खूबसूरत तस्वीर पर कहीं ना कहीं प्रश्न चिन्ह लगा रहा है बता दे कि प्रदेश के अन्य नगरी निकायों में नेता प्रतिपक्ष को कक्ष का आवंटन किया गया है वहीं कुछ निकायों में वाहन सुविधा भी दी गई है ऐसे में दुर्ग नगर पालिक निगम की शहरी सरकार द्वारा विपक्ष के नेता के साथ इस तरह का व्यवहार लोकतंत्र को आईना दिखाने जैसा प्रतीत हो रहा है मंगलवार को हुए सामान्य सभा के विशेष सत्र के पहले विपक्ष की कांग्रेस ने निगम कार्यालय के द्वारा के पास नेता प्रतिपक्ष का अस्थाई कक्ष खुले स्थान पर कर अपना विरोध भी जताए अब देखना यह है कि एक राष्ट्र एक चुनाव के लाभ की लंबी फेहरिस्त बताने वाली बाघमार सरकार विपक्ष के लिए किस तरह का सार्थक कदम उठाती हैं और लोकतंत्र की खूबसूरती को बरकरार रखने की दिशा में उनके पहल का सभी को इंतजार है?
रायपुर / शौर्यपथ / मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में छत्तीसगढ़ राज्य में इन दोनों ग्रामीण विकास एवं सामाजिक सशक्तिकरण का एक नया इतिहास लिखा जा रहा है। छत्तीसगढ़ सरकार एक अभिनव अभियान मोर दुवार- साय सरकार के माध्यम से गरीब ,वंचित और आवासहीन परिवारों के यहां दस्तक देकर उन्हें सम्मान के साथ प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत पक्के घर का अधिकार देने में जुटी है।
मुख्यमंत्री साय ने बीते दिनों जगदलपुर प्रवास के दौरान घाटपदमपुर ग्राम से इस अभियान की शुरुआत की थी। प्रधानमंत्री आवास योजना का तेजी से और गुणवत्तापूर्ण क्रियान्वयन छत्तीसगढ़ सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता है । इस बात को मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने मुख्यमंत्री का पद संभालने के दूसरे दिन ही कैबिनेट की पहली बैठक में 18 लाख परिवारों को आवास की स्वीकृति प्रदान कर स्पष्ट कर दिया था। छत्तीसगढ़ सरकार इस अभियान के माध्यम से प्रत्येक पात्र परिवार को पक्का आवास देने के अपने संकल्प को पूरा कर रही है।
छत्तीसगढ़ में चल रही ग्रामीण आवास क्रांति का ही यह परिणाम है कि अब गांवों में विशेषकर पिछड़े और गरीब तबके की बस्तियों में मिट्टी के जीर्णशीर्ण घरों और बांस- बल्ली के सहारे टिकी घास-फूंस की झोपड़ी की जगह अब साफ-सुथरे पक्के मकान बने हुए अथवा बनते दिखाई देने लगे हैं। राज्य के मैदानी इलाकों से लेकर सुदूर वनांचल का कोई ऐसा गांव अथवा मजरा- टोला नहीं, जहां 8-10 पक्के घर, प्रधानमंत्री आवास योजना के जरिए हाल- फिलहाल में न बने हों। यह योजना न केवल लाखों गरीब परिवारों को छत दे रही है, बल्कि रोजगार, व्यापार और उद्योगों को भी गति प्रदान कर रही है। इससे सीमेंट, ईट, सरिया और निर्माण सामग्री से जुड़े व्यवसाय में तेजी आयी है। यह जनकल्याण और आर्थिक विकास का एक संतुलित मॉडल है।
छत्तीसगढ़ राज्य को भारत सरकार द्वारा वर्ष 2024-25 के लिए कुल 11,50,315 ग्रामीण आवासों का लक्ष्य प्रदान किया गया है, जिसमें से अब तक 9,41,595 आवासों की स्वीकृति दी जा चुकी है। केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान द्वारा छत्तीसगढ़ प्रवास दौरान राज्य को अतिरिक्त 3 लाख आवासों की स्वीकृति देने से यह प्रयास और भी व्यापक हो गया है। यह छत्तीसगढ़ के इतिहास की अब तक की सबसे बड़ी ग्रामीण आवासीय पहल है।
राज्य सरकार समाज के सभी वर्ग के पात्र परिवारों के साथ-साथ बैगा, कमार, पहाड़ी कोरवा, अबूझमाड़िया एवं बिरहोर विशेष पिछड़ी जनजाति के परिवारों को प्रधानमंत्री जनमन योजना के तहत पक्का आवास उपलब्ध करा रही है। महासमुंद जिले के धनसुली गांव की कमार बस्ती में 15 से अधिक कमार परिवारों को पीएम जनमन योजना के अंतर्गत पक्के आवास उपलब्ध कराए गए हैं। इससे इन जनजातीय परिवारों के जीवन में स्थायित्व आया है और वे शासन की अन्य योजनाओं से भी लाभान्वित हो रहे हैं।
छत्तीसगढ़ सरकार का मोर दुवार- साय सरकार अभियान 30 अप्रैल तक तीन चरणों में संचालित है, जिसमें पात्र हितग्राहियों का घर-घर जाकर सर्वेक्षण करना और ग्राम सभाओं के माध्यम से सूची का वाचन और शत-प्रतिशत पात्र परिवारों का कवरेज सुनिश्चित करने के साथ ही सर्वेक्षण पूर्ण करने वाले कर्मियों का सार्वजनिक सम्मान किया जाएगा। मुख्यमंत्री श्री साय द्वारा गांव में जाकर सर्वेक्षण कार्य का शुभारंभ करना और हितग्राहियों से उनके बारे में जानकारी लेना इस बात का प्रमाण है कि राज्य सरकार इस योजना के प्रभावी क्रियान्वयन को लेकर पूरी तरह संवेदनशील और संकल्पित है।
इस अभियान को जन अभियान का स्वरूप देने के लिए जनप्रतिनिधियों, जनसेवियों और स्थानीय कलाकारों की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित की गई है। पीएम आवास पंचायत एम्बेसडर के रूप में नामित व्यक्तियों द्वारा भी लोगों को प्रेरित किया जा रहा है। गृह पोर्टल के माध्यम से पारदर्शिता एवं जानकारी की सहज उपलब्धता सुनिश्चित की गई है।
प्रधानमंत्री आवास योजना के अतिरिक्त, राज्य में जरूरत मंद परिवारों को पक्का आवास उपलब्ध कराने के लिए छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा मुख्यमंत्री आवास योजना संचालित की जा रही है। इस योजना के तहत 47,090 आवासों के निर्माण के लक्ष्य के विरूद्ध अब तक 38,632 आवास स्वीकृत किए गए हैं। राज्य सरकार की विशष पहल पर आत्मसमर्पित नक्सलियों एवं नक्सल पीड़ितों परिवारों के लिए 15,000 विशेष आवास स्वीकृत हुए हैं, जिनका निर्माण कराया जा रहा है। पीएम जनमन योजना के तहत विशेष पिछड़ी जनजाति के परिवारों के लिए 42,326 आवास के निर्माण के लक्ष्य को हासिल करने के लिए अब तक 27,778 आवासों की स्वीकृति दी जा चुकी है, जिसमें से 6,482 आवासों का निर्माण पूरा हो चुका है। नियद-नेल्ला-नार योजना के अंतर्गत अब तक 477 आवास पूर्ण कराए गए हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा चैत्र नवरात्रि के प्रथम दिन बिलासपुर से 3 लाख हितग्राहियों को गृह प्रवेश कराना इस योजना की सफलता है। पूर्ववर्ती सरकार द्वारा 18 लाख पात्र हितग्राहियों को आवास से वंचित रखा गया। छत्तीसगढ़ सरकार अब हर हितग्राही को उसका अधिकार दिलाने की दिशा में काम कर रही है। मोर दुवार- साय सरकार महाअभियान शासन की संवेदनशीलता, नीति की पारदर्शिता और जनता के प्रति प्रतिबद्धता का प्रतीक है। यह अभियान केवल योजना की सफलता नहीं, बल्कि एक मजबूत, सशक्त और आत्मनिर्भर छत्तीसगढ़ के निर्माण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
लेख : नसीम अहमद खान, उपसंचालक जनसंपर्क
रायपुर। शौर्यपथ।
दुर्ग में हाल ही में मासूम बच्ची के साथ हुई वीभत्स घटना ने हर किसी को झंझोर कर रख दिया इस वीभत्स घटना की निंदा सभी वर्ग के लोगों द्वारा किया जा रहा है समाचार पत्रों में न्यूज़ चेनल में रिश्तो को कलंकित और मासूम बच्ची के लिए गहन दुख की बात कही जा रही है वहीं पुलिस प्रशासन द्वारा मामले पर माननीय न्यायालय में मजबूती के साथ साक्ष्य रखने और आरोपी को जल्द से जल्द सजा हो इस बात के लिए भी कड़े कदम उठाए जा रहे हैं .वैशाली नगर विधायक द्वारा वकीलों से अपील की जा रही है कि माननीय न्यायालय में मासूम बच्ची के पक्ष में मजबूत साक्ष्य रखें ताकि आरोपी को मृत्युदंड मिले हर कही सिर्फ इसी बात की चर्चा आम है कि दोषियों पर कड़ी से कड़ी कार्यवाही हो वहीं इसका अगर दूसरा पहलू देखा जाए तो इस जघन्य अपराध और शहर में हुए अन्य अपराधों में अपराधी के लिए कुछ बातें सामान है ..
सुखा नशा में कुछ अंग्रेजी दवाइयां ऐसी है जो नशे के रूप में इस्तेमाल होती है वही ड्रग विभाग के अधिकारी से चर्चा करने पर यह जानकारी प्राप्त हुई है कि ड्रग विभाग द्वारा लगातार मेडिकल दुकानों का निरीक्षण किया जा रहा है एक अनुमान के मुताबिक पिछले तीन-चार महीना में लगभग 300 से अधिक दुकानों का निरीक्षण किया भी गया वहीं आवश्यकता पडऩे पर पुलिस प्रशासन के साथ मिलकर तकरीबन दर्जन भर करवाई भी की गई वहीं 40 से 50 मेडिकल दुकानों को नोटिस भी भेजा गया शहर में ड्रग विभाग पुलिस प्रशासन लगातार नशीली दवाइयां के अवैध व्यापार परिवहन पर सख्ती पूर्ण करवाई तो कर रही है बावजूद इसके शहर में सुखा नशा का प्रकोप लगातार बढ़ता ही जा रहा है ऐसे में अब इस तरह के जघन्य और वीभत्स अपराध को रोकने के लिए राजनीति से परे उठकर सभी राजनीतिक दलों को और आम जनता को एक जन अभियान छेडऩे की आवश्यकता है जिससे सुखा नशा करने वालों की पहचान हो और उसके द्वारा जहां से सुखा नशा मिलता है उसे तक पहुंचा जा सके सीढी दर सीढी कार्यवाही बिना जन सहयोग के संभव नहीं.
राजनीति से परे और एक सभ्य समाज जहां एक बेटी सुरक्षित रह सके और समाज अपराध मुक्त हो इसके लिए जिला प्रशासन पुलिस प्रशासन को दोष देने की अपेक्षा जन सहयोग से समाज में व्याप्त इस सूखे नशे की बुराई से छुटकारा पाया जा सकता है जिस प्रकार से हाल ही के दिनों में लगातार घटनाएं बढ़ रही है और अधिकतर अपराधों में नशा प्रमुख कारण बना हुआ है ऐसे में अगर जन सहयोग ना हो तो इस तरह के अपराधों के साए में कभी भी कोई भी आ सकता है .
हम जिस समाज में रहते हैं उसे समाज को सुरक्षित रखने के लिए कहीं ना कहीं आमजन को भी विरोध की राजनीती छोड़कर सहयोग की जिम्मेदारी निभानी होगी ताकि और इस तरह के अपराधों को रोकने हेतु जिला प्रशासन पुलिस प्रशासन को भी पूरा सहयोग करना होगा तभी समाज से सूखे नशे का कारोबार खत्म होगा और और खत्म होगी उस पिता की चिंता जिनकी बेटियों घर से बाहर पढ़ाई करने घूमने जाते या अन्य जरुरी कार्यो से घर से बाहर जाति है या माता पिता से दूर होती है . आज एक बेटी के लिए पूरा शहर दुखी है अगर आज नहीं जागे तो सूखे नशे का जाल कभी ना कभी कभी भी किसी को भी अपने आगोश में ले सकता है .
लेख - शरद पंसारी (संपादक - शौर्यपथ दैनिक समाचार )
शौर्यपथ लेख /
जिनको मेरे सामने आपने अस्तित्व को, अपने ओहदे को चीख चीख कर बताना पड़े मुझे उनसे सम्मान की क्या जरूरत है । जिनके काम मेरे से बनते हों क्या सचमुच मैं उनसे सम्मान की हकदार हूं । जहां मेरी उपस्थिति से काम बनते हो वो मुझे सम्मान क्या देंगें। सच में... खुद के लिए क्या कहूं, निःशब्द हूं.....हैरान हूं । एक स्त्री हूं मैं । एक बार फिर से कहूंगी कि मेरे जैसी सिर्फ मैं ही हूं.....नायाब। जब मुझ जैसा कोई नहीं इसलिए अक्सर आईने में खुदको देख लिया करती हूं । मैं खुद का मान हूं । पर इसमें मेरी उपलब्धि कैसी मुझे बनाने वाला तो कोई और है, जिसने सिर्फ इंसान बनाये थे । जिनमें कोई भेद नहीं था । खुदको एक इंसान से स्त्री तो मैंने खुद ही बनाया है और मुझसे कहीं अधिक पुरुष की खुदको वर्चस्व में रखने की सोच ने । एक इंसान से स्त्री बनने का रास्ता जितना भयावह रहा उससे बहुत अधिक भयानक सफर है एक स्त्री से फिर इंसान समझे जाने तक का । मैंने ही तो पुरुष को पुरुष बनने दिया,और खुदको कमजोर बनाती गई। पर अब मैं समझ गई हूं कि मैं एक इंसान हूं ।हां ....मुझ में ऐसी बहुत सी खूबियां है जो मुझे दूसरो से अलग करती हैं। हां सच है..... मुझे जरूरत नहीं किसी पुरुष की । मैं सक्षम हूं हर प्रकार से खुद के लिए । हां ..अगर किसी को जरूरत है मेरी , तो सबसे पहले मुझे एक इंसान की तरह देखे फिर मुझमें स्त्री को । हां ...मैं समझ चुकी हूं कि .. .... कि मैं एक इंसान हूं । मेरी इंसान होने की सोच पर मुझे नाज है जो मुझे औरों से अलग करती है। और मेरी यही सोच मेरी दुनियां बदल रही है। जिसमें मैं जी रही हूं अपने अनगिनत रूपों में और अपने ही कैनवास को अनगिनत रंगों से भर रही हूं। मेरी प्रतिस्पर्धा नहीं किसी से सिर्फ खुदको पहचान चुकी हूं । मेरे सफर ने मुझे मेरे अस्तित्व की पहचान करा दी है । मुझे गर्व है कि मैं एक स्त्री हूं ।
डॉ. अनुराधा बक्शी "अनु" दुर्ग छत्तीसगढ़
दुर्ग / शौर्यपथ / 6 महीने की जेल यात्रा के बाद भिलाई नगर विधायक देवेंद्र यादव को उच्चतम न्यायालय से बेल मिल गई पिछले साल अगस्त महीने में विधायक देवेंद्र यादव को बलौदा बाजार पुलिस ने हिंसा,अग्निकाण्ड सहित अन्य आरोपो के आधार पर हिरासत में लिया था पिछले 6 महीने से देवेंद्र यादव की उच्च न्यायालय में बैल एप्लीकेशन लगातार खारिज होती रही और 20 फरवरी को उच्चतम न्यायालय द्वारा देवेंद्र यादव को बेल मिला .देवेंद्र यादव के जमानत मिलने की खबर के बाद विधायक देवेंद्र यादव के समर्थकों में जहां उत्साह देखने को मिला वही आरोप प्रत्यारोपों का दौर भी आरंभ हो गया सोशल मीडिया में यह ज्ञान सामने आने लगा कि देवेंद्र यादव को बेल मिला है और वह दोष मुक्त नहीं हुए तो फिर जश्न कैसा और यह सही भी है कि बलौदा बाजार पुलिस द्वारा लगाए गए आरोपो के बाद माननीय न्यायालय द्वारा भिलाई नगर विधायक देवेंद्र यादव को अभी दोष मुक्त नहीं किया गया वहीं उच्चतम न्यायालय द्वारा विधायक देवेंद्र यादव को सिर्फ जमानत मिला है तो फिर जश्न कैसा यह सवाल सोशल मीडिया पर लगातार घूम रहा है वहीं इसका दूसरा पहलू यह भी है कि देवेंद्र यादव दोष मुक्त नहीं हुए सिर्फ जमानत मिली परंतु वह दोषी भी सिद्ध नहीं हुए मामला अभी माननीय न्यायालय में विचाराधीन है विचाराधीन मामले पर दोषी करार किया जाना भी कहीं ना कहीं न्यायपालिका के क्षेत्र में हस्तक्षेप जैसा ही है ऐसे कई मामले पूर्व में सामने आ चुके हैं जिसमें सालों बाद हुए फैसले में कई आरोपी दोष मुक्त हुए हैं तो कई आरोपी दोषी सिद्ध हुए .
भारतीय संविधान में न्यायपालिका की व्यवस्था है जिसमें आरोपी तब तक मुजरिम नहीं कहलाता जब तक माननीय न्यायालय द्वारा उन्हें दोषी करार नहीं दिया जाता और ना ही उन्हें दोष मुक्त कहा जाता जब तक माननीय न्यायालय में मामला विचाराधीन होता है दोष मुक्त और दोषी दो शब्दों में जमीन आसमान का फर्क है किसी व्यक्ति के ऊपर कोई मामला विचाराधीन है ना उसे दोष मुक्त कहा जा सकता और ना ही दोषी कहा जा सकता है माननीय न्यायालय के फैसले के बाद ही यह सिद्ध होता है कि मुलजिम निर्दोष है या फिर मुजरिम है शब्दों के इस खेल में अब जब की भिलाई नगर विधायक देवेंद्र यादव को जमानत मिल गई है ऐसे में विधायक यादव के समर्थकों में उत्साह है और जय संविधान के नारे लगाए जा रहे हैं वहीं विपक्ष इस जश्न को दिखावा बता रहा है और फिर से जेल जाने की बात कही जा रही मतलब कि खूब राजनितिक होना भी एक अहम् हिस्सा होता जा रहा है .
माननीय न्यायालय के विचाराधीन मामले में टिप्पणी किया जा रहा है जमानत पर छूटा व्यक्ति तब तक मुक्त नहीं हो सकता जब तक माननीय न्यायालय से उसे दोष मुक्त सिद्ध ना करे . दोष मुक्त और दोषी ,मुजरिम और मुलजिम ,विचाराधीन ,जमानत इन कानूनी शब्दों का संविधान में और न्यायपालिका में महत्वपूर्ण स्थान है परंतु वर्तमान समय में सोशल मीडिया में महा ज्ञानियों की कहीं कमी नहीं ऐसे में एक पक्ष जमानत पर ऐसी खुशियां मना रहा जैसे कि माननीय न्यायालय ने जमानत ना देकर दोष मुक्त कर दिया हो वही दूसरा पक्ष जमानत के बाद खुशियों को बेमानी बताकर ऐसी टिप्पणियों की भरमार कर दी जैसे मुलजिम ना होकर मुजरिम हो .
यह सत्य है कि भारत के लंबे इतिहास में प्रशासनिक कार्यालय (जिलाधीश कार्यालय) पर कभी आगजनी का मामला सामने नहीं आया यह पहली ऐसी घटना है जब किसी कलेक्टर कार्यालय पर आगजनी हुई हो . मामला बेहद गंभीर है और आगजनी में शामिल व्यक्तियों को माननीय न्यायालय द्वारा ऐसी सख्त से सख्त सजा मिलनी चाहिए जो कि एक ऐसी मिसाल बने की भविष्य में कभी कोई शासकीय संपत्ति को नुकसान पहुंचाने की ना सोच सके भारतीय न्यायपालिका को सुस्त कहा जाता है परंतु इसका दूसरा और महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि भारत का नागरिक (गरीब से लेकर आमिर ) आज भी न्याय के लिए इस न्याय के मंदिर पर ही भरोसा करता है और न्याय की उम्मीद में आज भी लाखों करोड़ों लोग न्यायालय की तरफ रुख करते हैं ताकि उन्हें इंसाफ मिल सके देर से ही सही किंतु न्यायपालिका के मंदिर से न्याय जरूर मिलता है और दोषी को सजा . बलोदा बाजार हिंसा मामले में भी आने वाले समय में यही देखने को मिलेगा की न्यायपालिका ने दोषियों को सख्त से सख्त सजा दी और निर्दोषों को दोष मुक्त किया जिसका इंतजार प्रशासन ,राजनीति के लोगों सहित प्रदेश एवं देश की आम जनता को भी है और यह इंतजार भविष्य में फैसले के साथ ही पूर्ण होगी .क्योंकि न्याय के मंदिर से सिर्फ न्याय ही मिलता है जिनका विश्वास सभी को है और इसके फैसले सभी को मंजूर होते हैं
क्या है बलौदाबाजार हिंसा: बलौदाबाजार जिले के महकोनी गांव में 15 और 16 मई की दरमियानी रात अमर गुफा में धार्मिक चिन्ह को नुकसान पहुंचाने के बाद समुदाय विशेष का गुस्सा फूट गया. इस मामले में पुलिस ने तीन आरोपियों को गिरफ्तार किया. लेकिन समाज के लोग इससे संतुष्ट नहीं हुए और सीबीआई जांच की मांग की. इसी घटना को लेकर 10 जून को बलौदाबाजार के दशहरा मैदान में सभा की गई. जिसमें प्रदेशभर के समाज के लोग पहुंचे. सभा के बाद आक्रामक भीड़ ने बलौदाबाजार एसपी और कलेक्ट्रेट कार्यालय में आग लगा दी. कई गाडिय़ां फूंक दी गई. इस सभा में भिलाई नगर विधायक देवेंद्र यादव भी पहुंचे थे. जिससे उन पर भीड़ को उकसाने का आरोप लगा.
17 अगस्त को हुई थी देवेंद्र यादव की गिरफ्तारी: कांग्रेस विधायक देवेंद्र यादव की 17 अगस्त को गिरफ्तारी हुई थी. उन्हें भिलाई में उनके घर से गिरफ्तार किया गया था. उसके बाद 17 अगस्त की रात को ही बलौदाबाजार कोर्ट में पेशी हुई. देवेंद्र यादव की दूसरी पेशी 20 अगस्त को हुई. उसके बाद बलौदाबाजार कोर्ट में तीसरी पेशी 27 अगस्त को हुई. 3 सितंबर को चौथी पेशी हुई. 9 सितंबर को पांचवीं पेशी हुई. 17 सितंबर को उनकी छठवीं पेशी बलौदाबाजार कोर्ट में हुई. इसके बाद कई पेशी होने के बाद विधायक देवेंद्र यादव जमानत याचिका के लिए अपील की. लेकिन बलौदाबाजार सीजेएम कोर्ट, जिला सत्र न्यायालय बलौदाबाजार और हाईकोर्ट बिलासपुर से उनकी जमानत याचिका खारिज हो गई. जिसके बाद विधायक ने सुप्रीम कोर्ट में जमानत याचिका लगाई. जिस पर कोर्ट ने 20 फरवरी की तारीख सुनवाई के लिए तय की . 20 फरवरी को भिलाई नगर विधायक देवेन्द्र यादव को जमानत मिली .
न्यायपालिका पर विश्वास : जमानत मिलने के बाद विधायक देवेन्द्र यादव ने कहा कि उन्हें न्याय पालिका पर पूरा विश्वास है और उन्हें न्याय जरुर मिलेगा जिसका सीधा अर्थ है कि न्याय पालिका के फैसले चाहे जो भी हो उन्हें स्वीकार्य है . ऐसे में वर्तमान समय में दोषी /दोषमुक्त जैसे शब्द के कोई मायने नहीं होते . न्यायालय के आदेश ही सर्वोपरि है और न्याय के लिए जंग पक्ष और विपक्ष कर रहे है जो फैसला होगा वह सभी को मान्य होगा .
निजी विचार - लेख (शरद पंसारी संपादक शौर्यपथ दैनिक समाचार )
दुर्ग । शौर्यपथ । भारतीय जनता पार्टी आज दुर्ग शहर ही नहीं प्रदेश एवं देश में एक ब्रांड के नाम से जाना जाता है भारतीय जनता पार्टी के प्रत्याशियों की जीत उनकी निजी जीत न होकर मजबूत संगठन और उन सक्रिय कार्यकर्ताओं की मेहनत का नतीजा है जिन्होंने सालों संगठन को मजबूत करने में अपना पूरा योगदान दिया ऐसे में निगम चुनाव हो या फिर विधानसभा या लोकसभा भारतीय जनता पार्टी का प्रत्याशी होना ही जीत की ओर एक कदम आगे बढ़ा देता है परंतु वर्तमान समय में दुर्ग नगर निगम में कुछ ऐसे पार्षद भी निर्वाचित हो गए हैं जो ना ही संगठन में अपनी कोई अहम भूमिका निभाई और ना ही भारतीय जनता पार्टी के पुराने कार्यकर्ता रहे परंतु मौका परस्ती और दल बदलू की राजनीति के कारण इनके भाग्य का सितारा भी बुलंदी की ओर पहुंच गया .ऐसे ही एक प्रत्याशी दुर्ग नगर निगम में निर्वाचित होकर आज वार्ड का जनप्रतिनिधित्व करेगा जो पूर्व में हुए निगम चुनाव में निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव जीतकर आए और कांग्रेस सरकार में शामिल होकर कांग्रेसी पार्षद की भूमिका निभाते रहे .वही जब प्रदेश में विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की हार हुई तो एक बार फिर अपनी दल बदलू नीति के तहत भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गए और साल भर में ही उन सक्रीय कार्यकर्ताओं के सपने को रौंद कर फिर से भारतीय जनता पार्टी के बैनर तले निगम चुनाव में अपनी किस्मत आजमाने लगे . परंतु कहा जाता है भारतीय जनता पार्टी में प्रत्याशी होना ही जीत की ओर तेजी से कदम बढ़ाने के बराबर होता है ऐसे में वार्ड नंबर 35 से कुलेश्वर साहू अपने दल बदलू नीति के बाद एक बार फिर नगर निगम में वार्ड नंबर 35 का जनप्रतिनिधित्व करेंगे .चुनावी सीजन में वार्ड की जनता से चर्चा के दौरान कुलेश्वर साहू के बारे में कुछ बातों का खुलासा किया जो आज के लोकतंत्र में आम जनता को सोचने पर मजबूर करता है चर्चा के दौरान वार्ड के कुछ युवाओं ने कहा कि कुलेश्वर साहू सिर्फ चखना सेंटर चलाने और इससे होने वाली कमाई के लिए ही चुनावी मैदान में उतरते हैं वार्ड में विकास कार्य के नाम पर शून्य की स्थिति है कांग्रेस सरकार में शामिल होकर साहू चखना सेंटर चलाते रहे और फिर सरकार बदलने के बाद एक बार फिर अपना रंग दिखाते हुए भारतीय जनता पार्टी में शामिल होकर अपने व्यापार की रक्षा के लिए प्रयत्नशील रहे . वार्ड की जनता के अनुसार नयापारा शराब भट्टी के समीप आज भी पार्षद कुलेश्वर साहू का दुकान है जहां शराबियो की ज़रूरत के सामान मिल जाती है प्रशासन ऐसे कार्यों में कितना सख्त है यह तो साफ नजर आ रहा है परंतु निर्दलीय से कांग्रेसी और कांग्रेसी से भाजपाई 5 साल में लगातार पार्टी बदलने की प्रक्रिया कहीं ना कहीं लोकतंत्र पर विश्वास रखने वालों के लिए एक गहरा आघात है इस वार्ड के कई भाजपा कार्यकर्ता भी जो सालों से चुनावी जंग में उतरने का सपना देख रहे थे कहीं ना कहीं उनके साथ भी अन्याय हुआ परंतु मजबूत संगठन और उनके फैसले के आगे बेबस और एक बार फिर दल बदलू का तमगा लिए कुलेश्वर साहू वार्ड नंबर 35 से पार्षद बन जश्न मना रहे हैं और लोकतंत्र को खुलेआम आइना दिखा रहे हैं .
लेख : वार्ड वासी से चर्चा के आधार पर
राष्ट्रव्यापी उत्सव के रूप में मनाया जा रहा है पोषण माह अभियान
पोषण अभियान से महिलाओं और बच्चों के आहार और व्यवहार में आ रहा सकारात्मक बदलाव
राज्य के 52 हजार से अधिक आंगनबाड़ियों में चल रहा है पोषण अभियान
रायपुर / शौर्यपथ / प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आह्वान पर राष्ट्रीय पोषण अभियान ने एक जन आंदोलन का रूप ले लिया है। चालू माह में पोषण अभियान को राष्ट्रव्यापी उत्सव के रूप में मनाया जा रहा है। राज्य के 52 हजार से अधिक आंगनबाड़ियों में पोषण अभियान संचालित हो रहा हैं। वहीं स्वास्थ्यवर्धक विभिन्न गतिविधियों को आयोजन भी किया जा रहा है। गौरतलब है कि प्रधानमंत्री श्री मोदी ने गर्भवती महिलाओं, स्तनपान कराने वाली माताओं, किशोरियों और छह वर्ष की आयु तक के बच्चों की पोषण स्थिति पर ध्यान केंद्रित करके कुपोषण को दूर करने के लिए वर्ष 2018 में ’राष्ट्रीय पोषण अभियान’ के रूप में शुरू किया था।
मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने कहा कि सुपोषण छत्तीसगढ़ बनाने के लिए हमारी सरकार दृढ़ संकल्पित है, उन्होंने राज्य के समस्त जनप्रतिनिधि, पंचायती राज संस्था के प्रतिनिधियों महिला स्व-सहायता समूहों, प्रबुद्ध वर्ग, विद्यार्थी वर्ग, सार्वजनिक एवं निजी क्षेत्रों के निकायों के प्रतिनिधि एवं समस्त जनसमुदाय से अपील करते हुए कहा है कि पोषण माह की गतिविधियों में पूरे उत्साह और ऊर्जा के साथ छत्तीसगढ़ को कुपोषण और एनीमिया मुक्त बनाने में सहभागी बने। महिलाओं और बच्चों को पोषण के प्रति जागरूक करने के लिए है जन प्रतिनिधियों, पंचायती राज संस्थाओं के प्रतिनिधियों, महिला स्वसहायता समूह, प्रबुद्ध नागरिकों, विद्यार्थियों और स्थानीय जन समुदाय को शामिल किया गया है।
महिला एवं बाल विकास मंत्री श्रीमती लक्ष्मी राजवाड़े ने कहा कि सितंबर माह के प्रथम दिवस से पोषण माह 2024 मनाया जा रहा है, जो पोषण जागरूकता को बढ़ावा देने और एक स्वस्थ भारत के निर्माण की दिशा में समर्पित एक राष्ट्रव्यापी उत्सव है। इस वर्ष अपने 7वें चरण में, पोषण माह अभियान एनीमिया की रोकथाम, विकास निगरानी, सुशासन और प्रौद्योगिकी के माध्यम से प्रभावी सेवा वितरण, पोषण भी पढ़ाई भी और पूरक पोषण जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर ध्यान केंद्रित कर रहा है। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय पोषण माह के तहत् छत्तीसगढ़ के लगभग 52 हजार आंगन बाड़ी केन्द्रों में महिलाओं और बच्चों को स्वास्थ्य के प्रति जागरूक करने और उनके पोषण संबंधित देख-भाल के लिए समझाईश दी जा रही है। गौरतलब है कि छत्तीसगढ़ को एनीमिया और कुपोषण मुक्त बनाने के लिए गांवों में महिला बाल विकास विभाग द्वारा सुुपोषण रथ के माध्यम से जागरूकता लाई जा रही।
राष्ट्रीय पोषण माह के अंतर्गत राज्य के सभी आंगनबाड़ी केंद्रो में प्रतिदिन पोषण व स्वच्छता संबंधी विभिन्न गतिविधियां आयोजित हो रही हैं। साथ ही जिले में 23 सितंबर 2024 तक सभी केंद्रों में वजन त्यौहार मनाया जा रहा है। इस दौरान आंगनबाड़ी केंद्रों में 0 से 06 वर्ष के बच्चों का वजन एवं ऊंचाई मापना, पोषण स्तर की जांच एवं उनके अभिभावकों को पोषण संबंधित जानकारी दी जा रही है। राज्य में राष्ट्रीय पोषण माह अंतर्गत अब तक डैशबोर्ड में 29 लाख 60 हजार 333 गतिविधियों की एंट्री की जा चुकी है। महिला एवं बाल विकास विभाग की संचालक सुश्री तूलिका प्रजापति ने विभाग के सभी अधिकारी-कर्मचारियों को की जा रही शत-प्रतिशत गतिविधियों की ऑनलाइन एंट्री करने के निर्देश दिए हैं।
सभी आंगनबाड़ी केंद्रों में भी समूह बैठक में वजन त्यौहार के बारे में चर्चा की जा रही है। ग्रामीण महिलाओं से चर्चा के दौरान 0 से 06 साल के बच्चे, किशोरी बालिकाओं को खान-पान और स्वास्थ्य देखभाल के बारे में बताया जा रहा है। महिला बाल विकास की योजनाओं की जानकारी देने के साथ ही गर्भवती महिलाओं से पौष्टिक आहार भोजन में शामिल करने का आग्रह किया जा रहा है।
राष्ट्रीय पोषण माह के साथ ही 12 से 23 सितम्बर तक प्रदेश की आंगनबाड़ियों में वजन त्यौहार भी मनाया गया। जिसके अंतर्गत बच्चों के वजन में बढ़ोत्तरी को मापने के साथ ही सामुदायिक जागरूकता का कार्य भी किया गया। वजन त्यौहार के दौरान बच्चों के वजन सहित अन्य विवरण महिला और बाल विकास विभाग के मोबाइल ऐप पर दर्ज किया गया। इसी तरह, पोषण माह के दौरान सुपोषण चौपाल, अन्नप्राशन दिवस, परिवार चौपाल, पोषण मेला, व्यंजन प्रदर्शन जैसे आयोजन पंचायत और शहरी क्षेत्रों में किए जा रहे हैं। पोषण के प्रति बच्चों को जागरूक करने के लिए स्कूलों में नारा लेखन, निबंध, चित्रकला और दीवार लेखन, स्पर्धाएं आयोजित की जा रही हैं। साथ ही स्वस्थ बालक-बालिका प्रतियोगिता का आयोजन भी किया जा रहा है। राष्ट्रीय पोषण माह के तहत ग्राम पंचायत के सहयोग से आंगनबाड़ी केंद्रों और शालाओं में पोषण वाटिका भी विकसित की जा रही है।
राष्ट्रीय पोषण माह 2024 सिर्फ़ एक अभियान नहीं है - यह एक आंदोलन है। किशोरियों को शामिल करके ’एनीमिया मुक्त भारत’ कार्यक्रम के लिए निरंतर समर्थन देकर और सामुदायिक भागीदारी का लाभ उठाकर, भारत कुपोषण मुक्त भविष्य की ओर अपनी यात्रा को तेज़ कर रहा है।
पोषण के प्रति भारत की प्रतिबद्धता सतत विकास के लिए उसकी महत्वाकांक्षा का आधार है। आइए हम सब मिलकर काम करने का संकल्प लें, ताकि भारत में हर बच्चे, माँ और परिवार को पौष्टिक भोजन और स्वस्थ भविष्य मिल सके। इस अभियान में हम सभी शामिल हों। साथ मिलकर हम कुपोषण मुक्त भारत का लक्ष्य हासिल कर सकते हैं।
साभार -
•डॉ.दानेश्वरी सम्भाकर
सहायक संचालक
शौर्यपथ / सनातन धर्म में इस तिथि में ऋषि पंचमी मनाया जाता है। इस दिन सप्त ऋषियों की पूजा की जाती है। ऋषि पंचमी का व्रत महिलाओं के लिए विशेष होता है। द्रिक पंचांग के अनुसार, 08 सितंबर को इन्द्र योग का निर्माण हो रहा है।
8 सितंबर का दिन भारत के इतिहास में एक काले अध्याय के रूप में याद किया जाता है। इसी दिन 2008 में महाराष्ट्र के मालेगांव में बम ब्लास्ट हुआ था। इस हमले में करीब 37 लोगों मारे गए थे। साथ ही 125 से अधिक लोग घायल हुए थे।
8 सितंबर को विश्व साक्षरता दिवस के रूप में मनाया जाता है .
8 सितंबर की महत्त्वपूर्ण घटनाएँ
1271 - जाॅन XXI का पोप के रूप में चयन।
1320 - गाजी मलिक दिल्ली का सुल्तान बना।
1331 - स्टीफन उरोस चतुर्थ ने खुद को सर्बिया का राजा घोषित किया।
1449 - टुमू किले का युद्ध- मंगोलिया ने चीन के सम्राट को बंधक बनाया।
1553 - इंग्लैंड में लिचफिल्ड शहर का निर्माण।
1563 - मैक्सीमिलियन को हंगरी का राजा चुना गया।
1689 - चीन और रूस ने नेरट्सजिंस्क (निरचुल) की संधि पर हस्ताक्षर किया।
1900 - टेक्सास के गैलवेस्टोन में चक्रवाती और ज्वारीय तूफान से 6000 लोगों की मौत
1952 - जेनेवा में काॅपीराइट के लिये पहले विश्व सम्मेलन में भारत समेत 35 देशों ने किये हस्ताक्षर।
1962 - चीन ने भारत की पूर्वी सीमा में घुसपैठ किया।
1988 - जाने माने व्यवसायी विजयपत सिंघानिया अपने माइक्रो लाइट सिंगल इंजन एयरक्राफ्ट से लंदन से अहमदाबाद पहुँचे।
1991 - मैसिडोनिया गणराज्य स्वतंत्र हुआ।
1997 - अमेरिकी ओपन टेनिस चैम्पियनशिप में पैट्रिक राफ़्टर को प्रथम ग्रैंड स्लैम ख़िताब मिला।
1998 - 2001 में निर्धारित 13वें गुट निरपेक्ष आंदोलन की मेजबानी बांग्लादेश को सौंपी गयी।
2000 - भारतीय प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने संयुक्त राष्ट्र शांति शिखर सम्मेलन के दौरान हिन्दी में भाषण देते हुए पाकिस्तान को लताड़ा।
2002 - नेपाल में माओवादियों ने 119 पुलिस कर्मियों को मार डाला।
2003 - इस्रायल के प्रधानमंत्री एरियल शैरोन चार दिवसीय भारत यात्रा पर नई दिल्ली पहुँचे।
2006 - महाराष्ट्र के नासिक ज़िले में मालेगाँव बम धमाके।
2008 -
सर्वोच्च न्यायालय ने कैनफिना म्यूचुअल फण्ड घोटाले मामले के मुख्य अभियुक्त और शेयर दलाल केतन पारिख व अन्य आरोपियों को ज़मानत दी।
प्रसिद्ध अमेरिका पत्रिका फोर्ब्स ने भारतीय अरबपति लक्ष्मी मित्तल को लाइफ टाइम अचीवमेण्ट अवार्ड देने की घोषणा की।
2009 - भारत ने विमानवाहक पोत एडमिरल गोर्शकोव को नए कलपुर्ज लगाकर तैयार करने के लिए रूस को 10 करोड़ 20 लाख डालर दिये।
रायपुर / शौर्यपथ / छत्तीसगढ़ की संस्कृति अपनी अति विशिष्ट परंपराओं और पर्वों के लिए जानी जाती है और हर पर्व, प्रकृति के पीछे गहरे समर्पण की मिसाल देता है। हरियाली को लेकर ऐसा ही दुर्लभ पर्व हरेली है, जब पूरी धरती हरीतिमा की चादर ओढ़ लेती है। धान के खेतों में रोपा लग जाता है और खेतों में चारों ओर प्रकृति अपने सुंदर नजारे में अपने को व्यक्त करती है। धरती माता का पूरा स्नेह पृथ्वीवासी या हर जीव-जन्तु पर उमड़ता है और इस स्नेह के प्रतिदान के लिए हम हरेली में प्रकृति को पूजते हैं। इस बार हरेली पर्व पर एक और खुशी हमारे प्रदेशवासियों के साथ जुड़ रही है। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने एक पेड़ माँ के नाम पर लगाने के अभियान का आगाज किया है। मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में छत्तीसगढ़ में यह अभियान पूरे उत्साह से चल रहा है। मुख्यमंत्री ने हरेली के अवसर पर लोगों से पेड़ लगाने की अपील की है। यह पेड़ वे अपनी माँ के नाम लगाएंगे साथ ही धरती माँ के नाम लगाएंगे, जो धरती हमें इतना कुछ देती है, उसके श्रृंगार के लिए पौधा लगाएंगे और सहेजेंगे। यह पौधा हमारी हरेली की स्मृतियों को सुरक्षित रखने के लिए भी यादगार होगा। साथ ही प्रदेश भर में जहां भी खुले मैदानों में पौधरोपण के आयोजन होंगे वहां लोग गेड़ी का आनंद भी लेंगे। अपनी प्रकृति और परिवेश से जुड़ने और इसे समृद्ध करने से बढ़कर सुख और क्या होगा।
छत्तीसगढ़ का पहला लोक पर्व हरेली
छत्तीसगढ़ का सबसे पहला लोक पर्व हरेली है, जो लोगों को छत्तीसगढ़ की संस्कृति और आस्था से परिचय कराता है। हरेली का मतलब हरियाली होता है, जो हर वर्ष सावन महीने के अमावस्या में मनाया जाता है। हरेली मुख्यतः खेती-किसानी से जुड़ा पर्व है। इस त्यौहार के पहले तक किसान अपनी फसलों की बोआई या रोपाई कर लेते हैं और इस दिन कृषि संबंधी सभी यंत्रों नागर, गैंती, कुदाली, फावड़ा समेत कृषि के काम आने वाले सभी तरह के औजारों की साफ-सफाई कर उन्हें एक स्थान पर रखकर उसकी पूजा-अर्चना करते हैं। घर में महिलाएं तरह-तरह के छत्तीसगढ़ी व्यंजन खासकर गुड़ का चीला बनाती हैं। हरेली में जहाँ किसान कृषि उपकरणों की पूजा कर पकवानों का आनंद लेते हैं, आपस में नारियल फेंक प्रतियोगिता करते हैं, वहीं युवा और बच्चे गेड़ी चढ़ने का मजा लेते हैं।
हरेली के दिन गांव में पशुपालन कार्य से जुड़े यादव समाज के लोग सुबह से ही सभी घरों में जाकर गाय, बैल और भैंसों को नमक और बगरंडा का पत्ता खिलाते हैं। हरेली के दिन गांव-गांव में लोहारों की पूछपरख बढ़ जाती है। इस दिन गांव के लोहार हर घर के मुख्य द्वार पर नीम की पत्ती लगाकर और चौखट में कील ठोंककर आशीष देते हैं। मान्यता है कि ऐसा करने से उस घर में रहने वालों की अनिष्ट से रक्षा होती है। इसके बदले में किसान उन्हे दान स्वरूप स्वेच्छा से दाल, चावल, सब्जी और नगद राशि देते हैं। ग्रामीणों द्वारा घर के बाहर गोबर से बने चित्र बनाते हैं, जिससे वह उनकी रक्षा करे।
हरेली से तीजा तक गेड़ी दौड़ का आयोजन
हरेली त्यौहार के दिन गांव के प्रत्येक घरों में गेड़ी का निर्माण किया जाता है, मुख्य रूप से यह पुरुषों का खेल है घर में जितने युवा एवं बच्चे होते हैं उतनी ही गेड़ी बनाई जाती है। गेड़ी दौड़ का प्रारंभ हरेली से होकर भादो में तीजा पोला के समय जिस दिन बासी खाने का कार्यक्रम होता है उस दिन तक होता है। बच्चे तालाब जाते हैं स्नान करते समय गेड़ी को तालाब में छोड़ आते हैं, फिर वर्षभर गेड़ी पर नहीं चढ़ते हरेली की प्रतीक्षा करते हैं। चूंकि वर्षा के कारण गांव के कई जगहों पर कीचड़ भर जाता है, इस समय गेड़ी पर बच्चे चढ़कर एक स्थान से दूसरे स्थान पर आते जाते हैं उसमें कीचड़ लग जाने का भय नहीं होता। बच्चे गेड़ी के सहारे कहीं से भी आ जा सकते हैं। गेड़ी का संबंध कीचड़ से भी है। कीचड़ में चलने पर किशोरों और युवाओं को गेड़ी का विशेष आनंद आता है। रास्ते में जितना अधिक कीचड़ होगा गेड़ी का उतना ही अधिक आनंद आता है। वर्तमान में गांव में काफी सुधार हुआ है गली और रास्तों पर काम हुआ है। अब ना कीचड़ होती है ना गलियों में दलदल। फिर भी गेड़ी छत्तीसगढ़ में अपना महत्व आज भी रखती है। गेड़ी में बच्चे जब एक साथ चलते हैं तो उनमें एक दूसरे से आगे जाने की इच्छा जागृत होती है और यही स्पर्धा बन जाती है। बच्चों की ऊंचाई के अनुसार दो बांस में बराबर दूरी पर कील लगाते हैं और बांस के टुकड़े को बीच में फाड़कर दो भाग कर लेते हैं, फिर एक सिरे को रस्सी से बांधकर पुनः जोड़ देते हैं इसे पउवा कहा जाता है। पउवा के खुले हुए भाग को बांस में कील के ऊपर फंसाते हैं पउवा के ठीक नीचे बांस से सटाकर 4-5 इंच लंबी लकड़ी को रस्सी से इस प्रकार बांधते है, जिससे वह नीचे ना जा सके लकड़ी को घोड़ी के नाम से भी जाना जाता है। गेड़ी में चलते समय जोरदार ध्वनि निकालने के लिए पैर पर दबाव डालते हैं जिसे मच कर चलना कहा जाता है।
नारियल फेंक प्रतियोगिता
नारियल फेंक बड़ों का खेल है इसमें बच्चे भाग नहीं लेते। प्रतियोगिता संयोजक नारियल की व्यवस्था करते हैं, एक नारियल खराब हो जाता है तो तत्काल ही दूसरे नारियल को खेल में सम्मिलित किया जाता है। खेल प्रारंभ होने से पूर्व दूरी निश्चित की जाती है, फिर शर्त रखी जाती है कि नारियल को कितने बार फेंक कर उक्त दूरी को पार किया जाएगा। प्रतिभागी शर्त स्वीकारते हैं, जितनी बार निश्चित किया गया है उतने बार में नारियल दूरी पार कर लेता है तो वह नारियल उसी का हो जाता है। यदि नारियल फेंकने में असफल हो जाता है तो उसे एक नारियल खरीद कर देना पड़ता है। नारियल फेंकना कठिन काम है इसके लिए अभ्यास जरूरी है। पर्व से संबंधित खेल होने के कारण बिना किसी तैयारी के लोग भाग लेते है।
बस्तर क्षेत्र में हरियाली अमावस्या पर मनाया जाता है अमुस त्यौहार
छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में ग्रामीणों द्वारा हरियाली अमावस्या पर अपने खेतों में औषधीय जड़ी-बूटियों के साथ तेंदू पेड़ की पतली छड़ी गाड़ कर अमुस त्यौहार मनाया जाता है। इस छड़ी के ऊपरी सिरे पर शतावर, रसना जड़ी, केऊ कंद को भेलवां के पत्तों में बांध दिया जाता है। खेतों में इस छड़ी को गाड़ने के पीछे ग्रामीणों की मान्यता यह है कि इससे कीट और अन्य व्याधियों के प्रकोप से फसल की रक्षा होती है। इस मौके पर मवेशियों को जड़ी बूटियां भी खिलाई जाती है। इसके लिए किसानों द्वारा एक दिन पहले से ही तैयारी कर ली जाती है। जंगल से खोदकर लाई गई जड़ी बूटियों में रसना, केऊ कंद, शतावर की पत्तियां और अन्य वनस्पतियां शामिल रहती है, पत्तों में लपेटकर मवेशियों को खिलाया जाता है। ग्रामीणों का मानना है कि इससे कृषि कार्य के दौरान लगे चोट-मोच से निजात मिल जाती है। इसी दिन रोग बोहरानी की रस्म भी होती है, जिसमें ग्रामीण इस्तेमाल के बाद टूटे-फूटे बांस के सूप-टोकरी-झाड़ू व अन्य चीजों को ग्राम की सरहद के बाहर पेड़ पर लटका देते हैं। दक्षिण बस्तर में यह त्यौहार सभी गांवों में सिर्फ हरियाली अमावस्या को ही नहीं, बल्कि इसके बाद गांवों में अगले एक पखवाड़े के भीतर कोई दिन नियत कर मनाया जाता है।
साभार : • डॉ. दानेश्वरी संभाकर,सहायक संचालक
Feb 09, 2021 Rate: 4.00
