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छत्तीसगढ़ / शौर्यपथ / पेंशन योजना एक ऐसी योजना है जिसके कारण उन कर्मचारियों का परिवार में महत्तव अंतिम साँस तक बरक़रार रहता है जो औलादे अपने माता पिता को सोने का अंडा देने वाली मुर्गी समझती है . आज ऐसा कई जगह देखने को मिलता है जहा जो परिवार के बुजुर्ग जब सेवानिवृत होकर घर में अपना समय गुजरते है और सेवानिवृत की एक मुश्त राशि जब उनके बैंक खातो में आती है तो परिवार के अन्य सदस्य तब तक उनके आगे पीछे मंडराते है जब तक उनके बैंक खातो में लाखो रूपये रहते है एक बार ये रूपये उनके कब्जों में गए नहीं कि फिर असली रंग दिखना शुरू हो जाता है तब उम्र के आखिरी पडाव में ऐसे बुजुर्ग परिवार से तो दूर हो ही जाते है साथ ही एक एक रूपये के लिए भी तरसते रहते है . किन्तु पेंशन राशि के महीने दर महीने आने से परिवार के हर सदस्य का प्यार उन पर हमेशा बना रहता है . ऐसा नहीं कि हर बुजुर्ग के साथ यह होता है किन्तु कुछ के साथ ऐसी घटना अक्सर सामने आती रहती है . भूपेश सरकार की इस पेंशन योजना को पुनह लागू करने से कर्मचारियों में जिस तरह की ख़ुशी दिखाई दी उससे तो यह साफ़ है कि आने वाले समय में हर वो पेंशनधारी अपनी जिन्दगी की आखिरी साँस तक सर उठा कर परिवार के मुखिया के रूप में अपनी जिन्दगी जीता रहेगा और परिवार में कभी तिरस्कार का सामना नहीं करना पड़ेगा क्योकि किसी ने भी क्या खूब कहा है पैसा भगवान् तो नहीं किन्तु भगवान् से कम भी नहीं . मेरे निजी नजरिये के के अनुसार भूपेश सरकार का यह फैसला कई परिवार को एक सूत्र में बांधे रखने में एक कारगार कदम है जिसकी जितनी भी सराहना कि जाए बहुत ही कम है जैसे सूर्य को रौशनी दिलाने के सामान . भूपेश सरकार के पेंशन स्कीम की पुनः लागू करने पर साधुवाद .
शरद पंसारी
संपादक - दैनिक शौर्यपथ समाचार पत्र
शौर्यपथ / प्रदीप भोले एक गरीब परिवार का आदमी था।अपनी पत्नीऔर दो बच्चों के साथ मेहनत मजदूरी करके वह परिवार की जिंदगी की गाड़ी जैसे तैसे खींच रहाथा। बरसात के मौसम में लगातार बारिश की वजह से काम पर नहीं जा पाने के कारण घर में राशन पानी का संकट उठ खड़ा हुआ।आर्थिक तंगी से जूझने की नौबत आ गई थी।ऐसे में परिवार चलाने की जिम्मेदारी को निभाने के लिए भोले को खराब मौसम में भी काम पर जाना ही पड़ा।
तब भोले की पत्नी घर पर गीली लकड़ी सुलगाते हुए चुल्हे पर रोटी पका रही थी।बच्चे भूख से ब्याकुल थे।वे रोटी पकने की बेसब्री से प्रतीक्षा कर रहे थे।तवे परअधपकी रोटी को मां ने चिमटे से पकड़कर चूल्हे कीआग में पलट पलट कर सेंकना शुरू किया।तभीभूख कीआग में जलती पेट कीअंतड़ियों को सहलाते हुए बच्चे ने सवाल किया- मां बहुत खराब मौसम है,फिर भी बाबूजी को काम करने क्यों जाना पड़ा?
बच्चे के सवाल का जवाब देती हुई मां बोली-देखो बेटा,चूल्हे की धधकतीआग में रोटी को पकाने,उसे जलने से बचाने के लिए उलटने पलटने की जवाबदेही चिमटे की ही होती है।पकी हुई रोटी को निकालने के लिए चिमटे को आग मेंअपना मुंह जलाना ही पड़ता है।तुम्हारे बाबूजी भी चिमटे की तरह ही हैं।वेअपनी जिम्मेदारी निभाने निकले हैं।इतना कहते-कहते मां की आंखें धूंए से भर गई थी।
इसे देखकर बच्चा उठा और मां कीआंखों से बहते आंसू को पोंछते हुए बोला- मां,तुझेऔर बाबूजी को गरम गरम रोटी खिलाने के लिए,बड़ा होकर मैं भी चिमटा ही बनूंगा।बच्चे की बात सुनते ही मां ने झट से रोटी का एक टुकड़ा बच्चे के मुंह में डालाऔर उसे कलेजे से लिपटा लिया।
विजय मिश्रा 'अमित'
पूर्व अति.महाप्रबंधक(जन.) छग पावर कम्पनी,
शौर्यपथ / गांव के सामान्य किसानों में प्रदीप भोले की गिनती होती थी।जमीन कम थी मगर उसका हौसला गज़ब का था। थोड़ी सी खेती में कुछअच्छा उपजा लेने की आस लिए बैंक से लोन लेने शहर के बैंक में भोले पहुंचा था।दो तीन महीने तक वह बैंक के चक्कर काट चुका था,पर फायदा ढेले भर का नहीं हुआ था।आखिर में बैंक के बड़े बाबू ने कुछ ले देकर भोले को लोन दिलाना पक्का कर दिया।
लोन देने के पहले उसके खेत जमीन का प्रत्यक्ष मुआईना करने बड़े बाबू लोन के कागजात लेकर भोले के गांव पहूंचा।वह रात की पार्टी के बहाने भोले के घर रुका।आधी रात तक मुर्गा शराब खाने पीने के बाद मुंह फाड़ते हुए बाबू सोने के लिए पंलग के करीब पहुंचा।पंलंग में मछरदानी नहीं लगा था।इसे देखकर बौखलाए सांड़ की तरह वह भड़क उठाऔर बोला-बिना मच्छरदानी के मैं सो नहीं पाऊंगा।साले मच्छर तो रात भर में मेरे शरीर का पूरा खून चूस डालेंगे।
बाबू की बातें सुनकर भोले सकपकाया हुआ दौड़ते गयाऔरअपने बच्चे की खाट पर लगे मछरदानी को निकाल कर बैंक बाबू के पलंग में लगा दिया।बैंक बाबू अपने रूदबे के असर में डुबा बेखबर शीघ्र ही चैन की नींद सो गया।यह सब देखकर भोले का बच्चा पूछ पड़ा- बाबूजी,बैंक बाबू जैसे मच्छर हमें ना चूस सकें इसके लिए कोई मछरदानी नहीं बनी है क्या ? बच्चे के इस प्रश्न से भोले की सोई आत्मा जाग उठी।उसका स्वाभिमान उसे ललकारते हुए धिक्कारने लगा।
भोले तमतमा उठाऔर सोते हुए बैंक बाबू के पलंग के करीब जा पहुंचा।उसने पलंग में लगे मछरदानी को झटके से निकाल कर वापस अपने बच्चे की पलंग पर लगा दिया।भोले का ऐसा भयानक रूप देखते ही बैंक बाबू सहम गया।थूक निगलते हुए वह उठाऔर साथ में लाए लोन के कागज पर कांपते हाथों से धड़ल्ले से हस्ताक्षर करता चला गया।
हस्ताक्षर करने के उपरांत वह गिड़गिड़ाते हुए बोला -भोले ,मुझे अभीआधी रात को घर से मत भगाना।इस वक्त शहर जाना माने अपनी जिंदगी को खतरे में डालना है।दया करना मेरे छोटे छोटे बच्चे हैं।भोले ने हंसते हुए कहा-चिंता मत करो साहेब।हम मच्छर नहीं किसान हैं।अपना पेट भरने के लिए हम दूसरों का खून नहीं चूसते,बल्कि दूसरों का पेट पालने के लिएअपना खून-पसीना बहाते हैं। इसीलिए शोषक नहीं पालनहार पोषक कहलाते हैं। भोले की बातें सुनकर बैंक बाबू की आंखें शर्म से झुकी जा रही थीं।
विजय मिश्रा "अमित"
पूर्व अति महाप्रबंधक (जन.)
छग पावर कम्पनी,
श्री ललित चतुर्वेदी, उप संचालक जनसंपर्क
शौर्यपथ लेख / राष्ट्रीय आदिवासी नृत्य महोत्सव में छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति, लोक गीत, नृत्य और संपूर्ण कलाओं से परिचित होगा देश और विदेश। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में यह आयोजन 28 से 30 अक्टूबर तक किया जा रहा है। राजधानी का साईंस कॉलेज मैदान आयोजन के लिए सज-धज कर तैयार हो चुका है। इस महोत्सव में विभिन्न राज्यों के आदिवासी लोक नर्तक दल के अलावा देश-विदेश के नर्तक दल भी अपनी प्रस्तुति देंगे।
छत्तीसगढ़ राज्य की 5 विशेष पिछड़ी जनजातियों में से एक बैगा जनजाति है। राज्य के कबीरधाम, मंुगेली, राजनांदगांव, बिलासपुर और कोरिया जिले में निवासरत है। बैगा जनजाति अपने ईष्ट देव की स्तुति, तीज-त्यौहार, उत्सव एवं मनोरंजन की दृष्टि से विभिन्न लोकगीत एवं नृत्य का गायन समूह में करते हैं। इनके लोकगीत और नृत्य में करमा, रीना-सैला, ददरिया, बिहाव, फाग आदि प्रमुख हैं। इसी प्रकार दण्डामी माड़िया जनजाति गांेड जनजाति की उपजाति है। सर डब्ल्यू. वी. ग्रिगसन ने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ ’द माड़िया जनजाति के सदस्यों द्वारा नृत्य के दौरान पहने जाने वाले गौर सिंग मुकुट के आधार पर ’बायसन हार्न माड़िया‘ जनजाति नाम दिया। प्रसिद्ध मानव वैज्ञानिक वेरियर एल्विन का ग्रंथ ’द माड़िया-मर्डर एंड सुसाइड‘ (1941) दण्डामी माड़िया जनजाति पर आधारित है। बैगा और माड़िया जनजाति के रस्मों-रिवाजों पर आधारित प्रमुख लोक नृत्य इस प्रकार हैं।
’रीना सैला नृत्य‘
बैगा जनजाति का प्रकृति एवं वनों से निकट संबंध है। जिसका बखान इनके लोक संस्कृति में व्यापक रूप से देखने को मिलता है। बैगा जनजाति की माताएं, महिलाएं अपने प्रेम एवं वात्सल्य से देवी-देवताओं और अपनी संस्कृति का गुणगान गायन के माध्यम से उनमें गीत एवं नृत्य से बच्चों को परिचित करने का प्रयास करती है। साथ ही बैगा माताएं अपने छोटे शिशु को सिखाने एवं वात्सल्य के रूप में रीना का गायन करती हैं। वेशभूषा महिलाएं सफेद रंग की साड़ी धारण करती हैं। गले में सुता-माला, कान में ढार, बांह में नागमोरी, हाथ में चूड़ी, पैर में कांसे का चूड़ा एवं ककनी, बनुरिया से श्रृंगार करती हैं। वाद्य यंत्रों में ढोल, टीमकी, बांसुरी, ठीसकी, पैजना आदि का प्रयोग किया जाता है।
सैला बैगा जनजाति के पुरूषों के द्वारा सैला नृत्य शैला ईष्ट देव एवं पूर्वज देव जैसे-करमदेव, ग्राम देव, ठाकुर देव, धरती माता तथा कुल देव नांगा बैगा, बैगीन को सुमिरन कर अपने फसलों के पक जाने पर धन्यवाद स्वरूप अपने परिवार के सुख-समृद्धि की स्थिति का एक दूसरे को शैला गीत एवं नृत्य के माध्यम से बताने का प्रयास किया जाता है। इनकी वेशभूषा पुरूष धोती, कुरता, जॉकेट, पगड़ी, पैर में पैजना, गले में रंगबिरंगी सूता माला धारण करते है। वाद्य यंत्रों में मांदर,ढोल, टीमकी, बांसुरी, पैजना आदि का प्रमुख रूप से उपयोग करते हैं। बोली बैगा जनजाति द्वारा रीना एवं शैला का गायन स्वयं की बैगानी बोली में किया जाता है। यह नृत्य प्रायः क्वार से कार्तिक माह के बीच मनाए जाने वाले उत्सवों, त्यौहारों में किया जाता है।
’दशहेरा करमा नृत्य‘
बैगा जनजाति समुदाय द्वारा करमा नृत्य भादो पुन्नी से माधी पुन्नी के समय किया जाता है। इस समुदाय के पुरूष सदस्य अन्य ग्रामों में जाकर करमा नृत्य के लिए ग्राम के सदस्यों को आवाहन करते हैं। जिसके प्रतिउत्तर में उस ग्राम की महिलाएं श्रृंगार कर आती है। इसके बाद प्रश्नोत्तरी के रूप में करमा गायन एवं नृत्य किया जाता है। इसी प्रकार अन्य ग्राम से आमंत्रण आने पर भी बैगा स्त्री-पुरूष के दल द्वारा करमा किया जाता है। करमा रात्रि के समय ग्राम में एक निर्धारित खुला स्थान जिस खरना कहा जाता है में अलाव जलाकर सभी आयु के स्त्री, पुरूष एवं बच्चे नृत्य करते हुए करते है। अपने सुख-दुःख को एक-दूसरे को प्रश्न एवं उत्तर के रूप में गीत एवं नृत्य के माध्यम से प्रस्तुत करते है।
करमा नृत्य के माध्यम से बैगा जनजाति में परस्पर सामन्जस्य, सुख-दुःख के लेन देन के साथ ही नव युवक-युवतियां भी आपस में परिचय प्राप्त करते है। इस नृत्य में महिला सदस्यों द्वारा विशेष श्रृंगार किया जाता है। जिसमें यह चरखाना (खादी) का प्रायः लाल एवं सफेद रंग का लुगड़ा, लाल रंग की ब्लाउज, सिर पर मोर पंख की कलगी, कानों में ढार, गले में सुता-माला, बांह में नागमोरी, कलाई में रंगीन चूड़िया एवं पैरों में पाजनी और विशेष रूप से सिर के बाल से कमर के नीचे तक बीरन घास की बनी लड़ियां धारण करती हैं, जिससे इनका सौंदर्य एवं श्रृंगार देखते ही बनता है। पुरूष वर्ग भी श्रृंगार के रूप में सफेद रंग की धोती, कुरता, काले रंग की कोट, जाकेट, सिर पर मोर पंख लगी पगड़ी और गले में आवश्यकतानुसार माला धारण करते हैं। वाद्य यंत्रों में मांदर, टिमकी, ढोल, बांसुरी, ठिचकी, पैजना आदि का उपयोग किया जाता है।
’करसाड़ नृत्य‘
दण्डामी माड़िया जनजाति नृत्य के दौरान पहने जाने वाले गौर सिंग मुकुट, बस्तर, दशहरा के अंतिम दिनों में चलने वाले विशालकाय काष्ठ रथ को खींचने का विशेषाधिकार और स्वभाव के लिए प्रसिद्ध है। इस नृत्य में दण्डामी माड़िया पुरूष सिर पर कपड़े की पगड़ी या साफा, मोती, माला, कुर्ता या शर्ट, धोती एवं काले रंग का हाफ कोट धारण करते हैं। वहीं महिलाएं साड़ी, ब्लाउज, माथे पर कौड़िया से युक्त पट्टा, गले में विभिन्न प्रकार की माला और गले, कलाई, पैरों पर बाजार में मिलने वाले सामान्य आभूषण पहनती हैं।
करसाड़ नृत्य के लिए पुरूष सदस्य अपने गले में लटका कर ढोल एवं मांदर का प्रयोग करता है। महिलाएं लोहे के रॉड के उपरी सिरे में लोहे की विशिष्ट घंटियों से युक्त ’गुजिड़‘ नामक का प्रयोग करती है। एक पुरूष सदस्य सीटी का प्रयोग करत है, नृत्य के दौरान सीटी की आवाज से ही नर्तक स्टेप बदलते हैं। नृत्य के प्रदर्शन का अवसर दण्डामी माड़िया जनजाति में करसाड़ नृत्य वार्षिक करसाड़ जात्रा के दौरान धार्मिक उत्सव में करते हैं। करसाड़ दण्डामी माड़िया जनजाति का प्रमुख त्यौहार है। करसाड़ के दिन सभी आमंत्रित देवी-देवाताओं की पूजा की जाती हैं और पुजारी, सिरहा देवी-देवताओं के प्रतीक चिन्हों जैसे-डोला, छत्रा, लाट बैरम आदि के साथ जुलूस निकालते हैं। जुलूस की समाप्ति के पश्चात् शाम को युवक-युवतियां अपने विशिष्ट नृत्य पोषाक में सज-सवरकर एकत्र होकर सारी रात नृत्य करते हैं।
’मांदरी नृत्य‘
दंडामी माड़िया जनजाति नृत्य के दौरान पहने जाने वाले गौर सिंग मुकुट, बस्तर दशहरा के अंतिम दिनों में चलने वाले विशालकाय काष्ठ रथ को खींचने का विशेषाधिकार और स्वभाव के लिए प्रसिद्ध है। दंडामी माड़िया जनजाति के सदस्य नृत्य के दौरान पहने जाने वाले गौर सिंग मुकुट को माड़िया समुदाय के वीरता तथा साहस का प्रतीक मानते हैं।
इस नृत्य की वेशभूषा में दंडामी माड़िया पुरूष सिर पर कपड़े की पगड़ी या साफा, मोती माला, कुर्ता या शर्ट, धोती एवं काले रंग का हाफ कोट धारण करते हैं। वहीं महिलाएं साड़ी, ब्लाउज, माथे पर कौड़ियों से युक्त पट्टा, गले में विभिन्न प्रकार की माला और गले, कलाई, पैरों पर बाजार में मिलने वाले सामान्य आभूषण पहनी हैं। वाद्य यंत्र मांदरी नृत्य के लिए पुरूष सदस्य अपने गले में लटकाकर ढोल एवं मांदर वाद्य का प्रयोग करते हैं। महिलाएं लोहे के रॉड के उपरी सिरे में लोहे की विशिष्ट घंटियों से युक्त ‘गुजिड़’ का प्रयोग करती हैं। एक पुरूष सदस्य सीटी का प्रयोग करता है, नृत्य के दौरान सीटी की आवाज से ही नर्तक स्टेप बदलते हैं।
यह नृत्य दंडामी विवाह, मेला-मंड़ई, धार्मिक उत्सव और मनोरंजन के अवसर पर किया जाता है। विवाह के दौरान अलग-अलग गांवों के अनेक नर्तक दल विवाह स्थल पर आकर नृत्य का प्रदर्शन करते हैं। जिसके बदले में उन्हें ‘लांदा’ (चावल की शराब) और ‘दाड़गो’ (महुए की शराब) दी जाती हैं। दंडामी माड़िया जनजाति के सदस्यों का मानना है कि गौर सिंग नृत्य उनके सामाजिक एकता, सहयोग और उत्साह में वृद्धि करता है। वर्तमान में दंडामी माड़िया जनजाति का गौर सिंग नृत्य अनेक सामाजिक तथा सांस्कृतिक आयोजनों में भी प्रदर्शन के लिए आमंत्रित किया जाता है।
राष्ट्रीय आदिवासी नृत्य समारोह की तैयारी में जुटा है दस साल का छयांक
28 से 30 अक्टूबर तक साइंस कालेज मैदान में होगा आयोजन
रायपुर / शौर्यपथ / राष्ट्रीय आदिवासी नृत्य महोत्सव का आयोजन एक बार फिर राजधानी रायपुर में होने जा रहा है। छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा किये जा रहे इस आयोजन में शामिल होने के लिए आदिवासी नृत्य से ताल्लुक रखने वाले कलाकार अपनी तैयारी में जुट गए हैं। कलाकार लगातार अभ्यास कर रहे हैं, उन्हें भरोसा है कि यदि उन्होंने अच्छे से मेहनत की तो उनका चयन निश्चित ही आदिवासी नृत्य समारोह के लिए होगा। आदिवासी नृत्य महोत्सव की तैयारी में बड़े-बड़े कलाकारों के बीच कुछ नन्हें कलाकार भी है, जो अपनी प्रतिभा दिखाने के लिए अपने स्तर पर कड़ी मेहनत कर रहे हैं। विशेष पिछड़ी जनजाति कमार से संबंधित विवाह कार्यक्रम के दौरान खुशियों को गीतों और पारम्परिक नृत्य के माध्यम से मंच पर प्रस्तुत करने दस साल का छयांक अपने पिता श्री अमर सिह और समूह के अन्य सदस्यों के साथ जुटा हुआ है। अभी तक कई कार्यक्रमों में अपनी प्रस्तुति दे चुके छयांक के नृत्य का कमाल देखकर देखने वाले भी ताली बजाने मजबूर हो जाते हैं।
रायपुर के साइंस कालेज मैदान में 28 से 30 अक्टूबर 2021 तक द्वितीय राष्ट्रीय आदिवासी नृत्य महोत्सव का आयोजन किया जा रहा है। इसकी तैयारी जोरो से चल रही है। कलाकार अपनी नृत्य कला का प्रदर्शन करने समय का इंतजार कर रहे हैं। धमतरी जिले के ग्राम मोहेरा से दस साल का छयांक कक्षा चौथी में पढ़ाई करता है। उसकी रूचि बचपन से ही नृत्य में है। इसलिए आदिवासी नृत्य से जुड़े उसके पिता श्री अमर सिह उन्हें भी कई कार्यक्रमों में साथ लेना नहीं भूलते। कमार जनजाति जो कि छत्तीसगढ़ में एक विशेष पिछड़ी जनजाति है। इनसे संबंधित जनजाति द्वारा विवाह के अवसर पर किये जाने वाले नृत्य और गाये जाने वाले गीत को पारम्परिक वाद्य यंत्रों के माध्यम से जय निरईमाता आदिवासी कमार नृत्य समूह द्वारा प्रस्तुत किया जाता है। समूह में 23 पुरूष सदस्य है। जिसमें छयांक भी बाल कलाकार के रूप में विशेष परिधान धारण कर नृत्य करता है। छयांक के पिता अमर सिह ने बताया कि वह जब 8 से 9 साल का था तब से नृत्य करता आ रहा है। पहले गांव-गांव जाकर नृत्य करता था। इसके बाद अनेक कार्यक्रमों में प्रस्तुति देता आ रहा है। आज वह अपने समूह का मुखिया है और सभी कलाकार उनके निर्देशन में उनके साथ ही सामूहिक रूप से नृत्य की प्रस्तुति देते हैं। उन्होंने बताया कि छयांक का भी लगाव नृत्य में हैं। इसलिए नृत्य कौशल का सम्पूर्ण प्रशिक्षण प्रदान किया गया है। छयांक ने बताया कि कमार जनजाति पर आधारित आदिवासी नृत्य उन्हें पसंद है। वह स्कूल भी जाता है। चूंकि आदिवासी नृत्य महोत्सव है। इसलिए कुछ दिनों के लिए वह अभ्यास में जुटा है और आदिवासी संस्कृति को आगे बढ़ाना चाहता है। छयांक के पिता अमर सिंह का कहना है कि छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा आदिवासी समाज की संस्कृति, कला और परम्परा को उभारने के साथ छिपी हुई प्रतिभाओं को सामने लाने राष्ट्रीय स्तर पर आदिवासी नृत्य महोत्सव का आयोजन करना एक बेहतर माध्यम साबित होगा।
सरगुजा से लेकर बस्तर तक आदिवासी संस्कृतियों की दिखेगी झलक
28 से 30 अक्टूबर तक होगा राष्ट्रीय आदिवासी नृत्य महोत्सव का आयोजन
रायपुर / शौर्यपथ लेख / नृत्य वह संगम है। नृत्य वह सरगम है। जिसमें न सिर्फ सुर और ताल का लय समाया है, अपितु जीवन की वह सच्चाई भी समाई हुई है जो हमें अपने उत्साह और खुशियों के साथ जीवन जीने की प्रेरणा देती हैं। नृत्य मुद्राओं, भाव-भंगिमाओं और भावनाओं, रूप-सौंदर्य के साथ खुशियों की वह अभिव्यक्ति भी है जो नृत्य करने वालों से लेकर इसे देखने वालों के अंतर्मन में उतरकर उन्हें इस तरह झूमने को मजबूर कर देता है कि शरीर का रोम-रोम ही नहीं सारे अंग झूम उठते हैं।
छत्तीसगढ़ की संस्कृति
छत्तीसगढ़ की भी अपनी अलग संस्कृति और पहचान है। सरगुजा से लेकर बस्तर तक वहाँ की प्रकृति में समाई नदी-नालों, झरनों,जलप्रपातों की अविरल बहती धाराओं की कलकल, झरझर की गूंज हो या बारिश में टिप-टिप गिरती पानी की बूंदे या उफान में रौद्र बहती नदियों की धारा, शांत जंगल में पंछियों का कलरव हो या छोटी-छोटी चिड़ियों की चहचहाहट, पर्वतों, घने जंगलों से आती सरसराती हवाएं हो या फिर वन्य जीवों की ख़ौफ़नाक आवाजें, भौरों की गुँजन, कीड़े-मकौड़े, झींगुरों की आवाज़ से लेकर पेड़ो से गिरते हुए पत्तों और जरा सी हवा चलने पर दूर-दूर सरकते सूखे पत्तों की सरसराहट सहित कई ऐसी धुने हैं जो सरगुजा से लेकर बस्तर के बीच जंगलों में नैसर्गिक और खूबसूरत दृश्यों के साथ समाई है। भले ही हम इन प्रकृति और प्रकृति के बीच से उठती धुनों की भाषाओं को समझ नहीं पाते, लेकिन इनके बीच कुछ पल वक्त गुजारने से ऐसा महसूस होता है कि जंगलों, नदी, पर्वतों, वन्य जीवों की भी सुख-दुख से जुड़ी अनगिनत कहानियां है जो अपनी भाषाओं, अपनी शैलियों में गीत गाते हैं, नृत्य करते हैं और इनका यह गीत और नृत्य इनके आसपास रहने वाले जनजातियों की संस्कृति में घुल-मिलकर वाद्य यंत्रों के सहारे हमें नृत्य के साथ देखने और समझने को मिलता है।
छत्तीसगढ़ की जनजातियों
छत्तीसगढ़ की संस्कृति का दर्शन कराने के साथ हमें जीवन की कई चुनौतियों से लड़ने और खुशी के अलावा विषम परिस्थितियों में भी जीवन यापन करने की प्रेरणा और संदेश देने वाले आदिवासी समाज के नृत्य, संगीत और गीत से एक बार फिर राष्ट्रीय आदिवासी नृत्य महोत्सव के माध्यम से देशभर के लोगों को जुड़ने का मौका मिलेगा। छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा राजधानी रायपुर में एक बार फिर 28 से 30 अक्टूबर तक राष्ट्रीय आदिवासी नृत्य महोत्सव का आयोजन साइंस कालेज मैदान में किया जा रहा है। महोत्सव की तैयारियां शुरू हो चुकी है।
इस महोत्सव में देशभर के अलग-अलग राज्यों से कलाकार जनजाति समाज सहित अन्य परिवेश के नृत्यों की रंगारंग प्रस्तुतियां देंगे। संस्कृति की ही अभिव्यक्ति व संवाहक छत्तीसगढ़ का नृत्य वास्तव में बहुत प्राचीन और समृद्धशाली होते हुए लोक कथाओं से जुड़ी है। जोकि मनोरंजन मात्र के लिए नहीं है। इन नृत्यों में आस्था, विश्वास और धार्मिक कथाओं का संगम भी है। आदिवासी समाज द्वारा अपने विशिष्ट प्रकार के नृत्यों का अभ्यास कर विभिन्न अवसरों पर जैसे- ऋतुओं के स्वागत, परिवार में बच्चे के जन्म, विवाह सहित अन्य बहुत से पर्व को उल्लास के साथ मनाने के लिए गीत गाये जाते हैं और नृत्यों का प्रदर्शन किया जाता है। इनमें आदिवासी समाज के पुरूष तथा महिलाओं की समान सहभागिता भी सम्मिलित होती है। सामूहिक रूप से सभी पारम्परिक धुनों में कदम और चाल और ताल के साथ नृत्य करते हैं।
छत्तीसगढ़ की जनजातियों द्वारा विभिन्न अवसरों में किए जाने वाले नृत्यों में विविधताओं के साथ कई समानताएं भी होती है। यहां आदिवासी समाज द्वारा सरहुल, मुरिया समाज द्वारा ककसार, उरांव का डमकच, बैगा और गोड़ समाज का करमा, डंडा, सुआ नाच सहित सतनामी समाज का पंथी और यदुवंशियों का राउत नाच भी प्रसिद्ध है।
छत्तीसगढ़ राज्य के अनेक नृत्य है। जो राज्य ही नहीं देश-विदेश में भी अपनी पहचान रखते हैं। आदिवासियों का प्रमुख क्षेत्र बस्तर, सरगुजा संभाग है। प्रकृति के नैसर्गिक वातावरण में रहने वाले इन जनजातियों के अलग-अलग जातीय नृत्य हैं। इनमें माड़ियों का ककसार, सींगों वाला नृत्य, तामेर नृत्य, डंडारी नाचा, मड़ई, परजा जाति का परब नृत्य, भतराओं का भतरा वेद पुरुष स्मृति और छेरना नृत्य, घुरुवाओं का घुरुवा नृत्य, कोयों का कोया नृत्य, गेंडीनृत्य प्रमुख है। मुख्यतः पहाड़ी कोरवा जनजातियों द्वारा किये जाने वाले डोमकच नृत्य आदिवासी युवक-युवतियों का प्रिय नृत्य है। विवाह के अवसर पर किये जाने वाले इस नृत्य को विवाह नृत्य भी कहा जाता है। यह नृत्य छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति का पर्याय है। करमा नृत्य को बैगा करमा, गोंड़ करमा, भुंइयाँ करमा आदि का जातीय नृत्य माना जाता है। इसमें स्त्री-पुरुष सभी भाग लेते हैं। सरहुल नृत्य उरांव जाति का जातीय नृत्य है। यह नृत्य प्रकृति पूजा का एक आदिम रूप है। आदिवासियों का विश्वास है कि साल वृक्षों के समूह में जिसे सरना कहा जाता है। महादेव और देव पितरों को प्रसन्न करके सुख शांति की कामना के लिए चैत्र पूर्णिमा की रात इस नृत्य का आयोजन किया जाता है। समूह में बहुत ही कलात्मक ढंग से किये जाने वाले डंडा व सैला नृत्य पुरुषों का सर्वाधिक प्रिय नृत्य है। इस नृत्य में ताल का अपना विशेष महत्व होता है। इसे मैदानी भाग में डंडा नृत्य और पर्वती भाग में सैला नृत्य के रूप में भी जाना जाता है। छत्तीसगढ़ के जनजाति बहुल क्षेत्रों में ग्राम देवी की वार्षिक, त्रिवार्षिक पूजा के दौरान मड़ई नृत्य करते हैं, इसमें देवी-देवता के जुलूस के सामने मड़ई नर्तक दल नृत्य करते है एवं पीछे-पीछे देवी-देवता की डोली, छत्रा, लाट आदि प्रतीकों को जुलूस रहता है। धुरवा जनजाति द्वारा विवाह के दौरान विवाह नृत्य किया जाता है। विवाह नृत्य वर-वधू दोनों पक्ष में किया जाता है। विवाह नृत्य तेल-हल्दी चढ़ाने की रस्म से प्रारंभ कर पूरे विवाह मंे किया जाता है। इसमें पुरूष और स्त्रियां समूह में गोल घेरा बनाकर नृत्य करते हैं।
इसी तरह राज्य में गेड़ी नृत्य भी प्रसिद्ध है। मुरिया जनजाति के सदस्य नवाखानी पर्व के दौरान लगभग एक माह पूर्व से गेड़ी निर्माण प्रारंभ कर देते हैं। गेड़ी नृत्य सावन मास के हरियाली अमावस्या से भादो मास की पूर्णिमा तक किया जाता है। गेड़ी नृत्य नवाखानी त्यौहार के समय करते हैं। इसमें मुरिया युवक बांस की गेंड़ी में गोल घेरा में अलग-अलग नृत्य मुद्रा मंे नृत्य करते हैं। नाट्य तथा नृत्य का सम्मिलित रूप गंवरमार नृत्य मुरिया जनजाति द्वारा किया जाता है। मुरिया जनजाति के नर्तक दल गौर-पशु मारने का प्रदर्शन करते हैं। इस नृत्य में दो व्यक्ति वन में जाकर गौर-पशु का शिकार करने का प्रयास करते हैं, किन्तु शिकार के दौरान गौर-पशु से घायल होकर एक व्यक्ति घायल हो जाता है। दूसरा व्यक्ति गांव जाकर पुजारी (सिरहा) को बुलाकर लाता है जो देवी आह्वान तथा पूजा कर घायल व्यक्ति को स्वस्थ्य कर देता है तथा दोनों व्यक्ति मिलकर गंवर पशु का शिकार करते हैं। इसी के प्रतीक स्वरूप गवंरमार नृत्य किया जाता है। यह एक प्रसिद्ध नृत्य है। जो देखने वालों को बहुत प्रभावित करता है।
सुआ नृत्य छत्तीसगढ़ के स्त्रियों द्वारा समूह में किये जाने वाला नृत्य है। इस नृत्य को करने वाली युवती या नारी की सुख-दुख की अभिव्यक्ति, मन की भावना नृत्य में प्रदर्शित होता है।
कमलज्योति, सहायक जनसम्पर्क अधिकारी
एम.एल. चौधरी, सहायक संचालक
रायपुर / शौर्यपथ / छत्तीसगढ़ के पंजीयन विभाग द्वारा अचल सम्पत्ति के अंतरण विलेखों के पंजीयन से स्टाम्प शुल्क एवं पंजीयन फीस के रूप में वित्तीय वर्ष 2020-21 में 1589.42 करोड़ राजस्व प्राप्त किया गया है, जो कि लक्ष्य 1500 करोड़ रूपए से 5.90 प्रतिशत अधिक रहा है।
वित्त विभाग की ओर से निर्धारित राजस्व प्राप्ति का लक्ष्य
चालू वित्तीय वर्ष 2021-22 के लिए वित्त विभाग की ओर से निर्धारित राजस्व प्राप्ति का लक्ष्य 1650 करोड़ रूपए है। अब तक 714.57 करोड़ रूपए राजस्व प्राप्त हुआ है, जो की गत वर्ष की इसी अवधि की राजस्व प्राप्ति 496.58 करोड़ रूपए की तुलना में 44 प्रतिशत अधिक है। छत्तीसगढ़ शासन द्वारा जनवरी 2019 मंे आम लोगों की सुविधा को ध्यान में रखते हुए छोटे भू-खण्डों के विक्रय पर लगी रोक को हटाकर ई-पंजीयन प्रणाली में आवश्यक प्रावधान कराया गया। जनवरी 2019 से अब तक छोटे भू-खण्डों से संबंधित 3 लाख से ज्यादा दस्तावेजों का पंजीयन हुआ है।
राज्य शासन द्वारा दस्तावेजों के बाजार मूल्य निर्धारण करने वाली गाईडलाईन की दरों में 30 प्रतिशत की कमी 25 जुलाई 2019 से की गई। विभिन्न परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए शासन द्वारा उक्त 30 प्रतिशत की कमी को वर्ष 2020-21 एवं वर्ष 2021-22 के लिए भी यथावत रखा गया है। सम्पत्ति के बाजार मूल्य में कमी के साथ ही सम्पत्ति के खरीदी बिक्री में राहत प्राप्त होने से समाज के सभी वर्ग के लिए भूमि, मकान खरीदना आसान हुआ है। इसी तरह से आवासीय भवनों के पंजीयन में 2 प्रतिशत की रियायत दी गई है। शासन द्वारा 75 लाख रूपए कीमत तक के मकान व भवन के विक्रय संबंधी विलेखों पर प्राभार्य होने वाले पंजीयन शुल्क की दर में दो प्रतिशत की रियायत अगस्त 2019 से प्रदान की गई है, जिसे नागरिकों के हितों में ध्यान में रखते हुए वित्तीय वर्ष 2020-21 एवं 2021-22 के लिए पंजीयन शुल्क की रियायत को यथावत रखा गया है।
भूमि खरीदी बिक्री के लिए दी गई रियायतों से छोटे एवं मध्यम परिवारों को अपने मकान खरीदने का सपना पूरा हो रहा है। राज्य शासन द्वारा भूमि के क्रय-विक्रय और मकानों और फ्लेट में दी जा रही पंजीयन में छूट से मकान और भूमि खरीदी के लिए कम कीमत देनी होगी।
ओम प्रकाश डहरिया
शौर्यपथ लेख / छत्तीसगढ़ की अस्मिता के प्रतीक माता कौशल्या के पुत्र भगवान श्री राम का भांजा के स्वरूप में गहरा नाता हैै। इसका जीता-जागता उदाहरण है, छत्तीसगढ़ में सभी जाति समुदाय के लोग बहन के पुत्र को भगवान के प्रतिरूप अर्थात भांजा मानकर उनका चरण पखारते हैं। मोक्ष की प्राप्ति के लिए प्रभु श्रीराम से कामना करते हैं। यह और भी प्रबल तब होता है, जब गांव-शहर-कस्बा कहीं भी हो कोई भी जाति अथवा समुदाय के हो मांमा-भांजा के बीच के रिश्ते को पूरी आत्मीयता के साथ निभाया जाता है। मांमा के साथ किसी भांजे का यह रिश्ता कई बार माता-पिता के लिए पुत्र से भी ज्यादा घनिष्ठ स्वरूप में दिखाई पड़ता है।
त्रेतायुग में जब छत्तीसगढ़ का प्राचीन नाम कोसल व दण्डकारण्य के नाम से विख्यात था, तब कोसल नरेश भानुमंत थे। वाल्मिकी रामायण के अनुसार अयोध्यापति युवराज दशरथ के राज्याभिषेक के अवसर पर कोसल नरेश भानुमंत को भी अयोध्या आमंत्रित किया गया था। इस अवसर पर कोसल नरेश की पुत्री एवं राजकन्या भानुमति भी अयोघ्या गई हुई थी। युवराज दशरथ कोसल राजकन्या भानुमति के सुंदर और सौम्य रूप को देखकर मोहित हो गए और कोसल नरेश महाराज भानुमंत से विवाह का प्रस्वाव रखा। युवराज दशरथ और कोसल की राजकन्या भानुमति का वैवाहिक संबंध हुआ। शादी के बाद कोसल क्षेत्र की राजकुमारी होने की वजह से भानुमति को कौशल्या कहा जाने लगा। अयोध्या की रानी इसी कौशल्या की कोख से मर्यादा पुरूषोत्तम भगवान श्री राम का जन्म हुआ। तभी ममतामयी माता कौशल्या को तत्कालीन कोसल राज्य के लोग बहन मानकर अपने बहन के पुत्र भगवान श्री राम को प्रतीक मानकर भांजा मानते है और उनका पैर छूकर आशीर्वाद लेते है।
कालांतर छत्तीसगढ में स्मृतिशेष आठवी-नौंवी सदी में निर्मित माता कौशल्या का भव्य मंदिर राजधानी रायपुर से 27 किलोमीटर दूर आरंग विेकासखण्ड के ग्राम चन्दखुरी में स्थित है। चंदखुरी भी रामायण से छत्तीसगढ़ को सीधे जोड़ता है। रामायण के बालकांड के सर्ग 13 श्लोक 26 में आरंग विकासखंड के तहत आने वाले गांव चंदखुरी का जिक्र मिलता है। माना जाता है कि चन्दखुरी सैकड़ों साल पहले चन्द्रपुरी अर्थात् देवताओं की नगरी के नाम से जानी जाती थी। समय के साथ चन्द्रपुरी, चन्द्रखुरी हो गया जो चन्द्रपुरी का अपभ्रंश है। पौराणिक दृष्टि से इस मंदिर का अवशेष सोमवंशी कालीन आठवी-नौंवी शताब्दी के माने जाते है। इसके अलावा छत्तीसगढी संस्कृति में राम का नाम रचे-बसे है। तभी तो जब एक दूसरे से मिलते समय चाहे रिश्ते-नाते हो अथवा अपरिचित राम-राम कका, राम-राम काकी, राम-राम भैइया जैसे उच्चारण से अभिवादन आम तौर पर देखने सुनने को मिल ही जाता है।
छत्तीसगढ़ के ग्राम चन्दखुरी की पावन भूमि में प्रभु श्रीराम की जननी माता कौशल्या का दुर्लभ मंदिर देश और दुनिया में एक मात्र मंदिर है। यह छत्तीसगढ़ की गौरवपूर्ण अस्मिता का प्रतीक है। प्रकृति की अनुपम छटा बिखेरते इस मंदिर के गर्भ गृह में माता कौशल्या की गोद में बालरूप में प्रभु श्रीराम जी की वात्सल्य प्रतिमा श्रद्धालुओं एवं भक्तों के मन को सहज ही अपनी ओर आकर्षित कर लेती है। वहीं पूर्वी छत्तीसगढ़ के महानदी, जोंक नदी और शिवनाथ नदी के संगम स्थल शिवरीनारायण क्षेत्र में रामनामी समुदाय में भगवान श्री राम के प्रति अकूत प्रेम एवं अराधना को परिलक्षित करता है।
स्मरणीय तथ्य है कि छत्तीसगढ़ का प्राचीनतम नाम दक्षिण कोसल था। रामायण काल में छत्तीसगढ़ का अधिकांश भाग दण्डकारण्य क्षेत्र के अंतर्गत आता था। यह क्षेत्र उन दिनों दक्षिणापथ कहलाता था। शोधकर्ताओं द्वारा वनवास काल में प्रभु श्री राम चन्द्र जी के यहां आने का प्रमाण मिलता है। शोधकर्ताओं के शोध किताबों से प्राप्त जानकारी के अनुसार प्रभु श्रीराम ने अपने वनवास काल के 14 वर्षों में से लगभग 10 वर्ष से अधिक समय छत्तीसगढ़ में व्यतीत किया था। छत्तीसगढ़ के लोकगीतों में देवी सीता की व्यथा, दण्डकारण्य की भौगोलिकता और वनस्पतियों के वर्णन भी मिलते हैं। माना जाता है कि भगवान श्रीराम ने उत्तर भारत से छत्तीसगढ़ में प्रवेश करने और यहां के विभिन्न स्थानों पर चौमासा व्यतीत करने के बाद दक्षिण भारत में प्रवेश किया था। इसलिए छत्तीसगढ़ को दक्षिणापथ भी कहा जाता है।
भगवान श्री रामजी के इन्हीं स्मरणीय तथ्यों और आगमन को सहेजने के लिए छत्तीसगढ़ ने श्री राम के यात्रा पथ को एवं जहां-जहां भगवान श्री राम, भगवान श्री लक्ष्मण और माता सीता ने समय व्यतीत किया है, जिन-जिन स्थानों पर उन्होंने आाराम किया पूजा-अर्चना की उन यादों को सहेजकर मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल ने चन्दखुरी स्थित माता कौशल्या मंदिर से प्रारंभ कर राम-वन-गमन-पर्यटन परिपथ के रूप में विकसित करने का बीड़ा उठाया है। जिसका भव्य शुभारंभ मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल नवरात्रि के पहले दिन 7 अक्टूबर को करने जा रहे हैं। इससे निश्चित ही देशवासियों की आस्था का सम्मान बढ़ेगा। यह श्री भूपेश सरकार का एक बड़ा उल्लेखनीय और ऐतिहासिक कदम हैं।
राम-वन-गमन-पथ के निर्माण से निश्चित ही राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति मिलेगी। वहीं राम वन गमन परिपथ को एक पर्यटन सर्किट के तौर पर विकसित किए जाने का निर्णय रोजगार मुहैया कराने की दिशा में भी एक कारगर प्रयास होगा। विभिन्न शोध प्रकाशनों के अनुसार प्रभु श्रीराम ने छत्तीसगढ़ में वनगमन के दौरान लगभग 75 स्थलों का भ्रमण किया। जिसमें से 51 स्थल ऐसे हैं, जहां श्री राम ने भ्रमण के दौरान रूककर कुछ समय बिताया था। राम वन गमन पथ में आने वाले छत्तीसगढ़ के नौ महत्वपूर्ण स्थलों सीतामढ़ी-हरचौका (कोरिया), रामगढ़ (अम्बिकापुर) , शिवरीनारायण (जांजगीर-चांपा), तुरतुरिया (बलौदाबाजार), चंदखुरी (रायपुर), राजिम (गरियाबंद), सिहावा-सप्त ऋषि आश्रम (धमतरी) और जगदलपुर(बस्तर) और रामाराम (सुकमा) सहित उन इक्यांवन स्थलों को चिन्हांकित कर विकसित किया जा रहा है।
प्रथम चरण में इन नौ महत्वपूर्ण स्थलों को विकसित करने के लिए राज्य सरकार ने 137 करोड़ रूपए का ‘कान्सेप्ट-प्लान‘ तैयार किया है। मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल की मंशा के अनुरूप माता कौशल्या मंदिर के मूलस्वरूप को यथावत रखते हुए भव्य और आर्कषक मंदिर के निर्माण किया गया है। वहीं इस क्षेत्र में सौन्दर्यीकरण का काम भी पूर्ण कर लिया गया है। इसके साथ ही भगवान श्री राम का 51 फीट ऊंचा भव्य एवं आकर्षक प्रतिमा का निर्माण किया गया है। जिसका अनावरण मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल करेंगे। राम वन गमन पर्यटन परिपथ के लिए राज्य शासन द्वारा गत वर्ष पांच करोड़ रूप्ए और इस वर्ष 10 करोड़ रूपए का बजट प्रावधान किया गया था। सुप्रीम कोर्ट से राम मंदिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त होने और भव्य राम मंदिर निर्माण शिलान्यास के साथ ही अब छत्तीसगढ़ में राम वनगमन पर्यटन परिपथ के निर्माण से छत्तीसगढ़ की देश भर में खास पहचान बनेगी। भगवान श्रीराम की माता कौशल्या मंदिर के साथ ही छत्तीसगढ़ में कोरिया से बस्तर के अंतिम छोर तक राम वन गमन पर्यटन परिपथ का विकास होगा। इससे प्रदेश के पर्यटन का भी तेजी से विकास होगा।
शौर्य की बात । जब भी मैं मेरे लाल शौर्य की बात करता हूं तो कई मित्र कहते हैं कि बेटा नहीं है तो क्या हुआ बेटी की तरफ देख कर जिंदगी जियो । बेटा बेटी एक समान है । कई लोगो की बात से ये अहसास भी होता है कि मैं अपनी लाडली सिद्धि को नही चाहता पर ऐसा नहीं है मेरे लिए मेरी जिंदगी को दो रत्न है शौर्य और सिद्धि मेरे लिए ये दोनो ही रत्न अनमोल है ।
कई बार सोचता हूं कि निक्की के पास चला जाऊ किंतु अगर मैं निक्की के पास चला गया तो मेरी परी बिटिया का क्या होगा कैसे जिंदगी जिए । मेरी रत्ना कैसे रहेगी । आज निक्की नही है तो मेरी जिंदगी अधूरी है पर मेरी जिम्मेदारी तो अभी बची है मेरी सिद्धि को कैसे तकलीफ में देख सकता हूं देख क्या सोच भी नही सकता । मेरी सिद्धि मेरी ही नहीं रत्ना और निक्की की भी जान है । निक्की उसका बहुत ख्याल रखता है आज भी वो उसके साथ है । हर पल अब उसकी रक्षा करता है । सिद्धि बेटा हम तेरे लिए ही जी रहे है । तेरी खुशी के लिए ही हर तकलीफ हर गम को सह रहे ताकि जो सपना तेरे भाई ने तेरे लिए देखा वो पूरा कर सके । तेरी खुशी में ही तेरे भैया की खुशी है और तुम दोनो की खुशी में ही हमारी खुशी है ।
हमारी जिंदगी में तो अब खुशी या गम का कोई मतलब ही नहीं खोखली हंसी और मुखौटे लगा कर जी रहे है बस इस लिए की सिद्धि को तकलीफ न हो । सिद्धि बेटा जब तू पैदा हुई थी उसके 14 दिन बाद रावण दहन था तब तेरे भैय्या ने बोला सिद्धि को भी ले जायेंगे रावण दहन में तब तुझे साथ लेकर गए थे जब फटाखे की आवाज आती तो तेरा भैय्या अपने दोनो हाथो से तेरे कानो पर हाथ रख देता ताकि तेज आवाज से तुझे तकलीफ ना हो बेटा अब भी तेरा भाई तेरे साथ है बेटा वही तेरी हर पल रक्षा करेगा । तेरा भाई तो अब भगवान का रूप है वो अपनी प्यारी बहन के साथ है । Love you bitiya rani..
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शौर्यपथ / ‘‘नीलकंठ तुम नीले रहियो, दूध भात का भोजन करियों, हमरी बात राम से कहियों।‘‘ बालपन ले ये लोकोक्ति ल दसहरा के दिन अपन बड़े बुजुरग मन के मंुहु ले सुनत आवत हो। दसहरा के दिन नीलकंठ चिरई ल देखना सुभ माने जाथे। काबर की अइसे पौराणिक मान्यता हवय की भगवान राम हर नीलकंठ के दरसन करे के बाद रावन बध करे रहीस। नीलकंठ ला षंकर भगवान के चहेता चिरई केहे गे हवय। एला षंकर जी के रूप तको माने जाथे।
इही पाय के दसहरा के दिन नीलकंठ ल देखत ये लोकोक्ति ल दोहराय जाथे। अउ अपन दुखपीरा हरे के मनौती मांगे जाथे। फेर धीरे धीरे ये रिवाज हर अब नंदावत जावत हे। काबर कि अब नीलकंठ चिरई हर तको जादा नइ दिखय। दसहरा के दिन एखर दरसन पाये बर सहरिया मन हर गांव कोति जाथे अउ खार बन म नीलकंठ ल खोजथे।
दीखे मा बहुत संुदर नीला-भूरा रंग के पाॅख वाला चिरई नीलकंठ ला अंगरेजी मा ब्लू जे अउ इंडियन रोलर केहे जाथे। ये हर भारत, पाकिस्तान, श्रीलंका म तको मिलथे। हमर देस भारत के बिहार, कर्नाटक, उड़ीसा, अउ आंध्रप्रदेश के राजपक्षी के दरजा नीलकंठ ल मिले हवय।
‘‘दसहरा के दिन नीलकंठ ल देखना सुभ माने जाथे’’ ये बिचार ल हिरदय म बइठारे-बइठारे नीलकंठ देखे बर भटकत मनखे मन ल एहु बात ले बिचार करना चाही कि आखिर ये सुन्दर चिरई अब काबर नंदावत हवय। नीलकंठ कस अउ दूसर कतको चिरई चिरगुन अब देखे बर नइ मिलय। एखर असली कारन रूख राई अउ जंगल के कटाइ्र्र के संगे संग धान अउ किसिम किसिम के अनाज के उपजोइया खेत ल अब पाट पाट के पलाट (भूखण्ड) म बदले के काम मनखे मन करत हवय। जादा ले जादा उपज पाय के फेर म अड़बड़ रसायनिक खातु अउ कीट नाशक दवा पावडर ल खेत म डारे जाथे। इही हर नीलकंठ कस चिरई मन बर जहर बन के जान लेवा हो गे हवय।
गांव हो कि सहर अब पक्का-पक्का घर मकान, सड़क बनत जावत हे। ते पायके चिरई चिरगुन मन ह अपन बसेरा बनाय के जगह अउ दाना-पानी बर तरसत हवय। अइसन पीरा झेलत चिरई चिरगुन के बंसज हर बाढ़े के बजाय घटत जावत हे। अउ नीलकंठ कस कतको किसिम के चिरई ल देखे बर अब मनखे मन हर तरसत हावंय।
अइसन बिकार के जनम देवोइया मनखे ल एंहु बात ल नइ भुलाना चाही कि किसान के मितान नीलकंठ अउ दूसर चिरई मन होथे। ए मन ह खेत म जामे फसल के नुकसान करोइया कीरा-मकोरा ल खा खाके फसल के रखवार कस काम करथे। ये अरथ म नीलकंठ हर किसान के भाग जगाने वाला, धन धान मे बढ़हर करोइया चिरई आय।
ये बात ल दसहरा तिहार म गुने के संगे संग जम्मो किसिम के चिरई के बंसज ल बढ़ाय अउ बाचे खुचे चिरई ल बचाय के उदिम ईमानदारी से करे के बात ल मन मे ठान लेना चाही। तभे मनखे के जिनगी म सुख के दिन बाढ़ही। साल भर में खाली एक दिन नीलकंठ के दरसन करके सुख सांति ल पाय के सोच ल बदले बर परहीं अउ चिरई मन के रहे बसे के ठौर ठिकाना ल बचाय-बढ़ाय के बीड़ा उठाना पड़ही।
विजय मिश्रा‘अमित‘
एम-8, सेक्टर-2, अग्रसेन नगर
पो0आ0- सुंदरनगर, रायपुर
शौर्य की बात। मेरी दुनिया तो उसी दिन सुनी हो गई जिस दिन तू रूठ गया था और मुझसे दूर हो गया । भले आज तू दुनिया के सामने नही है पर मेरे दिल में मेरी यादों में मेरे जेहन में तू हमें रहेगा । सब कहते है और धर्म भी कहता है कि पितृ पक्ष में पिंड दान करने से तेरे लिए स्वर्ग के दरवाजे खुल गए किंतु मुझे मालूम है कि तू स्वर्ग में ही है और मेरे साथ भी हमेशा है रीति रिवाज को निभाते हुए मैने भारी मन से पितृ पक्ष में बेटे का पिंड दान किया । मेरी जैसी किस्मत तो मेरे दुश्मन को भी ना दे भगवान ।
मेरा निक्की तो मेरी जान है तुझे कोई देख न सके कोई सुन ना सके किंतु मैं तो रोज ही तुझसे बात करता हूं ना हर बात मानता हूं ना तेरी तू तो सब जनता है ना बेटा तू भी तो हर पल मेरे साथ रहता है । चाहे भगवान भी आ जाए पर तुझे मुझसे कोई अलग नहीं कर सकता तेरे अलावा मेरा है ही कौन रे तू ही तो मेरे जीने का सहारा है तू पास है मेरे बहुत पास है मेरी सांसों में बस है तभी तो जिंदा हूं । तू कही मत जाना बेटा तेरे बिना कुछ अच्छा नहीं लगता निक्की कुछ भी नहीं । रोज मौत को बुलाता हूं पर वो भी नही आ रहा । क्या करू बता ना कि तुझे एक बार अपने गोद में बैठा कर ढेर सारा प्यार करूं सब कुछ भूल जाऊ सिर्फ तुझे प्यार करूं जी भर कर प्यार करूं ।
निक्की मेरे लाल कैसे जियूं तेरे बिना कुछ समझ नहीं आ रहा है बस एक अंधेरे रास्ते में चला जा रहा हूं बस चला जा रहा हूं इस यकीन पर कि किसी रास्ते में तुझे देख सकूं तुझे जी भर कर प्यार कर सकू । निक्की बेटा भले ही तेरे लिए सब कुछ कर रहा हूं फिर भी सकूं नही जब तक तू साथ नही कुछ भी ठीक नहीं है । पागलों की तरह समय गुजार रहा हूं झूठी खुशी में खुश हो रहा हूं पर मेरी असली खुशी तो तेरे साथ है । तू तो भगवान के पास है ना तो एक बार उनको बोल ना कि मुझे भी तेरे पास बुला ले ।तेरी मम्मी का हाल नही देख सकता बेटा बहुत कमजोर हूं कैसे सब संभालु तेरे बिना तू कुछ कर न बेटा तू तो सब कर सकता है तो क्या अपने पापा की इतनी सी बात नही मान सकता मुझे अपने पास बुला ले बेटा थक गया हूं रे अब हिम्मत नही अकेले चलने की आजा बेटा या मुझे बुला ले मेरे लाल ..
नसीम अहमद खान, सहायक संचालक
रायपुर/शौर्यपथ लेख / छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा पशुधन के संरक्षण और संवर्धन के लिए गांवों में निर्मित गौठान और साल भर पहले शुरू हुई गोधन न्याय योजना से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को एक नया संबल मिला है। गौठानों में गोधन न्याय योजना के तहत अब तक 100 करोड़ रूपए से अधिक की गोबर खरीदी की जा चुकी है। खरीदे गए गोबर से राज्य के लगभग 6000 गौठानों में बहुतायत रूप से वर्मी कम्पोस्ट और सुपर कम्पोस्ट का उत्पादन महिला समूहों द्वारा किया जा रहा है। गौठानों अब तक उत्पादित एवं विक्रय की गई खादों का मूल्य 120 करोड़ रूपए के पार हो गया है। गोधन न्याय योजना में ग्रामीणों की बढ़-चढ़कर भागीदारी में इसे न सिर्फ लोकप्रिय बनाया है बल्कि इसके माध्यम से जो परिणाम हमारे सामने आए हैं वह बेहद सुखद है।
गोधन न्याय योजना अपने आप में एक ऐसी अनूठी योजना बन गई है, जो बहुआयामी उद्देश्यों को अपने आप में समाहित कर लिया है। इस योजना के शुरूआती दौर में लोगों के मन में कई तरह के सवाल और इसकी सफलता को लेकर आशंकाएं थी, जिसे गौठान संचालन समिति और गौठान से जुड़ी महिलाओं ने निर्मूल साबित कर दिया है। इस योजना से हमारे गांवों मेेें उत्साह का एक नया वातावरण बना है। रोजगार के नए अवसर बढ़े हैं। पशुपालकों, ग्रामीणों को अतिरिक्त आय का जरिया मिला है। महिला स्व सहायता समूहों को को स्वावलंबन की एक नई राह मिली है।
पशुधन के संरक्षण और संवर्धन के साथ-साथ उन्हें चारे-पानी का एक ठौर देने के उदेद्श्य गांवों में स्थापित गौठान और गोधन न्याय योजना के समन्वय से वास्तव में गौठान अब ग्रामीण के आजीविका के नया ठौर बनते जा रहे है। गौठानों में महिला समूहों द्वारा जिस लगन और मेहनत के साथ आयमूलक गतिविधियां सफलतापूर्वक संचालित की जा रही है। वह अपने आप में बेमिसाल है। मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल का कहना है कि हमारे गांव शक्ति का केन्द्र रहे हैं। ग्रामीण संसाधनों ने इतनी शक्ति होती है कि उससे प्रदेश और देश की अर्थव्यवस्था संचालित हो। हमें अपनी संस्कृति, अस्मिता, स्वाभिमान और सम्मान से जुड़े रहकर विकास की गति को बढ़ाना हो तो इसका सबसे अच्छा साधन है अपने परम्परागत संसाधनों का सम्मान और मूल्य संवर्धन करते हुए ऐसा विकास, जिसमें बड़ी संख्या में ग्रामीण जनता की सीधी भागीदारी हो।
गोधन न्याय योजना और हमारे गौठान वास्तव में ग्रामीणों की योजना है और उन्हीं के द्वारा उन्हीं की भलाई के लिए संचालित की जा रही है। गोधन न्याय योजना के तहत गोबर खरीदी की राशि का आंकड़ा 100 करोड़ के पार हो गया है। यह कोई छोटी बात नहीं है। गोबर को बेचने वाले और खरीदने वाले और उससे वर्मी कम्पोस्ट से लेकर विविध उत्पाद तैयार करने वाले गांव के ही है। इससे यह बात स्पष्ट है कि हमारे गांव रोजगार और उत्पादन के केन्द्र बिन्दु बन सकते हैं, जो गांधी जी के ग्राम स्वराज का उद्देश्य है। छत्तीसगढ़ सरकार सुराजी गांव योजना- नरवा, गरूवा, घुरवा, बाड़ी और गोधन न्याय योजना के जरिए ग्राम स्वराज के सपने को पूरा करने की ओर तेजी से बढ़ रही है।
गोधन न्याय योजना के तहत अब तक 100 करोड़ 82 लाख रूपए की गोबर की खरीदी गौठानों में हो चुकी है। गौठान समितियों को 32 करोड़ 94 लाख तथा महिला स्व-सहायता समूहों को अब तक 21 करोड़ 42 लाख रूपए के लाभांश का वितरण किया जा चुका है। गौठानों में वर्मी कम्पोस्ट निर्माण से लेकर आय अर्जन की विविध गतिविधियों में जुटीं समूह की महिलाएं लगन और मेहनत से जुटी है। उनकी लगन और मेहनत ने यह बात प्रमाणित कर दी है, कि परिस्थितियां चाहे जितनी भी विषम हो उसे पुरूषार्थ से पराजित किया जा सकता है। महिला समूहों ने उच्च गुणवत्ता की वर्मी कम्पोस्ट और सुपर कम्पोस्ट खाद तैयार कर एक नया कीर्तिमान रचा है। छत्तीसगढ़ के गौठानों में उत्पादित वर्मी कम्पोस्ट की मांग पड़ोसी राज्य भी करने लगे हैं। झारखंड राज्य ने डेढ़ लाख क्विंटल वर्मी कम्पोस्ट सप्लाई का आर्डर रायगढ़ जिले को मिला है। यह गर्व की बात है। छत्तीसगढ़ राज्य से लगे सीमावर्ती राज्यों के किसान भी छत्तीसगढ़ के बार्डर इलाके के गौठानों में आकर वर्मीकम्पोस्ट क्रय कर रहे हैं। छत्तीसगढ़ सरकार की गोधन न्याय योजना को स्काच गोल्ड अवार्ड मिलना राज्य के लिए गौरव पूर्ण उपलब्धि है।
गोधन न्याय योजना के तहत अब तक राज्य में 10 हजार 112 गौठान स्वीकृत किए गए हैं जिनमें से 6112 गौठान निर्मित और संचालित हैं। इस योजना से लाभान्वित होने वालों में 44.51 प्रतिशत महिलाएं हैं। 48.10 प्रतिशत अन्य पिछड़ा वर्ग, 7.82 प्रतिशत अनुसूचित जाति के तथा 40.58 प्रतिशत अनुसूचित जनजाति वर्ग के पशुपालक हैं। 79 हजार से अधिक भूमिहीन परिवारों को इस योजना के माध्यम से अतिरिक्त आय का जरिया सुलभ हुआ है। महिला समूहों द्वारा गौठानों में अब तक 7 लाख 80 हजार क्विंटल वर्मी कम्पोस्ट का उत्पादन किया गया है, जिसमें से 6 लाख 13 हजार क्विंटल खाद का विक्रय हो गया है। गौठानों में 3 लाख 46 हजार क्विंटल सुपर कम्पोस्ट खाद में से 1 लाख 60 हजार क्विंटल खाद बिक चुकी है। गौठानों में सफलतापूर्वक गोबर की खरीदी और आयमूलक गतिविधियों के संचालन से 1634 गौठान स्वावलंबी हो चुके हैं। यह गोधन न्याय योजना के सार्थकता और उसके जरिए होन वाले लाभ का परिणाम है।
छत्तीसगढ़ को कला -साहित्य की दृष्टि से समृद्धि धरा के रूप में राष्ट्रीय- अंतरराष्ट्रीय जगत में ख्याति मिली हुई है। यहां के कलाकार साहित्यकार, चित्रकार, मूर्तिकार , पत्रकार अपने परिश्रम और अपने दमखम पर अपनी विशिष्ट पहचान बनाने में सदैव आगे रहे हैं। सरकार की दया की दरकार उन्हें बहूत ज्यादा नहीं रही है। लेकिन सदियों से यह बात चली आ रही है कि, राज्याश्रय प्रप्त होने पर कला- संस्कृति- साहित्य को बढ़ावा मिलता रहा है।
*छत्तीसगढ़ बनाने में कलाकारों की क्रांतिकारी भुमिका*
छत्तीसगढ़ राज्य बनने के पहले यहां के कलाकारों, साहित्यकारों और विचारकों ने नया राज्य बनाने में अपनी क्रांतिकारी भूमिका का निर्वहन बखूबी किया है , फलस्वरूप राज्य बनने के बाद छत्तीसगढ़ की कला- संस्कृति को निसंदेह बहुत अधिक बढ़ावा मिला है।राज्याश्रय प्राप्त होने के बाद यहां की अनेक लुप्त होती कला- संस्कृति तीज- त्यौहार, खेलों को भी जबरदस्त प्रोत्साहन मिला है, किन्तु पिछले दो सालों से कोरोना वायरस के संक्रमण में बहुत से निर्धन कलाकार काल कवलित हो गए ।अभी भी बहुत से निर्धन,असहाय,कलाकार टकटकी लगाए सरकार से आर्थिक सहयोग की आस लगाए बैठे हैं।आर्थिक सहयोग के लिए उनका आवेदन संस्कृति विभाग में लम्बे समय तक लंबित रहता है। ऐसे आर्थिक रूप से कमजोर कलाकारों को यथासंभव शीघ्रातिशीघ्र मदद करने की अपेक्षा सरकार से है। ऐसे कलाकारों का महाशत्रु पापी पेट बना हुआ है।
*कलाकारों का महाशत्रु है पापी पेट*
पापी पेट की मार से मजबूर कलाकार ही अपना स्वाभिमान बेचने मजबूर हो जाता है। ईश्वर ने कलाकारों को पेट नहीं दिया होता तो शायद ही कभी कोई कलाकार अपने आत्मसम्मान, स्वाभिमान को बेचता। कोरोना संक्रमण काल में सांस्कृतिक, सामाजिक कार्यक्रमों पर पाबंदी के कारण उत्पन्न आर्थिक तंगी ने कलाकारों को कुछ अन्य आय का जरिया अपनाने का रास्ता दिखाया। कलाकारों ने सड़क पर कपड़े बेचना, विविध दूकान खोलना,कुली, ड्राइवरी,मजदूरी करना जैसे अन्य कार्य जीविकोपार्जन के लिए शुरू कर दिया। जिसे कलाकारों की दुर्दशा का नाम दिया गया । यह उचित नहीं है।मेरे विचार से कलाकारों को यह ध्यान रखना चाहिए कि कलाकारी के साथ-साथ जीविकोपार्जन के लिए कुछ ना कुछ अन्य व्यवसाय को अपनाने की आवश्यकता बड़े से बड़े कलाकारों को भी होती है।
पिछले चालीस वर्षों से छत्तीसगढ़ी और हिंदी रंगमंच के साथ-साथ रेडियो टीवी और अब छत्तीसगढ़ी फिल्म जगत में भी अपनी प्रतिभा को प्रदर्शित करने का अवसर मुझे मिला है, लेकिन वर्ष 1979 से 82 तक मुझे भी बेरोजगारी के दिन देखने मिले थे ।तब भी मेरी कला को मैं अनवरत प्रदर्शित करता था ,उन दिनों मुझे ताने भी सुनने पड़ते थे कि नाटक नौटंकी से कुछ नहीं मिलने वाला है, जीवन चलाना है तो कुछ नौकरी चाकरी ढूंढो। *कलापथ पर संघर्ष का मिला बेहतर प्रतिफल*
कलाकारों को बात बात पर सरकार की ओर मुंह ताकने की आवश्यकता नहीं है, माना कि कोरोना वायरस संक्रमण काल ने कलाकारों ,पत्रकार, कलमकार, मूर्तिकार भाइयों को भी काफी हद तक तोड़ कर रख दिया है,पर जीना है तो कोरोना वायरस को अपने दम पर ,अपनी कला के बल पर, अपनी कलम के बल पर मारना होगा।ऐसे अनेक उदाहरण कला जगत में भरे पड़े जो इस बात के साक्षी हैं कि कलाकार अपनी कला के बल पर बहुत कुछ कर सकते हैं। कला के बलबूते हीशासकीय सेवा यात्रा में अतिरिक्त महाप्रबंधक (जनसंपर्क) छत्तीसगढ़ स्टेट पावर कंपनी का बड़ा पद मुझे हासिल हुआ। इस पद पर रहते हुए कला प्रतिभा को प्रदर्शित करने का सुनहराअवसर प्राप्त हुआ।
*सरकारी मदद में न हो देरी*
राज्य सरकार निश्चित रूप से कलाकारों को मदद करने की मंशा रखती है, लेकिन किसी भी काम में देरी जो होती है वह उस काम को सफल नहीं बना पाती। हितग्राहियों को सरकार की नियति पर संदेह होने लगता है ।सरकारी विभागों से अपेक्षा है ,कलाकारों की जो देनदारियां है उसे यथा समय भुगतान करें ।
*कलाकारों के खाने-पीने का प्रबंध स्तरीय हो*
कलापथक के कर्मी सरकार की योजनाओं के लिए जी-जान लगाकर गांव गांव जाते हैं, तो उनका भुगतान समय पर करें। एक बात का बहुत दुःख होता है ,अक्सर सरकारी कार्यक्रमों में कलाकारों के रुकने और खाने की व्यवस्था फोर्थ क्लास होती है। कांजी हाउस में भी ठहराने का उदाहरण देखने मिला है।कम से कम खाने पीने ठहरने के लिए अच्छी जगह हो ताकि एक कलाकार अपनी प्रस्तुति को दिल से कर सके, मन से कर सके।
मेरी तो यह सोच है कि एक कलाकार को अपने आप को ,अपनी कला को जीवित रखने के लिए छोटे से छोटा काम करना पड़ता है तो उसे हंसकर करना चाहिए क्योंकि हंसकर किया हुआ काम ही नाम दाम शोहरत को सुनिश्चित करता है।
छत्तीसगढ़ सरकार ने हाल ही में गांव गांव की कला संस्कृति और रामायण मंडलियों को बढ़ावा देने हेतु बड़े-बड़े पुरस्कारों की घोषणा की है ।इससे कला जगत, रामायण मंडली और लोक कलाकारों के लिए बेहतरीन कदम कहा जा सकता है।
*विजय मिश्रा "अमित"*
पूर्व अति.महाप्रबंधक (जन.)
शौर्य की बात । कभी-कभी लगता है कि जिंदगी जीना बहुत मुश्किल हो रहा है हर तरफ परेशानी हर तरफ मुश्किलों का सामना करते हुए हैं परिवार को लेकर चलना असंभव सा लगता है वैसे भी अब दुनिया में शौर्य के जाने के बाद ना तो मेरी जीने की इच्छा है और ना ही शौर्य की मम्मी की किंतु शौर्य की छोटी बहन तो इस दुनिया में है ना उसकी क्या गलती वह तो अभी छोटी है उसे जीने का हक है भगवान ने उसे जिंदगी दी है और हमें जिम्मेदारी है जैसे भी हो इस जिम्मेदारी को निभाना तो है ही क्योंकि शो सॉरी की लाडली बहन सिद्धि का जीवन हमारे बिना अधूरा है आज अगर हमने अपनी परेशानियों को हल करने के लिए अपने जीवन की लीला को समाप्त कर लिया तो सिद्धि का क्या होगा क्या बिना मां बाप के सिद्धि इस दुनिया में रह पाएगी बिल्कुल नहीं आज की दुनिया में बिना मां बाप के सहारे के बच्चों का क्या हाल होता है यह किसी से छुपा नहीं है हमारी तकलीफ है हमारा दर्द अब हमारे जीवन का हिस्सा है जीवन के इस दर्द को तो हमें अब जिंदगी भर लेकर साथ चलना है मुस्कुराते हुए अपने बच्चे का पालन करना है हर दर्द को सहते हुए सिद्धि के लिए मुस्कुराना है भगवान ने हमें जो दर्द दिया उस दर्द को उस गम को छुपाते हुए अपनी बेटी के लिए उसके भविष्य के लिए है जिंदा तो रहना ही है मालूम है कि एक बार हौसला दिखाते हुए मैं और रखना अपने जीवन को तो समाप्त कर सकते हैं किंतु उससे हमारा दर्द तो हमेशा हमेशा के लिए खत्म हो जाएगा पर वह दर्द वह तकलीफ हम अपने साथ लेकर नहीं जा पाएंगे वह सारा दर्द सारी तकलीफ है सारी परेशानियां एक मासूम के ऊपर गाज बन कर जिंदगी भर के लिए एक मासूम की झोली में चली जाएगी उस मासूम की झोली में जिसने अभी ठीक से दुनिया भी नहीं देखी है हमें कोई हक नहीं की हम अपनी परेशानियों को अपनी तकलीफों को एक मासूम की झोली में डालकर मुक्ति पा ले।
आज मैंने देखा है कि दुनिया में ऐसे कई लोग हैं जो जरा सी परेशानियों से हार कर अपना जीवन समाप्त कर लेते हैं किंतु उनके जीवन समाप्त करने से उनके बाद आने वाली है जो पीड़ा जो तकलीफ उनके परिवार वालों को होती है वह उस परेशानियों से उन तकलीफों से बहुत कम होती है जिनके कारण लोग आत्महत्या जैसा रास्ता उठाते हैं यकीन मानिए जीवन में हर किसी को कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ता है और यह परेशानी ना तो खत्म होती है और ना ही इसका आने का रास्ता बंद होता है जीवन में एक परेशानी आती है तो एक परेशानी जाती है एक खुशी आती है तो दूसरी खुशी जाती है खुशियां और गम इस जीवन में आता जाता रहता है परंतु इस आने-जाने के दौरान अगर हमने अपना रास्ता एक ऐसे शून्य की ओर बदल लिया तो जो परेशानियां जो दुख जो तकलीफ है हमारे पास आ रही थी वही परेशानियां वही तकलीफ है वही दर्द दुगने वेग से उनके पास चली जाएंगी जो हमारे अपने हैं जो हमारे लिए जीते हैं। आज के जीवन में खुशी और गम दिन और रात की तरह है अगर गम आते हैं तो जाएंगे भी इस पर हार मानने के बजाय डटकर मुकाबला करना चाहिए ताकि जो परेशानियां आज आई है वह चली जाएंगी और जो खुशियां आएंगी वह दुगने वेग से आएंगी कहते हैं ना कि जब इंसान को भूख लगती है तब रूखी सुखी रोटी भी पकवान लगती है उसी तरह जब गम जाता है तब जो थोड़ी खुशियां आती है वह दुनिया की है सबसे बड़ी खुशियों के समान होती है ।
आज आज जो परेशानी है वह एक न एक दिन तो चली जाएंगे क्योंकि यह दुनिया है और इस दुनिया में हर परेशानी का हर गम का कहीं ना कहीं किसी न किसी तरह इलाज हो ही जाता है बस जरूरत है तो एक सबल आत्मविश्वास की अगर आपके पास आत्मविश्वास है और प्रबल इच्छा शक्ति है तो कोई भी परेशानी लंबे समय तक टिकी नहीं रह सकती हैं आत्महत्या करने वाले लोग कमजोर होते हैं डरपोक होते हैं जो परेशानियों का मुकाबला नहीं कर सकते हैं जबकि इंसान अगर परेशानियों का मुकाबला करें तो और निखर कर सामने आता है एवं जीवन में सदा ही आगे बढ़ता है हर परेशानी कुछ ना कुछ सीख दे कर जाती है ।
10 सितंबर को दुनिया में आत्महत्या रोको दिवस के रूप में मनाया जाता है जबकि आज जरूरत है कि प्रत्येक दिन कुछ ऐसा करें की अपनों के बीच रहने वाले हैं साथियों का अपनों का ख्याल रखें उनके जज्बातों को समझें उनकी भावनाओं का कद्र करें उन्हें प्रोत्साहित करें ताकि वह समाज से मुकाबला कर सके और अपने साथ हो रहे गलत व्यवहार का पुरजोर विरोध करें ना कि उस से भागे हैं ईश्वर ने जीवन दिया है तो उस जीवन को सार्थक करने के लिए पूरे आत्मविश्वास के साथ मुकाबला करें ना कि डरपोक बंद कर जीवन लीला को समाप्त करें आपका जीवन सिर्फ आपका ही नहीं है इस पर आपके माता पिता भाई बंधु दोस्तों का समाज के लोगों का सभी का अधिकार है क्योंकि समाज हम सब से मिलकर ही बना है सही गलत का फैसला करने का अधिकार सभी के साथ मिलकर ही है दुनिया में जीवन को अगर सकारात्मक पहलू से देखा जाए तो दुनिया बहुत हसीन है अपने दर्द को अपने दुख को अपनी पलकों में समेटे हुए दुनिया का मुकाबला करना है सबसे बड़ा धर्म है और कर्म की अपना कर्म सत्कार भाव से करते रहो तो जीवन जीने का आनंद अलग ही है इसीलिए मेरी विनती है कि जीवन में अगर तकलीफ आती है तो उसका हल भी जरूर आता है।
यह बातें आज इसलिए लिख रहा हूं कि पिछले दिनों अपने कैसे मित्र गोपाल राजपूत के बारे में सुनकर काफी दुख हुआ जिस व्यक्ति से ना कभी मुलाकात हुई है ना ही वह कोई करीबी है किंतु फेसबुक फ्रेंड में होने के कारण एक दो बार बात हुई गोपाल का इस तरह जाना काफी दुख पहुंचा दिया । आज सोचता हूं की क्या हालत हो रही होगी उस मां बाप की जिसने उसे 20/ 22 वर्षों तक अपनी पलकों में बैठाकर पाला और आज एक जरा से फैसले के कारण गोपाल जी तो अपनी तकलीफ से मुक्ति पा है किंतु क्या उनके मां-बाप अब जिंदगी भर इस तकलीफ से दूर हो पाएंगे ।
मैं भी एक बाप हूं और मेरा लाल भी खेलते खेलते हैं इस दुनिया से विदा हो गया आज उसके जाने के बाद ना तो दिन अच्छा लगे ना रात अच्छी लगे ना तो सुख सुविधाओं का एहसास हो ना तो दुख दर्द का आभास हो बस जिंदगी चल रही है चेहरे पर मुखौटा लगाकर हंस लेते हैं खोखली हंसी के पीछे के दर्द को जमाने के सामने छुपा लेते हैं ताकि जो साथ है वह खुश रहे हैं जो जिम्मेदारी है उसे पूरी करें गोपाल भैया ऐसे आपको नहीं जाना था मेरा सभी से निवेदन है कि अगर आपको तकलीफ हो तो ऐसे लोगों को ढूंढो जो आपसे ज्यादा तकलीफ में जिंदगी जी रहे हैं आप उनसे प्रेरणा लेकर अपनी तकलीफों को कम कर सकते हो आपको उनसे मुकाबला करने की ताकत भी आएगी। मैं आज बहुत तकलीफ में हूं दुखी हूं किंतु फिर भी जी रहा हूं और जब तक ईश्वर ना चाहे जी लूंगा अपनी जिम्मेदारियों को निभाते रहूंगा ताकि मेरी सिद्धि मेरी रत्ना मेरे मां-बाप मेरे दोस्तों को कोई यह ना कह सके कि शरद कमजोर था डरपोक शरद हर तकलीफ में जिएगा और हर तकलीफ का मुकाबला करेगा किंतु कभी अपने जीवन को समाप्त नहीं करेगा क्योंकि डरपोक लोग ही आत्महत्या का रास्ता चुनते है । गोपाल भैया आप हमेशा मेरे दिल में रहोगे...
Feb 09, 2021 Rate: 4.00
