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June 03, 2026
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शौर्यपथ

शौर्यपथ

लाइफस्टाइल / शौर्यपथ / दुनियाभर में होने वाले मनोरंजन और संगीत के आयोजनों पर भी कोरोना का कहर टूटा है। ऐसे में कोरोना महामारी से लड़ते हुए इन आयोजनों को दोबारा खड़ा करने के लिए कई तरह के प्रयोग किये जा रहे हैं। कहीं सोशल डिस्टेंसिंग में तहत लोगों को दूर-दूर बैठाकर कॉन्सर्ट कराने के तरीके का उपयोग हो रहा है तो कहीं सेंसरों की मदद से लोगों के हाथ सैनिटाइज करने और उनमें दूरी बरकरार रखने के प्रयोगों पर काम किया जा रहा है। ऐसा ही एक प्रयोग ओकलाहोमा में हाल ही में किया गया। यहां एक संगीत बैंड ने प्रयोग के तहत प्लास्टिक के बुलबुले में खुद को बंद कर मंच पर प्रस्तुति दी। इतना ही नहीं बल्कि दर्शकों को भी प्लास्टिक बबल में डाला गया।
वीडियो फुटेज में दिखा अनोखा नजारा-
द फ्लेमिंग लिप्स नामक संगीत बैंड ने अपने प्रशंसकों के लिए एक कार्यक्रम का आयोजन किया। ओकलाहोमा शहर के इस समूह के सदस्यों ने खुद को अलग-अलग प्लास्टिक बबल में डाला। गायक और वादक सभी बुलबुलों के अंदर नजर आ रहे थे। कार्यक्रम के वीडियो फुटेज में 100 पिचके हुए प्लास्टिक के बुलबुले देखे गए।
इस कार्यक्रम कोरोनावायरस के कारण भविष्य में होने वाले कॉन्सर्ट का एक परीक्षण था। इसके साथ ही एक कार्यक्रम के दौरान एक म्यूजिक वीडियो भी बनाया गया ताकि भविष्य के कॉन्सर्ट की रूपरेखा के बारे में लोगों को बताया जा सके। कार्यक्रम के दौरान इस कॉन्सर्ट में 100 दर्शक भी प्लास्टिक बुलबुले के अंदर संगीत का लुत्फ उठाते नजर आएं।
अब और इंतजार नहीं कर सकते-
ओकलाहोमा के संगीत बैंड ने इस कार्यक्रम के दौरान अपने आने वाले नए एल्बम अमेरिकन हेड एट द क्राइटेरियन के दो गानों पर प्रस्तुति दी। इस कॉन्सर्ट हॉल में 3500 हजार लोगों के खड़े होने की व्यवस्था है, लेकिन प्रयोग के दौरान सिर्फ 100 लोगों को ही वहां आने की अनुमति दी गई। बैंड के सदस्य फ्रंटमैन वाइने कोएने ने इंस्टाग्राम पर कार्यक्रम का एक क्लिप साझा किया और साथ ही कई तस्वीरें भी पोस्ट की। उन्होंने कहा, मुझे लगता है किसी ने भी मार्च में नहीं सोचा होगा कि ये इतना लंबा चलेगा।
अब आठ महीने होने जा रहे हैं। मुझे लगता है कि सभी ने सोचा होगा कि अब यह बीमारी ठीक हो जाएगा, इस महीने नियंत्रण में आ जाएगी। लेकिन अब और इंतजार नहीं किया जा सकता। बबल के इस विकल्प पर पहली बार मई में प्रयोग किया गया था। स्टीफन कोलबर्ट ने अपने शो पर इसका प्रयोग किया था।
2004 से बबल का प्रयोग कर रहे कोएने-
कोएने 2004 से ही अपने कार्यक्रमों के दौरान प्लास्टिक बबल का इस्तेमाल कर रहे हैं। उन्होंने कहा, मुझे यह काफी पसंद है। इसके अंदर खड़े होकर आप कितने भी उत्साहित होकर चीख सकते है और इससे कोई दूसरा संक्रमित भी नहीं होगा। यह के बैरियर की तरह काम करता है जो आपको भी सुरक्षित रखता है और दूसरों को भी। यह एक सफल प्रयोग हैं और भविष्य में इसका इस्तेमाल किया जाना चाहिए।
नहीं होती घुटन-
बैंड के अन्य सदस्य डेजी स्मिथ ने कहा, यह प्लास्टिक बबल इतना बड़ा है कि इसके अंदर घुटन महसूस नहीं होती। इसके अंदर सांस लेने में कोई दिक्कत भी नहीं होती। अगस्त में पहली बार 2500 संगीत प्रेमियों के लिए सैम फेंडर के कॉन्सर्ट का आयोजन किया गया था। यहां दर्शकों के लिए छोटे-छोटे बाड़े बनाए गए थे ताकि सोशल डिस्टेंसिंग के नियमों का पालन किया जा सके। वहीं न्यूकैसल गोसफोर्थ पार्क में नॉर्थ शील्ड बैंड ने प्रस्तुति दी जिसमें छह-छह फीट की दूरी पर 500 ऊंचे प्लेटफॉर्म बनाए गए थे जिसमें एक साथ सिर्फ पांच लोग ही खड़े हो सकते हैं।

 शौर्यपथ / क्या आपका लाडला दिनभर टीवी या मोबाइल की स्क्रीन से चिपका रहता है? अगर हां तो संभल जाइए। एक अमेरिकी अध्ययन में स्क्रीन के जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल को न सिर्फ बच्चों की आंखों और मानसिक स्वास्थ्य, बल्कि सीखने-समझने, चीजें याद रखने व रिश्ते निभाने की क्षमता के लिहाज से भी घातक करार दिया गया है। अभिभावकों से कहा गया है कि वे बच्चों को दिनभर में दो घंटे से ज्यादा स्क्रीन के प्रयोग की छूट न दें।
कैलिफोर्निया स्थित मेमोरियल केयर ऑरेंज कोस्ट मेडिकल सेंटर के शोधकर्ताओं की मानें तो दिनभर में तीन घंटे से अधिक समय तक स्क्रीन का इस्तेमाल करने वाले बच्चे देरी से बोलना सीखते हैं। उन्हें पढ़ने-लिखने और भाषा समझने में भी दिक्कत पेश आती है। वहीं, जो किशोर रोज पांच से सात घंटे स्क्रीन के सामने डटे रहते हैं, उनमें उदासी, बेचैनी, जीवन से नाउम्मीदी और आक्रामकता की शिकायत पनपने का खतरा दोगुना होता है।
मोटापे का खतरा
मुख्य शोधकर्ता डॉ. जीना पोजनर ने स्क्रीन की लत को बच्चों में मोटापे की बढ़ती समस्या के लिए जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने मेयो क्लीनिक के उस अध्ययन का हवाला दिया, जिसमें स्क्रीन का इस्तेमाल हर दो घंटे बढ़ने पर मोटापे की आशंका में 23 फीसदी इजाफा होने की बात सामने आई थी। यह भी पाया गया था कि स्क्रीन के इस्तेमाल में 50 फीसदी कटौती करने वाले बच्चे 25 प्रतिशत कम कैलोरी खाते हैं।
अनिद्रा की शिकायत
पोजनर ने बताया कि स्क्रीन से निकलने वाली नीली रोशनी स्लीप हार्मोन ‘मेलाटोनिन’ का उत्पादन बाधित करती है। इससे बच्चों को नींद के आगोश में समाने में तो दिक्कत पेश आती ही है, साथ ही सुबह उठने पर वे तरोताजा भी महसूस नहीं करते। अधूरी नींद का उनकी याददाश्त और तार्किक क्षमता पर भी बुरा असर पड़ता है। पोजनर ने सोने से दो घंटे पहले ही बच्चों के लिए स्क्रीन का इस्तेमाल प्रतिबंधित करने की सलाह दी।
सिर से लेकर कमर तक में दर्द
2018 में प्रकाशित एक ब्रिटिश अध्ययन का जिक्र करते हुए पोजनर ने कहा कि घंटों स्क्रीन के सामने डटे रहने वाले बच्चों में सिर, पीठ, कमर और कंधे में दर्द की समस्या भी ज्यादा सामने आती है। इसकी वजह सिर झुकाने से उसका भार बढ़ना और रीढ़ की हड्डी पर अतिरिक्त दबाव पड़ना है।
चिंताजनक
-आठ से 12 साल तक के बच्चे रोजाना 04 से छह घंटे औसतन स्क्रीन से चिपके रहते हैं
-09 घंटे औसतन किशोर उम्र के लोग मोबाइल, टीवी या कंप्यूटर की स्क्रीन पर गुजारते हैं
किसके लिए कितना इस्तेमाल सही
डेढ़ साल तक के बच्चे
-परिजनों से दो से पांच मिनट की वीडियो कॉल तक ही सीमित होना चाहिए स्क्रीन का इस्तेमाल। मां-बाप को खेलने-कूदने और पढ़ने-लिखने के लिए प्रेरित करना चाहिए।
18 से 24 महीने
-माता-पिता की देखरेख में दिनभर में एक से डेढ़ घंटे ही स्क्रीन के प्रयोग की इजाजत होनी चाहिए। बच्चों को सिर्फ शिक्षण सामग्री तक पहुंच सुनिश्चित करना अनिवार्य।
दो से पांच साल
-नाच-गाने से जुड़े वीडियो और गेम खेलने की अनुमति दी जा सकती है। पर हफ्ते के शुरुआती पांच दिन अधिकतम एक घंटे और सप्ताहांत तीन घंटे से ज्यादा स्क्रीन न थमाएं।
पांच साल से ऊपर
-बड़े बच्चों के लिए स्क्रीन टाइम निर्धारित करना मुश्किल। पर टीवी-मोबाइल-कंप्यूटर के इस्तेमाल से शारीरिक सक्रियता और सीखने-समझने, रिश्ते निभाने की कला प्रभावित होने लगे तो यह घातक है।

 शौर्यपथ / अमेरिका के सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रीवेंशन के अनुसार आज के समय में एंटीबायोटिक के खिलाफ प्रतिरोध विकसित कर लेने वाले बैक्टीरिया चुनौती बनते जा रहे हैं। अमेरिका में हर लगभग 28 लाख लोग एंटीबायोटिक प्रतिरोधी संक्रमण की जद में आ जाते हैं और इनमें से तकरीबन 35,000 लोगों की मौत हो जाती है। अब अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ पेन्सिलवेनिया के पेरलमैन स्कूल ऑफ मेडिसिन के शोधकर्ताओं ने एक ततैया (वाष्प) के जहर से एक नया एंटीबायोटिक अणु तैयार किया है।
अमेरिकी वैज्ञानिकों ने इसके जहर से ऐसे एंटीमाइक्रोबियल अणु विकसित किए हैं जो उन बैक्टीरिया को खत्म करेंगे जिन पर दवाओं का असर नहीं हो रहा। अणु तैयार करने वाली अमेरिका की पेन्सिलवेनिया यूनिवर्सिटी का कहना है इससे तैयार होने वाली दवा से टीबी और सेप्सिस के खतरनाक बैक्टीरिया का इलाज किया जाएगा।
बैक्टीरिया पर बेअसर हो रही दवा का विकल्प-
नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेस जर्नल में पब्लिश रिसर्च के मुताबिक, वैज्ञानिकों ने एशियन, कोरियन और वेस्पुला ततैया के जहर से प्रोटीन का छोटा से हिस्सा निकालकर उसमें बदलाव किया। बदलाव के कारण दवा के अणु में उन बैक्टीरिया को खत्म करने की क्षमता बढ़ी है जिन पर दवाएं बेअसर साबित हो रही हैं। इन बीमारियों का कारण बनने वाले बैक्टीरिया पर मौजूद एंटीबायोटिक दवाएं काम नहीं कर रही हैं।
चूहे पर किया गया अध्ययन-
चूहे पर किए गए अध्ययन में सामने आया कि जिन बैक्टीरिया पर दवा का असर नहीं हो रहा है उन पर इसका असर हुआ। वैज्ञानिकों का कहना है, वर्तमान में ऐसे नए एंटीबायोटिक्स की जरूरत है जो दवा से नष्ट न होने वाले बैक्टीरिया को खत्म कर सकें क्योंकि ऐसे संक्रमण के मामले बढ़ रहे हैं। हमें लगता है जहर से निकले अणु नए तरह के एंटीबायोटिक का काम करेंगे।
ऐसे तैयार हुई दवा-
रिसर्च के मुताबिक, ततैया के जहर से मास्टोपरन-एल पेप्टाइड को अलग किया गया है। यह इनसानों के लिए काफी जहरीला होता है और रक्तचाप के स्तर को बढ़ाता है जिससे इनसानों की हालत नाजुक हो जाती है। इसके इस असर को कम करके इसमें इतना बदलाव किया गया कि यह बैक्टीरिया के लिए जहर का काम करे। इंसानों के लिए यह कितना सुरक्षित है, इस पर क्लीनिकल ट्रायल होना बाकी है।
इन बैक्टीरिया पर हुआ प्रयोग-
वैज्ञानिकों ने दवा का ट्रायल चूहे में मौजूद ई-कोली और स्टेफायलोकोकस ऑरेयस बैक्टीरिया पर किया। नई दवा की टेस्टिंग के दौरान 80 फीसदी चूहे जिंदा रहे। लेकिन जिन चूहों को इस दवा की मात्रा अधिक दी गई उनमें दुष्प्रभाव दिखे। शोध में दावा किया गया है कि यह दवा जेंटामायसिन और इमिपेनेम का विकल्प साबित हो सकता है क्योंकि दवा प्रतिरोधी बैक्टीरिया के मामले बढ़ रहे हैं। शोधकर्ताओं को उम्मीद है कि वो इस तरह के जहर से और एंटीबायोटिक अणु बना सकेंगे और इससे नई तरह की असरदार दवाएं बनाई जा सकेंगी।

 शौर्यपथ / कोरोनावायरस महामारी के दौरान लॉकडाउन में घर में बैठे-बैठे लोगों के स्क्रीन देखने के समय में इजाफा हो गया है। एक और जहां बच्चे ऑनलाइन पढ़ाई के कारण ज्यादा देर तक स्क्रीन देख रहे हैं वहीं दूसरी ओर कामकाजी लोग भी काफी देर तक काम करने के दौरान स्क्रीन देखते रहते हैं।
अब एक नए शोध में पता चला है कि रात को सोने से पहले नीली रोशनी को काटने वाले चश्मे का प्रयोग करने से नींद भी अच्छी आती है और अगले दिन कामकाज की उत्पादकता में भी बढ़ोतरी होती है।
इंडियाना यूनिवर्सिटी के केली स्कूल ऑफ बिजनेस के प्रोफेसर क्रिस्टियानों एल गुआराना ने कहा, हमने पाया कि नीली रोशनी को काटने या फिल्टर करने वाले चश्मे नींद को बेहतर करने में एक प्रभावी हस्तक्षेप साबित हुए हैं। इसके अलावा कार्यक्षमता को बढ़ाने, प्रदर्शन को बेहतर करने, संस्थागत व्यवहार को बेहतर करने और खराब कार्य व्यवहार को कम करने में भी ये ब्लू लाइट चश्मे प्रभावी साबित हुए हैं।
नीली रोशनी को फिल्टर करने वाले चश्मे आंखों के सामने एक शारीरिक अंधेरा पैदा कर देते हैं जिससे नींद की गुणवत्ता और अवधि दोनों में ही बढ़ोतरी होती है।
इन उपकरणों से निकलती है नीली रोशनी
ज्यादातर इस्तेमाल में आने वाले उपकरण जैसे कंप्यूटर स्क्रीन, स्मार्टफोन, टैबलेट और टीवी से नीली रोशनी निकलती है। पूर्व शोधों के अनुसार इस नीली रोशनी से नींद में खलल पड़ती है। घर से काम करने के दौरान लोगों की इन उपकरणों पर निर्भरता बढ़ गई है। शोधकर्ता गुआराना ने कहा, सामान्य तौर पर नीली रोशनी को रोकने वाले चश्मे से देर रात जागने वाले लोगों को ज्यादा फायदा होता है।
हालांकि नीली रोशनी से बचने से सभी को फायदा होता है। रात को काम करने वाले कर्मचारियों को इन चश्मों से ज्यादा फायदा होता है क्योंकि उनकी आंतरिक जैविक घड़ी और बाहरी नियंत्रित कार्य के समय में काफी गड़बड़ होती है। हमारे शोध से पता चलता है कि ब्लू लाइट चश्मे कर्मचारियों के स्वास्थ्य और कार्यक्षमता दोनों ही बढ़ाते हैं।
कर्मचारी और नियोक्ता दोनों को होगा फायदा
यूनिवर्सिटी ऑफ वाशिंगटन के प्रोफेसर बारनेस ने कहा, इस शोध से पता चलता है कि ये नीली रोशनी को रोकने वाले चश्मे के इस्तेमाल के सस्ते तरीके से कर्मचारी और नियोक्ता दोनों को ही फायदा होगा।
शोधकर्ताओं ने 63 कंपनी मैनेजरों और 67 कॉल सेंटर अधिकारियों से डाटा लिया। कुछ कर्मचारियों को ब्लू लाइट चश्मे दिए गए और कुछ को नहीं दिए गए। उन्होंने पाया कि कभी-कभी कर्मचारियों को अहले सुबह भी काम करना पड़ता है। इससे उनकी जैविक घड़ी में गड़बड़ी आ जाती है।
नियोक्ताओं को नीली रोशनी के संपर्क में आने की मात्रा को लेकर सोचना चाहिए और कर्मचारियों की जैविक घड़ी को बेहतर बनाने की कोशिश करनी चाहिए।

लाइफस्टाइल / शौर्यपथ / जियोवानी कैरिली और जियैमपिएरो नोबिली इटली के सुदूर नॉर्तोशे कस्बे के दो मात्र बाशिंदे हैं। बावजूद इसके वे कोरोना संक्रमण की रोकथाम के लिए जरूरी सभी एहतियाती उपायों का सख्ती से पालन कर रहे हैं। एक-दूसरे से मिलते समय दोनों न सिर्फ मास्क पहनना सुनिश्चित करते हैं, बल्कि आपस में छह फीट का फासला बनाए रखना भी नहीं भूलते।
नॉर्तोशे पर्यटकों के बीच लोकप्रिय पेरुगिया प्रांत की नरीना घाटी का बेहद खूबसूरत कस्बा है। हालांकि, समुद्र तल से 900 मीटर की ऊंचाई के चलते यहां पहुंचना उतना आसान नहीं। बावजूद इसके 82 वर्षीय कैरिली और 74 साल के नोबिली खुद को सार्स-कोव-2 वायरस के प्रकोप से सुरक्षित नहीं महसूस करते।
बकौल कैरिली, ‘कोविड-19 का नाम सुनते ही मेरी रूह कांप उठती है। मैं अगर संक्रमित हो गया तो कौन मेरा ख्याल रखेगा। मेरी उम्र हो चली है, फिर भी मैं जिंदा रहना चाहता हूं, अपनी भेड़ों, कुत्ते, सेब के बगानों, मधुमक्खी के छत्तों, वाइनयार्ड और मशरूम के खेतों के लिए।’
कैरिली कहते हैं, ‘नॉर्तोशे में न तो कोई होटल-रेस्तरां या बार है, न ही अस्पताल,क्लीनिक, दवा की दुकान या मिनी बाजार। हर छोटे-बड़े सामान की खरीदारी के लिए हमें शहर जाना पड़ता है। वहां अगर हम किसी संक्रमित के संपर्क में आ गए हों तो नहीं चाहते कि दूसरा भी वायरस का शिकार हो। मास्क लगाने और सामाजिक दूरी पर अमल करने की एक बड़ी वजह यह भी है।’
नियमों का पालन करना जरूरी
-इटली में सार्वजनिक स्थलों पर मास्क पहनना और एक मीटर की सामाजिक दूरी का पालन करना अनिवार्य है। नियमों की अनदेखी करने पर 470 से 1170 डॉलर (करीब 32900 से 81900 रुपये) का जुर्माना लगाने का प्रावधान किया गया है। नोबिली के मुताबिक वह और कैरिनी सिर्फ स्वास्थ्य कारणों से मास्क नहीं पहनते या फिर सोशल डिस्टेंसिंग पर अमल नहीं करते। दोनों का मानना है कि नियम-कायदे सबके लिए समान होते हैं। इन्हें तोड़ना अपने उसूलों का अपमान करने जैसा है।
आखिरी सांस तक नॉर्तोशे में रहेंगे
-कैरिली की पैदाइश नॉर्तोशे की ही है, पर पढ़ाई और नौकरी के सिलसिले में उनका ज्यादातर वक्त राजधानी रोम में गुजरा। रिटायरमेंट के बाद की जिंदगी बिताने के लिए वह पुश्तैनी गांव लौट गए। उनके साले के बहनोई नोबिली ने भी नॉर्तोशे में जा बसने का मन बना लिया। कैरिली कहते हैं, नोबिली के अलावा उनकी पांच भेड़ें और एक कुत्ता ही नॉर्तोशे में रहते हैं। बावजूद इसके दोनों को कभी अकेलापन महसूस नहीं होता। बाजार से लंबी दूरी और साधन का अभाव भी उन्हें शहर में बसने के लिए नहीं उकसाता।

वास्तु टिप्स / शौर्यपथ /हर इंसान सुख-सुविधाओं भरा जीवन गुजारना चाहता है। अपनी ख्वाहिशों के साथ जरुरतों को पूरा करने के लिए भी इंसान को पैसों की जरुरत होती है। कभी-कभी ऐसा होता है हम अपने परिवार की जरुरतों को पूरा करने के दिन-रात मेहनत करते हैं। लेकिन अंत में हमारे हाथ खाली ही रहते हैं। कई बार घर में धन के टिकने का न कारण वास्तु दोष भी होता है। वास्तु शास्त्र के अनुसार, वास्तु दोष को कुछ उपायों और टोटकों से दूर किया जा सकता है। जानिए अगर आपके घर का भी वास्तु खराब है तो उसे कैसे कर सकते हैं दूर, ताकि घर में टिकने लगे धन-
1. वास्तु शास्त्र के अनुसार, आप जहां पैसे रखते हैं उस अलमारी या तिजोरी का मुख उत्तर दिशा में होना चाहिए। कहा जाता है कि इससे धन में वृद्धि के साथ खर्चा भी कम होता है।
2. वास्तु के अनुसार, घर के पानी का निकास दक्षिण और पश्चिम दिशा से ही होना चाहिए। सही दिशा से जल निकासी का रास्ता होने से आर्थिक समस्याएं दूर हो जाती हैं।
3. वास्तु शास्त्र के अनुसार, घर में अक्सर टोटियों या नल से पानी गिरते रहना अशुभ होता है। इसके धन पानी की तरह बहता है और बेवजह के खर्च भी बढ़ता है।
4. कहा जाता है कि घर में टूटे शीशे रखना अशुभ होता है। ऐसा करने से घर में नेगेटिव एनर्जी का वास होता है और आर्थिक नुकसान भी होता है।
ये 3 चीजें बदल सकती हैं घर का माहौल-
1. माना जाता है कि घर में स्वास्तिक का निशान होना जरुरी होता है। कहते हैं कि जिस घर में स्वास्तिक चिन्ह होता है वहां नकारात्मक ऊर्जा नहीं आती है। घर में सुख-समृद्धि का वास होता है।
2. कहते हैं कि घर में कलश रखना बेहद शुभ होता है। इससे घर में खुशियां आती हैं और आर्थिक लाभ भी होता है।
3. कहते हैं कि घर में ओम का चिन्ह बनाने से वास्तु दोष दूर होता है और घर के सदस्यों के बीच प्यार बढ़ता है।

धर्म संसार / शौर्यपथ / पावन नवरात्र में तीसरे दिन मां चंद्रघंटा की उपासना की जाती है। मां चंद्रघंटा का रूप बहुत सौम्य है। मां का स्वरूप परम शांतिदायक और कल्याणकारी है। मां के मस्तक में घंटे का आकार का अर्द्धचंद्र है, इसलिए मां को चंद्रघंटा देवी कहा जाता है। मां के दिव्य स्वरूप का ध्यान करने से हर तरफ सकारात्मक ऊर्जा का संचार हो जाता है।
मां को लाल रंग के फूल अर्पित करें। मां की उपासना करते समय मंदिर की घंटी अवश्य बजाएं। घंटे की ध्वनि से मां अपने भक्तों पर हमेशा अपनी कृपा बरसाती हैं। मां को मखाने की खीर का भोग लगाना शुभ माना जाता है। मां की आराधना से अहंकार नष्ट हो जाता है। मां की आराधना से घर-परिवार में शांति आती है। तृतीय नवरात्र पर लाल रंग के वस्त्र पहनना शुभ माना जाता है। मां को गाय का दुग्ध अर्पित करने से दुखों से मुक्ति मिलती है। माता चंद्रघंटा को शहद का भोग लगाना शुभ माना जाता है। मां की आराधना से सभी कष्टों का निवारण होता है। मां सौभाग्य, शांति और वैभव प्रदान करती हैं। मां का उपासक निर्भय हो जाता है। मां चंद्रघंटा के भक्त जहां भी जाते हैं लोग उन्हें देखकर शांति और सुख का अनुभव करते हैं।

लखनऊ / शौर्यपथ / बलिया हत्याकांड के मुख्य आरोपी धीरेंद्र सिंह को यूपी एसटीएफ ने आज गिरफ्तार कर लिया. उधर बलिया में हत्या के आरोपी के समर्थन में बीजेपी कार्यकर्ताओं ने प्रदर्शन किया. उन्होंने जमकर नारेबाज़ी की. उनकी मांग है कि पीड़ित पक्ष पर भी मुकदमा हो क्योंकि उन्होंने भी मारपीट की थी. अगर मामला दर्ज नहीं हुआ तो वे बीजेपी छोड़ देंगे. पहले पुलिस ने धीरेंद्र सिंह को पकड़कर पिस्टल समेत छोड़ दिया था...लेकिन आज पकड़ा तो नहीं छोड़ा.अब उसे बलिया पुलिस को सौंपा जा रहा है.
बलिया के बीजेपी कार्यकर्ता, डब्लू भैया यानी हत्या के मुलज़िम धीरेंद्र सिंह की हिमायत में नारेबाज़ी करते रहे. वे कह रहे थे कि हत्या के आरोपी के संघर्ष में वे उनके साथ हैं. उनकी मांग है कि मरने वाले जयप्रकाश पाल के लोगों पर मुक़दमा हो वरना वे बीजेपी छोड़ देंगे.
बीजेपी के मंडल अध्यक्ष बुट्टन राय ने कहा कि, ''इस्तीफ़ा दे देंगे हम लोग.भारतीया जनता पार्टी में रहने से क्या फायदा है. क्या लाभ है हम लोगों को? क्या तनख़्वाह मिलती है? अपना घर से हम खर्चा करते हैं. अपने काम का नुकसान क के हम लोग पार्टी और देश के लिए काम करते हैं.''
उधर गोलीकांड में मारे गए जयप्रकाश पाल का परिवार मुलज़िम के लिए कड़ी से कड़ी सज़ा चाहता है. उनका कहना है कि उन्हें मुकदमों में न फंसाया जाए. जयप्रकाश के भाई सूरजपाल ने कहा कि ''विधायक जी उनकी तरफ, से हत्यारे की तरफ से बिल्कुल खड़े हैं. और हम लोगों को यह भी सुनने में आ रहा है कि तरह-तरह के मुक़दमे में फंसना चाहते हैं. इसलिए सरकार को हम लोगों की सहायता के लिए कुछ करना चाहिए."
धीरेंद्र सिंह के समर्थन में प्रदर्शन करने वाले बीजेपी कार्यकर्ता आरोप लगा रहे हैं कि जिले के संगठन में भ्रष्ट लोग हैं इसलिए धीरेंद्र सिंह की मज़बूत पैरवी नहीं हो पाई. बुट्टन राय ने कहा कि ''यहां का जो ज़िला अध्यक्ष है वो पैसा लेकर पद बांटता है. और करन मौर्य जो है विधानसभा में बसपा को वोट दिया था... उसको ज़िला कार्यसमिति में लिया. एक दिलीप गुप्ता है, वो हमसे सपा का वोट मांगा था.''

प्रवासी श्रमिकों के लिए प्रदेश भर में बनाए गए थे साढ़े 21 हजार से अधिक क्वारेंटाइन सेंटर
आवास एवं भोजन सहित सभी बुनियादी सुविधाएं कराई गई थीं मुहैया, कोरोना के संभावित मरीजों की तत्काल जांच करवाई गईं
कोरोना संक्रमण का प्रसार रोकने में इन क्वारेंटाइन सेंटरों से मिली बड़ी मदद

रायपुर / शौर्यपथ / देश के विभिन्न हिस्सों से बड़ी संख्या में छत्तीसगढ़ लौटे प्रवासी श्रमिकों के लिए ग्राम पंचायतों में बनाए गए क्वारेंटाइन सेंटरों से कोरोना संक्रमण का प्रसार रोकने में बड़ी सहायता मिली है। पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग द्वारा जिला प्रशासन के सहयोग से इसके लिए प्रदेश भर में 21 हजार 580 क्वारेंटाइन सेंटर बनाए गए थे। कोरोना काल में प्रदेश लौटे छह लाख 80 हजार 665 लोग इन सेंटरों में सफलतापूर्वक क्वारेंटाइन अवधि पूरी कर अपने घर पहुंच चुके हैं। इन लोगों ने खुद के एवं अन्य ग्रामीणों के स्वास्थ्य की सुरक्षा की दृष्टि से क्वारेंटाइन अवधि पूर्ण करने के बाद अगले दस दिनों तक होम-क्वारेंटाइन में रहने के निर्देशों का भी गंभीरता से पालन किया है।
गांवों में स्थापित क्वारेंटाइन सेंटरों का संचालन एवं नियंत्रण संबंधित जिला प्रशासन द्वारा किया गया। इनके संचालन में ग्राम पंचायतों, जनपद पंचायतों और जिला पंचायतों ने भी सक्रिय भागीदारी निभाई। ग्राम पंचायतों में स्थापित क्वारेंटाइन सेंटरों में रहने वाले प्रवासी मजदूरों को आवास और भोजन सहित सभी बुनियादी सुविधाएं मुहैया कराई गई थीं। अस्थायी शौचालयों, पुरूषों एवं महिलाओं के लिए अलग-अलग स्नानगृहों, स्वच्छ पेयजल, लाइट एवं पंखों की भी वहां व्यवस्था की गई थी। लोगों के मनोरंजन के लिए टेलीविजन एवं रेडियो के इंतजाम के साथ अनेक रचनात्मक गतिविधियां भी वहां संचालित की जा रही थीं। रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने योग और प्राणायाम का भी अभ्यास कराया गया। वृक्षारोपण, पेंटिंग, खेलकूद, पठन-पाठन जैसी गतिविधियों के माध्यम से भी उनकी मानसिक सेहत का ध्यान रखा गया।
क्वारेंटाइन सेंटरों में बेहतर साफ-सफाई के साथ कोरोना संक्रमण से बचाव के दिशा-निर्देशों के पालन पर भी जोर दिया गया था। बार-बार हाथ धोने के लिए साबुन और पानी के साथ ही हैंड-सेनिटाइजर भी उपलब्ध कराया गया था। मुंह ढंकने के लिए मास्क एवं गमछा भी दिया गया। कोरोना संक्रमित व्यक्ति के मिलने जैसी आपात स्थिति के लिए स्थानीय प्रशासन द्वारा प्रत्येक सेंटर में एक कमरा पृथक से आइसोलेशन के लिए सुरक्षित रखा गया था। स्वास्थ्य विभाग के सहयोग से क्वारेंटाइन सेंटरों में रह रहे लोगों के स्वास्थ्य की लगातार निगरानी की गई। अस्वस्थ लोगों को इलाज और दवाईयां भी मुहैया कराई गईं। संक्रमण की संभावना और लक्षण वाले व्यक्तियों के तत्काल सैंपल लेकर जांच के लिए भेजा गया।
पंचायत एवं ग्रामीण विकास मंत्री टी.एस. सिंहदेव के निर्देश पर विभाग द्वारा प्रवासी श्रमिकों के लिए मनरेगा के तहत जॉब-कार्ड बनाकर रोजगार दिए जाने के साथ ही उन्हें अन्य योजनाओं के माध्यम से भी रोजगार उपलब्ध कराने त्वरित कदम उठाए गए हैं। स्थानीय प्रशासन द्वारा मजदूरों की स्किल-मैपिंग कर औद्योगिक, भवन निर्माण और अन्य क्षेत्रों में उन्हें काम दिलाने के लिए भी गंभीर प्रयास किए जा रहे हैं।

नई दिल्ली / शौर्यपथ / बिहार में बांकीपुर विधानसभा सीट से कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ रहे पूर्व केंद्रीय मंत्री शत्रुघ्न सिन्हा के बेटे लव सिन्हा ने रविवार को कहा कि उन्होंने भाजपा के इस गढ़ में भगवा पार्टी को चुनौती देकर और अपनी क्षमता साबित कर राजनीतिक पारी की शुरूआत करने का फैसला किया है. लव ने यह भी कहा कि वह पटना साहिब लोकसभा क्षेत्र के तहत आने वाली बांकीपुर विधानसभा सीट से चुनाव, 2019 के आम चुनाव में अपने पिता को मिली हार का बदला लेने के लिये नहीं लड़ रहे हैं. उन्होंने कहा कि वह पटना के लोगों के कल्याण के लिये यह चुनाव लड़ रहे हैं.
अपने पिता की ही तरह अभिनेता से नेता बने लव ने पीटीआई-भाषा से एक साक्षात्कार में कहा कि 2014 के बाद से भाजपा बदल चुकी है. उन्होंने आरोप लगाया कि अब भगवा पार्टी के अंदर ज्यादा चर्चा नहीं होती है और अब सिर्फ ‘‘आदेश' जारी किया जाता है.
यह पूछे जाने पर कि बिहार में राष्ट्रीय जनता दल (राजद) जैसी पार्टी की व्यापक उपस्थिति होने के बावजूद उन्होंने अपनी चुनावी पारी का आगाज करने के लिये कांग्रेस को ही क्यों चुना, लव (37) ने कहा, ‘‘सिर्फ मैंने कांग्रेस को नहीं चुना है, बल्कि कांग्रेस ने भी मुझे चुना है. ''
उन्होंने कहा, ‘‘कांग्रेस ने मेरे द्वारा किये गये काम पर गौर किया, यहां तक कि उस वक्त के काम भी...जब मैंने अपने पिता के भाजपा में रहने के दौरान किये थे. मैंने यहां 2009 से अपने पिता के साथ काम किया है. मैं आश्वस्त हूं कि पार्टी (कांग्रेस) ने पिछले चुनावों में मेरे द्वारा किये गये काम पर गौर किया होगा और यही कारण है कि उन्होंने मुझे यह टिकट दिया. ''
भाजपा के इस गढ़ में चुनाव लड़ने की बात स्वीकार करते हुए लव ने कहा, ‘‘क्या इस कारण लड़ने से डरना चाहिए. मैं अपनी क्षमता साबित करने और अपनी क्षमता दुनिया को दिखाने के लिये लड़ाई लड़ने में यकीन रखता हूं. जीत या हार, कहीं से भी मेरे हाथ में नहीं है. जनता फैसला करेगी और हमें उनके फैसले को स्वीकार करना होगा.''
उन्होंने यह भी कहा कि मौजूदा विधायक नितिन नबीन के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर है. उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा उम्मीदवार को यह सीट अपने पिता से विरासत में मिली थी, जो बांकीपुर से विधायक थे. अपने पिता के कारण टिकट मिलने की अटकलों को खारिज करते हुए लव ने कहा कि यदि यह परिवारवाद होता, तो उन्होंने लोकसभा चुनाव लड़ना चुना होता, विधानसभा चुनाव नहीं .
उल्लेखनीय है कि लव ने जेपी दत्ता की फिल्म ‘पलटन' में अभिनय किया था. बांकीपुर, पटना साहिब लोकसभा क्षेत्र के तहत आता है और इसे भाजपा का एक गढ़ माना जाता है. संसदीय सीट पर शत्रुघ्न सिन्हा 2009 और 2014 में भाजपा के टिकट पर निर्वाचित हुए थे. हालांकि, 2019 के चुनाव में शत्रुघ्न (74) ने कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ा और इसमें उन्हें भाजपा के रविशंकर प्रसाद से हार का सामना करना पड़ा था.

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