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May 31, 2026
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शौर्यपथ

शौर्यपथ

     जीना इसी का नाम है /शौर्यपथ / वह जिस देश और समाज से आती हैं, वहां बेटे और बेटियों में भले कभी फर्क रहा हो, मगर आज वह दुनिया के सबसे तरक्कीपसंद समाजों में से एक है। अमेरिका की न्यू जर्सी प्रांत में पैदा मैरी रॉबिन्सन की परवरिश एक खुले माहौल में हुई। अपने पापा की बेहद दुलारी रहीं मैरी। उनका परिवार एक अच्छी और खुशहाल जिंदगी जी रहा था। मगर जिंदगी तो सबका इम्तिहान लेती है, सो मैरी के लिए भी उसने कुछ आजमाइशें तय कर रखी थीं।
आज से करीब 46 साल पहले की बात है। तब मैरी की उम्र सिर्फ 14 साल थी। एक रोज उन्हें पता चला कि पिता कैंसर के आखिरी स्टेज पर हैं। और मैरी कुछ समझ पातीं, इसके पहले ही पिता चल बसे। उनके जनाजे में पूरे रास्ते मैरी अपने भाई को पकडे़ खामोश चलती रहीं। उन्हें यह यकीन ही नहीं हो पा रहा था कि डैड अब कभी उनसे बातें नहीं कर सकेंगे। मैरी को गहरा मानसिक आघात लगा था, लेकिन कोई भी उनकी और उनके भाई की जहनी कैफीयत को समझने वाला नहीं था।
मैरी खुद में सिमटती चली गईं। उन्होंने दोस्तों के साथ बाहर खेलने जाना बंद कर दिया, पढ़ाई से भी मन उचट गया, जाहिर है, उनके ग्रेड गिरने लगे थे, वह बात-बात पर झल्ला उठती थीं। मैरी के भाई के व्यवहार में भी काफी बदलाव आ गया था। उन दोनों को उस वक्त किसी ऐसे परिजन या बडे़ स्नेही की जरूरत थी, जो उनके मर्म को छू पाता।इसके उलट उन्हें बिगडे़ बच्चे के रूप में देखा जाने लगा। मैरी कहती हैं, ‘मैं बुरी नहीं, उदास बच्ची थी।’
करीब छह वर्षों तक अपनी पीड़़ा और उदासी से मैरी रॉबिन्सन अकेले ही जूझती रहीं। फिर वह दुखी और अनाथ बच्चों की सहायता करने वाले एक समूह से बतौर वॉलंटियर जुड़ गईं। वहां बच्चों की मदद करके मैरी को काफी सुकून मिलता। फिर उन्होंने एक बड़ा फैसला किया और करीब दो दशक पहले अपनी नौकरी छोड़ दी, ताकि वह गमगीन बच्चों को अपना पूरा वक्त दे सकें। मैरी यह अच्छी तरह जान चुकी थीं कि जब किसी मासूम के मां-बाप, भाई-बहन में से किसी की मौत हो जाती है, तो उसे कितना गहरा सदमा पहुंचता है, इसलिए वह नहीं चाहती थीं कि कोई बच्चा या किशोर-किशोरी वर्षों तक शोक की हालत में रहे।
एक अध्ययन के मुताबिक, अमेरिका में लगभग पचास लाख बच्चे 18 साल से पहले अपने माता-पिता, भाई-बहन में से किसी न किसी प्रियजन को खो देते हैं। और ऐसे बच्चों के अवसाद-ग्रस्त होने, अपना आत्म-विश्वास खो देने या पढ़ाई में पिछड़ जाने का जोखिम सबसे ज्यादा होता है। इन्हीं सबको देखते हुए साल 2011 में मैरी ने एक गैर-लाभकारी संगठन ‘इमैजिंग, अ सेंटर फॉर कोपिंग विद लॉस’ की नींव रखी। इसके जरिए वह किसी अजीज परिजन की मौत के गम से डूबे बच्चों की सहायता करने में जुट गईं।
बच्चों की मदद करने का मैरी का तरीका काफी अनूठा है। इसकी शुरुआत वह एक पिज्जा पार्टी से करती हैं। इससे सबको आपस में घुलने-मिलने का मौका मिलता है और फिर बच्चों के परिवार के सदस्य और संस्था के वॉलंटियर एक घेरा बनाते हैं और एक ‘टॉकिंग स्टिक’ आपस में पास करते हैं। फिर जिसकी बारी आती है, वह अपनी दास्तान सुनाता है कि उसने अपने किस अजीज परिवारी-जन को खोया है। मैरी का मानना है कि शोक से बाहर निकालने में उस व्यक्ति का जिक्र बहुत अहम रोल निभाता है, जो हमसे हमेशा के लिए बिछड़ा है।
बच्चों को लगता है कि हरेक व्यक्ति ने अपने किसी न किसी प्रिय जन को खोया है और यही एहसास असरकारी दवा का काम करता है। मैरी के मुताबिक, हरेक बच्चा, बल्कि किशोर भी, अपने दिवंगत प्रिय के किसी चुटीले वाकये या उनकी जिंदगी की किसी यादगार घटना के बारे में बार-बार सुनना चाहता है। कभी उसकी आंखों से, तो कभी गहरी सांसों के साथ भीतर की पीड़ा पिघलकर बाहर आ जाती है। उम्र के हिसाब से शोकाकुल बच्चों को अलग-अलग समूहों में बांटा जाता है। संगठन के स्वयंसेवी उन्हें मेमोरी बॉक्स जैसी गतिविधियों के जरिए अपनी भावनाएं साझा करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। बच्चे मानो ज्वालामुखी की तरह अपने भीतर के सारे दुख, आक्रोश को बाहर फेंककर शांत हो जाते हैं। मैरी कहती हैं, ‘शोक तो जिंदगी का अटूट हिस्सा है, मगर हमारे बच्चों को कोई नहीं बताता कि वे इससे कैसे उबरें?
इमैजिंग में आने वाले बच्चे जब अपनी मानसिक वेदना से मुक्त होकर अपने दिवंगत परिजन को याद करते हैं, तो मैरी को लगता है कि उनके पिता जहां भी होंगे, जरूर खुश होंगे कि उनकी बेटी ने कुछ अच्छा किया है। उन्होंने अब तक सैकड़ों मासूमों को गहरे शोक से उबारा है। इतना ही नहीं, मैरी अब घूम-घूमकर देश-दुनिया के स्कूलों में शिक्षकों को प्रशिक्षण देती हैं कि शोकाकुल बच्चों के प्रति उनका आचरण कैसा होना चाहिए। इस नेक काम के लिए सीएनएन ने मैरी रॉबिन्सन को पिछले साल ‘हीरो ऑफ द ईयर’ के लिए नामित किया था।
प्रस्तुति : चंद्रकांत सिंह मैरी रॉबिन्सन अमेरिकी सामाजिक कार्यकर्ता

 

नजरिया /शौर्यपथ / सभ्य समाज में सार्वजनिक स्थानों पर थूकने को कभी अच्छा नहीं माना गया है, लेकिन खेलों में खिलाड़ियों का थूकना आम बात है। फुटबॉल और बेसबॉल खिलाड़ियों को थूकते देखना बहुत आम है, लेकिन कोरोना संक्रमण थूक के छींटे के माध्यम से भी होता है, तो खेल जगत खिलाड़ियों की इस आदत से दहला हुआ है। फुटबॉल और क्रिकेट में खिलाड़ियों के मैदान में थूकने पर एकदम से रोक लगाने पर आजकल बहस चल रही है।
पिछले दिनों रोमानिया फुटबॉल फेडरेशन ने सुझाव दिया कि कोई भी खिलाड़ी मैदान में थूकता पाया जाए, तो उस पर छह से 12 मैचों का प्रतिबंध लगा दिया जाए। इसके अलावा कुछ लोग मैदान में थूकने वाले खिलाड़ी को येलो कार्ड दिखाकर बुक करने का सुझाव दे रहे हैं। इनका मानना है कि बिना सजा इस समस्या से निजात पाना संभव नहीं है। लेकिन विश्व फुटबॉल की संचालक संस्था फीफा को लगता है कि मैच का संचालन करने वाले अधिकारियों के लिए यह पता लगाना संभव नहीं होगा कि कौन खिलाड़ी कब थूक रहा है। इसलिए फीफा रेफरी कमेटी के चेयरमैन कोलिना का कहना है कि लीग या टूर्नामेंट के आयोजक मसविदा बनाएं और थूकने वाले खिलाड़ियों पर मैच के बाद हिसाब से कार्रवाई की जाए। कोलिना कहते हैं कि मैदान में थूकने वाले खिलाड़ी को येलो कार्ड दिखाना थोड़ा अव्यावहारिक भी होगा, क्योंकि एक तो मैच के संचालक के लिए हर घटना पर निगाह रखना संभव नहीं होगा और कुछ पर कार्रवाई करना उनके साथ अन्याय हो जाएगा। फुटबॉल में किसी खिलाड़ी का दूसरे खिलाड़ी पर थूकना रेड कार्ड वाला अपराध है और सामान्य तौर पर थूकने वाले के प्रति इतनी कठोर कार्रवाई उचित नहीं लगती।
क्रिकेट में तेज गेंदबाज गेंद चमकाने के लिए लार का प्रयोग करते हैं। लार से संक्रमण की आशंका बढ़ जाती है। तेज गेंदबाज गेंद के एक हिस्से को चमकाकर गेंद का संतुलन बिगाड़ देते हैं, जिससे गेंद स्विंग होने लगती है। आईसीसी की क्रिकेट समिति ने फिलहाल गेंद पर लार के इस्तेमाल पर रोक लगा दी है, लेकिन उसने तेज गेंदबाजों के मैदान पर थूकने पर कोई प्रतिबंध नहीं लगाया है। आने वाले दिनों में मैदान पर थूकने पर भी पाबंदी की मांग उठ सकती है। समिति के प्रमुख अनिल कुंबले का कहना है कि गेंद पर लार का इस्तेमाल नहीं करना अंतरिम व्यवस्था है, कोरोना की समस्या खत्म होने पर यह प्रतिबंध खत्म हो सकता है।
अब सवाल यह है कि खिलाड़ी मैदान में थूकते क्यों हैं? तमाम अध्ययनों के अनुसार, ज्यादा कसरत या मेहनत करने पर लार में प्रोटीन की मात्रा बढ़ जाती है। खासतौर से म्यूकस की मात्रा बढ़ने से थूक गाढ़ा हो जाता है, जिसे निगलना मुश्किल होता है। ऐसे में, सांस लेने में दिक्कत होने लगती है और थूकने से ही स्थिति सामान्य होती है। क्रिकेट में खिलाड़ियों को लगातार नहीं दौड़ना पड़ता, इसलिए थूकने की समस्या कम होती है। इसमें आमतौर पर तेज गेंदबाज लंबे रनअप की वजह से थूकते मिल जाते हैं। टेनिस खिलाड़ी ब्रेक के समय ड्रिंक के कारण थूकने की समस्या से बचे रहते हैं। थूकने की मजबूरी फुटबॉल में ज्यादा है।
क्या फुटबॉलरों के थूकने पर रोक लगने से उनके खेल पर गलत प्रभाव तो नहीं पड़ेगा? शायद मैच के दौरान खिलाड़ियों का गला तर रखने की व्यवस्था करनी पडे़गी। इसके अलावा खिलाड़ियों को मैदान पर मिलकर जश्न मनाने से बचने की सलाह दी गई है। अक्सर खिलाड़ी खुशी में एक-दूसरे पर कूद पड़ते हैं। मैचों में आमतौर पर दोनों टीमों के कप्तान सद्भाव के तौर पर एक-दूसरे से जर्सी बदलते हैं, इस पर भी रोक लगा दी गई है।
ऐसी समस्याएं अनेक खेलों में आएंगी। खिलाड़ियों द्वारा मिलकर घेरा बनाना बंद हो जाएगा। टेनिस में तो अपनी गेंदें और तौलिया लाने की शुरुआत की जा रही है। सवाल यह है कि इतना सब होने के बाद भी क्या खेलों में पहले जैसा लुत्फ बना रहेगा? पिछले दिनों शुरू हुई जर्मन फुटबॉल लीग के मैच बिना दर्शक खेले जा रहे हैं। इसी तरह इंग्लिश प्रीमियर लीग की भी शुरुआत होने जा रही है। जुलाई में इंग्लैंड और वेस्ट इंडीज के बीच क्रिकेट सीरीज भी बिना दर्शक खेली जानी है। इन हालात में दर्शकों का खेलों के प्रति कितना लगाव बना रहता है, यह भी शायद कोरोना से ही तय होगा।
(ये लेखक के अपने विचार हैं) मनोज चतुर्वेदी, वरिष्ठ खेल पत्रकार

 

 

सम्पादकीय लेख / शौर्यपथ / केरल में एक हथिनी की जिस तरह दर्दनाक मौत हुई है, उससे न केवल कानून-व्यवस्था, बल्कि मानवीयता पर भी सवाल खडे़ हो गए हैं। अब जब भारी विरोध और आलोचना के बाद इस मौत या हत्या के दोषियों की गिरफ्तारी शुरू हो गई है, तब हमें पशु क्रूरता निवारण की दिशा में हर पहल का स्वागत करना चाहिए। गांधीजी ने स्पष्ट इशारा किया था कि आपकी सभ्यता की परख इस बात से होगी कि आप अपने पशुओं के साथ कैसा व्यवहार करते हैं। लेकिन पता यह लगा है कि फल में छिपाकर पशुओं को बारूद या पटाखे खिला देना नई बात नहीं है। चुपचाप न जाने कितने पशु मार दिए गए होंगे। वह गर्भवती हथिनी भी बारूद वाला अनानास खाकर वहीं मारी जाती, तो यह खबर देश-दुनिया में सुर्खियां नहीं बनती, शायद अब तक ऐसा ही होता आया होगा। पर वर्षों से चल रहे इस अत्याचार का घड़ा शायद भर गया था। निर्दोष बेजुबानों की पीड़ा तब दूर तलक गई, जब उस बुरी तरह घायल हथिनी ने तीन दिन पानी में खड़े होकर लगभग सत्याग्रह या विलाप किया। हथिनी अकेली नहीं थी, उसके पेट में शिशु था। यह एक ऐसा घटनाक्रम है, जो दशकों तक याद रखा जाएगा और संवेदनशील लोगों को रुलाता रहेगा। आम तौर पर घायल होने के बाद जानवर आक्रामक हो जाते हैं, लेकिन वह हथिनी आक्रामक नहीं हुई, असह्य वेदना से बचने के लिए और शायद अपने गर्भ की चिंता में वह पानी की गोद में जा खड़ी हुई। काश! उसे तुरंत पानी से बाहर निकाल लिया जाता और उसका हरसंभव इलाज हो पाता, तो मानवता यूं शर्मसार नहीं हो रही होती।
दोषियों को कतई माफ न किया जाए, साथ ही, अपनी फसलों को बचाने के इस बारूदी तरीके पर भी पूरी कड़ाई से रोक लगनी चाहिए। अभी पशुओं के साथ होने वाली क्रूरता को रोकने के लिए जो कानून हैं, वे शायद अपर्याप्त हैं और उन्हें लागू करने में सरकारी एजेंसियों की कोई खास रुचि नहीं है। ऐसी घटनाओं से निपटने के लिए केरल सरकार को अपने स्तर पर पूरे इंतजाम करने होंगे। केरल की व्यापक छवि में हाथियों की अपनी गरिमामय उपस्थिति है। इसी प्रेम भाव के विकास के लिए पूरे राज्य में काम होने चाहिए। केरल या उसके किसी जिले या किसी समुदाय के खिलाफ नफरत की राजनीति समस्या का निदान नहीं है, लेकिन यह विवाद जिस तरह से बढ़ रहा है, उससे लगता है, यह सड़क, कोर्ट से विधानसभा तक गरमाएगा। अत: पशुओं के अधिकारों के लिए सक्रिय लोगों को पूरी सावधानी और संयम से स्थाई समाधान की ओर बढ़ना होगा, तभी वे लक्ष्य तक पहुंचेंगे।
वैसे हाथियों के प्रति क्रूरता केवल केरल की समस्या नहीं है। छत्तीसगढ़, कर्नाटक, महाराष्ट्र, झारखंड, ओडिशा, पूर्वोत्तर से भी शिकायतें आती रहती हैं। इन हाथियों को जंगल से बाहर न आना पडे़, इसके प्रबंध बार-बार चर्चा व सिफारिश के बावजूद नहीं हो रहे हैं। कई बार चर्चा हुई है कि हाथियों के लिए जंगलों में फलदार पेड़ों के गलियारे होने चाहिए, ताकि उनकी जरूरत वहीं पूरी हो जाए। अब समय आ गया है, जब हाथी ही नहीं, तमाम वन्य जीवों-पशुओं को तरह-तरह से मारने की प्रवृत्ति पर अंकुश लगना चाहिए। तभी अपार पीड़ा से लाचार उस हथिनी का जल-सत्याग्रह सफल होगा और हम अपने हृदय में मानव होने का तार्किक गर्व सहेज सकेंगे।

 

मेलबॉक्स / शौर्यपथ / धरती पर मानव ही ऐसा प्राणी है, जो अच्छे और बुरे का भेद कर सकता है। मगर केरल की घटना ने ईश्वर की सबसे सुंदर रचना पर शक की चादर चढ़ा दी है। वहां एक गर्भवती हथिनी के साथ किया गया व्यवहार दुखी करने वाला है। इस घटना से यह समझ नहीं आ रहा कि वास्तव में जानवर कौन है? वह हथिनी, जो पीड़ा में भी शांत होकर पानी में खड़ी रही या फिर वे इंसान, जिन्होंने इस बेजुबान को फल में बम खिला दिया। हथिनी के पेट में पल रहे बच्चे ने भी शायद यही सोचा होगा कि अगर मानव ऐसे होते हैं, तो ठीक है कि मैं धरती पर नहीं आया। लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि जब-जब मानव इंसानियत से दूर हुआ है, तब-तब उसे इसका भारी खामियाजा भुगतना पड़ा है।
ललित शंकर, मावना, मेरठ

सबकी है दुनिया
विश्व पर्यावरण दिवस पर प्रकाशित अनिल प्रकाश जोशी का लेख ‘यह दुनिया सिर्फ इंसानों की नहीं’ पढ़ा। वाकई, इस दुनिया पर जितना हमारा अधिकार है, उतना ही उन लाखों जीव-जंतुओं और पेड़-पौधों का भी है, जिनको प्रकृति ने हमारे साथ जीवन दिया है। चूंकि इंसान सबसे बुद्धिमान प्राणी है, इसलिए उसे पर्यावरण संरक्षण पर विशेष ध्यान देना चाहिए। लेकिन दुखद यह है कि हम पर्यावरण को बचाने के लिए समय-समय पर बातें तो खूब करते हैं, लेकिन जिस तरह से उन पर काम होना चाहिए, वह नहीं करते। हमें अपने आसपास की आबोहवा साफ रखनी ही होगी, अन्यथा मानव जीवन शायद ही बचा रह सकेगा।
विजय कुमार धनिया, नई दिल्ली

बढ़ता तनाव
केरल के एक गांव में नौवीं कक्षा की एक छात्रा ने जिस तरह से आत्महत्या की, उससे कई सवाल उठ खड़े होते हैं। कहा जा रहा है कि ऑनलाइन पढ़ाई न कर पाने की वजह से वह दबाव में थी। यह बेहद अफसोस की बात है कि एक बच्ची पढ़ना चाहती थी, पर संसाधन के अभाव में हताशा के गर्त में चली गई और अपनी जान दे बैठी। सचमुच, सरकारी विद्यालयों में पढ़ने वाले बच्चे इतने संपन्न नहीं होते कि उनके पास स्मार्टफोन, टीवी, केबल आदि हों। ऑनलाइन पढ़ाई के लिए स्मार्टफोन और इंटरनेट की जरूरत पड़ती है। उस बच्ची के पिता दिहाड़ी मजदूर हैं। संभवत: पिता की आर्थिक मजबूरी रही होगी कि वह अपनी बेटी की ऑनलाइन पढ़ाई के लिए जरूरी संसाधन नहीं जुटा पाया। दिक्कत यह है कि सरकार ने ऑनलाइन पढ़ाई शुरू तो कर दी, लेकिन इसके लिए अपनी तैयारी पूरी नहीं की। कुछ समय लगाकर पहले अभिभावकों को तैयार करना जरूरी था। यह घटना सबक दे रही है कि हमें अपने आसपास ऐसे परिवारों की खोज-खबर जरूर लेनी चाहिए, जिनके मुखिया की आजीविका इस लॉकडाउन में चली गई हो और बुनियादी जरूरतें भी वह पूरी नहीं कर पा रहा हो।
विनय मोहन, सेक्टर 18, जगाधरी

अमानवीय कृत्य
केरल में गर्भवती हथिनी के साथ हुई बर्बरता हृदय-विदारक है। हमारे संविधान में सभी जीवों के प्रति दया की भावना रखने की बात मौलिक कर्तव्यों में कही गई है। हमारी संस्कृति में भी कई जीवों को पूजनीय माना जाता है और अहिंसा को महत्व दिया जाता है। ऐसे में, देश के सबसे शिक्षित राज्य में ऐसी अमानवीय घटना हमें चिंतित करती है। शत-प्रतिशत साक्षरता का भला क्या उद्देश्य होना चाहिए? क्या शिक्षा-व्यवस्था में सुधार की जरूरत है? जानवरों के अधिकारों को लेकर हमें ज्यादा गंभीर होना चाहिए। यह सही है कि देश में हर व्यक्ति को उनके अधिकार नहीं मिल पाते हैं, लेकिन मानवाधिकार और अन्य जीवों के अधिकार की बात एक साथ होनी चाहिए। ऐसा क्रूरतापूर्ण काम करने वालों से भला मानवता की क्या उम्मीद की जाए!
प्रीतीश पाठक
बलवाहाट, सहरसा

 

ओपिनियन / शौर्यपथ / प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री स्कॉट मॉरिसन के बीच हुई शिखर-वार्ता समोसा और गुजराती खिचड़ी की चर्चा के साथ खत्म हुई; इस वादे के साथ कि समोसे और खिचड़ी साझा किए जाएंगे। लेकिन फिलहाल यह मुमकिन नहीं था, क्योंकि वार्ता वर्चुअल (आभासी) थी, एक डिजिटल माध्यम के जरिए दोनों देशों के नेता एक-दूसरे से रूबरू हो रहे थे।
भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच यह शिखर-वार्ता द्विपक्षीय संबंधों के लिहाज से बहुत महत्वपूर्ण थी। दोनों देशों के बीच कई समझौते हुए, दोनों ने एक-दूसरे के मिलिट्री बेस के इस्तेमाल का बेहद महत्वपूर्ण समझौता भी किया। प्रधानमंत्री मोदी ने इसे व्यापार और साझेदारी का एक नया मॉडल बताते हुए शिखर-वार्ता के बाद ट्वीट भी किया। लेकिन यह सब बेहद सादगी से हुआ। इसमें पारंपरिक शिखर-वार्ता की रौनक गायब थी। न तो कोई भोज था, न फोटो-अप, न ही डिनर डिप्लोमेसी। एक स्क्रीन थी, और इस डिजिटल दीवार के आर-पार दोनों प्रधानमंत्री थे। उनमें बातचीत हुई और कई समझौते भी हुए। हालांकि, द्विपक्षीय रिश्तों की गरमी डिजिटल बंटवारे के आर-पार महसूस की गई।
कोरोना-काल के पूर्व की परंपरागत शिखर-वार्ताओं को याद कीजिए। पहले किसी शिखर-वार्ता का मतलब होता था- शासनाध्यक्ष के आने की तैयारियां, कई भोज, कई दौर की बातचीत, फिर कुछ समझौते, साझा बयान और फोटो-अप। ऐसे में, कहा जा सकता है कि असल की जगह अब वर्चुअल ले रहा है और इसकी अहमियत अब बढ़ती ही जाएगी। हां, इसमें आमने-सामने मिलने की गर्मजोशी और ‘पर्सनल टच’ की कमी जरूर महसूस होगी, लेकिन कोरोना-काल की यही असलियत है और इसमें भविष्य के संकेत भी हैं। वर्चुअल डिप्लोमेसी अब एक ऐसी सच्चाई है, जो आगे भी बनी रहेगी। ऑस्ट्रेलिया के हाई कमिश्नर बैरी ओ फैरेल ने इसी दौरान अपना कार्यभार संभाला और राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को डिजिटल माध्यम से ही अपना परिचय-पत्र पेश किया। इस मौके पर उन्होंने कहा भी कि कोरोना ने जीवन के हर क्षेत्र में बाधाएं खड़ी की हैं, कूटनीति इसका अपवाद नहीं।
दरअसल, कोरोना-काल की कूटनीति में द्विपक्षीय संवादों, शिखर-सम्मेलनों या किसी भी प्रकार के आदान-प्रदान के नियम बदल चुके हैं। असल की जगह वर्चुअल ने ले ली है। राजनयिकों ने एक-दूसरे के साथ संपर्क व सहयोग बनाए रखने का नया तरीका अपना लिया है, जिसमें शून्य शारीरिक नजदीकी अपनाई जा रही है। नाराजगी जाहिर करने का तरीका भी वर्चुअल हो गया है। अप्रैल महीने में भारत-पाक सीमा पर मारे गए नागरिकों को लेकर नई दिल्ली ने नाराजगी जताते हुए इस्लामाबाद को वर्चुअल आपत्ति-पत्र भेजा। फोन कॉल और फिर ई-मेल के जरिए आपत्ति दर्ज की गई।
वैश्विक कूटनीति इस दौरान कैसे डिजिटल माध्यम से काम कर रही है, इसकी एक दिलचस्प मिसाल है संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थाई प्रतिनिधि सैयद अकबरुद्दीन की सेवानिवृत्ति। वह रिटायर हुए और पद से उनकी विदाई एक आभासी नमस्ते के साथ हुई। इसी तरह, पिछले माह लगभग 20 सम्मेलन आभासी माध्यम से हुए। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की महासभा भी ऑनलाइन हुई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 4 मई को नाम शिखर-वार्ता में ऑनलाइन ही शिरकत की। कोरोना के शुरुआती दौर में ही प्रधानमंत्री ने सार्क देशों के नेताओं के साथ वीडियो कॉन्फ्रेंस के जरिए एक अहम बैठक की थी। यह सब सिर्फ भारत में नहीं हो रहा, सभी देश तकनीक के जरिए अब अपनी कूटनीति कर रहे हैं।
ऐसा नहीं है कि वर्चुअल माध्यम से कूटनीति पहले नहीं हुई। मोहित मुसद्दी और संजय पुलिपका ने देल्ही पॉलिसी ग्रुप के लिए लिखे अपने शोधपत्र में लिखा है कि कूटनीति के लिए वर्चुअल माध्यम अपनाना असामान्य नहीं है। जब से टेलीफोन ने कूटनीति में अपनी जगह बनाई है, वह वहां जम गया। उसकी भरपाई किसी अन्य चीज से नहीं की जा सकी। 1963 में शीत युद्ध के दौरान अमेरिका और सोवियत संघ के बीच हॉटलाइन की शुरुआत हुई थी, ताकि दोनों शीर्ष नेताओं के बीच सीधी बातचीत हो सके। देखते-देखते दूसरे देश भी कूटनीति के इस वैकल्पिक रास्ते का इस्तेमाल करने लगे। शीत युद्ध के बाद टेलीफोन द्वारा कूटनीति में गति आ गई। अब तो संयुक्त राष्ट्र भी वर्चुअल महासभा की संभावना पर गौर कर रहा है, जिसमें रिकॉर्ड किए गए भाषण चलाए जाएं।
डिजिटल माध्यम से कूटनीति के कई फायदे हैं। यह काफी किफायती है। शिखर सम्मलेन हो या फिर बहुपक्षीय बैठक, इनसे जुड़ी यात्राओं और आयोजनों का खर्च वर्चुअल माध्यम में काफी कम हो जाता है। यह पर्यावरण संरक्षण की नजर से भी बेहतर है, क्योंकि ऐसे में हवाई यात्राओं की संख्या में काफी कमी आएगी, जिसका सीधा असर ग्लोबल वार्मिंग पर पड़ता है। इन सभी फायदों को देखते हुए लगता है कि संबंधों के तार जोड़ने के लिए डिजिटल माध्यम ही भविष्य है।
लेकिन वर्चुअल डिप्लोमेसी पारंपरिक कूटनीति की जगह पूरी तरह से ले लेगी, यह मुश्किल है। भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच तो यह कामयाब हो सकती है, जहां दोनों पक्षों में कोई टकराव या मतभेद की स्थिति नहीं, लेकिन जहां मुश्किल परिस्थितियों से जूझना पड़ता है, वहां बंद दरवाजों के पीछे की कूटनीति और व्यक्तिगत संबंधों की अपनी अहमियत है। मिसाल के तौर पर, डोका ला टकराव के बाद भारत और चीन के रिश्तों में जमी बर्फ को पिघलाने में प्रधानमंत्री मोदी और शी जिनपिंग की वुहान में हुई पारंपरिक-वार्ता की अहम भूमिका थी। इसमें नदी किनारे की सैर, पारंपरिक भोज जैसी चीजों की अपनी जगह है, जो दोनों पक्षों के बीच एक आत्मीयता को जन्म देती है।
याद कीजिए, इंदिरा गांधी ने अपने दौर में अलफांसो आम की कूटनीति की थी, प्रधानमंत्री मोदी ने तत्कालीन पाकिस्तानी वजीर-ए-आजम नवाज शरीफ के साथ शॉल डिप्लोमेसी की थी। रूस तो वोदका डिप्लोमेसी के लिए दुनिया भर में जाना जाता है। प्रधानमंत्री मोदी और उनके ऑस्ट्रेलियाई समकक्ष के बीच भी समोसा और खिचड़ी की बात हुई, पर वह सिर्फ बात थी। जब उनकी आमने-सामने की मुलाकातें होंगी, तो बात आगे बढ़ेगी। संबंधों की जटिलताओं को सुलझाने के लिए या रिश्तों में जमी बर्फ को पिघलाने के लिए पुराने पारंपरिक तरीके जरूरी बने रहेंगे। हां, सामान्य बातचीत और कूटनीति के लिए वर्चुअल डिप्लोमेसी ही आगे का रास्ता है।
(ये लेखिका के अपने विचार हैं)नगमा सहर, टीवी पत्रकार व सीनियर फेलो, ओआरएफ

 

   दुर्ग / शौर्यपथ / आयुक्त बर्मन द्वारा सहायक राजस्व निरीक्षक को बाज़ार विभाग का प्रभार तो दे दिया गया किन्तु पहले दिन ही शहर के मुख्य बाज़ार इंदिरा मार्केट मुख्य मार्ग में अव्यवस्था का आलम दिखा और आम जनता परेशान होती रही किन्तु निगम के नवनियुक्त बाज़ार प्रभारी थान सिंह द्वारा किसी भी तरह की कोई कार्यवाही का ना करना समझ से परे है जबकि शाम के समय बाज़ार प्रभारी इंदिरा मार्केट प्रेस काम्प्लेक्स में ही अपनी टीम के साथ थे .
   बता दे कि इन दिनों शहर में अमृत मिशन योजना के तहत पाइप लाइन बिछाने का कार्य तीव्र गति से चल रहा है उसी कड़ी में आज पाइप लाइन का कार्य इंदिरा मार्किट मुख्य मार्ग होटल शीला के सामने पाइप लाइन बिछाने का कार्य प्रगति पर था जिसके कारण वन वे वाले मार्ग में एक तरफ ( शीला होटल के सामने ) के मार्ग को बंद कर दिया गया था जिसके कारण यातायात का दबाव दुसरे मार्ग पर जयादा बढ़ गया था . दुसरे मार्ग तरह निगम काम्प्लेक्स है जिसमे ऐसी कई दुकाने है जिनके सामान सड़क तक फैले रहते है . सामानों को इस तरह सड़क तक फैला कर व्यापार करने वालो के बारे में बाज़ार प्रभारी सहायक राजस्व निरीक्षक थान सिंह अच्छे से जानते है किन्तु वर्तमान में जब कार्य प्रगति पर था और एक ही तरफ से आने जाने वालो का रेला लगा हुआ था बावजूद इसके बाज़ार प्रभारी द्वारा मामले को किसी भी तरह संज्ञान नहीं लेना दुर्ग की आम जनता जो बाज़ार क्षेत्र में इस तरह के यातायात के दबाव से परेशांन थी निगम प्रशासन की कार्य शैली पर ऊँगली उठा रही थी किन्तु इतना सब होने के बाद भी बाज़ार विभाग द्वारा किसी भी तरह संज्ञान ना लेना सड़क तक सामान फैला कर व्यापार करने वाले व्यापारियों के हौसले ही बुलंद करता है . क्या नए बाज़ार प्रभारी इंदिरा मार्किट की दशा और दिशा सुधारेंगे या सिर्फ प्रभारी मुखिया बनकर मौन रहेंगे ?

दुर्ग / शौर्यपथ राजनीती लेख / राजेन्द्र साहू दुर्ग का जाना पहचाना नाम . कांग्रेस के बड़े नेताओ में राजेन्द्र साहू की गिनती होती है . प्रदेश कांग्रेस सरकार के मुखिया के करीबी माने जाने वाले राजेन्द्र साहू का दुर्ग के युवा वर्ग में खासी पकड है . राजेन्द्र साहू वर्षो से कांग्रेस के सक्रीय कार्यकर्ता और संगठन में कई पदों पर कार्य कर चुके है . मुख्यमंत्री के गृह क्षेत्र पतन का प्रभारी पद का बखूबी निर्वहन कर चुके राजेन्द्र साहू वर्तमान में प्रदेश कांग्रेस में महामंत्री के पद पर है . इन दिनों राजेन्द्र साहू केंद्र की नीतियों का विरोध करने में दुर्ग कांग्रेस के बड़े चेहरे बन गए है .
प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बने हुए ढेढ़ साल हो गया किन्तु राजेन्द्र साहू संगठन की राजनीती में ही समय देते रहे किन्तु पिछले कुछ दिनों से लगातार मिडिया के माध्यम से राजेन्द्र साहू लगातार केंद्र की मोदी सरकार की जनहित विरोधी नीतियों का लगातार विरोध कर रहे है और खबरों में छाए हुए है क्या सोशल मिडिया क्या प्रिंट मिडिया क्या इलेक्ट्रोनिक मिडिया हर क्षेत्र में लगातार कांग्रेस की तरफ से दुर्ग शहर में कांग्रेस की मुखर आवाज़ बन कर उभरे है .
          राजेन्द्र साहू के यु अचानक सक्रीय होने से दुर्ग कांग्रेसियों सहित भाजपा में भी चर्चा का विषय है . वैसे तो वर्तमान में भिलाई निगम , रिसाली निगम ,और जामुल निगम में ही चुनाव होने वाले है किन्तु देखा जाए तो इन तीनो निकाय के किसी पद की दौड़ में राजेन्द्र साहू कही नहीं नजर आते . वही चर्चा का विषय है कि क्या ये भविष्य की तैयारी तो नहीं .
      मुझे अच्छे से याद है कि २०१५ में जब हाल ही में छत्तीसगढ़ के विधान सभा चुनाव संपन्न हुए थे और प्रदेश में भाजपा की सरकार तीसरी बार बनी थी और मुख्यमंत्री बघेल तब नए प्रदेश अध्यक्ष का पद संभाले थे और राजनंदगांव के घुमका क्षेत्र में सभा ली थी उसी सभा में उनके द्वारा इस आक्रामक तरीके से कांग्रेसियों का उत्साह वर्धन किया था मानो चुनाव ४ साल बाद नहीं चार दिन बाद हो . पद सँभालते ही तात्कालिक प्रदेश अध्यक्ष भूपेश बघेल ने जिस तरह से पुरे छत्तीसगढ़ में सभाए लेनी शुरू कर दी थी और कार्यकर्ताओ को ऐसे तैयार कर रहे थे जैसे चुनाव अगले माह हो प्रदेश अध्यक्ष बनते ही तात्कालिक प्रदेश अध्यक्ष व वर्तमान मुख्यमंत्री बघेल ने आक्रामकता के साथ प्रदेश सरकार के खिलाफ राजनितिक जंग का बिगुल बजा दिया था और उसी का परिणाम २०१९ की विधान सभा में कांग्रेस की बम्फर जीत का तोहफा था .
     कुछ ऐसा ही नजारा आज उनके राजनैतिक शिष्य राजेन्द्र साहू में देखने को मिल रहा है . शहर में चर्चा का विषय है कि भविष्य में प्रदेश कांग्रेस द्वारा राजेन्द्र साहू को कोई बड़ी जिम्मेदारी दी जा सकती है . राजेन्द्र साहू वर्तमान में दुर्ग संसदीय क्षेत्र के एक ऐसे कांग्रेस नेता है जो आम जनता सहित संगठन की नजर में सौम्य , सहज , सरल और निर्विवाद नेता के तौर पर जाने जाते है .दुर्ग के और उनके जानने वाले कहते है कि राजेन्द्र साहू ने राजनितिक जीवन में अभी तक सिर्फ व्यक्ति ही कमाए है जो उनके समर्थक के रूप में जाने जाते है विरोधी भी उनके व्यवहार की तारीफ़ करते है . खैर राजनीती में एक पल में कौन कहा पहुँच जाए कुछ कहा नहीं जा सकते किन्तु वर्तमान में यही चर्चा है राजनितिक हलको में कि भविष्य में राजेन्द्र साहू को कोई महत्तवपूर्ण जिम्मेदारी मिल सकती है .

दुर्ग। शौर्यपथ । दुर्ग NSUI शहर अध्यक्ष हितेश सिन्हा के नेतृत्व में आज नगर पुलिस अधीक्षक श्री विवेक शुक्ला जी को दुर्ग शहर के साथ ही आस पास के ग्रामीण आंचलों में हर गाली मोहल्ले में चल रहे अवैध कारोबार सट्टा,जुआ के साथ ही प्रतिबंधित चीजे गांजा शराब बिक्री को तत्काल बंद करवाने के लिए ज्ञापन सौप करके पुलिस प्रशासन को जानकारी देकर चल रहे अवैध कारोबार जो भयंकर रूप से फलफूल रहा है जिसके को लेकर दुर्ग NSUI ने तत्काल बंद कराने एवं जो भी व्यक्ति इस कारोबार को बढ़ावा देने में लिप्त है ऐसे लोगो को चिंहित कर जल्द से जल्द कार्यवाही करने की मांग की किए एक सप्ताह के अंदर अवैध कारोबार पर अंकुश नही लगा तो प्रदेश के मुखिया श्री भूपेश बघेल जी,गृहमंत्री श्री ताम्रध्वज साहू से मिल करके इसकी शिकायत कर उचित कार्यवाही करने की मांग करेंगे.।।

*नीचले बस्तियों में जल भराव ना हो, निगम ने की है तैयारी...* *निगम, नाला और नालियों से कचरा निकालने का चला रहा है अभियान....* *आम जनता से अपील अपने घर के आस-पास नालियों में घर का कचरा ना डाले....निगम*

 

    दुर्ग /शौर्यपथ/ बारिश के समय शहर के निचली बस्तियों में बारिश के पानी से जलभराव की स्थिति निर्मित ना हो इसके लिए विशेष अभियान चलाकर नगर पालिक निगम दुर्ग द्वारा शहर के सभी बड़े नाला और वार्ड बस्तियों में स्थित छोटी बड़ी नालियों से कचरा मलमा निकालकर तल से सफाई की जा रही है । समस्त आम जनता से अपील है कि आपके द्वारा अपने घरों का कचरा घर के आस- पास के नालियों में डाल दिए जाने के कारण छोटी नाली से होकर बड़े नाला में कचरा आकर फंस जाता है । जिससे निचली बस्तियों में पानी भरने की समस्या होती है । नगर निगम द्वारा सभी नालियों से कचरा और मलबा निकालने का कार्य किया जा रहा है अत: अनुरोध है कि कोई भी व्यक्ति अपने घरों का कचरा अपने घर के आस-पास की नालियों में बिल्कुल ना डालें । उल्लेखनीय है कि भारत सरकार के स्वच्छ भारत अभियान के अंतर्गत स्वच्छता सर्वेक्षण के स्टार रेटिंग में केवल नालियों में कचरा मिलने के कारण ही दुर्ग निगम स्टार रेटिंग फेल हुआ है । पूरे शहर के छोटे बड़े नालियों से कचरा निकालने का अभियान निरंतर चलाया गया है । इसके साथ ही बड़े नाला से भी जेसीबी के माध्यम से मलमा और कचरा निकाला जा रहा है ताकि आने वाले समय में बारिश के दौरान किसी भी बस्ती व क्षेत्र में जलभराव की स्थिति ना हो और पानी सुगमता से निकास हो सके । इस कड़ी में नगर निगम दुर्ग द्वारा पोटिया कला वार्ड विवेकानंद नगर में स्थित बड़े नाला से कचरा मलमा निकाल कर जेसीबी से सफाई किया गया । इसी तरह से मग्गा होटल के पास से होकर मिलपारा की बड़ी नाली की सफाई की गई । इसी कड़ी में न्यू पुलिस लाइन वार्ड 48, गायत्री मंदिर वार्ड 25 गंजपारा वार्ड 36, नयापारा वार्ड 1, शंकर नगर वार्ड 10, --11, पोलसाय पारा वार्ड 27, संतरा बाड़ी वार्ड 26, आमदी मंदिर वार्ड 24, दीपक नगर वार्ड 23, शंकर नाल, गिरधारी नाला, पोटिया नाला, कसारीडीह नाला, केलाबाड़ी नाला, शक्ति नगर नाला, तकिया पारा, पोटियाकला वार्ड 54, आजाद वार्ड 37, आदि नालियों से कचरा निकाल कर सफाई की गयी । आयुक्त बर्मन ने बताया बारिश के दौरान किसी भी क्षेत्र में बारिश का पानी नालियों के कारण ना भरे इसके लिए अभियान चलाकर सभी नालियों से कचरा और मलमा निकाला जा रहा है । उन्होंने कहा शहर के बहुत से लोग अपने घरों का कचरा नालियों में डाल दे रहे हैं जिसके कारण कचरा छोटी नाली से होकर नाला में आकर फंसता है और इससे नाली में पानी निकासी रुक जाता है और संबंधित क्षेत्र में पानी भरने की समस्या होती है सभी लोगों से अपील है की वे नालियों में कचरा ना डालें शहर को साफ सुथरा रखने में नगर निगम को सहयोग प्रदान करे ।

शौर्यपथ लेख । फेसबुक वॉल में एक विचार दिखा जिसे एक महिला द्वारा पोस्ट किया गया था । पोस्ट में लिखी बाते सोंचने पर मजबूर कर देती है कहने को तो भारत मे अभिव्यक्ति की आजादी है महिलाओं का सम्मान भी है किंतु ऐसे कई क्षेत्र है जहां महिलाओं का सिर्फ उपयोग ही किया जाता है उन्ही क्षेत्री में एक क्षेत्र है विज्ञपन कि दुनिया का । विज्ञपन की दुनिया मे शायद ही कोई विज्ञपन का निर्माण हुआ हो जिसमें महिलाओं की भागीदारी ना हो किन्तु इसमे से कई विज्ञपन ऐसे है जो महिलाओं की उपयोग की वस्तु ना होने के बाद भी उनमें भागीदारी दिखती है । मेंस शेविंग क्रीम , मेंस वियर , मेंस ऑटो , मेंस ड्रिंक्स जैसे कई प्रोडूक्त है जिनका महिलाओं से कोई परोक्ष सम्बन्ध नही होता किन्तु बावजूद इसके ऐसे विज्ञापनों में इनकी भागीदारी एक विशेष ड्रेसिंग सेंस के साथ दिखाई जाती है ऐसे ही कुछ विज्ञापनों के बारे में एक महिला ने अपने विचार प्रकट किए है जो सोंचने पर मजबूर कर देते है कि क्या ये सही है ... पोस्ट के अंश आप सम्मानित पाठकों को समर्पित यह एक ऐड है जिसमें स्कूटर दिख रहा है.. स्कूटर बिक रहा हैसच कहूँ तो पहली नजर में स्कूटर दिखा ही नहीं..क्योंकि सबकी नजर स्कूटर पर गयी ही नही होगी ...? क्यों सच छिपाऊं,, मैं सोच रही हूँ ,, आखिर ये हो क्या रहा है..?? नारी क्यों देख औेर समझ नहीं पा रही कि बाजार ने उसे एक वस्तु बना दिया है,, वो क्यों विरोध नही करती..?? अगरबत्ती के ऐड में महिला,, शेविंग क्रीम के ऐड में महिला,, डिओ के ऐड में महिला की अमुक डिओ लगाओगे तो,, खिंची चली आंती है ,, पुरुषों के इनर वियर में महिला.. 18-20 साल के लड़के ओर लड़कियों पर इसका क्या असर हो रहा है? उसका समाज पर क्या असर होगा..?? एक परफ्यूम का विज्ञापन है जिसमें लड़की अपने पुरूष मित्र का परिचय माता पिता से कराती है। जब लड़का लड़की की माँ को आण्टी कहकर संबोधित करता है तो प्रौढ़ महिला उसे उसका नाम लेकर पुकारने को कहती है। उधर उसके पति के हाथ में पकड़े हुये पॉपकार्न के पैकेट भिंच जाते हैं, यह विज्ञापन क्या संदेश दे रहा है, समाज को..?? क्या परफ्यूम इतना प्रभाव कारी है कि एक अधेड़ महिला उससे प्रभावित होकर पति और बेटी के सामने इतनी निर्लज्ज हो जाती है..?? कुछ लड़कियां कहती है कि हम क्या पहनेंगे ये हम तय करेंगे, पुरुष नहीं..मैं आपकी बात से सहमत हो सकती हूँ लेकिन वुमन empowerment के नाम जो समाज के सामने जो अश्लीलता परोसी जा रही है उसके कारण देश के युवाओं और समाज पर जो इफेक्ट आ रहा है उसका जिम्मेदार कौन है..?? वह जो जिसे दिखाया जा रहा है या वह जो यह दिखा कर फायदा अपना फायदा उठा रहा। किसी भी प्रोडक्ट को बेचने के लिए किसी औरत या लड़की को अश्लील तरीके से दिखाना कहाँ तक वुमन इंपावरमेंट के अंदर आता है..?? समय बदल रहा है ...कहकर अंग प्रदर्शन करना कहा तक उचित है .. हा मानती हूँ समय अनुसार चलना चाहिए ..पर किस किताब मे लिखा है की ..अंग प्रदर्शन करो .. आज लड़के और लड़कियों मे कोई भेद नही बल्कि मे तो कहूँगी लड़कियां हर फिल्ड मे आगे है आज समाज मे .. आधुनिकता को इतना मत ओढ़ लो की अपनी सभ्यता ही भूल जाओ .. मे भी एक पढ़ी लिखी डॉक्टर हूँ .. पर पैसा कमाने के लिए देह प्रदर्शन का विरोध करती हूँ . सत्य ये है की अश्लीलता को किसी भी दृष्टिकोण से सही नहीं ठहराया जा सकता। ये कम उम्र के बच्चों को यौन अपराधों की तरफ ले जाने वाली एक नशे की दूकान है।ऊंचा उठने के लिए अंग प्रदर्शन नही ...बल्कि अपने अंग को ढककर ऊंचा बनकर दिखाओ आपकी पहचान आपके कम कपड़ों के फोटो से नही ..बल्कि नाम से होनी चाहिए .असल मे वहीं आपकी सच्ची सफलता है

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