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जीना इसी का नाम है / शौर्यपथ / अपनी जिंदगी से उन्हें कोई शिकायत नहीं थी। होती भी क्यों? एक कामयाब जीवन जीने के लिए जो कुछ चाहिए, वह सब कुछ तो उनके पास था। दांपत्य जीवन में भी किसी किस्म की कोई कमी न थी। पॉल बर्क बेहद चाहने वाले पति थे और वह तीन नन्हे बच्चों- होली, इसाक व जॉर्ज की मां थीं। बच्चों की किलकारियों से उनका घर खिलखिलाता रहता और थिया व पॉल उन पलों को जी भरकर जीते।
22 फरवरी, 2012 की बात है। हफ्ता भर पहले छोटे बेटे जॉर्ज की पहली सालगिरह मनाई थी। लेकिन 22 फरवरी को अपने खिलौनों के साथ खेलते-खेलते जॉर्ज अचानक गिर पड़ा और उसे मूच्र्छा के दौरे पड़ने लगे। इसके पहले वह कभी बीमार नहीं पड़ा था। पॉल और थिया बेटे को लेकर अस्पताल भागे, मगर चंद घंटों में ही सब कुछ खत्म हो गया था। डॉक्टर ने बर्क दंपति को जॉर्ज के पार्थिव शरीर के साथ कुछ पल बिताने की इजाजत तो दी, मगर उनके लिए वक्त जैसे वहीं खत्म हो गया था।
थिया और पॉल को जिंदगी यूं हैरान करेगी, यह तो कभी उनके गुमान में भी न आया होगा। बदहवासी के उन क्षणों में अपने जिगर के टुकडे़ को अलविदा कह वे जब घर लौटे, तो उसके बर्थडे के कार्ड वैसे ही सामने रखे हुए थे। वे समझ ही नहीं पा रहे थे, आखिर चंद घंटों में जॉर्ज उनसे इतना दूर कैसे चला गया? बाद में मिली पोस्टमार्टम रिपोर्ट से मालूम हुआ कि निमोनिया और टाइप-ए इन्फ्लूएंजा ने उनके प्यारे बेटे की जान ली थी।
जो घर बच्चों की किलकारियों और पॉल-थिया के कहकहों से गुलजार रहा करता, वहां मातम ने जैसे डेरा डाल दिया था। पति-पत्नी अपने भीतर ही यूं ढह चुके थे कि एक-दूसरे का संबल क्या बनते? उस समय उन्हें कुछ ऐसे कंधों की जरूरत थी, जिनसे टिककर वे अपने लिए कुछ ऊर्जा बटोर पाते। काश! कोई गले लगाकर उनसे कहता, आपकी कोई गलती नहीं है, आपने तो अपने तईं पूरी कोशिश की, लेकिन नियति को शायद यही मंजूर था। कोई बताता कि दोनों बच्चों को कैसे बताया जाए कि जॉर्ज के साथ क्या हुआ?
लेकिन कोई नहीं आया। किसी ने उनकी खबर नहीं ली। कई दिनों के बाद घर के दरवाजे पर पहली दस्तक पुलिस की हुई, जो उस हादसे की तफसील जानने आई थी। यह उसकी ड्यूटी का हिस्सा था, लेकिन उसके कुछ तकनीकी सवाल शायद एक पिता के भीतर यह अफसोस भी गढ़ गए कि जॉर्ज के यूं जाने के लिए कुछ हद तक वह भी जिम्मेदार हैं।
जब जॉर्ज को गए पांच दिन हो गए थे। परिवार को जिंदगी की तरफ लौटना था, दो नन्हे बच्चों को संभालना भी था, मगर बेटे के गम में डूबे पॉल बर्क ने कहीं गहरा सदमा दे दिया। वह घर से यह कहकर निकले थे कि थोड़ा टहलकर आ रहा हूं। मगर उनके बजाय कॉल बेल पुलिस ने बजाई थी। 33 साल के पॉल की मौत की सूचना थिया के लिए किसी सन्निपात से कम न थी। हालांकि, मृत्यु के कारणों की जांच करने वाले अधिकारी (कॉरोनर) ने बाद में बताया था कि पॉल ने खुदकुशी नहीं की, बल्कि बेटे की मौत के बाद वह तनाव से गुजर रहे थे और इसी वजह से हादसे के शिकार हो गए।
लेकिन पांच दिन के अंदर एक खुशहाल परिवार उजड़ गया। थिया तो सुन्न पड़ गई थीं। मगर पति और बेटे, दोनों की अंतिम विदाई की तैयारी करनी थी। दो जीवित मासूमों को संभालना था। रोने का वक्त ही कहां था उनके पास? वह महीनों तक नहीं रोईं। हताशा, घबराहट और तनाव की समस्या पर जीत पाने में उन्हें वर्षों लग गए, लेकिन पॉल के चले जाने के बाद थिया के माता-पिता और कुछ करीबी दोस्तों ने उनकी पूरी मदद की।
थिया को यह हमेशा महसूस होता रहा कि पीड़ा के उन पलों में अगर किसी ने आकर उनका गम बांटा होता, तो पॉल उनसे दूर न गए होते। यह बात उन्हें वर्षों तक कचोटती रही। अंतत: उन्होंने फिजिकल एजुकेशन टीचर की अपनी नौकरी छोड़ ‘टु विश अपॉन अ स्टार’ नाम से एक चैरिटी की शुरुआत की। इसका मकसद उन अभिभावकों की मदद करना है, जिनके 25 साल तक बच्चे की अचानक मौत हो जाती है। थिया की यह चैरिटी वेल्स पुलिस और मेडिकल बोर्डों के साथ मिलकर ऐसे बदकिस्मत माता-पिता की मदद करती है। अब तक 3,316 लोगों की यह संस्था मदद कर चुकी है।
थिया वेल्स के मिस्किन गांव में रहती हैं। साल 2018 में आईटी कॉन्ट्रेक्टर क्रेग मैनिंग्स से उन्होंने दूसरी शादी की है, जो उनकी चैरिटी से बतौर स्वयंसेवी जुडे़ रहे हैं। थिया की इस अनमोल मानवसेवा को देखते हुए कुछ ही महीने पहले उन्हें ‘प्राइड ऑफ ब्रिटेन’ सम्मान से नवाजा गया है। पुरस्कृत होने के बाद थिया के शब्द थे, ‘पॉल और जॉर्ज मुझे ऊपर से गर्व के साथ देख रहे होंगे। मैं कोशिश करूंगी कि वेल्स में ऐसा कोई मां-बाप, भाई-बहन हमारी मदद से वंचित न रहे।’ थिया ऐसे बच्चों के मासूम भाई-बहनों से कहती रहेंगी- जो गया है, उसको सितारों में देखना।
प्रस्तुति : चंद्रकांत सिंह
दुर्ग / शौर्यपथ / दाऊ श्री वासुदेव चंद्राकर कामधेनु विश्वविद्यालय, दुर्ग के अंतर्गत शैक्षणिक संस्थानों के विभिन्न पाठ्यक्रमों में सत्र 2021-22 में प्रवेश दिया जाना है। प्रदेश के एकमात्र वेटनरी कॉलेज अंजोरा, दुर्ग की 80 सीटों एवं मात्स्यिकी महाविद्यालय, कवर्धा की 100 सीटों में प्रवेश नीट (एनईईटी) 2021 की प्रावीण्यता सूची के आधार पर दिया जाएगा। प्रदेश में वेटनरी, फिशरीज एवं डेयरी टेक्नोलॉजी की मात्र एक-एक महाविद्यालय हैं। डेयरी टेक्नोलॉजी महाविद्यालय, रायपुर के स्नातक पाठ्यक्रम की 60 सीटें एवं बेमेतरा व तखतपुर के डेयरी पॉलीटेक्नीक महाविद्यालय की 60 सीटें है, जिसमें प्रवेश छत्तीसगढ़ व्यापम द्वारा आयोजित पी.ई.टी. द्वारा दिया जाएगा। विश्वविद्यालय के अधीनस्थ पॉलीटेक्निक कॉलेजो एनीमल हस्बेंड्री (360 सीटें) एवं फिशरीज साइंस (30 सीटें) में छत्तीसगढ़ व्यापम द्वारा आयोजित प्री-एग्रीकल्चर एवं प्री-वेटनरी टेस्ट द्वारा किया जाएगा। पशुचिकित्सा एवं पशुपालन महाविद्यालय, अंजोरा, डेयरी टेक्नोलॉजी महाविद्यालय, रायपुर एवं मात्स्यिकी महाविद्यालय, कवर्धा की स्नातकोत्तर (पी.जी. एवं पी.एच.डी.) में प्रवेश विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित कॉमन एंट्रेंस टेस्ट (सी.ई.टी.) 2021 द्वारा किया जाएगा। इन पाठ्यक्रमों में उपलब्ध सीटों की विषयवार एवं विस्तृत जानकारी विश्वविद्यालय की वेबसाइट ूूूण्बहाअण्ंबण्पद पर उपलब्ध होगी। विश्वविद्यालय के प्रभारी कुलपति, निदेशक शिक्षण एवं अधिष्ठाता वेटनरी कॉलेज बिलासपुर डॉ.एस.पी.इंगोले ने बताया कि छात्रों की जिज्ञासाओं एवं कठिनाईयों का समाधान ई-मेल एवं मोबाईल के माध्यम से विभागाध्यक्षों एवं अधिकारियों द्वारा प्राथमिकता से की जाएगी। पशुचिकित्सा एवं पशुपालन, मात्स्यिकी, डेयरी टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में स्वर्णिम भविष्य एवं चुनौतीपूर्ण कैरियर के लिए छत्तीसगढ़ के शहरी क्षेत्रों सहित ग्रामीण अंचल के छात्र-छात्राओं में रूझान बढ़ा है। विश्वविद्यालय में छात्रों के लिए गुणवत्ता युक्त पाठ्यक्रम एवं शिक्षण तथा व्यावहारिक-प्रायोगिक प्रशिक्षण के लिए आदर्श शैक्षणिक वातावरण निर्माण करने पर जोर दिया जा रहा हैं। इस संदर्भ में छात्र-छात्राओं एवं पालकों विश्वविद्यालय की वेबसाइट में नियमित रूप से अवलोकन करते रहें।
भिलाई / शौर्यपथ / भिलाई इस्पात संयंत्र के वायर रॉड मिल ने शनिवार 07 अगस्त को एसएई-1008 के 2700 टन वायर रॉड कॉइल्स का नेपाल को निर्यात हेतु लोडिंग किया गया। इस वित्तीय वर्ष में अब तक सेल-बीएसपी ने 3 बार में कुल 8100 टन वायर रॉड का निर्यात नेपाल को कर चुका है।
विदित हो कि भिलाई इस्पात संयंत्र के वायर रॉड मिल में परंपरागत रूप से एसएमएस 1-बीबीएम रूट से प्लेन वायर रॉड और टीएमटी कॉइल की रोलिंग की जाती रही है। एसएमएस 1-बीबीएम रूट के बंद होने के बाद, वायर रॉड मिल ने एसएमएस-3 रूट से प्राप्त कास्ट बिलेट्स से गुणवत्ता वाले एसएई-1008 के प्लेन वायर रॉड्स की चौंथी बार सफलतापूर्वक रोलिंग एवं निर्यात की है।
भिलाई इस्पात संयंत्र के वायर रॉड मिल द्वारा एसएई-1008 के कुल 43 वैगनों की एक और रेक में इस ग्रेड के 2700 टन वायर रॉड को रोल करके नेपाल भेजा जा रहा है। कॉइल्स की एक और अनूठी विशेषता यह है कि प्रत्येक कॉइल को क्यूआर कोड के साथ लेबल किया गया है जिसमें विभिन्न प्रकार की जानकारी होती है जैसे - हीट नंबर, क्वाइल संख्या, रोलिंग की गुणवत्ता, अनुभाग, तिथि और शिफ्ट। ये सभी जानकारी प्रत्येक कॉइल के लिए अलग-अलग होती हैं। इस लेबलिंग के साथ कॉइल के उचित लेबलिंग और मार्किंग की गयी है। ऐसा करते हुए सेल के मार्केटिंग विभाग सीएमओ की आवश्यकताओं को पूरा किया गया। एसएई-1008 वायर रॉड्स का उपयोग वायर ड्रॉइंग यूनिट्स द्वारा जीआई वायर बनाने के लिए किया जाएगा जिसके माध्यम से पहाड़ो पर होने वाले भू-स्खलन को रोकने हेतु गेबीयन बॉक्स का निर्माण किया जाएगा। आधी सामग्री को आगे के उपयोग के लिए गैल्वेनाइज्ड किया जाएगा।
इससे पूर्व 9 जून, 2021 को पहली बार 2700 टन और 30 जून, 2021 को दूसरी बार 2700 टन वायर रॉड 10 जुलाई, 2021 को तीसरी बार के 2700 टन वायर रॉड कॉइल्स का नेपाल निर्यात किया गया था।
ब्यूटी टिप्स / शौर्यपथ / खूबसूरती के मामले में गुलाब जल का इस्तेमाल कई महिलाएं करती है। इसका इस्तेमाल करें भी क्यों न, एक तो ये बाजार में आसानी से मिल जाता है और दूसरा त्वचा और बालों पर इसके ढेरों फायदे हैं। राजाना के स्किन केयर में इसे शामिल करने से कई समस्याों से बचा जा सकता है। जानते हैं इसे कैसे करें इस्तेमाल और इसके इस्तेमाल से कैसे मिलता है स्किन और बालों की समस्याओं से छुटकारा।
1) अगर आपके बाल काफी ज्यादा रफ हैं तो आप शैम्पू में गुलाब जल मिलाकर इस्तेमाल कर सकते हैं। इसके इस्तेमाल से आपके बाल काफी सॉफ्ट और हाइड्रेटेड हो जाएंगे।
2) स्किन को हाइड्रेट रखने के लिए भी आप इसका इस्तेमाल कर सकती हैं। अपने चेहरे पर क्रीम लगाने से पहले आप गुलाब जल का इस्तेमाल करें। इससे आपकी क्रीम ज्यादा देर तक स्किन पर टिकी रहेगी। गर्मियों के मौसम में इसके इस्तेमाल से स्किन को ठंडक मिलती है।
3)अगर आप मेकअप की शौकीन है, तो ध्यान दें। मेकअप करने से पहले गुलाब जल का इस्तेमाल करें। इससे मेकअप सेट रहेगा। आप चाहें तो पूरा मेकअप करने के बाद गुलाब जल के स्प्रे कर सकती हैं और मेकअप को सेट कर सकती हैं। ऐसे में आपको किसी और मेकअप स्प्रे की जरूरत भी नहीं पड़ेगी और मेकअप लंबे समय तक टिका रहेगा।
4) आप नहाने के पानी में भी इसको मिसला सकती हैं। इसकी खूशबू आपको अच्छी लगेगी। एसेंशिय ऑयल और गुलाबजल के साथ नहाने में आपको ताजगी का एहसास होगा और आप काफी अच्छा फील करेंगी।
5) अगर वैक्सिंग के बाग आपको दाने आ जाते हैं, तो आप गुलाब जल को आफ्टर वैक्सिंग जेल के तौर पर भी इस्तेमाल कर सकती हो। आप घर में भी गुलाब जल बना सकती हैं।
6) अगर आपको सनबर्न हुआ है, तो बर्न हुई जगह पर रुई की मदद से गुलाब जल को लगाएं। इसे उस जगह पर लगाएं जहां आपको जलन हो रही है। इसके इस्तेमाल से आपको बहुत आराम मिलेगा।
7) चेहरा ड्राई होने पर भी आप गुलाब जल का इस्तेमाल कर सकती हैं। इसके लिए अपनी फेस क्रीम में आप गुलाब जल को मिलाएं और चेहरे पर हल्के हाथ से लगाएं। आप इसका इस्तेमाल बॉडी वॉश में डाल कर भी कर सकती हैं।
सेहत / शौर्यपथ /आपने कई लोगों को देखा होगा कि वे इलायची चबाते रहते हैं, असल में इलायची एक बेहतरीन नेचुरल माउथ फ्रेशनर ही नहीं बल्कि वेट लॉस में भी काफी कारगर है। आप चाहें, तो इलायची चबाने के अलावा इलायची वाली चाय पीकर भी वेट लॉस कर सकते हैं लेकिन आपको ध्यान रखना है कि वेट लॉस के लिए बनाई हुई स्पेशल चाय में चीनी की जगह गुड़ का इस्तेमाल करना है। आइए जानते हैं, इलायची के फायदे-
वेट एंड फैट लॉस
पेट के आसपास जमा वसा सबसे जिद्दी होती है और यह किसी के भी व्यक्तित्व को भी खराब कर देती है। हरी इलायची इस जिद्दी फैट को जमा नहीं होने देती है। यह वसा कई हृदय संबंधी बीमारियों की जड़ भी होती है।
शरीर से विषैले तत्व बाहर निकालती है
आयुर्वेद की मानें तो हरी इलायची शरीर में मौजूद विषैले तत्वों को बाहर निकालने में भी मदद करती है। यह तत्व शरीर के रक्त प्रवाह में व्यवधान पैदा कर सकते हैं और हमारी ऊर्जा का स्तर भी घटाते हैं। इलायची की चाय इसके लिए सबसे अच्छा विकल्प हो सकती है।
पेट फूलने से बचाती है
हरी इलायची अपच की समस्या से बचाती है, जिससे कभी-कभी पेट फूलने की समस्या भी हो सकती है। यही वजह है कि हरी इलायची को गैस्ट्रोइन्टेस्टाइनल विकारों की प्रचलित दवा कहा जाता है। अच्छा पाचन तंत्र वजन घटाने के लिए अहम है।
शरीर में पानी जमा नहीं होने देती
शरीर में मूत्र के रूप में पानी को जमा होने से रोकती है। हरी इलायची के आयुर्वेदिक गुणों की बात करें, तो यह गुर्दों के सुचारु कार्य को प्रोत्साहित करती है।
खराब कोलेस्ट्रॉल को घटाए
वसा घटाने के गुणों के कारण इलायची शरीर में खराब कोलेस्ट्रॉल को घटाने का काम करती है। यह एलडीएल कोलेस्ट्रॉल और ट्राइग्लिसराइड्स को भी घटाने में मदद करती है।
खाना खजाना / शौर्यपथ /भारत का लोकप्रिय पकवान 'मालपुआ' एक पारंपरिक भारतीय मिठाई है। भगवान भोलेनाथ को इसका भोग लगाने से वे अतिप्रसन्न होते हैं। अमावस्या पर भोलेनाथ को लगाएं मालपूए का भोग...
सामग्री :
1 कप मैदा छना हुआ, 1 कप दूध, 1 चम्मच सौंफ, डेढ़ कप शक्कर, 1 चम्मच नीबू रस, घी (तलने और मोयन के लिए), डेकोरेशन के लिए मेवे की कतरन, 1 चम्मच इलायची पावडर।
विधि :
पहले मैदे में दो बड़े चम्मच घी का मोयन डालें, तत्पश्चात दूध और सौंफ मिलाएं और घोल तैयार कर लें। एक मोटे पेंदे के अलग बर्तन में शक्कर, नीबू रस और तीन-चौथाई कप पानी डालकर चाशनी तैयार कर लें।
एक कड़ाही में घी गर्म करके एक बड़े चम्मच से घोल डालते जाएं और करारा फ्राय होने तक तल लें। फिर चाशनी में डुबोएं और एक अलग बर्तन में रखते जाएं।
इस तरह सभी मालपुए तैयार कर लें और ऊपर से मेवे की कतरन और इलायची बुरका कर अमावस्या पर शंकरजी को मालपूए का भोग लगाएं।
ब्यूटी टिप्स / शौर्यपथ / खूबसूरत दिखने के लिए चेहरे पर अलग तरह के प्रोडक्ट लगाते हैं। कभी ब्रांडेड कंपनी का फाउंडेशन भी लगाया जाता है। लेकिन वह लंबे वक्त तक टिकता नहीं है, तो चेहरा भी काला पड़ने लग जाता है। कई बार क्या गलती होती है समझ नहीं पाते हैं। ऐसा भी हो सकता है कि फाउंडेशन में ऑयल होने की वजह से भी चेहरा काला पड़ने लगता है। तो आइए जानते हैं कैसे चेहरे पर लंबे वक्त तक फाउंडेशन लगाने के बाद चमकता रहे।
- फाउंडेशन के ऑयल को कम करें - जी हां,फाउंडेशन में ऑयल मौजूद होने पर स्किन काली पड़ने लगती है। हालांकि ड्राई स्किन के लिए यह अच्छा होता है। वहीं फाउंडेशन के ऑयल को कम करने के लिए स्टील की प्लेट में निकालें और हल्के हाथ मैश करें। इसके बाद लगाएं। ताकि फाउंडेशन लंबे वक्त तक टिका रहेगा।
-त्वचा के ऑयल को कम करें - अगर आपके चेहरे पर बहुत अधिक तेल आता है तो उसे अच्छे से साफ करें। इसके बाद फाउंडेशन लगाएं ताकि चेहरा काला नहीं पड़ेगा।
- प्राइमर लगाएं - कई बार क्रीम या प्राइमर लगाएं बिना ही फाउंडेशन लगा लेते हैं। लेकिन ऐसे में फाउंडेशन टिकता नहीं है। अगर आपके पास प्राइमर नहीं है तो आप एलोवेरा जेल भी लगा सकते हैं। 5 मिनट उसे सुखने दें। इसके बाद फाउंडेशन लगाएं।
-पाउडर लगाएं - फाउंडेशन लगाने के बाद पाउडर की जरूरत नहीं पड़ती है। लेकिन ऐसी गलती नहीं करें। फाउंडेशन लगाने के बाद पाउडर जरूर लगाएं। वह आपके चेहरे से हल्के रंग का होना चाहिए। पाउडर लगाने से फाउंडेशन लंबे वक्त तक टिका रहता है।
ब्यूटी टिप्स /शौर्यपथ / सुंदर दिखने के लिए त्वचा की नियमित देखभाल करना बहुत जरूरी है। कभी - कभी एक्स्ट्रा केयर करना भी जरूरी होता है। ताकि चेहरे की चमक बरकरार रहे। यह तय होता है कि महीने में एक बार पार्लर जरूर जाते हैं। लेकिन आपने कभी घर पर फेशियल किया है, वो भी वाइन फेशियल अगर नहीं तो आज कोशिश कीजिए। वाइन सेहत के लिए बहुत अच्छी नहीं होती है लेकिन सौंदर्य के लिए जरूर अच्छी होती है। वहीं बालों की समस्या से परेशान है तो बीयर से हेयर वॉश करने पर आराम मिलता है। वाइन का इस्तेमाल फेशियल के लिए किया जाता है। तो आइए जानते हैं वाइन से कैसे फेशियल करें।
स्टेप -1 सबसे पहले अपने चेहरे को साफ कर लें। इसके लिए आप वाइन का ही क्लींजिंग भी बना सकते हैं। एक कटोरी में वाइन लें, इसके बाद उसमें दो बुंद नींबू की मिलाएं। कॉटन की मदद से साफ कर लें।
स्टेप- 2 चेहरे को अच्छे से साफ करने के बाद स्क्रबिंग करें। इसके लिए एक बाउल में वाइन लें और उसमें चावल का पाउडर मिक्स करें। दोनों को मिक्स कर एक गाढ़ा पेस्ट तैयार कर लें। हल्के -हल्के हाथों से चेहरे पर लगाकर सर्कुलर मोशन में घुमाते रहें। इसके बाद 5 मिनट के लिए स्किन पर लगा रहने दें। फिर गीले टॉवेल से चहरे को साफ कर लें।
स्टेप 3 स्क्रबिंग के बाद भाप लेना नहीं भूलें। ताकि चेहरे पर मौजूद ब्लैक और व्हाइट हेड्स आसानी से निकल जाएं। और चेहरा एकदम साफ हो जाएगा। जी हां, चेहरे पर करीब 3
मिनट के लिए भाप जरूर लें। इससे नाक के आसपास और फोरहेड पर जमा डेड स्किन निकल जाएगी।
स्टेप 4 अब आपको लगाना है फेस पैक। जी हां, सबसे पहले एक बाउल में वाइन लें उसमें में 1 चम्मच शहद, दो चम्मच दही मिक्स कर लें। सभी को अच्छे से मिक्स कर लें। और फिर ब्रश की सहायता से लगा लें। 25 मिनट तक के लिए फेस पैक लगा रहने दें। इसके बाद गीले तौलिये से हल्के हाथों से पोंछ लें। इससे आपकी त्वचा एकदम खिल जाएगी।
स्टेप 5 - टोनिंग लगाना नहीं भूलें। जो सबसे जरूरी होता है। फेशियल के बाद कॉटन में गुलाबजल लें और चेहरे पर लगा लें। धीरे - धीरे आपके चेहरे पर निखार आ जाएगा। साथ अलग से ऑयल भी नजर नहीं आएगा।
आस्था / शौर्यपथ / दक्षिण भारत में ओणम का प्रसिद्ध त्योहार हिन्दू कैलेंडर के अनुसार भाद्र माह की शुक्ल त्रयोदशी को मनाया जाता है। जबकि मलयालम कैलेंडर के अनुसार चिंगम माह में यह त्योहार मनाया जाता है जो कि प्रथम माह है। खासकर यह त्योहार हस्त नक्षत्र से शुरू होकर श्रवण नक्षत्र तक चलता है। इस बार यह पर्व 12 अगस्त 2021 से प्रारंभ होकर 23 अगस्त तक लेगा। 21 अगस्त को ओणम का मुख्य पर्व रहेगा। आओ जानते हैं ओणम के बारे में 10 रोचक बातें
1. इस दिन राजा बलि देखने आते हैं अपनी प्रजा को : यह त्योहार किसी देवी-देवता के सम्मान में नहीं बल्की एक दानवीर असुर राजा बलि के सम्मान में मनाया जाता है जिसने विष्णु के अवतार भगवान वामन को 3 पग भूमि दान में दे दी थी और फिर श्री वामन ने उन्हें अमरता का वरदान देकर पाताल लोक का राजा बना दिया था। ऐसी मान्यता है कि अजर-अमर राजा बलि ओणम के दिन अपनी प्रजा को देखने आते हैं। राजा बलि की राजधानी महाबलीपुरम थी।
2. घरों की होती है साफ सफाई : जिस तरह दशहरे में दस दिन पहले रामलीलाओं का आयोजन होता है या दीपावली के पहले घर की रंगाई-पुताई के साथ फूलों से सजावट होती रही है।
3. बनता है फूलों का घर : उसी तरह ओणम से दस दिन पहले घरों को फूलों से सजाने का कार्य चलता रहता है। घर को अच्छे से सजाकर बाहर रंगोली बनाते हैं। खासकर घर में कमरे को साफ करके एक फूल-गृह बनाया जाता है जिसमें गोलाकार रुप में फूल सजाए जाते हैं। प्रतिदिन आठ दिन तक सजावट का यह कार्यक्रम चलता है।
4. राजा बालि की मूर्ति को सजाते हैं : इस दौरान राजा बलि की मिट्टी की बनी त्रिकोणात्मक मूर्ति पर अलग-अलग फूलों से चित्र बनाते हैं। प्रथम दिन फूलों से जितने गोलाकार वृत बनाई जाती हैं दसवें दिन तक उसके दसवें गुने तक गोलाकार में फूलों के वृत रचे जाते हैं।
5. फूलों की सजावट के आसपास उत्सव मनाती हैं महिलाएं : नौवें दिन हर घर में भगवान विष्णु की मूर्ति की पूजा होती है तथा परिवार की महिलाएं इसके इर्द-गिर्द नाचती हुई तालियां बजाती हैं। वामन अवतार के गीत गाते हैं।
6. नौका दौड़, नृत्य और गान : इस दौरान सर्प नौका दौड़ के साथ कथकली नृत्य और गाना भी होता है।
7. रात्रि में गणेश पूजा : रात को गणेशजी और श्रावण देवता की मूर्ति की पूजा होती है। मूर्तियों के सामने मंगलदीप जलाए जाते हैं। पूजा-अर्चना के बाद मूर्ति विसर्जन किया जाता है।
8 बनते हैं कौन से पकवान : इस दौरान पापड़ और केले के चिप्स बनाए जाते हैं। इसके अलावा 'पचड़ी–पचड़ी काल्लम, ओल्लम, दाव, घी, सांभर' भी बनाया जाता है। दूध, नारियल मिलाकर खास तरह की खीर बनाते हैं।
9. अठारह प्रकार के दुग्ध पकवान : कहते हैं कि केरल में अठारह प्रकार के दुग्ध पकवान बनते हैं। इनमें कई प्रकार की दालें जैसे मूंग व चना के आटे का प्रयोग भी विभिन्न व्यंजनों में किया जाता है। भोजन को कदली के पत्तों में परोसा जाता है।
10. थिरुवोनम : ओणम के अंतिम दिन थिरुवोनम होता है। यह मुख्य त्योहार है। इस दिन उत्सव का माहौल होता है।
आस्था /शौर्यपथ / हिंदू पंचांग के अनुसार श्रावण मास का तीसरा सोमवार 09 अगस्त 2021 को है। इसी दिन श्रावण मास की शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि भी है। ज्ञात हो कि श्रावण मास में सोमवार का विशेष महत्व माना गया है और अब तक दो सोमवार बीत चुके हैं। 9 अगस्त को श्रावण न तीसरा सोमवार मनाया जाएगा। इस दिन कर्क राशि में चंद्रमा और सूर्य की युति बनेगी, वहीं सिंह राशि में तीन ग्रहों की युति बन रही है। श्रावण सोमवार को सिंह राशि में शुक्र, मंगल और बुध ग्रह एक साथ विराजमान रहेंगे। इस दिन आश्लेषा नक्षत्र और चंद्रमा का गोचर कर्क राशि में होगा।
श्रावण मास में सोमवार के दिन पूजन के समय राहु काल का विशेष ध्यान रखना चाहिए, क्योंकि ज्योतिष शास्त्र में राहु काल को अशुभ योग माना गया है और अशुभ योग में पूजन और शुभ कार्य नहीं किए जाते हैं।
पंचांग के अनुसार श्रावण के तीसरे सोमवार, यानी 09 अगस्त 2021 को राहु काल का समय- प्रात: 07.26 मिनट से प्रात: 09.53 मिनट तक रहेगा। सोमवार के दिन अभिजीत मुहूर्त- प्रात: 11.59 मिनट से दोपहर 12.53 मिनट तक है।
इन दिनों चातुर्मास चल रहा है और श्रावण चातुर्मास का पहला मास है। इस संबंध में मान्यता है कि जब भगवान विष्णु का शयन काल के लिए पाताल प्रस्थान करते हैं तो पृथ्वी की बागड़ोर भगवान शिव को सौंप देते हैं। चातुर्मास का प्रथम महीना श्रावण में भगवान शिव, माता पार्वती के साथ पृथ्वी लोक का भ्रमण करते हैं और शिव-पार्वती अपने भक्तों की पूजा-अर्चना से प्रसन्न होकर उन्हें आशीर्वाद प्रदान करते हैं।
श्रावण मास में सोमवार के दिन पूजन के समय राहु काल का विशेष ध्यान रखना चाहिए, क्योंकि ज्योतिष शास्त्र में राहु काल को अशुभ योग माना गया है और अशुभ योग में पूजन और शुभ कार्य नहीं किए जाते हैं।
पंचांग के अनुसार श्रावण के तीसरे सोमवार, यानी 09 अगस्त 2021 को राहु काल का समय- प्रात: 07.26 मिनट से प्रात: 09.53 मिनट तक रहेगा। सोमवार के दिन अभिजीत मुहूर्त- प्रात: 11.59 मिनट से दोपहर 12.53 मिनट तक है।
इन दिनों चातुर्मास चल रहा है और श्रावण चातुर्मास का पहला मास है। इस संबंध में मान्यता है कि जब भगवान विष्णु का शयन काल के लिए पाताल प्रस्थान करते हैं तो पृथ्वी की बागड़ोर भगवान शिव को सौंप देते हैं। चातुर्मास का प्रथम महीना श्रावण में भगवान शिव, माता पार्वती के साथ पृथ्वी लोक का भ्रमण करते हैं और शिव-पार्वती अपने भक्तों की पूजा-अर्चना से प्रसन्न होकर उन्हें आशीर्वाद प्रदान करते हैं।
श्रावण सोमवार की सरल पूजन विधि-
* श्रावण सोमवार को ब्रह्म मुहूर्त में सोकर उठें।
* पूरे घर की सफाई कर स्नानादि से निवृत्त हो जाएं।
* गंगा जल या पवित्र जल पूरे घर में छिड़कें।
* घर में ही किसी पवित्र स्थान पर भगवान शिव की मूर्ति या चित्र स्थापित करें।
* पूरी पूजन तैयारी के बाद निम्न मंत्र से संकल्प लें-
'मम क्षेमस्थैर्यविजयारोग्यैश्वर्याभिवृद्धयर्थं सोमव्रतं करिष्ये'
* इसके पश्चात निम्न मंत्र से ध्यान करें-
'ध्यायेन्नित्यंमहेशं रजतगिरिनिभं चारुचंद्रावतंसं रत्नाकल्पोज्ज्वलांग परशुमृगवराभीतिहस्तं प्रसन्नम्।
पद्मासीनं समंतात्स्तुतममरगणैर्व्याघ्रकृत्तिं वसानं विश्वाद्यं विश्ववंद्यं निखिलभयहरं पंचवक्त्रं त्रिनेत्रम्॥
* ध्यान के पश्चात 'ॐ नमः शिवाय' से शिवजी का तथा 'ॐ शिवायै' नमः' से पार्वतीजी का षोडशोपचार पूजन करें।
* पूजन के पश्चात व्रत कथा सुनें।
* तत्पश्चात आरती कर प्रसाद वितरण करें।
* इसके बाद भोजन या फलाहार ग्रहण करें।
इसके अलावा श्रावण मास में शिवालयों में शिवलिंग का रुद्राभिषेक किया जाता है। बहुत से लोग रुद्राभिषेक तो छोड़िए जलाभिषेक के समय भी नियमों का पालन नहीं करते हैं। विधिवत रूप से किए गए रुद्राभिषेक से ही भगवान शिव प्रसन्न होकर भक्तों को मनचाहा वरदान देते हैं।
मंत्र
- ॐ सौं सोमाय नम:
- ॐ नमः शिवाय
- ॐ नमो भगवते रुद्राय।
श्रावण सोमवार कथा-
श्रावण सोमवार की कथा के अनुसार अमरपुर नगर में एक धनी व्यापारी रहता था। दूर-दूर तक उसका व्यापार फैला हुआ था। नगर में उस व्यापारी का सभी लोग मान-सम्मान करते थे। इतना सबकुछ होने पर भी वह व्यापारी अंतरमन से बहुत दुखी था, क्योंकि उस व्यापारी का कोई पुत्र नहीं था। दिन-रात उसे एक ही चिंता सताती रहती थी। उसकी मृत्यु के बाद उसके इतने बड़े व्यापार और धन-संपत्ति को कौन संभालेगा।
पुत्र पाने की इच्छा से वह व्यापारी प्रति सोमवार भगवान शिव की व्रत-पूजा किया करता था। सायंकाल को व्यापारी शिव मंदिर में जाकर भगवान शिव के सामने घी का दीपक जलाया करता था। उस व्यापारी की भक्ति देखकर एक दिन पार्वतीजी ने भगवान शिव से कहा- 'हे प्राणनाथ, यह व्यापारी आपका सच्चा भक्त है। कितने दिनों से यह सोमवार का व्रत और पूजा नियमित कर रहा है। भगवान, आप इस व्यापारी की मनोकामना अवश्य पूर्ण करें।'
भगवान शिव ने मुस्कराते हुए कहा- 'हे पार्वती! इस संसार में सबको उसके कर्म के अनुसार फल की प्राप्ति होती है। प्राणी जैसा कर्म करते हैं, उन्हें वैसा ही फल प्राप्त होता है।' इसके बावजूद पार्वतीजी नहीं मानीं। उन्होंने आग्रह करते हुए कहा- 'नहीं प्राणनाथ! आपको इस व्यापारी की इच्छा पूरी करनी ही पड़ेगी। यह आपका अनन्य भक्त है। प्रति सोमवार आपका विधिवत व्रत रखता है और पूजा-अर्चना के बाद आपको भोग लगाकर एक समय भोजन ग्रहण करता है। आपको इसे पुत्र-प्राप्ति का वरदान देना ही होगा।'
पार्वतीजी का इतना आग्रह देखकर भगवान शिव ने कहा- 'तुम्हारे आग्रह पर मैं इस व्यापारी को पुत्र-प्राप्ति का वरदान देता हूं, लेकिन इसका पुत्र 16 वर्ष से अधिक जीवित नहीं रहेगा।' उसी रात भगवान शिव ने स्वप्न में उस व्यापारी को दर्शन देकर उसे पुत्र-प्राप्ति का वरदान दिया और उसके पुत्र के 16 वर्ष तक जीवित रहने की बात भी बताई। भगवान के वरदान से व्यापारी को खुशी तो हुई, लेकिन पुत्र की अल्पायु की चिंता ने उस खुशी को नष्ट कर दिया। व्यापारी पहले की तरह सोमवार का विधिवत व्रत करता रहा। कुछ महीने पश्चात उसके घर अति सुंदर पुत्र उत्पन्न हुआ। पुत्र जन्म से व्यापारी के घर में खुशियां भर गईं। बहुत धूमधाम से पुत्र-जन्म का समारोह मनाया गया।
व्यापारी को पुत्र-जन्म की अधिक खुशी नहीं हुई, क्योंकि उसे पुत्र की अल्प आयु के रहस्य का पता था। यह रहस्य घर में किसी को नहीं मालूम था। विद्वान ब्राह्मणों ने उस पुत्र का नाम 'अमर' रखा। जब अमर 12 वर्ष का हुआ तो शिक्षा के लिए उसे वाराणसी भेजने का निश्चय हुआ। व्यापारी ने अमर के मामा दीपचंद को बुलाया और कहा कि अमर को शिक्षा प्राप्त करने के लिए वाराणसी छोड़ आओ। अमर अपने मामा के साथ शिक्षा प्राप्त करने के लिए चल दिया। रास्ते में जहां भी अमर और दीपचंद रात्रि विश्राम के लिए ठहरते, वहीं यज्ञ करते और ब्राह्मणों को भोजन कराते थे।
लंबी यात्रा के बाद अमर और दीपचंद एक नगर में पहुंचे। उस नगर के राजा की कन्या के विवाह की खुशी में पूरे नगर को सजाया गया था। निश्चित समय पर बारात आ गई लेकिन वर का पिता अपने बेटे के एक आंख से काने होने के कारण बहुत चिंतित था। उसे इस बात का भय सता रहा था कि राजा को इस बात का पता चलने पर कहीं वह विवाह से इंकार न कर दें। इससे उसकी बदनामी होगी।
वर के पिता ने अमर को देखा तो उसके मस्तिष्क में एक विचार आया। उसने सोचा, क्यों न इस लड़के को दूल्हा बनाकर राजकुमारी से विवाह करा दूं? विवाह के बाद इसको धन देकर विदा कर दूंगा और राजकुमारी को अपने नगर में ले जाऊंगा। वर के पिता ने इसी संबंध में अमर और दीपचंद से बात की। दीपचंद ने धन मिलने के लालच में वर के पिता की बात स्वीकार कर ली।
अमर को दूल्हे के वस्त्र पहनाकर राजकुमारी चंद्रिका से विवाह करा दिया गया। राजा ने बहुत-सा धन देकर राजकुमारी को विदा किया। अमर जब लौट रहा था तो सच नहीं छिपा सका और उसने राजकुमारी की ओढ़नी पर लिख दिया- 'राजकुमारी चंद्रिका, तुम्हारा विवाह तो मेरे साथ हुआ था, मैं तो वाराणसी में शिक्षा प्राप्त करने जा रहा हूं। अब तुम्हें जिस नवयुवक की पत्नी बनना पड़ेगा, वह काना है।'
जब राजकुमारी ने अपनी ओढ़नी पर लिखा हुआ पढ़ा तो उसने काने लड़के के साथ जाने से इंकार कर दिया। राजा ने सब बातें जानकर राजकुमारी को महल में रख लिया। उधर अमर अपने मामा दीपचंद के साथ वाराणसी पहुंच गया। अमर ने गुरुकुल में पढ़ना शुरू कर दिया।
जब अमर की आयु 16 वर्ष पूरी हुई तो उसने एक यज्ञ किया। यज्ञ की समाप्ति पर ब्राह्मणों को भोजन कराया और खूब अन्न-वस्त्र दान किए। रात को अमर अपने शयनकक्ष में सो गया। शिव के वरदान के अनुसार शयनावस्था में ही अमर के प्राण-पखेरू उड़ गए। सूर्योदय पर मामा अमर को मृत देखकर रोने-पीटने लगा। आसपास के लोग भी एकत्र होकर दुःख प्रकट करने लगे।
मामा के रोने, विलाप करने के स्वर समीप से गुजरते हुए भगवान शिव और माता पार्वती ने भी सुने। पार्वतीजी ने भगवान से कहा- 'प्राणनाथ! मुझसे इसके रोने के स्वर सहन नहीं हो रहे। आप इस व्यक्ति के कष्ट अवश्य दूर करें।' भगवान शिव ने पार्वतीजी के साथ अदृश्य रूप में समीप जाकर अमर को देखा तो पार्वतीजी से बोले- 'पार्वती! यह तो उसी व्यापारी का पुत्र है। मैंने इसे 16 वर्ष की आयु का वरदान दिया था। इसकी आयु तो पूरी हो गई।'
पार्वतीजी ने फिर भगवान शिव से निवेदन किया- 'हे प्राणनाथ! आप इस लड़के को जीवित करें, नहीं तो इसके माता-पिता पुत्र की मृत्यु के कारण रो-रोकर अपने प्राणों का त्याग कर देंगे। इस लड़के का पिता तो आपका परम भक्त है। वर्षों से सोमवार का व्रत करते हुए आपको भोग लगा रहा है।'
पार्वतीजी के आग्रह करने पर भगवान शिव ने उस लड़के को जीवित होने का वरदान दिया और कुछ ही पल में वह जीवित होकर उठ बैठा। शिक्षा समाप्त करके अमर मामा के साथ अपने नगर की ओर चल दिया। दोनों चलते हुए उसी नगर में पहुंचे, जहां अमर का विवाह हुआ था। उस नगर में भी अमर ने यज्ञ का आयोजन किया। समीप से गुजरते हुए नगर के राजा ने यज्ञ का आयोजन देखा।
राजा ने अमर को तुरंत पहचान लिया। यज्ञ समाप्त होने पर राजा अमर और उसके मामा को महल में ले गया और कुछ दिन उन्हें महल में रखकर बहुत-सा धन-वस्त्र देकर राजकुमारी के साथ विदा किया। रास्ते में सुरक्षा के लिए राजा ने बहुत से सैनिकों को भी साथ भेजा। दीपचंद ने नगर में पहुंचते ही एक दूत को घर भेजकर अपने आगमन की सूचना भेजी। अपने बेटे अमर के जीवित वापस लौटने की सूचना से व्यापारी बहुत प्रसन्न हुआ।
व्यापारी ने अपनी पत्नी के साथ स्वयं को एक कमरे में बंद कर रखा था। भूखे-प्यासे रहकर व्यापारी और उसकी पत्नी बेटे की प्रतीक्षा कर रहे थे। उन्होंने प्रतिज्ञा कर रखी थी कि यदि उन्हें अपने बेटे की मृत्यु का समाचार मिला तो दोनों अपने प्राण त्याग देंगे। व्यापारी अपनी पत्नी और मित्रों के साथ नगर के द्वार पर पहुंचा।
अपने बेटे के विवाह का समाचार सुनकर, पुत्रवधू राजकुमारी चंद्रिका को देखकर उसकी खुशी का ठिकाना न रहा। उसी रात भगवान शिव ने व्यापारी के स्वप्न में आकर कहा- 'हे श्रेष्ठी! मैंने तेरे सोमवार के व्रत करने और व्रतकथा सुनने से प्रसन्न होकर तेरे पुत्र को लंबी आयु प्रदान की है।' व्यापारी बहुत प्रसन्न हुआ। सोमवार का व्रत करने से व्यापारी के घर में खुशियां लौट आईं। शास्त्रों में लिखा है कि जो स्त्री-पुरुष सोमवार का विधिवत व्रत करते और व्रत कथा सुनते हैं उनकी सभी इच्छाएं पूरी होती हैं।
धर्म / शौर्यपथ / सावन का महिना मनभावन होता है। पेड़ पौधे, जीव-जंतु सभी इस महिना में खुशी से झूमते-नाचते-गाते हैं। ऐसे मनभावन मास में अमावस के दिन छत्तीसगढ़ का महापर्व "हरेली "आता है। हरेली मनाते छत्तीसगढ़ के रहवासी अपने खेत-खार, गाय-बैल, घर-परिवार की सुख-समृद्धि हेतु मनौती मांगते हैं। इन अर्थों में हरेली लोकहितैषी त्योहार है। पुराने समय में इसे बड़े धूमधाम से मनाने का चलन था,पर बदलते वक्त और नये जमाने के रंग ने हरेली के रंग को बदरंग करना आंरभ कर दिया।
हरेली के बदरंग होने की पीड़ा छत्तीसगढ़ के बुजुर्गो, चिंतकों को घुन कीड़े की तरह खाने लगी।ऐसा लगने लगा मानो छत्तीसगढ़ के तीज त्यौहार विलुप्त हो जाएंगे। इसके पीछे एक बड़ा कारण यह भी था, गांव के बच्चे शहर पढ़ने के लिए बड़ी तेजी से जाने लगे। ऐसे नई पीढ़ी के लोग शहरी चमक दमक को गांव में पसारने लगे। जिससे छत्तीसगढ़ के तीज त्योहार, खाई -खजाना, नरवा- नदिया, कांदा -कुसियार, खेल -खिलौनों की पूछ परख भी शनै शनै कम होने लगी। गांव के बच्चे अपने मूल रीति रिवाज को भूलने लगे।
गांव में शहरों की भांति विकास होना सबके लिए बेहतर हो सकता है, किंतु विकास की आड़ में बदलाव के बवंडर से तीज- त्यौहार, रीति -रिवाज और परंपराओं का लुप्त हो जाना छत्तीसगढ़ की नयी पीढ़ी के लिए शुभ संकेत नहीं कहा जा सकता क्यों कि कहते हैं-
जिस गांव में पानी नहीं गिरता ,
वहां की फसलें खराब हो जाती हैं ,
जहां तीज त्यौहार का मन नहीं होता,
वहां की नस्लें खराब हो जाती है
इस बात को मुख्यमंत्री श्री भूपेष बघेल जी के संग छत्तीसगढ़ सरकार के सभी गुणी जनों ने समझा और छत्तीसगढ़ के तीज त्यौहारों को पुनर्जीवित प्रतिष्ठित करने का बीड़ा उठाया। गढ़बो नवा छत्तीसगढ़ का नारा देते छत्तीसगढ़ के इतिहास में पहली बार हरेली, तीजा, भक्त माता कर्मा जयंती और विश्व आदिवासी दिवस में अवकाश देने का ऐतिहासिक फैसला लिया गया। ऐसा फैसला करके उन्होंने इस बात का भी संदेश दिया -
"जीवन की किताबों पर बेशक नया कव्हर चढ़ाइये,
पर बिखरे पन्नों को पहले प्यार से चिपकाइये"
हरेली पर्व में अवकाश देने की पहल से सरकार की नई सोच उजागर हुई ।साथ ही नई पीढ़ी के बच्चों को हरेली पर गॉव से जुड़ने, गेंड़ी चढ़ने, बैलगाड़ी दौड़ ,नारियल फेक सहित फुगड़ी-बिल्लस, बांटी-भौंरा आदि लोक खेलों को जानने, ग्रामीण गतिविधियों में भागीदारी देने के अलावा छत्तीसगढ़ी ब्यजंन जैसे गुरहा चीला, ठेठरी-खुरमी का स्वाद लेने का सुनहरा अवसर मिला है।
गाय बैल को खिलाते हैं लौंदी
हरेली के पर्व पर पर सभी किसान ग्रामीणजन अपने अपने घर के पुस्तैनी किसानी औजार जैसे हल,(नागर ) फावड़ा, कुदाली (गैंती), हंसिया, एवं खेती किसानी के अन्य छोटे बड़े औजार को साफ सुथरा धोकर, गोबर से लिपे पुतेऔर रंगोली से सजे आंगन में रखकर पूजा करते है। इस बहाने किसानी कार्य में उपयोग लिए जाने वाले पशुओं को आराम मिल जाता है और औजारों की साफ-सफाई तथा मरम्मत का कार्य भी वर्ष भर के लिए पूर्ण हो जाता है। गाय बैलों को निरोगी बनाए रखने के लिए हरेली के दिन नमक और औषधियुक्त पौधों की पत्तियों को पीसकर "लौंदी" बनाकर खिलाया जाता है। इससे पशुधन की रक्षा होती है
नीम पत्ती घर द्वार में लगाते हैं
हरेली के पर्व में गांव -गांव घर -घर के द्वार पर नीम की टहनियां को टांगने का रिवाज है। इसके पीछे एक बड़ा कारण यही है कि बरसात के मौसम में विविध प्रकार की बीमारियां का जन्म और फैलाव होता है। ऐसी बीमारियों को जन्म देने वाले कीटाणु को मारने की ताकत नीम की पत्ती में होती है, यह पत्ती संक्रमण को रोकने और प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने में भी सहायक है, अतः हरेली पर्व पर नीम की पत्तियां लगाने की प्रथा अत्यंत पुरानी है । इस दृष्टि से हरेली का त्योहार पेड़ पौधों की भी सुरक्षा और मानव जीवन में स्वच्छ पर्यावरण की उपादेयता को भी बताता है।
चौखट पर कील ठोकने का रिवाज
हरेली पर्व के दिन घर -घर के बाहर दरवाजे के चौखट पर गांव के लोहार द्वारा कील ठोकने की भी प्रथा है। इसके पीछे एक बड़ा राज यही छुपा हुआ है कि वर्षा काल में बरसते बादल और बिजली गिरने का बड़ा खतरा होता है। ऐसी आकाशीय बिजली को लोहे से निर्मित वस्तुएं अपनी और खींच कर जमीन में समाहित कर देती हैं, जिससे जीव जंतुओं पर बिजली गिरने का खतरा कम हो जाता है। हालांकि आज के जमाने में अब अधिकांश घरों में लोहे से निर्मित खिड़की ग्रिल दरवाजे लगाने का प्रचलन है इसीलिए अब चौखट पर कील ठोकने की प्रथा भी लगभग समाप्त हो चली है,। ये पुरानी प्रथाएं रिवाज हमें बताते हैं कि वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित हैं हमारी अधिकांश पारंपरिक प्रथाएं, जिन्हें हमारे अनपढ़ पुरखों ने अपने व्यावहारिक ज्ञान के बूते आजमाया है।
हरेली का पर्व प्रकृति और संस्कृति से जुड़ने के अलावा आपसी भाईचारा ,मेल मिलाप को भी बढ़ावा देता है। इस पर्व पर कीचड़ में चर्र चूं चर्र चूं करती गेंड़ी, गुरहा चीला-भजिया का स्वाद, सखी सहेलियों के साथ फुगड़ी और सवनाही झूले का आनंद यह संदेश देता है-
भुंइयां हरियर दिखत हे,
जइसे संवरे दुलहिन नवेली
हरेक के पीरा हरे बर आगिस
गांव म हमर तिहार हरेली।
विजय मिश्रा ‘अमित’ पूर्वअति.महाप्रबंधक(जन.)
सेहत / शौर्यपथ /राजमा को किडनी बीन्स भी कहा जाता है। कुछ समय में इसका सेवन बहुत अधिक बढ़ गया है। खासकर लोग राजमा-चावल खाना बहुत अधिक पसंद करते हैं। लेकिन बहुत कम लोग इस बात से वाकिफ होंगे कि राजमा का सेवन बहुत पौष्टिक होता है। इसमें भरपूर मात्रा में विटामिन्स और अन्य तत्व मौजूद होते हैं । विटामिन बी, विटामिन बी 2, विटामिन ई,विटामिन के, कैल्शियम, कॉपर, लोहा, मैंगनीज, फास्फोरस, पोटेशियम, सोडियम, जस्ता, ओमेगा-3 फैटी एसिड, ओमेगा-6 फैटी एसिड, कोलेन, पैंटोथेनिक एसिड, जैसे तत्व मौजूद होते हैं इसलिए राजमा खाने के फायदे भी बहुत सारे हैं। आइए जानते हैं -
वजन करें कंट्रोल - जी हां, अगर आप अलग-अलग तरह से वजन कंट्रोल कर थक गए है तो राजमा को अपनी डाइट में शामिल करें। आप इसकी सब्जी की बजाए सलाद और सूप के रूप में इसका इस्तेमाल कर सकते हैं। यह हर आयु वर्ग के लिए सही है। पोषण से भरपूर राजमा से वजन कम कंट्रोल करने में मदद मिलेगी।
ताकत बढ़ाएं - दरअसल, राजमा में भरपूर मात्रा में आयरन होता है, जिससे ताकत अच्छे से मिलती है। बता दें कि शरीर की उर्जा और मेटाबॉलिज्म के लिए आयरन सबसे अधिक जरूरी है। वह राजमा में होता है। साथ ही ऑक्सीजन का सर्कुलेशन भी बढ़ता है। इसलिए राजमा का सेवन सप्ताह में 2 बार जरूर करें।
पाचन क्रिया सुधारे - राजमा में उचित मात्रा में फाइबर होता है। जिससे पाचन क्रिया स्वस्थ्य रहती है। इसका सेवन करने से ब्लड शुगर भी नियंित्रत रहता है। बढ़ती उम्र को रोके -दरअसल राजमा में भरपूर मात्रा में एंटीऑक्सीडेंट होता है, जो बढ़ती उम्र की कोशिकाओं को धीमा करता है। साथ ही झुर्रियों को कम करने, मुहांसे कम करने, बालों और नाखूनों को बेहतर बनाता है।
दिल का रखें ख्याल - राजम में मैंग्नीशियम भी मौजूद होता है। जो कोलस्ट्रोल को कंट्रोल करने में मदद करता है। शरीर में रक्तप्रवाह, धमनियों की गति, और दिल से जुड़ी अन्य बीमारियों को दूर करने में मदद करता है।
अस्थमा मरीजों के लिए रामबाण - राजमा में मौजूद ब्रोन्कोडायलेटरी बहुत प्रभावी होता है। वह फेफड़ों को मजबूत करता है और वायु मार्ग को सुगम बनाता है। शोध में भी सामने आया है कि मैग्नीशियम का स्तर कम होने पर अस्थमा से जल्दी प्रभावित होते हैं।
हड्डियों को करें मजबूत - राजमा में मौजूद मौगनीज और कैल्शियम हड्डियों को मजबूत करता है। साथ ही ऑस्टियोपोरोसिस को भी रोकने में मदद करता है। राजमा में मौजूद फोलेट जोड़ों और हड्डियों को स्वस्थ्य रखने में मदद करता है।
गठिया बादी मिलेगा आराम - आज के वक्त में जॉइंट पेन एक आम बात हो गई है। लेकिन उसका दर्द पूरे समय बना रहता है। इसलिए अपने भोजन में राजमा जरूर शामिल करें।क्योंकि राजमा में उच्च मात्रा में तांबा मौजूद होता है जिससे शरीर में सूजन कम होती है और दर्द में आराम मिलता है।
प्रोटीन का सबसे अच्छा स्त्रोत - शाकाहारी लोगों के लिए राजमा प्रोटीन का सबसे अच्छा स्त्रोत है। चावल के साथ के इसका प्रयोग करने पर शरीर में प्रोटीन की मात्रा बढ़ जाती है।
उक्त रक्तचाप को कम करें - कोविड की वजह से लोगों में हाइपरटेंशन की समस्या तेजी से बढ़ी है। राजमा में मैग्नीशियम, फाइबर और प्रोटीन का अच्छा स्त्रोत है। यह रक्तचाप को सामान्य करने में मदद करता है। साथ ही इसमें मौजूद मैग्नीशियम से माइग्रेन का दर्द भी कम होता है।
जीवनी / शौर्यपथ / 1. रवीन्द्रनाथ ठाकुर कवि, दार्शनिक, चित्रकार जैसी कई कलाओं का संगम थे। टैगोर सिर्फ महान रचनाधर्मी ही नहीं थे, बल्कि वो पहले ऐसे इंसान थे जिन्होंने पूर्वी और पश्चिमी दुनिया के मध्य सेतु बनने का कार्य किया था।
2. रवीन्द्रनाथ टैगोर एक कवि, उपन्यासकार, नाटककार, चित्रकार, और दार्शनिक थे। वह गुरुदेव के नाम से लोकप्रिय थे।
3. रवींद्रनाथ टैगोर या रबीन्द्रनाथ ठाकुर का जन्म 7 मई सन् 1861 को कोलकाता में हुआ था। उनके पिता का नाम देवेंद्रनाथ टैगोर और माता का नाम शारदा देवी था।
4. रवीन्द्रनाथ अपने माता-पिता की तेरहवीं संतान थे।
5. बचपन में उन्हें प्यार से 'रबी' बुलाया जाता था। उन्हें बचपन से ही कविताएं और कहानियां लिखने का शौक था। आठ वर्ष की उम्र में उन्होंने अपनी पहली कविता लिखी, सोलह साल की उम्र में उन्होंने कहानियां और नाटक लिखना प्रारंभ कर दिया था।
6. उनकी स्कूल की पढ़ाई प्रतिष्ठित सेंट जेवियर स्कूल में हुई। टैगोर ने बैरिस्टर बनने की चाहत में 1878 में इंग्लैंड के ब्रिजटोन पब्लिक स्कूल में नाम दर्ज कराया। उन्होंने लंदन कॉलेज विश्वविद्यालय में कानून का अध्ययन किया लेकिन 1880 में बिना डिग्री हासिल किए ही वापस आ गए।
7. 1883 में उनका विवाह मृणालिनी देवी के साथ हुआ। उस समय मृणालिनी देवी सिर्फ 10 वर्ष की थी।
8. अपने जीवन में उन्होंने एक हजार कविताएं, आठ उपन्यास, आठ कहानी संग्रह और विभिन्न विषयों पर अनेक लेख लिखे। इतना ही नहीं रवीन्द्रनाथ टैगोर संगीतप्रेमी थे और उन्होंने अपने जीवन में 2000 से अधिक गीतों की रचना की।
9. रवीन्द्रनाथ टैगोर के लिखे दो गीत आज भारत और बांग्लादेश के राष्ट्रगान हैं। 'जन-गण-मन' और 'आमार शोनार बांग्ला' जन-जन की धड़कन बने हुए हैं। उन्होंने न सिर्फ भारत बल्कि बांग्लादेश और श्रीलंका के लिए भी राष्ट्रगान लिखे।
10. सन् 1901 में टैगोर ने पश्चिम बंगाल के ग्रामीण क्षेत्र में स्थित शांति निकेतन में एक प्रायोगिक विद्यालय की स्थापना की। उन्होंने गुरु-शिष्य परंपरा को नया आयाम दिया। जहां उन्होंने भारत और पश्चिमी परंपराओं के सर्वश्रेष्ठ को मिलाने का प्रयास किया। वह विद्यालय में ही स्थायी रूप से रहने लगे और 1921 में यह विश्व भारती विश्वविद्यालय बन गया।
11. जीवन के 51 वर्षों तक उनकी सारी उपलब्धियां और सफलताएं केवल कोलकाता और उसके आसपास के क्षेत्र तक ही सीमित रही। 51 वर्ष की उम्र में वे अपने बेटे के साथ इंग्लैंड जा रहे थे। समुद्री मार्ग से भारत से इंग्लैंड जाते समय उन्होंने अपने कविता संग्रह गीतांजलि का अंग्रेजी अनुवाद करना प्रारंभ किया। गीतांजलि का अनुवाद करने के पीछे उनका कोई उद्देश्य नहीं था केवल समय काटने के लिए कुछ करने की गरज से उन्होंने गीतांजलि का अनुवाद करना प्रारंभ किया। उन्होंने एक नोटबुक में अपने हाथ से गीतांजलि का अंग्रेजी अनुवाद किया।
12. लंदन में जहाज से उतरते समय उनका पुत्र उस सूटकेस को ही भूल गया जिसमें वह नोटबुक रखी थी। इस ऐतिहासिक कृति की नियति में किसी बंद सूटकेस में लुप्त होना नहीं लिखा था। वह सूटकेस जिस व्यक्ति को मिला उसने स्वयं उस सूटकेस को रवीन्द्रनाथ टैगोर तक अगले ही दिन पहुंचा दिया।
13. लंदन में टैगोर के अंग्रेज मित्र चित्रकार रोथेंस्टिन को जब यह पता चला कि गीतांजलि को स्वयं रवीन्द्रनाथ टैगोर ने अनुवादित किया है तो उन्होंने उसे पढ़ने की इच्छा जाहिर की। गीतांजलि पढ़ने के बाद रोथेंस्टिन उस पर मुग्ध हो गए।
14. उन्होंने अपने मित्र डब्ल्यू.बी. यीट्स को गीतांजलि के बारे में बताया और वहीं नोटबुक उन्हें भी पढ़ने के लिए दी। इसके बाद जो हुआ वह इतिहास है। यीट्स ने स्वयं गीतांजलि के अंग्रेजी के मूल संस्करण का प्रस्तावना लिखा।
15. सितंबर सन् 1912 में गीतांजलि के अंग्रेजी अनुवाद की कुछ सीमित प्रतियां इंडिया सोसायटी के सहयोग से प्रकाशित की गई। लंदन के साहित्यिक गलियारों में इस किताब की खूब सराहना हुई। जल्द ही गीतांजलि के शब्द माधुर्य ने संपूर्ण विश्व को सम्मोहित कर लिया।
16. पहली बार भारतीय मनीषा की झलक पश्चिमी जगत ने देखी। गीतांजलि के प्रकाशित होने के एक साल बाद सन् 1913 में रवीन्द्रनाथ टैगोर को नोबल पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
17. उन्हें साहित्य के नोबल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था किंतु इससे पूर्व सन 1915 में अंग्रेज शासन ने उन्हें नाइटहुड की उपाधि से अलंकृत किया। रवीन्द्रनाथ उन दिनों जलियांवाला बाग की दर्दनाक घटना से व्यथित थे। फलस्वरूप उपाधि उन्होंने लौटा दी।
18. रवीन्द्रनाथ टैगोर एशिया के प्रथम व्यक्ति थे, जिन्हें नोबल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।
19. गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर केवल भारत के ही नहीं समूचे विश्व के साहित्य, कला और संगीत के एक महान प्रकाश स्तंभ हैं, जो स्तंभ अनंतकाल तक प्रकाशमान रहेगा।
20. स्वामी विवेकानंद के बाद रवीन्द्रनाथ टैगोर दूसरे व्यक्ति थे, जिन्होंने विश्व धर्म संसद को दो बार संबोधित किया।
21. गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर भारतीय साहित्य के उज्ज्वल नक्षत्र हैं। उनका शांत अप्रतिम व्यक्तित्व भारतवासियों के लिए सदैव ही सम्माननीय रहा है। वे न सिर्फ महानतम कवि थे बल्कि चित्रकार, दार्शनिक, संगीतकार एवं नाटककार के विलक्षण गुण भी उनमें मौजूद थे।
22. उनकी प्रमुख रचनाएं गीतांजलि, गोरा एवं घरे बाईरे है। उनकी काव्य रचनाओं में अनूठी ताल और लय ध्वनित होती है। वर्ष 1877 में उनकी रचना 'भिखारिन' खासी चर्चित रही। उन्हें बंगाल का सांस्कृतिक उपदेशक भी कहा जाता है। उनके व्यक्तित्व की छाप बांग्ला लेखन पर ऐसी पड़ी कि तत्कालीन लेखन का स्वरूप ही बदल गया।
23. गुरुदेव का लिखा 'एकला चालो रे' गाना गांधीजी के जीवन का आदर्श बन गया।
24. गुरुदेव का संदेश था 'शिक्षा से ही देश स्वाधीन होगा संग्राम से नहीं'। कहना न होगा कि आज भी यह संदेश कितना प्रासंगिक है।
25. प्रोस्टेट कैंसर के कारण रवीन्द्रनाथ टैगोर का निधन 7 अगस्त, 1941 को कोलकाता हुआ था। टैगोर का लोगों के बीच इतना ज्यादा सम्मान था कि लोग उनकी मौत के बारे में बात नहीं करना चाहते थे। यह भारतीय साहित्य के लिए अभूतपूर्व क्षति थी।
सेहत / शौर्यपथ /एक समय ऐसा भी आता है जब लोग अपनी लाइफस्टाइल में बदलाव करते हैं। उसे हेल्दी बनाने की कोशिश करते हैं। अपने खानपान में बदलाव करते हैं, बॉडी का ध्यान रखते हैं। लेकिन वजन कम करने के लिए महंगे प्रोडक्ट का इस्तेमाल करते हैं। पर बीमारियों का समाधान रसोई घर में ही मौजूद होता है। जीरा खाने में तो तड़का लगाता है लेकिन सेहत के लिहाज से भी फायदेमंद है। तो आइए जानते हैं काले जीरे के फायदे के बारे में -
1. मोटापा कम करें - वजन कम करने में जीरा बेहद सहायक होता है। लेकिन इसके के लिए जीरे का पानी पीना होगा। रात में जीरे को पानी में भिगो दें। इसके बाद उसे सुबह हल्का गर्म कर लें। और छानकर पी लें। दरअसल आपने देखा होगा जीरे का पानी पीला नजर आता है वह एक प्रक्रिया है। उस प्रक्रिया को ऑस्मोसिस प्रक्रिया कहा जाता है। उस पीले पानी में सभी जरूरी पोषक तत्व मिल जाते हैं। जो वजन कम करने में मदद करता है।
2.पीरियड्स में आराम मिलता है - कुछ महिलाओं को पीरियड्स के दौरान हैवी ब्लीडिंग होती है। इस समय में सुबह 1 चम्मच खाली पेट जीरे का सेवन करना चाहिए। फिर दिन में 1 बार और शाम को। पूरे 1 दिन में 3 बार सेवन करना चाहिए। इससे पेट में ठंडक पहुंचती है और ब्लीडिंग में आराम मिलता है।
3. कैंसर को रोके - मेडिकल साइंस के मुताबिक जीरा जिस्म में कैंसर के सेल्स के खतरे को बढ़ने से रोकता है। जानवरों पर की गई रिसर्च में इस बात की पुष्टि की गई। यह कोलन कैंसर को जड़ से खत्म करने की सलाह देता है।
4. कोलेस्ट्रोल करें कम - एक रिपोर्ट के मुताबिक दही में जीर खाने से कोलेस्ट्रोल कम होता है। अगर मरीज को हाईकोलेस्ट्रोल है तो भी मरीजों को सेवन करना चाहिए। इससे शुगर जल्दी कंट्रोल में आएगी।
5. पोषक तत्वों से भरपूर - जीरे में एंटी इंफ्लामेंट्री और एंटी सेप्टिक तत्व मौजूद होते हैं। जिससे शरीर में हो रही सूजन और दर्द को भी कम करने में मदद करता है। इसलिए जीरे का सेवन करते रहना चाहिए।
6. उर्जा का संचार करें - जीरे का सेवन सेहत और सुंदरता दोनों के लिए किया जाता है। इसमें मौजूद तत्वों से रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। कमजोरी और थकान भी दूर होती है।
7.सिर दर्द और दांत दर्द में राहत - काले जीरे का तेल अपने माथे पर लगा लें। अधिक सिरदर्द होने पर राहत मिलेगी। वहीं दांत दर्द से परेशान है तो काले जीरे के तेल की कुछ बूंदे पानी में डालकर कुल्ला करें आराम मिलेगा।
8.त्वचा निखारे - चेहरे पर हो रही फुंसियों से परेशान होने परा काले जीरे के पाउडर का लेप बनाकर लगाएं। इसमें मौजूद एंटी बैक्टीरियल गुण संक्रमण से बचने में मदद करेंगे। वहीं चेहरे पर हो
Feb 09, 2021 Rate: 4.00
