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शिक्षा / शौर्यपथ / हमारे आसपास पोषक खाद्य पदार्थों की विस्तृत श्रृंखला होने के बावजूद जागरूकता के अभाव में हम उनसे प्रायः अनभिज्ञ ही बने रहते हैं।
भारत के विविध क्षेत्रों में पोषक गुणों से भरपूर ऐसे कई खाद्य उत्पाद पाए जाते हैं, जिनकी ओर पर्याप्त ध्यान नहीं दिए जाने के कारण उनके सेवन से मिलने वाले पोषण और स्वास्थ्यवर्द्धक लाभ से हम वंचित रह जाते हैं। पूर्वोत्तर में पाया जाने वाला नांरगी गूदे वाला खीरा ऐसा ही एक खाद्य उत्पाद है।
भारतीय कृषि वैज्ञानिकों ने अपने एक अध्ययन में पाया है कि देश के अन्य हिस्सों में उगायी जाने वाली खीरे की सफेद गूदे की किस्मों के मुकाबले नारंगी-गूदे वाले खीरे की किस्म कैरोटीनॉयड सामग्री (प्रो-विटामिन-ए) के मामले में चार से पांच गुना अधिक समृद्ध होती है।
पूर्वोत्तर भारत के जनजातीय क्षेत्रों में नारंगी-गूदे वाले खीरे की यह किस्म बहुतायत में पायी जाती है। स्थानीय लोग खाद्य पदार्थ के रूप में नारंगी गूदे वाले खीरे का सेवन सब्जी या फिर चटनी के रूप में करते हैं। खीरे की इस प्रजाति को मिजोरम में 'फंगमा' और 'हमाजिल' और मणिपुर में 'थाबी' कहते हैं।
कैरोटीनॉयड्स, जिसे टेट्राटरपीनोइड्स भी कहा जाता है, पीले, नारंगी और लाल कार्बनिक रंगद्रव्य को कहते हैं। यह पौधों एवं शैवाल के साथ-साथ कई बैक्टीरिया और कवक द्वारा उत्पादित होते हैं। कैरोटीनॉयड्स को कद्दू, गाजर, मक्का, टमाटर, कैनरी पक्षी, फीनिकोप्टरिडाए कुल के पक्षी फ्लेमिंगो, सालमन मछली, केकड़ा, झींगा और डैफोडील्स को विशिष्ट रंग देने के लिए जाना जाता है।
यह अनुमान लगाते हुए कि पौधों का नारंगी रंग उच्च कैरोटीनॉयड के कारण हो सकता है, शोधकर्ताओं ने खीरे की किस्म की विशेषताओं और उसके पोषक तत्वों का विस्तार से अध्ययन करने का निर्णय लिया। नारंगी गूदे वाले खीरे की किस्मों ने शोधकर्ताओं का ध्यान उस वक्त आकर्षित किया, जब वे नई दिल्ली स्थित भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) से संबद्ध नेशनल ब्यूरो ऑफ प्लांट जेनेटिक रिसोर्सेज (एनबीपीजीआर) में खीरे के देसी जर्मप्लाज्म भंडार की विशेषताओं का अध्ययन कर रहे थे। शोधकर्ताओं ने मणिपुर और मिजोरम से नारंगी खीरे के नमूने एकत्र किये हैं।
एनबीपीजीआर के शोधकर्ताओं का कहना है कि ‘बहुत सारे ऐसे फल उपलब्ध हैं, जो दैनिक रूप से बीटा कैरोटीन/कैरोटीनॉयड के अनुशंसित सेवन को सुनिश्चित कर सकते हैं। हालांकि, वे विकासशील देशों में गरीबों की पहुंच से बाहर हो सकते हैं। जबकि, खीरा पूरे भारत में सस्ती कीमत पर उपलब्ध है। कैरोटेनॉयड से समृद्ध स्थानीय फसल किस्मों की पहचान और उपयोग निश्चित रूप से पोषण सुरक्षा के क्षेत्र में हमारे प्रयासों में बदलाव ला सकता है’
इस अध्ययन में, वैज्ञानिकों ने मिजोरम से प्राप्त खीरे की तीन किस्मों और मणिपुर से प्राप्त एक किस्म को दिल्ली स्थित एनबीपीजीआर के कैंपस में उगाया है।
इसके साथ ही, उत्तर भारत में प्रमुखता से उगायी जाने वाली खीरे की सफेद गूदे वाली किस्म पूसा-उदय को भी उगाया गया है। खीरे की दोनों किस्मों में कुल शर्करा का स्तर एक समान पाया गया है, और खीरे की सामान्य किस्म के मुकाबले नारंगी गूदे वाली किस्म में एस्कॉर्बिक एसिड की थोड़ी अधिक मात्रा दिखाई देती है।
शोधकर्ताओं का कहना यह भी है कि खीरे के विकसित होने के विभिन्न चरणों में उसमें पाये जाने वाले कैरोटीनॉयड का स्तर भिन्न होता है। उन्होंने पाया कि नारंगी गूदे वाली खीरे की किस्म जब सलाद के रूप में खाये जाने योग्य हो जाती है, तो इसमें कैरोटीनॉयड की मात्रा सामान्य किस्म की तुलना में 2-4 गुना अधिक होती है। शोधकर्ताओं का कहना है कि अधिक परिपक्व होने पर नारंगी गूदे से युक्त इस खीरे में सफेद खीरे की तुलना में 10-50 गुना अधिक कैरोटीनॉयड सामग्री हो सकती है।
शोधकर्ताओं ने इसके स्वाद का आकलन करने के उद्देश्य से 41 व्यक्तियों को नारंगी गूदे वाले खीरे को चखाकर उसके स्वाद को स्कोर देने के लिए कहकर इसके स्वाद की स्वीकार्यता का मूल्यांकन किया है। सभी प्रतिभागियों ने खीरे की अनूठी सुगंध और स्वाद की सराहना की और यह स्वीकार किया कि इसे सलाद या रायते के रूप में खाया जा सकता है। शोधकर्ताओं का कहना है कि उच्च कैरोटीनॉयड से युक्त खीरे का सीधे सेवन करने के साथ-साथ इसका उपयोग खीरे की किस्मों में सुधार के लिए किया जा सकता है।
टिप्स ट्रिक्स / शौर्यपथ /हरियाली तीज पर महिलाएं 16 श्रंगार करती है, सजती - संवरती है। उन्हीं में से मेहंदी भी श्रंगार का ही हिस्सा है। इसके बिना तीज त्योहार या किसी भी प्रकार का पर्व पूरा नहीं होता है। हरियाली तीज एक विशेष पर्व होता है इस दिन महिलाएं संज संवर कर भगवान शिव जी और मां पार्वती जी की पूजा करती है। और भगवान से अपने पति की लंबी उम्र के लिए कामना करती है साथ ही परिवार के सुख की मंगलकामना करती है। लेकिन बदलते दौर में मेहंदी के रंग भी फीके पड़ने लगे हैं। कुछ नुस्खें है जिन्हें फॉलो कर आप अपनी मेहंदी का रंग गहरा कर सकती हो।
तो आइए जानते हैं 5 आसान से टिप्स -
1. मेहंदी को घोलते समय उसमे में सादा पानी नहीं मिलाते हुए चाय की पत्ती का पानी डालें। इसे बनाने के लिए तपेली में एक कप पानी रखें,उसमे पत्ती डाल दें। पानी को थोड़ी देर
उबाल लें और ठंडा होने के बाद उससे मेहंदी घोल लें।
2. मेहंदी घोलने से पहले मेहंदी में ही तेल डाल दें। इससे मेहंदी का कलर एक जैसा आता है। वहीं मेहंदी हल्की सी सुख जाने के बाद एक कटोरी में पानी लेकर उसमें शक्कर डाल दें। इसके बाद रूई की मदद से मेहंदी पर लगाएं। कलर अच्छा आएगा।
3. मेहंदी सूखने के बाद आप रूई की मदद से अचार का तेल भी लगा सकते हैं। इससे मेहंदी का कलर खूब जमेगा।
4. मेहंदी सूखने के बाद आप इसे हटा देते हैं, और लेकिन पानी से हाथ नहीं धोएं। इसके पहले थोड़ी देर के लिए घरेलू बाम का इस्तेमाल करें। अपने हाथों पर हल्के हाथों से लगा लें ।ध्यान रहे उंगलियों के पोरस पर नहीं लगाएं। ताकि गलती से आंख में नहीं लग जाएं।
5. मेहंदी सूखने के बाद रूई की मदद से हल्के हाथों से मेहंदी का तेल लगा लें। इसके बाद करीब 3 घंटे तक हाथों पर पानी नहीं लगाएं। फिर देखिए कितना गहरा रंग आता है।
टिप्स ट्रिक्स / शौर्यपथ /प्याज का इस्तेमाल करने से पहले अगर आप उसके छिलकों को निकाल कर फेंक देते हैं, तो प्याज के छिलकों में छिपे सेहत और सौन्दर्य के ये 5 राज जानने के बाद आप उन्हें फेंकना भूल जाएंगे -
1. बैड कोलेस्ट्राल कम करने में मदद करता है -
इसके लिए आपको प्याज के छिलकों को पूरी रात पानी में भिगोकर रखना है और सुबह इस पानी को पीना है। इसका स्वाद आपको जरूर अच्छा नहीं लगेगा, इसलिए आप चाहें तो इसमें शहद या चीनी मिलाकर भी पी सकते हैं। रोजाना इसके सेवन से आपको कुछ दिनों में फर्क जरूर नजर आएगा है।
2. त्वचा की एलर्जी से राहत दिलाएगा -
यदि आपको त्वचा में किसी चीज से एलर्जी है तो आप ऊपर बताई गई विधि से ही प्याज के छिलकों का पानी बनाएं (यानी कि रातभर प्याज के छिलकों को पानी में भिगोकर रखें और सुबह प्याज के छिलकों का पानी तैयार है) अब इस पानी से रोजाना अपनी त्वचा साफ करें।
3. बालों को बनाएो खूबसूरत -
आप बालों को चमकदार बनाने के लिए कई तरह के कंडीशनर इस्तेमाल करती हैं, तो अब से आप प्याज के छिलकों का पानी भी इस्तेमाल कर सकती हैं। इससे आपके बाल मुलायम और चमकदार हो जाएंगे।
4. चेहरे के दाग-धब्बे हटाएं -
चेहरे के दाग-धब्बे से निजात पाने के लिए आप प्याज के रसयुक्त छिलके का इस्तेमाल करें। इसके लिए आप प्याज के छिलके में हल्दी मिलाकर दाग-धब्बे वाली जगह पर लगाएं। जल्द ही आपको फर्क दिखेगा।
5. खराब गले को ठीक करें -
यदि कभी आपका गला खराब हो जाए तो आप प्याज के छिलकों को गर्म पानी में उबालें फिर इस पानी को पी लें। गले से संबंधित परेशानियों में प्याज की यह अनोखी चाय बेहद लाभकारी होगी।
आस्था / शौर्यपथ /हिन्दू कैलेंडर अनुसार श्रावण में जिस तरह शिव मंदिरों में शिवजी की पूजा होती है और सभी और श्रावण की धूम रहती है उसी तरह श्रीकृष्ण मंदिर में भी धूम रहती है और संपूर्ण ब्रजमंडल (मथुरा, वृंदावन, गोकुल, बरसाना, गोवर्धन आदि) में श्रीकृष्ण के बालरूप की पूजा होती है और उनके लिए विशेष हिंडोला बनाया जाता है साथ ही घटा महोत्सव का आयोजन भी होता है। आओ जानते हैं इस संबंध में कुछ खास।
1. ब्रज मंडल में धूम : श्रीकृष्ण की नगरी मथुरा, गोकुल, बरसाना और वृंदावन में सावन उत्सव का आयोजन होता है। ब्रज मंहल के इस सावन उत्सव को कृष्ण जन्माअष्टमी तक विभिन्न तरीकों से मनाया जाता है। जैसे इन उत्सवों में हिंडोले में झूला, घटाएं, रासलीला और गौरांगलीला का आयोजन होता हैं।
2. हिंडोला : यहां श्रावण मास के कृष्णपक्ष से मंदिर में दो चांदी के और एक सोने का हिंडोला डाला जाता है। इन हिंडोलों में भगवान कृष्ण को झुलाया जाता है। इस माह में अधिकतर जगह पर श्रीकृष्ण के बाल रूप की पूजा की जाती है। इसमें हिंडोला सजाने और बालमुकुंद को झूला झूलाने की परंपरा है।
3. हरियाली तीज : ब्रज मंडल में खासकर वृंदावन में हरियाली तीज की धूम होती है। यहां के प्राचीन राधावल्लभ मंदिर में हरियाली तीज से रक्षाबंधन तक चांदी, केले, फूल व पत्ती आदि के हिंडोले डाले जाते हैं तथा पवित्रा एकादशी पर ठाकुरजी पवित्रा धारण करते हैं। हरियाली तीज से पंचमी तक ठाकुरजी स्वर्ण हिंडोले में और उसके बाद पूर्णिमा तक चांदी, जड़ाऊ, फूलपत्ती आदि के हिंडोले में झूलते हैं।
4. कृष्ण के साथ बलराम भी झूलते हैं : ब्रज मंडल के अन्य मंदिरों में जहां हिंडोले में कृष्ण झूलते हैं वहीं ब्रज में एक ऐसा मंदिर है, जहां पूरे श्रावण मास में हिंडोले में कृष्ण के साथ बलराम भी झूलते हैं। दाऊजी मंदिर बल्देव एवं गिरिराज मुखारबिन्द मंदिर जतीपुरा में हिंडोले में ठाकुरजी की प्रतिमा के प्रतिबिम्ब को झुलाया जाता है।
5. रासलीला : इस माह को प्रेम और नव जीवन का माह भी कहा जाता है। मोर के पांव में नृत्य बंध जाता है। संपूर्ण सृष्टि नृत्य करने लगती हैं। वसंत के बाद श्रीकृष्ण इसी माह में रास रचाते हैं। ब्रजमंडल में श्रावण मास में मनायी जाने वाली रासलीला कम आकर्षक नहीं होती है। वृन्दावन का प्रमुख आकर्षण विश्वप्रसिद्ध रासाचार्यो द्वारा रासलीला प्रस्तुत की जाती है। जिनमें कृष्ण लीलाओं का जीवन्त प्रस्तुतीकरण होता है।
6. घटा उत्सव : सावन मास में ब्रजमंडल में सावन उत्सव के अलावा घटा महोत्सव का भी आयोजन होता है जिसमें विभिन्न रंग की आकर्षक घटा में कान्हा की लीलाओं का प्रस्तुतीकरण होता है। मंदिरों की कालीघटा देखने के लिए लाखों लोग इन मंदिरों में आते हैं।
टिप्स ट्रिक्स / शौर्यपथ /छाछ जिसे बटर मिल्क भी कहा जाता है, कई लोगों को पसंद होती है। नियमित छाछ पीने से न केवल सेहत को फायदा पहुंचता है बल्कि दिमाग को भी ठंडक मिलती है, साथ ही त्वचा पर भी इसका अच्छा असर होता है। छाछ को पीने के अलावा इसके कुछ नुस्खे भी है जिन्हें आप आजमा सकते हैं। आइए,जानते हैं छाछ पीने के फायदे और नुस्खे -
1 छाछ का सेवन भुने जीरे के साथ किया जाए, तो पाचन अच्छे से होता है और पेट की गर्मी व अन्य समस्याओं से बचा जा सकता है। यह तरलता बनाए रखने में भी मददगार है।
2 मोटापा अधिक होने पर छाछ को छौंककर सेंधा नमक डालकर पीने से फायदा होता है। उच्च रक्तचाप होने पर गिलोय का चूर्ण मट्ठे के साथ लेना चाहिए। वहीं सुबह-शाम मट्ठा या दही की पतली लस्सी पीने से स्मरण शक्ति तेज होती है।
3 बार-बार हिचकी आने की समस्या हो, तो छाछ में एक चम्मच सौंठ डालकर सेवन करना लाभदायक होगा। ऊल्टी आने या जी मचलाने पर छाछ में जायफल घिसकर इसके मिश्रण को पीने से लाभ मिलता है।
4 सौंदर्य समस्याओं के लिए भी छाछ बेहद फायदेमंद चीज है। छाछ में आटा मिलाकर बनाए गए लेप को लगाने से त्वचा की झुर्रियां कम होती हैं। इसके अलावा गुलाब की जड़ को छाछ में पीसकर चेहरे पर लगाने से मुहांसे खत्म हो जाते हैं।
5 अगर आप अत्यधिक तनाव से गुजर रहे हैं, तो नियमित छाछ का सेवन आपके लिए लाभदायक होगा। वहीं शरीर के साथ-साथ दिमाग की गर्मी को कम करने में भी छाछ का सेवन लाभप्रद है।
6 शरीर के किसी भाग में जल जाने पर तुरंत छाछ लगाने से लाभ होता है। खुजली की समस्या होने पर अमलतास के पत्ते छाछ में पीस लें और शरीर पर मलें। कुछ देर बाद स्नान करें। शरीर की खुजली नष्ट हो जाती है।
7 जहर को उतारने में भी इसका प्रयोग किया जाता है। किसी व्यक्ति द्वारा जहर खाने पर उसे बार-बार फीका मट्ठा पिलाने से लाभ होता है, परंतु डॉक्टर की सलाह जरूरी है। विषैले जीव-जंतु के काटने पर मट्ठे में तम्बाकू मिलाकर लगाना लाभप्रद होता है।
8 एड़ियां फटने की समस्या होने पर छाछ बनाने पर निकलने वाला ताजा मक्खन लगाएं। ऐसा करने से फटी एड़ियां जल्दी ठीक हो जाती हैं।
9 बाल झड़ने पर भी छाछ असरकारी है। इसके लिए बासी छाछ से सप्ताह में दो दिन बालों को धोना लाभप्रद होता है।
शौर्यपथ /विवाहित महिलाएं पैरों में बीच की 3 अंगुलियों में बिछिया पहनती है। यह गहना सिर्फ साज-श्रृंगार की वस्तु नहीं है। दोनों पैरों में बिछिया पहनने से महिलाओं का हार्मोनल सिस्टम सही रूप से कार्य करता है, बिछिया पहनने से थाइराइड की संभावना कम हो जाती है।
बिछिया एक्यूप्रेशर उपचार पद्धति पर कार्य करती है जिससे शरीर के निचले अंगों के तंत्रिका तंत्र और मांसपेशियां सबल रहती हैं।
बिछिया एक खास नस पर प्रेशर बनाती है जोकि गर्भाशय में समुचित रक्तसंचार प्रवहित करती है। इस प्रकार बिछिया औरतों की गर्भधारण क्षमता को स्वस्थ रखती है।
मछली की आकार की बिछिया सबसे असरदार मानी जाती है। मछली का आकार मतलब बीच में गोलाकार और आगे-पीछे कुछ नोकदार सी।
पैरों में हमेशा चांदी की बिछिया पहनें। सोने की बिछिया शारीरिक गर्मी का संतुलन खराब करके रोग उत्पन्न कर सकती है।
सेहत / शौर्यपथ /शरीर को हाइड्रट रखने के साथ ही त्वचा की खूबसूरती तक कई अनमोल गुणों का खजाना है खीरा और क्या-क्या खूबियां हैं इसमें, जानने के लिए पढ़ें इसके बेहतरीन फायदे-
1. खीरे की सबसे बड़ी खासियत है, कि इसमें यह 80 प्रतिशत पानी होता है। खीरा प्यास बुझाता है और शरीर में पानी की कमी को पूरा करता है। खीरा खाने के बाद शरीर को पर्याप्त मात्रा में पानी मिल जाता है।
2 यह शरीर के आंतरिक अंगों और त्वचा की गहराई से सफाई करता है। इसके अलावा धूप से झुलसी हुई त्वचा को न केवल राहत देता है बल्कि त्वचा की जलन और टेनिंग भी कम करता है।
3. खीरा का बेहतरीन गुण है आंखों को शीतलता प्रदान करना। फ्रिज में रखी इसके रस की क्यूब्स को आंखों पर रखने से आंखों की थकान मिटती है। इसके स्लाइस को आंखों की पलक के ऊपर पर रखने से आंखों को ठंडक मिलती है।
4 खीरा खाने से दिल की जलन कम होती है। यह शरीर के जहरीले तत्वों को बाहर निकलने में मदद करता है। इसके अलावा यह आंतों की भी बखूबी सफाई करता है।
5. हमें प्रतिदिन कुछ विटामिन्स लेना बेहद जरूरी होता है। जैसे विटामिन ए, बी और सी हमें नियमित लेना चाहिए। खीरा अकेला हमें प्रतिदिन के विटामिन्स देता है। खीरे के छिलके में विटामिन सी होता है।
6. साफ-सुथरी, चिकनी और चमकदार त्वचा चाहिए तो आप खीरे से अवश्य दोस्ती कीजिए। खीरा में पौटेशियम, मैगनीशियम और सिलीकॉन अत्यधिक मात्रा में होता है। यह खनिज त्वचा के लिए बहुत जरूरी हैं।
7. खीर वजन भी कम करता है। जो लोग अपना वजन घटाना चाहते हैं वे सूप और सलाद में खीरा का सेवन करें। क्योंकि खीरा में जल की मात्रा ज्यादा होती है जबकि कैलोरी नहीं। इसलिए यह जल्दी पेट को तृप्त करती है।
8. खीरा में फाइबर होते हैं जो खाना पचाने में मददगार होते हैं। आप कब्ज से परेशान हैं तो रोजाना खीरा खाएं। यह कब्ज के लिए कारगर दवाई है।
9. खीरा का यह गुण आपको चौंका देगा। जी हां, कैंसर से लड़ता है। खीरा खाने से कैंसर होने की आशंका कम होती है। खीरे में इकोइसोलएरीक्रिस्नोल, लैरीक्रिस्नोल और पाइनोरिस्नोल तत्व होते हैं। यह तत्व सभी तरह के कैंसर के रोकथाम में सक्षम हैं।
10. खीरे में मौजूद तत्व सीलिशिया बालों और नाखूनों में चमक लाता है और इन्हें मजबूत करता है। सल्फर और सीलिशिया के कारण बाल तेजी से बढ़ते हैं।
11. फ्रिज में रखें क्यूब्स को फेस से लगाने से काले धब्बों से भी छुटकारा मिलता है। और खूबसूरती में निखार आता है।
12. अगर आप खीरा का इस्तेमाल अपने स्कीन केयर रूटीन में करते हैं तो त्वचा संबंधी सारी समस्याएं धीरे-धीरे कम होंगी।
13. त्वचा के तैलीय होने पर मुंहासे जैसी समस्या आम हो जाती है। यदि आप भी पिंपल्स से परेशान हैं तो खीरा आपके लिए फायदेमंद है। इसके लिए आप खीरे का रस निकाल लें। इसमें कुछ बूंदें नींबू की मिलाएं। अब इसे अपने पूरे चेहरे पर लगाएं। कुछ देर लगा छोड़ दें। फिर ठंडे पानी से चेहरा धो लें।
14. धूप से त्वचा को बहुत नुकसान पहुंचता है। यदि आपके चेहरे पर टैनिंग हो गई है तो खीरा इसे हटाने के लिए बेहतरीन है। बस आपको इसका इस्तेमाल नियमित करना है। टैनिंग हटाने के लिए आप आधे खीरे का रस निकाल लें। इसमें चुटकीभर हल्दी मिलाएं। अब इसमें कुछ बूंदें नींबू के रस की मिलाएं। इसे चेहरे, गर्दन और अपने हाथों में लगाकर 15 मिनट तक लगा छोड़ दें, फिर साफ पानी से इसे साफ कर लें।
15. विटामिन सी और फोलिक एसिड से भरपूर खीरे का फेस मास्क महीन रेखाओं और झुर्रियों वाली त्वचा पर बेहतरीन काम करता है। यह उम्र बढ़ने की प्रक्रिया को धीमा कर देता है और त्वचा में कसाव लाता है।
16. मधुमेह के मरीजों को भूख से थोड़ा कम तथा हल्का भोजन लेने की सलाह दी जाती है। ऐसे में बार-बार भूख महसूस होती है। इस स्थिति में खीरा खाकर भूख मिटाना चाहिए।
17. पीलिया, ज्वर, प्यास, शरीर की जलन, त्वचा रोग, छाती में जलन, अजीर्ण व एसीडीटी में खीरा फायदेमंद है।
18. मोटापे से परेशान लोग सलाद के रूप में इसका प्रयोग करें तो लाभ होता है।
19. खीरे के सेवन से इससे गुर्दे की समस्या दूर हो सकती है।
20. भूख न लगने की स्थिति में खीरे का सेवन करने से भूख बढ़ती है।
सेहत / शौर्यपथ /कोरोना काल के बाद से लाइफस्टाइल में काफी बदलाव देखे जा रहे हैं। संभवतः आने वाले वक्त में और भी बदलाव नज़र आएं। कोरोना महामारी में लोगों ने अपने खान-पान में बड़ा बदलाव किया है। वे अपनी स्वास्थ्य के प्रति अधिक जागरूक होने लगे हैं। आइए जानते हैं इस महामारी के दौर में अपना ऑक्सीजन लेवल कैसे सामान्य रखें -
1.नींबू- नींबू विटामिन सी का सबसे अच्छा सोर्स है। इसके सेवन से इम्युनिटी बूस्ट होती है। वजन कम करने में भी यह बहुत मददगार है। प्रतिदिन सुबह गुनगुने पानी में नींबू डालकर पीना सेहत के लाभदायक है। नींबू ऑक्सीजन लेवल को सामान्य रखने में मदद करता है। यह एक प्राकृतिक एंटीसेप्टिक है। चेहरे पर पनप रही फुंसी, मुंहासे, ब्लैकहेड्स और झुर्रियों को कम करने में मदद करता है। आप नींबू के अचार का सेवन भी कर सकते हैं।
2.कीवी- कीवी को फलों का राजा कहा जाता है। इसमें मौजूद विटामिन सी, ई, पोटेशियम और फोलेट कई बीमारियों से बचाने में मदद करता है। डेंगू जैसी बीमारी में इस फल का सेवन करने के लिए कहा जाता है। इसमें भरपूर मात्रा में एंटीऑक्सीडेंट मौजूद होता है जो ऑक्सीजन को सामान्य रखने मदद करता है। साथ ही इसमें मौजूद तत्व संक्रमण जैसी अन्य बीमारियों से बचाने में मदद करता है।
3.केला- केला जिसे खाने से ताकत मिलती है, इसका सेवन शरीर में ऑक्सीजन का स्तर बढ़ाने में मदद करता है। इसमें भरपूर मात्रा में अल्कालाइन मौजूद रहता है, जो ऑक्सीजन की कमी को दूर कर सकता है।
4.लहसुन- लहसुन आयुर्वेदिक औषधियों में गिना जाता है। भारतीय खाने में स्वाद बढ़ाने के लिए इसका अधिक मात्रा में उपयोग किया जाता है। जानकारों के अनुसार इसके सेवन से शरीर में ऑक्सीजन का लेवल सामान्य रखने में मदद करता है। इतना ही नहीं कोलेस्ट्रॉल की बीमारी होने पर भी इसका सेवन किया जाता है। ताकि खून गाढ़ा नहीं पड़ें।
5.दही- दही का सेवन शरीर की बेहतरी के लिए सबसे अच्छा। इसमें विटामिन, कैल्शियम और प्रोटीन सब मौजूद होता है। आप प्रतिदिन इसका खाने के साथ सेवन कर सकते हैं, इससे ऑक्सीजन की कमी पूरी होती है। साथ ही इसका सेवन पाचन शक्ति को भी मजबूत करता है। हालांकि रात को दही का सेवन नहीं करना चाहिए। यह शरीर के लिए जितना अच्छा दिन में है उतना ही रात में घातक सिद्ध होता है।
खाना खाजना / शौर्यपथ /सामग्री :
2 कटोरी चावल, 2 कटोरी पोहा, 1 कटोरी दही, स्वादानुसार नमक व तेल, चुटकीभर मीठा सोडा।
विधि :
चावल व पोहा अलग-अलग धोकर पर्याप्त पानी रखकर 6-7 घंटे तक भीगने दें फिर इन्हें पीसकर दही व नमक डालकर पेस्ट बना लें। इसमें चुटकीभर सोडा भी डाल दें।
अब नॉन स्टिक या लोहे के तवे को गरम करें। पहले एक चम्मच तेल डालकर फिर घोल डालें और चम्मच से फैलाकर धीमी आंच पर फ्राय होने दें जब तक नीचे वाला भाग सुनहरे भूरे रंग का और कुरकुरा न हो जाए। अब तैयार डोसे को चटनी के साथ गरमा-गरम परोसें।
खानाखाजना / शौर्यपथ /कब्ज और पेट के हाजमे के लिए बहुत लाभकारी है। इसे बनाने की विधि एकदम सरल है। आइए जानें...
सामग्री :
2 पके पेरू (अमरूद, जाम), आधा चम्मच दाल चीनी पाउडर, आधा चम्मच पिसी हुई काली मिर्च, नमक, काला नमक, पुदीने के पत्ते, शकर (स्वादानुसार)।
विधि :
सबसे पहले अमरूद के अंदर का गुदा निकालकर उसे एक बर्तन में उबाल लें। फिर उसमें सारी सामग्री मिलाकर छान लें।
अब इसे थोड़ा गाढ़ा होने तक पकाएं। फिर सूप बाउल में निकाल लें। ऊपर से पुदीने की दो-तीन पत्ती डालकर गरमा-गरम सर्व करें। यह सूप सेहत के लिए बहुत लाभदायी होता है।
नोट : अगर इसमें पुदीना डाला जाएं तो इसका स्वाद दुगुना हो जाता है।
खाना खजाना / शौर्यपथ /आजकल कई लोगों की पसंद बने हुए हैं मोमोज। खास कर यह बच्चों के पसंदीदा फूड में शामिल है। इस फ्रेंडशिप डे के खास मौके पर आप भी इसे ट्राय कर सकते हैं। इसे आप डिफरेंट तरीके से बनाकर अपने दोस्त को खिलाएंगे तो निश्चित ही उसे बहुत अच्छा लगेगा। आइए पढ़ें तंदूरी मसाला मोमोज बनाने की सरलतम विधि-
सामग्री :
ऑइल 1 टेबलस्पून
बटर 4 टेबलस्पून
मैदा 100 ग्राम
सोयाबीन चंक्स 4 टेबलस्पून
शिमला मिर्च 1
प्याज 1
अदरक छोटा टुकड़ा
लहसुन 8 कलियां
पत्तागोभी
नमक स्वादानुसार
क्रीम 1/2 कप
मैजिक मसाला 1 पैकेट
तंदूरी मसाला 1 टेबलस्पून
रेड कलर 1 पिंच
गार्लिक सॉस
हरी चटनी
सेंकने के लिए कोयला
मोमोज की स्टफिंग :
पत्तागोभी को कद्दूकस कर लें और प्याज व शिमला मिर्च को बारीक काट लें। इसमें सोया चंक्स मिलाएं और स्वादानुसार नमक के साथ मैजिक मसाले का एक पाउच डाल लें।
स्टफिंग को हलका-सा फ्राई कर लें।
क्रीम पेस्ट-
क्रीम के साथ गार्लिक सॉस और हरी चटनी मिला लें।
मोमोज बनाने के लिए-
मैदा छानकर हल्का-सा नमक और ऑइल मिक्स कर लें और गूंथ लें।
मैदे की रोटी बेल लें और बीच में तैयार की गई स्टफिंग रखकर ऊपर की तरफ से पतला फोल्ड कर लें और 10 मिनट के लिए स्टीम कर लें।
तंदूरी टच-
दही में अदरक व लहसुन का पेस्ट, एक पिंच रेड कलर, तंदूरी मसाला, हल्दी डालकर मिक्स कर लें और मोमोज को इसमें अच्छे से कोड कर लें।
मोमोज को 1 घंटे के लिए रख दें ताकि इसमें तंदूरी फ्लेवर आ जाए। कटी शिमला मिर्च, प्याज और मोमोज को स्टिक्स में लगाएं और बटर से ग्रीस कर लें।
थोड़ा-सा कच्चा कोयला जलाकर आंच पर स्टिक्स को रखें।
मोमोज को अच्छे से सिंकने के बाद आप इन्हें क्रीम पेस्ट में डाल लें।
आपके तंदूरी क्रीमी मोमोज तैयार हैं।
नोट : आपके पास यदि कोयला नहीं है तो आप पेन में बटर गर्म करके भी इन्हें हल्की आंच पर सेक सकते हैं।
आस्था / शौर्यपथ /यदि आप मध्यप्रदेश की तीर्थनगरी उज्जैन में पुण्य सलिला शिप्रा तट के निकट स्थित 6ठी शताब्दी ईसा पूर्व में निर्मित 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक बाबा महाकालेश्वर के दर्शन करने जा रहे हैं तो कुछ जरूरी 10 बात अवश्य जान लें।
1. भस्म आरती : कालों के काल महाकाल के यहां प्रतिदिन अलसुबह भस्म आरती होती है। इस आरती की खासियत यह है कि इसमें ताजा मुर्दे की भस्म से भगवान महाकाल का श्रृंगार किया जाता है। इस आरती में शामिल होने के लिए पहले से बुकिंग की जाती है।
2. जूना महाकाल : महाकाल के दर्शन करने के बाद जूना महाकाल के दर्शन जरूर करना चाहिए। यह महाकाल प्रांगण में ही स्थित है।
3. तीन महाकाल विराजमान हैं उज्जैन में : उज्जैन में साढ़े तीन काल विराजमान है- महाकाल, कालभैरव, गढ़कालिका और अर्ध काल भैरव। यदि महाकाल बाबा और जूना महाकाल बाबा के दर्शन कर लिए हैं तो यहां के दर्शन भी जरूर करें।
4. 12 ज्योतिर्लिंगों में सबसे खास : 12 ज्योतिर्लिंगों में से महाकाल ही एकमात्र सर्वोत्तम शिवलिंग है। कहते हैं कि 'आकाशे तारकं लिंगं पाताले हाटकेश्वरम्। भूलोके च महाकालो लिंड्गत्रय नमोस्तु ते।।' अर्थात आकाश में तारक शिवलिंग, पाताल में हाटकेश्वर शिवलिंग तथा पृथ्वी पर महाकालेश्वर ही मान्य शिवलिंग है।
5. महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग के तीन भाग हैं : वर्तमान में जो महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग है, वह 3 खंडों में विभाजित है। निचले खंड में महाकालेश्वर, मध्य खंड में ओंकारेश्वर तथा ऊपरी खंड में श्री नागचन्द्रेश्वर मंदिर स्थित है। नागचन्द्रेश्वर शिवलिंग के दर्शन वर्ष में एक बार नागपंचमी के दिन ही करने दिए जाते हैं।
6. गर्भगृह का दृश्य : गर्भगृह में विराजित भगवान महाकालेश्वर का विशाल दक्षिणमुखी शिवलिंग है। इसी के साथ ही गर्भगृह में माता पार्वती, भगवान गणेश व कार्तिकेय की मोहक प्रतिमाएं हैं। गर्भगृह में नंदी दीप स्थापित है, जो सदैव प्रज्वलित होता रहता है। गर्भगृह के सामने विशाल कक्ष में नंदी की प्रतिमा विराजित है।
7. उज्जैन के राजा : उज्जैन का एक ही राजा है और वह है महाकाल बाबा। विक्रमादित्य के शासन के बाद से यहां कोई भी राजा रात में नहीं रुक सकता। जिसने भी यह दुस्साहस किया है, वह संकटों से घिरकर मारा गया। यदि आप मंत्री या राजा हैं तो यहां रात ना रुकें। वर्तमान में भी कोई भी राजा, मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री आदि यहां रात नहीं रुक सकता।
8. महाकाल की सवारी : उज्जैन के राजा महाकाल बाबा श्रावण मास में प्रति सोमवार नगर भ्रमण करते हैं और अपनी प्रजा को देखते हैं। महाकाल की सवारी में किसी भी प्रकार का नशा करके शामिल नहीं होते हैं। महाशिवरात्रि के दिन समूचा शहर शिवमय हो जाता है। चारों ओर बस शिव जी का ही गुंजन सुनाई देता है। सारा शहर बाराती बन शिवविवाह में शामिल होता है।
9. क्यों कहते हैं महाकाल : काल के दो अर्थ होते हैं- एक समय और दूसरा मृत्यु। महाकाल को 'महाकाल' इसलिए कहा जाता है कि प्राचीन समय में यहीं से संपूर्ण विश्व का मानक समय निर्धारित होता था इसीलिए इस ज्योतिर्लिंग का नाम 'महाकालेश्वर' रखा गया है। हालांकि महाकाल कहने का संबंध पौराणिक मान्यता से भी जुड़ा हुआ है।
10. महाकाल की पौराणिक कथा : पौराणिक कथा के अनुसार इस शिवलिंग की स्थापना राजा चन्द्रसेन और गोप बालक रूप की कथा से जुड़ी है। कथा से हनुमानजी का संबंध भी जुड़ा हुआ है।
आस्था / शौर्यपथ /श्रावण मास में शिवजी के दर्शन करने के दौरान या कावड़िये यात्रा करने के दौरा 'बोल बम बम' के नारे लगाते हुए चलते हैं। आखिर ये 'बम बम भोले' या 'बोल बम बम' क्यों बोलते हैं?
शिवजी तो पर्वत, जंगल और शमशानवासी हैं। वैरागी बनकर वे इधर उधर घूमा करते हैं या किसी पर्वत पर वृक्ष के नीचे ध्यान लगाकर बैठ जाते हैं। उनके गण भी कई प्रकार के हैं कोई भूत प्रेत है तो तोफ पिशाच, कोई तांत्रिक है तो कोई देवता। कहते हैं कि बाबा को प्रसन्न करने के लिए किसी मंत्र, विशेष पूजन या वाद्ययंत्र की जरूरत नहीं पड़ती है। अन्य देवताओं की तरह भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए शंख, नगाड़ा, मृदंग, भेरी, घण्टी आदि वाद्य बजाने की आवश्यकता नहीं है केवल गाल बजाकर 'बम-बम भोले', 'बोल बम-बम' या 'भोलेशंकर' कहकर उन्हें साष्टांग दंडवत करके प्रसन्न किया जा सकता है। इसीलिए वे 'आशुतोष' कहे जाते हैं।
शिवपुराण में अनुसार शिव पूजन के अंत में समस्त सिद्धियों के दाता भगवान शिव को गले की आवाज (मुख वाद्य) से संतुष्ट करना चाहिए। जिसमें 'बोल बम बम' या 'बम बम भोले' बोलना चाहिए।'
एक बार भगवान शिवजी ने माता पार्वती को अपने स्वरूप का ज्ञान कराते हुए कहा था- 'प्रणव (ॐ) ही वेदों का सार और मेरा स्वरूप है। ॐकार मेरे मुख से उत्पन्न होने के कारण मेरे ही स्वरूप को बताता है। यह मन्त्र मेरी आत्मा है। इसका स्मरण करने से मेरा ही स्मरण होता है। मेरे उत्तर की ओर मुख से अकार, पश्चिम की ओर मुख से उकार, दक्षिण के मुख से मकार, पूर्व के मुख से बिन्दु और मध्य के मुख से नाद उत्पन्न हुआ है। इस प्रकार मेरे पांचों मुख से निकले हुए इन सबसे एक अक्षर 'ॐ' बना।'....कहते हैं कि 'बम बम' शब्द प्रणव का ही सरल रूप है इसीलिए 'बम बम' बोलकर शिवजी को प्रसन्न किया जाता है।
आस्था / शौर्यपथ /ध्यानलिंगम् वेलिंगिरि पर्वतमाला की तलहटी में दक्षिण का अनूठा शिव मंदिर इस स्थान पर किसी विशेष विचार, प्रार्थना अथवा पूजा पद्धति का अवलंबन नहीं किया गया है। कोई भी धर्मावलंबी यहां आकर ध्यानलिंग में संचित ऊर्जा को ग्रहण कर सकता है।
उस गहन अंधेरी कंदरा में प्रवेश करते ही सामने एक विशाल शिवलिंग शक्तिपुंज-सा दृष्टिगोचर होता है। नीचे जलराशि में झिलमिलाते दीप एवं खिले कमल मन मंदिर को उल्लास से भर देते हैं। पुष्पों की सुवास से सुरभित पवन, तांबे के स्वर्ण जड़ित पात्र से लिंग पर टप-टप टपकते जल की प्रतिध्वनि एवं दीपों की जल में प्रतिछाया अंतर्मन को असीम शांति प्रदान करती है। इस अलौकिक दृश्य को दर्शनार्थीगण अपलक विस्फारित नेत्रों से ठगे-से देखते रह जाते हैं।
यह वर्णन दक्षिण भारत के मेनचेस्टर कहे जाने वाले नगर कोयम्बटूर से 30 किलोमीटर दूर वेलिंगिरि पर्वतमाला की तलहटी में स्थित एक मंदिर के शिवलिंग का है जिसे 'ध्यानलिंगम्' कहा जाता है। देश में कुछ अत्यंत श्रेष्ठ धार्मिक एवं सांस्कृतिक केंद्रों का निर्माण इन दिनों हुआ है, जो भारत की प्राचीन वास्तुकला के श्रेष्ठ नमूने तो हैं ही, कला की दृष्टि से भी अनुपम हैं।
अहमदाबाद में अक्षरधाम, दिल्ली में लोटस टेम्पल एवं कन्याकुमारी में अरब सागर, बंगाल की खाड़ी एवं हिन्द महासागर के संगम पर निर्मित विवेकानंद स्मारक तो अब सर्वज्ञात हैं ही। ध्यानलिंगम् मंदिर इसी श्रेणी में गिना जा सकता है, जो 1999 में ही लोकार्पित हुआ है।
इस ध्यानलिंगम् के निर्माण की प्रेरणा एक कर्मवीर योगी संत श्री सद्गुरु जग्गी वासुदेव को, जब वे मैसूर स्थित चामुण्डी पहाड़ी की एक शिला पर ध्यानमग्न थे, प्राप्त हुई। इस अनुभूति ने उनके जीवन में हलचल पैदा कर दी और उन्होंने ध्यानलिंग निर्माण करने का संकल्प लिया। ध्यानलिंग के विषय में पुरातन ग्रंथों में गूढ़ विवरण ही था, अतः इस परिकल्पना को साकार करना अत्यंत दुष्कर कार्य था। परंतु संत ने तो ठान ली थी, सो गहन अध्ययन एवं अंतर्ज्ञान ने उन्हें प्रेरित किया कदम आगे बढ़ाने को और फिर उनके साथ इस स्वप्न को साकार करने के लिए जुटने लगे अनेक शिष्य, वास्तुविद्, अभियंता एवं दानी बंधुगण। वेलिंगिरि पर्वतमाला की तलहटी के घने जंगल में स्थान प्राप्त हो गया।
मंदिर के रूपांकन में शास्त्रों के अनुसार ज्यामितीय आकार, परिक्रमा, गर्भगृह, प्रमुख देवता, अन्य देवतागण एवं उपयोग में आने वाली भवन सामग्री का सांगोपांग ध्यान रखा गया। गर्भगृह, जो विशाल डोम के आकार का बनाना तय हुआ, उसमें सीमेंट, कांक्रीट एवं सरियों का उपयोग न करते हुए परंपरागत ईंट, चूना, मिट्टी, रेती, नौसादर एवं विभिन्न जड़ी-बूटियों से निर्मित घोल का उपयोग किया गया। डोम के आकल्पन में भारतीय वास्तुकला के नियम तथा नवीन कम्प्यूटर तकनीक का प्रयोग किया गया। अठारह महीने में डोम बनकर तैयार हुआ तथा इस संपूर्ण परिसर के निर्माण में तीन वर्ष का समय लगा। 24 जून 1999 को संसार के प्रथम 'ध्यानलिंगम्' की स्थापना हुई और 23 नवंबर 1999 को संपूर्ण परिसर लोकार्पित हुआ।
अब चलें परिसर दर्शन को!
सर्वप्रथम प्रवेश करते ही सत्रह फुट ऊंचा सफेद ग्रेनाइट निर्मित 'सर्वधर्मस्तम्भ' है- जिसमें संसार के प्रमुख धर्मों के चिह्न अंकित हैं, जो प्रदर्शित करता है-'यह मंदिर सभी धर्मानुयायियों का स्वागत करता है।' इस स्तम्भ के पीछे मानव शरीर के सात चक्रों को दर्शित किया गया है। आगे बढ़ने पर मंदिर का प्रवेश द्वार मिलता है, जो प्राचीन वास्तुकला का बेजोड़ नमूना है।
प्रवेश करने के लिए तीन अपेक्षाकृत ऊंची सीढ़ियां हैं, जो तम्, रज एवं सत् की प्रतीक हैं। ऊंची इसलिए बनाई गई हैं ताकि सीढ़ियां उतरते समय स्नायुमंडल के भागों पर विशेष जोर पड़े, जिससे तन-मन ध्यानलिंग से प्रसारित ऊर्जा को ग्रहण करने को तैयार हो जाए।
आगे परिक्रमा की ओर बढ़ने पर बायीं ओर योगशास्त्र विज्ञान के पितामह पातंजलि की एवं विशाल शिव कीऊंची, काले ग्रेनाइट की अत्यंत प्रभावशाली प्रतिमा है।
दाहिनी ओर हरे ग्रेनाइट की वनश्री (पीपल वृक्ष) की प्रतिकृति है। देहरी पर सिद्धि अवस्था की प्रतीक छः ध्यानमग्न त्रिकोणाकार प्रतिमाएँ हैं।
अब हम प्रवेश करने को तत्पर हैं उस अद्वितीय कंदरा में जो डोम के आकार की बनी है। इस डोम के निर्माण में अतिविशिष्ट पद्धति अपनाई गई है। इसकी नींव दस फुट गहरी ली गई है। इसकी जमीन से ऊंचाई 33 फुट, व्यास 76 फुट तथा वजन 700 टन है। इस अनुपात से इसकी विशालता का अनुभव किया जा सकता है। इस डोम को छः फुट ऊंची पत्थरों की जुड़ाई पर रखा गया है।
संपूर्ण निर्माण में न सीमेंट का उपयोग हुआ न सरियों का एवं न ही निर्माण हेतु कच्चे ढांचे का। केवल ईंटों एवं ग्रेनाइट पत्थर के शिलाखंडों को विशेष तकनीक से जोड़ा गया है। गर्भगृह में हवा एवं प्रकाश हेतु अट्ठाईस त्रिकोणाकार रोशनदान हैं तथा डोम शीर्ष पर एक स्वर्णपत्र परिवेष्ठित तांबे का लिंगाकार लघु डोम बनाया गया है, जो गर्भगृह के अंदर की गरम हवा को निष्कासित करता है तथा प्रकाश की किरणों का सीधे प्रवेश भी रोकता है। नीचे निर्मित रोशनदान से गर्भगृह में शीतल वायु प्रवेश करती है। अंदर गर्भगृह में दर्शनार्थियों को ध्यान लगाने हेतु 28 आलेनुमा बैठने के स्थान निर्मित किए गए हैं।
अब कन्दरानुमा इस डोम आकार के गर्भगृह में प्रवेश करते हैं, जहां उपर्युक्त शिवलिंग के दर्शन होते हैं। इस अंधेरी कन्दरा में केवल दीपक का ही प्रकाश है। अंदर केंद्र में तेरह फुट नौ इंच ऊंचाई का विशाल काले ग्रेनाइट का शिवलिंग विशेष रूप से रसायनज्ञों द्वारा बनाए गए पारद के आधार पर टिका हुआ है। शिवलिंग को श्वेत ग्रेनाइट से निर्मित, मुंह खोले विश्राम की मुद्रा में एक महानाग सात फेरे में कुन्डली मारकर सुशोभित करता है।
सबसे नीचे जल का घेरा है। इसमें संपूर्ण शिवलिंग तैरता-सा दिखाई देता है। इस जल में छोटे-छोटे कमल खिले हुए हैं और दीपों का झिलमिलाता प्रकाश संपूर्ण परिसर को आलोकित करता रहता है। शिवलिंग मानव शरीर के सात चक्रों के प्रतीक तांबे के सात चमकदार वर्तुलों से घेरा गया है, जो लिंग की शोभा को अत्यंत आकर्षक बनाता है। लिंग के ऊपर स्थित तांबे के स्वर्ण जड़ित पात्र से सतत् शीतल जल द्वारा अभिषेक होता रहता है। इसी संपूर्ण रचना को 'ध्यानलिंगम्' नाम दिया गया है।
ध्यानलिंग प्राचीन भारतीय वास्तुकला को विज्ञानसम्मत आधार देकर निर्मित किया गया है। उसका आकार, रंग समन्वय, परिवेश इत्यादि ऊर्जा को संचित करके अनवरत प्रकाश किरणों के समान मानवमात्र के तन-मन को प्रभावित करते रहते हैं। अतः इस स्थान पर किसी विशेष विचार, प्रार्थना अथवा पूजा पद्धति का अवलंबन नहीं किया गया है। कोई भी धर्मावलंबी यहां आकर ध्यानलिंग में संचित ऊर्जा को ग्रहण कर सकता है। केवल गुरु-शिष्य का भाव आवश्यक है। ध्यानलिंग को मन में गुरु स्थान पर प्रतिष्ठित कर कुछ क्षण अपलक दर्शन एवं फिर नेत्र बंद कर नियत स्थान पर बैठना यही पर्याप्त है।
इस मंदिर में एक और आश्चर्यजनक विशेषता है- यहां कोई स्तुति, कोई आरती अथवा कर्मकांड नहीं होता है। प्रतिदिन मध्याह्न 11.50 से 12.10 एवं सायंकाल 5.50 से 6.00 बजे तक 20 मिनट के लिए मानवमात्र की भाषा अर्थात् ध्वनि का आलाप होता है, जिसे 'नाद आराधना' कहा जाता है। जल तरंग एवं अन्य वाद्यों द्वारा सुमधुर नाद निकाला जाता है। एक ब्रह्मचारी एवं एक ब्रह्मचारिणी द्वारा अत्यंत मधुर कंठ से निकाला गया आलाप उपस्थितजनों को स्वर्गिक आनंद की अनुभूति कराता है। दर्शनार्थियों को इस 'नाद आराधना' के समय अवश्य उपस्थित रहकर नादब्रह्म को हृदयंगम करना चाहिए। मंदिर परिसर प्रातः 6 बजे से रात्रि 8 बजे तक दर्शनार्थियों के लिए खुला रहता है।
Feb 09, 2021 Rate: 4.00
