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व्रत त्यौहार / शौर्यपथ / नवरात्रि में व्रत रखने के दौरान कई बार ऐसा होता है कि शरीर में कमजोरी हो जाती है जिसकी वजह से कभी-कभी चक्कर भी आने लगते हैं। ऐसे में बहुत जरूरी है कि अपने शरीर का भी ध्यान रखा जाए। आज हम आपको व्रत की ऐसी ही हेल्दी रेसिपी बता रहे हैं, जिसे व्रत के दौरान खाने से आपको कमजोरी और ज्यादा भूख भी नहीं लगेगी। रोजाना एक लड्डू के सेवन करने से आपकी इम्युनिटी भी बढ़ेगी।
सिंघाड़े के आटे के फायदे
सिंघाड़े में प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, विटामिन बी व सी, आयरन, कैल्शियम, मैग्नीशियम, फॉस्फोरस जैसे मिनरल्स, रायबोफ्लेबिन जैसे तत्व पर्याप्त मात्रा में मिलते हैं। आयुर्वेद में कहा गया है कि सिंघाड़े में भैंस के दूध की तुलना में 22 प्रतिशत अधिक खनिज लवण और क्षार तत्व पाए जाते हैं। वैज्ञानिकों ने तो अमृत तुल्य बताते हुए इसे ताकतवर और पौष्टिक तत्वों का खजाना बताया है। इस फल में कई औषधीय गुण हैं, जिनसे शुगर, अल्सर, हृदय रोग, गठिया जैसे रोगों से बचाव हो सकता है। बुजुर्गों व गर्भवती महिलाओं के लिए तो यह काफी गुणकारी है।
सामग्री :
सिंघाड़े का आटा
गुड़
सोंठ पाउडर
देसी घी
काजू-बादाम
विधि :
सबसे पहले सिंघाड़े के आटे को छान लीजिए। अगर सिंघाड़े का आटा थोड़ा मोटा रहेगा तो लड्डू सोंधे बनेंगे।
गुड़ को अच्छी तरह से फोड़ लीजिए। गुड़ में एक भी गांठ नहीं रहनी चाहिए।
कटे हुए मेवे को तवे पर हल्का सा भून लीजिए।
कड़ाही में करीब 150 ग्राम घी गर्म कर लीजिए। आपका करीब 100 ग्राम घी बचा रहेगा, इसका बाद में इस्तेमाल करेंगे।
गैस की आंच मीडियम करके सिंघाड़े के आटे को अच्छी तरह से भून लीजिए। जब आटे से सोंधी खुशबू आने लगे और ये गुलाबी हो जाए तो समझिए की ये भून गया है।अब पिटे हुए गुड़ के ऊपर गरम-गरम सिंघाड़े के आटे को इस तरह से डालिए कि गुड़ पूरी तरह से ढक जाए। आटे की गर्मी से गुड़ नरम हो जाएगा और सिंघाड़े का लड्डू बनाने में आसानी होगी।आटे के ऊपर अब सोंठ, घी और मेवे डालकर चम्मच की मदद से अच्छी तरह मिला लीजिए। ध्यान रहे कि मिश्रण ठंडा होने से पहले ही आप इसे मिला लें।
जब मिश्रण इतना गरम रह जाए कि आप इसे हाथ से छू सकें, तब इसे एक बार हाथ से भी अच्छी तरह मिक्स कर लीजिए।
अब आपको फटाफट लड्डू बनाना है क्योंकि अगर मिश्रण ठंडा हो गया तो लड्डू बनाना मुश्किल हो जाएगा।
दोनों हाथ से लड्डू बनाने की कोशिश करें इससे ये मिश्रण के गर्म रहते ही बन जाएंगे।
आस्था /शौर्यपथ / शारदीय नवरात्र के दूसरे दिन देवी ब्रह्मचारिणी की पूजा करने का विधान है। शास्त्रों में इन्हें संयम की देवी कहा जाता है। मां ब्रह्मचारिणी की पूजा करने से व्यक्ति को तप, त्याग, वैराग्य, सदाचार, संयम की प्राप्ति होती है। मां ब्रह्मचारिणी के दाहिने हाथ में अक्ष माला और बाएं हाथ में कमंडल है।
बह्मचारिणी पड़ने का कारण
शास्त्रों के अनुसार, मां दुर्गा ने पार्वती के रूप में पर्वतराज के घर पुत्री के रूप में जन्म लिया और नारद के कहने पर पार्वती ने शिव को पति मानकर उन्हें पाने के लिए निर्जल और निराहार कठोर तपस्या की। हजारों सालों तक तपस्या करने के बाद इनका नाम तपश्चारिणी या ब्रह्मचारिणी पड़ा। नवरात्र के दूसरे दिन को इसी तप को प्रतीक के रूप में पूजा जाता है।
इस देवी की कथा का सार यह है कि जीवन के कठिन संघर्षों में भी मन विचलित नहीं होना चाहिए। मां ब्रह्मचारिणी की पूजा करके आप अपने जीवन में धन-समृद्धि, खुशहाली ला सकते है।
ऐसे करें मां ब्रह्मचारिणी की पूजा
मान्यताओं के अनुसार सबसे पहले जिन देवी-देवताओ एवं गणों व योगिनियों को आपने कलश में आमंत्रित किया है। उन्हें पंचामृत स्नान दूध, दही, घृत, मेवे और शहद से स्नान कराएं। इसके बाद इन पर फूल, अक्षत, रोली, चंदन का भोग लगाएं। इसके बाद पान, सुपारी और कुछ दक्षिणा रखकर पंडित को दान करें। इसके बाद अपने हाथों में एक फूल लेकर प्रार्थना करते हुए बार-बार मंत्र का उच्चारण करें। इसके बाद मां ब्रह्मचारिणी को सिर्फ लाल रंग का ही फूल चढ़ाए साथ ही कमल से बना हुआ ही माला पहनाएं। मां को चीनी का भोग लगाएं। ऐसा करने से मां जल्द ही प्रसन्न होती है। इसके बाद भगवान शिव जी की पूजा करें और फिर ब्रह्मा जी के नाम से जल, फूल, अक्षत आदि हाथ में लेकर “ऊं ब्रह्मणे नम:” कहते हुए इसे भूमि पर रखें।
करें इन मंत्रों का जाप
अगर आप भी किसी कार्य में अपनी जीत सुनिश्चित करना चाहते हैं, तो आज के दिन आपको देवी ब्रह्मचारिणी के इस मंत्र का जाप जरूर करना चाहिए। देवी ब्रह्मचारिणी का मंत्र इस प्रकार है - 'ऊं ऐं ह्रीं क्लीं ब्रह्मचारिण्यै नम:।' आज के दिन आपको इस मंत्र का कम से कम एक माला, यानी 108 बार जाप करना चाहिए। इससे विभिन्न कार्यों में आपकी जीत सुनिश्चित होगी।
ब्रह्मचारिणी देवी का मंत्र
देवी ब्रह्मचारिणी की पूजा करते समय हाथों में एक लाल फूल लेकर देवी का ध्यान करें और हाथ जोड़ते हुए प्रार्थना करते हुए मंत्र का उच्चारण करें।
श्लोक
दधाना करपद्माभ्यामक्षमालाकमण्डलु| देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा ||
ध्यान मंत्र
वन्दे वांछित लाभायचन्द्रार्घकृतशेखराम्।
जपमालाकमण्डलु धराब्रह्मचारिणी शुभाम्॥
गौरवर्णा स्वाधिष्ठानस्थिता द्वितीय दुर्गा त्रिनेत्राम।
धवल परिधाना ब्रह्मरूपा पुष्पालंकार भूषिताम्॥
परम वंदना पल्लवराधरां कांत कपोला पीन।
पयोधराम् कमनीया लावणयं स्मेरमुखी निम्ननाभि नितम्बनीम्॥
शौर्यपथ / पिछले एक साल से दुनिया भर के वैज्ञानिक कोविड-19 को लेकर कई अध्ययन कर चुके हैं। बावजूद इसके कोरोनावायरस नाम की यह महामारी रोजाना हजारों लोगों को अपना शिकार बना रही है। कोविड महामारी ने पूरी दुनिया को अपनी चपेट में ले लिया है।
भारत में भी एक बार फिर कोविड-19 के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। इस महामारी से निजात पाने के लिए वैज्ञानिक भी आए दिन अध्ययन करते रहते हैं। हाल ही में कोरोना को लेकर एक और अध्ययन किया गया है। इस अध्ययन में दावा किया गया है कि सूरज की रोशनी में अधिक समय बिताने, खासकर अल्ट्रावायलेट किरण के संपर्क में आने से कोविड-19 से होने वाली मौतों को कम किया जा सकता है।
ब्रिटेन में एडिनबर्ग विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं की मानें तो सूरज की रोशनी के संपर्क में ज्यादा देर रहने से मृत्यु दर में कमी और सामान्य लोक स्वास्थ्य को बनाए रखने में मदद मिल सकती है।
ब्रिटिश जर्नल ऑफ डर्माटोलोजी में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार अमेरिकी महाद्वीप में जनवरी से अप्रैल 2020 के बीच होने वाली मौतों के साथ अल्ट्रावायलेट स्तर की तुलना की गई। इस अध्ययन के दौरान टीम ने पाया कि ऐसे इलाके जहां अल्ट्रावायलेट किरणों के संपर्क में लोग अधिक थे, वहां कोविड-19 से मरने वाले लोगों की संख्या कम थी। इंग्लैंड और इटली में हुए अध्ययन में भी शोधकर्ताओं को कुछ इस तरह के नतीजे ही देखने को मिले।
व्रत त्यौहार /शौर्यपथ / चैत्र नवरात्रि के पहले दिन मां शैलपुत्री की पूजा की जाती है। मां शैलपुत्री को नव दुर्गा में प्रथम दुर्गा माना गया है। मां शैलपुत्री को प्रसाद में गाय का घी अथवा उससे बने पदार्थों का भोग लगाया जाता है। माना जाता है कि मां दुर्गा को गाय के घी से बनी चीजें अधिक प्रिय है। इसका भोग प्रसाद में लगाने से मां भक्तों पर खुश होकर उनकी सभी इच्छाएं पूरी करती हैं। तो देर किस बात की आइए जानते हैं मां शैलपुत्री को प्रसन्न करने के लिए कैसे बनाएं बादाम का हलवा।
बादाम का हलवा बनाने के लिए सामग्री-
-250 बादाम
-13 टेबल स्पून देसी घी
-10 टेबल स्पून चीनी
बादाम का हलवा बनाने की विधि-
बादाम का हलवा बनाने के लिए सबसे पहले गर्म पानी में बादाम हो हल्का से उबालकर उन्हें छील लें। इसके बाद बादाम का पेस्ट बनाने के लिए इन्हें ब्लेंडर में डालकर उनका दरदरा पेस्ट बना लें। अब एक पैन में देसी घी गर्म करके इसमें बादाम का पेस्ट डालें। इसमें चीनी डालें और धीमी आंच पर गोल्डन ब्राउन होने तक भूनें। आपका बादाम का हलवा बनकर तैयार है, इसे कटे हुए बादाम से गार्निश करें।
खाना खजाना /शौर्यपथ / नवरात्रि के दौरान फलाहार में सबसे ज्यादा आलू का सेवन किया जाता है। अगर आप हर नवरात्रि आलू की सब्जी खाकर बोर हो गए हैं तो इस बार ट्राई करें आलू का चीला। यह चीला खाने में जितना टेस्टी होता है, बनने में उतना ही आसान भी है। तो देर किस बात की आइए जान लेते हैं क्या है इस चटपटे चीले को बनाने की आसान रेसिपी।
आलू का चीला बनाने के लिए सामग्री-
-2-3 कच्चे आलू कद्दूकस किए हुए
-2 हरी मिर्च
-बारीक कटा हुआ हरा धनिया
-¼ छोटा चम्मच काली मिर्च पाउडर
-1 बड़ा चम्मच देसी घी
-सेंधा नमक स्वादानुसार
आलू का चीला बनाने का तरीका-
आलू का चीला बनाने के लिए सबसे पहले एक बाउल में कद्दूकस किया हुआ आलू, हरी मिर्च, धनिया पत्ती, काली मिर्च पाउडर और नमक डालकर अच्छी तरह मिला लें। अब तवे को गर्म करके उसमें 1 चम्मच देसी घी डालें। इसके बाद गर्म तवे में आलू का मिश्रण डालकर चम्मच की मदद से तवे पर ½ सेमी मोटाई के साथ मिश्रण को गोल आकार में फैलाएं। वरना चीला टूट सकता है। अब चीले को दोनों तरफ से गोल्डन ब्राउन होने तक पकाएं। आपका आलू का चीला बनकर तैयार है। इस फलाहारी चीले को व्रत की चटनी या दही के साथ सर्व कर सकते हैं।
टिप्स ट्रिक्स /शौर्यपथ / आपका घर और दुकान कितना ही सुंदर क्यों नहीं बना हो लेकिन वास्तु दोष होने से सुख और समृद्धि नहीं होती है। इसलिए दुकान में वास्तु का जरूर ध्यान रखना चाहिए। ताकि काम में किसी तरह की रूकावट पैदा नहीं हो। साथ ही लक्ष्मी जी भी अप्रसन्न नहीं हो। दुकान जहां से आप अपना जीवन जीते हैं और अगर वहीं पर ही दोष हो तो वृद्धि रूक जाती है।
इसलिए आइए जानते हैं कुछ बातें जिससे दुकान की बरकत होती रहे-
1. अगर आपकी दुकान के सामने कोई पेड़ या खंबा लगा हो तो उसे हटवा दीजिए। हालांकि ऐसा संभव नहीं होता है। इस जगह पर अपने मुख्य द्वार पर हर दिन फूल लगाकर स्वास्तिक बनाएं।
2. दुकान में पूर्व-उत्तर ईशान कोण का अधिक महत्व होता है। इसलिए उस जगह पर विशेष साफ-सफाई का ध्यान रखें।
3. ऐसा कहा जाता है दुकान में सीढ़िया होना शुभ नहीं है। ऐसा होता है तो आप सीढ़ी के नीचे विंड चाइम लगा दीजिए।
4. दुकान में भगवान जी का मंदिर जरूर होना चाहिए। इससे दुकान की बरकत होती है। कोशिश रहे हर दिन सुबह-शाम दिया बत्ती की जाए।
5. कई बार सबकुछ अच्छा होने के बाद भी आमदानी नहीं होती है। ऐसे वक्त में अपने तिजौरी या गुल्लक में मां लक्ष्मी जी की मूर्ति जरूर रखें। मूर्ति नहीं है तो आप सोने या चांदी के सिक्के भी रख सकते हैं।
आस्था /शौर्यपथ / माता कालिका के अनेक रूप हैं जिनमें से प्रमुख है- 1.दक्षिणा काली, 2.शमशान काली, 3.मातृ काली और 4.महाकाली। इसके अलावा श्यामा काली, गुह्य काली, अष्ट काली और भद्रकाली आदि अनेक रूप भी है। सभी रूपों की अलग अलग पूजा और उपासना पद्धतियां हैं। आओ जानते हैं भद्रकाली काली क्या है और क्या है उनका मंत्र।
1. भद्रकाली का शाब्दिक अर्थ है अच्छी काली, जिनकी पूजा मुख्यतः दक्षिण भारत में होती है।
2. भद्रकाली मां काली का शांत स्वरूप है। इस रूप में मां काली शांत हैं और वर देती हैं।
3. महाभारत शान्ति पर्व के अनुसार यह पार्वती के कोप से उत्पन्न दक्ष के यज्ञ की विध्वंसक देवी हैं।
4. ॐ जयंती मंगला काली भद्रकाली कपालिनी
दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तुते।
भद्रं मंगलं सुखं वा कलयति स्वीकरोति भक्तेभ्योदातुम् इति भद्रकाली सुखप्रदा- जो अपने भक्तों को देने के लिए ही भद्र सुख या मंगल स्वीकार करती है, वह भद्रकाली है।
5. नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नम:।नम: प्रकृत्यै भद्रायै नियता: प्रणता: स्मताम्।।
ॐ काली महा काली भद्रकाली कपालिनी दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोस्तुते
देवी को नमस्कार है, महादेवी को नमस्कार है। महादेवी शिवा को सर्वदा नमस्कार है। प्रकृति एवं भद्रा को मेरा प्रणाम है। हम लोग नियमपूर्वक जगदम्बा को नमस्कार करते हैं।
6. सावित्री पीठ कुरुक्षेत्र शक्तिपीठ : हरियाणा के कुरुक्षेत्र में माता की एड़ी (गुल्फ) गिरी थी। इसकी शक्ति है सावित्री और भैरव है स्थाणु। देविकूप भद्रकाली मंदिर को सावित्री पीठ, देवी पीठ, कालिका पीठ या आदी पीठ भी कहा जाता है। कुरुक्षेत्र में महाभारत युद्ध के पहले श्रीकृष्ण के कहने पर अर्जुन ने यहां माता की आराधना की थी।
इस पीठ में भद्रकाली विराजमान है और गणों के रूप में दक्षिणमुखी हनुमान, गणेश तथा भैरव विद्यमान हैं। यहीं स्थाणु शिव का अद्भुत शिवलिंग भी है, जिसमें प्राकृतिक रूप से ललाट, तिलक एवं सर्प अंकित हैं। यह शक्तिपीठ हरियाणा के कुरुक्षेत्र जंक्शन तथा थानेश्वर रेलवे स्टेशन के दोनों ओर से 4 किलोमीटर दूर झांसी मार्ग पर, द्वैपायन सरोवर के पास स्थित है।
इसके अलााव तीन सागरों के संगम-स्थल पर स्थित 'कन्याकुमारी शक्तिपीठ' के मंदिर में ही भद्रकाली का मंदिर है।
शौर्यपथ / आलू अधिकांश भारतीय घरों में खानपान का अभिन्न हिस्सा है। हम में से अधिकांश लोग आलू का किसी न किसी रुप में सेवन करते हैं। सच कहें, तो आलू के बिना खाने की कल्पना करना मुश्किल है। अधिकांश सब्जियों में आलू का इस्तेमाल होता है। आलू से अलग-अलग तरह की चीजें बनती हैं।
लेकिन कुछ लोग अब आलू का सेवन करने से कतराने लगे हैं। ऐसा माना जाने लगा है कि आलू का सेवन स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होता है और यह कई स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के जोखिम को बढ़ाता है। यही कारण है कि लोग इसे पूरी तरह से अपने आहार में काटने पर विचार करने लगे हैं। लेकिन क्या वाकई आलू को अपने आहार से हटाना आपके लिए फायदेमंद हो सकता है? खैर, हम ऐसा नहीं मानते हैं, क्योंकि आलू पोषक तत्वों का भंडार है और कई स्वास्थ्य लाभ प्रदान करता है।
ऐसे में यदि आप अपने आहार में से आलू का पूरी तरह से बहिष्कार करने पर विचार कर रही हैं, तो ऐसा न करने के लिए हम यहां आपको आलू के 6 स्वास्थ्य लाभ बता रहे हैं।
यहां जानिए आलू के 6 स्वास्थ्य लाभ
1. पोषक तत्वों से भरपूर है
आलू कई विटामिन और खनिजों का एक बेहतरीन स्रोत है। आलू में प्रोटीन, फाइबर, विटामिन सी, विटामिन बी 6, पोटेशियम, मैग्नीशियम, मैंगनीज, फास्फोरस, नियासिन और फोलेट जैसे कई विटामिन और मिनरल्स भरपूर मात्रा में होते हैं।
हालांकि, आलू की पोषण सामग्री विविधता के आधार पर भिन्न हो सकती है। साथ ही उन्हें कैसे तैयार किया जाता है। उदाहरण के लिए, आलू को तलने से उन्हें पकाने से अधिक कैलोरी और वसा मिलती है।
यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि आलू की त्वचा में विटामिन और मिनरल की एक बड़ी मात्रा होती है। आलू का छिलका उतारने से उनकी पोषण सामग्री काफी कम हो जाती है।
2. आलू में एंटीऑक्सीडेंट होते हैं
आलू फ्लेवोनोइड्स, करॉटिनाइड्स और फेनोलिक एसिड जैसे यौगिकों में समृद्ध हैं। ये यौगिक फ्री रेडिकल्स के संभावित हानिकारक अणुओं को बेअसर करके शरीर में एंटीऑक्सीडेंट के रूप में कार्य करते हैं। जब फ्री रेडिकल्स जमा होते हैं, तो वे हृदय रोग, मधुमेह और कैंसर जैसी पुरानी बीमारियों के जोखिम को बढ़ा सकते हैं।
उदाहरण के लिए, एक टेस्ट-ट्यूब अध्ययन में पाया गया कि आलू में मौजूद एंटीऑक्सीडेंट लीवर और कोलन कैंसर कोशिकाओं के विकास को दबा सकते हैं।
अध्ययन में यह भी पाया गया है कि बैंगनी आलू जैसे रंगीन आलू में सफेद आलू की तुलना में तीन से चार गुना अधिक एंटीऑक्सीडेंट होते हैं। यह उन्हें फ्री रेडिकल्स को बेअसर करने में संभावित रूप से अधिक प्रभावी बनाता है।
3. ब्लड शुगर कंट्रोल में सुधार हो सकता है
आलू में एक विशेष प्रकार का स्टार्च होता है, जिसे प्रतिरोधी स्टार्च (resistant starch) के रूप में जाना जाता है। यह स्टार्च टूट कर पूरी तरह से शरीर द्वारा अवशोषित नहीं होता है। इसके बजाय, यह बड़ी आंत में पहुंचता है, जहां यह आपकी आंत में फायदेमंद बैक्टीरिया के लिए पोषक तत्वों का स्रोत बन जाता है।
शोध ने प्रतिरोधी स्टार्च को इंसुलिन प्रतिरोध को कम करने सहित कई स्वास्थ्य लाभों के साथ जोड़ा है, जो बदले में ब्लड शुगर कंट्रोल में सुधार करता है।
टाइप 2 मधुमेह वाले लोगों के एक अध्ययन में पाया गया कि प्रतिरोधी स्टार्च वाले भोजन का सेवन भोजन के बाद अतिरिक्त ब्लड शुगर को हटाने में मदद करता है।
4. पाचन स्वास्थ्य में सुधार कर सकता है
आलू में मौजूद प्रतिरोधी स्टार्च पाचन स्वास्थ्य में भी सुधार कर सकता है। जब प्रतिरोधी स्टार्च बड़ी आंत में पहुंचता है, तो यह फायदेमंद आंत के बैक्टीरिया के लिए एक अच्छा भोजन बन जाता है। ये बैक्टीरिया इसे पचाते हैं और इसे शॉर्ट-चेन फैटी एसिड (short-chain fatty acids) में बदल देते हैं।
आलू से प्रतिरोधी स्टार्च ज्यादातर शॉर्ट-चेन फैटी एसिड बूटिरेट में बदल जाता है। जो कि आंत के बैक्टीरिया के लिए पसंदीदा खाद्य स्रोत है।
अध्ययनों से पता चला है कि बुटीरेट कोलन में सूजन को कम कर सकता है। कोलन के बचाव को मजबूत कर सकता है और कोलोरेक्टल कैंसर के जोखिम को कम कर सकता है।
5. प्राकृतिक रूप से ग्लूटेन-फ्री है
ग्लूटेन-फ्री आहार दुनिया भर में सबसे लोकप्रिय आहारों में से एक है। इसमें ग्लूटेन को खत्म करना शामिल है, जो कि अनाज में पाए जाने वाले प्रोटीन का एक परिवार है जैसे कि स्पेल्ट, गेहूं, जौ और राई।
यदि आप एक ग्लूटेन-फ्री आहार का पालन करते हैं, तो आपको अपने आहार में आलू को शामिल करने पर विचार करना चाहिए। वे स्वाभाविक रूप से ग्लूटेन-फ्री हैं। जिसका अर्थ है कि वे असुविधाजनक लक्षणों को ट्रिगर नहीं करते हैं।
6. अविश्वसनीय रूप से पेट भरने वाले हैं
पोषक तत्वों से भरपूर होने के अलावा, आलू अविश्वसनीय रूप से पेट भरने वाले भी हैं। एक अध्ययन में, 11 लोगों को 38 आम खाद्य पदार्थ खिलाए गए थे। उन्हें खाद्य पदार्थों को रेट (rate) करने के लिए कहा गया था कि वे कैसे पेट भरते हैं। आलू को उन सभी की सर्वोच्च परिपूर्णता रेटिंग प्राप्त हुई।
आलू को क्रोइसैन्ट से सात गुना अधिक पेट भरने वाले भोजन के रूप में रेट किया गया था। जिसे कम से कम पेट भरने वाले खाद्य पदार्थ के रूप में रैंक किया गया था।
सेहत /शौर्यपथ / गर्मियों में सत्तू का सेवन न सिर्फ आपकी सेहत का ध्यान रखता है बल्कि आपको दिनभर तरोताजा बनाए रखने में भी मदद करता है। आइए जानते हैं गर्मियों में लू और डिहाइड्रेशन से बचने के लिए कैसे बनाए सत्तू।
सत्तू का शरबत बनाने के लिए सामग्री-
-चने का सत्तू - आधा कप
-पुदीना के पत्ते - 10
-नींबू का रस- 2 चम्मच
-हरी मिर्च - आधी
-भुना जीरा - आधा छोटी चम्मच
-काला नमक - स्वादानुसार या आधा छोटी चम्मच
-नमक - एक चौथाई चम्मच या स्वादानुसार
सत्तू का नमकीन शरबत बनाने की विधि-
सत्तू का नमकीन शरबत बनाने के लिए सबसे पहले पुदीना के पत्ते धोकर बारीक काट लें। हरी मिर्च को भी बारीक काटकर रख लें। इसके बाद सत्तू में थोड़ा सा ठंडा पानी डालकर उसे गुठलियां खत्म होने तक घोल लें। अब घोल में 1 कप पानी डालकर उसमें काला नमक, सादा नमक, हरी मिर्च, पुदीना की पत्तियां, नींबू का रस और भुना जीरा पाउडर डालकर मिलाएं। आपका सत्तू का नमकीन शर्बत तैयार है। आप इसे एक गिलास में डालकर पुदीना की साबुत पत्तियों को साथ गार्निश करें। सत्तू को ठंडा करने के लिए आप इसमें 3-4 बर्फ के टुकड़े तोड़कर डाल दें। गर्मियों में रोजाना 1 -2 गिलास सत्तू पीने से आप गर्मी और लू से बचे रहते हैं।
सत्तू पीने के फायदे-
-सत्तू में मौजूद फाइबर, कार्बोहाईड्रेट, प्रोटीन, स्टार्च जैसे पोषक तत्व गर्मियों में पेट की बीमारियां होने से बचाता है। सत्तू पीने से पेट और शरीर को ठंडा रखा जा सकता है।
-सत्तू में मौजूद मिनरल्स जैसे आयरन, मैग्नीशियम और फॉस्फोरस आदि शरीर को तुरंत एनर्जी देने का काम कर सकते हैं।
-सत्तू की तासीर ठंडी होने की वजह से गर्मियों में इसका सेवन करने से लू और डिहाइड्रेशन की समस्या नहीं होती।
-सत्तू में मौजूद फाइबर की अच्छी मात्रा आपके पेट को लंबे समय तक भरा हुआ होने का एहसास कराती है। सत्तू को डाइट में शामिल करके आप बड़ी आसानी से अपना वजन कम कर सकते हैं।
-सत्तू एक लो-ग्लाइसेमिक इंडेक्स वाला शरबत है जो डायबिटीज रोगियों के लिए काफी फायदेमंद हो सकता है। इससे ब्लड शुगर लेवल को भी कंट्रोल किया जा सकता है।
सेहत /शौर्यपथ / मौसम कोई भी हो लेकिन उसके बदलते ही व्यक्ति का इम्यून सिस्टम कमजोर होने लगता है। ऐसे में थोड़ी सी भी लापरवाही व्यक्ति की सेहत को परेशानी में डाल सकती है। फिलहाल गर्मियों का मौसम शुरू हो चुका है और यह अपने साथ धूप, तेज तापमान के साथ कई अन्य बीमारियां भी लेकर आता है। जिनकी अनदेखी करने पर आप परेशान हो सकते हैं। तो आइए जानते हैं आखिर क्या हैं ये बीमारियां।
डिहाइड्रेशन - डिहाइड्रेशन को निर्जलीकरण के नाम से भी पहचाना जाता है। इससे पीड़ित व्यक्ति के शरीर में पानी, शुगर और नमक के संतुलन में गड़बड़ी हो जाती है। डिहाइड्रेशन के दौरान व्यक्ति का मुंह सूखता है, थकान, प्यास का बढ़ना, पेशाब कम होना, सिर दर्द, रूखी त्वचा, कब्ज, और चक्कर आने जैसे लक्षण दिखाई देते हैं। हालत गंभीर होने पर व्यक्ति को प्यास अधिक लगती है और हार्ट रेट बढ़ने के साथ ब्लड प्रेशर लो हो जाता है। इस समस्या से बचने के लिए व्यक्ति को अधिक से अधिक मात्रा में पानी पीना चाहिए। इसके अलावा नींबू पानी, नारियल पानी, शिकंजी या अन्य तरल पदार्थों को अपनी रोजाना डाइट का हिस्सा बनाना चाहिए।
घमौरी- घमौरी होने पर शरीर पर छोटे-छोटे लाल दरदरे दाने हो जाते हैं। इसमें बहुत ज्यादा खुजली होने लगती है।घमौरी अक्सर उमस, ह्यूमिडिटी और ज्यादा टाइट कपड़ों के पहनने की वजह से होती है। इसके अलावा घमौरी शरीर पर कपड़े की घर्षण या कपड़े से ढकी त्वचा पर भी होती है। घमौरी से बचने के लिए गर्मियों में ज्यादातर सूती के कपड़े पहनें, ऐसा करने से आपकी त्वचा सांस ले पाती है। नहाने के बाद एकदम कपड़े पहननें की जगह पहले अपने शरीर को अच्छी तरह सूखा लें।
फूड पॉइजनिंग- गर्मी के मौसम में हवा में ह्यूमिडिटी होने की वजह से बैक्टीरिया, वायरस और फंगस तेजी से बढ़ते हैं। जो भोजन को जल्दी दूषित कर देते हैं। ऐसा भोजन करने से व्यक्ति को फूड पॉइजनिंग की समस्या हो सकती है। जिसकी वजह से पेट में दर्द, बुखार, बार-बार उल्टी, सिरदर्द, कमजोरी, दस्त भूख कम लगना, पेशाब में जलन या पेशाब न आना, मुंह सूखना आदि लक्षण नजर आ सकते हैं। इससे बचने के लिए हमेशा अपने हाथ-मुंह धोकर सब्जी हो या फल उन्हें भी धोकर खाएं। बासी, पुराना और बाहर का खाना खाने से बचें।
व्रत त्यौहार /शौर्यपथ / संपूर्ण विश्व में मात्र भारत को ही यह सौभाग्य एवं गौरव प्राप्त रहा है कि यहां का समाज साधु-संतों के बताए मार्ग पर चलता आया है। भारतीय धर्मग्रंथों में कहा गया है कि जब-जब अत्याचार बढ़े हैं, नैतिक मूल्यों का क्षरण हुआ है तथा आसुरी प्रवृत्तियां हावी हुई हैं, तब-तब किसी न किसी रूप में ईश्वर ने अवतार लेकर धर्मपरायण प्रजा की रक्षा की।
ऐसी ही एक कथा भगवान झूलेलालजी के अवतरण की है। शताब्दियों पूर्व सिन्धु प्रदेश में मिर्ख शाह नाम का एक राजा राज करता था। राजा बहुत दंभी तथा असहिष्णु प्रकृति का था। सदैव अपनी प्रजा पर अत्याचार करता था। इस राजा के शासनकाल में सांस्कृतिक और जीवन-मूल्यों का कोई महत्व नहीं था। पूरा सिन्धु प्रदेश राजा के अत्याचारों से त्रस्त था। उन्हें कोई ऐसा मार्ग नहीं मिल रहा था जिससे वे इस क्रूर शासक के अत्याचारों से मुक्ति पा सकें।
लोककथाओं में यह बात लंबे समय से प्रचलित है कि मिर्ख शाह के आतंक ने जब जनता को मानसिक यंत्रणा दी तो जनता ने ईश्वर की शरण ली। सिन्धु नदी के तट पर ईश्वर का स्मरण किया तथा वरुण देव उदेरोलाल ने जलपति के रूप में मत्स्य पर सवार होकर दर्शन दिए। तभी नामवाणी हुई कि अवतार होगा एवं नसरपुर के ठाकुर भाई रतनराय के घर माता देवकी की कोख से उपजा बालक सभी की मनोकामना पूर्ण करेगा।
समय ने करवट ली और नसरपुर के ठाकुर रतनराय के घर माता देवकी ने चैत्र शुक्ल 2 संवत् 1007 को बालक को जन्म दिया एवं बालक का नाम उदयचंद रखा गया। इस चमत्कारिक बालक के जन्म का हाल जब मिर्ख शाह को पता चला तो उसने अपना अंत मानकर इस बालक को समाप्त करवाने की योजना बनाई। बादशाह के सेनापति दल-बल के साथ रतनराय के यहां पहुंचे और बालक के अपहरण का प्रयास किया, लेकिन मिर्ख शाह की फौजी ताकत पंगु हो गई। उन्हें उदेरोलाल सिंहासन पर आसीन दिव्य पुरुष दिखाई दिया। सेनापतियों ने बादशाह को सब हकीकत बयान की।
उदेरोलाल ने किशोर अवस्था में ही अपना चमत्कारी पराक्रम दिखाकर जनता को ढांढस बंधाया और यौवन में प्रवेश करते ही जनता से कहा कि बेखौफ अपना काम करें। उदेरोलाल ने बादशाह को संदेश भेजा कि शांति ही परम सत्य है। इसे चुनौती मान बादशाह ने उदेरोलाल पर आक्रमण कर दिया। बादशाह का दर्प चूर-चूर हुआ और पराजय झेलकर उदेरोलाल के चरणों में स्थान मांगा। उदेरोलाल ने सर्वधर्म समभाव का संदेश दिया। इसका असर यह हुआ कि मिर्ख शाह उदयचंद का परम शिष्य बनकर उनके विचारों के प्रचार में जुट गया।
उपासक भगवान झूलेलालजी को उदेरोलाल, घोड़ेवारो, जिन्दपीर, लालसांईं, पल्लेवारो, ज्योतिनवारो, अमरलाल आदि नामों से पूजते हैं। सिन्धु घाटी सभ्यता के निवासी चैत्र मास के चंद्र दर्शन के दिन भगवान झूलेलालजी का उत्सव संपूर्ण विश्व में चेटीचंड के त्योहार के रूप में परंपरागत हर्षोल्लास के साथ मनाते हैं।
चूंकि भगवान झूलेलालजी को जल और ज्योति का अवतार माना गया है, इसलिए काष्ठ का एक मंदिर बनाकर उसमें एक लोटी से जल और ज्योति प्रज्वलित की जाती है और इस मंदिर को श्रद्धालु चेटीचंड के दिन अपने सिर पर उठाकर, जिसे बहिराणा साहब भी कहा जाता है, भगवान वरुणदेव का स्तुति गान करते हैं एवं समाज का परंपरागत नृत्य छेज करते हैं। यह सर्वधर्म समभाव का प्रतीक है। झूलेलाल उत्सव चेटीचंड, जिसे सिन्धी समाज सिन्धी दिवस के रूप में मनाता चला आ रहा है, पर समाज की विभाजक रेखाएं समाप्त हो जाती हैं।
आस्था /शौर्यपथ / 58 ईसा पूर्व राजा विक्रमादित्य ने खगोलविदों की मदद से पूर्व प्रचलित कैलेंडर और हिन्दू पंचांग पर आधारित एक कैलेंडर को इजाद करवाया जिसे बाद में विक्रमादित्य संवत कहा जाने लगा। यही हिन्दुओं का सबसे शुद्ध कैलेंडर माना जाता है। इसे नव संवत्सर भी कहते हैं। संवत्सर के पांच प्रकार हैं सौर, चंद्र, नक्षत्र, सावन और अधिमास। विक्रम संवत में सभी का समावेश है। आओ जानते हैं हिन्दू नववर्ष की 5 खास बातें।
1. हिन्दू नववर्ष का प्रारंभ चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा गुड़ी पड़वा से होता है। इस नववर्ष को प्रत्येक राज्य में अलग अलग नाम से पुकारा जाता है परंतु है यह नवसंवत्सर। गुड़ी पड़वा, होला मोहल्ला, युगादि, विशु, वैशाखी, कश्मीरी नवरेह, उगाडी, चेटीचंड, चित्रैय तिरुविजा आदि सभी की तिथि इस नव संवत्सर के आसपास ही आती है।
2. इसी कैलेंडर से 12 माह और 7 दिवस बने हैं। 12 माह का एक वर्ष और 7 दिन का एक सप्ताह रखने का प्रचलन विक्रम संवत से ही शुरू हुआ। महीने का हिसाब सूर्य व चंद्रमा की गति पर रखा जाता है। विक्रम कैलेंडर की इस धारणा को यूनानियों के माध्यम से अरब और अंग्रेजों ने अपनाया। बाद में भारत के अन्य प्रांतों ने अपने-अपने कैलेंडर इसी के आधार पर विकसित किए।
3. चैत्र माह से ही पुराने कामकाज को समेटकर नए कामकाज की रूपरेखा तय की जाती है। इस धारणा का प्रचलन विश्व के प्रत्येक देश में आज भी जारी है। आज भी भारत में चैत्र माह में बहिखाते नए किए जाते हैं। ब्रह्म पुराण अनुसार ब्रह्मा ने इस दिन सृष्टि रचना की शुरुआत की थी। इसी दिन से सतयुग की शुरुआत भी मानी जाती है। इसी दिन भगवान विष्णु ने मत्स्य अवतार लिया था। इसी दिन से चैत्र नवरात्रि का प्रारंभ भी होता है। इसी दिन को भगवान राम का राज्याभिषेक हुआ था और पूरे अयोध्या नगर में विजय पताका फहराई गई थी।
4. वैसे तो नववर्ष चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की एकम से ही प्रारंभ हो जाता है। इसीलिए भी चैत्र माह की एकम को धुलेंडी पर्व मनाया जाता है। परंतु जब चैत्र माह के शुक्ल पक्ष का प्रथम दिवस जिसे प्रतिपदा कहते हैं आता है तभी से नववर्ष मनाने का प्रचलन रहा है। ज्योतिषियों के अनुसार इसी दिन से चैत्री पंचांग का आरम्भ माना जाता है, क्योंकि चैत्र मास की पूर्णिमा का अंत चित्रा नक्षत्र में होने से इस चैत्र मास को नववर्ष का प्रथम दिन माना जाता है।
5. रात्रि के अंधकार में नववर्ष का स्वागत नहीं होता। नया वर्ष सूरज की पहली किरण का स्वागत करके मनाया जाता है। अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार रात 12 बजे ही नववर्ष प्रारंभ मान लिया जाता है जो कि वैज्ञानिक नहीं है। दिन और रात को मिलाकर ही एक दिवस पूर्ण होता है। दिवस का प्रारंभ सूर्योदय से होता है और अगले सूर्योदय तक यह चलता है। सूर्यास्त को दिन और रात का संधिकाल मना जाता है।
मनोरंजन / शौर्यपथ /बीआर चोपड़ा की 'महाभारत' में 'इंद्रदेव' का किरदार निभाने वाले दिग्गज कलाकार सतीश कौल का निधन हो गया। मीडिया रिपोर्ट्स में बताया जा रहा है कि वो आर्थिक तंगी का सामना कर रहे थे और उनकी मौत कोरोना के कारण हुई है। 73 वर्षीय सतीश कौल ने बीते शनिवार को कोरोना जूझते हुए आखिरी सांस ली। वहीं 'महाभारत' में ही सतीश कौल के साथ काम कर चुके अभिनेता गजेंद्र चौहान ने उनके निधन पर शोक जाहिर किया है। उन्होंने एक इंटरव्यू के दौरान कहा है कि उनसे हम सभी को सबक लेना चाहिए।
सुपरस्टार होकर जीनी पड़ी गुमनामी की जिंदगी
गजेंद्र चौहान ने 'महाभारत' में 'युधिष्ठिर' का किरदार निभाया था। वहीं सतीश कौल के निधन की खबर को उन्होंने बहुत बड़ा लॉस बताया है। आज तक से बातचीत के दौरान गजेंद्र ने बताया कि सतीश इतने बड़े स्टार रह चुके हैं, वो पंजाबी सिनेमा के तो सुपरस्टार थे और लगभग 300 फिल्मों में काम कर चुके थे लेकिन फिर भी पिछले कई सालों से गुमनामी की जिंदगी जीने को मजबूर थे। गजेंद्र का कहना है कि शिर्डी स्थित साईं मंदिर या पटियाला के किसी अस्पताल से जब-कब सामने आईं तस्वीरों से उनके बारे में पता चलता रहता था।
गजेंद्र चौहान ने बताया सबक
गजेंद्र ने इस इंटरव्यू के दौरान कहा कि सतीश कौल ने अपनी जिंदगी में जबरदस्त पैसा और ग्लैमर देखा लेकिन उम्र के दूसरे पड़ाव और अंतिम समय में उनका किसी ने साथ नहीं दिया, वो बेहद स्वाभिमानी थे इसीलिए उन्होंने किसी से मदद नहीं मांगी। गजेंद्र ने कहा सतीश जी का निधन हम सब के लिए एक सबक है कि हर व्यवसाय से जड़े लोगों को अपना अच्छा समय भविष्य के लिए बचा कर रखना चाहिए। उनका कहना है कि बुरे वक्त के लिए पैसों की बचत जरूर करनी चाहिए क्योंकि आर्थिक और पारिवारिक अभाव इंसान को खोखला कर देता है।
CINTAA की मदद पर बोले
CINTAA की मदद के सवाल पर गजेंद्र का कहना है कि कोई भी फेडरेशन या एसोसिएशन किसी की बाप-बार मदद नहीं सकता है। उनका मानना है कि जिस इंडस्ट्री से वो जुड़े हैं, उसमें जबरदस्त उतार-चढ़ाव आते हैं। किसी के लिए दिन एक जैसा नहीं रहता।
खाना खजाना /शौर्यपथ / आज हम आपके लिए बेसन मेथी थेपला की रेसिपी लेकर आए हैं। यह बड़ी मजेदार डिश है, क्योंकि बच्चे भी इसे बड़े पसंद से खाते हैं, आइए, जानते हैं कैसे बनती है यह डिश
सामग्री :
1 कप गेहूं का आटा
1/4 कप दही
1/4 कप तेल
1/4 कप बेसन
1/2 कप बारीक कटी हुई हरी मेथी
1/2 छोटा चम्मच धनिया पाउडर
1/4 छोटा चम्मच लाल मिर्च पाउडर
1/4 छोटा चम्मच हल्दी पाउडर
1/4 छोटा चम्मच अजवाइन
नमक स्वादानुसार
विधि :
मेथी थेपला बनाने के लिए सबसे पहले एक बर्तन में गेहूं का आटा, बेसन, लाल मिर्च पाउडर, हल्दी पाउडर, धनिया पाउडर, अजवायन, नमक, कटी हुई मेथी, दही और 2 छोटे चम्मच तेल डालकर अच्छी तरह से मिला लें।
इस मिश्रण को पानी की मदद से गूथ लें। गुथ हुआ आटा नरम रहना चाहिए। गूंथने के बाद को आटे को ढक से और बीस मिनट के लिए रख दें। बीस मिनट के बाद हाथों में थोड़ा सा तेल लगाकर आटे को हल्के हाथों से एक बार और गूथ लें, जिससे आटा चिकना हो जाए।
अब तवा को गैस पर रख कर गरम करें। तैयार आटे की लोई बनाकर गेहूं के आटे की मदद से चकले पर रखकर पतला बेल लें। तवा गरम होने पर उस पर थोड़ा सा तेल डालें और पूरे तवे पर फैला लें। इसके बाद बेले हुए थेपले को तवे पर डाल दें और मीडियम आंच पर सेकें।
जब थेपला एक तरफ हल्का सिक जाए, तो उसे पलट दें। इसके बाद एक छोटा चम्मच तेल थेपला पर फैला कर डालें। फिर थेपला को पलट कर थोड़ा सा तेल डालें और उसे उलट-पलट कर सेक लें। इसी तरह से सारे थेपले सेक लें।
लीजिए मेथी का थेपला तैयार है। इन्हें मनचाहे अचार, चटनी या दही के साथ गरमा गर्म सर्व करें।
Feb 09, 2021 Rate: 4.00
