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ओवेरियन सिस्ट रिमूवल, हिस्टरएक्टोमी एवं एक एमरजेंसी सिजेरियन ऑपरेशन
दुर्ग / शौर्यपथ / प्रदेश के अंतिम व्यक्ति तक स्वास्थ्य सुविधाएँ पहुंचाने के लिए किए जा रहे प्रयास रंग लाने लगे हैं। अब ग्रामीण अंचलों के शासकीय अस्पतालों में भी मुश्किल सर्जरियाँ होने लगीं हैं, जिनके लिए कल तक बड़े अस्पतालों पर निर्भरता थी। कलेक्टर डॉ. सर्वेश्वर नरेंद्र भुरे एवं मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. गंभीर सिंह ठाकुर के मार्गदर्शन में दुर्ग जिले के विभिन्न सामुदायिक स्वास्थ्य के केंद्रों में भी बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराने के प्रयास किए जा रहे हैं। इसी कड़ी में सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पाटन में दिनांक 19 जनवरी को 3 मेजर ऑपरेशन किए गए, मिनिमली इनवेसिव सर्जरी विधि से ओवेरियन सिस्ट रिमूवल, हिस्टरएक्टोमी एवं एक एमरजेंसी सिजेरियन ऑपरेशन सफलतापूर्वक हुआ।
चिकित्सकीय टीम में डॉ. कृष्ण कुमार डेहरिया स्त्री रोग विशेषज्ञ सर्जन, एनेस्थीसिया विशेषज्ञ डॉ. अजय सिंह ठाकुर, डॉ. सीडी दीवान सर्जन, स्टाफ नर्स शिव कुमारी दुबे, एकता सैमुअल, रीना बंछोर, जितेंद्र निर्मलकर रेखा कन्नौजे आदि ऑपरेशन दल के सदस्यों के सहयोग से सफलतापूर्वक संपन्न हुआ । विकास खंड चिकित्सा अधिकारी एवं स्वामी आत्मानंद शासकीय चिकित्सालय सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के प्रभारी चिकित्सा अधिकारी डॉ. आशीष शर्मा ने बताया की क्षेत्र की जनता को चिकित्सा सुविधा एवं सेवाएं देने के लिए प्रयास किए जा रहे हैं, जिससे उन्हें कम दूरी में ही गुणवत्तापूर्ण सुविधा एवं सेवाएं दे सकें। इस उद्देश्य से शासन द्वारा अस्थि रोग विशेषज्ञ की पदस्थापना की गई है, डॉ. अरुण कटारे अस्थि रोग विशेषज्ञ की सेवाएं भी मिल रही हैं। विगत दिनों अस्थि रोग से संबंधित इलाज प्रारंभ किया गया है, इसमें फ्रैक्चर माइनर, अस्थि रोग सर्जरी एवं स्किन ग्राफ्टिंग भी की गई है, आगामी समय में विकासखंड पाटन में गुणवत्तापूर्ण सेवाओं के विस्तार की प्लानिंग की जा रही है।
क्षेत्र की जनता को डॉ. खूबचंद बघेल स्वास्थ्य सहायता योजना एवं आयुष्मान भारत योजना से लाभान्वित किया जा रहा है। मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य डॉ. गंभीर सिंह ठाकुर एवं जिला कार्यक्रम प्रबंधक राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन सुश्री प्यूली मजूमदार ने सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पाटन पहुंचकर चिकित्सक की टीम की सराहना की एवं ऑपरेशन से लाभान्वित हुए हितग्राहियों से मुलाकात उनका कुशल क्षेम पूछा एवं जल्द स्वास्थ्य लाभ की शुभकामनाएं दी।
सेहत /शौर्यपथ /आजकल समय से पहले लोगों के आखों की रोशनी कमजोर होने लगी है, क्योंकि बदलती लाइफ स्टाइल के साथ ही हम सभी को कुछ घंटे मोबाइल या कम्यूटर स्क्रीन के सामने रहना होता है। लेकिन यदि हम अपने खान-पान में थोड़ी ध्यान दें तो शायद इस समस्या को बढ़ने से रोका जा सकता है। जानें उन 4 चीजों के बारे में जिनके रोज खाने से आखों की रोशनी दुरुस्त रहती है-
हरी सब्जियां
अपनी डाइट में हरी पत्तेदार सब्जियों को शामिल करें। हरी पत्तेदार सब्जियों में आयरन की भरपूर मात्रा पायी जाती है, जो आंखों के लिए बहुत ही जरूरी है।
गाजर
गाजर का जूस पीना सेहत के लिए तो अच्छा है ही साथ ही आंखों के लिए भी बहुत फायदेमंद है। रोजाना एक गिलास गाजर का जूस पीने से आंखों पर चढ़ा चश्मा तक उतर सकता है।
बादाम का दूध
सप्ताह में कम से कम तीन बार बादाम का दूध पिएं। इसमें विटामिन ई होता है जो कि आंखों में किसी भी बीमारी से लड़ने के लिए फायदेमंद है।
अंडे
अंडे में अमीनो एसिड, प्रोटीन, सल्फर, लैक्टिन, ल्युटिन, सिस्टीन और विटामिन बी2 होता है। विटामिन बी सेल के कार्य करने में महत्वपूण होता है।
मछली
मछली में हाई प्रोटीन होता है। मछली आंखों के अलावा बालों के लिए भी बहुत अच्छी होती है।
सोयाबीन
आप अगर नॉन वेज नहीं खाते, तो आप सोयाबीन खा सकते हैं, यह आपकी आंखों के लिए बहुत फायदेंमंद है।
सेहत /शौर्यपथ / क्या आप चाइनीज फूड के शौकीन हैं? तो आपने अक्सर चाइनीज फूड्स में हरी प्याज का सेवन किया होगा। यह कई चाईनीज फूड का एक अनिवार्य हिस्सा है। लेकिन क्या आप जानती हैं कि हरी प्याज का सेवन सेहत के लिए बेहद फायदेमंद माना जाता है।
हरी प्याज को स्प्रिंग अनियन के नाम से भी जाना जा है। इसमें ऐसे कई पोषक तत्व मौजूद होते हैं, जो स्वास्थ्य के लिए बेहद फायदेमंद माने जाते हैं। इसकी सबसे अच्छी बात यह है कि इसमें कैलोरी की मात्रा कम होती है और इसे कच्चा या पकाकर दोनों ही तरह से खाया जा सकता है। हम यहां आपको हरी प्याज के स्वास्थ्य संबंधी 5 लाभ बता रहे हैं।
पोषक तत्वों भरपूर है हरी प्याज
हरी प्याज विटामिन-सी और कैल्शियम का एक बेहतरीन स्रोत है। यह विटामिन ए,बी,सी, बी2 या थाइमिन, कॉपर, आयरन, फास्फोरस, मैग्नीशियम और पोटेशियम, जैसे आवश्यक विटामिन और मिनरल से भरपूर होती है। जो कि हमारे शरीर को न सिर्फ जरूरी पोषण प्रदान करती है, बल्कि यह कई स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं को दूर रखने में भी मदद करती है।
शोध बताते हैं कि हरी प्याज कोलेस्ट्रॉल के स्तर को कम कर सकती है। साथ ही हार्ट अटैक और स्ट्रोक के जोखिम को कम कर सकती है। इसमें जीवाणुरोधी और एंटीफंगल गुण होते हैं।
यहां हैं हरी प्याज के 5 स्वास्थ्य लाभ
1. हृदय के लिए फायदेमंद है
हरी प्याज में एंटीऑक्सिडेंट की उपस्थिति फ्री-रेडिकल्स की कार्रवाई को रोक कर डीएनए और सेलुलर ऊतक की क्षति को रोकने में मदद करती है। विटामिन-सी शरीर में उच्च कोलेस्ट्रॉल और ब्लड प्रेशर के स्तर को कम करने में मदद करता है, जो बदले में आपके हृदय रोग के जोखिम को कम करता है। हरी प्याज में मौजूद सल्फर यौगिक कोरोनरी हृदय रोगों के जोखिम को कम करने में भी मदद करते हैं।
2. हड्डियों के लिए फायदेमंद है
हरी प्याज में विटामिन-C और K की उच्च मात्रा होती है, दोनों हड्डियों के सामान्य कामकाज के लिए आवश्यक हैं। विटामिन सी कोलेजन के संश्लेषण में मदद करता है, जो आपकी हड्डियों को मजबूत बनाता है। जबकि विटामिन K हड्डियों के घनत्व को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
3. कैंसर के जोखिम को कम करती है हरी प्याज
हरी प्याज शक्तिशाली सल्फर युक्त यौगिक में समृद्ध होती हैं, जिन्हें एलिल सल्फाइड कहा जाता है। ये कोलन कैंसर के विकास के जोखिम को कम करने में मदद करता है। फ्लेवोनोइड्स एक्सथिन ऑक्सीडेज एंजाइम के उत्पादन को रोक कर कैंसर को रोकने में भी मदद करते हैं। जो फ्री-रेडिकल्स के उत्पादन से डीएनए और सेलुलर ऊतक को नुकसान पहुंचाते हैं।
कैंसर से लड़ने वाले खाद्य पदार्थ खाने के अलावा, अपने भोजन की आदतों को बदलने से भी आपको कैंसर के जोखिम को कम करने में मदद मिलती है।
4. ब्लड शुगर को नियंत्रित करती है
अध्ययनों से पता चला है कि हरी प्याज में मौजूद सल्फर यौगिक ब्लड शुगर के उच्च स्तर को कम करने में मदद करते हैं। यह इंसुलिन के स्तर को बढ़ाकर प्राप्त किया जाता है, एक हार्मोन, जो शरीर की कोशिकाओं को रक्त में शर्करा के परिवहन के लिए आवश्यक है। ऐसे में अगर आपको डायबिटीज है तो इस सब्जी को अपनी स्वस्थ सब्जियों की सूची में शामिल करें।
5. पेट की जटिलताओं से बचाती है
हरी प्याज जठरांत्र संबंधी समस्याओं से राहत में फायदेमंद है। यह दस्त और पेट की अन्य जटिलताओं को रोकने के लिए एक शक्तिशाली प्राकृतिक उपचार के रूप में कार्य करती है। इसके अतिरिक्त, वे आपकी भूख में भी सुधार करती है। उच्च मात्रा में फाइबर से भरी होने के कारण, यह हरी सब्जी आपके पाचन तंत्र की सुचारू रूप से काम करने में मदद करती है।
सेहत /शौर्यपथ /मेडिटेशन को ही ध्यान लगाना कहते है, इसे दिनचर्या का हिस्सा बनाकर रोजाना करने से कई फायदे होते हैं। अगर अभी तक आपने मेडिटेशन को अपने रूटीन में शामिल नहीं किया है तो, ये 13 फायदे जानने के बाद आप कल से ही इसे अपनी दिनचर्या में शामिल कर लेंगे -
1 मेडिटेशन, मन अशांत रहने पर उसके निष्क्रिय पड़े हुए भागों को उपयोग में लाने योग्य बनाता है।
2 अनुभव की क्षमता को सूक्ष्म करने की एक प्रक्रिया है ध्यान।
3 यदि आपको भूलने की आदत है तो ध्यान आपके लिए बहुत उपयोगी है।
4 गुस्सैल प्रवृत्ति के लोगों का मन शांत करने में कारगर है भावातीत ध्यान।
5 निर्णय न ले पाने वाले भी इसे अपनी जिंदगी में शामिल कर सकते हैं।
6 हृदयरोग की रोकथाम के लिए उत्तम औषधि के समान है।
7 मन की चंचलता को नियंत्रित करता है।
8 दीर्घायु बनाने में इसकी अहम उपयोगिता है।
9 शांति, सामर्थ्य, संतोष, शांति, विद्वत्ता और सभी आवश्यकताओं को पूरा करता है भावातीत ध्यान।
10 चाहें तो ध्यान के समय कुछ फूल आस-पास रखें, कोई सुगंधित वस्तु का छिड़काव कर दें, अगरबत्ती जला दें।
11 रात्रि के भोजन से पहले ही ध्यान के लिए बैठें। प्रातःकाल सूर्योदय से पहले ध्यान करें।
12 ढीले वस्त्र पहनकर ध्यान करें।
13 महिलाएं यदि चाहें तो भावातीत ध्यान किसी शिक्षक के द्वारा भी सीख सकती हैं। चाहें तो मेडिटेशन सेंटर में भी आप इसे सीख सकती हैं।
नुस्खा /शौर्यपथ /वैसे तो प्याज का सेवन करने से कई सेहत लाभ मिलते हैं, लेकिन कटे प्याज को केवल अपने शरीर के किसी हिस्से पर घंटों तक रखने से भी कई सेहत समस्याएं दूर हो सकती है। आइए, जानते हैं कटे प्याज के एक टूकडे को मोजे में डालकर रात भर पहनने से कौन से सेहत लाभ मिलते हैं -
1 मोजे और प्याज का यह उपाय बुखार में सबसे अधिक प्रभावकारी है। अगर आप बुखार महसूस कर रहे हैं तो रात को सोते वक्त यह उपाय आजमाएं और आराम से सो जाएं। यह प्याज आपके शरीर की सारी गर्मी सोख लेगा और आप राहत महसूस करेंगे।
2 प्याज एंटी बैक्टीरियल और एंटी वायरल गुणों से भरपूर होता है। शरीर के किसी भी हिस्से में रखने या रगड़ने पर यह बैक्टीरिया का नाश करता है और बढ़े हुए तापमान को कम करता है।
3 प्याज को पैर में रखकर सोना पैरों से आने वाली गंध को भी दूर करने में मदद करता है, क्योंकि प्याज की तेज गंध अपने आसपास की वायु को शुद्ध करने में सहायक होती है।
4 ऐसा भी माना जाता है कि प्याज को इस तरह पैरों के बीच रखने से पेट के संक्रमण से भी निजात मिलती है और किडनी से संबंधित समस्याएं भी दूर होती है। यह रक्त को भी शुद्ध करने में मददगार है।
5 यह उपाय छोटी आंत और मूत्राशय की समस्याओं में भी फायदेमंद है। इसके अलावा सर्दी, जुकाम और संक्रमण के लिए भी आप यह तरीका आजमा सकते हैं।
धर्म संसार / शौर्यपथ /हिन्दू धर्म में परिक्रमा का बड़ा महत्त्व है। परिक्रमा से अभिप्राय है कि सामान्य स्थान या किसी व्यक्ति के चारों ओर उसकी बाहिनी तरफ से घूमना। इसको 'प्रदक्षिणा करना' भी कहते हैं, जो षोडशोपचार पूजा का एक अंग है। प्रदक्षिणा की प्रथा अतिप्राचीन है। वैदिक काल से ही इससे व्यक्ति, देवमूर्ति, पवित्र स्थानों को प्रभावित करने या सम्मान प्रदर्शन का कार्य समझा जाता रहा है। दुनिया के सभी धर्मों में परिक्रमा का प्रचलन हिन्दू धर्म की देन है। काबा में भी परिक्रमा की जाती है तो बोधगया में भी। आपको पता होगा कि भगवान गणेश और कार्तिकेय ने भी परिक्रमा की थी। यह प्रचलन वहीं से शुरू हुआ है।
1.देवमंदिर और मूर्ति परिक्रमा:- जैसे देव मंदिर में जगन्नाथ पुरी परिक्रमा, रामेश्वरम, तिरुवन्नमल, तिरुवनन्तपुरम परिक्रमा और देवमूर्ति में शिव, दुर्गा, गणेश, विष्णु, हनुमान, कार्तिकेय आदि देवमूर्तियों की परिक्रमा करना।
2.नदी परिक्रमा:- जैसे नर्मदा, गंगा, सरयु, क्षिप्रा, गोदावरी, कावेरी परिक्रमा आदि।
2.पर्वत परिक्रमा:- जैसे गोवर्धन परिक्रमा, गिरनार, कामदगिरि, तिरुमलै परिक्रमा आदि।
3.वृक्ष परिक्रमा:- जैसे पीपल और बरगद की परिक्रमा करना।
3.तीर्थ परिक्रमा:- जैसे चौरासी कोस परिक्रमा, अयोध्या, उज्जैन या प्रयाग पंचकोशी यात्रा, राजिम परिक्रमा आदि।
4.चार धाम परिक्रमा:- जैसे छोटा चार धाम परिक्रमा या बड़ा चार धाम यात्रा।
5. भरत खण्ड परिक्रमा:- अर्थात संपूर्ण भारत की परिक्रमा करना। परिवाज्रक संत और साधु ये यात्राएं करते हैं। इस यात्रा के पहले क्रम में सिंधु की यात्रा, दूसरे में गंगा की यात्रा, तीसरे में ब्रह्मपुत्र की यात्रा, चौथे में नर्मदा, पांचवें में महानदी, छठे में गोदावरी, सातवें में कावेरा, आठवें में कृष्णा और अंत में कन्याकुमारी में इस यात्रा का अंत होता है। हालांकि प्रत्येक साधु समाज में इस यात्रा का अलग अलग विधान और नियम है।
6. विवाह परिक्रम:- मनु स्मृति में विवाह के समक्ष वधू को अग्नि के चारों ओर तीन बार प्रदक्षिणा करने का विधान बतलाया गया है जबकि दोनों मिलकर 7 बार प्रदक्षिणा करते हैं तो विवाह संपन्न माना जाता है।
किस देव की कितनी बार परिक्रमा?
1. भगवान शिव की आधी परिक्रमा की जाती है।
2. माता दुर्गा की एक परिक्रमा की जाती है।
3. हनुमानजी और गणेशजी की तीन परिक्रमा की जाती है।
4. भगवान विष्णु की चार परिक्रमा की जाती है।
5. सूर्यदेव की चार परिक्रमा की जाती है।
6. पीपल वृक्ष की 108 परिक्रमाएं करना चाहिए।
7. जिन देवताओं की प्रदक्षिणा का विधान नहीं प्राप्त होता है, उनकी तीन प्रदक्षिणा की जा सकती है।
धर्म संसार /शौर्यपथ /हर देवी या देवता किसी न किसी की सवारी करने के बाद ही गमन करते हैं, जैसे लक्ष्मीजी उल्लू पर, विष्णुजी गरुढ़ पर, माता दुर्गा शेर पर और इसी तरह सभी देवी देवताओं के पार अपनी अपनी सवारी है परंतु क्या आप जानते हैं कि हनुमानजी के पास कितने प्रकार के अस्त्र शस्त्र हैं और वे कौन से वाहन की सवारी करते हैं? नहीं जानते हैं तो आओ आज हम आपको बताते हैं।
खड्गं त्रिशूलं खट्वाङ्गं पाशाङ्कुशसुपर्वतम् ।
मुष्टिद्रुमगदाभिन्दिपालज्ञानेन संयुतम् ॥ ८॥
एतान्यायुधजालानि धारयन्तं यजामहे ।
प्रेतासनोपविष्टं तु सर्वाभरणभूषितम् ॥ ९॥
हनुमानजी का वाहन : 'हनुमत्सहस्त्रनामस्तोत्र' के 72वें श्लोक में उन्हें 'वायुवाहन:' कहा गया। मतलब यह कि उनका वाहन वायु है। वे वायु पर सवार होकर अति प्रबल वेग से एक स्थान से दूसरे स्थान पर गमन करते हैं। हनुमान जी ने एक बार श्रीराम और लक्ष्मण को अपने कंधे पर बैठाकर उड़ान भरा था। उसके बाद एक बार हनुमान जी ने बात-बात में द्रोणाचल पर्वत को उखाड़कर लंका ले गए और उसी रात को यथास्थान रख आए थे।
भूतों की सवारी : प्रचलित मान्यता और जनश्रुति के अनुसार यह कहा जाता है हनुमानजी भूतों की सवारी भी करते हैं।
हनुमानजी के अस्त्र और शस्त्र : हनुमानजी के अस्त्र-शस्त्रों में पहला स्थान उनकी गदा का है। कुबेर ने गदाघात से अप्रभावित होने का वर दिया है। हनुमान जी वज्रांग हैं। यम ने उन्हें अपने दंड से अभयदान दिया है। भगवान शंकर ने हनुमानजी को शूल एवं पाशुपत, त्रिशूल आदि अस्त्रों से अभय होने का वरदान दिया था। अस्त्र-शस्त्र के कर्ता विश्वकर्मा ने हनुमान जी को समस्त आयुधों से अवध्य होने का वरदान दिया है।
उनके संपूर्ण अंग-प्रत्यंग, रद, मुष्ठि, नख, पूंछ, गदा एवं गिरि, पादप आदि प्रभु के अमंगलों का नाश करने के लिए एक दिव्यास्त्र के समान है। 1.खड्ग, 2.त्रिशूल, 3.खट्वांग, 4.पाश, 5.पर्वत, 6.अंकुश, 7.स्तम्भ, 8.मुष्टि, 9.गदा और 10.वृक्ष हैं।
हनुमानजी का बायां हाथ गदा से युक्त कहा गया है। 'वामहस्तगदायुक्तम्'. श्री लक्ष्मण और रावण के बीच युद्ध में हनुमान जी ने रावण के साथ युद्ध में गदा का प्रयोग किया था। उन्होंने गदा के प्रहार से ही रावण के रथ को खंडित किया था। स्कंदपुराण में हनुमानजी को वज्रायुध धारण करने वाला कहकर उनको नमस्कार किया गया है। उनके हाथ में वज्र सदा विराजमान रहता है। अशोक वाटिका में हनुमानजी ने राक्षसों के संहार के लिए वृक्ष की डाली का उपयोग किया था। हनुमानजी का एक अस्त्र उनकी पूंछ भी है। अपनी मुष्टिप्रहार से उन्होंने कई दुष्टों का संहार किया है।
धर्म संसार /शौर्यपथ /हर देवी या देवता किसी न किसी की सवारी करने के बाद ही गमन करते हैं, जैसे लक्ष्मीजी उल्लू पर, विष्णुजी गरुढ़ पर, माता दुर्गा शेर पर और इसी तरह सभी देवी देवताओं के पार अपनी अपनी सवारी है परंतु क्या आप जानते हैं कि हनुमानजी के पास कितने प्रकार के अस्त्र शस्त्र हैं और वे कौन से वाहन की सवारी करते हैं? नहीं जानते हैं तो आओ आज हम आपको बताते हैं।
खड्गं त्रिशूलं खट्वाङ्गं पाशाङ्कुशसुपर्वतम् ।
मुष्टिद्रुमगदाभिन्दिपालज्ञानेन संयुतम् ॥ ८॥
एतान्यायुधजालानि धारयन्तं यजामहे ।
प्रेतासनोपविष्टं तु सर्वाभरणभूषितम् ॥ ९॥
हनुमानजी का वाहन : 'हनुमत्सहस्त्रनामस्तोत्र' के 72वें श्लोक में उन्हें 'वायुवाहन:' कहा गया। मतलब यह कि उनका वाहन वायु है। वे वायु पर सवार होकर अति प्रबल वेग से एक स्थान से दूसरे स्थान पर गमन करते हैं। हनुमान जी ने एक बार श्रीराम और लक्ष्मण को अपने कंधे पर बैठाकर उड़ान भरा था। उसके बाद एक बार हनुमान जी ने बात-बात में द्रोणाचल पर्वत को उखाड़कर लंका ले गए और उसी रात को यथास्थान रख आए थे।
भूतों की सवारी : प्रचलित मान्यता और जनश्रुति के अनुसार यह कहा जाता है हनुमानजी भूतों की सवारी भी करते हैं।
हनुमानजी के अस्त्र और शस्त्र : हनुमानजी के अस्त्र-शस्त्रों में पहला स्थान उनकी गदा का है। कुबेर ने गदाघात से अप्रभावित होने का वर दिया है। हनुमान जी वज्रांग हैं। यम ने उन्हें अपने दंड से अभयदान दिया है। भगवान शंकर ने हनुमानजी को शूल एवं पाशुपत, त्रिशूल आदि अस्त्रों से अभय होने का वरदान दिया था। अस्त्र-शस्त्र के कर्ता विश्वकर्मा ने हनुमान जी को समस्त आयुधों से अवध्य होने का वरदान दिया है।
उनके संपूर्ण अंग-प्रत्यंग, रद, मुष्ठि, नख, पूंछ, गदा एवं गिरि, पादप आदि प्रभु के अमंगलों का नाश करने के लिए एक दिव्यास्त्र के समान है। 1.खड्ग, 2.त्रिशूल, 3.खट्वांग, 4.पाश, 5.पर्वत, 6.अंकुश, 7.स्तम्भ, 8.मुष्टि, 9.गदा और 10.वृक्ष हैं।
हनुमानजी का बायां हाथ गदा से युक्त कहा गया है। 'वामहस्तगदायुक्तम्'. श्री लक्ष्मण और रावण के बीच युद्ध में हनुमान जी ने रावण के साथ युद्ध में गदा का प्रयोग किया था। उन्होंने गदा के प्रहार से ही रावण के रथ को खंडित किया था। स्कंदपुराण में हनुमानजी को वज्रायुध धारण करने वाला कहकर उनको नमस्कार किया गया है। उनके हाथ में वज्र सदा विराजमान रहता है। अशोक वाटिका में हनुमानजी ने राक्षसों के संहार के लिए वृक्ष की डाली का उपयोग किया था। हनुमानजी का एक अस्त्र उनकी पूंछ भी है। अपनी मुष्टिप्रहार से उन्होंने कई दुष्टों का संहार किया है।
धर्म संसार /शौर्यपथ /तांडव शब्द भगवान शिव से जुड़ा हुआ है। ताण्डव का अर्थ होता है उग्र तथा औद्धत्यपूर्ण क्रिया कलाप या स्वच्छंद क्रिया कलाप। ताण्डव (अथवा ताण्डव नृत्य) शंकर भगवान द्वारा किया जाने वाला अलौकिक नृत्य है।
1. तांडव के प्रवर्तक : शास्त्रों के अनुसार शिवजी को ही तांडव नृत्य का प्रवर्तक माना जाता है। परंतु अन्य आगम तथा काव्य ग्रंथों में दुर्गा, गणेश, भैरव, श्रीराम आदि के तांडव का भी उल्लेख मिलता है।
2. तांडव स्त्रोत : रावण ने अपने आराध्य शिव की स्तुति में 'शिव तांडव स्तोत्र' की रचना की थी। इसके अलावा आदि शंकराचार्य रचित दुर्गा तांडव (महिषासुर मर्दिनी संकटा स्तोत्र), गणेश तांडव, भैरव तांडव एवं श्रीभागवतानंद गुरु रचित श्रीराघवेंद्रचरितम् में राम तांडव स्तोत्र भी प्राप्त होता है।
3. तांडव नृत्य : मान्यता है कि रावण के भवन में पूजन के समाप्त होने पर शिवजी ने, महिषासुर को मारने के बाद दुर्गा माता ने, गजमुख की पराजय के बाद गणेशजी ने, ब्रह्मा के पंचम मस्तक के छेदद के बाद आदिभैरव ने तथा रावण के वध के समय प्रभु श्रीराम जी ने तांडव नृत्य किया।
4. तांडव ताल : भारतीय संगीत शास्त्र में चौदह प्रमुख तालभेद में वीर तथा बीभत्स रस के सम्मिश्रण से बना तांडवीय ताल का उल्लेख मिलता है।
5. तांडव वनस्पति : वनस्पति शास्त्र के अनुसार एक प्रकार की घास को भी तांडव कहा गया है।
6. शिव का तांडव नृत्य : कहते हैं कि भगवान शिव दो स्थिति में तांडव नृत्य करते हैं। पहला जब वो क्रोधित होते हैं तब वे बिना डमरू के तांडव नृत्य करते हैं। ऐसा में जब शिवजी को क्रोध आता है तो वे तांडव नृत्य करते हैं और जब क्रोध वे ते अपना तीसरा नेत्र खोल देते हैं तो जो भी सामने होता है वह भस्म हो जाता है। परंतु दूसरा जब वे डमरू बजाते हुए तांडव करते हैं तो इसका अर्थ यह है कि वे आनंदित हैं, प्रकृति में आनंद की बारिश हो रही है। ऐसे समय में शिव परम आनंद से पूर्ण रहते हैं। नटराज, भगवान शिव का ही रूप है, जब शिव तांडव करते हैं तो उनका यह रूप नटराज कहलता है।
7. सृष्टि को भस्म करने के लिए तांडव : कुछ का मानना है कि शिव ने तांडव नृत्य कर सृष्टि को भस्म कर दिया था तब सृष्टि की जगह बहुत काल तक यही (महाशिवरात्रि) महारात्रि छाई रही। देवी पार्वती ने इसी रात्रि को शिव की पूजा कर उनसे पुन: सृष्टि रचना की प्रार्थना की इसीलिए इसे शिव की पूजा की रात्रि कहा जाता है। फिर इसी रात्रि को भगवान शंकर ने सृष्टि उत्पत्ति की इच्छा से स्वयं को ज्योतिर्लिंग में परिवर्तित किया।
8. ज्ञान प्राप्ति पर तांडव : यह भी कहा जाता है कि भगवन शिव को जब हिमालय पर ज्ञान प्राप्त हुआ था उस ज्ञान के आनंद में उन्होंने झूमकर नृत्य किया था, जिस नृत्य को बाद में तांडव कहा गया। शिव के शिष्य हैं- बृहस्पति, विशालाक्ष, शुक्र, सहस्राक्ष, महेन्द्र, प्राचेतस मनु, भरद्वाज इसके अलावा 8वें गौरशिरस मुनि भी थे। सर्व प्रथम इन्होंने ही शिवजी का तांडव नृत्य उस वक्त देखा था जब उन्हें (शिवजी को) ज्ञान प्राप्त हुआ था।
9. काली तांडव : शिवजी के साथ माता काली ही उनके जैसा तांडव करने की क्षमता रखती हैं। माता पार्वती ने यही नृत्य बाणासुर की पुत्री को सिखाया था।
10. शास्त्रीय नृत्य : कहते हैं कि भरतमुनि ने नाट्यशास्त्र का पहला अध्याय लिखने के बाद अपने शिष्यों को तांडव नृत्य का प्रशिक्षण दिया था। वर्तमान में शास्त्रीय नृत्य से संबंधित जिनती भी कला या विद्याएं या नृत्य प्रचलित हैं वह सभी तांडव नृत्य की ही देन हैं। तांडव नृत्य की एक तीव्र शैली है, वहीं इसी लास्य सौम्य शैली भी है। लास्य शैली में वर्तमान में भरतनाट्यम, कुचिपुडी, ओडिसी और कत्थक नृत्य किए जाते हैं जबकि कथकली तांडव नृत्य से प्रेरित है।
सेहत /शौर्यपथ /लौंग की भारतीय खाने में खास जगह है। इसके उपयोग से खाने में स्वाद के साथ-साथ कुछ अहम गुण भी जुड़ जाते हैं। इसका उपयोग तेल व एंटीसेप्टिक के रूप में किया जाता है। लौंग में आपके स्वास्थ्य को दुरुस्त रखने के कई गुण होते हैं।
लौंग में होने वाला एक खास तरह का स्वाद इसमें होने वाले एक तत्व युजेनॉल की वजह से होता है। यही तत्व इसमें होने वाली एक खास तरह की गंध को पैदा करता है। हालांकि लौंग हर मौसम में हर उम्र के व्यक्तियों के लिए लाभदायक है, पर सर्दी के मौसम में इसकी खास उपयोगिता है, क्योंकि इसकी तासीर बहुत गर्म होती है। लौंग के तेल की तासीर काफी गर्म होती है और इस कारण इसे बहुत सावधानी से इस्तेमाल करना चाहिए। जब आप अपनी त्वचा पर इसे लगाएं तो सीधे तौर पर बिना किसी चीज को साथ मिलाए न लगाएं।
1. दांतों में होने वाले दर्द में लौंग के इस्तेमाल से निजात मिलती है और यही कारण है कि 99 प्रतिशत टूथपेस्ट में होने वाले पदार्थों की लिस्ट में लौंग खासतौर पर शामिल होती है।
2. खांसी और बदबूदार सांसों के इलाज के लिए लौंग बहुत कारगर है। लौंग का नियमित इस्तेमाल इन समस्याओं से छुटकारा दिलाता है। आप लौंग को अपने खाने में या फिर ऐसे ही सौंफ के साथ खा सकते हैं।
3. सामान्य तौर पर होने वाली सर्दी को लौंग से दुरुस्त किया जा सकता है। आप लौंग के तेल की 10 बूंदों को शहद के साथ मिलाकर दिन में 2 से 3 बार इस्तेमाल करके अपनी सर्दी को ठीक कर सकते हैं।
4. लौंग में दिमागी स्ट्रेस को कम करने का भी गुण होता है। लौंग को आप तुलसी, पुदीना और इलायची के साथ इस्तेमाल करके खुशबूदार चाय बना सकते हैं और चाहें तो यही मिक्स आप शहद के साथ इस्तेमाल करके भी स्ट्रेस से छुटकारा पा सकते हैं।
लौंग का तेल अन्य किसी भी तेल के मुकाबले सबसे ज्यादा एंटीऑक्सीडेंट गुणों से भरपूर होता है। एंटीऑक्सीडेंट स्वस्थ त्वचा और शरीर को तंदुरुस्त रखने में बहुत कारगर होते हैं। लौंग के तेल में मिनरल्स जैसे पोटेशियम, सोडियम, फॉस्फोरस, आयरन, विटामिन A और विटामिन C अत्यधिक मात्रा में होते हैं।
लौंग स्वास्थ्यवर्धक है, वहीं इसके कुछ नुकसान भी हैं। आइए, जानते हैं इसके दुष्प्रभाव के बारे में...
इसका अत्यधिक सेवन आंतों को नुकसान पहुंचा सकता है।
लौंग के ज्यादा सेवन से शरीर में जलन भी हो सकती है
शरीर में गर्मी बढ़ने पर मुंहासे संबधी समस्या भी उत्पन्न हो सकती है।
इसके अत्यधिक सेवन से एलर्जी का भी डर रहता है।
रक्त का पतलापन भी हो सकता है।
सेहत /शौर्यपथ / हममे से अधिकतर लोग खाना खाने के बाद सौंफ खाना पसंद करते है। वैसे भी सौंफ माउथ फ्रेशनर का भी काम करता हैं। सौंफ के सेवन से मुंह की दुर्गंध से भी छुटकारा मिलता है, इसके अलावा भी सौंफ के कई फायदे हैं। दरअसल, सौंफ औषधीय गुणों से भरपूर होती है, खाने के बाद इसके सेवन से भोजन पचाने में आसानी होती है। ऐसे कई अन्य गुणों के लिए सौंफ जानी जाती हैं। आइए जानते हैं सौफ के पानी के फायदों के बारे में
सौंफ का पानी पेट की कई समस्याओं से निजात दिलाता है। इससे आपको पेट से जुड़ी समस्या से राहत मिलती है। जैसे एसिडिटी और पेट में गैस की समस्या से आप परेशान हैं, तो सौंफ का पानी आपको नियमित रूप से पीना चाहिए। इससे आपको राहत मिलेगी।
वजन घटाना चाहते है, तो सुबह खाली पेट सौंफ के पानी का सेवन करना आपके लिए बहुत फायदेमंद है। सौंफ के पानी से
वजन घटाने में मदद मिलती है। इसे आप नियमित सुबह के समय खाली पेट पीएं। यह मेटाबॉलिज्म को बढ़ाता है, जिससे शरीर अधिक फैट को कम करता है। इसके लिए सौंफ को रातभर पानी में भिगोकर रखें फिर इसका सुबह-सुबह सेवन करें।
यदि मासिक धर्म के दर्द से परेशान है तो सौंफ का पानी आपके बहुत काम आ सकता है। इससे मासिक धर्म के समय ऐंठन और दर्द से राहत मिलती है।
सौंफ का पानी शरीर को डिटॉक्स करने में भी बहुत मददगार होता है। इसमें फाइबर पाया जाता है जो शरीर के विषैले पदार्थ को बाहर निकालने में मदद करता है। और शरीर को अंदर से साफ करता है।
ज्योतिष / शौर्यपथ / पूजा साधना करते समय बहुत सी ऐसी बातें हैं जिन पर सामान्यतः हमारा ध्यान नहीं जाता है लेकिन पूजा साधना की दृष्टि से यह बातें अति महत्वपूर्ण हैं... जैसे शास्त्रों में बांस की लकड़ी जलाना मना है फिर भी लोग अगरबत्ती जलाते हैं। यह बांस की बनी होती है। अगरबत्ती जलाने से पितृदोष लगता है। शास्त्रों में पूजन विधान में कहीं भी अगरबत्ती का उल्लेख नहीं मिलता सब जगह धूप ही लिखा हुआ मिलता है। अगरबत्ती केमिकल से बनाई जाती है भला केमिकल या बांस जलने से भगवान खुश कैसे होंगे?
1. गणेशजी को तुलसी का पत्र छोड़कर सब पत्र प्रिय हैं।
भैरव की पूजा में तुलसी स्वीकार्य नहीं है।
2. कुंद का पुष्प शिव को माघ महीने को छोड़कर निषेध है।
3. बिना स्नान किये जो तुलसी पत्र जो तोड़ता है उसे देवता स्वीकार नहीं करते।
4. रविवार को दूर्वा नहीं तोड़नी चाहिए।
5. केतकी पुष्प शिव को नहीं चढ़ाना चाहिए।
6. केतकी पुष्प से कार्तिक माह में विष्णु की पूजा अवश्य करें।
7. देवताओं के सामने प्रज्जवलित दीप को बुझाना नहीं चाहिए।
8. शालिग्राम का आवाह्न तथा विसर्जन नहीं होता।
9. जो मूर्ति स्थापित हो उसमें आवाहन और विसर्जन नहीं होता।
10. तुलसीपत्र को मध्यान्ह के बाद ग्रहण न करें।
11. पूजा करते समय यदि गुरुदेव,ज्येष्ठ व्यक्ति या पूज्य व्यक्ति आ जाए तो उनको उठ कर प्रणाम कर उनकी आज्ञा से शेष कर्म को समाप्त करें।
12. मिट्टी की मूर्ति का आवाहन और विसर्जन होता है और अंत में शास्त्रीयविधि से गंगा प्रवाह भी किया जाता है।
13. कमल को पांच रात,बिल्वपत्र को दस रात और तुलसी को ग्यारह रात बाद शुद्ध करके पूजन के कार्य में लिया जा सकता है।
14. पंचामृत में यदि सब वस्तु प्राप्त न हो सके तो केवल दुग्ध से स्नान कराने मात्र से पंचामृतजन्य फल जाता है।
15. शालिग्राम पर अक्षत नहीं चढ़ता। लाल रंग मिश्रित चावल चढ़ाया जा सकता है।
16. हाथ में धारण किये पुष्प, तांबे के पात्र में चन्दन और चर्म पात्र में गंगाजल अपवित्र हो जाते हैं।
17. पिघला हुआ घी और पतला चन्दन नहीं चढ़ाना चाहिए।
18. दीपक से दीपक को जलाने से प्राणी दरिद्र और रोगी होता है। दक्षिणाभिमुख दीपक को न रखें।
देवी के बाएं और दाहिने दीपक रखें। दीपक से अगरबत्ती जलाना भी दरिद्रता का कारक होता है।
19. द्वादशी, संक्रांति, रविवार, पक्षान्त और संध्याकाल में तुलसीपत्र न तोड़ें।
20. प्रतिदिन की पूजा में सफलता के लिए दक्षिणा अवश्य चढ़ाएं।
21. आसन, शयन, दान, भोजन, वस्त्र संग्रह, विवाद और विवाह के समयों पर छींक शुभ मानी गई है।
22. जो मलिन वस्त्र पहनकर, मूषक आदि के काटे वस्त्र, केशादि बाल कर्तन युक्त और मुख दुर्गन्ध युक्त हो, जप आदि करता है उसे देवता नाश कर देते हैं।
23. मिट्टी, गोबर को निशा में और प्रदोषकाल में गोमूत्र को ग्रहण न करें।
24. मूर्ति स्नान में मूर्ति को अंगूठे से न रगड़ें।
25. पीपल को नित्य नमस्कार पूर्वाह्न के पश्चात् दोपहर में ही करना चाहिए। इसके बाद न करें।
26. जहां अपूज्यों की पूजा होती है और विद्वानों का अनादर होता है, उस स्थान पर दुर्भिक्ष, मरण और भय उत्पन्न होता है।
27. पौष मास की शुक्ल दशमी तिथि, चैत्र की शुक्ल पंचमी और श्रावण की पूर्णिमा तिथि को लक्ष्मी प्राप्ति के लिए लक्ष्मी का पूजन करें।
28. कृष्णपक्ष में, रिक्तिका तिथि में, श्रवणादी नक्षत्र में लक्ष्मी की पूजा न करें।
29. अपराह्नकाल में, रात्रि में, कृष्ण पक्ष में, द्वादशी तिथि में और अष्टमी को लक्ष्मी का पूजन प्रारम्भ न करें।
30. मंडप के नव भाग होते हैं, वे सब बराबर-बराबर के होते हैं अर्थात् मंडप सब तरफ से चतुरासन होता है, अर्थात् टेढ़ा नहीं होता। जिस कुंड की श्रृंगार द्वारा रचना नहीं होती वह यजमान का नाश करता है।
शौर्यपथ / कई ऐसी चीजें शास्त्रों और धर्म-पुराणों में बताई हैं, जिनके उधार लेने और दान करने से भी परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है। आइए आज हम आपको बताते हैं उन चीजों के बारे में जो ना उधार लेना चाहिए और ना ही दान में देना चाहिए।
पेन
शास्त्रों के अनुसार, चित्रगुप्त हमारे कर्मों को यमराज के यहां लिखते हैं। चित्रगुप्त अपनी लेखनी से हमारे जीवन में आगे आने वाली परेशानियों या खुशियों का खाका तैयार कर रहे होते हैं। इसलिए जीवन में कलम को बड़ा महत्व दिया गया है। वेदों के अनुसार, अपनी कलम को किसी के साथ बांटना या फिर किसी से कलम उधार लेना तरक्की में बाधक होसकता है।
घड़ी
कई लोग घड़ी का आदान प्रदान भी करते हैं। लेकिन याद रहे ऐसा करना आपकी मुश्किलें बढ़ा सकता है। इसलिए कभी किसी दूसरे व्यक्ति को अपनी घड़ी नहीं पहनना चाहिए। चूंकि घड़ी को व्यक्ति के जीवन के समय से जोड़कर देखा जाता है। ऐसे में किसी और की घड़ी को अपनी कलाई पर बांधने से आपकी प्रोफेशनल लाइफ में समस्या आ सकती है। अगर आपका अच्छा समय चल रहा होगा तो वह उधार लेने वाले के पास चला जाएगा और अगर घड़ी के मालिक का बुरा वक़्त चल रहा होगा तो वह लेने वाले के पास आ जाएगा। इसलिए देन और लेन दोनों से बचें।
कंघा
हमेशा अपने कंघे का ही उपयोग करना चाहिए। किसी दूसरे का कंघा इस्तेमाल करना सेहत और शास्त्र दोनों के लिहाज से हितकारी नही है। ना सिर्फ कंघे बल्कि सिर से संबंधित सभी सामग्री को कभी भी दूसरे से साझा नहीं करना चाहिए। इससे आपके भाग्य पर विपरीत असर पड़ सकता है।
अंगूठी
अंगूठी पुरुष और महिलाएं दोनों ही पहनती हैं, अंगूठी बदलना या उधार लेना आम बात है। इसे जीवन में आने वाली विपरीत परिस्थितियों से जोड़कर देखा गया है। कभी भी किसी दूसरे की अंगूठी न पहननी चाहिए और न ही लेनी, न देनी
चाहिए। यदि आप ऐसा करते हैं, तो आपके जीवन में न केवल मुश्किलें आएंगी बल्कि आपको आर्थिक समस्या का सामना भी करना पड़ सकता है।
कपड़े
किसी को भी दूसरे व्यक्ति के कपड़े नहीं लेना चाहिए। ऐसा करना ना सिर्फ शास्त्रों में मना है, बल्कि स्वास्थ्य की दृष्टि से भी यह ठीक नहीं है। शास्त्रों की मानें तो किसी दूसरे के कपड़े पहनने से आपका भाग्य आपसे नाराज हो जाता है और दुर्भाग्य आपको चारों तरफ से घेर लेता है। इसके बाद आपको कई समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है।
धर्म संसार / शौर्यपथ / मंत्र जप एक ऐसा उपाय है, जिससे सभी समस्याएं दूर हो सकती हैं। शास्त्रों में मंत्रों को बहुत शक्तिशाली और चमत्कारी बताया गया है। सबसे ज्यादा प्रभावी मंत्रों में से एक मंत्र है गायत्री मंत्र। इसके जप से बहुत जल्दी शुभ फल प्राप्त हो सकते हैं।
गायत्री मंत्र जप का समय :
गायत्री मंत्र जप के लिए 3 समय बताए गए हैं, जप के समय को संध्याकाल भी कहा जाता है।
* गायत्री मंत्र के जप का पहला समय है सुबह का। सूर्योदय से थोड़ी देर पहले मंत्र जप शुरू किया जाना चाहिए। जप सूर्योदय के बाद तक करना चाहिए।
* मंत्र जप के लिए दूसरा समय है दोपहर का। दोपहर में भी इस मंत्र का जप किया जाता है।
* इसके बाद तीसरा समय है शाम को सूर्यास्त से कुछ देर पहले। सूर्यास्त से पहले मंत्र जप शुरू करके सूर्यास्त के कुछ देर बाद तक जप करना चाहिए।
यदि संध्याकाल के अतिरिक्त गायत्री मंत्र का जप करना हो तो मौन रहकर या मानसिक रूप से करना चाहिए। मंत्र जप अधिक तेज आवाज में नहीं करना चाहिए।
पवित्र और चमत्कारी गायत्री मंत्र :
ॐ भूर्भुव: स्व: तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि। धियो यो न: प्रचोदयात्।।
गायत्री मंत्र का अर्थ :
- सृष्टिकर्ता प्रकाशमान परामात्मा के तेज का हम ध्यान करते हैं, परमात्मा का वह तेज हमारी बुद्धि को सद्मार्ग की ओर चलने के लिए प्रेरित करें।
गायत्री मंत्र जप की विधि :
* इस मंत्र के जप करने के लिए रुद्राक्ष की माला का प्रयोग करना श्रेष्ठ होता है।
* जप से पहले स्नान आदि कर्मों से खुद को पवित्र कर लेना चाहिए।
* मंत्र जप की संख्या कम से कम 108 होनी चाहिए।
* घर के मंदिर में या किसी पवित्र स्थान पर गायत्री माता का ध्यान करते हुए मंत्र का जप करना चाहिए।
गायत्री मंत्र जप के 8 फायदे
* उत्साह एवं सकारात्मकता बढ़ती है।
* धर्म और सेवा कार्यों में मन लगता है।
* पूर्वाभास होने लगता है।
* आशीर्वाद देने की शक्ति बढ़ती है।
* स्वप्न सिद्धि प्राप्त होती है।
* क्रोध शांत होता है।
* त्वचा में चमक आती है।
* बुराइयों से मन दूर होता है।
Feb 09, 2021 Rate: 4.00
