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सेहत /शौर्यपथ / बढ़ते वजन से छुटकारा पाने के लिए अगर आप योगा, एक्सरसाइज, वॉक और जॉगिंग जैसे सभी विकल्प अपनाकर थक चुके हैं तो अब एक्यूप्रेशर की मदद लेकर देखिए। मोटापा घटाने और बढ़ते वजन को कम करने में एक्यूप्रेशर बेहद कमाल की भूमिका निभाता है। दरअसल, व्यक्ति के शरीर में कुछ खास बिंदु होते हैं जिन्हें दबाने से बड़ी आसानी से कई किलो वजन कम किया जा सकता है। आइए जानते हैं कौन से हैं वो खास बिंदु।
नाभि के नीचे बिंदु-
नाभि के 1 इंच नीचे एक बिंदु होता है। इस बिंदु को दो अंगुलियों से 2 मिनट के लिए दबाएं या मालिश करें। ऐसा करने से न केवल गैस दूर होती है बल्कि पाचन शक्ति बेहतर होती है।
कोहनी के पास स्थित बिंदु-
कोहनी के पास स्थित बिंदु को अगर दबाया जाए तो न सिर्फ शरीर का तापमान नियंत्रित होता है बल्कि यह मोटापे को कम करने में भी मदद करता है। रोजाना 1 मिनट तक नियमित रूप से इस बिंदु को दबाने से शरीर की गर्मी और जरूरत से ज्यादा पानी निकालने में भी मदद मिलती है।
नाक और होंठ के बीच में बना बिंदु-
नाक और होंठ के बीच में स्थित बिंदु को दबाने से ना सिर्फ तनाव दूर होता है बल्कि इससे मोटापे की समस्या भी दूर होती है। इस बिंदु को दबाने से तनाव संबंधित हॉर्मोन भी संतुलित रहते हैं।
कान के बीच में स्थित बिंदु-
कान के बीच में स्थित बिंदु को एक्यूप्रेशर में केंद्र बिंदु भी कहा जाता है। इस बिंदु को अपनी अंगुली की मदद से 1 या 2 मिनट तक दबाने से आप अपने बढ़ते वजन को कम कर सकते हैं। इस बिंदु पर जब दबाव पड़ता है तो व्यक्ति की भूख भी नियंत्रित होती है।
सेहत / शौर्यपथ / लहसुन में मौजूद गुणकारी तत्व हमें कई बीमारियों से बचा सकते हैं। इसे इस्तेमाल करने का सबसे आसान तरीका है दाल-सब्जी या हरे साग में लहसुन का छौंक लगाना।
खाने में स्वाद को बढ़ाने के लिए लहसुन का प्रयोग तो काफी समय से किया जा रहा है। लेकिन क्या आपको पता है कि लहसुन में ऐसे गुणकारी तत्व होते हैं, जो आपको कई बीमारियों से बचा सकते हैं। यूं तो हर मसाले में अपने आप में ही कई आयुर्वेदिक औषधीय खूबियां होती हैं, लेकिन लहसुन में ऐसे एंटीऑक्सीडेंट गुण होते हैं जो आपको एक नहीं बल्कि कई बीमारियों से बचा सकते हैं।
पोषण का खजाना है लहसुन
लहसुन कम कैलोरी और न्यूट्रिएंट्स से भरपूर एक बेहद ही अच्छा खाद्य पदार्थ है। यूनाइटेड स्टेट्स डिपार्टमेंट ऑफ एग्रीकल्चर के डाटा के अनुसार लहसुन की एक गांठ में रोज के खाने लायक लगभग 2% मैग्नीज, 2% विटामिन बी-6, 1% विटामिन सी, 1% सेलेनियम और 0.06 ग्राम फाइबर के साथ-साथ कैल्शियम, कॉपर, पोटेशियम, फॉस्फोरस, आयरन और विटामिन बी-1 जैसे सेहतमंद तत्व मौजूद होते हैं।
कई तरीकों से किया जा सकता है लहसुन का सेवन
आयुर्वेद में लहसुन को कच्चा खाने की सलाह दी गई है। पर इसका तीखा स्वाद और गंध आपके लिए मुश्किल हो सकता है। इसलिए दादी-नानी ने जो सबसे आसान उपाय सुझाया वह है दाल, सब्जी या हरे साग में लहसुन का छौंक लगाना। इससे न सिर्फ खाने का स्वाद बढ़ जाता है, बल्कि उसके पोषक तत्वों में भी बढ़ोतरी हो जाती है।
असल में लहसुन को चाहें कच्चा खाया जाए, उबाल कर, भूनकर खाया जाए, ये हर तरह से लाजवाब होता है। खास बात यह कि खाली पेट लहसुन का सेवन भी आपके लिए लाभदायक हो सकता है।
इसके फायदों को देखते हुए डॉक्टर भी किसी न किसी रूप में हमें लहसुन को अपनी डाइट में शामिल करने की सलाह देते हैं। चलिए हम आपको इस गुणकारी लहसुन के फायदे बताते हैं-
अब जानिए क्यों जरूरी है सर्दियों के मौसम में जरूरी है सब्जियों में लहसुन का छौंक
1. कोल्ड से दे सकता है आराम
लहसुन हमें सर्दियों में होने वाले कोल्ड और फ्लू से आराम दिलाता है। दरअसल लहसुन में मौजूद एंटीऑक्सीडेंट्स हमारे इम्यून सिस्टम को बूस्ट करने में बहुत मदद करते हैं। एक स्टडी के मुताबिक लहसुन कोल्ड के लक्षणों को 70% तक कम कर सकता है। यहां तक कि यह हमें कई और बीमारियों से भी दूर रहने में हमारी मदद करता है।
2. हार्ट अटैक के खतरे को करता है कम
कोलेस्ट्रॉल लेवल और ब्लड प्रेशर के बढ़ने से हार्ट अटैक की संभावना बढ़ जाती है। नेशनल सेंटर फॉर बायोटेक्नोलॉजी इंफॉर्मेशन में प्रकाशित एक स्टडी के अनुसार लहसुन हमारे ब्लड प्रेशर को भी नियंत्रित रखता है। इसी वजह से लहसुन खाने वाले लोगों को हार्ट अटैक आने के कम चांस होते हैं।
3. डाइजेशन को सुधारता है
सर्दियों में डाइजेस्टिव प्रॉब्लम्स भी बढ़ जाती हैं। इसकी वजह है अधिक आहार और कम सक्रियता। पर लहसुन पाचन संबंधी समस्याओं से आपको राहत दिला सकता है। नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ हेल्थ में प्रकाशित एक जर्नल के मुताबिक लहसुन खाने से हमारे इंटेस्टाइन में मौजूद बैड बैक्टीरिया साफ हो जाते हैं। साथ ही इसकी एंटी-इन्फ्लेमेटरी प्रॉपर्टीज हमारे इंटेस्टाइन और पेट में इन्फ्लेमेशन को भी कम करती हैं।
4. त्वचा के लिए भी है लाभदायक
लहसुन के अंदर एंटीऑक्सीडेंट, एंटीफंगल और एंटीबैक्टीरियल प्रॉपर्टीज मौजूद होती हैं, जो हमारी त्वचा के लिए बेहद फायदेमंद होती हैं। यह एक्ने और एक्ने मार्क्स जैसी समस्या से भी हमें बचाता है।
5. शरीर को रखता है गर्म
लहसुन सर्दियों में और भी ज्यादा फायदेमंद होता है। आयुर्वेद के मुताबिक इसकी तासीर गर्म होने की वजह से यह सर्दियों में हमारे शरीर को गर्म रहने में मदद करता है। दाल और सब्जियों में लहसुन मिलाकर या फिर सुबह-सुबह एक कली कच्चे लहसुन की खाने से सर्दियों में हमारा शरीर गर्म महसूस करता है और हम सर्दी-जुकाम से भी बचे रहते हैं।
खाना खजाना /शौर्यपथ /अक्सर उबली हुई दाल का स्वाद बढ़ाने के लिए लोग उसमें हींग और जीरे का तड़का लगाते हैं। उबली हुई दाल में लगाया गया यह साधारण सा तड़का उसका स्वाद और सुगंध कई गुना बढ़ा देता है। लेकिन आज हम आपको बताने जा रहे हैं ढाबा -स्टाइल दाल तड़का। यह तड़का न सिर्फ दाल का स्वाद बढ़ाता है बल्कि इसका तरीका भी बेहद आसान है। तो देर किस बात की, आइए जानते हैं कैसे बनाएं स्वादिष्ट दाल तड़का।
ढाबा -स्टाइल तड़का-
इस तरह के तड़के में जीरा, हींग, धनिया पाउडर, लाल मिर्च पाउडर के साथ प्याज, टमाटर, अदरक, लहसुन और हरी मिर्च को पहले पकाया जाता है। इसके बाद इसमें उबली हुई दाल को मिला दिया जाता है। अब दाल में ऊपर से मक्खन या घी के साथ कुछ ताजा कटा हुआ धनिया पत्तों को डालने से दाल का स्वाद बढ़ जाता है।
सरल कलोंजी तड़का-
सरल कलोंजी तड़का में कलोंजी, लाल मिर्च और टमाटर को सरसों के तेल में पकाकर उबली हुई दाल में डाला जाता है।
स्कीन केयर /शौर्यपथ / आप अपने चेहरे को निखारने के लिए आप क्या कुछ उपाय नहीं करते। ऐसे में मार्केट में महंगे प्रॉडक्ट खरीदने में अक्सर आपकी पैसे तो बहुत खर्च हो जाते हैं लेकिन आपको इससे कोई खास फायदा नहीं होता। आप इन प्रॉडक्ट्स को ध्यान से देखने पर पाएंगे कि इसमें भी नेचुरल फल, सब्जियों, मसालों के तत्व होते हैं लेकिन इनकी मात्रा न के बराबर होती है, जिससे इनका जल्दी फायदा नहीं होता है। आज हम आपको ऐसे तीन नेचुरल फेसमास्क बताएंगे, जिनका इस्तेमाल करने से न सिर्फ आपको फायदा होगा बल्कि इससे आपके काफी पैसे भी बच जाएंगे-
शहद और नींबू फेस पैक
शहद में विटामिन, मिनरल्सव, अमीनो एसिड, एंटीऑक्सिडेंट और कुछ एंजाइम होते हैं, जो स्किएन की अंदर से सफाई करते हैं। इस पैक को लगाने से न सिर्फ चेहरे के मुंहासे रोकने में मदद मिलती है बल्किस चेहरे पर इंस्टेंोट ग्लोि भी आता है।
सामग्री-
1 चम्मच शहद
नींबू के रस की कुछ बूंदें
विधि-
एक चम्मच शहद में नींबू के रस की 3-4 बूंदें मिलाएं।
इसे अपने चेहरे पर लगाएं। फिर चेहरे को 20 मिनट के बाद धो लें।
ध्यान दें: नींबू का रस आपकी त्वचा को संवेदनशील बना सकता है। इसलिए बाहर निकलने से पहले सनस्क्रीन जरूर लगा लें।
एलोवेरा, नींबू और शहद
एलोवेरा का फेस पैक मुंहासे को रोकने में मदद करता है। इसे अगर नींबू और शहद के साथ मिला कर लगाया जाए तो स्किपन पर ग्लोे आता है। एलोवेरा स्किन को नमी भी देता है।
सामग्री-
2 बड़े चम्मच एलोवेरा जेल
1 चम्मच नींबू का रस
1 चम्मच शहद
विधि-
एलोवेरा जेल, नींबू का रस और शहद को सीमित मात्रा में मिलाएं।
पैक को अपने चेहरे पर लगाएं।
पैक को 15 मिनट चेहरे पर रखने के बाद सादे पानी से धो लें।
टमाटर और मुल्तानी मिट्टी फेस पैक
टमाटर में लाइकोपीन होता है, जो आपकी त्वचा सूरज की हानिकारक किरणों से बचाता है। मुल्तानी मिट्टी में त्वचा को साफ करने वाले गुण हैं। यह त्वचा को चमकदार बनाए रखने के लिए जानी जाती है।
सामग्री-
1 बड़ा चम्मच मुल्तानी मिट्टी
2 बड़े चम्मच टमाटर का रस
विधि-
मुल्तानी मिट्टी और टमाटर के रस को एक कटोरे में मिलाएं। जब तक अच्छा पेस्ट न बन जाए तब तक इसे फेटते रहें।
फिर चेहरे पर फेस पैक लगाएं और इसे सूखने दें।
पैक सूखने के बाद इसे पानी से धो लें।
अगर आपकी स्किबन सेंसिटिव है, तो अच्छा होगा कि आप चेहरे पर फेस पैक लगाने से पहले शरीर के छोटे हिस्सेा पर पैच टेस्ट कर लें।
धर्म संसार /शौर्यपथ /सकट चौथ का व्रत हर महीने रखा जाता है। माघ महीने में पड़ने वाले सकट चौथ का विशेष महत्व होता है। इस दिन को सकट चौथ, संकष्टी चतुर्थी, माघ चतुर्थी व्रत या तिलकुट चौथ के नाम से भी जानते हैं। इस दिन माताएं अपनी संतान की लंबी आयु की कामना के लिए उपवास करती हैं। कहते हैं कि भगवान गणेश की कृपा से व्रती के सभी दुख दूर हो जाते हैं। इस साल सकट चौथ 31 जनवरी 2021 को है।
सकट चौथ व्रत शुभ मुहूर्त-
सकट चौथ व्रत तिथि- जनवरी 31, 2021 (रविवार)
सकट चौथ के दिन चन्द्रोदय समय – 20:40
चतुर्थी तिथि प्रारम्भ – जनवरी 31, 2021 को 20:24 बजे
चतुर्थी तिथि समाप्त – फरवरी 01, 2021 को 18:24 बजे।
सकट चौथ व्रत कथा-
पौराणिक कथाओं के अनुसार, सकट चौथ के दिन गणेश भगवान के जीवन पर आया सबसे बड़ा संकट टल गया था। इसीलिए इसका नाम सकट चौथ पड़ा। इसे पीछे ये कहानी है कि मां पार्वती एकबार स्नान करने गईं। स्नानघर के बाहर उन्होंने अपने पुत्र गणेश जी को खड़ा कर दिया और उन्हें रखवाली का आदेश देते हुए कहा कि जब तक मैं स्नान कर खुद बाहर न आऊं किसी को भीतर आने की इजाजत मत देना।
गणेश जी अपनी मां की बात मानते हुए बाहर पहरा देने लगे। उसी समय भगवान शिव माता पार्वती से मिलने आए लेकिन गणेश भगवान ने उन्हें दरवाजे पर ही कुछ देर रुकने के लिए कहा। भगवान शिव ने इस बात से बेहद आहत और अपमानित महसूस किया। गुस्से में उन्होंने गणेश भगवान पर त्रिशूल का वार किया। जिससे उनकी गर्दन दूर जा गिरी।
स्नानघर के बाहर शोरगुल सुनकर जब माता पार्वती बाहर आईं तो देखा कि गणेश जी की गर्दन कटी हुई है। ये देखकर वो रोने लगीं और उन्होंने शिवजी से कहा कि गणेश जी के प्राण फिर से वापस कर दें ।इसपर शिवजी ने एक हाथी का सिर लेकर गणेश जी को लगा दिया । इस तरह से गणेश भगवान को दूसरा जीवन मिला । तभी से गणेश की हाथी की तरह सूंड होने लगी। तभी से महिलाएं बच्चों की सलामती के लिए माघ माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को गणेश चतुर्थी का व्रत करने लगीं।
एक अन्य कथा भी है प्रचलित-
व्रत कथा
किसी नगर में एक कुम्हार रहता था। एक बार जब उसने बर्तन बनाकर आंवां लगाया तो आंवां नहीं पका। परेशान होकर वह राजा के पास गया और बोला कि महाराज न जाने क्या कारण है कि आंवा पक ही नहीं रहा है। राजा ने राजपंडित को बुलाकर कारण पूछा। राजपंडित ने कहा, ''हर बार आंवा लगाते समय एक बच्चे की बलि देने से आंवा पक जाएगा।'' राजा का आदेश हो गया। बलि आरम्भ हुई। जिस परिवार की बारी होती, वह अपने बच्चों में से एक बच्चा बलि के लिए भेज देता। इस तरह कुछ दिनों बाद एक बुढि़या के लड़के की बारी आई। बुढि़या के एक ही बेटा था तथा उसके जीवन का सहारा था, पर राजाज्ञा कुछ नहीं देखती। दुखी बुढ़िया सोचने लगी, ''मेरा एक ही बेटा है, वह भी सकट के दिन मुझ से जुदा हो जाएगा।'' तभी उसको एक उपाय सूझा। उसने लड़के को सकट की सुपारी तथा दूब का बीड़ा देकर कहा, ''भगवान का नाम लेकर आंवां में बैठ जाना। सकट माता तेरी रक्षा करेंगी।''
सकट के दिन बालक आंवां में बिठा दिया गया और बुढि़या सकट माता के सामने बैठकर पूजा प्रार्थना करने लगी। पहले तो आंवा पकने में कई दिन लग जाते थे, पर इस बार सकट माता की कृपा से एक ही रात में आंवा पक गया। सवेरे कुम्हार ने देखा तो हैरान रह गया। आंवां पक गया था और बुढ़िया का बेटा जीवित व सुरक्षित था। सकट माता की कृपा से नगर के अन्य बालक भी जी उठे। यह देख नगरवासियों ने माता सकट की महिमा स्वीकार कर ली। तब से आज तक सकट माता की पूजा और व्रत का विधान चला आ रहा है।
आस्था /शौर्यपथ / हिंदू पंचांग के अनुसार, माघ माह साल का 11वां महीना होता है। ज्योतिष शास्त्र में हर माह का अलग महत्व बताया गया है। लेकिन माघ के महीने को विशेष फलकारी माना गया है। मान्यता है कि इस महीने में किए गए कार्यों का शुभ फल मिलता है। माघ महीना मकर संक्रांति से यानी 14 जनवरी से शुरू हो चुका है। शास्त्रों में इस महीने में किए जाने वाले कुछ विशेष कार्यों को बताया गया है। मान्यता है कि इन कार्यों को करने से देवी-देवता प्रसन्न होते हैं और कष्टों से मुक्ति मिलती है।
1. गीता पाठ- माघ महीने में नियमित तौर पर गीता पाठ करना शुभ होता है। कहते हैं कि ऐसा करने से भगवान विष्णु का आशीर्वाद प्राप्त होता है। इसके साथ ही मन शांत रहता है और नकारात्मकता दूर होती है।
2. तिल- माघ महीने में भगवान विष्णु को प्रतिदिन पूजा के दौरान तिल अर्पित करना शुभ होता है। कहते हैं कि ऐसा करने से व्यक्ति को पापों से मुक्ति मिल जाती है। इसके अलावा तिल खाने और पानी में डालकर नहाने से पुण्य की प्राप्ति होती है।
3. दान- शास्त्रों में दान का विशेष महत्व बताया गया है। लेकिन माघ महीने में दान का खास महत्व होता है। कहते हैं कि इस माह में गर्म कपड़े दान करने से पुण्य की प्राप्ति होती है। इसके अलावा देवी-देवताओं का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
4. नियमित पूजा- माघ महीने में पूजा-अर्चना का विशेष महत्व होता है। कहते हैं कि प्रतिदिन घर में पूजा नकारात्मकता दूर होती है। मान्यता है कि माघ महीने में नियमित तौर पर पूजा करने से आर्थिक स्थिति मजबूत होती है और घर में खुशहाली आती है।
धर्म संसार /शौर्यपथ /हिंदू धर्म में व्रतों में सबसे महत्वपूर्ण एकादशी का व्रत होता है। पौष मास में शुक्ल पक्ष को पड़ने वाली एकादशी को पौष पुत्रदा एकादशी कहते हैं। इस दिन भगवान विष्णु की विधि-विधान से पूजा की जाती है। मान्यता है कि पुत्रदा एकादशी का व्रत रखने वालों की भगवान विष्णु सभी मनोकामनाएं पूरी करते हैं। संतान प्राप्ति की कामना के लिए इस व्रत को उत्तम माना जाता है। इस साल पुत्रदा एकादशी 24 जनवरी 2021 को है।
पुत्रदा एकादशी शुभ मुहूर्त-
व्रत प्रारंभ: 23 जनवरी, शनिवार, रात 8:56 बजे।
व्रत समाप्ति: 24 जनवरी, रविवार, रात 10: 57 बजे।
पारण का समय: 25 जनवरी, सोमवार, सुबह 7:13 से 9:21 बजे तक।
संतान की कामना के लिए करें ये काम-
ज्योतिषाचार्यों के अनुसार, संतान कामना के लिए इस दिन भगवान कृष्ण के बाल स्वरूप की पूजा की जाती है। इस दिन सुबह पति-पत्नी को साथ में भगवान कृष्ण की पूजा करनी चाहिए। उन्हें पीले फल, तुलसी, पीले पुष्प और पंचामृत आदि अर्पित करना चाहिए। इसके बाद संतान गोपाल मंत्र का जाप करना चाहिए। मंत्र जाप के बाद पति-पत्नी को साथ में प्रसाद ग्रहण करना चाहिए। एकादशी के दिन भगवान श्रीकृष्ण को पंचामृत का भोग लगाना शुभ माना जाता है।
पुत्रदा एकादशी की कथा
धार्मिक कथाओं के अनुसार, भद्रावती राज्य में सुकेतुमान नाम का राजा राज्य करता था। उसकी पत्नी शैव्या थी। राजा के पास सबकुछ था, सिर्फ संतान नहीं थी। ऐसे में राजा और रानी उदास और चिंतित रहा करते थे। राजा के मन में पिंडदान की चिंता सताने लगी। ऐसे में एक दिन राजा ने दुखी होकर अपने प्राण लेने का मन बना लिया, हालांकि पाप के डर से उसने यह विचार त्याग दिया। राजा का एक दिन मन राजपाठ में नहीं लग रहा था, जिसके कारण वह जंगल की ओर चला गया।
राजा को जंगल में पक्षी और जानवर दिखाई दिए। राजा के मन में बुरे विचार आने लगे। इसके बाद राजा दुखी होकर एक तालाब किनारे बैठ गए। तालाब के किनारे ऋषि मुनियों के आश्रम बने हुए थे। राजा आश्रम में गए और ऋषि मुनि राजा को देखकर प्रसन्न हुए। उन्होंने कहा कि राजन आप अपनी इच्छा बताए। राजा ने अपने मन की चिंता मुनियों को बताई। राजा की चिंता सुनकर मुनि ने कहा कि एक पुत्रदा एकादशी है। मुनियों ने राजा को पुत्रदा एकादशी का व्रत रखने को कहा। राजा वे उसी दिन से इस व्रत को रखा और द्वादशी को इसका विधि-विधान से पारण किया। इसके फल स्वरूप रानी ने कुछ दिनों बाद गर्भ धारण किया और नौ माह बाद राजा को पुत्र की प्राप्ति हुई।
धर्म संसार / शौर्यपथ / भोजन भगवान द्वारा दिया गया प्रसाद है। अन्न को ईश्वर के समान माना जाता है। अग्नि द्वारा पकाए गए अन्न पर सबसे पहला अधिकार अग्नि का ही होता है। कभी भी अन्न का अनादर न होने पाए इसका सदैव ध्यान रखें। कहा जाता है कि अन्न के एक दाने भर से भी किसी को जीवनदान दिया जा सकता है। वास्तु में अन्न को लेकर कुछ आसान से उपाय बताए गए हैं, जिनका अपने जीवन में हमें अवश्य पालन करना चाहिए।
भोजन ग्रहण करने से पहले भगवान को भोग अवश्य लगाएं। अन्न देवता, अन्नपूर्णा माता को धन्यवाद दें। बिना स्नान किए रसोईघर में भोजन नहीं बनाना चाहिए और भोजन बनाते समय परिवार के स्वस्थ रहने का विचार करना चाहिए। हाथ, पैर और मुंह धोने के पश्चात ही भोजन ग्रहण करें। गीले पैरों के साथ भोजन करने से स्वास्थ्य अच्छा रहता है। कभी भी टूटे या गंदे बर्तन में भोजन न करें। थाली को हाथ में उठाकर भी भोजन न करें। जमीन पर बैठकर भोजन ग्रहण करना सबसे उत्तम माना जाता है। बिस्तर पर बैठकर भोजन कभी न करें। स्वादिष्ट न होने पर भी भोजन का कभी तिरस्कार न करें। रसोईघर को हमेशा स्वच्छ रखें। रात में सोने से पहले रसोईघर को स्वच्छ कर लें। रसोईघर में कभी भी अनुपयोगी चीजें न रखें। भंडार गृह में डिब्बे या कनस्तर खाली न रहने दें। भोजन में से गाय, कुत्ते, चींटी और पक्षियों को प्रतिदिन भोजन खिलाएं। गाय को प्रतिदिन रोटी खिलाने से आर्थिक संकट दूर होते हैं। भोजन ग्रहण करते समय न तो किसी से बात करें और न ही कोई अन्य कार्य करें। घर के मुख्य द्वार के सामने रसोईघर न बनवाएं। घर में आए मेहमानों को दक्षिण या पश्चिम दिशा में बैठाकर भोजन कराएं। रसोईघर में पीने का पानी उत्तर-पूर्व दिशा में रखना चाहिए। रसोईघर में पानी और आग को कभी भी पास नहीं रखना चाहिए। डस्टबिन को रसोईघर से बाहर रखें। रसोईघर की दीवारों का रंग पीला, नारंगी या गेरूआं रखें। रसोईघर में पूजा का स्थान न बनाएं। रसोइघर में टूटे फूटे बर्तन या झाडू ना रखें। किचन में प्लाटिक के बर्तन या डिब्बे नहीं रखना चाहिए। रसोईघर में अन्नपूर्णा माता का चित्र लगाएंगे तो घर में बरकत बनी रहेगी। भोजन करने के बाद थाली में कभी हाथ न धोएं। कभी जूठन न छोड़ें। रसोईघर में नल से पानी का टपकना आर्थिक क्षति का संकेत है।
सेहत /शौर्यपथ /सर्दियों के मौसम में हल्दी की गांठ का उपयोग सबसे अधिक लाभदायक है और यह समय हल्दी से होने वाले फायदों को कई गुना बढ़ा देता है क्योंकि कच्ची हल्दी में हल्दी पाउडर की तुलना में ज्यादा गुण होते हैं। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि कच्ची हल्दी के इस्तेमाल के दौरान निकलने वाला रंग हल्दी पाउडर की तुलना में काफी ज्यादा गाढ़ा और पक्का होता है।
कच्ची हल्दी, अदरक की तरह दिखाई देती है। इसे ज्यूस में डालकर, दूध में उबालकर, चावल के व्यंजनों में डालकर, अचार के तौर पर, चटनी बनाकर और सूप में मिलाकर उपयोग किया जा सकता है। आइए जानते हैं हल्दी के 10 गुण -
1. कच्ची हल्दी में कैंसर से लड़ने के गुण होते हैं। यह खासतौर पर पुरुषों में होने वाले प्रोस्टेट कैंसर के कैंसर सेल्स को बढ़ने से रोकने के साथ साथ उन्हें खत्म भी कर देती है। यह हानिकारक रेडिएशन के संपर्क में आने से होने वाले ट्यूमर से भी बचाव करती है।
2. हल्दी में सूजन को रोकने का खास गुण होता है। इसका उपयोग गठिया रोगियों को अत्यधिक लाभ पहुंचाता है। यह शरीर के प्राकृतिक सेल्स को खत्म करने वाले फ्री रेडिकल्स को खत्म करती है और गठिया रोग में होने वाले जोडों के दर्द में लाभ पहुंचाती है।
3. कच्ची हल्दी में इंसुलिन के स्तर को संतुलित करने का गुण होता है। इस प्रकार यह मधुमेह रोगियों के लिए बहुत लाभदायक होती है। इंसुलिन के अलावा यह ग्लूकोज को नियंत्रित करती है जिससे मधुमेह के दौरान दी जाने वाली उपचार का असर बढ़ जाता है। परंतु अगर आप जो दवाइयां ले रहे हैं बहुत बढ़े हुए स्तर (हाई डोज) की हैं तो हल्दी के उपयोग से पहले चिकित्सकीय सलाह अत्यंत आवश्यक है।
4. शोध से साबित हो चका है कि हल्दी में लिपोपॉलीसेच्चाराइड नाम का तत्व होता है इससे शरीर में इम्यून सिस्टम मजबूत होता है। हल्दी इस तरह से शरीर में बैक्टेरिया की समस्या से बचाव करती है। यह बुखार होने से रोकती है। इसमें शरीर को फंगल इंफेक्शन से बचाने के गुण होते है।
5. हल्दी के लगातार इस्तेमाल से कोलेस्ट्रोल सेरम का स्तर शरीर में कम बना रहता है। कोलेस्ट्रोल सेरम को नियंत्रित रखकर हल्दी शरीर को ह्रदय रोगों से सुरक्षित रखती है।
6. कच्ची हल्दी में एंटीबैक्टीरियल और एंटी सेप्टिक गुण होते हैं। इसमें इंफेक्शन से लडने के गुण भी पाए जाते हैं। इसमें सोराइसिस जैसे त्वचा संबंधि रोगों से बचाव के गुण होते हैं।
7. हल्दी का उपयोग त्वचा को चमकदार और स्वस्थ रखने में बहुत कारगर है। इसके एंटीसेप्टीक गुण के कारण भारतीय संस्कृति में विवाह के पूर्व पूरे शरीर पर हल्दी का उबटन लगाया जाता है।
8. कच्ची हल्दी से बनी चाय अत्यधिक लाभकारी पेय है। इससे इम्यून सिस्टम मजबूत होता है।
9. हल्दी में वजन कम करने का गुण पाया जाता है। इसका नियमित उपयोग से वजन कम होने की गति बढ़ जाती है।
10. शोध से साबित होता है कि हल्दी लीवर को भी स्वस्थ रखती है। हल्दी के उपयोग से लीवर सुचारू रुप से काम करता रहता है।
हल्दी विस्मयकारी गुणों से भरपूर है परंतु कुछ लोगों पर इसके विपरीत प्रभाव पड़ सकते हैं। जिन लोगों को हल्दी से एलर्जी है उन्हें पेट में दर्द या डायरिया जैसे लक्षण सामने आ सकते हैं। गर्भवती महिलाओं को कच्ची हल्दी के उपयोग से पहले चिकित्सकीय सलाह ले लेनी चाहिए। इससे खून का थक्का जमना भी प्रभावित हो सकता है जिससे रक्त का बहाव बढ़ जाता है अत: अगर किसी की सर्जरी होने वाली हो तो उन्हें कच्ची हल्दी का सेवन नहीं करना चाहिए।
सेहत /शौर्यपथ /सर्दियों के मौसम में सेहत का ख्याल रखना बहुत जरूरी होता है। ताकि बीमारियों से दूर रहा जा सकें। वहीं ये जिम्मेदारी तब और बढ़ जाती है जब आप गर्भवती होती है। जी हां यदि आप गर्भवती है, तो आपको सर्दियों के मौसम में अपना विशेष ख्याल रखने की जरूरत है, क्योंकि ऐसे में सिर्फ आप अकेली नहीं है आपके साथ एक नन्ही सी जान जुड़ी है, जिसका आपको बहुत अच्छे से और समझदारी के साथ ख्याल रखना है। सर्दियों में सही आहार और कुछ महत्वपूर्ण बातों का ख्याल रखने की जरूरत होती है। तो आइए जानते हैं सर्दियों के मौसम में आपको किन बातों का ख्याल रखना चाहिए....
सर्दियों के मौसम में खुद को एक्टिव रखने के लिए गर्भवती महिलाओं को योग करना चाहिए लेकिन ख्याल रखें कि आप किसी एक्सपर्ट की सलाह के अनुसार ही योग को अपनी दिनचर्या में शामिल करें।
गर्भवती महिलाओं को ठंड से बचाव की जरूरत होती है। इसलिए गर्म कपड़े पहनें। ताकि आप ठंड से बचकर रह सकें। क्योंकि गर्भ में पल रहे बच्चें पर बाहर के मौसम का भी प्रभाव पड़ता है, इसलिए आपको अपनी पूरी अच्छी तरह से देखभाल करनी है। साथ ही पांव में मोजे पहनकर रखें। घर में भी चप्पल पहनकर ही घूमें।
सेहत के लिए पौष्टिक आहार लेना बहुत जरूरी है। सर्दी में रोग-प्रतिरोधक क्षमता मजबूत रहें इसलिए अपनी डाइट का ख्याल रखें।
सर्दियों में गर्भवती महिलाओं की स्किन काफी ड्राई हो जाती है इससे निजात पाने के लिए कोई अच्छा मॉइश्चराइजर लगाएं। इसके अलावा आप बेबी ऑयल का भी इस्तेमाल कर सकते है।
नहाने के बाद अपने पूरे बॉडी पर बेबी ऑयल से हल्के हाथों से मसाज करके गर्म कपड़े पहन लें।
सर्दियों के मौसम में अगर आपको जुकाम सर्दी, बुखार ऐसी कोई भी समस्या होती है, तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें। अपने हिसाब से किसी भी चीज का सेवन न करें। डॉक्टर के परामर्श के बाद ही किसी चीज का सेवन करें।
धर्म संसार /शौर्यपथ /भारतीय पारंपरिक धार्मिक व्यवस्था में देवी-देवता मानवीय स्वरूप में स्वीकार्य हैं। चूंकि सगुण की उपासना करते हैं, इसलिए सगुण की हम मानवीय रूप में ही आराधना करते हैं। उनका जन्म होता है, विवाह होता है। परिवार होता है, निवास, वाहन, बच्चे, पसंद के फूल, फल.... मौसम, महीना... सब कुछ ठीक वैसे ही जैसे इंसान के हुआ करते हैं।
उसी के अनुरूप देवी-देवताओं के वाहन, मास, ऋतु, पसंदीदा फल, फूल, पूजा-पद्धति... मिष्ठान्ना-नेवैद्य इन सबका का भी एक नियम है। जैसे केतकी के फूल पार्वती को चढ़ते हैं, किंतु शिव को नहीं। काला चना दुर्गा को नैवेद्य में भोग लगाया जाता है, लेकिन किसी अन्य देवता को नहीं। आइए जानें कि किस देवता को भोग में क्या प्रिय है
विष्णु का नेवैद्य
भगवान विष्णुजी को खीर या सूजी के हलवे का नेवैद्य बहुत पसंद है। खीर कई प्रकार से बनाई जाती है। खीर में किशमिश, बारीक कतरे हुए बादाम, बहुत थाड़ी-सी नारियल की कतरन, काजू, पिस्ता, चारौली, थोड़े से पिसे हुए मखाने, सुगंध के लिए एक इलायची, कुछ केसर और अंत में तुलसी जरूर डालें।
उसे उत्तम प्रकार से बनाएं और फिर विष्णुजी को भोग लगाने के बाद वितरित करें। मान्यता है कि प्रति रविवार और गुरुवार को विष्णु-लक्ष्मी मंदिर में जाकर विष्णुजी को उक्त उत्तम प्रकार का भोग लगाने से दोनों प्रसन्ना होते हैं।
शिव का भोग
शिव को भांग और पंचामृत का नेवैद्य पसंद है। भोले को दूध, दही, शहद, शकर, घी, जलधारा से स्नान कराकर भांग-धतूरा, गंध, चंदन, फूल, रोली, वस्त्र अर्पित किए जाते हैं। शिवजी को रेवड़ी, चिरौंजी और मिश्री भी अर्पित की जाती है। श्रावण मास में शिवजी का उपवास रखकर उनको गुड़, चना और चिरौंजी के अलावा दूध अर्पित करने से सभी तरह की मनोकामना पूर्ण होती है।
हनुमान को लगाएं भोग
हनुमानजी को हलुआ, पंच मेवा, गुड़ से बने लड्डू या रोठ, डंठल वाला पान और केसर- भात बहुत पसंद हैं। इसके अलावा हनुमानजी को कुछ लोग इमरती भी अर्पित करते हैं। कोई व्यक्ति 5 मंगलवार कर हनुमानजी को चोला चढ़ाकर यह नैवेद्य लगाता है, तो उसके हर तरह के संकटों का अविलंब समाधान होता है।
मां लक्ष्मी को भोग
लक्ष्मीजी को धन की देवी माना गया है। कहते हैं कि अर्थ बिना सब व्यर्थ है। लक्ष्मीजी को प्रसन्ना करने के लिए उनके प्रिय भोग को लक्ष्मी मंदिर में जाकर अर्पित करना चाहिए। लक्ष्मीजी को सफेद और पीले रंग के मिष्ठान्ना, केसर-भात बहुत पसंद हैं।
कम से कम 11 शुक्रवार को जो कोई भी व्यक्ति एक लाल फूल अर्पित कर लक्ष्मीजी के मंदिर में उन्हें यह भोग लगाता है तो उसके घर में हर तरह की शांति और समृद्धि रहती है। किसी भी प्रकार से धन की कमी नहीं रहती।
दुर्गा माता को भोग
माता दुर्गा को शक्ति की देवी माना गया है। दुर्गाजी को खीर, मालपुए, हलुआ, केले, नारियल और मिष्ठान्न बहुत पसंद हैं। नवरात्रि के मौके पर उन्हें प्रतिदिन इसका भोग लगाने से हर तरह की मनोकामना पूर्ण होती है, खासकर माताजी को सभी तरह का हलुआ बहुत पसंद है, नवरात्रि में काला चना उनके नेवैद्य का महत्वपूर्ण हिस्सा होता है। बुधवार और शुक्रवार के दिन दुर्गा मां को विशेषकर नेवैद्य अर्पित किया जाता है। माताजी के प्रसन्ना होने पर वह सभी तरह के संकट दूर होते हैं।
सरस्वती माता भोग
माता सरस्वती को ज्ञान की देवी माना गया है। ज्ञान कई तरह का होता है। स्मृतिदोष है तो ज्ञान किसी काम का नहीं। ज्ञान को व्यक्त करने की क्षमता नहीं है, तब भी ज्ञान किसी काम का नहीं। ज्ञान और योग्यता के बगैर जीवन में उन्नति संभव नहीं। अत: माता सरस्वती के प्रति श्रद्धा होना जरूरी है। माता सरस्वती को दूध, पंचामृत, दही, मक्खन, सफेद तिल के लड्डू तथा धान का लावा पसंद है।
गणेश भोग
गणेशजी को मोदक या लड्डू का नैवेद्य अच्छा लगता है। मोदक भी कई तरह के बनते हैं। महाराष्ट्र में खासतौर पर गणेश पूजा के अवसर पर घर-घर में तरह-तरह के मोदक बनाए जाते हैं। मोदक के अलावा गणेशजी को मोतीचूर के लड्डू भी पसंद हैं। शुद्ध घी से बने बेसन के लड्डू भी पसंद हैं। नारियल, तिल और सूजी के लड्डू भी उनको अर्पित किए जाते हैं।
भगवान श्री राम भोग
भगवान श्रीरामजी को केसर भात, खीर, धनिए का भोग आदि पसंद हैं। इसके अलावा उनको कलाकंद, बर्फी, गुलाब जामुन का भोग भी प्रिय है।
श्रीकृष्ण भोग
भगवान श्रीकृष्ण को माखन और मिश्री का नैवेद्य बहुत पसंद है। इसके अलावा खीर, हलुआ और मावा-मिश्री के लड्डू पसंद हैं।
शौर्यपथ / आज हम आपको चांदी की 4 ऐसी वस्तुओं के बारे में बताएंगे जो घर की सुख और शांति को हमेशा बरकरार रखती है। घर में अमन-चमन हो जाता है। आइए जानते हैं...
1. घर में चांदी का गिलास जरूर रखना चाहिए और इसी से पानी भी पीना चाहिए। चांदी के गिलास से पानी पीने से और इसे घर में रखने से राहु और केतु का प्रकोप कभी नहीं आता।
2. वास्तु शास्त्र के अनुसार घर में चांदी के हाथी रखने से व्यापार में काफी लाभ होता है और व्यापार कभी घाटे में नहीं जाता।
3. चांदी की चैन या अंगूठी पहनने से विवाह में हो रहा विलंब दूर हो जाता है।
4. चांदी का चौकोर टुकड़ा जेब में रखने से नौकरी में आ रही समस्या हल हो जाती है और जल्द से जल्द नौकरी मिल जाती है।
धर्म संसार /शौर्यपथ /प्रयागे माघ पर्यन्त त्रिवेणी संगमे शुभे।
निवासः पुण्यशीलानां कल्पवासो हि कश्यते॥- (पद्मपुराण)
कुंभ में सभी लोग नहीं जा पाते हैं, लेकिन जाने का सोचते जरूर हैं। यह समय दान, जप, ध्यान और संयम का समय रहता है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि कुंभ में जाए बगैर ही कैसे पुण्य लाभ कमाया जा सकता है?
कुंभ में इस वक्त कल्पवास चल रहा है। कुंभ में जहां स्नान करने का महत्व है वहीं कल्पवास में नियम-धरम का पालन करने का महत्व है। दूसरी ओर कुंभ में प्रवचन सुन कर, दान करके और पितरों के लिए तर्पण करके भी लोग पुण्य लाभ कमाते हैं। आप चाहें तो ये सब कुछ करके भी पुण्य लाभ कमा सकते हैं-
1.प्रतिदिन हल्दी मिले बेसन से स्नान करने के पश्चात्य सुबह-शाम संध्यावंदन करते समय भगवान विष्णु का ध्यान करें और निम्न मंत्र-क्रिया से स्वयं को पवित्र करें।
संध्यावंदन का मंत्र :
ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थांगतोऽपि वा।
यः स्मरेत पुण्डरीकांक्ष से बाह्याभ्यंतरः शुचि।
इस मंत्र से आचमन करें-
ॐ केशवायनमः ॐ माधवाय नमः ॐ नाराणाय नमः का जाप करें।
हाथ में नारियल, पुष्प व द्रव्य लेकर यह मंत्र पढ़ें। इसके बाद आचमन करते हुए गणेश, गंगा, यमुना, सरस्वती, त्रिवेणी, माधव, वेणीमाधव और अक्षयवट की स्तुति करें।
2.जब तक कुंभ चल रहा हैं तब तक प्रतिदिन एक वक्त का सादा भोजन करें और मौन रहें।
2.आप किसी योग्य व्यक्ति को दान दे सकते हैं। दान में अन्यदान, वस्त्रदान, तुलादान, फलदान, तिल या तेलदान कर सकते हैं।
3.गाय, कुत्ते, पक्षी, कव्वा, चींटी और मछली को भोजन खिलाएं। गाय को खिलाने से घर की पीड़ा दूर होगी। कुत्ते को खिलाने से दुश्मन आपसे दूर रहेंगे। कव्वे को खिलाने से आपके पितृ प्रसंन्न रहेंगे। पक्षी को खिलाने से व्यापार-नौकरी में लाभ होगा। चींटी को खिलाने से कर्ज समाप्त होगा और मछली को खिलाने से समृद्धि बढ़ेंगी।
4.आप संकल्प लें- किसी किसी भी तरह के व्यवसन का सेवन नहीं करूंगा, क्रोध और द्वेष वश कोई कार्य नहीं करूंगा, बुरी संगत और कुवचनों का त्याग करूंगा और सदा माता-पिता व गुरु की सेवा करूंगा।
शौर्यपथ / आधुनिक विज्ञान के अनुसार अमीबा से लेकर मानव तक की यात्रा में लगभग 1 करोड़ 04 लाख योनियां मानी गई हैं। ब्रिटिश वैज्ञानिक राबर्ट एम.मे. के अनुसार दुनिया में 87 लाख प्रजातियां हैं। उनका अनुमान है कि कीट-पतंगे, पशु-पक्षी, पौधा-पादप, जलचर-थलचर सब मिलाकर जीव की 87 लाख प्रजातियां हैं। हिन्दू मान्यता अनुसार 84 लाख योनियों में भटकने के बाद मानव शरीर मिलता है। परंतु क्या यह सही है या कल्पित है?
'सृष्टि के आदिकाल में न सत् था न असत्, न वायु थी न आकाश, न मृत्यु थी न अमरता, न रात थी न दिन, उस समय केवल वही था जो वायुरहित स्थिति में भी अपनी शक्ति से साँस ले रहा था। उसके अतिरिक्त कुछ भी नहीं था।'- ऋग्वेद
वैदिक ज्ञान के अनुसार यह जगत, आत्मा वा ब्रह्म का ही दूसरा रूप है। इसका विकासक्रम आत्मा से प्रारंभ होकर ही आत्मा पर ही समाप्त होता है। मतलब आत्मा पहले सुप्त होकर पूर्व जागृत की ओर कदम बढ़ाती है। आत्मा जब खुद को आत्मस्वरूप में जान लेती है तब वह ब्रह्म में लीन हो जाती है।
वैदिक ज्ञान के अनुसार यह संपूर्ण ब्रह्मांड पंच कोषों और पंच तत्वों वाला है।
ब्रह्म की जगह हम समझने के लिए अत्मा को रख देते हैं। आप पांच तत्वों को तो जानते ही हैं- आकाश, वायु, अग्नि, जल और ग्रह (धरती या सूर्य)। सब सोचते हैं कि सबसे पहले ग्रहों की रचना हुई फिर उसमें जल, अग्नि और वायु की, लेकिन यह सच नहीं है।
ग्रह या कहें की जड़ जगत की रचना सबसे अंतिम रचना है। तब सबसे पहले क्या उत्पन्न हुआ? जैसे आप सबसे पहले हैं फिर आपका शरीर सबसे अंत में। आपके और शरीर के बीच जो है आप उसे जानें। अग्नि जल, प्राण और मन। प्राण तो वायु है और मन तो आकाश है। शरीर तो जड़ जगत का हिस्सा है। अर्थात धरती का। जो भी दिखाई दे रहा है वह सब जड़ जगत है।
नीचे गिरने का अर्थ है जड़ हो जाना और ऊपर उठने का अर्थ है ब्रह्माकाश हो जाना। अब इन पांच तत्वों से बड़कर भी कुछ है क्योंकि सृष्टि रचना में उन्हीं का सबसे बड़ा योगदान रहा है।
पंच कोष : जड़, प्राण, मन, बुद्धि और आनंद/ अवस्था: जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीय।
'एक आत्मा है जो अन्नरसमय है (जड़), एक अन्य आंतर आत्मा है, प्राणमय (वायु) जो कि उसे पूर्ण करता है- एक अन्य आंतर आत्मा है, मनोमय (मन)- एक अन्य आंतर आत्मा है, विज्ञानमय (सत्यज्ञानमय)- एक अन्य आंतर आत्मा है, आनंदमय (ब्रह्माकाश)। '-तैत्तिरीयोपनिषद
भावार्थ : जड़ में प्राण; प्राण में मन; मन में विज्ञान और विज्ञान में आनंद। यह चेतना या आत्मा के रहने के पांच स्तर हैं। आत्मा इनमें एक साथ रहती है। यह अलग बात है कि किसे किस स्तर का अनुभव होता है। ऐसा कह सकते हैं कि यह पांच स्तर आत्मा का आवरण है। कोई भी आत्मा अपने कर्म प्रयास से इन पांचों स्तरों में से किसी भी एक स्तर का अनुभव कर उसी के प्रति आसक्त रहती है। सर्वोच्च स्तर आनंदमय है और निम्न स्तर जड़।
अंतत: जड़ या अन्नरसमय कोष दृष्टिगोचर होता है। प्राण और मन का अनुभव होता है किंतु जाग्रत मनुष्य को ही विज्ञानमय कोष समझ में आता है। जो विज्ञानमय कोष को समझ लेता है वही उसके स्तर को भी समझता है।
अभ्यास और जाग्रति द्वारा ही उच्च स्तर में गति होती है। अकर्मण्यता से नीचे के स्तर में चेतना गिरती जाती है। इस प्रकृति में ही उक्त पंच कोषों में आत्मा विचरण करती है किंतु जो आत्मा इन पाँचों कोष से मुक्त हो जाती है ऐसी मुक्तात्मा को ही ब्रह्मलीन कहा जाता है। यही मोक्ष की अवस्था है।
इस तरह वेदों में जीवात्मा के पांच शरीर बताए गए हैं- जड़, प्राण, मन, विज्ञान और आनंद। इस पांच शरीर या कोष के अलग-अलग ग्रंथों में अलग-अलग नाम हैं जिसे वेद ब्रह्म कहते हैं उस ईश्वर की अनुभूति सिर्फ वही आत्मा कर सकती है जो आनंदमय शरीर में स्थित है। देवता, दानव, पितर और मानव इस हेतु सक्षम नहीं।
आज जो मनुष्य रूप में कोई आत्मा है वह अरबों वर्ष पूर्व...जड़ होने से पहले अंधकार में सुप्तावस्था में मौजूद थी। जड़ से ही क्रमश: आगे बढ़ते हुए वह पत्थर, पौधे, जीव और अन्य प्राणियों में खुद को अभिव्यक्त करते हुए मनुष्य रूप में प्रकट हुई। अरबों वर्ष का सफर तब मिट्टी में मिल जाता है जब कोई मनुष्य पाप कर्मों से अपनी चेतना का स्तर गिराकर नीचे की योनियों में जन्म ले लेता है।
Feb 09, 2021 Rate: 4.00
