
CONTECT NO. - 8962936808
EMAIL ID - shouryapath12@gmail.com
Address - SHOURYA NIWAS, SARSWATI GYAN MANDIR SCHOOL, SUBHASH NAGAR, KASARIDIH - DURG ( CHHATTISGARH )
LEGAL ADVISOR - DEEPAK KHOBRAGADE (ADVOCATE)
ओपिनियन / शौर्यपथ /खबर अमेरिका से आई है। मगर चिंता पूरी दुनिया की है। कोरोना का हाल सुधरते-सुधरते अचानक बिगड़ता नजर आया। अनिश्चितता बढ़ रही है कि यह बीमारी काबू में आती दिखे, तब भी चैन से नहीं बैठा जा सकता। इसी तरह, अमेरिका में बेरोजगारी भत्ता मांगने वालों की गिनती भी पिछले हफ्ते अचानक तेजी से उछली है। जुलाई के पहले हफ्ते में करीब 3.20 करोड़ अमेरिकियों ने यह भत्ता लिया है। कोरोना की वजह से हरेक बेरोजगार के खाते में 600 डॉलर अलग से पहुंचते हैं। सरकार पर दबाव बन रहा है कि कोरोना थम नहीं रहा है और इस मदद की मीयाद भी बढ़ाई जाए। इधर, 18 जुलाई को जो हफ्ता खत्म हुआ, उसमें करीब 14 लाख नए लोगों ने बेरोजगारी भत्ते की अर्जी लगाई है। यह पिछले हफ्ते से करीब एक लाख नौ हजार ज्यादा है। ऐसी बढ़त पिछले चार महीने में पहली बार हुई है। इससे यह आशंका मजबूत हो रही है कि रोजगार के मोर्चे पर अमेरिका में हालत खराब है।
इसके उलट भारतीय रोजगार बाजार में धीरे-धीरे सुधार दिख रहा है। सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (सीएमआईई) के अनुसार, शहरी इलाकों में रोजगार का आंकड़ा अप्रैल के 26 प्रतिशत से बढ़ते-बढ़ते जुलाई में करीब 38 प्रतिशत तक पहुंच चुका है। शहरी इलाकों में लोगों के काम पर लौटने की रफ्तार तेज है और इसमें ज्यादातर वे लोग हैं, जो मध्यमवर्गीय घरों में जरूरी काम करते हैं। जैसे बाई, रसोइए, ड्राइवर या सफाईकर्मी। इस तरह के लोग ही सबसे तेजी से काम पर लौटे हैं और इसका नतीजा है कि मध्यवर्ग के लिए अब लॉकडाउन शायद उतना कष्टकारी नहीं रह गया है।
हालांकि सीएमआईई के ही एक सर्वे में पता चला है कि लोगों के बजट टाइट हो रहे हैं। खासकर अप्रैल से जून के बीच बहुत से परिवारों की कमाई पर भारी असर पड़ा है। जहां पिछले साल इस दौरान 33 प्रतिशत परिवारों ने कहा था कि उनकी कमाई बढ़ गई है, वहीं इस साल ऐसा कहने वालों की गिनती छह प्रतिशत के आसपास है। हालांकि कई और आंकड़े हैं, जिन्हें देखकर लगता है कि कामकाज वापस पटरी पर आ रहा है। दोपहिया बेचने वाली देश की सबसे बड़ी कंपनियों की बिक्री में तेज उछाल दिख रहा है। जून में हीरो मोटो ने साढ़े चार लाख गाड़ियां बेचीं, मई से चार गुना ज्यादा। हालांकि, पिछले साल के जून के मुकाबले यह 26 प्रतिशत कम है। कंपनी के चेयरमैन सुनील मुंजाल के अनुसार, सबसे अच्छी मांग गांव और कस्बों से आ रही है। इसकी वजह सरकार के आर्थिक पैकेज से निकली रकम का इन इलाकों तक पहुंचना है। सामान्य मॉनसून और रबी की बंपर पैदावार के बाद उन्हें लग रहा है कि अब अगर कोई नया झटका नहीं लगा, तो साल खत्म होते-होते बिक्री में इतनी तेजी आ चुकी होगी कि दो महीने की बंदी से हुआ नुकसान भी धुल जाएगा।
रोजमर्रा की चीजें बनाने वाली कंपनियों का हाल भी अलग नहीं है। जिस दौरान पूरा देश लॉकडाउन की सबसे गंभीर मार झेल रहा था, उसी समय यानी अप्रैल से जून के बीच ब्रिटैनिया का मुनाफा पिछले साल से दोगुने से भी ज्यादा हो गया। यही हाल कुछ अन्य कंपनियों का है।
दूसरी तरफ, कोरोना के आंकड़े देखिए, जो डरावनी रफ्तार से बढ़ रहे हैं। इसके बावजूद शेयर बाजार को देखिए, तो लगता ही नहीं कि कहीं कोई मुसीबत है। भारी गिरावट के बाद सेंसेक्स और निफ्टी फिर से नई ऊंचाई की ओर रेस लगा रहे हैं। छोटी और मंझोली कंपनियों में भी तेजी दिख रही है। बाजार में इस तेजी के कई कारण बताए जा रहे हैं। एक तो नए लोगों को बताया जा रहा है कि भारी गिरावट के बाद बाजार में तेजी आती है और ऐसी गिरावट ही पैसा बनाने के लिए सबसे अच्छा समय होता है। इस चक्कर में बहुत से नए लोग शेयर बाजार में आ गए हैं। लेकिन 23 मार्च की तेज गिरावट के बाद उछाल की शुरुआत इन लोगों के भरोसे नहीं हुई थी। दरअसल, अमेरिका और यूरोप के कई देशों में सरकारों ने बहुत बड़ी रकम लोगों के हाथों में खर्च करने के लिए दी है। उस पैसे का एक बड़ा हिस्सा उन देशों के म्यूचुअल फंड के रास्ते भारत पहुंचा है। यह रकम कुछ गिनी-चुनी बड़ी कंपनियों में ही लगती है, लेकिन इससे आई तेजी से दूसरे निवेशक आकर्षित होते हैं।
एक समस्या यह है कि बैंकों में पैसा रखना करीब-करीब बेकार लगने लगा है। ऐसे में, अगर कोई शेयर बाजार का लालच दिखा दे, तो मन मचलना स्वाभाविक है। कुछ लोग हिम्मत कर रहे हैं और कूद रहे हैं। जनवरी से मई के बीच देश में करीब 29 लाख नए डीमैट अकाउंट खुले हैं और शेयर बाजार में कैश सेगमेंट में जो कारोबार हो रहा है, अप्रैल से जून के बीच उसका आधे से ज्यादा हिस्सा छोटे निवेशकों से ही आया है। पिछले साल से मुकाबला करें, तो इस दौरान रिटेल निवेशकों का कारोबार 78 प्रतिशत बढ़ा है और उन्होंने 33 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा का लेन-देन किया है।
बाजार में इस तेजी से सबको मजा आ रहा है, लेकिन यह खतरनाक स्थिति है। रिजर्व बैंक के गवर्नर ने भी शुक्रवार को जारी फाइनेंशियल स्टैबिलिटी रिपोर्ट में चिंता जताई है कि बाजार और बाजार के सूचकांक जिस तरह चल रहे हैं, उनका देश की आर्थिक स्थिति या जमीनी सच्चाई से कोई रिश्ता नहीं दिखता। रिपोर्ट में आशंका जताई गई है कि बैंकों के डूबे कर्ज दोगुने हो सकते हैं और उस स्तर पर पहुंच जाएंगे, जहां पिछले 20 साल में कभी नहीं रहे। साफ है, जमीनी तकलीफ दूर किए बिना इस समस्या से पार नहीं पाया जा सकता। आर्थिक विशेषज्ञ शोभना सुब्रमण्यम कहती हैं कि सरकार को बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट पर खर्च करना होगा। इसके लिए कम से कम चार-पांच लाख करोड़ रुपये का कर्ज लेना होगा। सवाल है कि इस वक्त सरकार कर्ज लेगी, तो चुकाएगी कब और कैसे? क्या कमाई का कोई दूसरा रास्ता है? काम-धंधे बिगड़ते रहे, तो टैक्स की कमाई भी घटेगी। रास्ता एक ही है कि सरकार खर्च करे। इसके लिए पूर्व वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा का सुझाव है कि सरकार को सारी हिचक और रेटिंग वगैरह की चिंता छोड़ नए नोट छापने चाहिए और उसे प्रोजेक्ट्स में भी लगाने चाहिए और जनता की जेब में भी पैसा डालना चाहिए। इससे इकोनॉमी में वह रफ्तार आ सकेगी, जो इस आपदा को अवसर में बदल पाएगी।
(ये लेखक के अपने विचार हैं) आलोक जोशी, वरिष्ठ पत्रकार
शौर्यपथ । सेहत । शिक्षा । ज्यादातर लोगों को क्या लगता है कि सेक्स के बाद सभी कपल्स फिल्मों की तरह एक दूसरे को बांहों में भर कर सो जाते हैं या फिर दोनों एक दूसरे से प्यार भरी बातें करते हैं। जबकि ऐसा नहीं है, क्योंकि फिल्मों में जैसा दिखाते हैं वैसा आपके साथ रियल में भी हो ऐसा मुमकिन नहीं है। आज हम आपको कुछ ऐसी बातें बताने जा रहे हैं, जिनको जानकर आपका ये भ्रम दूर हो जाएगा। जी हां कुछ कपल्स ने सेक्स के बाद एक दूसरे के साथ ऐसा व्यवहार किया जो हैरान करने लायक था। एक कपल ने बताया कि जब उन्होंने पहली बार सेक्स किया तो मर्द पार्टनर सेक्स के बाद बिल्कुल चुप हो गया। घर जाकर बाद में उसने मैसेज करके पूछा कि बैड पर मैं कितना सक्सेस हुआ। मर्द पार्टनर को ये लग रहा था कि कहीं अगर महिला को मजा नहीं आया तो शायद वो उससे इस बात के लिए रिश्ता भी तोड़ सकती है। एक कपल ने बताया कि जब उन्होंने सेक्स किया तो महिला पार्टनर सेक्स के तुरंत बाद बहुत जोर-जोर से रोने लगी। जब वो ज्यादा देर तक रोने लगी तो मर्द पार्टनर ने उससे पूछा कि तुम क्यों रो रही हो तो महिला पार्टनर ने बताया कि कुछ दिनों पहले तुम्हारी मां से मेरी लड़ाई हो गई थी। एक लड़के ने बताया कि एक बार उसने एक लड़की के साथ सेक्स किया तो उससे पहले हमने काफी देर बात की और एक दूसरे को अपने बारे में बताया। जब हमने सेक्स कर लिया तो लड़की ने बोला कि मेरा असली नाम कुछ और ही है। एक लड़की ने बताया कि एक बार वो अपने बॉयफ्रेंड के साथ सेक्स कर रही थी तो उसे याद आया कि थोड़ी देर बार उसकी रूप मेट आने वाली है। तो लड़की ने सेक्स के तुरंत बाद ही लड़के से कहा कि तुम यहां से निकल जाओ अभी के अभी। फिर लड़की ने बाद में फोन पर लड़के को सारी बात बताई। नोट: 18+ स्टोरी का उद्देश्य अश्लीलता परोसना नहीं, बल्कि सेक्स के प्रति जागरूकता फैलाना है, ताकि आपके जीवन में खुशहाली आए।
सेहत / शौर्यपथ / संतरा एक आम फल हो सकता है लेकिन संतरे के स्वास्थ्य लाभ आम नहीं होते हैं. संतरा का सेवन कर आप कमाल के फायदे ले सकते हैं. संतरे में काफी मात्रा में विटामिन सी की मात्रा पाई जाती है. संतरे में फैट, कोलेस्ट्रॉल और सोडियम की मात्रा न के बराबर होती है.
संतरा एक आम फल हो सकता है लेकिन संतरे के स्वास्थ्य लाभ आम नहीं होते हैं. संतरा का सेवन कर आप कमाल के फायदे ले सकते हैं. संतरे में काफी मात्रा में विटामिन सी की मात्रा पाई जाती है. संतरे में फैट, कोलेस्ट्रॉल और सोडियम की मात्रा न के बराबर होती है. संतरा आपके दिल को स्वस्थ्य रखता है, ये आपकी आंखों को भी सुरक्षित रखता है और संतरे एक खासियत जिसकी हर किसी को जरूरत है. इम्यूनिटी बढ़ाने में संतरा फायदेमंद हो सकता है. संतरा कोलेस्ट्रॉल, डायबिटीज जैसी परेशानियों को दूर करने में भी लाभदायक माना जाता है. संतरे के फायदे कई हैं, लेकिन ऐसा नहीं है कि यह स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक नहीं होता है.संतरे के ज्यादा सेवन से संतरे के दुष्प्रभाव भी हो सकते हैं. अगर आप इम्यून सिस्टम को बूस्ट करना चाहते हैं तो आप संतरे का सेवन बेझिझक कर सकते हैं लेकिन संतरा खाने का भी एक समय होता है जिसमें इसका सेवन करने की सलाह दी जाता है. यहां हम बता रहे हैं संतरे के फायदे और नुकसान के साथ संतरा किस समय खाना नुकसानदायक हो सकता है. संतरे को खाने का क्या है सही समय...
संतरे का सेवन कर पाएं ये कमाल के फायदे 7
1. इम्यूनिटी बढ़ाने में है मददगार
संतरे में विटामिन सी की मात्रा बहुत अच्छी होती है. संतरा विटामिन सी का एक अच्छा स्रोत है. विटामिन सी एक तरह से एंटीऑक्सीडेंट का काम करता है और शरीर में डैमेज सेल्स को रिपेयर करने के साथ-साथ फ्री रेडिकल्स से लड़ता है. संतरा शरीर के इम्यून सिस्टम को मजबूती भी देता है. इम्यूनिटी बढ़ाने के लिए आप संतरे का सेवन कर सकते हैं.
2. कोलेस्ट्रॉल में फायदेमंद है संतरा
संतरे में कोलेस्ट्रॉल नहीं होता है, बल्कि इसके सेवन से शरीर में मौजूद बैड कोलेस्ट्रॉल की मात्रा को कम करने में मदद मिल सकती है. संतरे में मौजूद विटामिन सी आपके शरीर में फ्री रेडिकल्स को न्यूट्रिलाइज कर कोलेस्ट्रॉल को ऑक्सिडाइज करता है, जिससे पहले से जमा हुआ कोलेस्ट्रॉल धीरे-धीरे कम हो सकता है.
3. डायबिटीज में फायदेमंद
संतरा डायबिटीज में फायदेमंद माना जाता है. संतरे में फाइबर की मात्रा अच्छी होती है. फाइबर ब्लड शुगर लेवल को बढऩे से रोक सकता है. अगर संतरे को साबूत खाया जाए तो यह डायबिटीज में मदद कर सकता है अगर आप इसका जूस पिएंगे तो यह ब्लड शुगर लेवल को बढ़ा सकता है क्योंकि जूस निकालने पर इसका फाइबर कम हो सकता है.
4. दिल की बीमारियों को रखे दूर
अगर आप रोज एक संतरा खाते हैं, तो यह दिल की बीमारियों का खतरा कम कर सकता है. इसका कारण यह है कि संतरे में फ्लैवोनॉइड्स होते हैं, जो आर्टरीज के ब्लॉकेज को खोलते हैं और ब्लड सर्कुलेशन को ठीक रखने में मदद कर सकते हैं.
5. कब्ज से राहत दिलाने में फायदेमंद
संतरे में घुलनशील और अघुलनशील दोनों ही प्रकार के फाइबर होते हैं. यह आपके पेट को भी भरा रखता है और आंतों की सफाई करने में भी मददगार हो सकते हैं. संतरा खाने से आपकी कब्ज की समस्या दूर हो सकती है. संतरा पेट दर्द और फूड पॉयजनिंग को भी रोक सकता है.
6. संतरा स्किन के लिए भी असरदार
संतरा खाने से आपकी स्किन पर ग्लो आ सकता है. संतरे में बीटा कैरोटीन होता है, जो सेल्स को डैमेज से बचाने के लिए एक पावरफुल एंटीऑक्सीडेंट माना जाता है. संतरा झुर्रियां, डार्क सर्कल्स और बुढ़ापे के लक्षणों को दूर करने में फायदेमंद माना जाता है. इसके अलावा बीटा कैरोटीन आपकी आंखों की रोशनी को भी लंबे समय तक बनाए रखने में मददगार हो सकता है.
ज्यादा संतरा खाने से हो सकते हैं ये नुकसान 7
1. पाचन की समस्या हो सकती है.
2. ज्यादा सेवन से बढ़ सकता है ब्लड शुगर लेवल.
3. वजन बढऩे की हो सकती है समस्या
4. दांतों से संबंधित हो सकती है परेशानी
5. ऑस्टियोपोरोसिस का खतरा
इस समय न खाएं संतरा
संतरे में विटामिन सी भरपूर मात्रा में होती है. इसके साथ ही इसमें विटामिन ए, बी कॉप्लेक्स, फ्लेवोनॉयड, अमिनो एसिड के अलावा भी कई फायदेमंद तत्व होते हैं. हालांकि इन फायदों के लिए इसे सही समय पर ही खाना होता है. भूलकर भी संतरे को एकदम सुबह और रात में न खाएं. कोशिश करें संतरे को हमेशा दिन में खाएं. संतरे का खाने के तुरंत बाद सेवन न करें. खाने से एक घंटा पहले या खाने के एक घंटे बाद ही संतरे का सेवन करना चाहिए.
अस्वीकरण: सलाह सहित यह सामग्री केवल सामान्य जानकारी प्रदान करती है. यह किसी भी तरह से योग्य चिकित्सा राय का विकल्प नहीं है. अधिक जानकारी के लिए हमेशा किसी विशेषज्ञ या अपने चिकित्सक से परामर्श करें. एनडीटीवी इस जानकारी के लिए जि़म्मेदारी का दावा नहीं करता है.
धर्म संसार / शौर्यपथ / सावन का महीना खत्म होने में अब कुछ ही दिन बचे हैं। 3 अगस्त को सावन के आखिरी सोमवार का व्रत रखा जाएगा। सावन का महीना भगवान शिव को बेहद प्रिय है। ऐसी मान्यता है कि इस महीने में सच्चे दिल से की गई पूजा का फल और आशीर्वाद भक्तों को महादेव जरूर देते हैं। शास्त्रों के मुताबिक, सोमवार का दिन भगवान शिव की अराधना का होता है। माना जाता है कि भगवान शिव की पूजा के दौरान कुछ बातों का ध्यान रखना भी जरूरी होता है।
इन बातों का जरूर रखें ध्यान-
1. ऐसी मान्यता है कि सावन में बैंगन का सेवन नहीं करना चाहिए। इसलिए भगवान शिव के उपासकों को सावन महीने में बैंगन का सेवन नहीं करना चाहिए।
2. कहा जाता है कि सावन महीने में पूजा में तुलसी के पत्तों और केतकी के फूलों का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। मान्यता है कि भगवान शिव को सफेद रंग के पुष्प अर्पित करने से पूजा का फल मिलता है।
3. कहते हैं कि भगवान शिव की पूजा में शिवलिंग को कभी हल्दी और कुमकुम नहीं लगाना चाहिए। कुमकुम को लेकर कहा जाता है कि सुहागिनें पति की लंबी आयु के लिए कुमकुम लगाती हैं। जबकि भगवान शिव को संहारक के रूप में जाना जाता है। ऐसे में पूजा के दौरान कुमकुम का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए।
4. ऐसी मान्यता है कि भगवान शिव की पूजा करते समय शिवलिंग पर नारियल के पानी से अभिषेक नहीं करना चाहिए। हालांकि भगवान शिव की प्रतिमा पर नारियल का फल अर्पित करना शुभ माना गया है।
5. शिवलिंक का अभिषेक करते समय कास्य और पीतल के बर्तनों का इस्तेमाल करना शुभ माना गया है।
6. भगवान शिव को अर्पित की जाने वाले सभी चीजें शुद्ध और निर्मल होनी चाहिए।
सेहत / शौर्यपथ / संतरा एक आम फल हो सकता है लेकिन संतरे के स्वास्थ्य लाभ आम नहीं होते हैं. संतरा का सेवन कर आप कमाल के फायदे ले सकते हैं. संतरे में काफी मात्रा में विटामिन सी की मात्रा पाई जाती है. संतरे में फैट, कोलेस्ट्रॉल और सोडियम की मात्रा न के बराबर होती है.
संतरा एक आम फल हो सकता है लेकिन संतरे के स्वास्थ्य लाभ आम नहीं होते हैं. संतरा का सेवन कर आप कमाल के फायदे ले सकते हैं. संतरे में काफी मात्रा में विटामिन सी की मात्रा पाई जाती है. संतरे में फैट, कोलेस्ट्रॉल और सोडियम की मात्रा न के बराबर होती है. संतरा आपके दिल को स्वस्थ्य रखता है, ये आपकी आंखों को भी सुरक्षित रखता है और संतरे एक खासियत जिसकी हर किसी को जरूरत है. इम्यूनिटी बढ़ाने में संतरा फायदेमंद हो सकता है. संतरा कोलेस्ट्रॉल, डायबिटीज जैसी परेशानियों को दूर करने में भी लाभदायक माना जाता है. संतरे के फायदे कई हैं, लेकिन ऐसा नहीं है कि यह स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक नहीं होता है.संतरे के ज्यादा सेवन से संतरे के दुष्प्रभाव भी हो सकते हैं. अगर आप इम्यून सिस्टम को बूस्ट करना चाहते हैं तो आप संतरे का सेवन बेझिझक कर सकते हैं लेकिन संतरा खाने का भी एक समय होता है जिसमें इसका सेवन करने की सलाह दी जाता है. यहां हम बता रहे हैं संतरे के फायदे और नुकसान के साथ संतरा किस समय खाना नुकसानदायक हो सकता है. संतरे को खाने का क्या है सही समय...
संतरे का सेवन कर पाएं ये कमाल के फायदे |
1. इम्यूनिटी बढ़ाने में है मददगार
संतरे में विटामिन सी की मात्रा बहुत अच्छी होती है. संतरा विटामिन सी का एक अच्छा स्रोत है. विटामिन सी एक तरह से एंटीऑक्सीडेंट का काम करता है और शरीर में डैमेज सेल्स को रिपेयर करने के साथ-साथ फ्री रेडिकल्स से लड़ता है. संतरा शरीर के इम्यून सिस्टम को मजबूती भी देता है. इम्यूनिटी बढ़ाने के लिए आप संतरे का सेवन कर सकते हैं.
2. कोलेस्ट्रॉल में फायदेमंद है संतरा
संतरे में कोलेस्ट्रॉल नहीं होता है, बल्कि इसके सेवन से शरीर में मौजूद बैड कोलेस्ट्रॉल की मात्रा को कम करने में मदद मिल सकती है. संतरे में मौजूद विटामिन सी आपके शरीर में फ्री रेडिकल्स को न्यूट्रिलाइज कर कोलेस्ट्रॉल को ऑक्सिडाइज करता है, जिससे पहले से जमा हुआ कोलेस्ट्रॉल धीरे-धीरे कम हो सकता है.
3. डायबिटीज में फायदेमंद
संतरा डायबिटीज में फायदेमंद माना जाता है. संतरे में फाइबर की मात्रा अच्छी होती है. फाइबर ब्लड शुगर लेवल को बढ़ने से रोक सकता है. अगर संतरे को साबूत खाया जाए तो यह डायबिटीज में मदद कर सकता है अगर आप इसका जूस पिएंगे तो यह ब्लड शुगर लेवल को बढ़ा सकता है क्योंकि जूस निकालने पर इसका फाइबर कम हो सकता है.
4. दिल की बीमारियों को रखे दूर
अगर आप रोज एक संतरा खाते हैं, तो यह दिल की बीमारियों का खतरा कम कर सकता है. इसका कारण यह है कि संतरे में फ्लैवोनॉइड्स होते हैं, जो आर्टरीज के ब्लॉकेज को खोलते हैं और ब्लड सर्कुलेशन को ठीक रखने में मदद कर सकते हैं.
5. कब्ज से राहत दिलाने में फायदेमंद
संतरे में घुलनशील और अघुलनशील दोनों ही प्रकार के फाइबर होते हैं. यह आपके पेट को भी भरा रखता है और आंतों की सफाई करने में भी मददगार हो सकते हैं. संतरा खाने से आपकी कब्ज की समस्या दूर हो सकती है. संतरा पेट दर्द और फूड पॉयजनिंग को भी रोक सकता है.
6. संतरा स्किन के लिए भी असरदार
संतरा खाने से आपकी स्किन पर ग्लो आ सकता है. संतरे में बीटा कैरोटीन होता है, जो सेल्स को डैमेज से बचाने के लिए एक पावरफुल एंटीऑक्सीडेंट माना जाता है. संतरा झुर्रियां, डार्क सर्कल्स और बुढ़ापे के लक्षणों को दूर करने में फायदेमंद माना जाता है. इसके अलावा बीटा कैरोटीन आपकी आंखों की रोशनी को भी लंबे समय तक बनाए रखने में मददगार हो सकता है.
ज्यादा संतरा खाने से हो सकते हैं ये नुकसान |
1. पाचन की समस्या हो सकती है.
2. ज्यादा सेवन से बढ़ सकता है ब्लड शुगर लेवल.
3. वजन बढ़ने की हो सकती है समस्या
4. दांतों से संबंधित हो सकती है परेशानी
5. ऑस्टियोपोरोसिस का खतरा
इस समय न खाएं संतरा
संतरे में विटामिन सी भरपूर मात्रा में होती है. इसके साथ ही इसमें विटामिन ए, बी कॉप्लेक्स, फ्लेवोनॉयड, अमिनो एसिड के अलावा भी कई फायदेमंद तत्व होते हैं. हालांकि इन फायदों के लिए इसे सही समय पर ही खाना होता है. भूलकर भी संतरे को एकदम सुबह और रात में न खाएं. कोशिश करें संतरे को हमेशा दिन में खाएं. संतरे का खाने के तुरंत बाद सेवन न करें. खाने से एक घंटा पहले या खाने के एक घंटे बाद ही संतरे का सेवन करना चाहिए.
अस्वीकरण: सलाह सहित यह सामग्री केवल सामान्य जानकारी प्रदान करती है. यह किसी भी तरह से योग्य चिकित्सा राय का विकल्प नहीं है. अधिक जानकारी के लिए हमेशा किसी विशेषज्ञ या अपने चिकित्सक से परामर्श करें. एनडीटीवी इस जानकारी के लिए ज़िम्मेदारी का दावा नहीं करता है.
गेजेट्स / शौर्यपथ / WhatsApp पर बेहतरीन फीचर्स की भरमार है, लेकिन एक चीज़ है जिसको लेकर व्हाट्सऐप हमें निराश करता है वो है मैसेज को शेड्यूल करने का फीचर। जी हां, व्हाट्सऐप पर अब तक मैसेज शेड्यूल करने का तरीका पेश नहीं किया गया है, जिस वजह से हमें कई बार परेशानी का सामना करना पड़ता है। एक उदाहरण यह ही ले लीजिए अपने दोस्त को सबसे पहले बर्थडे मैसेज भेजने के लिए आपको रात के 12 बजे तक जागना पड़ता है, अगर व्हाट्सऐप पर शेड्यूलिंग मैसेज का फीचर होता तो रात के 12 बजे तक जागने की परेशानी न झेलनी पड़ती। भले ही व्हाट्सऐप पर इस फीचर को अब तक न जोड़ा गया हो, लेकिन आज हम आपकी इस परेशानी को दूर करने का तरीका जरूर बताएंगे। एंड्रॉयड व आइफोन स्मार्टफोन पर व्हाट्सऐप मैसेज शेड्यूल करने के कई दूसरे तरीके मौजूद हैं। तो चलिए जानते हैं क्या है वो तरीका जिनकी मदद से बिना व्हाट्सऐप खोले ही व्हाट्सऐप मैसेज भेजा जा सकता है।
जैसा कि हमने पहले बताया, WhatsApp ने मैसेज शेड्यूल करने का कोई ऑफिशियल फीचर पेश नहीं किया है। हालांकि, अगर आप एंड्रॉयड डिवाइस इस्तेमाल करते हैं, तो आप व्हाट्सऐप पर मैसेज को कई थर्ड-पार्टी ऐप की सहायता से शेड्यूल कर सकते हैं। जी हां, कई थर्ड-पार्टी ऐप्स मौजूद हैं, जो आपकी इस काम में सहायता कर सकते हैं, लेकिन एक ऐप है SKEDit जो अपना काम बेहतर तरीके से करता है। तो चलिए जानते हैं कैसे इस ऐप की मदद से करें व्हाट्सऐप मैजेस शेड्यूल-
1. सबसे पहले गूगल प्ले स्टोर पर जाकर SKEDit डाउनलोड और इंस्टॉल कर लें।
2. ओपन करने के बाद आपको सबसे पहले इसमें साइन-इन करना होगा।
3. साइन-इन करने के बाद मैन मैन्यू में से WhatsApp पर टैप करें।
4. इसके बाद ऐप आपसे कुछ परमिशन मांगेगा, उसे Grant कर दें। अब Enable Accessibility पर टैप करें फिर SKEDit पर जाएं और टॉगल को ऑन कर दें। आखिर में आपको Allow पर टैप करना है।
5. इसके बाद ऐप में वापस जाएं, जहां पर आप अपने मैसेज को शेड्यूल कर पाएंगे। सबसे पहले जिसे मैसेज भेजना है, उसे चुने और फिर अपना मैसेज लिखें। अब तारीख और समय को सेट करें। यहां आपको एक विकल्प यह भी मिलेगा कि आप इस मैसेज को दोहराना चाहते हैं या नहीं।
6. नीचे अब आपको फाइनल टॉगल दिखेगा। यहां आपको Ask Me Before Sending का विकल्प दिखेगा, यदि आप इसे ऑन करके शेड्यूल करते हैं, तो मैसेज भेजने से पहले यह आपको एक नोटिफिकेशन भेजेगा, जिस पर क्लिक करने के बाद ही यह मैसेज Send होगा। वहीं, अगर आप इस विकल्प को ऑफ करते हैं, तो बिना नोटिफिकेशन भेजे यह मैसेज Send कर देगा। दोस्त को बर्थडे विश करना है, तो आप इसे ऑफ भी रख सकते हैं।
How to schedule WhatsApp message in iPhone
एंड्रॉयड की तरह आइओएस में व्हाट्सऐप मैसेज शेड्यूल करने के लिए कोई थर्ड पार्टी ऐप उपलब्ध नहीं है। हालांकि, यहां हम आपको आइफोन पर व्हाट्सऐप मैसेज शेड्यूल करने का एक अलग तरीका बताएंगे, यह तरीका है Siri Shortcuts। यह एक ऐप्पल ऐप है, जो कि एक निश्चित समय पर व्हाट्सऐप मैसेज को ऑटोमेटिकली भेज देतe है। आइफोन पर व्हाट्सऐप मैसेज भेजने का तरीका-
1. सबसे पहले ऐप स्टोर पर जाकर Shortcuts app अपने आइफोन में डाउनलोड और इंस्टॉल करें।
2. अब नीचे दिए Automation टैब को चुनें।
3. अब टॉप राइट कॉर्नर पर दिए + आइकन पर क्लिक करें और Create Personal Automation पर टैप करें।
4. अगली स्क्रीन में Time of Day पर टैप करें जब भी आपको अपना मैसेज भेजना है उसे शेड्यूल कर दें। यह होने के बाद Next पर टैप कर दें।
5. अब Add Action पर टैप करें और सर्च बार में जाकर Text टाइप करें, अब नीचे आ रही लिस्ट में से Text को सिलेक्ट कर लें।
6. अब Text में जाकर अपना मैसेज टाइप करें, जो भी आप शेड्यूल करके भेजना चाहते हैं।
7. अब मैसेज बॉक्स के नीचे आपको एक + आइकन दिखेगा उस पर टैप करें और फिर सर्च बार में जाकर व्हाट्सऐप को सर्च करें।
8. यहां आपको कुछ विकल्प की लिस्ट दिखेगी, जहां पर आपको Send Message via WhatsApp सिलेक्ट करना है। अब जिसे मैसेज भेजना चाहते हैं उनका नंबर सिलेक्ट करें और फिर Next पर क्लिक कर दें। आखिर की स्क्रीन पर आपको Done पर टैप करना है।
अब आपको शेड्यूल टाइम पर Shortcuts app के द्वारा एक नोटिफिकेशन मिलेगा, जिस पर टैप करके आपका व्हाट्सऐप ओपन हो जाएगा और टाइप किया मैसेज भी दिखेगा। अब आपको बस इस मैसेज को Send करना है।
गौर करने वाली बात यह है कि इस तरीके से आप केवल एक हफ्ते के अंदर ही मैसेज को शेड्यूल कर सकते हैं, जो थोड़ा कम समय है। लेकिन मैसेज शेड्यूल न हो पाने से अच्छा है इस 1 हफ्ते वाले तरीके को अपनाकर दोस्तों को टाइम पर बर्थडे विश करना।
मेरी कहानी / शौर्यपथ / बहुत अमीर होते हैं वे लोग, जो नजरों से भी प्यार लुटाते चलते हैं और जिस पर प्यार की एक नजर पड़ जाए, तो उससे खुशनसीब कोई और नहीं होता। इसलिए कहा गया है कि मां सबसे अमीर होती है और उसके आंचल में बच्चे सबसे खुशनसीब। हालांकि यह भी कुदरत का स्याह करिश्मा ही है कि कोई मां प्यार के मामले में कंगाल हो, तो उसका बच्चा जाहिर है, बदनसीब ही होगा। पर ऐसी भी क्या बदनसीबी कि ममता भरी एक नजर के लिए दिल तरस जाए! मां या पिता, दोनों में से कोई तो निगाह भर देख ले, तो चैन आ जाए। सेना में रह चुके सेल्समैन पिता घर से ऐसे निकलते थे कि मानो उनकी सारी जिम्मेदारियां बाहर ही बसती हों और अभिनेत्री मां घर ऐसे लौटती थीं, मानो एक पैर बाहर ही रह गया हो।
संसाधनों की कोई कमी न थी, लेकिन एक धाय भरोसे बच्चे पल रहे थे। मां और पिता जब कभी मिलते थे, तब पता चलता था कि दुश्मनी क्या होती है। खुलकर लड़ाई होती थी, पास-पड़ोस तक गालियों की गंदगी बरसती थी। जिन हाथों को पुचकारने का धर्म निभाना था, वही हाथ ऐसे उठते थे कि लगता था, पिता पहले विश्व युद्ध से लौटे नहीं हैं, अभी वहीं दो-दो हाथ कर रहे हैं। सुधरने के आसार दूर-दूर तक नजर नहीं आते थे। परस्पर प्रेम और समर्पण के अभाव ने माता-पिता को बेरहम बना दिया था और यह आफत बच्चों पर भी समान रूप से बरसती थी। शारीरिक हिंसा से कई गुना ज्यादा मानसिक हिंसा से वह बच्चा मार्लन गुजर रहा था। सोचता रहता कि मां और पिता का ध्यान अपनी ओर कैसे खींचा जाए? ऐसा क्या किया जाए कि उनकी एक निगाह मिल जाए? वे देखने को मजबूर हो जाएं और उन्हें अपनी तंग जिंदगी में अपने बच्चे से भी कुछ खुशी नसीब हो। वैसे मार्लन को पता था कि माता और पिता अपनी-अपनी दुनिया में हर मुमकिन मनमानी करते हुए बहुत खुश हैं। उन्हें बच्चों की परवाह नहीं, लेकिन ऐसा क्या किया जाए कि दो पल वे अपने बच्चों के साथ भी बिताएं?
एक दिन मां घर में बैठी मिल गईं और मार्लन ने अपनी नई योग्यता का प्रदर्शन शुरू किया, ताकि मां नजर भर देख लें। मार्लन ने उस गाय का अभिनय शुरू किया, जो मां को प्यारी थी। मां ने अपने बेटे की हरकतों को नजर उठाकर देखा और उनकी आंखों में खुशी छलक आई। बेटा तो हर्ष से निहाल हो गया। सबसे बड़ी बात थी कि उसने कुछ ऐसा किया, जो मां को पसंद आया और मां ने देखा। उस ग्यारह साल के बच्चे का दिल बाग-बाग हो गया। एक राह मिली कि अभिनय ही वह कला है, जिस पर मां रीझ सकती हैं। गाय का अभिनय कर खुशी मिली, तो चस्का लग गया। फिर कभी घोडे़ का अभिनय, तो कभी किसी पड़ोसी बच्चे का अभिनय, एक सिलसिला चल पड़ा।
कभी-कभी पिता भी देख लेते थे, लेकिन कभी तारीफ नहीं करते थे। अपने बेटे को हमेशा नाकारा साबित करते थे। साफ कहते थे, तुम जिंदगी में कुछ नहीं कर सकते। तारीफ तो मां भी नहीं करती थीं, कभी देख भर लेतीं, तो भी कमाल हो जाता। मार्लन को पता चल गया कि ध्यान खींचना है, तो बेहतर से बेहतर अभिनय करो, जान डाल दो, जिसे निभा रहे हो, उस किरदार को जी जाओ। और यह सब किसलिए? बस प्यार भरी एक नजर के लिए। मां और पिता के लिए। खुशी के चंद लम्हों के लिए। ऐसे लम्हे, जिनकी बुनियाद पर दुनिया का सबसे शानदार अभिनेता खड़ा हुआ।
आज मनोरंजन की दुनिया में शायद ही कोई ऐसा होगा, जो अभिनेता मार्लन ब्रैंडो (1924-2004) को नहीं जानता होगा। बड़े परदे पर गॉडफादर और अन्य अनेक किरदारों को साकार कर देने वाले मार्लन ने बचपन की तड़प व त्रासदी को अपना कलात्मक हथियार बना लिया। बिगड़ैल पिता को भले सुधार न सके, लेकिन एक दिन वह आया, जब पिटती हुई मां के पक्ष में जा खड़े हुए और पिता की कनपटी से पिस्तौल लगाकर कहा, ‘देखो, यह आखिरी बार है, अब कभी हाथ मत लगाना, वरना छोड़ूंगा नहीं’। जब कभी परदे पर गुस्सा दिखाने की जरूरत पड़ती, तो मार्लन अपने पिता को याद कर लेते थे और गुस्सा अनायास फट पड़ता था। हालांकि उन्होंने सफल होने के बाद पिता को फिल्म निर्माता बनाया और उनकी जरूरतों का पूरा ध्यान भी रखा, लेकिन पिता की मौत के बाद वह अक्सर हंसते हुए कह देते थे कि वह आदमी कुछ सेकंड के लिए भी सामने आ जाए, तो मैं उसका जबड़ा तोड़ दूंगा। और जिस साल मार्लन को अभिनय के लिए पहला ऑस्कर अवॉर्ड मिला, उसी साल दुनिया से जाते-जाते मां को एहसास हुआ कि बच्चों को पालने में बड़ी कमी रह गई। उन्होंने अफसोस का इजहार किया, लेकिन क्या फायदा? जब जो होना था, हो चुका था।
प्रस्तुति : ज्ञानेश उपाध्याय मार्लन ब्रैंडो, अमेरिकी अभिनेता और निर्देशक
शौर्यपथ / उनके सामने दो विकल्प थे- किसी पुरअम्न मुल्क में एक खुशहाल जिंदगी और दूसरा, अपने गरीब व नाकाम देश (सोमालिया) में लौटकर खौफ व दुश्वारियों के बीच जीना। डॉक्टर हौवा अब्दी ने अपने वतन से वफा का रास्ता चुना। और बड़ी बात यह कि उन्हें अपने इस फैसले पर कभी अफसोस नहीं हुआ। तब भी नहीं, जब एक आतंकी समूह के सैकड़ों गुर्गों ने उनके अस्पताल पर हमला कर दिया था।
सन 1947 में मोगादिशु के एक खाते-पीते परिवार में हौवा पैदा हुईं। पिता खुद शिक्षित थे, इसलिए उन्होंने अपनी बेटियों को स्कूल भेजने में कभी कोताही नहीं की। मगर जब हौवा 12 साल की थीं, प्रसव के दौरान उनकी मां की मौत हो गई। वेदना से छटपटाती मां का चेहरा हौवा के भीतर जैसे नक्श हो गया। काश! उनकी मां को कोई डॉक्टर बचा लेता।
महज 12 साल की हौवा पर अचानक चार छोटी बहनों की देखरेख की जिम्मेदारी आ पड़ी। दादी थीं, मगर उम्रदराज होने के कारण जल्दी ही थक जाती थीं। ऐसे में, हौवा ने सारी जिम्मेदारियां निभाते हुए खुद से एक वादा किया कि वह पढ़-लिखकर डॉक्टर ही बनेंगी, ताकि किसी की मां को यूं मरने से बचा सकें। पढ़ने में तो वह शुरू से ही जहीन थीं, अब उसके साथ एक बड़ा मकसद आ जुड़ा था।
सन 1964 की बात है। हौवा तब 17 साल की थीं। हायर सेकेंडरी की तालीम मुकम्मल हो रही थी और यहीं से उन्हें अपने सपने की तरफ मुुड़ना था। संयोग से उसी वक्त उन्हें तत्कालीन सोवियत संघ का वजीफा मिल गया और वह मास्को पहुंच गईं। और फिर वहां से कीव। कीव अब यूके्रन की राजधानी है। वहां पर मेडिकल की पढ़ाई के दौरान ही उनकी मुलाकात अदन मोहम्मद से हुई। अदन भी सोमाली थे। वहीं पढ़ रहे थे। दोनों ने 1973 में शादी कर ली।
कीव से स्नातक और स्त्री रोग में विशेषज्ञता हासिल करने के बाद हौवा वापस अपने मुल्क लौट आईं और यहां सरकारी अस्पतालों में उन्होंने काम करना शुरू कर दिया। इस दौरान वह दो बेटी और एक बेटे की मां बन चुकी थीं। जिंदगी ठीक गुजर रही थी, मगर देश की स्वास्थ्य सेवाओं की हालत देख हौवा बहुत दुखी रहती थीं। सोमालिया में अस्पताल बहुत कम थे और मरीज ज्यादा। गरीबी, भूख, कुपोषण ने तो जैसे इस भूखंड से गहरी नातेदारी पाल ली है। खैर, जब भी किसी महिला के प्रसव के दौरान मरने की खबर सुनतीं, तो हौवा बेचैन हो उठतीं। लगता, जैसे मां तड़प रही हैं।
लिहाजा 1983 में उन्होंने अपनी पैतृक जमीन पर एक कमरे का क्लिनिक शुरू किया। सोमालिया के तत्कालीन राष्ट्रपति ने खुद उन्हें इसकी इजाजत दी थी। हौवा अब आसपास की खानाबदोश, कबाइली औरतों को प्रेरित करने लगीं कि वे उनके पास सुरक्षित प्रसव के लिए आएं। मुफ्त, किफायती इलाज और काबिलियत ने हौवा को दूर-दूर तक मशहूर कर दिया। मगर 1991 में सोमालिया गृह युद्ध की चपेट में आ गया। इसके बावजूद हौवा मानव सेवा से नहीं डिगीं। 5 मई, 2010 की सुबह लगभग 750 लड़ाकों ने हौवा अब्दी अस्पताल पर धावा बोल दिया। हौवा कुछ समझ पातीं, उसके पहले ही उनकी कनपटी से बंदूक सटाकर एक आतंकी गरज उठा- ‘तुम क्यों अस्पताल चला रही हो? अव्वल तो तुम औरत हो, और फिर बूढ़ी भी। इसे फौरन बंद करो।’
हौवा ने गौर किया, किशोरवय के ये गुर्गे उस समूह के थे, जो हाथ काट डालने और व्यभिचार के आरोपियों को पत्थर मार-मारकर मौत के घाट उतार देने के लिए कुख्यात है। फिर भी उन्होंने पूरे साहस के साथ कहा, ‘मैं अपना अस्पताल नहीं छोड़ूंगी। अगर मरूंगी भी, तो अपनों के बीच और पूरी गरिमा के साथ।’ आतंकियों ने कई दिनों तक अस्पताल को अपने कब्जे में रखा। इस बीच कई बच्चे इलाज के अभाव में मर गए। फिर तो आस-पास की सैकड़ों औरतें हौवा के समर्थन में अस्पताल के इर्द-गिर्द जमा हो गईं। बढ़ते जन-आक्रोश और वैश्विक दबाव के आगे आतंकियों को झुकना पड़ा। वे न सिर्फ अस्पताल छोड़कर भागने को बाध्य हुए, बल्कि उन्होंने डॉक्टर हौवा से लिखित में माफी भी मांगी।
सन् 1983 में एक कमरे से शुरू हुए हौवा अब्दी अस्पताल में आज चार सौ बेड और तीन-तीन ऑपरेशन थिएटर हैं, उनकी दोनों बेटियां भी डॉक्टर बन चुकी हैं और हाथ बंटाती हैं। आधा दर्जन से अधिक डॉक्टरों और चालीस से अधिक नर्सों के साथ यह अस्पताल हजारों लोगों की खिदमत कर रहा है। इसके साथ ही गृह युद्ध में यतीम हुए बच्चों व बेवा औरतों के लिए भी हौवा ने पनाहगाह और स्कूल शुरू किए हैं। प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से वह अब तक करीब 90 हजार सोमाली लोगों की जिंदगी में उम्मीद की किरण लेकर आई हैं। इसके लिए उन्हें कई प्रतिष्ठित सम्मानों से नवाजा गया है।
एक सफल या सार्थक जिंदगी में से हौवा ने अपने लिए सार्थक जीवन चुना है। और उनके इस फैसले पर पूरी मानवता को फख्र होगा। सोमाली लोगों की ‘मामा हौवा’को काफी सारे लोग सोमालिया की मदर टेरेसा भी कहते हैं।
प्रस्तुति : चंद्रकांत सिंह हौवा अब्दी, डॉक्टर व मानवाधिकारवादी
सम्पादकीय लेख / शौर्यपथ / भारतीय चुनाव आयोग लोकसभा की एक सीट और विधानसभाओं की 56 सीटों पर उपचुनाव कराने को तैयार है, तो इससे पता चलता है कि महामारी की वजह से लोकतांत्रिक प्रक्रिया नहीं रुकेगी। मंगलवार को आठ सीटों के लिए तय उपचुनाव को जब रद्द किया गया था, तब यह माना जा रहा था कि कोरोना के दौर में मतदान आधारित कोई चुनाव नहीं हो सकेगा। लेकिन यह साफ हो गया है कि जिन सीटों पर अब आयोग चुनाव के लिए तैयार है, उनमें वे आठ सीटें भी शामिल हैं। आठ सीटों को लेकर जल्दी इसलिए भी है, क्योंकि इनके लिए 7 सितंबर तक चुनाव हो जाने चाहिए। बाकी बची 49 सीटों के लिए सितंबर का पूरा समय है। सब कुछ ठीक रहा और स्थानीय प्रशासन ने कोई अड़ंगा नहीं लगाया, तो आयोग चुनाव प्रक्रिया तेज कर देगा। वैसे भी, बिहार विधानसभा चुनाव की तैयारियां चल ही रही हैं। समय पर चुनाव कराना आयोग की जिम्मेदारी है और अगर वह इसे निभाने को लालायित है, तो उसकी सराहना होनी चाहिए। हालांकि काफी कुछ सरकारों को भी तय करना है। अगस्त, सितंबर तक कोरोना जिन इलाकों में काबू में आ जाएगा, वहां तो ज्यादा परेशानी नहीं होगी, मगर उसी दौर में कोरोना चरम पर रहा, तो चुनाव टालने की नौबत आ सकती है। इतना तय है कि कोरोना के समय चुनाव कराने के लिए ज्यादा संसाधन, वाहन और सुरक्षा बलों की जरूरत पडे़गी। हर एक मतदान केंद्र पर बचाव के दिशा-निर्देशों की पालना कराना आसान नहीं होगा। लंबी लाइन और मतदाताओं की परस्पर दूरी को बनाए रखना बड़ी चुनौती होगी।
सर्वाधिक 27 सीटों पर मध्य प्रदेश में उपचुनाव होने हैं। मणिपुर में 11, गुजरात में आठ, तो उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल में चार-चार सीटें और झारखंड में भी दो सीटें खाली हैं। हरियाणा, छत्तीसगढ़ इत्यादि में भी सीटें खाली हैं। संविधान के तहत इन सीटों को खाली नहीं रखा जा सकता। रिक्त विधानसभा क्षेत्रों के नागरिकों के अधिकारों की बहाली और किसी सांविधानिक संकट से बचने के लिए चुनाव जरूरी हैं। हो सकता है, जो प्रतिनिधि ऐसे मुश्किलों के बीच से चुनाव जीतकर आएं, वे जनता के बेहतर सेवक साबित हों। हो सकता है, जो सरकारें कोरोना के दौर में बनें, वे शायद ज्यादा समर्पित और संवेदनशील हों।
एक बड़ी महामारी के समय चुनाव का दुर्लभ अनुभव देश को होने जा रहा है। विभिन्न पार्टियां वर्चुअल रैलियां आयोजित कर रही हैं। ऐसे में, अपेक्षित शारीरिक दूरी बरतते हुए भी लोगों से संपर्क करना और मतदान के लिए रिझाना कैसे संभव है, यह देखना दिलचस्प होगा। हो सकता है, विशाल रैलियों और जनसभाओं में होने वाली बेहिसाब भीड़ से प्रभावित होने का मौका न मिलने पर लोग अपने प्रतिनिधि के बारे में सही फैसला कर सकें। ऐसा नहीं है कि कोरोना के समय दुनिया में चुनाव बंद हो गए हैं। दक्षिण कोरिया और सिंगापुर में कोरोना के समय में ही चुनाव हुए हैं। अमेरिका में राष्ट्रपति का चुनाव 3 नवंबर को तय है और इसकी प्रक्रिया भी वहां शुरू हो चुकी है। दुनिया के जिम्मेदार लोकतंत्रों ने यह संकेत दे दिया है कि कोरोना की वजह से चुनाव नहीं रुकने वाले। किसी बहाने से चुनाव से बचना ठीक नहीं। कोरोना के समय सुरक्षित चुनाव कुछ महंगा पड़ सकता है, लेकिन लोकतांत्रिक प्रक्रिया बहाल रखने के लिए हमें इस लागत से गुजरना होगा।
ओपिनियन / शौर्यपथ / आज ‘विजय दिवस’है। ठीक 21 बरस पहले हमने संसार के सबसे दुर्गम इलाकों में से एक में थोपी गई जंग जीतकर साबित कर दिया था कि हिन्दुस्तानियों के हौसले कभी पस्त नहीं होते। युद्ध-नीति के मुताबिक, हर जय-पराजय के अपने निश्चित सबक होते हैं। क्या नई दिल्ली के सत्ता-सदन ने इस अनुभव का पर्याप्त लाभ उठाया? लद्दाख की सीमाओं पर पसरे तनाव ने इस सवाल को बेहद मौजूं और धारदार बना दिया है।
पहले कारगिल की बात। इसकी जड़ें अतीत में धंसी हुई थीं। साल 1984 में सियाचिन की बर्फीली चोटियां गंवाने के बाद जनरल जिया के समक्ष तत्कालीन डायरेक्टर जनरल ऑफ मिलिट्री ऑपरेशन्स-पाकिस्तान ने एक जवाबी कार्ययोजना पेश की। इस रणनीति के तहत पाकिस्तानी फौज को सर्दियों में कारगिल की चोटियों पर चढ़कर श्रीनगर-लेह राजमार्ग को काट देना था। जिया ने इसे ठंडे बस्ते में डाल दिया। वजह? उन दिनों वह अपने आका अमेरिका के साथ मिलकर अफगानिस्तान से सोवियत सेनाओं को बाहर करने में लगे थे। उनके पास इस सवाल का जवाब नहीं था कि कारगिल के जवाब में अगर भारत ने समूचा युद्ध छेड़ दिया, तो रावलपिंडी का रक्षा प्रतिष्ठान दो मोर्चों के बीच सैंडविच तो नहीं बन जाएगा?
परवेज मुशर्रफ ने इसे नए संदर्भों में देखा। उनकी अगुवाई में फल-फूल रहे ‘गैंग ऑफ फोर’ ने पुरानी योजना को झाड़-पोंछकर नया जामा पहना दिया। परवेज मुशर्रफ इससे इतने मुतमइन थे कि बिना प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को बताए, उन्होंने ‘नॉर्दर्न लाइट इन्फेंट्री’ के जवानों को कूच के आदेश दे दिए। यह अभियान इतना गोपनीय रखा गया कि थल सेना के अन्य कमांडरों के साथ वायु सेना के आला अफसर तक इससे अनजान रहे। भारत ने जब अपनी सरजमीं खाली कराने के लिए हवाई हमले शुरू किए, तब वे हक्का-बक्का रह गए। समूचा सत्ता प्रतिष्ठान उनसे असहमत था, सेना के अन्य अंग अनभिज्ञ थे और भारतीय प्रतिक्रिया अनपेक्षित थी।
वे भारतीय वायु सेना की कार्रवाई का प्रतिरोध भी नहीं कर सकते थे। नई दिल्ली जो कर रही थी, अपनी जमीन पर कर रही थी। नियंत्रण रेखा लांघने का मतलब होता युद्ध, जिसके लिए वे उस समय तैयार न थे। यही नहीं, तब तक उन्होंने यह भी नहीं माना था कि भारतीय चौकियों पर कब्जा जमाए बैठे लोग उनके नियमित सैनिक हैं। जनरल मुशर्रफ किंकर्तव्यविमूढ़ हो गए और नवाज शरीफ हताश। निराशा भरे माहौल में इन्हें 4 जुलाई, 1999 को ह्वाइट हाउस की चौखट चूमनी पड़ी। उस बैठक के दौरान बिल क्लिंटन की मुद्रा बेहद कठोर थी। शरीफ ने कुछ शर्तों के साथ वापसी की बात कही। क्लिंटन ने कहा कि आपकी कोई शर्त नहीं मानी जाएगी। पाकिस्तान की भलाई इसी में है कि उसके दस्ते शराफत से वापस चले जाएं। नतीजतन, पाक फौजियों को लौटना पड़ा था। इस प्रक्रिया में भी उनके तमाम फौजी मारे गए। मुशर्रफ का यह गुनाह बेलज्जत साबित हुआ।
मुझे याद है, उन दिनों भी समझदार लोग कह रहे थे कि इस जीत का उल्लास मनाइए, पर सबक भी सीखिए। हमारी सीमाएं विशाल और बहुआयामी हैं। इनकी हिफाजत के लिए हम अभी तक तैयार नहीं हैं। तब 1962 की चीन से हुई जंग को भी याद किया गया था। जुलाई 1999 से जुलाई 2020 तक एनडीए और यूपीए ने दस-दस बरस हुकूमत की, पर सीमा सुरक्षा के मामले में हम आज भी सौ फीसदी अंकों के अधिकारी नहीं हैं। चीन के इस अतिक्रमण ने कारगिल और मुंबई पर आतंकवादी हमले सहित तमाम पुराने जख्मों को हरा कर दिया है। हम चीन, पाकिस्तान और आतंक के हमसायों से तब तक नहीं जूझ सकते, जब तक कि सीमाएं सुरक्षित न हों।
चीन ने पिछले दिनों लद्दाख में वही तरीका अख्तियार किया, जो कारगिल में पाकिस्तान ने किया था। उनके सैनिक उस समय कारगिल की चोटियों पर जम चुके थे, जब अटल बिहारी वाजपेयी दोस्ती की बस लेकर लाहौर में अपना खैरमकदम करा रहे थे। चीनी राष्ट्रपति ने भी कुछ माह पूर्व 11 अक्तूबर, 2019 को चेन्नई के समीप मामल्लपुरम में भारतीय आतिथ्य का लुत्फ उठाया था। कभी पल्लव सम्राटों की आर्थिक राजधानी रहे इस शहर से चीन को भी तिजारत होती थी। लगा था, पुराने दिन लौट रहे हैं, पर कूटनीति भले मनोभावों की कीमत पर ही फलती-फूलती है।हालांकि, बीजिंग की नीयत में खोट पहले से ही नजर आ रही थी। इससे पहले डोका ला और उससे भी पहले दौलत बेग ओल्डी, दीपसांग में दोनों देशों की सेनाएं हफ्तों तक आमने-सामने रही थीं। हमें इसलिए भी सतर्क रहना चाहिए था, क्योंकि कई वर्षों से पीएलए के दस्ते वास्तविक नियंत्रण रेखा के पास निर्माण कर रहे थे। उनके दस्ते ऐसी दुर्गम जगहों पर निरंतर अभ्यास कर रहे थे। इसीलिए संघर्ष के वक्त तैयारी के मामले में चीनी हमसे कहीं आगे थे।
यही वजह है कि जब वे अंदर आए, तो उन्हें वापस लौटाना कारगिल से कहीं ज्यादा दुष्कर साबित हो रहा है। अभी तक यह भी साफ नहीं हो सका है कि ये वापस लौटे हैं, तो कितना लौटे हैं? प्रधानमंत्री की घोषणा के बावजूद विपक्षी दल और कई अवकाश प्राप्त सैन्य व कूटनीतिक सेवा के अधिकारी इसे मानने को तैयार नहीं हैं। पर एक बात तय है कि शी जिनपिंग और उनकी सत्ता चौकड़ी को अंदाज नहीं था कि भारत इतनी दृढ़ता से पेश आएगा। 15 जून को गलवान में हमारे जवानों ने शहादत दी और अब जो आंकडे़ सामने आ रहे हैं, उससे जाहिर है कि चीनी सैनिकों को अधिक तादाद में हताहत होना पड़ा। तब से अब तक सीमा और कूटनीति के मोर्चे पर कोई कसर नहीं छोड़ी गई है।
ध्यान दें। आज की भांति कारगिल के मामले में भी भारतीय नेकनीयती जगजाहिर थी और इसका खामियाजा पाकिस्तान को उठाना पड़ा। उसने अमेरिका की हमदर्दी हमेशा के लिए खो दी और यह कहने का हक भी कि भारतीय भूमि पर खूंरेजी करने वाले लोग दहशतगर्द नहीं, बल्कि मुजाहिदीन हैं। अब यही हाल चीन का हो रहा है। उसे दुनिया भर में कडे़ प्रतिरोध का सामना करना पड़ रहा है। अमेरिका सहित पश्चिम के सारे देश उसकी हरकत के खिलाफ हैं। इंग्लैंड, जापान और तमाम देशों ने भारत की तरह चीनी कंपनियों पर प्रतिबंध लगाने शुरू कर दिए हैं। उसके उपनिवेशवादी विस्तार को रोकने का सबसे बढ़िया तरीका यही है कि हम बीजिंग की कारोबारी सत्ता पर चोट करें। विश्व बिरादरी यही कर रही है। क्या देंग जियाओ पिंग की नीति को हवा में उड़ा डालने वाले शी जिनपिंग भी वही गलती कर बैठे हैं, जो कभी जनरल अयूब खां और भुट्टो की जोड़ी अथवा जनरल परवेज मुशर्रफ ने की थी? चाहे जो हो, पर यह तय है कि हमें अपनी ऐतिहासिक भूलों से बचना होगा। भारत शताब्दियों से अपनी सीमाओं की निगहबानी के मामले में नादान साबित होता रहा है। यह आत्मघाती सिलसिला अब थम जाना चाहिए।शशि शेखर
भिलाई / शौर्यपथ / भिलाई इस्पात संयंत्र की नब्ज के रूप में काम करने वाला विभाग है, इन्टीग्रेटेड कंट्रोल सिस्टमजिसे हम इंकास विभाग के नाम से जानते हैं। इस विभाग का प्रमुख कार्य है फाइबर ऑप्टिक डेटा नेटवर्क का रखरखाव, पीएलसी आधारित सिस्टम का मेंटेनेंस, हॉट शॉप्स व मिल्स में प्रोसेस ऑटोमेशन को चलाने हेतु पीएलसी स्पेयर्स की खरीदी, विभिन्न ब्रेकडाउन्स का निराकरण आदि।
इंकास की शुरुआत वर्ष 1986 में हुई। यह विभाग हमारे संयंत्र में प्लांट स्वचालन और कम्प्यूटरीकरण तथा डेटा संचार के क्षेत्र में प्रमुख भूमिका निभा रहा है। 1986 से पहले, संयंत्र में अधिकांश उपकरण कंप्यूटर संगत नहीं थे। परन्तु संयंत्र के ऑटोमेशन के लिए कंप्यूटर संगत प्रक्रिया को लागू करना इसकी पहली आवश्यकता थी। इसलिए विभाग के लिए पहला काम कंप्यूटर संगत प्रक्रिया संकेतों को प्राप्त करने के लिए उचित उपायों की पहचान कर इसे प्राप्त करना था। इस जरूरत को विभाग ने इंस्ट्रूमेंटेशन विभाग और प्रोडक्शन शॉप्स के सक्रिय सहयोग के साथ पूरा किया। यह स्वचालन की दिशा में पहला कदम था।
महाप्रबंधक प्रभारी इंकास के शंकरसुब्रमण्यन ने स्टील प्लांट के क्रमिक ऑटोमेशन की प्रक्रिया को समझाते हुए बताया कि हमारे संयंत्र में 5 अलग-अलग स्तर के ऑटोमेशन सिस्टम लगे हुए हैं। लेवल-0 में सेंसरों और माप उपकरणों का उपयोग किया गया है, लेवल-1 क्षेत्र विशेष में स्थानीय स्तर पर प्रक्रिया नियंत्रण प्रणाली का उपयोग किया जा रहा है, लेवल-2 में शॉप लेवल ऑटोमेशन शामिल है, लेवल-03 के तहत केंद्रीय निगरानी प्रणाली और प्रबंधन सूचना प्रणाली लगाई गई है, लेवल-04 में ईआरपी/एमईएस के माध्यम से व्यापारिक लेनदेन के लिए ऑटोमेशन किया गया है। उन्होंने आगे कहा कि इंकास का गठन विभिन्न उत्पादन और सेवा इकाइयों में स्वचालन प्रणाली की पहचान, अवधारणा और कार्यान्वयन के लिए किया गया था और यह उनकी सुचारू कार्यप्रणाली को सुनिश्चित करता है।
इंकास विभाग का कार्यक्षेत्र प्लांट, माइंस तथा अस्पताल से लेकर टाउनशिप क्षेत्र में फैला हुआ है। प्लांट के भीतर के क्षेत्र को 5 जोन में विभाजित किया गया है-आयरन जोन, स्टील जोन, मिल्स जोन, एनर्जी मैनेजमेंट जोन और नेटवर्किंग ग्रुप। विभाग का सम्पर्क अपने फाइब्रो ऑप्टिक नेटवर्क के माध्यम से संयंत्र के प्रत्येक क्षेत्र के कोने-कोने में है। इसके अलावा, इंकास विभाग संयंत्र की नई परियोजनाओं के तहत लगे विभिन्न विभागों जैसे यूआरएम, ब्लास्ट फर्नेस-8, कोक ओवन बैटरी-11 एवं एसएमएस-3 में अत्याधुनिक ऑटोमेशन की अवधारणा, सिस्टम को बनाए रखने, डेटा साझा करने के लिए नेटवर्क कनेक्शन, उत्पादों के डिस्पैच तथा ब्रेकडाउन्स के समाधान हेतु अपनी भूमिका का बखूबी निर्वहन कर रहा है।
इंकास विभाग के महाप्रबंधक एम पी सिंह ने बताया कि प्लांट और टाउनशिप क्षेत्र में व्यवसाय और प्रक्रिया अनुप्रयोगों को चलाने के लिए, 2 कोर स्विच, 15 एरिया स्विच/राउटर्स, 4 एग्रेगेशन स्विच और 500 से अधिक एज स्विच लगाए गए हैं। साथ ही संचार व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने हेतु एक प्रतिबद्ध सर्वर सिस्टम को मेंटेन किया जाता है जिसके माध्यम से संचार की आवश्यकता को बनाए रखने के लिए ईमेल, इंटरनेट प्रॉक्सी और एंटीवायरस जैसी इन्फ्रास्ट्रक्चर सेवाएँ प्रदान की जाती हैं। लगभग 500 किमी फाइबर ऑप्टिक नेटवर्क के माध्यम से संयंत्र के लगभग 6000 उपयोगकर्ताओं तथा टाउनशिप के 750 उपयोगकर्ताओं को जोड़ा गया है। वे आगे कहते हैं कि ईआरपी के माध्यम से डेटा साझा करना, सेल नेट के माध्यम से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग सुविधा, प्लांट के अंदर उपकरणों से डेटा कैप्चर करने और डेटा की उपलब्धता सुनिश्चित करने के बाद केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को सांविधिक प्रदूषण उत्सर्जन संबंधित पर्यावरण डेटा उपलब्ध कराया जाता है। विभाग द्वारा संयंत्र के उत्पादन गतिविधियों को सक्षम और सुचारू बनाए रखने पर विशेष ध्यान केंद्रित किया जाता है। वर्ष 2013 से इंकास में कार्यरत् ओसीटी श्री कुंचे साई किरण का कहना है कि उन्हें खुशी है कि उन्हें आयरन जोन में प्रोसेस ऑटोमेशन कार्य को संपादित करने का मौका मिला है। जिसके तहत सॉफ्टवेयर्स व पीएलसी प्रोग्रामिंग को अपडेट करने से लेकर वर्चुअल सर्वर की उपलब्धता सुनिश्चित करने के साथ-साथ एचएमआई क्लाइंट के माध्यम से नेटवर्किंग को सक्षम बनाने में अपना योगदान दे रहे हैं। उन्हें गर्व है कि एसपी-3, कोक ओवन बैटरी-11, ब्लास्ट फर्नेस-8 और ओएचपी-बी में मॉडेक्स परियोजनाओं की कमीशनिंग में सहयोग प्रदान किया है।
लाइफस्टाइल / शौर्यपथ / क्या आपने कभी ऐसे लोगों को देखा है, जो हमेशा कुछ न कुछ खाते रहते हैं? हर समय कुछ न कुछ खाते रहना सेहत के लिए अच्छा नहीं होता।यह आदत धीरे-धीरे ईटिंग डिसऑर्डर तक जाती है। ईटिंग डिसॉर्डर खानपान की आदतों से संबंधित एक गंभीर स्थिति है, जो नकारात्मक रूप से आपके स्वास्थ्य, भावनाओं और कार्य करने की क्षमता को प्रभावित करती है। इस समस्या से ग्रस्त लोगों में खानपान की आदतें सामान्य नहीं रहतीं। कुछ लोग अपने शरीर की आवश्यकता से अधिक खाते हैं, तो कई लोग उससे बहुत कम खाते हैं।
ईटिंग डिसॉर्डर के प्रकार
एनारेक्सिया नवरेसा, बुलिमिया नवरेसा और बिंज ईटिंग डिसॉर्डर सबसे सामान्य प्रकार के डिसॉर्डर हैं। इसके अलावा कुछ और ईटिंग डिसॉर्डर हैं, जिनमें पिका, रूमिनेशन डिसॉर्डर और अवाइडेंट/रिस्ट्रक्टिव फूड इनटेक डिसॉर्डर प्रमुख हैं।
एनारेक्सिया नवरेसा
एनारेक्सिया नवरेसा को आम भाषा में एनारेक्सिया कहा जाता है। यह एक घातक ईटिंग डिसॉर्डर है। इसमें शरीर का वजन कम हो जाता है, क्योंकि जो लोग एनारेक्सिया से पीड़ित होते हैं, वे अपने भार और शरीर के आकार को नियंत्रित करने का अत्यधिक प्रयास करते हैं। एनारेक्सिया से पीड़ित लोग कैलरी का सेवन अत्यधिक कम कर देते हैं या वजन कम करने के लिए दूसरे उपायों को अपनाते हैं। इसमें अत्यधिक व्यायाम करना, पेट साफ रखने के लिए लैक्जेटिव का सेवन या खाने के बाद उल्टी कर देना जैसी चीजें शामिल होती हैं। वजन कम करने के ये प्रयास तब भी जारी रहते हैं, जब वजन अत्यधिक कम हो जाता है। कभी-कभी इससे पीड़ित लोग खुद को इतना भूखा मारते हैं कि यह स्थिति उनके लिए घातक हो जाती है।
बुलिमिया नवरेसा
बुलिमिया घातक ईटिंग डिसॉर्डर है। इससे पीड़ित व्यक्ति का खानपान पर नियंत्रण नहीं रहता। ऐसे लोग थोड़े समय में ही अधिक मात्रा में खा लेते हैं और अस्वस्थ तरीके से उस अतिरिक्त कैलोरी को कम करने का प्रयास करते हैं, क्योंकि अधिक खाने के बाद ऐसे लोग शर्म और अत्यधिक भय से भर जाते हैं। वजन बढ़ने के डर से वे उल्टी करने का प्रयास करते हैं, अत्यधिक व्यायाम करते हैं या लैक्जेटिव का उपयोग करते हैं, ताकि अतिरिक्त कैलरी मल द्वारा निकल जाए।
बिंज ईटिंग डिसॉर्डर
बिंज ईटिंग डिसॉर्डर से पीड़ित लोग नियमित रूप से अत्यधिक भोजन खाते हैं। ऐसे लोगों को इस बात का पूरा एहसास रहता है कि उनका अपने खानपान पर नियंत्रण नहीं रहा। बिंज के बाद भी लोग अपने व्यवहार के कारण आत्मग्लानि, गुस्से या शर्म से भर जाते हैं, लेकिन बुलिमिया की तरह वे इस अतिरिक्त कैलरी इनटेक को व्यायाम या दूसरे तरीकों से बाहर निकालने का प्रयास नहीं करते।
अन्य ईटिंग डिसॉर्डर
पिका : पिका एक ऐसा ईटिंग डिसॉर्डर है, जिसमें व्यक्ति को नॉनफूड आइटम खाने का मन करता है, जैसे साबुन, कपड़ा, टैलकम पाउडर, धूल, चॉक आदि। यह समस्या महीने में कम से कम एक बार तो होती ही है। पिका न स्वास्थ्य के लिए अच्छा है और न ही सामाजिक रूप से। लगातार इन चीजों के सेवन से स्वास्थ्य संबंधी कई जटिलताएं हो सकती हैं, जैसे पॉयजनिंग, पाचन मार्ग संबंधी समस्या या संक्रमण। पिका अकसर दूसरी स्वास्थ्य समस्याओं के साथ होता है, जैसे ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसॉर्डर।
खाना खजाना / शौर्यपथ / बटाटा गोलगप्पे चाट वीकेंड के लिए सबसे खास रेसिपी है। यह रेसिपी बच्चों को भी बहुत पसंद आएगी। आइए, जानते हैं रेसिपी-
सामग्री :
गोलगप्पे- आवश्यकतानुसार
उबले आलू- 2
चाट मसाला पाउडर- 1 चम्मच
नीबू का रस- 1 चम्मच
बारीक कटा प्याज- 2
दही के लिए सामग्री :
दही- 1/2 कप
काला नमक- स्वादानुसार
चीनी- 1 चम्मच
गार्निशिंग के लिए:
लाल मिर्च पाउडर- आवश्यकतानुसार
चाट मसाला पाउडर-आवश्यकतानुसार
हरी चटनी- 1/2 कप
मीठी चटनी- 1/2 कप
सेव- 1 कप
विधि :
एक बाउल में आलू का छिलका छीलकर मैश करें। उसमें चाट मसाला और नीबू का रस डालकर अच्छी तरह से मिलाएं। एक दूसरे बाउल में दही, काला नमक और चीनी डालकर अच्छी तरह से फेंट लें। सर्विंग प्लेट में पानी पूरी रखें और एक-एक करके सारी पानी पूरी के बीच में छेद करें। उसमें थोड़ा-थोड़ा आलू वाला मिश्रण डालें। ऊपर से थोड़ा-थोड़ा प्याज, दही, दोनों चटनियां, सेव, चाट मसाला, लाल मिर्च पाउडर और धनिया पत्ती डालें। तुरंत सर्व करें।
टिप्स / शौर्यपथ / कुकिंग टिप्स की बात करें, तो ये छोटे-छोटे टिप्स खाने को और भी टेस्टी बना देते हैं। आज हम आपको ऐसे ही टिप्स बताएंगे जिससे कि चिकन की रेसिपी और भी टेस्टी बनेगी-
-चिकन को पकाते वक्त शुरुआत में उसे हमेशा तेज आंच पर पकाएं ताकि उसका जूस सील हो जाए, उसके बाद उसे धीमी आंच पर पकाएं।
-चिकन के टुकड़ों में मसाले अच्छी तरह से लग जाएं, इसके लिए एक प्लास्टिक की पॉलिथिन में पहले मसाले और मैरीनेट की सभी सामग्री डालें और उसे अच्छी तरह से हिलाएं। इसके बाद चिकन को पकाएं। इसका फायदा यह होगा कि चिकन में मसाले अच्छी तरह से रच-बस जाएगा।
-फ्राइड चिकन बनाते वक्त चिकन को तलने से पहले आटे या मैदा में रोल करने की जगह, मिल्क पाउडर में रोल करें। तलने के बाद चिकन का रंग अच्छा आएगा।
-अगर आप चाहती हैं कि आपके बनाए कबाब मुलायम बनें और उन्हें चबाने में खाने वाले को परेशानी न हो, तो उन्हें अपेक्षाकृत ज्यादा देर तक मैरीनेट करें और साथ ही जरूरत से ज्यादा पकाएं नहीं।
-चिकन को हमेशा ऊंचे तापमान पर पकाएं ताकि उसके सभी बैक्टीरिया पूरी तरह से मर जाएं।
-चिकन की साफ-सफाई के दौरान खास सतर्कता बरतें। चिकन को हमेशा गर्म पानी से धोएं। साथ ही जिस बरतन में आपने कच्चे चिकन को रखा है, उसे भी गर्म पानी से धोना न भूलें। कच्चे चिकन को छूने के बाद अपने हाथों को साबुन से धोना न भूलें। इसके अलावा अगर आप कच्चे चिकन को फ्रिज में स्टोर कर रही हैं, तो इस बात का ध्यान रखें कि उसका जूस खाने के दूसरे सामान में न लगे।
Feb 09, 2021 Rate: 4.00
