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सेहत / शौर्यपथ / मुंहासें एक सामान्य स्किन प्रोबल्म है, जो कई महिलाओं को परेशान करते हैं. कई तरह के महंगे स्किन प्रोडक्ट्स और ट्रीटमेंट्स के बाद बहुत सी महिलाओं ने अपने मुंहासों से छुटकारा पाने के लिए घरेलू नुस्खों का इस्तेमाल करना शुरू किया औरर उन्हें सही में इसका असर भी दिखाई दिया. ऐसे में गुलाब जल को आपको मुंहासें दूर करने के लिए जरूर ट्राय करके देखना चाहिए. न केवल गुलाब जल आपकी त्वचा के पीएच स्केल को बैलेंस करता है, बल्कि यह मुंहासों से भी छुटकारा दिलाता है और आपकी त्वचा को जवां बनाता है.
मुंहासों के लिए गुलाब जल का क्यों करें इस्तेमाल?
गुलाब जल में एस्ट्रिजेंट प्रोपर्टीज होती हैं, जो आपकी त्वचा के लिए टोनर का काम करती है. यह आपकी त्वचा से धूल मिट्टी और कीटाणुओं को निकालकर पोर्स को खोलता है और चेहरे की डीप क्लेंजिंग करता है. साथ ही ये ढीली त्वचा को वापस से टाइट भी करता है. ये आपकी त्वचा पर बहुत ही कोमल रहता है और एक्सेस ऑयल को भी रोकता है.
हालांकि, गुलाब जल में मौजूद एंटी बैक्टीरियल, एंटीमाइक्रोबायल और एंटी इंफ्लामेटरी प्रोपर्टीज इसे मुंहासों से छुटकारा दिलाने के लिए लाभकारी बनाती हैं. इसकी एंटी बैक्टीरियल और एंटीमाइक्रोबायल प्रोपर्टीज मुंहासे पैदा करने वाले बैक्टीरिया को दूर रखती हैं और त्वचा को साफ करती हैं.
वहीं इसक एंटी इंफ्लामेटरी प्रोपर्टीज आपके दर्द को कम करती है और त्वचा को जल्दी से ठीक करने में मदद करती है. इसलिए हम आपके लिए कुछ ऐसे तरीके लाए हैं, जिनसे आप भी मुंहासों से छुटकारा पा सकती हैं.
1. गुलाब जल का स्प्रे
गुलाब जल को स्प्रे के रूप में लगाने से भी मुंहासें करने वाले बैक्टीरिया दूर रहते हैं.
आपको चाहिए
- गुलाब जल
- एक छोटी स्प्रे बोतल
ऐसे करें इस्तेमाल
- सबसे पहले स्प्रे बोतल में गुलाब जल डाल लें और साइड में रख लें.
- अपने चेहरे को क्लेंजर से साफ करें और सुखा लें.
- अब अपने चेहरे पर गुलाब जल छिड़कें.
- इसे 20 से 30 सेकेंड के लिए चेहरे पर रहने दें.
- अब टिशू से अपना चेहरा साफ कर लें.
- आप चाहें तो मोइश्चराइजर में मिला कर भी इसे लगा सकती हैं.
- आप रोज इस स्प्रे को अपने चेहरे पर लगाएं और कुछ ही वक्त में आपको बदलाव नजर आने लगेगा.
2. गुलाब जल और मुल्तानी मिट्टी
ऑयली त्वचा के लोगों के लिए ये फेस मास्क एक दम परफेक्ट है. मुल्तानी मिट्टी चेहरे से एक्सेस ऑयल को सोख लेती है और चेहरे को डीप क्लेंज करती है. ये घरेलू नुस्खां त्वचा को ऑयल और मुंहासों से दूर रखने में मदद करेगा.
आपको चाहिए
- 1 टेबलस्पून मुल्तानी मिट्टी
- 1 टेबलस्पून गुलाब जल
ऐसे करें इस्तेमाल
- दोनों को अच्छे से मिला लें और एक स्मूथ पेस्ट बना लें.
- अपना चेहरा धो लें और पानी सुखा लें.
- अब इस पेस्ट को अपने चेहरे और गले पर लगाएं.
- पेस्ट के सूखने तक इसे लगा रहने दें.
- अब अपने चेहरे को सामान्य पानी से धो लें.
- इस मास्क का अपने चेहरे पर दो बार इस्तेमाल करें.
3. गुलाब जल और सेब का सिरका
सेब के सिरके को इसकी एंटी बैक्टीरियल और एंटी इंफ्लामेटरी प्रोपर्टीज के लिए जाना जाता है. ये दोनों ही मुंहासों को दूर करती हैं और त्वचा को साफ और स्वस्थ बनाती हैं.
आपको चाहिए
- आधा कप गुलाब जल
- 2 टीस्पून सेब का सिरका
ऐसे करें इस्तेमाल
- अपने चेहरे को क्लेंजर से धो लें और सुखा लें.
- अब एक कप में सेब के सिरके और गुलाब जल को मिला लें.
- एक रुई का टुकड़ा लें और इसे मिक्स्चर में डालें और फिर चेहरे पर लगाएं.
- अब अपने चेहरे को सूखने दें.
- इसके बाद अपने चेहरे पर मोइश्चराइजर लगाएं.
- इस घरेलू नुस्खे का हफ्ते में कम से मक 2 बार इस्तेमाल करें.
4. गुलाब जल और चंदन
नेचुरल स्किनकेयर की बात आती है तो चंदर जादू की तरह काम करता है. चंदन में मौजूद एंटी इंफ्लामेटरी प्रोपर्टीज जलन को कम करती है और धूल मिट्टी को बाहर निकालकर त्वचा को साफ करती है.
आपको चाहिए
- 2 टेबलस्पून चंदन का पाउडर
- 1 टेबलस्पून गुलाब जल
ऐसे करें इस्तेमाल
- गुलाब जल और चंदन के पाउडर को एक बाउल में मिक्स कर के पेस्ट बना लें.
- अब अपने चेहरे को क्लेंजर से धो लें और सुखा लें.
- इस पेस्ट को अपने चेहरे पर लगाएं और सूखने तक छोड़ दें.
- अब अपने चेहरे को ठंडे पानी से धो लें.
- आप इस नुस्खे का हफ्ते में 3 से 4 बार इस्तेमाल कर सकते हैं.
5. गुलाब जल और नींबू
नींबू में काफी अधिक मात्रा में विटामिन सी होता है, जो मुंहासों के लिए काफी लाभकारी है. इसके अलावा नींबू बहुत ही अच्छा स्किन ब्राइटनिंग एजेंट भी है, जो आपकी त्वचा के स्कार्स को हटाता है. ये नुस्खा आपको मुंहासें से मुक्स साफ त्वचा देगा.
नजरिया /शौर्यपथ / कई मौके आते हैं, जब देश हमें प्रेरित करता है। वर्ष 1992 के ओलंपिक के समय मैं छोटा था, वहां भारतीय खिलाड़ियों की टीम को देश का प्रतिनिधित्व करते हुए देखना मेरे लिए बहुत प्रेरणादायी था। तब लिंबा राम ने कैसे निशाना साधा था, उत्सव-तमाशे का कैसा माहौल था! खिलाड़ी कैसे अपने बेहतरीन प्रदर्शन के अभियान में लगे थे। तब मुझे ओलंपिक में हॉकी महाशक्ति के रूप में हमारी विरासत के बारे में भी पता था, और यह कुछ ऐसा था, जिसने मुझे अपनी खेल यात्रा और भारत को गौरव दिलाने के लिए प्रेरित किया।
मुझे याद है, जब 11 अगस्त, 2008 को बीजिंग ओलंपिक में मैंने स्वर्ण पदक जीता, तब मुझे नहीं लगा था कि मैंने जीत लिया है। जीतने के बाद भी मेरा ध्यान जीत की प्रक्रिया पर लगा था। कैसे सर्वश्रेष्ठ करना है, यही बात मेरे दिमाग में चल रही थी। हालांकि जैसे-जैसे चीझें साफ हुईं, मुझे स्थिति की गंभीरता का एहसास हुआ। जीवन के एक लक्ष्य तक पहुंचने की खुशी महसूस हुई। इस बात ने मेरे मन को छू लिया कि मेरे एक काम ने पूरे देश को कैसे प्रभावित किया है।
पिछले वर्षों में खेलों में बढ़ती भागीदारी बहुत प्रोत्साहित करती है। एथलीटों का समर्थन करने के लिए आगे आने वाले अधिक से अधिक लोगों को देखना बहुत अच्छा लगता है। उदाहरण के लिए, एक औसत जिला स्तरीय प्रतियोगिता में भी भागीदारी बढ़ गई है, जब मैं इस स्तर पर प्रतिस्पद्र्धा करता था, तब इतने लोग नहीं आते थे। आज हर खेल में किसी न किसी रोल मॉडल का उदय खिलाड़ियों को पेशेवर खेल की राह दिखाता है, इसे पोषित-प्रोत्साहित करने की जरूरत है। अगले दशक में मैं निश्चित ही अधिक एथलीटों को विश्व विजेता बनते देख सकता हूं, और उम्मीद है, मैं लंबे समय तक भारत का एकमात्र व्यक्तिगत स्वर्ण पदक विजेता नहीं रहूंगा।
आज खेलों में निवेश की जरूरत है। देश में प्रचुर प्रतिभा है। सही खेल ढांचा हो और खिलाड़ी विकास में दूरदर्शिता हो, तो प्रतिभाओं को प्रोत्साहन मिलेगा। कई मायने में यह हो भी रहा है। मैंने सरकार में खेलों के लिए नए सिरे से प्रतिबद्धता देखी है। यही वजह है, मैं इस देश में खेलों के विकास को बहुत आशावादी रूप से देखता हूं। खेल विकास के लिए सरकार भी करे और कॉरपोरेट सेक्टर जितना ज्यादा शामिल हो, उतना बेहतर होगा।
कोरोना न होता, तो इस समय ओलंपिक का माहौल होता। यह उन खिलाड़ियों के लिए निराशा की बात है, जिन्होंने टोक्यो खेलों को ध्यान में रखते हुए वर्षों से तैयारी की है। हालांकि, इससे कई युवा एथलीटों को तैयार होने के लिए अतिरिक्त समय मिलेगा। कोरोना ने हमें एक कदम पीछे लेने और आगे के कदमों की योजना बनाने का समय दिया है। यह अंतत: इस पर निर्भर करता है कि आप स्थिति को कैसे देखते हैं और इससे भी महत्वपूर्ण कि आप इसका अधिकतम उपयोग कैसे करते हैं। बेशक, जो अवसर का लाभ उठाएगा, वह जरूर जीतेगा।
आज जो दौर है, उसका हममें से कई लोगों पर प्रभाव पड़ा है और इस पर काबू पाने के लिए सेहतमंद और सुरक्षित रहना हमारे लिए अहम है। जितना संभव हो, घर पर रहने और सुरक्षा प्रोटोकॉल का पालन करने, जैसे मास्क पहनने और हाथ धोने से भी एक बड़ा फर्क आएगा। आप एक दिनचर्या रखें और बिना अपवाद पालन करें। जो छोटे व्यायाम घर पर किए जा सकते हैं, जितना संभव हो, करें। साथ ही, अच्छे भोजन से न केवल शारीरिक, बल्कि मानसिक सेहत में भी मदद मिलेगी।
हमें अपनी मजबूती के साथ देश की मजबूती के बारे में भी जरूर सोचना है। इस देश को कैसे आकार दिया जाएगा, यह बात भारत के युवाओं के परस्पर सामंजस्य और सामूहिक विकास में योगदान के लिए सक्षम होने पर निर्भर है। हमें अपने देश के युवाओं का साथ देना होगा। युवा जो कुछ कर सकते हैं, उन्हें उसी दिशा में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन के लिए प्रोत्साहित करना होगा। ऐसा करते हुए हम भारतीयों की एक पूरी पीढ़ी को प्रेरित कर सकते हैं, जो देश को नई ऊंचाइयों पर ले जाएगी।
एक उद्यमी, खिलाड़ी या किसी अन्य पेशे में सफलता के लिए आप जिस भी क्षेत्र को चुनें, अपने इरादे को बुलंद रखें। सीखने के लिए हमेशा तैयार रहें। दुनिया का परिदृश्य तेजी से बदल रहा है, आपका भी बदलेगा, अगर आप पूरी लगन से अपनी मंजिल पर पूरा ध्यान लगाएंगे।
(ये लेखक के अपने विचार हैं) अभिनव बिंद्रा, ओलंपिक स्वर्ण पदक विजेता
सम्पादकीय / शौर्यपथ / स्वतंत्र भारत ने विकसित राष्ट्र होने की ओर एक लंबा सफर तय कर लिया है, और अभी आगे का लंबा सफर हमें जल्दी पूरा करना है। बताते हैं, भारत कम से कम 2035 तक युवाओं का देश है, उसके बाद हमारी आबादी में युवाओं की तादाद कम होती जाएगी। इसलिए अगले 15 वर्ष हमारे लिए बहुमूल्य हैं। हमें 1947 में जो भारत मिला था, वह अंग्रेजी शासन द्वारा बुरी तरह प्रताड़ित व शोषित था। कृषि अर्थव्यवस्था भारत की रीढ़ थी, गुलामी के दौर में सबसे पहले उसी पर प्रहार हुआ था। साल 1901 से 1941 के बीच भारत में प्रति व्यक्ति खाद्यान्न उत्पादन में 24 प्रतिशत की गिरावट आई थी। तब देश की 70 प्रतिशत जमीन पर जमींदारों का कब्जा हो गया था। अंग्रेज और जमींदार मिलकर फसल व मेहनत का आधा हिस्सा छीन लेते थे, लेकिन आज न तो अंग्रेज हैं और न जमींदार। व्यापक समाज को सामने आने का मौका मिला। नतीजा सामने है, भारतीय अर्थव्यवस्था का आकार पीपीपी (परचेजिंग पावर पैरिटी) के हिसाब से दुनिया में तीसरे स्थान पर है और भारतीय अर्थव्यवस्था का स्थान दुनिया में पांचवां माना जाता है। आज हमारी अर्थव्यवस्था उस ब्रिटेन से भी बड़ी है, जिसने हमें कभी गुलाम बना रखा था। अनेक पैमाने हैं, जिनसे भारत की आर्थिक मजबूती को देखा जा सकता है। 1946 के आसपास भारतीय अर्थव्यवस्था में कुल बचत सकल राष्ट्रीय उत्पाद का महज 2.75 प्रतिशत थी, जो 1971-75 में 12.35 प्रतिशत और मार्च 2019 में 30.1 प्रतिशत पहुंच गई। बचत से यह संकेत मिलता है कि हम नए निवेश में कितने सक्षम हैं। निवेश की हमारी क्षमता बढ़ती जा रही है। ज्यादा दशक नहीं बीते हैं, दुनिया भारत की आर्थिक ताकत नहीं जानती थी। मंदी से मुकाबले के दौर में भी भारतीय अर्थव्यवस्था ने दुनिया में अपने महत्व को बेहतर ढंग से स्थापित किया।
बेशक, हमारी आर्थिक आजादी में कमियां भी हैं और तभी तो पांचवें नंबर की अर्थव्यवस्था वाला देश प्रति व्यक्ति आय के मामले में दुनिया में 100 देशों में भी शामिल नहीं है। सामाजिक पैमाने पर भारत के विकास को लंबा सफर तय करना है। संकेत स्पष्ट है कि अर्थव्यवस्था के आकार मात्र से पूरे देश को नहीं देखा जा सकता। अगर हम अंतरिक्ष विज्ञान के मामले में अग्रणी पांच देशों में शामिल हैं, तो सामाजिक विकास के पैमाने पर भी हमें पांच नहीं, तो टॉप 50 में तो रहना ही चाहिए। यदि हम टॉप सामरिक शक्तियों में शुमार किए जाते हैं, तो हमें कम से कम पांच टॉप रक्षा सामान उत्पादक देशों में भी होना चाहिए। बेशक तरक्की हुई है, सामाजिक, आर्थिक, सामरिक, हर मोर्चे पर, और आज जो भारत है, वह 1962 में नहीं था। लेकिन उतना ही सच है कि पूरे समर्पण के साथ अगर स्वतंत्र देश की सेवा होती, तो हम आज से कहीं ज्यादा मजबूत और सुरक्षित होते।
भारत में जितनी कमियां हैं, उससे कहीं ज्यादा संभावनाएं हैं। हाल के वर्षों के आंकड़ों को देखें, तो कहीं न कहीं सेवा क्षेत्र पर देश का अत्यधिक भार पड़ रहा है। सेवा क्षेत्र देश के विकास में 50 प्रतिशत से अधिक योगदान कर रहा है। चिंता यह है कि औद्योगिक योगदान 29 प्रतिशत और कृषि योगदान महज 17 प्रतिशत है। सेवा क्षेत्र को मजबूत करते हुए हमें कृषि और उद्योग पर पहले से ज्यादा ध्यान देना होगा, तभी हमारी स्वतंत्रता विकसित और सशक्त होगी।
मेलबॉक्स / शौर्यपथ / अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी, आंचल में है दूध और आंखों में पानी...’ कवि मैथिलीशरण गुप्त की ये पंक्तियां नारी जीवन की दयनीय अवस्था को सटीक बयां करती हैं। हमारे देश में महिलाओं के खिलाफ हिंसा थमने का नाम नहीं ले रही है। विडंबना है कि यहां देवियों की पूजा की जाती है, पर महिलाओं को आमतौर पर खिलौना समझ लिया जाता है। देश की लचर न्याय-व्यवस्था इसके लिए जिम्मेदार है। महिलाओं के खिलाफ अपराध करने वाले भली-भांति जानते हैं कि कानून उन्हें कठोर दंड नहीं दे सकता। फिर, हमारा समाज अब भी इतना पुरुष प्रधान तो है ही कि आजादी के इतने वर्षों के बाद भी महिलाओं को सारे अधिकार देने से बचता है। हालांकि, सरकारें अपनी तरफ से लगातार प्रयास करती रही हैं, लेकिन अब भी संकीर्ण सोच में बदलाव लाने की कई कोशिशें करनी होंगी। यदि सरकार और समाज मिलकर प्रयास करें, तो इसमें कोई दोराय नहीं कि हम महिलाओं के लिए एक आदर्श देश बना सकते हैं।
राजेंद्र प्रसाद, रांची, झारखंड
स्वतंत्रता दिवस का जश्न
आज देश आजादी का महान पर्व मना रहा है। देश को स्वतंत्र हुए 73 वर्ष हो गए। इन वर्षों में हमने काफी कुछ हासिल किया है। वर्ष 1947 से 2020 तक की यात्रा पर गौर करें, तो यही लगता है कि फर्श से अर्श तक का सफर हमने तय किया है। एक वक्त यहां खाने के भी लाले थे, मगर अब हम इतना अनाज उगा लेते हैं कि जरूरतमंद देशों को भी भेजते हैं। नई-नई तकनीक और प्रौद्योगिकी को भी हमने खूब अपनाया है। कहा तो यह भी जाता है कि भारतीय प्रतिभा के बूते ही अमेरिका का सिलिकॉन वैली आकार ले सका। फिर भी, काफी कुछ किया जाना अभी शेष है। गरीबी उन्मूलन की दिशा में लगातार काम करने के बाद बावजूद हमें अब तक इसमें बहुत सफलता नहीं मिली है। इसी तरह, पठन-पाठन का माहौल भी बेहतर बनाना एक बड़ी चुनौती है। स्वास्थ्य सेवाओं पर भी खर्च भी बढ़ाने होंगे। अगर ये सब हम कर सके, तो निश्चय ही आने वाले वर्ष भारत के हैं।
समिधा, महरौली, नई दिल्ली
संकल्प लें आज
स्वतंत्रता दिवस भारतीयों के लिए हर्षोल्लास का दिन है, लेकिन कोरोना-काल ने इस दिन मनने वाले विभिन्न कार्यक्रमों को स्थगित कर दिया है, जिससे जश्न मानो फीका पड़ गया है। आजादी की सुखद अनुभूति जिस तरह आज से सात दशक पहले लोग किया करते थे, आज भी वैसा ही करते हैं। हालांकि, आजाद होने के बाद लोगों ने सोचा था कि अपना मुल्क होगा, तो बेहतर शासन प्रणाली कायम होगी। मगर दुर्भाग्य से लोकतंत्र की सभी खूबियों को हम अपना नहीं सके हैं। राजनेताओं-नौकरशाहों के गठजोड़ से आम जन कितने संतुष्ट हैं, यह आसानी से समझा जा सकता है। सरकार ने बेशक कई योजनाएं शुरू की हैं, लेकिन जब तक भ्रष्टाचार का खात्मा नहीं होगा, तब तक आजादी का वास्तविक एहसास मुश्किल है।
मिथिलेश कुमार, भागलपुर
हर नागरिक प्रहरी
आज क्यों देशभक्ति दो राष्ट्रीय पर्वों में सिमटकर रह गई है? 15 अगस्त और 26 जनवरी के अलावा पूरे साल शायद ही कोई इसकी बात करता है। सवाल यह है कि हम हर समय देशभक्त जैसा आचरण क्यों नहीं करते, ताकि रामराज्य कायम हो? आज आजादी के लिए नहीं, बल्कि देश के भीतर जड़ें जमा रहे आतंकवाद और भ्रष्टाचार के खिलाफ हमें लड़ना है। मुखौटा पहने अपनों से टकराना है। यह लड़ाई पहले से कहीं ज्यादा गंभीर और बड़ी है, क्योंकि इसमें कौन अपना है और कौन पराया, यह समझना मुश्किल है। इसलिए आज हर नागरिक का कर्तव्य होना चाहिए कि वह प्रहरी बनकर भ्रष्टाचारियों, अपराधियों और आतंकवादियों से लडे़।
शिवांगी खत्री, माछरा, मेरठ
ओपिनियन / शौर्यपथ / वह साल 1918 था। महात्मा गांधी को दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटे तीन वर्ष हो चले थे। अहमदाबाद में बापू को लगा कि उन्हें हल्का पेचिश हो गया है। फिर भी, कस्तूरबा द्वारा बनाई गई खीर देखकर वह लोभ रोक न पाए और अपनी सेहत बुरी तरह बिगाड़ बैठे। बाद के वर्षों में सत्य के साथ प्रयोग में उन्होंने लिखा, ‘यह यमदूत के लिए पर्याप्त निमंत्रण था’। गांधी को दरअसल स्पेनिश फ्लू के कारण पेट संबंधी दिक्कतें हुई थीं। इस फ्लू ने पहले विश्व युद्ध के आखिरी वर्ष में पूरी दुनिया को तबाह कर दिया था। लेखिका लौरा स्पिने ने अपनी किताब द पेल राइडर में इस महामारी के बारे में काफी कुछ बताया है।
महज एक साल पहले तक हमारी दुनिया भी स्थिर लग रही थी। राजनीति, अर्थव्यवस्था, प्रभुत्व और रिश्तों के वैश्विक तार इस तरह आपस में गुंथे हुए थे कि उनकी गांठों का खुलना असंभव लग रहा था। मगर दिसंबर, 2019 में सब कुछ बदल गया। चीन के वुहान में एक वायरस ने एक इंसान को संक्रमित किया। यह वह वायरस था, जो चमगादड़ों में रहता है। अमूमन इस तरह के मामले जल्द ही अंजाम तक पहुंच जाते हैं। इंसान संक्रमण-मुक्त हो जाता है और हालात पटरी पर लौट आते हैं। मगर इस बार वायरस के पास यह क्षमता थी कि वह एक इंसान से दूसरे को संक्रमित कर सके। अगर 1918 का स्पेनिश फ्लू तालाब में उठने वाली तरंग की तरह फैला, तो कोरोना वायरस ने तालाब में ऐसी हिलोरें पैदा कर दी हैं, जो पत्थर के लगातार उछलते रहने से बनती रहती हैं। यह बीमारी न सिर्फ हमारी सेहत और कमजोर वर्गों की आजीविका पर कहर बनकर टूटी है, बल्कि दुनिया की अर्थव्यवस्था और मनोबल को भी इसने पर्याप्त नुकसान पहुंचाया है। पूरा जनजीवन अस्त-व्यस्त हो गया है। इससे मानसिक सेहत पर नकारात्मक असर पड़ा है, उसको कम करके नहीं आंका जाना चाहिए।
आज स्वतंत्रता दिवस के दिन, जब पीछे मुड़कर हम देखते हैं, तो हमें उन तीन डोर की जरूरत महसूस होती है, जो भारत व दुनिया को आपस में बांधकर रख सकती है। पहली डोर है, अपने नागरिकों को सम्मान के साथ स्वीकार करना। दूसरी डोर है, इस महामारी से बाहर निकलने का तरीका समझना और तीसरी, नई राह पर चलना।
भारत से अपरिचित किसी के लिए भी यह जानना अद्भुत होगा कि लॉकडाउन-1 के बाद से देश ने किस तरह से काम किए हैं। हमारे डॉक्टरों, नर्सों और अस्पतालों ने बिना थके मेहनत की है। छोटे शहरों से लेकर महानगरों तक के प्रशासनिक अधिकारियों ने भी अपनी-अपनी नींद त्याग दी। हमारे वैज्ञानिक, इंजीनियर, उद्योगपति, किसान, सभी एक साथ आगे आए। सरकार और नौकरशाही में हर स्तर पर इस महामारी के तमाम पहलुओं से निपटने की प्रतिबद्धता दिखी, जो आज भी कायम है। वाकई, यह असाधारण समय है, जहां हर दिन फैसले लेने पड़ रहे हैं, और वह भी पेचीदा व विविध इनपुट के आधार पर।
इस भयावह साल की करीब-करीब दो-तिहाई यात्रा हमने पूरी कर ली है, अब पहले से कहीं अधिक जरूरी है कि हम संजीदा हो जाएं, अपने दायित्व को समझें और अपनी आजीविका फिर से हासिल करें। हाथ पर हाथ धरे बैठकर किसी चमत्कार की उम्मीद कतई न करें। बेशक, हमने इस वायरस के बारे में काफी कुछ जाना है, और हमें अब भी बहुत कुछ समझना है। लेकिन विज्ञान के कुछ निष्कर्ष बेहद यकीनी हैं। उन पर अमल करके हम इस वायरस को हरा सकते हैं और पुरानी जीवनशैली फिर से पा सकते हैं। मास्क का इस्तेमाल, दैहिक दूरी का पालन जैसे व्यवहार, दवा और वैक्सीन हमें इस महामारी से निश्चय ही बाहर निकाल देंगे, लेकिन हमें इससे उबरने और अपनी समृद्धि फिर से हासिल करने के लिए नए रास्ते खोजने होंगे। कोरोना के प्रकोप ने हमारे लोगों, उनकी उम्मीदों और हमारी सरकारों को एक धरातल पर ला दिया है। हमें अब एक साथ काम करना होगा, क्योंकि हमारे पास यही एकमात्र भविष्य है।
हमें भारत-निर्माण की तरफ बढ़ना होगा और इसके लिए यह सुनिश्चित करना होगा कि हमारे नौजवानों के पास अवसर उपलब्ध हों। भारत के विकास की इस नई गाथा में नेतृत्व सिर्फ युवा ही संभाल सकते हैं। जल जीवन मिशन, स्वच्छ भारत अभियान जैसी कई प्रमुख योजनाएं हमारे पास हैं, तो स्टार्ट-अप, कृषि व उद्यमिता में तमाम अवसर, जहां योग्यता को भरपूर तवज्जो मिलती है। इन सबको भुनाने के लिए हमारे युवाओं को उच्च शिक्षा और कौशल हासिल करने के हर मौके ढूंढ़ने होंगे। कुछ क्षेत्र तो ऐसे हैं, जहां बहुत कम उम्र के नौजवान भी प्रशिक्षण पाकर विश्व स्तर पर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा सकते हैं। इसके लिए उन्हें कोडिंग या मशीनों के संचालन में प्रशिक्षण की जरूरत है। इसी तरह, कृषि उपकरणों का विकास व रखरखाव भी अब बहुत महत्वपूर्ण हो चला है। लिहाजा कंप्यूटर विज्ञान और कोडिंग सीखने के हर उपलब्ध मौके को हाथ से जाने नहीं देना चाहिए। अगर हमारे ग्रामीण इलाकों में ऐसे कार्यक्रम चलाए जाते हैं, तो वे मूल्य-वद्र्धित उत्पादों के निर्यात के बडे़ गढ़ बन सकते हैं। साथ ही, बेहतर जीवन-यापन के लिए वे लोगों को लुभाने भी लगेंगे।
जाहिर है, यहां विज्ञान और तकनीक की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है और उनको केंद्र में रखकर ही नीतियां बननी चाहिए। वर्षों बाद लोगों ने शोध और अनुसंधान की मांग की है, जो बताता है कि वैज्ञानिकों से कैसी अपेक्षाएं हैं। इसीलिए हमारे ऊपर बहुत भारी जिम्मेदारी है। महामारी ने बता दिया है कि हमारा लक्ष्य क्या होना चाहिए। हमें आत्म-विश्वास और आत्म-निर्भरता से पर्यावरण, जैव विविधता और टिकाऊ विकास पर पर्याप्त ध्यान देना होगा। 1918 में फ्लू के शिकार महात्मा गांधी कमजोर नहीं पड़े थे, बल्कि उन्होंने पूरी दृढ़ता से उसका मुकाबला किया था। इस स्वतंत्रता दिवस पर हमें फिर से वही रास्ता अपनाने की ओर बढ़ना चाहिए।
(ये लेखक के अपने विचार हैं) के विजय राघवन, प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार, भारत सरकार
भिलाई / शौर्यपथ / महापौर परिषद के सदस्य नीरज पाल की अध्यक्षता एवं आयुक्त ऋतुराज रघुवंशी की उपस्थिति में आज शुक्रवार को निगम के सभागार में सोशल डिस्टेंस मेंटेन करते हुए महापौर परिषद की बैठक हुई। जहां एसटीपी की स्थापना के लिए विष्णु केमिकल लिमिटेड औद्योगिक क्षेत्र को अनुमति प्रदान करने के लिए सर्वसम्मति से महापौर परिषद के सदस्यों ने सहमति जताई! इस प्रस्ताव पर सहमति जताने के साथ ही निगम को इससे राजस्व की प्राप्ति भी होगी! जल कार्य विभाग द्वारा किए गए गणना के अनुसार 5 रुपए प्रति किलोलीटर नाले की जल को लेने की एवज में लिया जाएगा! जितना जल विष्णु केमिकल लिमिटेड द्वारा लिया जाएगा उसकी गणना इसी आधार पर करते हुए राशि की वसूली की जाएगी! बता दें कि विष्णु केमिकल लिमिटेड औद्योगिक क्षेत्र नंदिनी रोड भिलाई के द्वारा एसटीपी की स्थापना की अनुमति के लिए आवेदन प्रस्तुत किया गया था!
दुर्ग / शौर्यपथ / जैन समाज का एक प्रतिनिधिमंडल जिसमें जैन समाज के सभी संप्रदाय के लोग ओसवाल पंचायत के बैनर तले दुर्ग जिला कलेक्टर डॉक्टर सर्वेश्वर नरेंद्र भूरे तथा दुर्ग नगर निगम कमिश्नर बर्मन को एक ज्ञापन सौंपकर जैन समाज का सबसे बड़ा त्यौहार पर्यूषण पर्व पर जीव हत्या पर रोक लगाने की मांग को लेकर ज्ञापन सौंपा । इसके साथ ही जिला कलेक्टर सर्वेश्वर नरेंद्र भूरे को सर्वोच्च न्यायालय के एक आदेश की कॉपी भी संलग्न कर जानकारी दी जिसमें 15 अगस्त से लेकर 22 अगस्त तक सभी बूचडख़ाने पर रोक लगाने का आदेश पारित किया गया है। इस आदेश की कॉपी जिला कलेक्टर एवं निगम कमिश्नर बर्मन को दी गई है। ओसवाल पंचायत दुर्ग के द्वारा दिए गए ज्ञापन में कहां गया की पर्यूषण पर्व पर पूरे भारतवर्ष में जैन धर्म के द्वारा जप तप उपवास अनुष्ठान के माध्यम से सभी धार्मिक क्रियाएं शहर के आध्यात्मिक वातावरण को शुद्ध बनाने हेतु यह सभी प्रयोग पूरे भारतवर्ष में आयोजित होते हैं और ऐसे समय में मूक पशुओं की निर्मम हत्या कर शहर का आध्यात्मिक वातावरण खराब होता है वातावरण की शुद्धता के लिए इन दिनों में सभी मुक्त पशुओं की हत्या पर सर्वोच्च न्यायालय ने 8 दिनों के लिए सभी कत्लखाने बंद रखने का आदेश जारी किया है अखिल भारती पशु पक्षी कल्याण बोर्ड भारत सरकार ने सभी राज्य सरकारों को पर्यूषण पर्व पर पशु वध रोकने आदेशित किया है । जैन समाज के प्रतिनिधि मंडल में ओसवाल पंचायत दुर्ग के अध्यक्ष गौतम बोथरा मदन जैन गौतम सांखला, नवीन संचेती, निर्मल बाफना, ताराचंद कांकरिया, टीकम छाजेड़, किशोर कोठारी, नवीन बोथरा, निर्मल श्री श्री माल, गौतम बाटिया, ताराचंद कोचर सहित जैन समाज के विभिन्न संप्रदाय के प्रमुख सदस्य जैन समाज के प्रतिनिधि मंडल में विशेष रुप से उपस्थित थे।
दुर्ग / शौर्यपथ / कोविड संक्रमण को रोकने के लिए काम करते हुए इससे संक्रमित होकर एवं स्वस्थ होकर लौटे कोरोना वारियर्स का सम्मान स्वाधीनता दिवस के अवसर पर समारोह के मुख्य अतिथि कृषि एवं जल संसाधन मंत्री श्री रविन्द्र चौबे द्वारा किया जाएगा। इनमें शामिल हैं:-
स्वतंत्रता दिवस सम्मान समारोह श्रेणी स्वास्थ्य - रविचंद्र प्रकाश, कोल्डचैन हैडलर, शहरी प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र, मरोदा, अश्विनी साहू, चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी, शहरी प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र, छावनी, लक्ष्मी नारायण, क्र्लक, शहरी प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र, छावनी, राजकुमारी यादव, चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी, शहरी प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र, छावनी, अशोक वर्मा, लैब टेक्नीशियन, शहरी प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र, बैकुण्ठधाम, अशोक साहू, चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी, शहरी प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र, कोसानगर श्रीमती श्वेता जोसेफ, स्टॉफ नर्स, शहरी प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र, छावनी, श्रीमती तुलसी चतुर्वेदी, महिला स्वास्थ्य कार्यकर्ता, शहरी प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र, घासीदास वार्ड, कमलकांत साहू, लैब टेक्नीशियन, शहरी प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र, बघेरा, श्रीमती द्रोपती, महिला स्वास्थ्य कार्यकर्ता, एस.एस.के. आदर्श नगर, श्रीमती दिव्या, स्टॉफ नर्स, शहरी प्रथामिक स्वास्थ्य केन्द्र, पोटिया, पोषण लाल यादव, फार्मा. ग्रेड-2, सामूदायिक स्वास्थ्य केन्द्र पाटन, दिव्या सनपाल, फार्मा. ग्रेड-2, सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र पाटन, टिमनमन लाल साहू, फार्मा. ग्रेड-2, सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र पाटन, मारुति वैष्णव, सफाई कर्मचारी (जे.डी.एस.), सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र पाटन, धनंजय साहू, वाहन चालक (जे.डी.एस.), सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र झीट, श्रीमती सेती बाई, सफाई कर्मचारी (जे.डी.एस.),प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र बटरेल, श्रीमती सीमा साहू, महिला स्वास्थ्य कार्यकर्ता, प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र गाड़ाडीह, श्रीमती देवीला चंद्राकर, महिला स्वास्थ्य कार्यकर्ता, उपस्वास्थ्य केन्द्र पचपेड़ी पाटन] टेकेश्वर साहू, टी.बी.एच.बी., दुर्ग, श्रीमती इंद्र अमृत, एस.टी.एस., पाटन, डॉ दुर्गेश वर्मा, दंत चिकित्सा अधिकार, सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र उतई, चंद्रशेखर पटेल, लैब टेक्नीशियन, डॉ. हरिओम चंद्राकर, चिकित्सा अधिकारी, प्राथ. स्वा. केन्द्र जुनवानी खम्हरिया, श्रीमती रेवती शिवारे, एम.टी. टेकापार बोरी, मंजू पांडे, महिला स्वास्थ्य कार्यकर्ता, उप स्वास्थ्य केन्द्र मातरा, श्रीमती उमा साहू, एम.टी., बरहापुर, श्रीमती गोमती साहू, मितानीन, करेली पुरदा, श्रीमती लता देती, मितानीन, करेली पुरदा होमिन देशमुख, मितानीन, पोटिया सेवति बोरी, टुपेन्द्र मढ़रिया, पुरूष स्वास्थ्य कार्यकर्ता, उप स्वास्थ्य केन्द्र, कपसदा, श्रीमती अन्नपूर्णा साहू, नेवई, श्रीमती नेहा मार्टिन, स्टॉफ नर्स, जिला अस्पताल दुर्ग, श्रीमती इंदू सिंग, स्टॉफ नर्स, जिला अस्पताल दुर्ग, तोरण लाल ठाकुर, औषधालय सेवक, आयुर्वेद चिकित्सा विभाग और प्रकाश सिंह ठाकुर, औषधालय सेवक, आयुर्वेद चिकित्सा विभाग का नाम शामिल है।
स्वंतंत्रता दिवस समारोह में कोरोना वारियर्स का सम्मान श्रेणी स्वछता
श्रीमती टिकेश्वरी निषाद, सफाई मित्र, नगर पालिक निगम दुर्ग, दयाराम विश्वकर्मा, सफाई कर्मचारी, नगर पालिक निगम भिलाई, सुरन्ना, सफाई कर्मचारी, नगर पालिक निगम भिलाई, नेत्रों बाग, सफाई कर्मचारी, नगर पालिक निगम भिलाई, गजरत पिता नारायण, सफाई कर्मचारी, नगर पालिक निगम भिलाई, श्रीमती रंजीता धुर्वे, सफाई कर्मचारी, नगर पालिक निगम भिलाई, श्रीमती नगमा धुर्वे, सफाई कर्मचारी, नगर पालिक निगम भिलाई, श्री दिलेश्वर सोनवानी, सफाई कर्मचारी, नगर पालिक निगम रिसाली का नाम शामिल है।
स्वतंत्रता दिवस समारोह में कोरोना वारियर्स का सम्मान श्रेणी (पुलिस विभाग)
ब्रम्हानंद देशलहरे, प्रधान आरक्षक, जिला पुलिस बल दुर्ग, आर.के. तिवारी, प्रधान आरक्षक, जिला पुलिस बल दुर्ग, उत्तम कुमार सोनी, प्रधान आरक्षक, जिला पुलिस बल दुर्ग, पंकज चौबे, प्रधान आरक्षक, जिला पुलिस बल दुर्ग, झग्गर सिंह टंडन, सहायक उप निरीक्षक, जिला पुलिस बल दुर्ग, अर्जुन लाल पटेल, उप निरीक्षक, जिला पुलिस बल दुर्ग, रमेन्द्र कुमार, उप निरीक्षक, जिला पुलिस बल दुर्ग, संतोष वानखेड़े, आरक्षक, जिला पुलिस बल दुर्ग, तोरण सांडिल्य, आरक्षक, जिला पुलिस बल दुर्ग, ओमप्रकाश देशमुख, आरक्षक, जिला पुलिस बल दुर्ग, शकील खान, आरक्षक, जिला पुलिस बल दुर्ग, शशिकांत यादव, आरक्षक, जिला पुलिस बल दुर्ग, विकास सिंह, आरक्षक, जिला पुलिस बल दुर्ग, प्रिंस तिवारी, आरक्षक, जिला पुलिस बल दुर्ग, कौशल साहू, आरक्षक, जिला पुलिस बल दुर्ग, सत्येन्द्र मढ़रिया, आरक्षक, जिला पुलिस बल दुर्ग, श्रीमती धर्मिन साहू, आंगनबाड़ी कार्यकर्ता, आंगनबाडी केन्द्र बोरिगारका 1, श्रीमती कमलेश्वरी गजपाल, आंगनबाड़ी कार्यकर्ता, आंगनबाडी केन्द्र बोरिगारका 2, श्रीमती उत्तरा पाटिल, आंगनबाड़ी कार्यकर्ता, आंगनबाडी केन्द्र मोतिमपुर 02, श्रीमती शिवकुवंर यादव, आंगनबाड़ी सहायिका, आंगनबाड़ी केन्द्र सिपकोन्हा 03, श्री अशोक पारकर, पंचायत सचिव, जनपद पंचायत धमधा, श्रीमती भूपेश्वरी राय सरपंच, ग्राम पंचायत दारगांव का नाम शामिल है।
खाना खजाना / शौर्यपथ /आपको अगर अनोखी रेसिपीज बनाने का शौक है, तो आप मैक्रोनी कप रेसिपी ट्राई कर सकते हैं।
सामग्री :
नमकीन बिस्कुट- 20
चीज- 1/2 कप
दूध- 3 चम्मच
बटर- 3 चम्मच
मैक्रोनी- 8 चम्मच
तेल- 2 चम्मच
बारीक कटी प्याज, शिमला मिर्च और पत्ता गोभी- 5 चम्मच
नमक- स्वादानुसार
टोमैटो सॉस- 2 चम्मच
विधि :
मैक्रोनी को उबाल लें। पैन में तेल गर्म करें और उसमें प्याज और सभी सब्जियों को पांच मिनट तक पकाएं। नमक डालें। दो मिनट और पकाएं। उबली हुई मैक्रोनी डालें, सॉस डालें। अच्छी तरह से मिलाएं और गैस ऑफ कर दें। अब कप बनाने के लिए एक पॉलिथिन में बिस्कुट डालें और बेलन की मदद से बिस्कुट का बारीक पाउडर बना लें। ओवन को 350 डिग्री फॉरेनहाइट पर पहले से गर्म कर लें। एक बाउल में बिस्कुट का यह पाउडर डालें। बाउल में आधा कप चीज और दूध डालें। दूध धीरे-धीरे डालें। बिस्कुट को गूंद लें। मफिन पैन पर बटर लगाएं। थोड़ा-सा मिश्रण मफिन कप में डालें और उसे अच्छी तरह से फैलाकर छोटे से कप का आकार दें। चार मफिन कप ऐसे ही बनाएं और उसे 350 डिग्री फॉरेनहाइट पर तीन से चार मिनट तक बेक करें। किनारे से जब उसका रंग सुनहरा हो जाए तो फोर्क की मदद से मफिन कप को हल्का-सा ढीला कर दें, पर उसे बाहर न निकालें। अब तैयार मैक्रोनी को कप में डालें। ऊपर से कद्दूकस किया चीज डालें। मैक्रोनी कप को वापस ओवन में डालें और चीज के पिघलने तक बेक करें। दो-तीन मिनट के बाद मैक्रोनी कप को चम्मच की मदद से मफिन कप से बाहर निकाल लें। गर्मागर्म सर्व करें।
शौर्यपथ / ऋषि-मुनियों और अवतारों की भूमि 'भारतÓ एक रहस्यमय देश है। भारत में ऐसे कई स्थान हैं जिनका आज भी रहस्य बरकरार है। इन अनसुलझे रहस्यों को सुलझाने का क्या कोई प्रयास कर रहा है? वैसे तो भारत में हजारों अनसुलझे रहस्य हैं लेकिन यहां प्रस्तुत हैं प्रमुख 10 अनसुलझे रहस्य।
1. रहस्यों से भरे मंदिर : श्रीपद्मनाभम मंदिर, वृंदावन निधिवन का रंगमहल, कन्याकुमारी मंदिर, करनी माता का मंदिर, शनि शिंगणापुर, सोमनाथ मंदिर, कामाख्या मंदिर, महाकाल मंदिर, काल भैरव उज्जैन मंदिर, अजंता-एलोरा के मंदिर, खजुराहो का मंदिर, ज्वालादेवी का मंदिर, लेपाक्षी का मंदिर और जगन्नाथ का मंदिर। ऐसे सैंकड़ों मंदिर है जो किसी न किसी रहस्य के कारण आज भी उनका रहस्य अनसुलझा है।
2. समुद्र के नीचे द्वारिका : गुजरात के तट पर भगवान श्रीकृष्ण की बसाई हुई नगरी यानी द्वारिका। इस जगह का धार्मिक महत्व तो है ही, रहस्य भी कम नहीं है। कहा जाता है कि कृष्ण की मृत्यु के साथ उनकी बसाई हुई यह नगरी समुद्र में डूब गई। आज भी यहां उस नगरी के अवशेष मौजूद हैं। यह रहस्य अभी भी बरकरार है कि यह नगरी किसी तरह नष्ट हो गई थी और यह कितने हजार वर्ष प्राचीन है।
3. कैलाश पर्वत और मानसरोवर : यह दुनिया का सबसे रहस्यमयी और विचित्र स्थान है। इसे अप्राकृतिक शक्तियों का केंद्र माना जाता है। वैज्ञानिकों के अनुसार यह धरती का केंद्र है। यह एक ऐसा भी केंद्र है जिसे एक्सिस मुंडी कहा जाता है। एक्सिस मुंडी अर्थात दुनिया की नाभि या आकाशीय ध्रुव और भौगोलिक ध्रुव का केंद्र। यह आकाश और पृथ्वी के बीच संबंध का एक बिंदु है, जहां दसों दिशाएं मिल जाती हैं। इस स्थान से जुड़े अनगिनत रहस्य हैं।
4. सोन के भंडार : श्रीपद्मनाभम मंदिर के अलावा कहते हैं कि बिहार के राजगीर में छुपा है मौर्य शासक बिम्बिसार का अमूल्य स्वर्ण भंडार। बिहार का एक छोटा-सा शहर राजगीर, जो कि नालंदा जिले में स्?थित है, कई मायनों में महत्वपूर्ण माना जाता है। यह शहर प्राचीन समय में मगध की राजधानी था। इसी राजगीर में है सोन भंडार गुफा। इस गुफा के बारे में कहा जाता है कि इसमें बेशकीमती खजाना छुपा है जिसे कि आज तक कोई नहीं खोज पाया है। यह खजाना मौर्य शासक बिम्बिसार का बताया जाता है, हालांकि कुछ लोग इसे पूर्व मगध सम्राट जरासंध का भी बताते हैं।
5. अलेया भूत लाइट : पश्चिम बंगाल के दलदली इलाकों में कई बार रहस्यमयी रोशनी देखे जाने की जानकारी मिली थी। स्थानीय लोगों के मुताबिक, यह उन मछुआरों की आत्माएं हैं, जो मछली पकड़ते वक्त किसी वजह से मर गए थे। लोग इन्हें भूतों की रोशनी भी कहते हैं। ऐसा भी कहा जाता है कि जिन मछुआरों को यह रोशनी दिखती है, वे या तो रास्ता भटक जाते हैं या ज्यादा दिन जिंदा नहीं रह पाते। इन दलदली क्षेत्रों से कई मछुआरों की लाशें भी मिली हैं, लेकिन स्थानीय प्रशासन यह मानने को तैयार नहीं कि यह भूतों के चलते ऐसा हुआ। हालांकि अभी तक इस रहस्य से भरी गुत्थी सुलझ नहीं पाई है। वैज्ञानिकों को अंदेशा है कि दलदली क्षेत्रों में अक्सर मीथेन गैस बनती है और वे किसी तत्व के संपर्क में आने से रोशनी पैदा करती है।
6. रूपकुंड झील : मानसरोवर के अलावा भारत में ऐसी कई झीलें या ताल हैं जो कि बहुत ही रहस्यमयी है जैसे महाराष्ट्र में बुलढाना जिले में स्थित लोणार की झील। इसी तरह रूपकुंड झील या नदी हिमालय पर्वतों में स्थित है। इस तट पर मानव कंकाल पाए गए हैं। पिछले कई वर्षों से भारतीय और यूरोपीय वैज्ञानिकों के विभिन्न समूहों ने इस रहस्य को सुलझाने के कई प्रयास किए, पर वे नाकाम रहे। भारत के उत्तरी क्षेत्र में खुदाई के समय नेशनल जिओग्राफिक (भारतीय प्रभाग) को 22 फुट का विशाल नरकंकाल मिला है। उत्तर के रेगिस्तानी इलाके में एम्प्टी क्षेत्र के नाम से जाना जाने वाला यह क्षेत्र सेना के नियंत्रण में है। यह वही इलाका है, जहां से कभी प्राचीनकाल में सरस्वती नदी बहती थी। माना जा रहा है कि इस तरह के विशालकाय मानव 5 लाख वर्ष पूर्व से 1 करोड़ 20 लाख वर्ष पूर्व के बीच में धरती पर रहा करते थे जिनका वजन लगभग 550 किलो हुआ करता था।
7. जतिंगा गांव : असम में स्थित यह गांव पक्षी आत्महत्या की घटनाओं के लिए सुर्खियों में बना हुआ है। कहा जाता है कि पक्षी यहां आकर आत्महत्या करते हैं। जापान के माउंट फूजी तलहटी में आवकिगोहारा के घने जंगल में जिस तरह से लोग आत्महत्या करने आते हैं, ठीक उसी तरह से मानसून की बोझिल रात में जतिंगा के आसमान पर मंडराने लगता है मौत का काला साया। रोशनी की ओर झुंड के झुंड पखेरू आते हैं और काल के गाल में समा जाते हैं। चिडिय़ों के इस प्रकार सामूहिक आत्महत्या के पीछे क्या कारण है इस बात का पता आज तक नहीं लगाया जा सका। इस बात का पता लगाने के लिए कई शोध हो चुके हैं, परंतु प्रकृति के इस गूढ़ रहस्य के बारे में अभी भी ठोस रूप से कुछ नहीं कहा जा सकता। असम के कछार स्थित इस घाटी के रहस्यों को जानना जरूरी है।
8. भारत की गुफाएं : भारत में बहुत सारी प्राचीन गुफाएं हैं, जैसे बाघ की गुफाएं, अजंता- एलोरा की गुफाएं, एलीफेंटा की गुफाएं और भीम बेटका की गुफाएं। ये सभी गुफाएं किसने और कब बनाईं? इसका रहस्य अभी सुलझा नहीं है। अखंड भारत की बात करें तो अफगानिस्तान के बामियान की गुफाओं को भी इसमें शामिल किया जा सकता है। भीमबेटका में 750 गुफाएं हैं जिनमें 500 गुफाओं में शैलचित्र बने हैं। यहां की सबसे प्राचीन चित्रकारी को कुछ इतिहासकार 35 हजार वर्ष पुराना मानते हैं, तो कुछ 12,000 साल पुरानी। मध्यप्रदेश के रायसेन जिले में स्थित पुरापाषाणिक भीमबेटका की गुफाएं भोपाल से 46 किलोमीटर की दूरी पर स्थित हैं। ये विंध्य पर्वतमालाओं से घिरी हुई हैं। भीमबेटका मध्यभारत के पठार के दक्षिणी किनारे पर स्थित विंध्याचल की पहाडिय़ों के निचले हिस्से पर स्थित है। पूर्व पाषाणकाल से मध्य पाषाणकाल तक यह स्थान मानव गतिविधियों का केंद्र रहा।
9. तिब्बत का यमद्वार : प्राचीन काल में तिब्बत को त्रिविष्टप कहते थे। यह अखंड भारत का ही हिस्सा हुआ करता था। तिब्बत को चीन ने अपने कब्जे में ले रखा है। तिब्बत में दारचेन से 30 मिनट की दूरी पर है यह यम का द्वार। यम का द्वार पवित्र कैलाश पर्वत के रास्ते में पड़ता है। हिंदू मान्यता अनुसार, इसे मृत्यु के देवता यमराज के घर का प्रवेश द्वार माना जाता है। यह कैलाश पर्वत की परिक्रमा यात्रा के शुरुआती प्वाइंट पर है। तिब्बती लोग इसे चोरटेन कांग नग्यी के नाम से जानते हैं, जिसका मतलब होता है दो पैर वाले स्तूप। ऐसा कहा जाता है कि यहां रात में रुकने वाला जीवित नहीं रह पाता। ऐसी कई घटनाएं हो भी चुकी हैं, लेकिन इसके पीछे के कारणों का खुलासा आज तक नहीं हो पाया है। साथ ही यह मंदिरनुमा द्वार किसने और कब बनाया, इसका कोई प्रमाण नहीं है। ढेरों शोध हुए, लेकिन कोई नतीजा नहीं निकल सका।
10. भारत के विचित्र मानव : ऐसे कई लोग हैं जिनके बारे में दावा किया जाता है कि वे हजारों वर्षों से जीवित हैं। अश्वत्थामा, हनुमानजी, जामवंत, विभीषण, पराशुराम, महर्षि व्यास, कृपाचार्य, राजा बली आदि।
भारत में देवहरा बाबा के बारे में दावा किया जाता है कि वे 750 वर्ष तक जिंदा रहे। उनकी मौत 1990 में हो गई थी। त्रैलंग स्वामी जिन्हें 'गणपति सरस्वतीÓ भी कहते हैं, उनकी उम्र 286 वर्ष की थी। त्रैलंग स्वामी का जन्म नृसिंह राव और विद्यावती के घर 1601 को हुआ था। वे वाराणसी में 1737-1887 तक रहे। इसी तरह शिवपुरी बाबा थे, जो 27 सितंबर 1826 में जन्मे और जनवरी 1963 में उन्होंने देह त्याग दी। बंगाल के संत लोकनाथजी का जन्म 31 अगस्त 1730 को हुआ और 3 जून 1890 को उन्होंने देह छोड़ दी।...इसी तरह महावतार बाबा के बारे में कहा जाता है कि वे पिछले 5000 वर्षों से जीवित हैं। सवाल लंबे काल तक जिंदा रहने का नहीं कई चमत्कारिक, सिद्ध, जादूगर और अजीब ही तरह के करतब बताने वाले लोग भी रहे हैं।
धर्म संसार / शौर्यपथ / इसके बाद नारदजी शिशुपाल को उसके तीन जन्मों के बारे में बताते हैं। नारदजी बताते हैं कि सनक और सनंदन के श्राप के चलते जय और विजय आकाश से धरती की ओर गिरने लगे और फिर वे ऋषि कश्यप की पत्नी दिति के गर्भ से जुड़वा भाइयों के रूप में हिरण्याक्ष और हिरण्यकश्यप के रूप में जन्में। दोनों ही महाशक्तिशाली दैत्य थे और उनके कारण धरती पर अत्याचार और अन्याय का शासन स्थापित हो चला था। हिरण्याक्ष का वध श्रीहरि ने वराह रूप धारण करके किया तो हिरण्यकश्यप का वध नृसिंह अवतार धारण करके किया।
इसके बाद नारदजी बताते हैं कि पुन: तुम दोनों का जन्म दूसरे जन्म में रावण और कुंभकर्ण के रूप में हुआ। तब श्रीहरि विष्णु ने राम बनकर पहले कुंभकर्ण और बाद में रावण का वध किया। रावण के रूप में तुम थे तो विजय कुंभकर्ण था। फिर नारदजी कहते हैं- अब यह तुम्हारा अंतिम जन्म था जिसमें तुम श्रीकृष्ण की बुआ के पुत्र शिशुपाल के रूप में जन्में और प्रभु ने अपने हाथों तुम्हें मानव शरीर से मुक्त करके तुम्हारा उद्धार किया। यह सुनकर जय अर्थात शिशुपाल पूछता है कि मुनिराज कृपया ये तो बताइये की इस जन्म में मेरा साथी विजय कहां है? इस पर नारदजी कहते हैं कि वह श्रीकृष्ण की बड़ी बुआ के पुत्र के रूप में दंतवक्र के रूप में तुम्हारे साथ ही इस धरती पर जन्मा था। शीघ्र ही वह भी भगवान श्रीकृष्ण के हाथों मुक्ति पाएगा। यह सुनकर जय पूछता है- परंतु कब तक? तब नारदजी कहते हैं- जब पांडवों का राजसूय यज्ञ होने के पश्चात भगवान द्वारिका लौटेंगे जब वह द्वारिका पर आक्रमण करेगा तब परंतु अभी तो इंद्रप्रस्थ में ही भगवान उत्सव का आनंद ले रहे हैं। उनके साथ इंद्रप्रस्थ में पधारे हुए सभी अतिथिगण भी पांडवों का वैभव देखकर चकित हो रहे हैं।
फिर उधर बलराम, दुर्योधन, द्रुपद आदि सहित सभी लोग इंद्रप्रस्थ के वैभव का अवलोकन करते हैं। उनके चमत्कारिक और जगमगाते महल को देखकर सभी अचंभित हो रहे होते हैं। शकुनि और दुर्योधन को समझ में नहीं आता है कि ये कैसा मायाजाल है। दुर्योधन संकेतों से शकुनि को आगे बढ़ने का कहता है।
शकुनि एक महल के अंदर के एक कक्ष के द्वार
पर खड़ा होकर कहता है- आओ चलो, चलो अंदर। तब जैसी ही दुर्योधन द्वार के अंदर जाने लगता है तो उससे टकरा जाता है। उसकी नाक पर लग जाती है। शकुनि भी कहता है- अरे भांजे। तब दुर्योधन हाथ लगाकर देखता है तो पता चलता है कि द्वार की जगह तो दीवार है जो द्वार जैसी दिखाई दे रही है। शकुनि भी भीतर जाने का प्रयास करता है तो टकरा जाता है। दोनों अचरज में पड़ जाते हैं तब शकुनि कहता है- चलो भांजे चलो, ये कैसी माया है।
फिर वह दूसरे खुले दरवाजे के पास जाते हैं तो उन्हें लगता है कि यह भी भ्रम होगा जब वह उसमें जाने का प्रयास करते हैं तो गिरते गिरते बचते हैं क्योंकि असल में वह दरवाजा ही होता है दीवार नहीं। शकुनि कहता है- भांजे चलो। दोनों उसमें प्रवेश कर जाते हैं। वहां अदंर उन्हें भव्य महल नजर आता है जिसके ऊपर चारों ओर बालकनी रहती है और ऊपर जाने के लिए सीढ़ियां भी होती है। उन्हें महल के बीचोबीच विशालकाय चमचमाता कालीन बिछा हुआ नजर आता है।
वह कालीन के पास जाते हैं तो शकुनि कहता है इतना सोना। फिर आगे बढ़ने लगते हैं तो उन्हें अजीबसा नजर आता है। शकुनि कहता है- भांजे ये क्या अचंभा है ये पानी कहां से आ गया? उस जगह को तरणताल समझकर तब दोनों अपने वस्त्र ऊपर करके आगे बढ़ते हैं लेकिन जैसे ही पैर रखते हैं तो उन्हें महसूस होता है कि पानी जैसा दिखाई दे रहा हैं किंतु पानी नहीं है। इस पर शकुनि कहता है भांजे ये पानी है या पानी नहीं है? फिर वो दोनों पैरों से भूमि को ठोककर देखते हैं तो पानी महसूस नहीं होता है। तभी उन्हें बालकनी से महिलाओं के हंसी-ठिठोली की आवाज सुनाई देती है। फिर वे दोनों अपने वस्त्र (धौती) को नीचे करके निश्चिंत होकर चलने लगते हैं तभी आगे थोड़ी दूर चलकर वे एक पट्टेदार जगह पर खड़े होकर पीछे देखते हैं तो पानी गायब हो जाता है और उन्हें भूमि ही नजर आती है लेकिन ज्योंहि वह आगे देखते हैं तो उन्हें पुन: पानी नजर आता है।
तब दुर्योधन असमंजस में पड़कर सकुचाकर कहता है- चुपचाप आगे चलिये मामाश्री। शकुनि कहता है- हां चलो भांजे चलो। दोनों आगे चलकर पुन: दूसरी पट्टेदार भूमि पर खड़े होकर पीछे देखते हैं तो उन्हें पानी नजर नहीं आता है और आगे देखते हैं तो पुन: तरणताल जैसा नजर आता है। फिर वह दोनों एक दूसरे की ओर देखकर हंसने लगते हैं और शकुनि कहता है- चलो भांजे चलो। तब जैसे ही दुर्योधन आगे कदम बढ़ाता है वैसे ही वह तरणताल में गिर जाता है और गिला हो जाता है। यह देखकर बालकनी में स्थित द्रौपदी अपनी सखियों के साथ यह दृश्य देखकर हंसने लगती है। शकुनि उसे हाथ पकड़कर बाहर निकालता है।
बाहर निकलकर वह ऊपर देखता है कि द्रौपदी जोर-जोर से हंस रही है। भिगा हुआ खड़ा दुर्योधन कहता है- मामाश्री चलो यहां से। तभी द्रौपदी कहती है- देवरजी! ओ देवरजी ये हस्तिनापुर नहीं है जहां देखे बिना भी चल सकते हैं। ये तो इंद्रप्रस्थ के महल है जहां आंखें खोल कर चलना पड़ता है। ऐसा कहकर वह व्यंगात्मक हंसी हंसने लगती है। यह सुनकर दुर्योधन क्रोधित होकर कहता है- आज की हंसी तुझे महंगी पड़ेगी रानी, बहुत महंगी पड़ेगी। चलो मामाश्री। ऐसा कहकर दुर्योधन वहां से चला जाता है।
उधर, श्रीकृष्ण और बलराम के साथ पांचों पांडवों को हंसते हुए बताया जाता है। तब श्रीकृष्ण कहते हैं- अच्छा तो महाराज आज्ञा दें। मराजा युधिष्ठिर कहते हैं- अरे इतनी शीघ्रता भी क्या है? हम आपको अभी जाने नहीं देंगे कन्हैया। यह सुनकर श्रीकृष्ण कहते हैं- महाराज जाना तो होगा ही। कितने दिन हो गए हम दोनों द्वारिका से बाहर हैं, वहां की व्यवस्था भी तो संभालनी पड़ेगी। इस पर युधिष्ठिर कहते हैं कि परंतु मुझे आप दोनों को छोड़ने का जी नहीं करता। यह सुनकर श्रीकृष्ण कहते हैं कि इसीलिए तो मैं दाऊ भैया को यहीं छोड़े जा रहा हूं और उनका भी मन है कि वे कुछ दिन यहीं ठहरें और उनके बदले में मैं अपने प्रिय सखा अर्जुन को ले जा रहा हूं।
इस पर बलरामजी कहते हैं जाने दीजिये महाराज युधिष्ठिर कन्हैया को। वहां रुक्मिणी भी तो अधीर हो रही होगी। यह सुनकर सभी हंसने लगते हैं। फिर अर्जुन और श्रीकृष्ण को वहां से द्वारिका के लिए विदा किया जाता है।
इधर, शकुनि कहता है दुर्योधन से कि लो भांजे तुम्हारा काम तो बन गया। कृष्ण और अर्जुन दोनों द्वारिका चले गए हैं। अब तुम्हें बलराम मिल गए हैं और वह भी अकेले। वो यहीं पर रुके हुए हैं। तो बस अब पूरी तरह से बलराम की सेवा करो और उनकी खूब चापलूसी करो हां। चाहे जैसे भी हो तुम्हें उन्हें अपना गुरु बनाना ही होगा। भांजे यदि तुमने ऐसा कर लिया तो विजयश्री तुम्हारे भी भाल पर होगी हां। यह सुनकर दुर्योधन कहता है- ठीक है मामाश्री ठीक है।
फिर जब बलरामजी यमुना किनारे ध्यान और संध्यावंदन कर रहे होते हैं तब शकुनि और दुर्योधन वहां पहुंच जाते हैं। ध्यान करने के बाद वे सूर्य को अर्ध्य देते हैं और फिर जब वे पलटकर पुन: लौटने लगते हैं तो देखते हैं कि उनके मार्ग में फूल बिछे हुए हैं। वो ये देखकर आश्चर्य से प्रसन्न हो जाते हैं। फिर वह फूलों पर कुछ दूर चलने के बाद कहते हैं- कोई है, कोई है? मेरी राहों में फूल बिछाकर मेरा सम्मान किया है, उस पर मैं प्रसन्न हूं। जिस व्यक्ति ने मेरा स्वागत किया है उसे मैं देखना चाहता हूं।
कुछ देर बार दुर्योधन हाथ जोड़े उनके समक्ष उपस्थित होता है। यह देखकर बलरामजी कहते हैं- दुर्योधन तुम? तब दुर्योधन कहता है- हां बलराम भैया। तभी शकुनि भी पीछे से आकर कहता है- प्रणाम द्वारिकाधीश। स्वागत है आपका द्वारिकाधीश। तब बलराम कहते हैं कि परंतु ऐसा स्वागत करने की क्या जरूरत थी? तब शकुनि कहता है कि ऐसा स्वागत कुछ महान हस्तियों का ही किया जाता है द्वारिकाधीश। आप शायद जानते नहीं कि हस्तिनापुर का युवराज दुर्योधन आप ही की पूजा करता है। यह सुनकर दुर्योधन उनके चरणों में फूल अर्पित करके घुटने के बल बैठ जाता है। तब बलराम कहते हैं- अरे ये क्या कर रहे हो दुर्योधन? इस पर शकुनि कहता है ये तो अपने देवता की पूजा कर रहा है पूजा द्वारिकाधीश।
फिर शकुनि भीम और श्रीकृष्ण के संबंध में बलरामजी से उल्टी-सीधी बातें करके उनके मन में शंका उत्पन्न करता है। वह कहता है कि भीम कह रहा था कि गदा युद्ध में मैं बलराम भैया से भी ज्यादा निपुण हो गया हूं और श्रीकृष्ण कह रहे थे कि बलराम भैया तो मुझे नाहक ही हर बात पर डांटते रहते हैं। फिर शकुनि कहता है कि सच तो ये है बलराम भैया द्वारिका की रक्षा तो आपन ही करते हैं आप ही द्वारिकाधीश है।...इस तरह शकुनि श्रीकृष्ण और बलरामजी के बीच दरार पैदा करने का प्रयास करता है।
इस तरह दुर्योधन और शकुनि चापलूसी करके बलराम को गद्गद कर देते हैं और बलरामजी के मन में भीम के प्रति शंका भर देते हैं। तब अंत में बलरामजी दुर्योधन को गदा चलाना सिखाने के लिए तैयार हो जाते हैं। फिर दुर्योधन विधिवत रूप से बलरामजी को अपना गुरु बनाता है और फिर बलरामजी उसे गदा देकर कहते हैं कि तुम्हारा अध्ययन शीघ्र ही शुरु हो जाएगा शिष्य दुर्योधन।...जय श्रीकृष्णा।
नजरिया / शौर्यपथ /नब्बे वर्षों के लंबे संघर्ष के बाद 15 अगस्त, 1947 को हमारे देश को आजादी मिली थी। अंगे्रजों की गुलामी से मुक्ति दिलाने के लिए जो कीमत और कुर्बानी हमारे पुरखों ने चुकाई है, वह हमारे लिए पे्ररणा का स्रोत है। लेकिन इस मौके पर यह जानना भी जरूरी है कि जो देश धर्म, दर्शन, कला और विज्ञान के क्षेत्र में शताब्दियों तक विश्व के मानचित्र पर चमकता रहा, वह गुलाम कैसे हो गया? आपसी फूट, विशेषकर यहां के शासकों तथा राजवंशों में पारस्परिक ईष्र्या, ऊंच-नीच के भेद, जनसमूह में राजनीतिक ज्ञान के अभाव, अर्थ-संचय, वैज्ञानिक उन्नति के प्रति उदासीनता, और इन सबसे बढ़कर हर स्थिति में चुपचाप बैठे रहने की प्रवृत्ति ने हमें पहले मुगलों और फिर अंग्रेजों का गुलाम बना दिया। इसलिए गुलामी के इन कारणों को समझना जरूरी है, ताकि भविष्य में कभी देश गुलाम न हो।
स्वाधीनता कभी-कभी भौतिक दुर्बलता के कारण हाथ से निकल जाती है, परंतु पराधीनता राष्ट्रीय चरित्र की दुर्बलता से उत्पन्न होती है। और जब पराधीन राष्ट्र में ठोकर खाते-खाते सोई हुई ऊंची भावनाएं जागती हैं, तब वह स्वतंत्रता का अधिकारी बनता है और उसकी प्राप्ति के मार्ग पर अग्रसर होता है। उसकी ऊंची भावनाएं त्याग और तपस्या के रूप में व्यक्त होती हैं। हमारा स्वाधीनता दिवस उन्हीं उदात्त भावनाओं, देशभक्तों के त्याग, तपस्या और बलिदान की वृत्ति का प्रतीक है। पर हमें नहीं भूलना चाहिए कि स्वाधीनता को प्राप्त करना कठिन होता है, उसको खो देना नहीं। इसलिए निरंतर सतर्कता स्वाधीनता का मूल्य है। अपनी स्वतंत्रता कायम रखने के लिए निरंतर सतर्क रहने की आवश्यकता है और स्वाधीनता का भार हरेक नागरिक पर है। चरित्र में कहीं भी दुर्बलता आना ‘स्वार्थ बुद्धि का बलवती होना, सत्य से डिग जाना’ यह सब व्यक्ति व राष्ट्र, दोनों के लिए घातक है।
यह सच है कि स्वतंत्रता मिलने पर अपनी कमियों का पता चलता है। आज हमारा देश इस बात का अनुभव कर रहा है। प्राय: उन सभी चीजों की कमी है, जिनके सहारे कोई देश सम्मान पाता है। चीजों को खरीदने और बनाने के लिए संसाधन नहीं, विशेषज्ञ नहीं। आज जो राष्ट्र संपन्न हैं, वे और उन्नत होते जाएंगे और यदि हम शीघ्र उनके बराबर नहीं आ जाते, तो फिर हमारी स्वंतत्रता दबाव में रहेगी। दूसरी ओर, अंतरराष्ट्रीय परिस्थिति ऐसी है कि नहीं कहा जा सकता कि शांति कब तक बनी रहेगी। राष्ट्रों में लोभ और भय के कारण इतनी तनातनी है कि किसी भी दिन, किसी भी कोने में लड़ाई छिड़ सकती है और जिस प्रकार, 1914 में सर्बिया की एक घटना ने महायुद्ध शुरू करा दिया था, उसी प्रकार एक चिनगारी आज महायुद्ध को जन्म दे सकती है, और अब जो महायुद्ध होगा, वह पहले से कहीं भीषण होगा। तात्पर्य यह कि हमें थोडे़ समय में अपने घर को संभालना है। यह काम असाधारण धैर्य, साहस और त्याग बुद्धि से ही हो सकता है। यदि भविष्य में राष्ट्र को कष्ट से मुक्त रखना है, तो आज प्रत्येक भारतीय को कष्ट सहने के लिए तैयार रहना होगा।
हमारे यहां कई तरह की विचारधाराएं हैं, कई राजनीतिक दल हैं। लोगों को अपने विचारों के अनुसार समुदाय बनाने का पूरा अधिकार है। विचारों के विनिमय से सत्य का परिचय होता है। अपने विचारों से राष्ट्रीय जीवन को प्रभावित करने का अधिकार भी सबको है। बिना ऐसी स्वतंत्रता के लोकतांत्रिक व्यवस्था नहीं चल सकती। परंतु हमें दो बातों का हमेशा ध्यान रखना चाहिए। एक, हममें सहिष्णुता होनी चाहिए। हमें यह मानना चाहिए कि जितना विचार स्वातंत्र्य हमको है, उतना ही दूसरों को है। दूसरी, विचार-विनिमय में विरोधी के व्यक्तित्व पर आक्षेप करना ऐसी कटुता उत्पन्न कर देता है, जो राष्ट्रीय जीवन को विषाक्त कर देता है।
हमारी निजी स्वतंत्रता वहीं तक है, जहां तक वह राष्ट्र की स्वतंत्रता को बाधा नहीं पहुंचाती। हमारे आपसी मतभेदों से राष्ट्र की उन्नति में किसी प्रकार की बाधा नहीं पड़नी चाहिए। चाहे जो भी दल शासनारूढ़ हो, उसको अपने सिद्धांतों के अनुसार काम के संचालन में तभी सुविधा होगी, जब देश संपन्न और बलवान होगा। प्रत्येक नागरिक और दल को इस संक्रमण काल में संकीर्ण घेरों से ऊपर उठना होगा। इस स्वतंत्रता दिवस के दिन हम यह संकल्प करें कि अपने राष्ट्र को सुखी, संपन्न और शक्तिशाली बनाने में हम अपनी ओर से हर प्रयास करेंगे।
(ये लेखक के अपने विचार हैं) निरंकार सिंह, पूर्व सहायक संपादक, हिंदी विश्वकोश
सम्पादकीयलेख / शौर्यपथ / कर सुधार की ओर भारत ने जो कदम उठाए हैं, वे जरूरी व स्वागतयोग्य हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत में कराधान व्यवस्था को सुधारने के इरादे से जो घोषणाएं की हैं, उनसे टैक्स चुकाने वालों को निश्चित ही खुशी हो रही होगी। इन सुधारों का मुख्य लक्ष्य यदि ईमानदार करदाताओं को बढ़ावा देना है, तो इसकी जरूरत दशकों से महसूस की जा रही थी। अव्वल तो स्वयं प्रधानमंत्री ने बता दिया है कि 130 करोड़ लोगों के देश में केवल डेढ़ करोड़ कर चुकाते हैं। कर चुकाने की क्षमता इससे कहीं ज्यादा लोगों में होगी, लेकिन ज्यादातर लोग कमाई छिपाकर टैक्स चुकाने से बचते रहे हैं। कर वसूली की जो पुरानी या लगभग सामंती व्यवस्था रही है, उसमें कई बार कर चुकाने वाला भी कठघरे में खड़ा कर दिया जाता है। शहर या इलाके के आयकर अधिकारियों में बहुत ताकत होती है और वे अपना ‘टारगेट’ चुनने के लिए लगभग स्वतंत्र होते हैं। आयकर अधिकारियों की मनमानी और कई बार सरकारों की स्थानीय राजनीति के तहत भी आयकर चुकाने वाले नागरिक निशाने पर आ जाते हैं। अब नए दौर के हिसाब से हो रहे सुधारों से हम बदलाव की उम्मीद कर सकते हैं।
सरकार करों के फेसलेस मूल्यांकन अर्थात सीधे संपर्क के बिना ही कर निर्धारण की ओर जो कदम उठा रही है, उसमें व्यावहारिक पहलुओं पर विशेष ध्यान देना होगा। ठीक इसी तरह से कर चुकाने में कोई शिकायत होने पर फेसलेस अपील की सुविधा दी जा रही है, तो जाहिर है, ऑनलाइन सिस्टम को बहुत आसान रखना होगा। इसके साथ ही टैक्स चार्टर का जमीनी लाभ दिखना जरूरी है, ताकि बाकी लोग भी कर देने के लिए प्रेरित हों। प्रधानमंत्री ने देश के लोगों से आगे बढ़कर ईमानदारी के साथ कर देने का आह्वान किया है, तो इस जरूरत को भी समझा जा सकता है। कोरोना और आर्थिक सुस्ती की वजह से सरकार के राजस्व पर असर पड़ा है। सरकार को यह भी लग रहा है कि बुरे दौर में कर वसूली पिछले वर्षों के मुकाबले घटेगी, यह स्वाभाविक भी है, इसलिए सरकार यह सुधार लेकर आई है। राजस्व बढ़ाने का एक उपाय कर दायरा बढ़ाना होता है, पर आज देश जिस दौर में है, लोगों पर नए टैक्स नहीं लादे जा सकते। अत: वर्तमान करदाताओं को ईमानदारी से और पारदर्शी कर भुगतान की सुविधा देकर सरकार ठीक ही कर रही है। प्रधानमंत्री ने यह भी इशारा किया है कि कर सुधार एक सतत प्रक्रिया है, समय-समय पर सुधार होते रहे हैं, इससे संकेत मिलता है कि अभी अन्य कर सुधार भी संभव हैं।
इसमें कोई शक नहीं कि ईमानदार करदाता की राष्ट्र-निर्माण में बड़ी भूमिका होती है। ईमानदार करदाता के जीवन को आसान बनाने के लिए अमेरिका और कुछ अन्य देशों में बेहतर प्रावधान हैं। विकसित अर्थव्यवस्थाओं में कर चुकाने वालों की वक्त आने पर मदद करने की परंपरा है, जिसके तहत कोरोना के समय भी कर चुकाने वालों के लिए विशेष राहत, रियायत के प्रबंध किए गए हैं। भारत में भी ऐसे करदाताओं के बारे में सोचना चाहिए, जो वर्षों से कर चुका रहे थे, लेकिन इस बार रोजगार-धंधे के प्रभावित होने से नहीं चुका पा रहे हैं। करदाताओं को कर चुकाने में सुविधा-सम्मान देने के साथ अन्य प्रकार से भी प्रोत्साहित करने पर विचार करना चाहिए। कर मानव सभ्यता की पुरानी परंपरा है, यह जितनी सहज और शालीन हो, उतना अच्छा है।
Feb 09, 2021 Rate: 4.00
