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धर्म संसार / शौर्यपथ / श्रीकृष्ण और बलराम को गुप्तचर आकर बताता है संभरासुर और उसका पुत्र मयासुर दोनों की सेना द्वारिका पर आक्रमण के लिए निकल चुकी है। यह सुनकर बलराम जी कहते हैं कि उससे पहले में उन दोनों को नष्ट करके हटा दूंगा। यह सुनकर श्रीकृष्ण कहते हैं- नहीं दाऊ भैया, यदि वह युद्ध करना चाहते हैं तो हम अवश्य युद्ध करेंगे परंतु पहला वार हमारा नहीं होगा
दैत्यराज संभरासुर और उसका पुत्र तीनों लोकों पर आधिपत्य की इच्छा से सबसे पहले द्वारिका पर आक्रमण कर देते हैं। दोनों ही मायावी युद्ध में कुशल होते हैं। बलराम और श्रीकृष्ण उन दोनों से भयंकर युद्ध लड़ते हैं। दोनों ही यादव सेना में हड़कंप मचा देते हैं तब श्रीकृष्ण कहते हैं कि इन दोनों से नीति की अपेक्षा नहीं की जा सकती। अनीति से राज्य करना और अनीति से युद्ध करना यही इन मायावी पिता और पुत्र की नीति है।
संभरासुकर कहता है अब मुझे कोई नहीं रोक सकता ग्वाले। फिर मायासुर कहता है- इसलिए हे कृष्ण! तुम हमारी शरण में आ जाओ, हम तुम्हें क्षमा देंगे। बलरामजी मायासुर को कई तरह से मारने का प्रयास करते हैं परंतु वह अपनी माया से सभी को हैरान कर देता है। श्रीकृष्ण संभरासुर से लड़ते हैं तो वह भी अपनी माया के जाल में श्रीकृष्ण को उलझा देता है। तब मायासुर कहता है- कृष्ण अपने दाऊ भैया को समझाओ की असुर सम्राट संभरासुर की शरण में आने मैं ही उसकी भलाई है। यह सुनकर बलरामजी कहते हैं- संभरासुर अपने इस मायावी पुत्र के साथ तुम भी अपनी नगरी लौट जाओ वर्ना तुम भी मेरे क्रोध की आग में जल जाओगे।
फिर चारों में भयंकर मायावी युद्ध होता है कभी श्रीकृष्ण का तो कभी संभरासुर का पलड़ा भारी रहती है। एक समय ऐसा आता है कि संभरासुर के सारे अस्त्र असफल हो जाते हैं तब संभरासुर एक भयंकर अस्त्र का आह्वान करता है। यह देखकर श्रीकृष्ण बलराम की ओर देखने लगते हैं बलराम भी श्रीकृष्ण की ओर देखकर फिर संभरासुर की ओर दोनों देखते हैं। संभरासुर का पुत्र मायासुर यह देखकर प्रसन्न होता है।
फिर वह उस अस्त्र को श्रीकृष्ण की ओर छोड़ देता है। वह अस्त्र सीधा श्रीकृष्ण के हृदय में जाकर लगता है और श्रीकृष्ण दर्द से कराहने लगते हैं। यह देखकर बलरामजी चीखते हैं- कन्हैया। दोनों असुर जोर-जोर से हंसने लगते हैं। श्रीकृष्ण कराहते हुए रथ में गिरकर मर जाते हैं। बलरामजी अपने रथ से उतरकर श्रीकृष्ण के रथ पर जाते हैं और उन्हें जगाने का प्रयास करते हैं। बलराम कहते हैं ये कैसे हुआ कन्हैया? तुम तो संसार में सबसे अधिक शक्तिशाली हो भगवान हो, तुमको कैसे इस मायावी राक्षस के आगे मृत्यु आ गई? अब मैं द्वारिका को क्या मुंह दिखाऊंगा? कैसे उन्हें समझाऊंगा? कन्हैया जिस संसार में तुम नहीं, उस संसार में मेरा मर जाना ही बेहतर है। अब मैं भी एक पल भी जीना नहीं चाहता।
ऐसा कहकर बलरामजी अपनी तलवार निकालकर अपनी गर्दन काटने ही वाले रहते हैं कि तभी श्रीकृष्ण उनका हाथ पकड़कर उन्हें रोककर कहते हैं- दाऊ भैया रुको। यह देखकर बलरामजी आश्चर्य करते हैं कि ये कैसी माया! श्रीकृष्ण तो रथ में पड़े हैं और ये दूसरे श्रीकृष्ण उन्हें रोक रहे हैं। दाऊ भैया कहते हैं- कन्हैया...ऐसा कहकर वो दोनों कृष्ण को देखकर हैरान रह जाते हैं तब वे श्रीकृष्ण को हाथ लगाकर कहते हैं- कन्हैया तुम जीवित हो? यह सुनकर श्रीकृष्ण कहते हैं- हां दाऊ भैया, ऐसे मायावी असुर के हाथ से मरने के लिए हमने इस पृथ्वीलोक पर जनम नहीं लिया है। यह सुनकर बलरामजी अतिप्रसन्न होकर कृष्ण को गले लगा लेते हैं। अरे कन्हैया तुम्हें जीवित देखकर मैं कितना खुश हूं ये तुम नहीं समझ सकते। फिर बलरामजी रथ में मृत पड़े कृष्ण को देखकर कहते हैं- परंतु कन्हैया ये कौन है?
इस पर श्रीकृष्ण कहते हैं- वो! वो मायावी संभरासुर की माया है। अरे, आपको भ्रम में डालने के लिए संभरासुर ने ये माया रचाई थी और आप उसके मायाजाल में फंस गए दाऊ भैया। फिर श्रीकृष्ण कहते हैं- ये देखिये और वह मृत श्रीकृष्ण गायब हो जाते हैं। फिर श्रीकृष्ण कहते हैं- अब आप जान गए संभरासुर की नीति। मृत्युलोक में माता, पिता, भ्राता, पुत्र, कन्या, पौत्र इस तरह के अटूट नाते बन जाते हैं। उसी का लाभ उठाने का प्रयास ये मायावी संभरासुर करता है। अपनी माया से अपने शत्रु को शोकाकुल कर देता है। फिर ऐसे शत्रु पर उसे विजय प्राप्त करने में किसी भी तरह की कठिनाइयों का सामना नहीं करना पड़ता है। दाऊ भैया आप रणभूमि पर हैं। यदि मुझे सचमुच ही मृत्यु आ जाती तो भी आपको शस्त्र नीचे नहीं रखना चाहिए।
फिर बलरामजी कहते हैं- मुझसे भूल हो गई कन्हैया। परंतु अब में इन मायावी पिता और पुत्र को ऐसा दंड दूंगा कि ये द्वारिका की ओर आंख उठाने का साहस भी नहीं करेंगे। ऐसा कहकर बलरामजी अपने रथ पर चले जाते हैं। दोनों असुर जोर-जोर से उनकी हंसी उड़ाते हैं। फिर बलराम क्रोधित होकर अपनी गदा फेंकते हैं जो आसमान में जाकर दो रूप लेकर दोनों असुरों के रथ को तोड़ देती हैं। फिर बलरामजी अपने हल को विशालकाय बनाते हैं और उससे असुरों की सेना का संहार करने लगते हैं। यह देखकर संभरासुर घबरा जाता है और अपने पुत्र से कहता है- मायासुर! बलराम तो साक्षात मृत्यु दाता नजर आने लगा है। अब हमें निकल चलना चाहिए। यह सुनकर मायासुर कहता है- नहीं पिताश्री! मैं तो इस युद्ध में विजय प्राप्त करके ही लौटूंगा। फिर मायासुर शिवजी का आह्वान करता है तब उसके पास एक दिव्य धनुष आ जाता है जिसमें बाण के रूप में त्रिशूल होता है।
बलराम और श्रीकृष्ण यह देखकर अचंभित हो जाते हैं। फिर मायासुर कहता है- पिताश्री ये अस्त्र मुझे महादेव शंकर दे दिया था। ये कभी विफल नहीं होगा। बलराम को इस अस्त्र के कारण निश्चत ही मृत्यु आएगी। यह सुनकर श्रीकृष्ण बलराम की ओर देखने लगते हैं। फिर वे आंखें बंद करके भगवान शिव से कहते हैं- हे जगत के पालनहार कैलाशपति निलकंठ महादेव शंकर कृपाकर आप मुझे दर्शन दीजिये।
फिर भगगवान शंकर कहते हैं- हे वासुदेव आंखें खोलिये। कहिये आप हमसे क्या चाहते हैं? भगवान श्रीकृष्ण आंखें खोलते हैं तो उन्हें शिवजी दिखाई देते हैं तब वे उन्हें प्रणाम करके कहते हैं- हे महादेव! संभरासुर का पुत्र मायासुर आपका दिया हुआ अस्त्र दाऊ भैया पर छोड़ने वाला है जिसे केवल आप ही विफल कर सकते हैं। आप ही दाऊ भैया की रक्षा कर सकते हैं। यह सुनकर भगवान शंकर कहते हैं- नहीं देवकीनंदन! हमारा दिया हुआ अस्त्र कभी विफल नहीं हो सकता। परंतु हमारे अस्त्र के प्रभाव से बलराम को मृत्यु नहीं आएगी। हां, उन्हें मूर्च्छा अवश्य आएगी। यह सुनकर श्रीकृष्ण कहते हैं- हे महादेव आपकी कृपा और आशीर्वाद जिस पर हो उसे मृत्यु कैसे आ सकती है। ऐसा कहकर श्रीकृष्ण उन्हें प्रणाम करते हैं और महादेव अदृश्य हो जाते हैं।
उधर, मयासुर धनुष पर लगे त्रिशूल से कहता है- जाओ और अपना लक्ष्य साधो। वह त्रिशूल धनुष से निकलकर सीधा बलरामजी के हृदय में जाकर लगता है और बलरामजी कन्हैया कहते हुए मूर्च्छित हो जाते हैं। यह देखकर मायासुर चीखकर कहता है- हे ग्वाले ये मेरी माया नहीं है, ये मेरा पराक्रम है। अपने बड़े भाई की मृत्यु से कुछ बोध लो और हमारी शरण में आ जाओ। हम तुम्हें अभय देंगे। नहीं तो तुम भी इसी प्रकार मृत्यु के आधीन हो जाओगे।
यह सुनकर श्रीकृष्ण अपनी अंगुली ऊपर करते हैं तो तुरंत ही उनके हाथ में सुदर्शन चक्र घर्राने लगता है। यह देखकर संभरासुर और मायासुर घबरा जाते हैं। तब श्रीकृष्ण सुदर्शन चक्र को मायासुर की ओर छोड़ देते हैं। तक्षण ही मायासुर की गर्दन से सिर अलग हो जाता है यह देखकर संभरासुर चीखता है- मायासुर। मायासुर धरती पर गिर पड़ता है और सुदर्शन चक्र पुन: लौटकर श्रीकृष्ण की अंगुली पर विराजमान होकर गायब हो जाता है।
उधर, संभरासुर चीखना हुआ अपने पुत्र के पास जाता है तो इधर श्रीकृष्ण बलराम के पास। फिर श्रीकृष्ण अपने दाऊ भैया को मूर्च्छा से जागते हैं। जागकर बलरामजी कहते हैं- कन्हैया क्या मैं मूर्च्छित हो गया था? तब श्रीकृष्ण कहते हैं- हां दाऊ भैया परंतु अब कोई चिंता करने की आवश्यकता नहीं। संभरासुर परास्त हो गया है और मायासुर का मैंने वध कर दिया है। यह सुनकर बलरामजी आश्चर्य करने लगते हैं।
उधर, संभरासुर अपने पुत्र के शव को अपने नगर ले जाता है और वहां मायासुर की माता अपने पुत्र के शव के पास विलाप करती है और अपने पति को कहती है कि धिक्कार है आप पर और आपके बल पर। आपके सामने आपके पुत्र का वध होता है और आप उसकी रक्षा भी नहीं कर सके, कैसे पिता हैं आप? जिस कृष्ण ने मेरे पुत्र का वध किया है आप उसे क्या दंड देंगे? जब आप उसे दंड देंगे तभी मेरा शोकग्रस्त्र मन शांत होगा। यह सुनकर संभरासुर कहता है कि मायावती ये संभरासुर प्रतिज्ञा करता है कि जिस प्रकार कृष्ण ने मेरे पुत्र को मुझसे छीना है उसी प्रकार मैं भी उसके पुत्र को उससे छीन लूंगा। पुत्र के वियोग में जिस तरह मेरी पत्नी शोक मना रही है उसी तरह कृष्ण की पत्नी भी शोकाकुल हो जाएगी। ये मेरी प्रतिज्ञा है।
उधर, नारादमुनि कामदेव से कहते हैं- कामदेव देख लिया ना। आपके जन्म लेने के पूर्व ही आपके शत्रु ने जनम ले लिया है जो अब आपकी मृत्यु की तैयारियां कर रहा हैं। यह सुनकर रति कहती हैं कि मुनिवर कम से कम ऐसी घड़ी पर तो अशुभ बातें न किया करें। लाखों वर्षों से मैं इसी शुभ घड़ी की प्रतीक्षा कर रही थी वो शुभ घड़ी जब प्रद्युम्न का जन्म होगा और मेरे सुहाग को शरीर मिल जाएगा। फिर कामदेवजी कहते हैं कि परंतु प्रद्युम्न के रूप में मेरा जन्म कब और कैसे होगा होगा? तब नारदमुनि कहते हैं कि श्रीकृष्ण की आज्ञा से ही रुक्मिणी के गर्भ से होगा। इसके लिए आपको उनकी आज्ञा लेने के लिए धरती पर जाना होगा।...
फिर कामदेव और रति श्रीकृष्ण के पास जाते हैं और वे देखते हैं कि भगवन तो ध्यानस्थ बैठे हैं और रुक्मिणी माता सो रही है। कामदेव रति से कहते हैं कि तो क्या हुआ मैं उन्हें अभी जगा देता हूं। यह सुनकर रति कहती है- नहीं नहीं, फिर वही भूल करना चाहते हैं क्या, जिस भूल ने आपसे आपका शरीर छीन लिया था। याद रखिये आप यहां अपना शरीर पाने आए हैं खोने नहीं। तब कामदेवजी कहते हैं कि परंतु मेरे पास अब शरीर तो रहा नहीं तो अब मैं क्या खोऊंगा? तब रति कहती हैं कि शरीर न सही पर शरीर की यह निशानी तो है जिसे अब मैं नहीं खोना चाहती।
तभी श्रीकृष्ण की आंखें खुल जाती है। वह उन दोनों को देखकर मुस्कुराते हैं। यह देखकर वे दोनों श्रीकृष्ण को प्रणाम करते हैं। तब श्रीकृष्ण कहते हैं- सुखीभव:। यह सुनकर रति कहती है कि भगवन! आपने हमें सुखी होने का आशीर्वाद दिया है ना। इस पर श्रीकृष्ण कहते हैं- हां देवी मेरा कहा सत्य है। इस पर रति कहती हैं- तो बताइये जब मैं मेरे पतिदेव के दर्शन नहीं कर सकती। उनका मेरा मिलन लाखों वर्षों से अधूरा है। ऐसे में मैं और मेरे पतिदेव कैसे सुखी हो सकते हैं?
तब श्रीकृष्ण कहते हैं कि कामदेव तुम भाग्यवान हो जो तुम्हें देवी रति जैसी पत्नि मिली है। पति से मिलन की आस में इसने लाखों वर्षों तक किसी जोगन की भांति तपस्या की है। युग-युगों तक प्रतीक्षा की है और अब ये प्रतीक्षा समाप्त होने जा रही है। यह सुनकर कामदेवजी कहते हैं सच भगवन! मुझे नया शरीर मिल जाएगा? तब श्रीकृष्ण कहते हैं- हां कामदेव जिस घटना का समय यहां तक की पल भी लाखों वर्ष पूर्व शिवजी ने स्वयं निश्चय कर दिया था। उस घटना के घटने का वो पल अब आ गया है।
यह सुनकर रति कहती हैं- अर्थात आप मेरे पतिदेव को अपने पुत्र रूप में स्वीकार करते हैं? तब श्रीकृष्ण कहते हैं- हां, कामदेव आज से तुम मेरे पुत्र हो। यह सुनकर रति प्रसन्न हो जाती है। कामदेव कहते हैं- धन्यवाद भगवन। रति कहती हैं- भगवन आपके इस उपकार के लिए मैं सदा आपकी आभारी रहूंगी। यह सुनकर श्रीकृष्ण कहते हैं कि अपने पुत्र या कुलवधू के लिए कुछ करना उपकार नहीं होता देवी रति। जब कामदेव हमारा पुत्र बनने जा रहा है तो इस नाते तुम हमारी बहू ही तो बनोगी ना? यह सुनकर रति अति प्रसन्न होकर कहती है- आप धन्य हैं प्रभु! आप धन्य हैं।
फिर श्रीकृष्ण कहते हैं- कामदेव मेरा पुत्र बनने के लिए तुम्हें अपनी माता लक्ष्मी के शरीर का एक अंग बनकर जन्म लेना है। इसलिए मैं तुम्हें आज्ञा देता हूं कि तुम अपनी होने वाली माता के गर्भ में समा जाओ। यह सुनकर कामदेव कहते हैं- धन्यवाद प्रभु।...फिर कामदेव पास ही की पलंग पर सोई माता रुक्मिणी के गर्भ में प्रवेश कर जाते हैं। यह देखकर देवी रति अति प्रसन्न हो जाती है।
फिर देवी रुक्मिणी की गोद भराई की रस्म बताई जाती है। सत्यभामा, जामवंती आदि सभी उनकी आरती उतारती हैं। अर्जुन, बलराम और श्रीकृष्ण आदि सभी सिंहासन पर बैठे हुए ये कार्यक्रम देख कर प्रसन्न होते रहते हैं।
आगे श्रीकृष्ण और रुक्मिणी के पुत्र का जन्म होता है। सत्यभामा और जामवंती भी उसको दुलारकर दाई मां को भेंट देती हैं। फिर उस बालक को सभी बारी-बारी अपनी गोद में लेते हैं। फिर बलराम और बाद में श्रीकृष्ण उसे गोद में लेकर दुलारते हैं।... उधर रति भी ये समाचार देवर्षि नारद से सुनकर प्रसन्न हो जाती है।
फिर नारदजी संभरासुर और उनकी पत्नी मायावती को भी ये समाचार सुनाते हैं कि श्रीकृष्ण के यहां पुत्र का जन्म हुआ है और वे आनंद उत्सव मना रहे हैं। यह सुनकर संभरासुर कहता है- नि:संदेह मुनिवर शुभ समाचार है ये, इसी दिन की तो प्रतीक्षा थी। फिर नारदजी वहां से चले जाते हैं।
फिर संभरासुर कहता है- इसी दिन की प्रतीक्षा में तो मेरी तलवार को जंग लग गया था परंतु अब मैं इस तलवार को धार लगाऊंगा। परंतु जल छीड़कर नहीं, कृष्ण पुत्र का रक्त छीड़कर। आज रात में ही कृष्ण पुत्र का वध करूंगा। ये बालवध आज रात ही हो जाना चाहिए। तब उसकी पत्नी मायावती कहती है कि नहीं नाथ, इतनी जल्दी ना करें। इसलिए कि जैसे-जैसे समय बितेगा कृष्ण और रुक्मिणी की अपने पुत्र के प्रति स्नेह भावना बढ़ेगी तो उसके वियोग में उनका शोक भी उतना ही कठिन होगा। इसलिए कुछ दिन और धैर्य रखिये नाथ। कृष्ण और रुक्मिणी को उनके पुत्र के भविष्य के सपने तो सजा लेने दो। शत्रु पुत्र का नाम तो रख लेने दो उन्हें। जय श्रीकृष्णा।
दुर्ग / शौर्यपथ /भारत में प्रत्येक वर्ष 5 सितंबर को शिक्षक दिवस मनाया जाता है . शिक्षक दिवस के अवसर पर भारत सरकार द्वारा सम्पूर्ण देश से चयनित शिक्षको को पुरस्कृत कर उनका सम्मान किया जाता है . प्रतिवर्ष की तरह इस वर्ष भी ५ सितम्बर को चयनित शिक्षको का भारत सरकार सम्मान करेगी और भारत के प्रथम नागरिक राष्ट्रपति के हांथो ये सम्मान उत्कृष्ट कार्य करने वाले शिक्षको को मिलेगा इस वर्ष सम्मान प्राप्त शिक्षकों की घोषणा कर दी गयी गई है। जिसमें पूरे देश से 47 शिक्षकों को चयनित किया गया है। जिसमें छत्तीसगढ़ से एकमात्र शिक्षिका सपना सोनी, व्याख्याता (भौतिक शास्त्र) जो कि शासकीय उच्चतर माध्यमिक शाला जेवरा सिरसा में पदस्थ हैं का चयन किया गया है। पूरे देश से विभिन्न राज्यों केन्द्र शासित प्रदेश एवं स्वतंत्र एजेंसियों से 153 शिक्षकों का राष्ट्रीय ज्यूरी द्वारा साक्षात्कार लिया गया। जिसमें से सपना सोनी का चयन किया गया है।
सपना सोनी ने अपनी समर्पित शिक्षण नवीन व आधुनिक शिक्षण विधियों के द्वारा अथक प्रयास से विद्यार्थियों के शिक्षा व जीवन में सकारात्मक बदलाव लाया है। जिसमें जनसहयोग से वह 2014 में जिले के शासकीय स्कूलों में पहला स्मार्ट क्लास, वर्ष 2014 से ही आईसीटी के माध्यम से नवीन शिक्षण प्रविधियों द्वारा अध्यापन, हिंदी माध्यम में ई कंटेन्ट विकसित कर विद्यार्थियों के अधिगम को सरल, रुचिकर व प्रभावशाली बनाया, एजुकेशनल वीडियोज के माध्यम से बच्चों की पढ़ाई को आसान बनाना, संस्था में अंतरिक्ष विज्ञान क्लब के स्थापना व क्रियान्वयन द्वारा विद्यार्थियों में वैज्ञानिक दृृष्टिकोण उत्पन्न करना, संस्था में विज्ञान कार्नर के माध्यम से वैज्ञानिक अभिवृत्ति उत्पन्न किया।
विगत 12 वर्षों से संस्था के विद्यार्थीगण इनके उत्कृष्ट मार्गदर्शन में विभिन्न प्रतियोगिता में राष्ट्रीय स्तर पर पुरस्कृृत हो रहे हैं आदि प्रमुख उपलब्धियों के आधार पर इनका चयन राष्ट्रीय पुरस्कार के लिए किया गया है।
टिप्स /ट्रिक्स / शौर्यपथ / गूगल प्लेस्टोर पर मौजूद MaskChat - Hides Whatsapp Chat एक शानदार एंड्रॉयड एप है जिसे यूजर की चैटिंग को प्राइवेट रखने के लिए बनाया गया है। जब आप अपने स्मार्टफोन पर प्राइवेट चैट करते हैं, तब यह एप आपके चैट के उपर की स्क्रीन को डिजिटल पर्दे से छिपा देता हैं। इससे आपके आसपास के झांकने वाले पड़ोसी से आपके मैसेज प्राइवेट रखने में मदद मिलती हैं।
अन्य चैटिंग एप के लिए भी कारगर
MaskChat - Hides Whatsapp Chat एप सिर्फ व्हाट्सएप तक ही सीमित नहीं है बल्कि इसका इस्तेमाल फेसबुक मैसेंजर, वीचैट,हाइक और स्नैपचेट के लिए भी किया जा सकता है। इसके साथ ही पासवर्ड टाइप करते समय या बैंक की इनफॉर्मेशन टाइप करते समय अपनी स्क्रीन को हाइड करने के लिए इसका इस्तेमाल कर सकते हैं।
कैसे करें इस्तेमाल
इस एप को डाउनलोड करने के बाद यूजर को स्क्रीन पर एक फ्लोटिंग मास्क चैट आइकॉन दिखाई देगा, जिस स्क्रीन को आप दूसरों से हाइड करना चाहते हैं, उस स्क्रीन पर इस आइकॉन को ऊपर से नीचे की ओर ड्रैग करें। अब एक डिजिटल पर्दा नीचे आ जाएगा, जो आपकी स्क्रीन को छिपा देगा और आप किसी भी शर्मिंदा पलों से बच सकते है जब आपके माता-पिता या बड़े आपके आसपास होते हैं।
पर्दे की बढ़ा सकते हैं डार्कनेस
इस एप में कंपनी की तरफ से दिए गए पर्दे की मोटाई औसतन होती है, जो आपको कम लग सकती है। इसके लिए आप पर्दे के दाईं ओर दिए गए तीन लाइन वाले विकल्प पर क्लिक कर सकते हैं। इससे स्क्रीन के बीच में तीन नए विकल्प आएंगे। उनमें से बीच वाले विकल्प की मदद से आप पर्दे की ब्राइटनेस को नियंत्रित कर सकते हैं। बंद करने के लिए क्रॉस आइकॉन पर क्लिक कर आप पर्दे को क्लोज कर सकते हैं, लेकिन फ्लोटिंग मास्केचैट आइकॉन को पीछे छोड़ देगा। गियर आइकॉन पर टैप कर आप थीम को बदल भी सकते हैं। थीम को सिलेक्ट करने के बाद उसके नीचें के Apply theme बटन पर टैप कर अप्लाई करें।
सेहत / शौर्यपथ / कई बार ऐसा होता है कि बहुत ज्यादा व्यायाम और डाइटिंग करने के बाद भी आपका वजन कम नहीं हो पाता। ऐसे में आप सोचने लग जाते हैं कि आखिर आप ऐसी क्या कमी कर रहे हैं, जिससे आपका वजन कम नहीं हो पा रहा है। आइए, जानते हैं किन तरीकों से आप जल्दी वजन कम कर सकते हैं-
खाने में कम कर करें तेल और घी की मात्रा
अगर वजन कम करना चाहते हैं, तो सबसे पहले तेल खाना कम करें। ऑयल के हेल्दी विकल्प लेना बेहतर आइडिया है। एक चम्मच घी या तेल में 135 कैलरी होती है, जो कि मैनेजेबल है। वजन कम करने के लिए आपको 1200 कैलरी प्रति दिन का बैलेंस बनाना होता है।
ब्राउन राइस खाना शुरु करें
भले ही सफेद चावल आपको कितने भी पसंद हों, अगर आप वजन कम कर रही हैं तो इनका डायट में रहना बिल्कुल सही नहीं है। बेहतर होगा कि आप ब्राउन राइस लेना शुरू करें इसके आधे कप में 133 कैलरीज होती हैं वहीं वाइट राइस में 266 कैलरीज होती हैं।
अपने खाने की मात्रा सुनिश्चित करें
दूसरी सबसे जरूरी बात ध्यान रखें कि जब आप वजन कम करने के लिए कुछ खुद को कुछ चीजें खाने से रोकते हैं, तो इसका असर आपकी ऊर्जा पर पड़ता है और किसी दिन रोकते-रोकते आप ज्यादा खा लेते हैं। इसलिए बेहतर होगा कि आप ये जरूर ध्यान रखें कि कितनी मात्रा में इसे खा रहे हैं।
खाने को कई हिस्सों में खाएं
दिन में दो या तीन बार खाना खाने के बजाय खाने थोड़ा-थोड़ा खाना छह बार मं खाएं। स्नैक्स लेना बंद न करें बल्कि फ्राई के बजाय बेक या एयर फ्राई करें।
खाने के बाद वॉक करना न भूलें
बहुत से लोग खाना खाने के बाद वॉक नहीं करते, अगर आप वजन कम करना चाहते हैं, तो खाने के बाद वॉक जरुर करें।
सेहत /शौर्यपथ / विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने कहा है कि कोरोना वायरस (कोविड-19) महामारी से बचाव के लिए 12 वर्ष और उससे अधिक उम्र के बच्चों को वयस्कों की तरह मास्क पहनना चाहिए। डब्ल्यूएचओ ने शनिवार को 12 वर्ष अथवा उससे अधिक उम्र के बच्चों के मास्क पहनने को लेकर नये नियम जारी किए हैं।
डब्ल्यूएचओ के मुताबिक विभिन्न देशों में वयस्कों के मास्क पहनने को लेकर जो नियम हैं वही नियम बच्चों पर भी लागू किए जाने चाहिए। डब्ल्यूएचओ ने कहा कि यह अभी तक पता नहीं चल पाया है कि बच्चों के जरिये कोरोना का संक्रमण कैसे फैलता है लेकिन इस बात के पुख्ता प्रमाण हैं कि किशोरों के जरिये वयस्कों की तरह कोरोना संक्रमण फैल सकता है।
डब्ल्यूएचओ के मुताबिक पांच वर्ष और उससे कम उम्र के बच्चों को मास्क नहीं पहनना चाहिए। छह से 11 वर्ष की उम्र के बच्चों के लिए सलाह दी गई है कि परिजन उनको मास्क पहनाने और उतारने में मदद करें। डब्ल्यूएचओ ने कहा है कि 6० वर्ष से कम उम्र के स्वस्थ लोगों को कपड़े का मास्क पहनना चाहिए जबकि इससे अधिक उम्र के लोगों और अन्य बीमारियों से पीड़ति लोगों को मेडिकल मास्क पहनना चाहिए।
गौरतलब है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने 11 मार्च को कोरोना वायरस (कोविड-19) को महामारी घोषित किया था। अमेरिका की जॉन हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी के विज्ञान एवं इंजीनियरिंग केन्द्र (सीएसएसई) की ओर से जारी किए गए ताजा आंकड़ों के मुताबिक दुनिया भर में कोरोना संक्रमण के 2.31 करोड़ से अधिक मामलों की पुष्टि हो चुकी है जबकि इस महामारी से आठ लाख से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है।
खाना खजाना /शौर्यपथ / अंकुरित मूंग दाल कबाब न सिर्फ खाने में टेस्टी होते हैं बल्कि इनका सेवन डाइट करने वाले लोग भी बिना डरे कर सकते हैं। अंकुरित मूंग में प्रोटीन की मात्रा अधिक पाई जाती है, जिसकी वजह से यह सेहत के लिहाज से भी काफी फायदेमंद होता है। तो देर किस बात की आइए जानते हैं घर पर ही कैसे बनाए जाते हैं अंकुरित मूंग दाल कबाब।
अंकुरित मूंग दाल कबाब बनाने के लिए लगने वाली सामग्री-
-एक कप अंकुरित मूंग दाल
-1 उबला हुआ शकरकंद
-एक बड़ा चम्मच कॉर्नफ्लोर
-एक बड़ा चम्मच बेसन
- एक बड़ा चम्मच मैदा
-आधा बड़ा चम्मच सूजी
-1 कटा हुआ प्याज
-2 कटी हुई हरी मिर्च
-1-2 चम्मच कद्दूकस की हुई अदरक
-1 बड़ा चम्मच ताजा कटा हरा धनिया
-नमक स्वादअनुसार
-काली मिर्च स्वाद के लिए
-1 चम्मच कश्मीरी लाल मिर्च पाउडर
-1 चम्मच अमचूर पाउडर
-1.5 चम्मच भुना जीरा-धनिया पाउडर
-आधा चम्मच अजवाइन
-तेल तलने के लिए
अंकुरित मूंग दाल कबाब बनाने का तरीका-
अंकुरित मूंग दाल कबाब बनाने के लिए सबसे पहले अंकुरित मूंग का चिकना पेस्ट बनाने के लिए उसमें थोड़ी मात्रा में पानी मिला दें। यदि आप अंकुरित मूंग में क्रंची टेस्ट चाहते हैं तो मूंग दाल का मोटा पेस्ट बनाएं। अब शकरकंद या आलू को छीलकर मैश कर लें। अब सभी मिश्रण को मूंग अंकुरित, शकरकंद और अन्य सभी सामग्री (तेल छोड़कर) एक कटोरे डालकर नरम आटे में गूंथ लें। अब इस आटे से छोटे कबाब के आकार की गोलियां बनाकर, उन्हें एक तरफ रख दें
अब एक पैन में तेल गर्म करके उसमें कबाब तल लें। कबाब को दोनों तरफ से तब तक सेकें, जब तक वह दोनों तरफ से खस्ता और सुनहरे भूरे रंग के न हो जाए। अंकुरित मूंग दाल के कबाब तैयार हैं। आप इन्हें पुदीना या धनिया चटनी के साथ गर्मा-गर्म सर्व करें।
लाइफस्टाइल / शौर्यपथ / अगर जिम में घंटों कसरत करके या फिर महंगी-महंगी दवाइयां खाने के बावजूद भी आप अपना वजन कम नहीं कर पाएं हैं तो भी टेंशन न लें। आप सोच रहे होंगे भला ये क्या बात हुई, आजकल ज्यादातर रोग बढ़ते वजन या मोटापे की ही देन हैं तो चिंता भला क्यों न करें। तो आपको बता दें, अगर आप भी उन लोगों की लिस्ट में शामिल है जो अपने मोटापे से निजात पाना चाहते हैं तो बिना किसी झंझट, बस अपनी डाइट में करें ये छोटे-छोटे बदलाव। आइए जानते हैं क्या हैं ये बदलाव।
1-भोजन के लिए छोटी प्लेट का करें इस्तेमाल-
मोटापा कम करने के लिए सबसे पहले पोर्शन कंट्रोल का फॉर्मूला अपनाएं। सबसे पहले यह जान लें कि वजन कम करने के लिए आपको सीमित मात्रा में कैलोरी खाने की जरूरत होती है। यदि आप अपने लिए एक छोटी डिनर प्लेट बनाते हैं और कोशिश करते हैं कि उसे दोबारा नहीं भरेंगे, तो आप अधिक भोजन करने से बच जाएंगे।
2-दोपहर को करें स्नैक्स का सेवन-
लंच और डिनर के बीच का अंतर अधिक होने की वजह से कई बार लोग डिनर में अधिक भोजन कर लेते हैं। इससे बचने के लिए अपने स्नैक्स को दोपहर में देर से खाएं ताकि रात को आपको भूख न लगे। कोशिश करें अपने आहार में उच्च फाइबर वाले खाद्य पदार्थों को शामिल करें, ताकि आपको जल्दी भूख न लगे।
3-भोजन करने से पहले कोई गर्म पेय जरूर पिएं-
अध्ययन बताते हैं कि अपने भोजन से पहले कुछ गर्म पीने से व्यक्ति को कम भूख लगती है। इसके लिए आप सूप की कटोरी को अपनी डाइट में शामिल कर सकते हैं।
4-दूसरों की थाली से न खाएं-
दूसरों की प्लेट से छोटे-छोटे बाइट लेकर खाना भी आपके वजन कम करने के लक्ष्य को बिगाड़ सकता है। दरअसल, व्यक्ति का मस्तिष्क इस तरह के भोजन को नहीं गिनता और वो अधिक भोजन का सेवन कर लेता है। यही वजह है कि व्यक्ति को हमेशा अपनी ही प्लेट से खाने की सलाह दी जाती है।
5-जल्दी डिनर करें-
बिस्तर पर जाने से कम से कम 2 घंटे पहले आपको अपना भोजन करना चाहिए। वजन कम करना चाहते हैं तो शाम 7 बजे तक अपना डिनर कर लें।
सक्सेस मंत्र / शौर्यपथ / जो मनुष्य सफलता की राह में जितने ज्यादा जोखिम और कष्ट उठाता है वह अपने जीवन में उतना ही ज्यादा सफल इंसान बनता है। बावजूद इसके इन 5 चीजों की कमी किसी भी व्यक्ति के लिए कई बार असफलता का कारण बन जाती हैं। आइए जानते हैं क्या हैं ये 5 चीजें।
1-जीवन में लक्ष्य की कमी-
जब तक व्यक्ति के जीवन में कोई लक्ष्य नहीं होता वह कभी सफल नहीं हो सकता। सफलता का स्वाद चखने के लिए हर व्यक्ति के पास एक लक्ष्य का होना जरूरी होता है। सफलता की सीढी का पहला कदम एक निर्धारित लक्ष्य का होना है।
2-लोगों से डर-
आपने कई बार ऐसे लोग देखे होंगे जो दूसरे व्यक्तियों से बात करने में हिचकिचाते हैं, जिसकी वजह से हुनरमंद होने के बावजूद भी सफलता उन्हें छूकर निकल जाती है। यदि आप भी जीवन में सफलता प्राप्त करना चाहते हैं तो लोगों के सामने निडर होकर उनके प्रश्नों का उत्तर देने की कोशिश करें, अपने विचारों को खुलकर दूसरों के सामने रखें।
3-विनम्रता की कमी-
जीवन में विनम्रता के बिना कोई भी व्यक्ति सफल नहीं बन सकता । जीवन में सफलता हासिल करने के लिए व्यक्ति के भीतर हर दिन कुछ नया सीखने की चाह मौजूद होनी चाहिए। इसके लिए व्यक्ति के स्वभाव का विनम्र होना बेहद जरूरी है।
4-खुद को परफेक्शनिस्ट मानना-
मैं ही सबसे समझदार हूं, मुझे ही सब आता है। अगर आप भी इस तरह का नजरिया ऱखते हैं तो आप गलत हैं। इस तरह का नजरिया आपके असफल होने की संभावनाओं को बढ़ाता है। अगर आप खुद और दूसरों को बिल्कुल सटीक नतीजों की परवाह किए बगैर अच्छा करने देंगे तो आपके फेल होने की आशंका कम हो जाती है।
5-बहस न करें-
याद रखें बहस में कभी भी किसी मुद्दे का हल नहीं निकलता जबकि सोच समझ कर बातचीत करने से सभी मुश्किलों का हल निकलता है ।
धर्म संसार /शौर्यपथ / भगवान श्रीगणेश प्रथम पूज्य हैं। उनकी आराधना से विद्या, बुद्धि, विवेक, यश, सिद्धि सहजता से प्राप्त हो जाते हैं। उनके कानों में वैदिक ज्ञान, मस्तक में ब्रह्मलोक, आंखों में लक्ष्य, दाएं हाथ में वरदान, बाएं हाथ में अन्न, सूंड में धर्म, पेट में सुख-समृद्धि, नाभि में ब्रह्मांड और चरणों में सप्तलोक हैं।
आदिपूज्य भगवान श्रीगणेश को व्रकतुंड, विघ्नहर्ता, मंगलमूर्ति आदि कई नामों से पुकारा जाता है। उनके हर नाम के साथ एक कथा जुड़ी हुई है। अक्षरों के अधिपति होने के कारण उन्हें श्रीगणेश कहा जाता है, इसलिए भगवान श्रीगणेश विद्या-बुद्धि के दाता कहे जाते हैं। भगवान शिव ने श्रीगणेश को वरदान दिया कि सभी देवताओं के पूजन में सबसे पहले पूजे जाने के अधिकारी वह ही होंगे। भगवान श्रीगणेश की रिद्धि और सिद्धि नामक दो पत्नियां हैं और शुभ-लाभ नामक दो पुत्र हैं। भगवान श्रीगणेश की पूजा में कभी भी तुलसी नहीं अर्पित की जाती है। महाभारत में उनके स्वरूप और उपनिषदों में उनकी शक्ति का वर्णन है। महर्षि वेदव्यास के कहने पर भगवान श्रीगणेश ने महाभारत का लेखन किया। दस दिन में महाभारत का लेखन संपन्न हो गया, लेकिन लगातार लिखने की वजह से भगवान श्रीगणेश का तापमान बहुत अधिक हो गया। इसलिए उन्हें सरोवर में डुबकी लगानी पड़ी। यही कारण है कि गणेश उत्सव पर दस दिन तक भगवान श्रीगणेश का पूजन करने के बाद अनंत चतुर्दशी को उन्हें नदी में विसर्जित कर दिया जाता है। भगवान श्रीगणेश का वाहन डिंक नामक मूषक है। एक दंत होने के कारण भगवान श्रीगणेश को एकदंत भी कहा जाता है।
धर्म संसार / शौर्यपथ / रामलला अब चक्रवर्ती नरेश के रूप में भक्तों को दर्शन देकर उनका कुशलक्षेम जानने बाहर भी निकला करेंगे। इसी भाव को लेकर रामजन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ने हर माह के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि पर रामलला की शोभायात्रा निकालने पर विचार कर रहा है। यह शोभायात्रा रामजन्मभूमि परिसर से सरयू तट तक निकाली जाएगी। यहां सरयू दर्शन के उपरांत दक्षिणात्य पद्धति से वैदिक मंत्रोच्चार के बीच कल्याण महोत्सव का आयोजन किया जाएगा।
चैत्र रामनवमी पर निकलेगी वार्षिक यात्रा-
चैत्र रामनवमी के अवसर पर विराजमान रामलला की वार्षिक यात्रा भी निकाली जाएगी। यह यात्रा मध्याह्न भगवान के प्राकट्योत्सव के उपरांत निकाली जाएगी। उड़ीसा के जगन्नाथपुरी की रथयात्रा की तर्ज पर इस शोभायात्रा में भगवान स्वयं नगर दर्शन के लिए निकलेंगे और आम श्रद्धालुओं को राज प्रासाद के बाहर आकर दर्शन देंगे। इस यात्रा में रामलला के साथ उनके तीनों अनुज क्रमश: भरत-शत्रुघ्नन, लक्ष्मण भी अलग-अलग रथारूढ़ होंगे। इस शाही यात्रा का मार्ग सम्पूर्ण रामकोट परिक्षेत्र रहा करेगा। इससे मेला क्षेत्र में कोई व्यवधान भी नहीं आएगा।
अभी प्रतिवर्ष पौष मास में निकलती है शोभायात्रा-
22/23 दिसम्बर 1949 के बाद से रामजन्मभूमि सेवा समिति के तत्वावधान में प्रतिवर्ष पौष मास में रामलला का प्राकट्योत्सव मनाया जाता है। नौ दिवसीय उत्सव के अंतिम दिन भगवान की शोभायात्रा सम्पूर्ण रामकोट परिक्षेत्र में निकाली जाती है। छह दिसम्बर 92 की घटना के बाद भी उत्सव यथावत रामजन्मभूमि परिसर में ही मनाया जाता रहा लेकिन वर्ष 2003 में शिलादान प्रकरण के बाद से नौ दिवसीय उत्सव प्रतीकात्मक हो गया और रिसीवर की ओर से अंतिम दो दिनों के लिए ही अनुमति दी जाती रही है।
चैत्र रामनवमी पर अम्माजी मंदिर से आज भी निकलती है शोभायात्रा-
अयोध्या। दक्षिण भारतीय परम्परा के अम्माजी मंदिर में चैत्र रामनवमी के अवसर पर पंच दिवसीय ब्रह्मोत्सव मनाया जाता है। इस मौके पर प्रतिदिन सायं भगवान की शोभायात्रा अलग-अलग वाहनों से निकाली जाती है। यह शोभायात्रा सायंकालीन बेला में निकाली जाती है। दक्षिण भारत के एक अन्य मंदिर नाटुकोट्टै नगरत्तार छत्रम से भी प्रत्येक रामनवमी के अवसर पर भगवान के प्राकट्य के बाद मध्याह्न में ही शोभायात्रा निकाली जाती थी। वर्ष 2005 में रामजन्मभूमि परिसर में लश्करे तैय्यबा के फिदायीन दस्ते के हमले के बाद शोभायात्रा बंद करा दी गई।
मेरी कहानी / शौर्यपथ /आराम की जिंदगी का कोई मुकाबला नहीं। बहुत आनंद होता है, जब जिंदगी का एक ढर्रा तय हो जाता है, कोई जोखिम नहीं, रोज घर से फैक्टरी और फैक्टरी से घर। वही काम, वही लोग, वही जिंदगी। सब कुछ तय समय पर अपनी मर्जी से, तो और क्या चाहिए? उस 18 साल के युवा के साथ भी ऐसा ही था। वह बहुत खुश था, लेकिन किस्मत में कुछ और दर्ज था। उसकी वैसी खुशी कुदरत को मंजूर नहीं थी। एक दिन फैक्टरी का खेल कोच फैक्टरी के खुले अहाते में दहाड़ रहा था। कारखाने में काम करने वाले लड़कों को एक प्रतिस्पद्र्धा में भेजने के लिए चुन रहा था। सब लड़कों को देखने के बाद कड़क कोच ने चार लड़कों को चुना। तीन तो खुश थे, लेकिन चौथा गिड़गिड़ा रहा था, ‘सर, मैं दौड़ नहीं पाऊंगा। सर, मुझे माफ कर दीजिए। मुझसे नहीं होगा।’
कोच ने फटकारा, ‘तुमसे क्यों नहीं होगा?’
युवा ने नरमी से अपनी दाल गलाने की कोशिश की, ‘सर, मैं कभी नहीं दौड़ता। मुझे याद नहीं, मैं पिछली बार कब दौड़ा था, मेरी जगह किसी और को ले लीजिए। मैं दौड़ नहीं पाऊंगा, तो कंपनी का नाम खराब होगा।’
कोच कुछ गंभीर हुआ, ‘लेकिन मुझे लगता है, तुम दौड़ सकते हो।’
अपनी जिंदगी से संतुष्ट युवा सोच रहा था कि कैसे दौड़ने से बचा जाए। खामखा क्यों मुसीबत मोल लें, दौड़ने की जरूरत क्या है? दौड़कर समय और शरीर, दोनों खराब ही होना है। कोच ने कहा, ‘तुम्हें मैंने चुन लिया है। यह सम्मान की बात है। अब चलो, दौड़ो, तुम दौड़ सकते हो और दौड़ना ही है।’
युवा ने फिर बहाना बनाया, ‘सर, मैं दौड़ नहीं सकता, क्योंकि मैं दौड़ने के लिए फिट नहीं हूं। मुझे छोड़ दीजिए सर, आपको और लड़के मिल जाएंगे।’
कोच ने समझाया, ‘तुम्हें क्या हुआ है? अच्छे-खासे तो दिख रहे हो। तुम्हारे पास एक धावक का शरीर है।’नई मेहनत, नवाचार से बचने के लिए युवा ने फिर गुहार लगाई, ‘कृपया, मुझे माफ कर दीजिए सर, मैं अनफिट हूं।’
लेकिन कोच भी अपने फन का पक्का इंसान था, उसे लग रहा था कि उसने कैसे गलत चयन कर लिया। उसने तत्काल कहा, ‘ऐसा करो, तुम अभी जाओ डॉक्टर के पास, वह अगर बोल दे कि तुम अनफिट हो, तो मैं तुम्हारी बात सुन लूंगा।’
युवा मजबूर हो गया। डॉक्टर ने उसकी जांच करके बताया कि वह दौड़ने के लिए फिट है। जिंदगी में आ गई स्थिरता और आरामतलबी को बचाने के लिए की जा रही उसकी कवायद वहीं ढेर हो गई। कोच के सामने कोई नया बहाना नहीं सूझा। भारी मन लिए भागना पड़ा। ऐसा लगा, जैसे खुद को ही नहीं, दूसरे की जिद और फरमान को भी ढो रहे हैं। अभी भी कोई बहाना चल जाए, तो दौड़ना छोड़ किनारे हो लें। खैर, उस कोच ने दौड़ा ही दिया और बता दिया कि पीछे मुडे़, तो पिछड़ जाओगे। आगे देखने वाला ही अव्वल आता है। तो जैसे-तैसे दौड़ना शुरू हुआ, लेकिन जैसे-जैसे पोर-पोर खुलता गया, वैसे-वैसे भारीपन कम होता चला गया। कहीं खडे़ रहो और हवा तेज चले, तो ही हवा से बात होती है, पर दौड़ पड़ो, तो शांत हवा से भी बात होने लगती है। रगों में ताकत बनती है और जज्बा बढ़ता है। शरीर में ताकत और सांस का एक क्रम है, जब दौड़ना शुरू होता है, तो यह क्रम अपने आप सहज होता जाता है।
जब असली दौड़ शुरू हुई, तो उस युवा अर्थात एमिल जाटोपेक को एहसास हुआ- वाह, दौड़ना तो लाजवाब है! मेरा तो जन्म ही दौड़ने के लिए हुआ है। मैं अभी तक क्या कर रहा था, 18 की उम्र तक खुद को दौड़ से बचा रहा था? उस स्पद्र्धा में जाटोपेक कुल 100 धावकों के बीच दूसरे स्थान पर आए थे। यह खुद उनके लिए आश्चर्य की बात थी, बिना अनुभव इतने सारे लड़कों को पछाड़ देना, कुछ ही दिन पहले ख्वाब से भी परे था। उस कोच की जिद और उस पहली दौड़ से जाटोपेक की जिंदगी हमेशा के लिए बदल गई। मात्र चार साल बाद वह लंबी दौड़ के मुकाबलों में अपने देश चेकोस्लोवाकिया की नुमाइंदगी करने लगे।
1952 ओलंपिक से पहले तो डॉक्टर ने कह दिया था कि तुम फिट नहीं हो, ओलंपिक में भाग मत लो, लेकिन दौड़ने का जुनून ऐसा था कि एमिल जाटोपेक (1922-2000) नहीं माने। उस ओलंपिक में वह 5,000 व 10,000 मीटर दौड़ में स्वर्ण जीत चुके थे। मैराथन दौड़ शुरू होने जा रही थी, किसी ने सुझाव दिया कि बैठे तो हो, इसमें भी दौड़ लो। मैराथन उनका खेल नहीं था, पर जाटोपेक दौड़ गए और पुराना रिकॉर्ड तोड़कर स्वर्ण पाने में कामयाब रहे। तीन स्वर्ण का वह खास रिकॉर्ड आज भी नहीं टूटा है। वह आज रोचक प्रेरणास्रोत हैं। जो इंसान कभी दौड़ना नहीं चाहता था, वह ऐसा दौड़ा कि 18 रिकॉर्ड अपने नाम कर गया।
प्रस्तुति : ज्ञानेश उपाध्याय एमिल जाटोपेक विश्व प्रसिद्ध धावक
जीना इसी का नाम है / शौर्यपथ /देश को आजादी मिले तीन साल बीते थे। केरल के एक संपन्न परिवार में बेटा पैदा हुआ। उसके दादा और पिता बहुत खुश थे कि खानदान को वारिस मिल गया। लेकिन जो मादियथ नाम के इस बालक को विधाता ने अलग ही मिजाज के साथ भेजा था। जो की परवरिश में किसी अभाव के लिए कोई जगह न थी।
जो अक्सर दादा या पिता के साथ रबड़ की अपनी खेती देखने जाया करते थे। लेकिन वहां पहुंचकर उन्हें कुछ अलग सा महसूस होता। मासूम मन यह समझ ही नहीं पाता कि हमारे खेतों-बागों में काम करने वाले लोग आखिर हमारी तरह क्यों नहीं खाना खाते? उन्हें क्यों चूहों के बिलों को खोदकर अनाज निकालना पड़ता है? जो जब थोड़े बड़े हुए, तो एक और कड़वी सामाजिक सच्चाई से उनका साबका पड़़ा। दरअसल, एक दिन घर वालों ने तथाकथित निम्न जाति के बच्चों के साथ उन्हें खुले में खेलने से सख्ती से मना किया।
जो को यह पाबंदी बिल्कुल पसंद नहीं आई और शायद उसी वक्त इन विद्रूपों से मोर्चा लेने का ख्याल उनकी चेतना का हिस्सा भी बन गया। कहते हैं, साहसी व्यक्ति पहला प्रयोग अपने ऊपर करता है। जो की उम्र तो उस समय महज 12 साल थी। पर साहसी होने की कसौटी पर खुद को उन्होंने उसी उम्र में आजमाया और अपने ही मजदूरों से कहा कि सब एक साथ मिलकर बेहतर मजदूरी और दूसरी सुविधाओं की मांग करो, तभी पिताजी मानेंगे।
जाहिर है, यह बागी तेवर पिता को नागवार गुजरा। बेटे की बगावती हरकत से चिंतित पिता ने बगैर वक्त गंवाए जो को गांव से दूर एक हॉस्टल में डाल दिया। मगर जो के भीतर तो हकगोई की लौ जल चुकी थी। स्कूल में भी उन्होंने साथी छात्रों को अपने अधिकारों के लिए संगठित होने को प्रेरित किया। अब तक पिता को एहसास हो गया था कि उनका बेटा समाज के लिए ही शायद इस धरती पर आया है। उन्होंने बेटे पर कभी कोई दबाव नहीं बनाया, बल्कि उसकी कोशिशों में सहायक बन गए।
जो मादियथ उन दिनों लोयला कॉलेज, चेन्नई के छात्र संघ के अध्यक्ष हुआ करते थे। वह गांधीजी के विचारों से काफी प्रभावित थे। जिस तरह बापू ने जनरल क्लास से रेलयात्रा के जरिए असली भारत को जाना-समझा था, उससे प्रेरित होकर जो भी देश के गरीबों और गरीबी को जानने के लिए साइकिल से भारत भ्रमण पर निकल पड़े। उन्हीं दिनों में उन्होंने यंग स्टूडेंट्स मूवमेंट फॉर डेवलपमेंट (वाईएसएमडी) नामक एक संगठन बनाया।
बात 1971 की है। देश बांग्लादेश मुक्ति संग्राम में जुटा हुआ था। बड़ी तादाद में शरणार्थी पूर्वी बंगाल से भागकर पश्चिम बंगाल आ गए थे। जो अपने संगठन के 400 साथियों के साथ कोलकाता पहुंचे, ताकि राहत शिविरों के प्रबंधन में प्रशासन का सहयोग कर सकें। जो बताते हैं, ‘कोलकाता के राहत-शिविरों में हैजा फैल गया था। कई लोग उसके शिकार हो गए। मगर कोई उनकी लाश को हाथ लगाने को तैयार न था, तब मैंने और मेरे साथियों ने फैसला किया कि इनके अंतिम संस्कार पूरी गरिमा के साथ होने चाहिए। हम स्वयं ट्रकों से उन्हें ले जाते और उनके अंतिम कर्म करते थे।’ जो और उनके साथियों की इस सेवा भावना से स्थानीय प्रशासन के लोग काफी प्रभावित थे।
दुर्योग से, उसी वर्ष अक्तूबर में ओडिशा में भयानक चक्रवाती तूफान आया। दस हजार से भी ज्यादा लोग मारे गए, जबकि कई लाख लोगों का घर-बार उजड़ गया था। जो अपने 40 साथियों के साथ कोलकाता से ओडिशा पहुंचे। राहत-कार्य के शुरुआती चरणों के पूरे होने पर वाईएसएमडी के युवा जब केरल लौटने लगे, तब जो और कुछ अन्य कार्यकर्ताओं ने ओडिशा में रुककर ही काम करने का फैसला किया।
वहां के आदिवासी इलाकों की गरीबी और भुखमरी ने जो को अंदर तक हिला दिया था। स्थानीय प्रशासन के अनुरोध पर वह अपने कुछ साथियों के साथ गंजाम जिला पहुंचे और 1979 में उन्होंने वहां ‘ग्राम विकास’ नामक संस्था की नींव रखी। जिला प्रशासन ने जो से अनुरोध किया था कि वह आदिवासियों को पशुपालन और दुग्ध उत्पादन के लिए प्रशिक्षित करें, ताकि वे आधुनिक जीवन से परिचित हों और समाज की मुख्यधारा से जुड़ सकें। जब जो के साथियों ने आदिवासियों के घर-घर पहुंच उनसे बात की, तो पता चला कि वे लोग मवेशी से दूध निकालने को भारी पाप मानते हैं। वन्य संस्कृति में उन पर सिर्फ उनके छौनों का हक माना जाता है।
चुनौती बड़ी थी, मगर जो की टीम ने दूसरे तरीकों से उन्हें प्रेरित किया, स्थानीय दबंगों द्वारा हड़पी गई उनकी जमीनें उन्हें दिलवाईं, साफ पेयजल के लिए मुहिम चलाई, पेड़ काटने की बजाय बायोगैस के इस्तेमाल के लिए उन्हें राजी किया। बच्चों के लिए स्कूल खोले गए। जो के प्रयासों ने ओडिशा में लगभग 20 लाख लोगों की जिंदगी में बेहतरी की रोशनी फैलाई है। कई नोबेल विजेता इनके कामों की सराहना कर चुके हैं। कौन कहता है कि मसीहा राजधानियों में बसते हैं, सच्चे मसीहा तो वनवासियों के पास हैं।
प्रस्तुति : चंद्रकांत सिंह जो मादियथ गांधीवादी सामाजिक कार्यकर्ता
सम्पादकीय लेख / शौर्यपथ / बुनियादी हकीकत को भुला देने वाले मुल्क पाकिस्तान को अगर दुनिया में खुद को प्रासंगिक बनाए रखने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाना पड़ रहा है, तो कोई आश्चर्य नहीं। अरब दुनिया में अलग-थलग पड़ने लगा पाकिस्तान अब चीन को साथ रखने के लिए और भी मजबूर है। पाकिस्तान की जो आक्रामक व अतार्किक नीतियां हैं, उनके मुताबिक कोई भी समझदार, न्यायपूर्ण देश खुलकर उसके साथ खड़ा नहीं हो सकता। यह विडंबना है कि पाकिस्तान को भाग-भागकर उस चीन के पास जाना पड़ता है, जिसे उस धर्म की कतई परवाह नहीं है, जिसके आधार पर कभी पाकिस्तान बना था। जहां नमाज पढ़ने और दाढ़ी रखने पर भी पाबंदी लगाई जा सकती है, वहां पाकिस्तान को किस रूप में होना चाहिए? शायद इस पर पाकिस्तान में कम ही लोग विचार करते हैं। वहां का सत्ता प्रतिष्ठान इतनी गहराई तक भारत विरोधी हो चुका है कि अपने देश की पहचान, आदर्श और संपदा की कीमत पर चीन से दोस्ती खरीदना चाहता है। यह बदलाव उसके भटकाव को ही साबित करता है। जिन मुस्लिम मुल्कों को वह अपना सहोदर मानता था, सऊदी अरब व संयुक्त अरब अमीरात, उनकी बेरुखी भी पाकिस्तान को सुधार के लिए प्रेरित नहीं कर पाई। पाकिस्तान समझ नहीं पा रहा है कि भारत का वजूद पिछले कुछ दशकों में खुद मुस्लिम मुल्कों में किस कदर मजबूत हो चुका है, तो दूसरी ओर, इन्हीं दशकों में पाकिस्तान का वजूद कितना सिमटता जा रहा है।
एक समय था, जब अरब दुनिया में पाकिस्तान की थोड़ी-बहुत सुनी जाती थी, लेकिन विगत चार वर्षों में भारत की व्यापक नीतियां अरब मुल्कों को समझ में आने लगी हैं। इसके अलावा जो धर्म के नाम पर चीन में हो रहा है, वह भी अरब मुल्कों से छिपा हुआ नहीं है। पाकिस्तान इस पर कोई चर्चा नहीं करना चाहता, पर एक समय आएगा, जब यह बात कहीं न कहीं से उठेगी और तब सबसे ज्यादा तकलीफ पाकिस्तान को होगी। पाकिस्तान के विदेश मंत्री अपने सेना प्रमुख के अरब से लौटते ही चीन पहुंच गए हैं, जहां उनकी चीनी विदेश मंत्री से बात होगी। वहां भले ही यह कहा जा रहा हो कि भारत की कोई चर्चा नहीं होगी, लेकिन यह बात अब छिपी नहीं है कि कश्मीर और भारत विरोधी प्रस्तावों को लेकर संयुक्त राष्ट्र में चीन क्यों सक्रिय नजर आता है। संकेत साफ है, चीन और पाकिस्तान की बातचीत का एक मुख्य मुद्दा भारत ही है। खुद को आर्थिक रूप से गिरवी रखते हुए पाकिस्तान जिस तरह से भारत विरोधी सौदे-साजिशें करता आ रहा है, उसे समझना किसी के लिए भी मुश्किल नहीं है। चीनी विदेश मंत्रालय की ओर से संकेत भी है, पाकिस्तान-चीन के बीच सीपैक, द्विपक्षीय व अंतरराष्ट्रीय मसलों पर बातचीत होगी, लेकिन साथ ही भारत को चिढ़ाने के लिए उनके विशेषज्ञों ने यहां तक कहा है कि भारत कोविड-19 से लड़ने में अपनी विफलता की खीज चीन और पाकिस्तान पर निकाल रहा है।
कहना न होगा, भारत को चिंता की नहीं, सावधान रहने की जरूरत है। पाकिस्तान अपनी भारत विरोधी गलत नीतियों के कारण अकेला पड़ रहा है, साजिश हो या विलाप, चीन उसका आखिरी कंधा है। भारत की रणनीति सही है, जो भी देश लोकतंत्र, न्याय, पारदर्शिता, अमन-चैन और सद्भाव के दुश्मन हैं, हिंसा और आतंक के प्रेमी हैं, उन्हें अकेले बैठना ही पड़ेगा। और हमारा काम है, उन पर चौकस नजर रखना।
नजरिया / शौर्यपथ / गणेशजी दुनिया के सर्वप्रथम और मौलिक प्रबंधन गुरु हैं। प्रबंध के पुरोधा हैं। आस्था के आकाश और धर्म के धरातल पर भारतीय संस्कृति में वह प्रथम पूज्य भी हैं और अपनी संपूर्ण उपस्थिति में प्रबंधन के प्रेरणा स्रोत भी। वह ऐसे प्रबंधशास्त्री भी हैं, जिनमें हमें पग-पग पर उपयोगी व्यवहार भी दिखता है व नवाचार भी। वह प्रखर प्रबंधक होने के साथ कुशल प्रशासक भी हैं।
एक कुशल प्रबंधन गुरु में पांच विशेषताएं होती हैं। पहली विशेषता है, संस्कारशीलता, दूसरी- व्यवहार कुशलता, तीसरी- संस्थान की हित साधना, चौथी- त्वरित-औचित्यपूर्ण निर्णय क्षमता और पांचवीं- नवाचार के प्रति उत्साह। इन पांचों विशेषताओं की कसौटी पर गणेश विश्व के पहले प्रबंधन गुरु लगते हैं। संस्कारशीलता के संदर्भ में देखें, तो उनमें साहस और समर्पण के संस्कार कूट-कूटकर भरे हैं। एक प्रबंधक के लिए कठिनाइयों से लोहा लेने का साहस और कर्तव्य के प्रति समर्पण का संस्कार अनिवार्य है। गणेश की संस्कारशीलता अर्थात साहस व समर्पण का इससे बड़ा प्रमाण क्या हो सकता है कि जब भगवान शिव ने यह उत्तरदायित्व उन्हें सौंपा कि मेरे विश्राम में कोई व्यवधान नहीं पहुंचाए, तब गणेश रक्षा प्रबंधक के रूप में द्वार पर खडे़ हो गए। किसी कारणवश भगवान परशुराम जब भगवान शिव से मिलने आए, तो गणेश ने उन्हें द्वार पर ही रोक लिया। द्वार के रक्षा प्रबंधक का कर्तव्य निभाया। इस पर क्रोधित हो परशुराम ने गणेश को युद्ध के लिए ललकारा। गणेश में साहस था, उन्होंने इस चुनौती को स्वीकारा और युद्ध किया। ऐसी कथा है कि इसी युद्ध में गणेश के एक दांत का क्षय हुआ था, जिसके कारण वह एकदंत कहलाए। दोनों के बीच युद्ध के शोर से भगवान शिव की निद्रा टूटी और उन्होंने आगे बढ़कर दोनों को युद्ध से रोका और अपने पुत्र को साहस व समर्पण अर्थात कर्तव्यनिष्ठा के लिए आशीर्वाद दिया।
तात्पर्य यह है कि प्रबंधन गुरु की प्रथम विशेषता साहस और समर्पण से वह संपन्न हैं। जहां तक व्यवहार कुशलता की बात है, तो यहां भी गणेश विशिष्ट सिद्ध होते हैं। उदाहरण के लिए, दूर्वा (एक प्रकार की घास) और मोदक, दोनों के प्रति उनका व्यवहार समान है। उनके पूजन में दूर्वा और भोग में लड्डू का समान महत्व है। इसे कहते हैं, समता का व्यवहार। वह एक हाथ में फरसा अर्थात शक्तिशाली अस्त्र को जितना सम्मान देते हैं, अपने वाहन के रूप में अंगीकार करके मामूली मूषक को भी उतना ही मान प्रदान करते हैं। किसी प्रबंधक की यह विशेषता ही उसे सफल बनाती है कि वह व्यवहार कुशल हो, गुणी का सम्मान करे, किंतु गुणहीन या साधारण का अनादर भी न करे। हां, प्रदर्शन के आधार पर कभी पुरस्कार या चेतावनी का व्यवहार वह कर सकता है।
यदि संस्थान की हित साधना के आधार पर देखें, तो भले ही यह क्षेपक हो, किंतु उदाहरण तो है ही कि जब पार्वतीजी स्नान के लिए गईं, तो गणेश को आदेश दे गईं कि किसी को प्रवेश नहीं करने देना। बाल गणेश को द्वारपाल का काम मिल गया, जब भगवान शिव आए, तो गणेश ने उन्हें भी प्रवेश करने नहीं दिया। भले ही क्रोध में भगवान शिव ने गणेश का मस्तक काट दिया, लेकिन गणेश अपने कर्तव्य या उत्तरदायित्व से पीछे नहीं हटे।
तात्पर्य यह कि कुशल कर्तव्यनिष्ठ खुद को खतरे में डालकर त्याग करते हुए भी संस्थान, समाज, देश की हित-साधना करता है। गणेश जी ने यही किया था।
आज प्रतिस्पद्र्धा का समय है, हर जगह व्यक्तियों व संस्थानों के बीच अव्वल आने की होड़ है। कथा है कि एक प्रतिस्पद्र्धा पौराणिक काल में भी हुई थी। प्रतिस्पद्र्धा में प्रथम आने के लिए गणेश ने श्रीराम लिखकर और माता-पिता शिव-पार्वती की परिक्रमा करके त्वरित व औचित्यपूर्ण निर्णय क्षमता का परिचय दिया था। वह हमें प्रेरित करते हैं कि कम से कम समय में अच्छे से अच्छे कार्य को कैसे पूरा किया जा सकता है।
जहां तक नवाचार के प्रति उत्साह का मामला है, तो महाभारत के लेखन के समय वेदव्यास द्वारा दी गई कलम टूट जाने पर उन्होंने अपने दांत से ही लेखन कर इस ग्रंथ को पूरा किया था। इससे भी उनका प्रबंधकीय कौशल ही सिद्ध होता है। वह एक ऐसे भगवान हैं, जो हर स्थिति, हर रूप और हर आयु वर्ग में ढल जाते हैं और हमें सहज, सृजनशील और कर्मशील जीवन की प्रेरणा देते हैं।
(ये लेखक के अपने विचार हैं) अजहर हाशमी , साहित्यकार व शिक्षाविद्
Feb 09, 2021 Rate: 4.00
