September 08, 2026
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    मेलबॉक्स / शौर्यपथ / ‘चिंता रहित खेलना-खाना, वह फिरना निर्भय स्वच्छंद, कैसे भूला जा सकता है, बचपन का अतुलित आनंद...’ सुभद्रा कुमारी चौहान की इन पंक्तियों में बचपन को बेहद खूबसूरती से पिरोया गया है। मगर आधुनिक युग के बच्चे इन सुखमय पलों का पूरी तरह से कहां आनंद ले पाते हैं। प्रतिस्पद्र्धा के इस दौर में साधन तो अधिक हैं, लेकिन बच्चे रेस के घोडे़ की तरह अंधी दौड़ में शामिल हैं। उनका बचपन कहीं खो सा गया है। शुरुआत से ही उनके दिमाग में यह बात डाल दी जाती है कि उन्हें सबसे अधिक नंबर लाना है। यदि ऐसा नहीं हुआ, तो वे जीवन में सफल नहीं हो पाएंगे। बेशक उन्हें पढ़ने के लिए प्रेरित किया जाए, मगर उनकी क्षमता का आकलन किए बिना उन पर अपनी अपेक्षाओं का बोझ डालना बिल्कुल गलत है। बच्चों को अपनी रुचि के मुताबिक ही विषय और क्षेत्र का चुनाव करने के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए। यही आज की जरूरत है।
    आस्था मुकुल, झारखंड

    कब सीखेंगे हम
    लॉकडाउन के कारण अर्थव्यवस्था के जाम हो चुके चक्कों को गति देने के लिए औद्योगिक गतिविधियों में रियायतें जारी हैं। इसके कारण एक ओर जहां कोरोना संक्रमितों की संख्या लगातार बढ़ रही है, तो वहीं दूसरी ओर सड़कों पर वाहनों की गति अनियंत्रित होती दिख रही है। तीन महीने से अधिक चले लॉकडाउन और अनलॉक किए जाने के दौरान कई लोगों की आदतें नहीं बदलीं और वे बाजार एवं सार्वजनिक जगहों पर बिना मास्क लगाए व शारीरिक दूरी के नियमों का उल्लंघन करते देखे जा सकते हैं। सड़कों पर घटनाएं भी बढ़ने लगी हैं, जबकि लॉकडाउन के दौरान ऐसे हादसे नाममात्र के होते थे। साफ है कि लॉकडाउन के सबक को हम सबने अब भुला दिया है।
    शिवम सिंह, बिंदकी, उत्तर प्रदेश

    बीमार होते अस्पताल
    देश में एक तरफ जहां कोविड-19 से जंग गंभीर होती जा रही है, तो कुछ अस्पतालों द्वारा मरीजों से बेहिसाब फीस वसूलने की खबरें भी आम होने लगी हैं। अच्छी बात है कि कई सरकारों ने अब इसके खिलाफ कदम उठाने की शुरुआत कर दी है। महाराष्ट्र इस अभियान से जुड़ने वाला नया राज्य है। उसने अपने अस्पतालों को साफ-साफ शब्दों में चेता दिया है कि अगर किसी अस्पताल ने कोविड-19 मरीज की मजबूरी का फायदा उठाया, तो उस पर पांच गुना तक का जुर्माना ठोका जा सकता है। यहां तक कि उसका पंजीयन भी रद्द हो सकता है। उम्मीद की जानी चाहिए कि यह कुछ हद तक अस्पतालों पर लगाम लगाएगा। राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय (एनएसएसओ) के ताजा सर्वेक्षण के मुताबिक, सरकारी अस्पतालों में आबादी के लिहाज से सुविधाएं और मानव संसाधन नहीं हैं, इसलिए शहरी इलाकों में 80 प्रतिशत से अधिक लोग निजी अस्पतालों पर भरोसा करने लगे हैं। आबादी को देखते हुए निजी अस्पताल जरूरी हैं, पर उनके कामकाज पर निगरानी तंत्र की भी जरूरत है। सरकारों को इस दिशा में जरूर सोचना चाहिए।
    अरविंद पाराशर, मकनपुर, उत्तर प्रदेश

    जांच अंजाम तक पहुंचे
    गुरुवार को प्रकाशित संपादकीय ‘एक जरूरी जांच’ सुशांत सिंह राजपूत मामले की व्यथा उजागर करता लगा। बिहार और महाराष्ट्र की पुलिस में इसको लेकर जो उलझन पैदा हुई, वह वाकई चिंता का विषय है। महाराष्ट्र पुलिस द्वारा बिहार पुलिस के अधिकारियों के साथ किया गया व्यवहार भी कतई शोभनीय नहीं था। दोनों की लड़ाई के बीच कभी-कभी तो मूल मुद्दा ही गायब होता दिखा। निश्चय ही, इस तरह के घटनाक्रम से पुलिस-प्रशासन के व्यवहार पर उंगलियां उठती हैं। इसीलिए, जरूरत दोनों में आपसी सहयोग की थी, जिससे सच्चाई सामने आ पाती। मगर ऐसा नहीं हुआ, और अब सारा दारोमदार सीबीआई पर है।
    अमृतलाल मारू, धार, मध्य प्रदेश

     

    ओपिनियन / शौर्यपथ / भारत में कोरोना वायरस से जान गंवाने वालों की संख्या 55 हजार से अधिक हो चुकी है, और यह आंकड़ा लगातार बढ़ता ही जा रहा है, हालांकि मृत्यु-दर में अब गिरावट दिखने लगी है। रिकवरी रेट, यानी कोरोना की जंग जीतने वाले मरीजों की संख्या भी लगातार बढ़ रही है। उम्मीद है कि अगले साल की शुरुआत तक इसका टीका आम लोगों के लिए उपलब्ध हो जाएगा। इन सबसे ऐसा लगता है कि महामारी का बुरा दौर बीत चुका है। जाहिर है, अब वह वक्त आ गया है कि अर्थव्यवस्था को गति दी जाए।
    2020-21 में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में एक से 15 फीसदी तक की गिरावट का अनुमान लगाया गया है। मेरा मानना है कि इसमें पांच प्रतिशत तक की कमी हो सकती है। दरअसल, अप्रैल-जून की तिमाही कोरोना से सबसे बुरी तरह प्रभावित हुई थी। साल-दर-साल उत्पादन बेशक घट रहा है, पर इसकी गति काफी धीमी है। चौथी तिमाही तक संभवत: यह गति थमने लगेगी, जिससे उत्पादन फिर से लय पकड़ने लगेगा। इस सुधार का दायरा दूसरे क्षेत्रों में भी फैल सकता है। गैर-खाद्य ऋण (खेती व इससे जुड़ी गतिविधियों, उद्योग, सेवा और पर्सनल लोन जैसे कर्ज), ऊर्जा खपत, औद्योगिक उत्पादन, रोजगार और जीएसटी संग्रह जैसे प्रमुख संकेतकों के आंकड़ों का भी यही संकेत है। सिर्फ यह साल और अगला वर्ष सुखद नहीं है। 2021-22 के अंत में हमारा उत्पादन उस स्तर पर आ जाएगा, जिस स्तर पर 2019-20 के अंत में था। इसके बाद भारत की विकास-गाथा उन नीतियों पर निर्भर करेगी, जो अगले डेढ़ साल में अपनाई जाएंगी। तमाम विकल्प इसी बात पर निर्भर करते हैं कि हम आज कहां खडे़ हैं।
    इस साल संयुक्त राजकोषीय घाटा जीडीपी का 10.5 प्रतिशत हो सकता है, या फिर इसमें राज्यों को अतिरिक्त उधार की मिली अनुमति को भी शामिल कर लें, तो यह 12.5 फीसदी तक जा सकता है। सार्वजनिक क्षेत्रों की उधार आवश्यकता, जिसमें सार्वजनिक उपक्रम भी शामिल हैं, जीडीपी की करीब 14-15 फीसदी हो सकती है। जीडीपी का करीब नौ प्रतिशत तरलता या नकदी बढ़ाने में लगाया गया है, यह राशि भी बड़े पैमाने पर मांग को प्रोत्साहित करेगी। अब इसका कितना हिस्सा उत्पादन की रिकवरी में मददगार होगा और महंगाई कितनी बढ़ाएगा, यह आपूर्ति की रुकावटें तय करेंगी। अधिकांश विश्लेषक मौजूदा मंदी पर अपना ध्यान लगाए हुए हैं, जबकि कुछ ने कीमतों में सामान्य स्तर से भी अधिक की गिरावट की आशंका जताई है। मगर मैं स्टैगफ्लेशन यानी मुद्रास्फीति जनित मंदी (बढ़ती महंगाई के साथ आने वाली मंदी) के खतरों का जिक्र करता रहा हूं, जो दुर्भाग्य से सही साबित हुआ है। जीडीपी में तेज गिरावट के साथ हमारी मुद्रास्फीति लगभग सात फीसदी तक बढ़ गई है और खाद्य मुद्रास्फीति भी 10 प्रतिशत के करीब है।
    इसीलिए 2022-23 तक देश की राजकोषीय और मौद्रिक नीतियों को धीरे-धीरे नियंत्रित तरीके से आगे बढ़ाना होगा। महामारी की वजह से आई वैश्विक मंदी और गहराता भू-राजनीतिक तनाव जब तक शांत नहीं होंगे, यह उम्मीद फिजूल है कि अंतरराष्ट्रीय कारक हमारे विकास में मददगार होंगे। हमारा चालू खाता तात्कालिक रूप से इसलिए बढ़ गया था, क्योंकि तेल की कीमतों में कमी के साथ-साथ जीडीपी में गिरावट से आयात में कमी आई थी। हालांकि, जैसे-जैसे हालात सुधरेंगे, आयात में तेजी आएगी, जिससे व्यापार घाटा बढ़ेगा और कुल मांग पर नकारात्मक असर होगा। इस सूरतेहाल में, अगर हम चाहते हैं कि हमारी विकास दर सात फीसदी या इससे अधिक हो, तो अच्छी रणनीति यही होनी चाहिए कि लंबित संरचनात्मक सुधारों को फिर से आगे बढ़ाते हुए निवेश और उद्योग का भरोसा जीता जाए।
    इस तरह के सुधारों में वित्तीय क्षेत्र को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए। सरकारी बैंकों को रिजर्व बैंक की विशेष निगरानी में लाया जाना चाहिए और उस पर सरकार का स्वामित्व 50 फीसदी से कम किया जाना चाहिए। हालांकि, यह सुधार अपने-आप में पर्याप्त नहीं है, क्योंकि यस बैंक, आईएल ऐंड एफएस जैसे निजी बैंकों में फर्जीवाड़े हुए हैं। ऐसे में, बैंकों और गैर-बैंकों, दोनों तरह के वित्तीय संस्थानों पर कड़ी निगरानी जरूरी है, ताकि गैर-निष्पादित परिसंपत्तियां यानी डूबत कर्ज की समस्या पर काबू पाया जा सके।
    दूसरा, राजकोषीय सुधार किए जाएं, जिसके तहत कर रियायतों और छूट में भारी कमी जरूरी है। इसके साथ-साथ भोजन, शिक्षा, स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों में दी जा रही सब्सिडी को छोड़कर बाकी सभी रियायतों को बंद करना भी जरूरी है। इसके अलावा, केंद्र व राज्य सरकारों को शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी ढांचों के विकास पर अतिरिक्त खर्च करना चाहिए।
    तीसरा सुधार ऊर्जा क्षेत्र में होना चाहिए। इसमें वितरण का काम निजी कंपनियों के हवाले कर देना चाहिए। दिल्ली जैसे राज्य उदाहरण हैं। चौथा, हमें उन नियमों को खत्म कर देना चाहिए, जो लघु व मध्यम उद्योगों के विकास में रोडे़ अटकाते हैं। फैक्टरी ऐक्ट इसका एक उदाहरण है। ऐसा किया जाना इसलिए जरूरी है, ताकि उद्योग व सेवाओं में रोजगार-सृजन हो।
    पांचवां, सार्वजनिक उपक्रमों में सुधार जरूरी है। यह काम अब तक कठिन साबित हुआ है। सरकार-संचालित कंपनियों को या तो निजी उद्यमों से उचित स्पद्र्धा करनी चाहिए या फिर उनसे जीतना चाहिए, क्योंकि इनमें करदाताओं का पैसा लगाया जाता है। छठा सुधार कृषि क्षेत्र में होना चाहिए। इसमें मार्केटिंग सिस्टम को ठीक करना जरूरी है, क्योंकि उपभोक्ताओं के भुगतान का उचित हिस्सा किसानों को आज भी नहीं मिल पाता।
    ध्यान रखें, हमारे सरकारी संस्थानों, विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका की गुणवत्ता भी देश के आर्थिक प्रदर्शन को प्रभावित करती है। इसलिए आर्थिक सुधारों के अलावा उच्च विकास के लिए इन संस्थानों को मजबूत करना भी आवश्यक है। हमें सुधारों को एक प्रक्रिया के रूप में देखना चाहिए, किसी घटना के रूप में नहीं। और इस प्रक्रिया के प्रभावी होने में एक दशक तक का वक्त भी लग सकता है। चीन, भारत और अन्य देशों का इतिहास यही बताता है।
    (ये लेखक के अपने विचार हैं) सुदीप्तो मंडल, फेलो, नेशनल कौंसिल ऑफ एप्लाइड इकोनॉमिक रिसर्च

     

    भिलाई / शौर्यपथ / भिलाई इस्पात संयंत्र के बिजनेस एक्सीलेंस विभाग द्वारा गुणवत्ता-2020 के तहत संयंत्र स्तरीय क्वालिटी सर्कल एवं 5-एस प्रोजेक्ट प्रस्तुतीकरण प्रतियोगिता-2020 का महती आयोजन किया जा रहा है। बीई विभाग द्वारा यह आयोजन प्रतिवर्ष किया जाता है। यह प्रतियोगिता संयंत्र में क्वालिटी सर्कल व 5-एस के तहत किए गए इनोवेटिव कार्यों को प्रस्तुत करने का एक सार्थक मंच प्रदान करता है। इसके तहत संयंत्र की क्वालिटी सर्कल व 5-एस टीमें अपने प्रोजेक्ट प्रस्तुतीकरण से अपनी सृजनात्मक प्रतिभा का प्रदर्शन करते हैं। यह महत्वपूर्ण प्रतियोगिता बिजनेस एक्सीलेंस विभाग के महाप्रबंधक श्री मनोज कुमार दुबे के नेतृत्व एवं वरिष्ठ बिजनेस एनालिशिस्ट सुनील कुमार देशमुख के समन्वय में आयोजित किया गया है।
    सर्वाधिक 78 टीमों के भाग लेने का नया रिकॉर्ड
    कोरोना के संकट के बावजूद संयंत्र बिरादरी ने अपने सृजनशीलता की धमक दिखाई है। संयंत्र प्रत्येक चुनौती पर विजय पाने के लिए अनेक क्रिएटिव कार्यों को अंजाम दिया है। यही वजह है कि संयंत्र के बिजनेस एक्सीलेंस विभाग द्वारा गुणवत्ता-2020 के प्रतियोगिता में इस वर्ष सर्वाधिक 78 टीमों ने भाग लेने का रिकॉर्ड कायम किया है। जबकि विगत वर्ष आयोजित इस प्रतियोगिता में 55 टीमों ने भाग लिया था। इस प्रकार कोरोना संकट के बाद भी संयंत्र बिरादरी की सृजनात्मक भागीदारी में लगभग 30 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। इस वर्ष भाग लेने वाले 78 टीमों में से क्वालिटी सर्कल में 41 टीमें, 5-एस में 26 टीमें तथा लीन क्वालिटी सर्कल में 11 टीमें भाग ले रही हैं।
    पहली बार लीन क्वालिटी सर्कल का आगाज
    उल्लेखनीय है कि भिलाई इस्पात संयंत्र में क्वालिटी सर्कल का प्रारंभ वर्ष 1988 से किया गया। इसी प्रकार संयंत्र में 5-एस गतिविधियों को वर्ष 2010 में प्रारंभ किया गया। इसी क्रम में वर्ष 2020 में इस प्रतियोगिता में एक नया वर्ग जोड़ा गया है। जिसके तहत लीन क्वालिटी सर्कल को इस प्रतियोगिता में पहली बार शामिल किया गया है। लीन क्वालिटी सर्कल में उन टीमों को शामिल किया जाता है, जो इससे पूर्व क्वालिटी सर्कल के समस्या निदान टूल्स के प्रयोग में परिपक्व हो चुके हैं।
    सिर्फ केस-स्टडी मूल्यांकन से होगा परिणामों का निर्धारण
    कोरोना महामारी के संक्रमण को ध्यान में रखते हुए इस वर्ष प्रतियोगिता का आंकलन क्वालिटी सर्कल में सिर्फ केस-स्टडी मूल्यांकन तथा क्यूसी रजिस्टर के आधार पर किया जायेगा। केस-स्टडी मूल्यांकन में 100 अंक तथा क्यूसी रजिस्टर में 20 अंक रखे गये हैं। इसी क्रम में 5-एस टीमों का तथा लीन क्वालिटी सर्कल का मूल्यांकन केस-स्टडी हेतु निर्धारित 100 अंक के आधार पर किया जायेगा। कोरोना के मद्देनजर इस वर्ष साक्षात प्रस्तुतीकरण नहीं किया जायेगा।
    तीन स्ट्रीमों में होगी प्रतियोगिता
    इस प्रतियोगिता में क्वालिटी सर्कल टीम में कुल 6 सदस्य जिसमें गैर-कार्यपालक वर्ग के 5 सदस्य तथा फेसिलिटेटर के रूप में कार्यपालक के एक सदस्य भाग ले सकेंगे। क्वालिटी सर्कल का आयोजन तीन अलग-अलग स्ट्रीम में आयोजित किया गया है। जिसमें ऑपरेशन में कार्य करने वाले कार्मिक मैन्यूफेक्चरिंग स्ट्रीम में, मेंटेनेंस व अन्य सहायक सेवाओं में संलग्न कार्मिक मैन्यूफेक्चरिंग सपोर्ट स्ट्रीम में तथा अन्य सेवाओं में संलग्न कार्मिक प्योर सर्विसेस स्ट्रीम में अपने प्रोजेक्ट प्रस्तुत कर सकते हैं। इसी प्रकार 5-एस टीम तथा लीन क्वालिटी सर्कल टीम के प्रत्येक टीम में कुल 4 सदस्य होंगे। जिसमें गैर-कार्यपालक वर्ग के 3 सदस्य तथा फेसिलिटेटर के रूप में एक कार्यपालक सदस्य भाग ले सकेंगे।
    बीएसपी के ब्रांड इमेज बनाने में मदद
    संयंत्र बिरादरी के सृजनशीलता को संपोषित करने हेतु इस प्रतियोगिता का आयोजन किया जा रहा है। इस प्रतियोगिता में जीतने वाले कार्मिक आगे क्यूसीएफआई के चैप्टर कन्वेंशन व नेशनल कन्वेंशन मेंं भाग लेने की पात्रता हासिल करते हैं। बिजनेस एक्सीलेंस विभाग के महाप्रबंधक श्री मनोज कुमार दुबे के नेतृत्व एवं वरिष्ठ बिजनेस एनालिशिस्ट श्री सुनील कुमार देशमुख के समन्वय में इसमें बेहतर केस-स्टडी प्रस्तुत करने हेतु बीई विभाग द्वारा समय-समय पर समग्र प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। इस प्रतियोगिता के चलते संयंत्र में किए गए विभिन्न मॉडिफिकेशनों को राष्ट्रीय स्तर पर स मान प्राप्त होता है और सेल-बीएसपी के ब्रांड इमेज के निर्माण में मदद मिलती है।

    टिप्स ट्रिक्स / शौर्यपथ / अक्सर होता है जब हम ऑफिस में होते हैं तब हमें अपना फोन वाइब्रेट/साइलेंट मोड पर रखना होता है लेकिन जब घर आ जाते हैं तो उसी फोन को रिंग मोड पर लाना भूल जाते हैं और कई बार अधिकतर जरूरी कॉल मिस्ड हो जाती हैं। ऐसी में कई बार परेशानी का सामना भी करना पड़ सकता है। इससे बचने के लिए आप गूगल के ट्रस्टेड प्लेस फीचर का इस्तेमाल कर सकते हैं। इसकी मदद से आपके घर पहुंचते ही फोन पर से लॉक हट जाएगा। साथ ही वह वाइब्रेट/साइलेंट से हटकर रिंगटोन मोड में आ जाएगा।

    फोन में मौजूद kट्रस्टेड प्लेसl को सेट करने के लिए पहले फोन की सेटिंग्स में जाएं, उसके बाद स्मार्ट लॉक के अंदर जाएं। फोन के सर्च मेन्यू में जाकर सीधे kस्मार्ट लॉकl सर्च करने से भी उस विकल्प में पहुंच सकते हैं। kस्मार्ट लॉकl में जाने के लिए पासवर्ड की जरूरत होगी, उसे टाइप करने के बाद आपके सामने स्मार्ट लॉक के विकल्प आ जाएंगे। इसमें सबसे ऊपर kऑन बॉडी डिटेक्शनl है। दूसरे नंबर पर kट्रस्टेड प्लेसl नाम का विकल्प है। इसके बाद उपयोगकर्ता जिस लोकेशन पर अपना फोन अनलॉक रखना चाहते हैं, उसे kएड ट्रस्टेड प्लेसl में जाकर शामिल कर सकते हैं। ध्यान रखें अगर आप घर की लोकेशन या ऑफिस की लोकेशन को शामिल करना चाहते हैं तो ध्यान रखें कि उस वक्त आप घर पर ही हों क्योंकि ट्रस्टेड प्लेस जीपीएस से वर्तमान लोकेशन लेता है। इसमें एक से ज्यादा लोकेशन को शामिल किया जा सकता है। उसके लिए एड प्लेस नाम के विकल्प पर क्लिक करना होगा।

    ऑफिस पहुंचते ही ऑन हो जाएगा वाइब्रेट मोड
    दफ्तर या कॉलेज क्लास में फोन कॉल आने पर तेज आवाज में बजने लगते हैं, जो कई बार शर्मिंदगी में डाल सकता है। इससे बचने के लिए आप गूगल असिस्टेंट के kरूटीनl फीचर का इस्तेमाल कर सकते हैं। रूटीन में उपयोगकर्ता अपनी जरूरत के मुताबिक बदलाव भी कर सकता है।

    ऐसे करें सेट
    इसके लिए सबसे पहले फोन के सामने बोलें kहे गूगलl ताकि वॉयस असिस्टेंट को सक्रिय किया जा सके। इसके बाद फोन स्क्रीन में नीचे की ओर दाईं तरफ दिए गए kएक्सप्लोरl विकल्प पर क्लिक कर दें। इसके बाद दाईं तरफ ऊपर की ओर जीमेल पर लगी प्रोफाइल फोटो मिलेगी, उस पर क्लिक करें। ऐसा करने से एक छोटी स्क्रीन खुलेगी, जिममें सेटिंग्स नाम का विकल्प होगा, उस पर क्लिक कर दें। इसमें kयूोर इनफोl लिखा मिलेगा, उसी के पास kअसिस्टेंटl भी लिखा हुआ दिखाई देगा, जिसपर आपको क्लिक करना है। kअसिस्टेंटl पर क्लिक करने के बाद कुछ नए विकल्प स्क्रीन पर दिखना शुरू होंगे, उन विकल्पों में नीचे की तरफ स्क्रॉल करके जाने पर kरूटीनl नामक विकल्प दिखेगा। kरूटीनl में कुछ रेडी मेड विकल्प मिलेंगे, जो गुड मॉर्निंग, बेड टाइम लीविंग होम, आई होम और कम्यूटिंग टू वर्क जैसे विकल्प मिलेंगे।

    ऑफिस जाते वक्त खुद ब खुद चलने लगेंगे गाने या न्यूज
    दफ्तर जा रहे हैं तो गूगल असिस्टेंट के kकम्यूटिंग टू वर्कk विकल्प आपके लिए उपयोगी साबित हो सकता है। इसके लिए फोन पर हे गूगल के बाद kलेट्स गो टू वर्कl बोलना होगा, उसके बाद फोन पर आज के कैलेंजर संबंधी जानकारियां और मौसम की जानकारी मिलेगी, फिर संगीत या समाचार बजने लगेंगे। ध्यान रखें कि इसमें आप बदलाव कर सकते हैं। बदलाव करने के लिए पहले आपको रूटीन नाम के विकल्प के अंदर जाकर kकम्यूटिंग टू वर्कl वाले विकल्प पर क्लिक करना होगा, उसके बाद नीचे नीले रंग में दिए गए विकल्प kएड एक्शनl पर क्लिक करना होगा। ऐसा करने के बाद दो विकल्प मिलेंगे, जिसमें से ब्राउजर पॉप्यूलर एक्शन पर क्लिक करना होगा। इसमें वॉल्यूम से लेकर अधिकतर सेटिंग्स को कस्टमाइज किया जा सकता है।

    घर जाने से पहले अपने आप चला जाएगा मैसेज
    उपयोगकर्ता वापस घर जा रहा है और वह चाहता है कि इस बात की जानकारी वह अपने माता-पिता, भाई-बहन या फिर पत्नी को दे दे तो गूगल खुद-ब-खुद मैसेज कर देगा। इसके लिए आपको होम वाले रूटीन पर क्लिक करने के बाद kएड एक्शनl पर जाना होगा, उसके बाद नीचे की तरफ कम्यूनिकेशन के विकल्प में उपयोगकर्ता को सेंड ए टेक्स्ट नाम का विकल्प दिखाई देगा, उसके सामने बने बॉक्स पर क्लिक करना होगा ताकि वह नीला हो जाए और उसके बाद इसी बॉक्स के दूसरी तरफ सेटिंग्स का आइकन होगा, उस पर क्लिक करना होगा। ऐसा करने के बाद आपके सामने दो बॉक्स आएंगे, सबसे ऊपर वाले बॉक्स पर उस नंबर को डालना होगा, जिसे भेजना चाहते हैं और उसके बाद नीचे वाले बॉक्स में संदेश को टाइप किया जा सकता है।

    गूगल असिस्टेंट क्या है
    गूगल असिस्टेंट को खासतौर से स्मार्टफोन यूजर की सहूलियत के लिए तैयार किया गया है, जो सवालों के जवाब देता है। गूगल पर आप कुछ भी सवाल पूछते है तो वह 80 प्रतिशत जवाब सही ही देता है। गूगल असिस्टेंट से आप वॉइस कमांड देकर कुछ भी काम कर सकते है। चाहे आपको इंटरनेट पर कुछ भी सर्च करना हो आप कर सकते है।

    2016 में लॉन्च किया गया था गूगल असिस्टेंट हे गूगल, जो तब गूगल होम का हिस्सा था
    2017 में इसकी शुरुआत एंड्रॉयड ऑपरेटिंग सिस्टम वाले फोन में भी हो गई थी

    सम्पादकीय / शौर्यपथ / अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की मौत के मामले में जांच सीबीआई को सौंपने का फैसला न केवल सुखद, बल्कि न्यायपूर्ण भी है। सुप्रीम कोर्ट ने कुछ देर से सही, लेकिन उचित फैसला किया है, इससे न केवल पीड़ित पक्ष, बल्कि सुशांत सिंह राजपूत के समर्थकों का भी मनोबल बढ़ेगा। 14 जून को हुई सुशांत की मौत को पहली नजर में आत्महत्या का मामला माना गया था, लेकिन बाद में जैसे परिस्थिति जन्य तथ्य और विरोधाभास सामने आते गए, उससे यह मामला गंभीर बनता गया। विशेष रूप से सुशांत के पिता द्वारा बिहार में दर्ज कराई गई प्रथम सूचना रिपोर्ट में जिस तरह से आरोप लगाए गए, उससे यह बात लोगों के दिल तक पहुंची कि सुशांत के साथ विगत छह महीने से लगातार नाइंसाफी हो रही थी। यदि कुछ क्षण के लिए यह मान भी लिया जाए कि उन्होंने आत्महत्या की है, तो भी इस संदेह की पर्याप्त गुंजाइश है कि सुशांत को उस ओर दुष्प्रेरित किया गया। सुशांत की मौत से पहले ही उनकी निराशा, अवसाद का सिलसिला शुरू हो चुका था। यह बात भी सामने आ चुकी है कि यह कुशल अभिनेता अपनी सफलता, संपन्नता, ऊर्जा और युवा चुस्ती के बावजूद इतना हतोत्साहित था कि उसे दवाइयों की जरूरत पड़ रही थी। सबसे बड़ी बात कि दवाइयां वही लोग खिला रहे थे, जिन पर आरोप लग रहे हैं। जो लोग उन्हें डॉक्टर के पास ले जा रहे थे, वही लोग सुशांत को उनके परिवार से दूर कर रहे थे। दुखद है कि ये सारे इशारे मुंबई पुलिस को नहीं दिख रहे थे। ऐसे में, सीबीआई जांच को टालना मुश्किल था।
    बिहार पुलिस की जांच को जिस तरह से प्रभावित किया गया, जिस तरह से बिहार के जांच दल के साथ अपराधियों या कोरोना संदिग्ध जैसा सुलूक किया गया, उससे भी लोगों को लगने लगा कि मुंबई पुलिस पर सोलह आना भरोसा नहीं किया जा सकता। मुंबई पुलिस की छवि पर जो दाग लग रहे थे, उन पर सीबीआई जांच के आदेश के साथ सुप्रीम कोर्ट की मुहर लग गई। अब मुंबई पुलिस के पास एक ही रास्ता है कि वह सीबीआई की जांच में सहयोग करे और सीबीआई की जांच टीम के साथ कतई वैसा सुलूक न करे, जैसा उसने बिहार पुलिस के साथ किया। सुप्रीम कोर्ट के फैसले से बेशक बिहार पुलिस का मनोबल बढ़ेगा। उसकी एफआईआर और जांच की दिशा सही साबित हुई है। बिहार पुलिस को अभी तक जो तथ्य हासिल हुए हैं, उन्हें सीबीआई को सौंपने का समय आ गया है।
    अब सीबीआई को इस मामले की तह में जाकर सुशांत की मौत के मूलभूत कारणों को उजागर करना होगा। बॉलीवुड में हुई इस मौत के अनगिनत दुखद पहलू हैं, जो यह संकेत करते हैं कि सिनेमा दुनिया की नैतिक बुनियाद कितनी जर्जर है। किस तरह से सामंतवाद या मठाधीशी का ढर्रा चल पड़ा है। किस तरह से अनेक अयोग्य और आपराधिक किस्म के लोग भी गुट बनाकर अपने-अपने गलत ढंग से यहां गुजारा कर रहे हैं। सीबीआई जांच अगर शक्तिशाली होते बॉलीवुड की आपराधिक बुराइयों तक पहुंच पाई, तो इससे देश का भी भला होगा। छोटे शहरों और सामान्य परिवारों के प्रतिभावानों के साथ वहां कैसा व्यवहार होता है, यह जानने की जरूरत पूरे देश को है। वह दुखद दास्तां भी सामने आनी चाहिए, जिसे सुशांत अपने साथ लिए गए हैं। सीबीआई को ध्यान रखना होगा कि उस पर अब देश की निगाह है।

     

    मेलबॉक्स / शौर्यपथ / कोरोना के इस भयावह दौर में बच्चे काफी दिनों से विद्यालय नहीं जा रहे हैं, लेकिन अब वे ऑनलाइन क्लास से पढ़ने को बोरियत भरा समझने लगे हैं। विद्यालयों की भूमिका हमारे जीवन में बहुत अधिक होती है। जीवन को गढ़ने और सार्थक बनाने के जो प्रयास विद्यालयों में किए जाते हैं, वे सचमुच एक अच्छे और जिम्मेदार नागरिक बनने के लिए जरूरी माने जाते हैं। कोरोना संक्रमण के भय से बंद विद्यालयों के खुलने का इंतजार अब सारे बच्चे कर रहे हैं, ताकि वे बचपन की बुनियाद मजबूत बना सकें। वाकई, घर पर न तो उन्हें कक्षा जैसा वातावरण मिल रहा है और न स्कूल जैसी सुविधा। लंबे समय तक स्क्रीन देखना बच्चों के लिए अब असहज भी होता जा रहा है। ऐसे में, जब तक विद्यालय नहीं खुलते, तब तक यदि हर अध्यापक अपने आस-पास के बच्चों के साथ थोड़ा समय बिताकर उनकी रुचि और उत्साह को बनाए रखने में मदद करे, तो यह एक बेहद सकारात्मक पहल होगी।
    हरीश कुमार शर्मा, बख्तावरपुर गांव

    मास्क है जरूरी
    पूरी दुनिया इस समय कोरोना महामारी से जूझ रही है, जिसमें बचाव के हर उपाय अपनाने की बात सभी विश्लेषक कह रहे हैं। इन उपायों में दैहिक दूरी का पालन, भीड़-भाड़ से परहेज, साबुन से लगातार हाथ धोना और मास्क का इस्तेमाल प्रमुख हैं। मगर हमारे देश में कुछ लोग मास्क से आजादी का अभियान चलाकर दूसरे लोगों को गुमराह कर रहे हैं। मास्क को गुलामी का प्रतीक बताते हुए वे समाज में यह भ्रम फैला रहे हैं कि यह कोरोना वायरस का प्रसार नहीं रोकता, बल्कि कई बीमारियों की सौगात दे जाता है। ऐसे लोगों पर कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए। आपदा की इस मुश्किल घड़ी में यदि इस तरह की अफवाहें फैलाई जाएंगी, तो सार्वजनिक स्वास्थ्य पर इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।
    सुरेंद्र जाखड़, सीकर, राजस्थान

    माही-दौर याद रहेगा
    दुनिया के महान क्रिकेटरों में शुमार महेंद्र सिंह धौनी के संन्यास लेने के साथ ही भारतीय क्रिकेट का एक अध्याय समाप्त हो गया। मैदान पर उनकी कमी खलेगी। उन्होंने विश्व स्तर पर भारत को एक अलग पहचान दिलाई। बतौर कप्तान उनका प्रदर्शन इतना शानदार रहा कि शायद ही कभी भुलाया जा सकेगा। यही कारण है कि वह देश के सबसे सफल कप्तानों की सूची में शीर्ष पर रहेंगे। हालांकि, वनडे और टेस्ट में उनका खेल अब हम नहीं देख पाएंगे, लेकिन आईपीएल में उनके हेलीकॉप्टर शॉट का नजारा देखने को मिल सकता है। क्रिकेट प्रेमी इसका बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं।
    अभिषेक सिंह, जौनपुर

    एकजुट लड़ाई जरूरी
    देश की सर्वोच्च अदालत ने फैसला सुनाया है कि कोरोना काल में इंजीनियरिंग और मेडिकल की परीक्षा तय समय पर ली जाएगी। देखा जाए, तो जीवन चलने का ही नाम है। मसले, मुश्किलें, संघर्ष मानव जीवन का हिस्सा हैं। कोरोना महामारी भले ही देश को खोखला कर दे, पर हमें एक नई शुरुआत करनी ही होगी, इसीलिए बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ नहीं किया जा सकता। परंतु यह भी सत्य है कि हमें हमारी व्यवस्था मजबूत बनानी होगी, क्योंकि सावधानी हटी-दुर्घटना घटी! कोरोना महामारी में सतर्कता बेहद आवश्यक है। जरूरी है कि प्रशासन और जनता, दोनों साथ मिलकर इसके लिए प्रयास करें। इससे अवश्य ही संक्रमण का प्रसार रोका जा सकता है। आवश्यकता है कि हम परिस्थिति की गंभीरता को समझते हुए अपने विवेक का पूर्ण इस्तेमाल करें और सरकार द्वारा जारी सभी दिशा-निर्देशों का पालन करें। हालांकि, प्रशासन का यह भी कर्तव्य है कि दैहिक दूरी का पालन करवाते हुए परीक्षा आयोजित करवाए, ताकि संक्रमण फैलने का कोई खतरा न हो।
    राजेंद्र प्रसाद, रांची, झारखंड

     

    ओपिनियन / शौर्यपथ / पिछले दिनों संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) ने इजरायल के साथ अपने राजनयिक संबंध शुरू करने का फैसला किया, जिसने विश्व समुदाय का खासा ध्यान खींचा है। यह संकेत है कि इस क्षेत्र में सियासी समीकरण नए सिरे से गढे़ जा रहे हैं। पिछले कुछ समय से ऐसी कोशिशें जारी हैं, जिसके तीन प्रमुख कारक हैं। पहला, 1950 के दशक के बाद से इस क्षेत्र के तमाम देशों के नीति-निर्धारण में फलस्तीन का मसला प्रमुखता से शामिल रहा है। दूसरा, अरब और ईरान के रिश्तों में कड़वाहट, जो 1979 की ईरानी-क्रांति से पहले से चल रही है। और तीसरा कारक है, तुर्की साम्राज्य के गौरव को फिर से स्थापित करने की एर्दोगन की महत्वाकांक्षा।
    पाकिस्तान कश्मीर मसले पर समर्थन जुटाने के लिए अरब, ईरान और तुर्की, तीनों मुल्कों से अपने रिश्तों का बेजा फायदा उठाता रहा है। ईरान के साथ-साथ उसे अरब देशों से भी आर्थिक मदद मिलती रही है। मगर पहली बार यहां के प्रमुख राष्ट्रों के साथ रिश्तों में संतुलन साधने में उसे काफी मुश्किलें पेश आ रही हैं। पाकिस्तानी विदेश मंत्री महमूद कुरैशी ने तो चेतावनी भी दी थी कि यदि इस्लामिक सहयोग संगठन जम्मू-कश्मीर के मसले पर विदेश मंत्रियों की बैठक नहीं बुलाता, तो वह इस संगठन के बाहर कश्मीर मसले को उठाएगा। इससे पाकिस्तान और खाड़ी देशों की आपसी दरारें जगजाहिर हुई हैं। मगर यह तनाव कोई नया नहीं है।
    दरअसल, पाकिस्तान और खाड़ी देशों में तनातनी 2014 में शुरू हुई, जब सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात ने पाकिस्तान से यह गुजारिश की थी कि वह अपनी सैन्य टुकड़ी यमन की जंग में उनकी मदद के लिए भेजे। पाकिस्तान की हुकूमत ने संसद की मंजूरी के बाद ही ऐसा करने की बात कही। यह एक असामान्य घटना थी, क्योंकि अतीत में पाकिस्तान की हुकूमत विदेश नीति से जुडे़ प्रमुख फैसले बिना संसद की सहमति से लेती रही थी। लिहाजा, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात ने जल्द ही समझ लिया कि ईरान के साथ विवाद में पाकिस्तान उनका साथ देने के लिए तैयार नहीं है और संसद की अनुमति केवल बहाना है।
    यमन मसले पर पाकिस्तान से निराश होने के बावजूद इमरान खान के सत्ता संभालने के बाद सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात उसकी मदद के लिए आगे आए। क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने साल 2019 में पाकिस्तान का दौरा किया। सऊदी अरब ने स्टेट बैंक ऑफ पाकिस्तान को तीन अरब अमेरिकी डॉलर देने का भी फैसला किया, क्योंकि तब मुल्क का विदेशी मुद्रा भंडार लगभग खाली हो गया था। उसने तेल मुहैया कराने में पाकिस्तान को 3.2 अरब डॉलर की रियायत भी दी। मगर बाद के महीनों में, इमरान खान ने संयुक्त राष्ट्र महासभा की बैठक के लिए अपनी न्यूयॉर्क यात्रा के दौरान तुर्की, मलेशिया और ईरान के राष्ट्राध्यक्षों के साथ बैठकें कीं। इसके बाद वह मलेशिया में इस्लामी देशों के शिखर सम्मेलन में भाग लेने के लिए तैयार थे, पर इस यात्रा को स्थगित कर दी। सऊदी अरब की नजर में यह इस्लामी दुनिया में उसके नेतृत्व को चुनौती देने वाला कदम था और उसने इसे इस्लामिक सहयोग संगठन के बरअक्स संगठन खड़ा करने की कोशिश के रूप में देखा।
    पाकिस्तान और सऊदी अरब के मतभेद लगातार सुलगते रहे हैं। सऊदी अरब का साथ देने को तो पाकिस्तान तैयार नहीं है, लेकिन वह चाहता है कि सऊदी उसके एजेंडे को आगे बढ़ाने में मदद करे। वह भारत के खिलाफ इस्लामी देशों के संगठन का भी इस्तेमाल करना चाहता है। नतीजतन, सऊदी अरब ने 3.2 अरब अमेरिकी डॉलर की रियायती तेल सुविधा का नवीनीकरण नहीं किया, जिसकी अवधि पिछले मई माह में समाप्त हो चुकी है। इसके अलावा, उसने स्टेट बैंक ऑफ पाकिस्तान को दिए गए एक अरब डॉलर को वापस करने की मांग भी कर दी है। जाहिर है, कोरोना महामारी के इस संकट काल में जब पाकिस्तान गंभीर आर्थिक दुश्वारियों का सामना कर रहा है, तब सऊदी अरब के साथ बिगड़ते रिश्ते उसकी मुश्किलें और बढ़ाएंगे।
    बहरहाल, मिस्र द्वारा कैंप डेविड समझौते के बाद इजरायल से कूटनीतिक रिश्ते बनाने के करीब चार दशकों के बाद संयुक्त अरब अमीरात ने इजरायल की तरफ अपना हाथ बढ़ाया है। उधर, तुर्की ने अमीरात के साथ अपने राजनयिक संबंध तोड़ने की धमकी दी है। यह संकेत है कि तुर्की अरब देशों को किनारे करके अब तमाम इस्लामी मुल्कों को अपने झंडे के नीचे लाने की नीति पर आगे बढ़ रहा है।
    तेल की मांग में आई गिरावट की वजह से सऊदी अरब सहित खाड़ी के राजतंत्र मुश्किल माली हालत का सामना कर रहे हैं। इससे चीन और भारत का महत्व बढ़ गया है, जो सऊदी तेल के प्रमुख खरीदार हैं। सऊदी अरब को अपने बजट को संतुलित रखने के लिए प्रति बैरल न्यूनतम 80-84 अमेरिकी डॉलर की कीमत की जरूरत है, जबकि अभी तेल की कीमत 45 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल के आसपास है। इस बीच तुर्की एक आक्रामक विदेश नीति पर आगे बढ़ रहा है। अप्रैल महीने में लीबिया में हस्तक्षेप करने के बाद यूनान और साइप्रस के साथ उसका तनाव बढ़ रहा है। इसमें उसे यूरोपीय संघ का भी विरोध झेलना पड़ रहा है। यह मामला पूर्वी भूमध्य सागर में तेल और गैस की खोज से जुड़ा है।
    एर्दोगन की एकेपी पार्टी ने संसद में अपना पूर्ण बहुमत खो दिया है। पिछले साल तो यह पार्टी इस्तांबुल मेयर के प्रतिष्ठित चुनाव में भी हार गई थी। दरअसल, एर्दोगन आक्रामक विदेश नीति के सहारे अपनी गिरती लोकप्रियता को संभालने की कोशिश कर रहे हैं, और मुस्लिम दुनिया के सऊदी नेतृत्व को चुनौती दे रहे हैं। यह ऐसे समय में हो रहा है, जब उनका देश एक बडे़ आर्थिक संकट का सामना कर रहा है।
    इधर, पाकिस्तान बदतर आर्थिक स्थिति का सामना कर रहा है, लेकिन जम्मू-कश्मीर पर अपनी सोच को बदलने के लिए तैयार नहीं है। तुर्की के वोल्कान बोजकिर, जो संयुक्त राष्ट्र महासभा के अगले सम्मेलन के अध्यक्ष होंगे, अभी-अभी पाकिस्तान-यात्रा से लौटे हैं। प्रधानमंत्री इमरान खान और विदेश मंत्री कुरैशी ने उनके साथ बातचीत में जम्मू-कश्मीर का मुद्दा उठाया है। यह संकेत है कि सितंबर में शुरू हो रहे संयुक्त राष्ट्र महासभा सत्र में क्या हो सकता है। तुर्की से मेल-मिलाप बढ़ाने से सऊदी अरब सहित अन्य अरब देशों के साथ भी उसके रिश्ते पर असर पडे़गा, जो पहले से ही तनावपूर्ण है।
    (ये लेखक के अपने विचार हैं) दिनकर प्रकाश श्रीवास्तव, ईरान में भारत के पूर्व राजदूत

     

    कृषि कालेज का एक साल हुआ पूरा, पहले बैच ने पूरी की पहले साल की पढ़ाई
    साल भर की गई कड़ी मेहनत से निखरने लगा भूमि अनुदेशक प्रक्षेत्र का रूप
    इस बार शतप्रतिशत रिजल्ट, अब 48 छात्रों को मिलेगा प्रवेश

    दुर्ग / शौर्यपथ / जिले के पहले सरकारी कृषि कालेज की सौगात मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने पिछले साल इसी दिन दी थी। पाटन की समृद्ध धरा में प्रगतिशील किसानों की नई पीढ़ी को आगे बढ़ाने, कृषि के क्षेत्र में हुनरमंद युवाओं को अवसर देने मुख्यमंत्री ने मर्रा में महाविद्यालय आरंभ करने का निर्णय लिया था। एक साल के भीतर महाविद्यालय की छोटी सी टीम ने इसका स्वरूप निखारने में कड़ी मेहनत की है। राज्य शासन ने यहां आधुनिक कृषि महाविद्यालय के लिए 87 एकड़ भूमि हस्तांतरित की। इसमें 72 एकड़ में भूमि अनुदेशक प्रक्षेत्र बनाने का निर्णय लिया गया। कृषि की पढ़ाई कमरों से अधिक फील्ड में होती है। इसके लिए फील्ड के आकार का चयन, फिर इसे तकनीकी जरूरतों के अनुरूप विकसित करने का जतन इस साल भर में हुआ। प्रोफेसर छात्रों के साथ अध्यापन कक्षों में रहे, फिर मर्रा के किसानों की भूमि में उन्हें ले गए। यहां उन्होंने फील्ड में पढ़ाई कराई। फिर बचे समय में वे भूमि अनुदेशक प्रक्षेत्र में आए, जिसे विकसित करना था। यहां मनरेगा मजदूरों के माध्यम से प्रक्षेत्र विकसित कराया गया। साढ़े सात सौ मजदूरों को जो मर्रा, आमालोरी और गुढिय़ारी के थे, उन्हें लाकडाउन के दौरान भी रोजगार मिला। महाविद्यालय के बुनियाद खड़ी करने में डीन डॉ. अजय वर्मा का बड़ा योगदान रहा। उन्होंने अपनी टीम के साथ अनुदेशक प्रक्षेत्र में साल भर कड़ी मेहनत की। प्रोफेसर धूप में पूरा दिन खड़े रहकर काम का निरीक्षण करते रहे और अनुदेशक क्षेत्र की जमीन निखरती रही। जब कृषि महाविद्यालय बनता है तो अकादमिक आयोजन भी होते हैं जिसमें विशेषज्ञ हिस्सा लेते हैं। डॉ. अजय वर्मा ने बताया कि यहां राज्य स्तरीय कृषि मेले का आयोजन किया गया। इसमें लगभग 500 किसानों ने हिस्सेदारी की। इसके संचालन और रखरखाव में भी रोजगार की संभावनाएं बढ़ी हैं। इसके लिए राज्य शासन ने 29 लाख रुपए महाविद्यालय को प्रदान किये। मशरूम उत्पादन के लिए 35 लाख रुपए प्रदान किये। भारत रत्न संत विनोबा भावे कृषि महाविद्यालय एवं अनुसंधान केंद्र, मर्रा की स्थापना कर मुख्यमंत्री ने बड़ी पहल की है। इस साल यहाँ 48 छात्रों को एडमिशन मिल सकेगा। मुख्यमंत्री के मर्रा में शिक्षक रहे श्री हीरा सिंह ठाकुर ने कहा कि मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने यहां पढ़ाई की, अब यहां उन्होंने कृषि के लिए महाविद्यालय शुरू कर दिया। यह उनकी गुरु दक्षिणा है।

    दुर्ग / शौर्यपथ /  कोरोना संकट को देखते हुए इंजीनियरिंग कालेज प्रबंधन छात्रों को इंस्टालमेंट में फीस देने की सुविधा उपलब्ध कराएं ताकि एक साथ वित्तीय भार अभिभावकों पर न पड़े। कलेक्टर डाॅ. सर्वेश्वर नरेंद्र भुरे ने यह बात जिले के इंजीनियरिंग कालेज के प्रबंधकों की बैठक में कही। उन्होंने कहा कि इंस्टालमेंट से फीस देने की सुविधा देने से अभिभावकों को भी राहत मिलेगी और प्रबंधन को भी महाविद्यालय चलाने के लिए आवश्यक फीस मिल सकेगी। उन्होंने कहा कि कोरोना काल में संतुलन के रास्ते से काम करना होगा। हमें  देखना होगा कि अभिभावकों को किसी तरह की दिक्कत न हो, साथ ही कालेज प्रबंधन को भी समय-समय पर इंस्टालमेंट के रूप में फीस की राशि मिलती रहे ताकि उन्हें अपने महाविद्यालय के सुचारू रूप में संचालन में सहायता मिलती रहे। कलेक्टर ने कहा कि फीस शासन की निर्धारित गाइडलाइन के अनुरूप ही लें। इस संबंध में शासन द्वारा दिये गए निर्देशों के अनुरूप पालन होना चाहिए। उन्होंने कहा कि जिले में तकनीकी शिक्षा की बेहतरी के लिए आपके सुझाव हमेशा आमंत्रित हैं। आपको किसी भी तरह से फीडबैक देना है आप प्रशासन से संपर्क कर सकते हैं। विद्यार्थियों को बेहतरीन तकनीकी शिक्षा मिल सके, इसी लक्ष्य को लेकर हम सब कार्य कर रहे हैं। बैठक में अपर कलेक्टर  बीबी पंचभाई एवं डिप्टी कलेक्टर सुश्री दिव्या वैष्णव भी उपस्थित थीं।

    बीजापुर / शौर्यपथ /  शासन की स्वरोजगार योजना से लाभान्वित होकर बीजापुर तहसील अंतर्गत ईटपाल निवासी प्रहलाद नाईक गांव में हाॅलर मिल स्थापित कर खेती-किसानी के साथ ही इसे आय का अतिरिक्त जरिया बना चुका है। प्रहलाद नाईक अपने गांव में हाॅलर मिल के माध्यम से ईटपाल, जैतालूर और मांझीगुड़ा के किसानों तथा ग्रामीणों की धान कुटाई सहित गेहूं, चावल, दाल, रागी इत्यादि की पिसाई का कार्य कर रहे हैं। प्रहलाद नाईक ने बताया कि परिवार के पास केवल ढाई एकड़ कृषि भूमि के मद्देनजर खेती-किसानी के अलावा गांव में ही स्वरोजगार अपनाने की सोच रहे थे। इस बीच वर्ष 2015-16 में अंत्यावसायी सहकारी विकास समिति के अधिकारी ने स्माॅल बिजनेस योजनान्तर्गत स्वरोजगार स्थापित करने की जानकारी देने के साथ ही बैंक के माध्यम से 6 प्रतिशत रियायती ब्याज दर पर3 लाख रूपए ऋण उपलब्ध कराये जाने के बारे में बताया। इस योजना के सम्बन्ध में परिवार के सदस्यों तथा मित्रों से चर्चा कर गांव में ही हाॅलर मिल स्थापित करने के लिए आवेदन पत्र जिला अंत्यावसायी सहकारी विकास समिति के कार्यालय में जमा कर दिया। इसके बाद उक्त प्रकरण पर 3 लाख रूपए ऋण की स्वीकृति दी गयी। इस ऋण राशि गांव में पूर्व से निर्मित शेड में ही हाॅलर मिल स्थापित किया।

         प्रहलाद नाईक बताते हैं कि पहले लोग बीजापुर जाकर धान की मिलिंग और गेहूं, चावल, रागी की पिसाई का कार्य करवाते थे। लेकिन जब गांव में ही हाॅलर मिल लग गया तो ईटपाल, जैतालूर सहित मांझीगुड़ा के लोग धान की मिलिंग करवाने के साथ ही गेहूं, चावल, दाल, रागी की पिसाई करवा रहे हैं। जिससे उन्हे घर पर ही स्वरोजगार उपलब्ध हुआ है। प्रहलाद नाईक बताते हैं इस काम से उन्हे हर महीने 5 से 6 हजार रूपए आमदनी होती है। त्यौहार तथा शादी-ब्याह के सीजन में ग्रामीण धान की मिलिंग तथा आटा-दाल पिसाई ज्यादा करवाते हैं तो आमदनी में भी इजाफा होता है। जिसके फलस्वरूप 3 लाख रूपए ऋण राशि में से अब तक एक लाख 56 हजार रूपए ऋण राशि अदा कर चुके हैं। प्रहलाद ने बताया कि अपने परिवार के ढाई एकड़ कृषि भूमि में धान की फसल लेने के साथ ही रबी सीजन के दौरान एक एकड़ रकबा में साग-सब्जी का उत्पादन करते हैं। जिससे 5 सदस्यीय परिवार का आसानी के साथ भरण-पोषण कर रहे हैं, वहीं बच्चों की पढ़ाई पर ध्यान दे रहे हैं। प्रहलाद शासन की स्वरोजगार योजना से लाभान्वित होकर गांव घर में ही आय का जरिया मिलने से खुश है और इसके लिए सरकार को साधुवाद दिया।

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