July 24, 2026
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    मेलबॉक्स / शौर्यपथ / शीर्ष अदालत ने अपने फैसले से एक बार फिर स्पष्ट कर दिया कि वह पिता की संपत्ति में बेटियों को भी बराबर का अधिकारी मानती है। इससे निश्चय ही बेटियों और बेटों में होने वाला भेदभाव कुछ हद तक कम हो सकेगा। सवाल सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर नहीं, बल्कि यह है कि जब बेटियां सुरक्षित ही नहीं रहेंगी, तो संपत्ति का भला क्या लाभ? जिस तरह से आए दिन बलात्कार, छेड़छाड़ जैसे मामलों में अप्रत्याशित वृद्धि हुई है, उसको देखते हुए यही कहा जा सकता है कि वर्तमान परिवेश में बेटियों को संपत्ति से ज्यादा सुरक्षा की जरूरत है। छोटे शहर हों या महानगर, ग्रामीण इलाके हों या शहरी क्षेत्र, हर जगह बेटियों पर जुल्म बढ़े हैं। दिल्ली में 12 वर्षीया बच्ची के साथ दरिंदगी होती है, तो बुलंदशहर में राह चलते छेड़खानी, ये घटनाएं बताती हैं कि बेटियों को सुरक्षा देने में हमारी सरकार, समाज और कानून बुरी तरह विफल रहे हैं। विधायिका, न्यापालिका और कार्यपालिका को इस पर गंभीरता से सोचना चाहिए और बेटियों के अनुकूल समाज बनाना चाहिए।
    प्रत्यूष आनंद, नवादा, बिहार

    जिम्मेदार बनें हम
    देश के दस राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ मंगलवार की अपनी बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अधिक से अधिक जांच पर जोर दिया। यह बताता है कि कोरोना महामारी से निपटने में यह कदम किस हद तक कारगर है। उन्होंने उन राज्यों को खासतौर से जांच की रफ्तार और दायरा बढ़ाने की अपील की, जहां संक्रमण-दर और मृत्यु-दर अधिक हैं। सरकार की गंभीरता जनहित में उचित है, लेकिन हम भारतीयों को जैसे ही छूट मिलती है, हमारा ‘इम्यून सिस्टम’ उछल-कूद मचाने लगता है और हम पाबंदियों की परवाह किए बिना अपने पुराने ढर्रे पर आकर आस-पड़ोस और मोहल्ले में कोरोना का ‘निमंत्रण-पत्र’ बांटने लगते हैं। इसीलिए सरकारों व प्रशासन को उन पर सख्त कार्रवाई करनी चाहिए, जो दिशा-निर्देशों का उल्लंघन करते हैं। ऐसा करने पर ही हम इस महामारी का मुकाबला कर सकेंगे।
    सुभाष बुड़ावन वाला
    रतलाम, मध्य प्रदेश

    अलविदा इंदौरी साहब
    ‘सभी का खून शामिल है यहां की मिट्टी में, किसी के बाप का हिन्दुस्तान थोड़ी है...’ इस तरह की वीरोचित और न्यायपरक पंक्तियां लिखने वाले राहत इंदौरी साहब अब हमारे बीच नहीं हैं। वह हमेशा के लिए रुखसत हो गए। उनका पूरा जीवन एक ऐसे आदमी की अत्यंत संघर्षमय कहानी है, जो अपने अदम्य साहस और जीवटता से शून्य से शिखर तक पहुंचता है। उन्होंने अपनी बेखौफ अभिव्यक्ति से देश के आमजन, मजदूर, किसान, गरीब आदि को आवाज दी। यही वजह है कि वह हर किसी के अजीज बन गए। उनका यूं जाना इसलिए ज्यादा खलता है, क्योंकि अभी देश पर भय और दहशत की एक विचित्र धुंध छाई हुई है। निश्चय ही, वह अपनी शायरी से हमारे दिलों में जिंदा रहेंगे।
    निर्मल कुमार शर्मा, गाजियाबाद

    सख्त कार्रवाई हो
    दुनिया कितनी आगे निकल गई है, किंतु हम अब भी छोटी-छोटी बातों पर सौहार्द बिगाड़ देते हैं और जनजीवन अस्त-व्यस्त कर देते हैं। समाज के समझदार लोगों को ऐसे वक्त में तुरंत आगे आना चाहिए और नासमझों को समझाने के प्रयास कर उद्वेलित भावनाएं शांत करनी चाहिए। सरकार तो कानून-व्यवस्था के जरिए अमन स्थापित करती ही है। सवाल यह है कि क्या मिला उन लोगों को, जिन्होंने कतिपय लोगों की भावनाएं उद्वेलित कर शांत बेंगलुरु को अशांत कर डाला? एक गलती करे और पूरा शहर उसे भुगते, यह किसी भी दृष्टि से ठीक नहीं। भविष्य में ऐसी गलती न हो, इसका ख्याल समाज के जिम्मेदार लोगों और सरकार, दोनों को रखना होगा। देशहित व जनहित में यह जरूरी है।
    महेश नेनावा, इंदौर, मध्य प्रदेश

     

    ओपिनियन / शौर्यपथ /अयोध्या में श्रीराम जन्मस्थान पर मंदिर निर्माण के शुभारंभ को समूचे भारत और विश्व भर में फैले भारतीय मूल के लोगों और भारत प्रेमियों ने जी भरकर देखा। अगणित लोगों को यह दृश्य एक स्वप्नपूर्ति का अनुभव और आनंद दे गया। लंबे संघर्ष के बाद यह महत्वपूर्ण उपलब्धि प्राप्त हुई है। असंख्य भारतीयों के चेहरों पर समाधान का तेज और आंखों में हर्ष के आंसू भी देखने को मिले। कई लोगों के लिए यह कार्य-पूर्ति का क्षण था, परंतु वास्तव में यह कार्यारंभ का क्षण है।
    भारत में धर्म और सामाजिक जीवन एक-दूसरे से भिन्न नहीं देखे गए हैं। सभी समान हैं। ऐसी भारतीय मान्यता है, और इसे भारत जीता भी आया है। ‘युबांतु’ एक अफ्रीकी संकल्पना है। उसका अर्थ है, ‘मैं हूं, क्योंकि हम हैं’। मैं, मेरा परिवार, ग्राम, राज्य, राष्ट्र, मानवता, मानवेतर जीव सृष्टि, निसर्ग, ये सभी परस्पर जुड़ी हुई क्रमश: विस्तारित होने वाली विभिन्न इकाइयां हैं, यही एकात्म है। इनमें परस्पर संघर्ष नहीं, समन्वय है; स्पद्र्धा नहीं, संवाद है। इन सभी इकाइयों का समुच्चय हमारा जीवन है। ये सब हैं, इसीलिए हम सब हैं। इनके बीच का संतुलन धर्म है और यह संतुलन बनाए रखना ही धर्म स्थापना है। सैकड़ों वर्षों तक भारत सर्वाधिक समृद्ध देश था। सामथ्र्य संपन्न होने पर भी भारत ने अन्य देशों पर युद्ध नहीं लादे। व्यापार के लिए दुनिया के सुदूर कोनों तक जाने के बावजूद भारत ने न उपनिवेश बनाए, न उनका शोषण किया; न उन्हें लूटा, न ही उनका धर्म-परिवर्तन किया और न उन्हें गुलाम बनाकर उनका सौदा किया। भारत में मंदिर आध्यात्मिक साधना के साथ-साथ श्रेष्ठ लोकाचार और आर्थिक समृद्धि के कारण रहे हैं और केंद्र भी।
    1951 मे सोमनाथ मंदिर में प्राण-प्रतिष्ठा करते समय भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद के भाषण में इसका स्पष्ट उल्लेख मिलता है। वह कहते हैं, ‘इस पुनीत अवसर पर हम सबके लिए यही उचित है कि हम आज इस बात का व्रत लें कि जिस प्रकार हमने आज अपनी ऐतिहासिक श्रद्धा के इस प्रतीक में फिर से प्राण-प्रतिष्ठा की है, उसी प्रकार हम अपने देश के जन-साधारण के उस समृद्धि मंदिर में भी प्राण-प्रतिष्ठा पूरी लगन से करेंगे, जिस समृद्धि मंदिर का एक चिन्ह सोमनाथ का पुराना मंदिर था।... साथ ही सोमनाथ के मंदिर का पुनर्निर्माण तब तक मेरी समझ में पूरा नहीं होगा, जब तक कि इस देश की संस्कृति का स्तर इतना ऊंचा न हो जाए कि यदि कोई आज का अलबरूनी हमारी वर्तमान स्थिति को देखे, तो हमारी संस्कृति के बारे मे दुनिया को वही बताए, जो भाव उसने उस समय प्रकट किए थे’। गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर स्वदेशी समाज में लिखते हैं, ‘हम वास्तव में जो हैं, वही बनें। ज्ञानपूर्वक, सरल और सचल भाव से, संपूर्ण रूप से हम अपने आपको प्राप्त करें।’
    वर्ष 1987 में राम-जानकी रथ यात्रा चल रही थी, तब सरसंघचालक बालासाहब देवरस से एक कार्यकर्ता ने पूछा- गौ हत्या प्रतिबंध का आंदोलन, कश्मीर के 370 में सुधार आदि विषय, मांग करके हमने छोड़ दिए, ऐसा लगता है। क्या राम मंदिर के विषय में भी वैसा ही होगा? तब बालासाहब देवरस का उत्तर था, ‘हम इसी निमित्त राष्ट्रीय जागरण करते हैं। यह जागरण सतत किसी न किसी निमित्त से करते रहना चाहिए। आज हिंदू समाज की राष्ट्रीय चेतना का सामान्य स्तर बहुत नीचा है। इसी कारण ये सारी समस्याएं हैं। जिस दिन संपूर्ण समाज की राष्ट्रीय चेतना का सामान्य स्तर पर्याप्त उन्नत होगा, तब हो सकता है, इन सभी विषयों के समाधान एक साथ हो जाएं’।
    मैल्कॉम ग्लेडवेल की पुस्तक टिपिंग प्वॉइंट : हाउ लिटिल थिंग कैन मेक अ बिग डिफरेंस की व्याख्या वह यूं करते हैं, ‘टिपिंग प्वॉइंट वह बिंदु है, जिस पर छोटे परिवर्तन या घटनाओं की एक शृंखला पर्याप्त महत्वपूर्ण हो जाती है, जिससे बडे़, अधिक महत्वपूर्ण परिवर्तन होते हैं’। आज बालासाहब के शब्दों का स्मरण करते हुए लगता है कि उस भाव को व्यक्त करते समय क्या उनका संकेत टिपिंग प्वॉइंट की ओर था?
    संघ के ज्येष्ठ प्रचारक और चिंतक दत्तोपंत ठेंगड़ी एक बात हमेशा कहा करते थे, ‘समाज में कुछ लोगों का राष्ट्रीय दृष्टि से जागृत और खूब सक्रिय होना शाश्वत परिवर्तन नहीं लाता है। जब सामान्य व्यक्ति की राष्ट्रीय चेतना का स्तर थोड़ा भी ऊंचा उठता है, तब बड़े-बड़े परिवर्तन होते हैं। इसलिए समय-समय पर कुछ मुद्दों को लेकर राष्ट्रीय जागरण के प्रयास सतत करते रहने से ही धीरे-धीरे सामान्य व्यक्ति की राष्ट्रीय चेतना का स्तर ऊंचा उठेगा। इन सबके सम्मिलित प्रभाव से राष्ट्रहित के अनेक छोटे-बड़े महत्व के अन्य आवश्यक कार्य सहज होते जाएंगे’।
    लगता है, बालासाहब देवरस और ठेंगड़ी जी द्वारा वर्णित वह ‘टिपिंग प्वॉइंट’ निकट आ रहा है, रवींद्रनाथ ठाकुर का वह स्वदेशी समाज सक्रिय हो रहा है। राष्ट्र जीवन के अनेक क्षेत्रों में, अनेक वर्षों से लंबित राष्ट्रहित के मूलभूत परिवर्तन एक के बाद एक हो रहे हैं। देश की रक्षा नीति और विदेश नीति में मूलभूत परिवर्तन विश्व अनुभव कर रहा है। विकेंद्रित और कृषि आधारित अर्थ नीति के आधार पर आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ने का संकल्प प्रकट हो रहा है। भारत की जड़ों से जुड़कर विश्व के आकाश को आगोश में लेने के लिए ऊंची उड़ान भरने वाले पंख देने वाली नई शिक्षा नीति की घोषणा हुई है। समाज के स्वयं के उद्यम और नवाचारों को प्रोत्साहन मिलने का वातावरण बन रहा है। यह सारा एक साथ होता नजर आ रहा है। इस परिवर्तन को 2014 से हुए केंद्रीय सत्ता परिवर्तन के साथ जोड़कर देखना स्वाभाविक है। 16 मई, 2014 के दिन चुनाव परिणामों की घोषणा होने का बाद 18 मई रविवार के संडे गार्जियन के महत्वपूर्ण संपादकीय में एक मूलभूत और गहरी बात कही गई थी, ‘यह स्पष्ट होना चाहिए कि भारतीय समाज में अंतर्निहित परिवर्तनों की वजह से ही नरेंद्र मोदी आए हैं, किसी दूसरे तरीके से नहीं’। राष्ट्रीय चेतना के सामान्य स्तर के ऊंचा उठने के कारण ही सभी प्रकार के इष्ट परिवर्तन शुरू हुए हैं और सत्ता परिवर्तन भी उसी का भाग है।
    अपना दायित्व निभाने के लिए भारत वर्ष अपनी चिर-परिचित शक्ति के साथ खड़ा हो रहा है। अब तक रुके हुए या रोके गए सभी आवश्यक कार्य होना शुरू हो गए हैं। संपूर्ण समाज को सजग रहकर सक्रिय होना होगा। यह वही आत्म-आभास है, जिससे जरूरी आत्मविश्वास और आत्मनिर्भरता अवश्यंभावी है। एक संघ गीत में कहा गया है, अरुणोदय हो चुका वीर, अब कर्मक्षेत्र में जुट जाएं, अपने खून-पसीने द्वारा नवयुग धरती पर लाएं।
    (ये लेखक के अपने विचार हैं) मनमोहन वैद्य, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सर कार्यवाह

     

    सेहत / शौर्यपथ / अदरक एक ऐसी जड़ीबूटी है, जिसका आयुर्वेद की दुनिया में कई हजारों सालों से इस्तेमाल किया जा रहा है. हां, ये केवल एक ऐसी ही जड़ीबूटी नहीं है, जो आपके खाने का स्वाद बढ़ाने के लिए इस्तेमाल की जाती है. ये एक स्वास्थ्यवर्धक जड़ीबूटी है, जो आपको स्वस्थ रखने में मदद करती है. हालांकि, क्या आप जानते हैं कि आपके बालों के लिए अदरक बहुत ही लाभकारी होती है.

    अदरक की ही तरह इसका रस भी बेहद लाभकारी होता है और इसमें बहुत से जरूरी न्यूट्रीएंट्स होते हैं, जो आपके बालों को बढ़ाते हैं. तो चलिए आपको बताते हैं कि अदरक का रस बालों को कैसे बढ़ाता है और किस तरह से बालों के लिए फायदेमंद होता है.

    बालों को बढ़ाने के लिए फायदेमंद क्यों होता है अदरक का रस
    अदरक में जरूरी विटामिन्स और मिनरल्स होते हैं. जैसे मैगनीशियम, पोटैशियम और फॉसफोरस, जो आपकी स्कैल्प को जरूरी पोषण देते हैं और बालों को बढ़ने में मदद करते हैं. इस वजह से पारंपरिक तौर पर बहुत से लोग पहले से ही अदरक का इस्तेमाल बालों को बढ़ाने के लिए करते आ रहे हैं.

    अदरक के रस में एंटी इंफ्लामेटरी और एंटीमाइक्रोबायल प्रोपर्टीज होती हैं जो स्कैल्प में खून का सर्कुलेशन बढ़ाते हैं और हेयर फॉलिसेल्स को स्टिम्यूलेट करते हैं, ताकि आपके बाल बढ़ सकें. कई बार बालों के झड़ने का मुख्य कारण डैंडरफ होता है. जब आपका स्कैल्प अस्वस्थ होता है तो उससे आपके सिर में डैंडरफ हो जाता है. अदरक के रस में मौजूद एंटीफंगल प्रोपर्टीज आपकी स्कैल्प को साफ रखती हैं.

    इस वजह से अदरक का रस बालों को बढ़ने में मदद करता है और आपको भी इन 4 तरीकों से अदरक के रस का इस्तेमाल करना चाहिए.

    1. अदरक का रस
    आप चाहें तो अदरक के रस को सीधे अपनी स्कैल्प पर लगा सकते हैं और उन्हें मजबूत और स्वस्थ बना सकते हैं.

    आपको चाहिए
    - एक ताजी अदरक,
    - एक कॉटन पैड

    ऐसे करें इस्तेमाल
    - एक कटोरी में अदरक का रस निकाल लें.
    - अब इस रस को अपने बालों की स्कैल्प पर कॉटन बॉल की मदद से लगाएं. इस रस को अपनी स्कैल्प पर लगाएं. ध्यान रहे कि आप इसे अपने बालों में न लगाएं.
    - अब कम से कम आधे घंटे तक इसे बालों में लगे रहने दें.
    - शैंपू से अपने बाल धो लें.
    - इसके बाद कंडिशनर लगाएं.
    - बेहतर नतीजों के लिए हफ्ते में कम से कम तीन बार इसका इस्तेमाल करें.

    2. अदरक का रस, ऑलिव ऑयल, नींबू का रस
    बालों को शाइनी और स्मूथ बनाने के लिए ऑलिव ऑयल बेहद ही लाभकारी होता है. ये आपकी स्कैल्प को मोइश्चराइज रखता है और बालों को ड्राय होने से बचाता है. वहीं नींबू का रस विटामिन सी का अच्छा स्त्रोत है. इसमें एंटीऑक्सिडेंट्स ब हैं, जो स्कैल्प पर कोलॉजेन के प्रोडक्शन को बूस्ट करता है.

    आपको चाहिए
    - 2 टेबलस्पून अदरक का रस
    - 3 टेबलस्पून ऑलिव ऑयल
    - आधा टीस्पून नींबू का रस

    ऐसे करें इस्तेमाल
    - एक कटोरी में तीनों चीजों को मिला लें.
    - अब इस मिक्स्चर को अपने स्कैल्प पर लगाएं.
    - इसे 30 मिनट के लिए स्कैल्प पर लगा छोड़ दें और फिर अपने बाल धो लें.
    - हफ्ते में एक से दो बार इस नुस्खे का इस्तेमाल करें.

    3. अदरक का रस, नारियल का तेल और लहसून
    नारियल के तेल का इस्तेमाल बहुत सी महिलाएं अपने बालों को स्वस्थ रखने के लिए करती होंगी. इसमें अधिक मात्रा में लॉरिक एसिड, होता है, जो बालों को डैमेज होने से बचाता है और बालों को बढ़ाता है. वहीं लहसून भी बालों के लिए काफी अच्छा होता है. नारियल के तेल में विटामिन बी, सी और लॉरिक एसिड होता है, जो स्कैल्प को नरिश करता है.

    आपको चाहिए
    - 1 टीस्पून अदरक का जूस
    - 4 टीस्पून नारियल का तेल
    - 3 लहसून की तुरी
    - 6 टीस्पून नारियल का दूध
    - 2 टीस्पून शहद

    ऐसे करें इस्तेमाल
    - एक कटोरी में सब चीजों को मिला लें.
    - अब इसे अपनी स्कैल्प पर लगाएं.
    - कम से कम 30 मिनट के लिए इसे लगा छोड़ दें.
    - अब अपने बालों को अच्छे से धो लें.
    - बेहतर नतीजों के लिए इस नुस्खें का हफ्ते में एक बार इस्तेमाल करें.

    4. अदरक का रस और तिल का तेल
    विटामिन ई और बी, प्रोटीन और मिनरल से भरपूर तिल ता तेल बालों को अंदर तक नरिश करता है और बालों को बढ़ने में मदद करता है.

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    नजरिया / शौर्यपथ / लैंगिक समानता के क्षेत्र में 11 अगस्त, 2020 का दिन अत्यंत महत्वपूर्ण रहा। सर्वोच्च न्यायालय ने अपने एक महत्वपूर्ण निर्णय में न केवल बेटियों को बेटों के बराबर के अधिकार पर अपनी मुहर लगाई, अपितु इस विषय से जुड़ी कानूनी अनिश्चितता को भी दूर कर दिया है।
    सन 1956 के हिंदू उत्तराधिकार कानून में हिंदू परिवार की संपत्ति में बेटियों को बेटों के बराबर अधिकार नहीं था। यह संविधान के उन आदर्शों के उलट था, जिसमें पुरुषों और महिलाओं को बराबरी का दर्जा मिलना था। साल 2005 में इस कमी को दूर करने का प्रयास किया गया। हिंदू उत्तराधिकार कानून में संशोधन करके बेटियों को भी पिता की संपत्ति और दायित्व में बेटों के बराबर अधिकार दे दिया गया था। निश्चित रूप से यह बहुत बड़ा कदम था, इसे 9 सितंबर, 2005 से लागू कर दिया गया। बेटियों के अधिकार को लेकर किसी को कोई भ्रम न था, लेकिन उसके लागू होने की तिथि को लेकर देश भर में विवाद था और आम लोगों के बीच ही नहीं, बल्कि अदालतों के निर्णयों में भी विरोधाभास रहा।
    चूंकि 2005 के संशोधन को उसी साल 9 सितंबर से लागू किया गया, इसलिए कुछ लोगों का तर्क था कि यह उन मामलों में लागू नहीं होगा, जिनमें संपत्ति के स्वामी की मृत्यु इसके पहले हो गई हो। अदालतों के फैसले भी अलग-अलग आ रहे थे। परस्पर विरोधी फैसलों के कारण इस विषय पर कानूनी असमंजस की स्थिति बनी हुई थी और इस अस्पष्टता को दूर करना जरूरी था। सुप्रीम कोर्ट की पूर्ण पीठ ने विनीता शर्मा बनाम राकेश शर्मा के मामले में सभी भ्रांतियों को दूर करते हुए न्यायिक रुख स्पष्ट कर दिया है। इसके माध्यम से यह साफ हो गया है कि हिंदू अविभक्त परिवार की संपत्ति में बेटियों को भी बेटों की तरह जन्मना और समांशी अधिकार हासिल है। उनके इस अधिकार पर इस बात का कोई असर नहीं पडे़गा कि उनका जन्म 2005 के संशोधन के पहले हुआ था। यदि पिता की मृत्यु 9 सितंबर, 2005 के पहले हुई हो, तब भी बेटियों के अधिकारों पर प्रतिकूल असर नहीं पड़ेगा। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी साफ कर दिया कि इस निर्णय के माध्यम से बेटियों के अधिकार को विस्तार दिया गया है। इसका किसी रिश्तेदार के अधिकार पर कोई असर नहीं पड़ता।
    पारंपरिक हिंदू विधि में बेटियों को समांशी नहीं माना जाता था, इसलिए उन्हें परिवार की संपत्ति में जन्मना अधिकार नहीं था। अपने संविधान के माध्यम से हमने ऐसे समाज की कल्पना ही नहीं, अपितु वादा भी किया, जिसमें पुरुष और महिला के बीच कोई भेदभाव नहीं हो। हिंदू विवाह, दत्तक ग्रहण तथा उत्तराधिकार के क्षेत्र में महिलाओं को पुरुषों के बराबर अधिकार दिया गया। पारंपरिक मिताक्षरा कानून में बेटी को पिंडदान करने का अधिकार नहीं था, इसलिए उसे न तो गोद लिया जा सकता था और न ही संपत्ति में अधिकार था। इन कानूनों ने नए युग का सूत्रपात किया। बेटियों को केवल अधिकार ही नहीं, अपितु उनके दायित्व को भी सुनिश्चित किया। इसका एक उदाहरण दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 है। इसके तहत अन्य बातों के अलावा बच्चों पर अपने माता-पिता के भरण-पोषण की जिम्मेदारी दी गई है। इसका अर्थ यह लगाया जाता रहा कि यह जिम्मेदारी केवल बेटों तक ही सीमित है। बेटियों को लोग इससे इसलिए मुक्त मानते थे, क्योंकि उन्हें दूसरे घर जाना होता है, पर सुप्रीम कोर्ट ने डॉ विजय मनोहर बनाम काशीराम राजाराम के निर्णय में 1987 में ही स्पष्ट कर दिया था कि केवल बेटे ही नहीं, अपितु बेटी भी और यहां तक कि शादीशुदा बेटी भी अपने माता-पिता का भरण-पोषण करने को बाध्य है।
    लैंगिक समानता के आदर्शों को पूरा करने के लिए हर स्तर पर कार्य हुआ है, जिससे बेटियां मजबूत हुई हैं। ऐसे में, उत्तराधिकार के मामले में बेटियों को कमतर रखना संविधान की प्रतिबद्धताओं के अनुरूप नहीं था। इसी कमी को दूर करने के लिए 2005 में हिंदू उत्तराधिकार कानून में संशोधन किया गया। न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा के अनुसार, यह देर से लिया गया सही निर्णय था, मगर इस कानून के लागू होने की तिथि के बारे में अस्पष्टता बनी हुई थी। ताजा निर्णय के माध्यम से भ्रम का वातावरण समाप्त हुआ है और लैंगिक समानता से जुड़ी भ्रांतियों का भी निवारण हुआ है।
    (ये लेखक के अपने विचार हैं) हरबंश दीक्षित, विधि विशेषज्ञ व सदस्य, उत्तर प्रदेश उच्चतर शिक्षा सेवा आयोग

     

    सम्पादकीय लेख / शौर्यपथ / भारत का एक प्रमुख आईटी हब माने जाने वाले बेमिसाल शहर बेंगलुरु में सद्भाव का प्रभावित होना न केवल चिंताजनक, बल्कि शर्मनाक भी है। सोशल मीडिया पर महज एक पोस्ट की वजह से भीड़ ऐसे भड़की कि तीन लोगों को अपनी जान देकर और 100 से ज्यादा लोगों को घायल होकर कीमत चुकानी पड़ी। इसके अलावा 110 से ज्यादा लोग गिरफ्तार किए गए हैं। हिंसक भीड़ को संभालने में 60 से अधिक पुलिस वाले घायल हुए हैं। सद्भावना से खिलवाड़ के कारण 200 से ज्यादा परिवारों पर सीधे असर पड़ा है और अपेक्षाकृत शांत रहने वाले बेंगलुरु के दामन पर एक दाग आ लगा है। पढ़े-लिखे समझे जाने वाले शहरों में भी अगर एक पोस्ट मात्र से अमन-चैन का माहौल खराब हो सकता है, तो इससे पता चलता है कि भारत में सतर्कता कितनी जरूरी है।
    पोस्ट करने वाला शख्स कांग्रेस विधायक का भतीजा बताया जा रहा है, हालांकि उसका कहना है कि उसने पोस्ट नहीं डाली, इसके बावजूद एहतियात बरतते हुए पुलिस ने उसे गिरफ्तार करके ठीक किया है। पूरे मामले की जांच होनी चाहिए कि आखिर पोस्ट किसने लिखी? इसके पीछे कोई साजिश तो नहीं है? सभ्य समाज के लोगों के साथ-साथ सरकार को भी सजग रहना चाहिए, नाना प्रकार के अनर्गल और गैर-कानूनी पोस्ट सोशल मीडिया पर चलती रहती हैं, जिनसे लोगों की भावनाएं आहत होती रहती हैं। कई बार लोग पोस्ट की आक्रामकता या हिंसा झेल लेते हैं, पर कई बार भावना भड़क उठती है। अत: अव्वल तो यह सुनिश्चित करना होगा कि किसी भी अवैध-हिंसक-दुर्भावनाओं से भरी पोस्ट को चलने ही न दिया जाए। अगर कोई ऐसी पोस्ट को आगे बढ़ाता है, तो उसे ऐसे दंडित करना चाहिए कि समाज के सामने एक नजीर बन जाए।
    दूसरी ओर, किसी भी तरह की हिंसा के लिए भीड़ जुटाने की बढ़ती गैर-कानूनी प्रवृत्ति की पड़ताल भी जरूरी है। एक लोकतांत्रिक देश में ऐसे भीड़-तंत्र को बढ़ाने के अपने खतरे हैं। पुलिस का खुफिया तंत्र मजबूत होना चाहिए, ताकि किसी भी तरह के आपराधिक मकसद या कानून हाथ में लेने के इरादे से कोई साजिश मुमकिन न हो। लोकतंत्र में भीड़ की इस भ्रांति पर अंकुश भी जरूरी है कि वह कुछ भी कर सकती है। दिल्ली में जो दंगे हुए थे, उसमें भी कदम-कदम पर दोनों समुदायों की ओर भीड़ की गलत भूमिका दिखी थी। बेंगलुरु में भी यही हुआ, भीड़ ने विधायक के घर, पुलिस वालों और थाने को निशाना बनाया। उपद्रवियों ने सुबह तक का इंतजार नहीं किया, रात ही ऐसे निकल चले कि गोलीबारी की नौबत आ गई। खुफिया एजेंसियों को यह देखना होगा कि बेंगलुरु में हुई इस हिंसा के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं थी। कर्नाटक के गृह मंत्री ने बिल्कुल सही कहा है, ‘तोड़फोड़ से किसी समस्या का समाधान नहीं हो सकता’। बेंगलुरु के डीजे हल्ली व केजी हल्ली पुलिस स्टेशन के अंतर्गत आने वाले इलाकों में कफ्र्यू लगा दिया गया है। किसी भी भीड़ को सड़क पर उतरने का मौका नहीं मिलना चाहिए। संयम बरतने के साथ ही, पुलिस साइबर सेल और आईटी कंपनियों को भी पूरी सावधानी बरतनी चाहिए कि सोशल मीडिया के किस भी मंच पर द्वेष-रोष भरे घात-प्रतिघात का नया सिलसिला न चले। साइबर वल्र्ड की गंदगी को वहीं पूरी चौकसी व कड़ाई से साफ करने की जरूरत है, ताकि वह किसी शहर में सड़क पर न नजर आए।

     

    मेलबॉक्स / शौर्यपथ / बुलंदशहर की छात्रा सुदीक्षा के साथ जो कुछ हुआ, वह शर्मनाक है। यह घटना बताती है कि देश में अब भी छेड़खानी और बलात्कार मानो सामान्य बात है। लेकिन दुख की बात यह है कि हम अब भी अपने जन-प्रतिनिधियों से कानून-व्यवस्था में सुधार लाने या लड़कियों की सुरक्षा आदि की मांग नहीं करते, बल्कि हमारे लिए जरूरी कुछ अन्य मुद्दे हैं। कहना गलत नहीं होगा कि कानूनी धाराओं के बेहतर क्रियान्वयन न हो पाने की वजह से ऐसे अपराध दिन-प्रतिदिन बढ़ रहे हैं। अगर पुलिस राह चलते छेड़खानी करने वाले शोहदों को सख्त धाराओं के तहत गिरफ्तार करे और सजा दिलाए, तो संभव है कि उनकी लड़कियों को छेड़ने की फिर कभी हिम्मत नहीं हो। मगर ऐसा हो, तब तो? कुछ दायित्व समाज को भी निभाने होंगे। हरेक माता-पिता को यह बात बचपन में ही अपनी संतान के मन में डालनी होगी कि उन्हें लड़कियों का सम्मान करना चाहिए, अपमान नहीं। अगर हम सब ऐसा कुछ कर सके, तो यकीनन किसी और प्रतिभाशाली सुदीक्षा को यूं अपनी जान नहीं गंवानी पड़ेगी।
    शिवानी गांधी
    बहराइच, उत्तर प्रदेश

    सबक हम लेते नहीं
    लगता है कि लोगों ने निर्भया कांड से सबक नहीं लिया है। तभी तो महिलाओं और बच्चियों के साथ दरिंदगी अनवरत जारी है। आए दिन अखबारों में प्रमुखता से छपने वाली ऐसी खबरें पीड़ा पहुंचाती हैं। सरकार ने कठोर कानून जरूर बनाए हैं, अपराधियों को सजा भी मिल रही है, लेकिन शैतान की हैवानियत जारी है। निर्भया के दरिंदों को जब फांसी दी गई थी, तब यह अनुमान लगाया गया था कि अब इस तरह की घटनाएं कम होंगी। मगर लगता है कि इससे कोई सबक नहीं लिया गया। सुदीक्षा के साथ हुई छेड़खानी इसका ताजा उदाहरण है। इन घटनाओं के अपराधी पकड़े भी जाते हैं, तो उन्हें सजा मिलने में इतना अधिक वक्त लग जाता है कि इंसाफ काफी पीछे छूट जाता है। ऐसे मामलों में तुरंत कार्रवाई और दोषियों को त्वरित सजा वक्त का तकाजा है।
    अमृतलाल मारू
    धार, मध्य प्रदेश

    सराहनीय काम
    बीते दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अंडमान-निकोबार द्वीप समूह में अच्छी इंटरनेट-सेवा मुहैया कराने के लिए ‘ऑप्टिकल फाइबर केबल’ की शुरुआत की। यह निश्चय ही लाभदायक और सराहनीय काम है। इससे अंडमान-निकोबार द्वीप की सुरक्षा में भी मदद मिलेगी और पर्यटन को भी खासा बढ़ावा मिलेगा। अब तक यहां आने वाले पर्यटक अच्छी इंटरनेट-सेवा की कमी महसूस करते रहे हैं। अब ऐसा नहीं हो सकेगा। यहां इंटरनेट की अच्छी सुविधा मिलने से ज्ञान-विज्ञान की शाखाएं भी खुल सकेंगी। इन सबसे डिजिटल इंडिया अभियान को विशेष गति मिलेगी।
    सोनू कुमार गोस्वामी, अररिया, बिहार

    डॉक्टरों से भेदभाव
    कोरोना मरीजों, डॉक्टरों, नर्सों आदि के साथ हमारे समाज में जैसा बर्ताव किया जा रहा है, उसका कारण मानव का स्वार्थी और असंवेदनशील होना है। सच तो यह है कि हमें निरंतर असंवेदनशीलता सिखाई जाती है। जन्म लेते ही बच्चा परिवार में स्व-केंद्रित होना सीखता है, इसलिए भविष्य में यह भूल जाता है कि समाज के प्रति भी उसके कुछ दायित्व हैं। इसका खामियाजा बच्चे के मां-बाप को भी भुगतना पड़ता है। कोरोना के संक्रमण-काल में लोगों का यह भेदभाव इसी का संकेत है। हालांकि, इसमें कुछ लोग अपवाद भी हैं, जिनसे ही यह धरती बेहतर ढंग से चल रही है। इन्हीं अपवादों में कोरोना वॉरियर्स हैं, जो अपनी जान की परवाह किए बिना संक्रमित लोगों का जीवन बचा रहे हैं। इसलिए उनके साथ किसी भी तरह का भेदभाव मानवता के खिलाफ है। हमें इससे बचना चाहिए।
    अभिषेक सिंह, जौनपुर

     

    ओपिनियन / शौर्यपथ / राजनीति में जितने काम जनता के सामने किए जाते हैं, उससे कहीं ज्यादा मेहनत परदे के पीछे की जाती है। अमेरिका का राष्ट्रपति चुनाव इसका अपवाद नहीं है। वहां भारतीय मूल की कमला हैरिस को डेमोक्रेटिक पार्टी ने उप-राष्ट्रपति पद का अपना उम्मीदवार बनाया है, जबकि राष्ट्रपति पद की उम्मीदवारी के दौरान अपना दावा पेश करते हुए वह जो बिडेन के खिलाफ आक्रामकता की हद तक मुखर हो चुकी हैं। जाहिर है, डेमोक्रेटिक पार्टी ने जो बिडेन और कमला हैरिस की जोड़ी चुनावी मैदान में उतारकर अमेरिकी मतदाताओं को एक साथ कई संदेश देने की कोशिश की है।
    अमेरिका में राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव नवंबर में होने जा रहे हैं। कमला हैरिस अधिक से अधिक भारतीय मतदाताओं को डमोके्रटिक उम्मीदवार जो बिडेन के पक्ष में लुभा सकती हैं। साल 2016 के चुनावी आंकड़ों के मुताबिक, वहां करीब 41 लाख भारतीय मूल के नागरिक हैं, जिनमें से लगभग 18 लाख मतदान के योग्य हैं। माना यही जाता है कि भारतीय मूल के मतदाता पारंपरिक तौर पर डेमोक्रेटिक पार्टी के पक्ष में अपना वोट गिराते रहे हैं, लेकिन व्हाइट हाउस में डोनाल्ड ट्रंप के प्रवेश के बाद से माहौल कुछ हद तक बदला है। अब कयास यह लगाया जाने लगा है कि डेमोक्रेटिक के ये पारंपरिक वोटर उससे छिटककर रिपब्लिकन पार्टी के पाले में जा सकते हैं। ‘हाउडी मोदी’ जैसे आयोजन के बाद इस फेरबदल के अनुमान में कहीं ज्यादा तेजी आई है।
    लिहाजा, ऐसे किसी उम्मीदवार को चुनावी मैदान में उतारने का दबाव डेमोक्रेटिक पर था, जो उसके पारंपरिक गढ़ को मजबूत करते हुए रिपब्लिकन की ‘सपोर्ट बेस’ में सेंध लगा सकें। कमला हैरिस का व्यक्तित्व इसमें पार्टी की मदद करता दिखता है। वह पुराने दिनों में एक चर्चित वकील रह चुकी हैं। सेक्स हिंसा के खिलाफ उनकी टिप्पणी काफी सुर्खियों में रही। बेशक आलोचकों की नजर में वह एक उलझी हुई दावेदार हैं, क्योंकि राष्ट्रपति पद के लिए अपना दावा पेश करते समय वह जिन ‘प्रगतिशील’ नीतियों की हिमायती दिखीं, उनमें से कई को वह वकालत के अपने शुरुआती वर्षों में खारिज कर चुकी हैं। बहरहाल, देर से ही सही, पर अश्वेतों के प्रति पुलिसिया अत्याचार के खिलाफ वह जिस तरह से मुखर हुईं, उससे भी उनकी एक सकारात्मक छवि बनी है। इसी तरह, स्वास्थ्य-सेवा में सुधार, बिना दस्तावेज के रह रहे आप्रवासियों को नागरिकता मुहैया कराने, बंदूकों की खुली बिक्री पर पाबंदी लगाने, तर्कसंगत कर सुधार जैसे मसलों पर भी वह खुलकर अपनी राय रखती रही हैं। इन सबसे उनका अपना एक मतदाता-वर्ग तैयार हुआ है।
    कमला हैरिस का मुखर होना भी उनके पक्ष में जाता है। राष्ट्रपति पद की उम्मीदवारी के वक्त जो बिडेन पर की गई उनकी टिप्पणी तो अब भी कई लोगों के जेहन में ताजा होगी। उन्होंने जो बिडेन को तब घेरा था, जब उनकी बिडेन के दिवंगत बेटे से खूब बनती थी। इससे यह धारणा बनी है कि कमला चुनाव में रिपब्लिकन उम्मीदवारों पर हमलावर होने में जो बिडेन की खासा मदद कर सकती हैं। जो बिडेन ने उनकी दावेदारी पेश करते हुए कहा भी कि काम करने के तरीके पर हमारे आपसी मतभेद हो सकते हैं, लेकिन रणनीति पर नहीं।
    मगर हमारे लिए अहमियत यह रखती है कि भारत के प्रति वह क्या सोचती हैं? अभी तक यह साफ-साफ नहीं कहा जा सकता कि वह नई दिल्ली से कितनी करीब हैं, लेकिन डेमोक्रेटिक पार्टी को भारत का हितैषी माना जाता है। चूंकि जो बिडेन पहले ही यह स्पष्ट कर चुके हैं कि राष्ट्रपति बनने के बाद उनकी प्राथमिकता में भारत शीर्ष पर होगा, इसलिए यह उम्मीद की जा सकती है कि कमला हैरिस नई दिल्ली और वाशिंगटन की मित्रता को एक नए मुकाम पर पहुंचाने में मददगार साबित हो सकेंगी। बेशक डोनाल्ड ट्रंंप के अब तक के कार्यकाल में भारत और अमेरिका के रिश्ते आगे बढ़े हैं, लेकिन एच1-बी वीजा पर उनका सख्त रुख नई दिल्ली के मुफीद नहीं माना गया, जबकि जो बिडेन यह एलान कर चुके हैं कि अगर वह राष्ट्रपति के रूप में चुने गए, तो इस वीजा पर लगी पाबंदी हटा ली जाएगी।
    कमला अमेरिकी समाज में गहरा रहे विभाजन को थामने में भी सहायक हो सकेंगी। वह अश्वेत डोनाल्ड हैरिस और श्यामला गोपालन की संतान हैं। अमेरिका में, और खासतौर से अश्वेतों में जिस तरह से बेरोजगारी बढ़ी है, उससे रिपब्लिकन सरकार के प्रति उनमें नाराजगी तेज हुई है। रही-सही कसर कोरोना महामारी ने पूरी कर दी है। कोविड-19 से जान-माल की भारी कीमत चुका रहे अमेरिका में अश्वेत इस बीमारी से बुरी तरह प्रभावित हुए हैं। और माना जाता है कि श्वेतों-अश्वेतों के बीच का सामाजिक भेद इसकी एक बड़ी वजह है। कमला हैरिस को चुनाव मैदान में उतारकर डेमोक्रेटिक पार्टी अमेरिकी समाज को एकजुट करने का संकेत दे रही है। अगर ऐसा होता है, तो यकीनन यह भारत के हित में भी होगा। वहां जिस तरह से भारतीय मूल के आप्रवासियों की आमद बढ़ी है, उसके कारण से भारत सरकार पर यह दबाव भी बढ़ा है कि भारतीय अनिवासी वहां किसी तरह के भेदभाव का शिकार न बनें।
    बहरहाल, कमला हैरिस असल अर्थों में भारत के लिए कितनी सहायक हो सकेंगी, इसका जवाब तो भविष्य के गर्भ में है, लेकिन इसका अनुमान चुनावी अभियान में पार्टी द्वारा उठाए जाने वाले मुद्दों से जरूर लगाया जा सकेगा। कश्मीर-विवाद, पाकिस्तान में जड़ जमा चुके आतंकवाद, चीन की विस्तारवादी नीति, मध्य एशिया में बढ़ता तनाव जैसे मसलों को लेकर पार्टी की रणनीति का खुलासा चुनावी मैदान में हो सकता है। फिर, परमाणु मसलों पर भी डेमोक्रेटिक पार्टी का रुख भारत के खिलाफ रहा है। ऐसे में, यह देखना होगा कि पार्टी अब इस बारे में क्या सोचती है? सही-सही जवाब के लिए अभी हमें कुछ इंतजार करना होगा, मगर इतना तो तय है कि कमला हैरिस का दांव खेलकर डेमोक्रेटिक ने वहां की चुनावी बिसात को बदल दिया है।
    (ये लेखक के अपने विचार हैं) शशांक, पूर्व विदेश सचिव

     

    // नवाचार के माध्यम से बच्चों को शिक्षा जोड़ने के लिए किए जा रहे प्रयास सराहनीय: मंत्री डॉ. प्रेमसाय सिंह टेकाम
    // जशपुर जिले की समीक्षा बैठक में दिए निर्माणाधीन कार्यों को तेजी से पूर्ण करने के निर्देश

    जशपुर / शौर्यपथ / छत्तीसगढ़ के नगर पालिका क्षेत्र जशपुर में नवाचार करते हुए सोशल डिस्टेंश के साथ केबल टीव्ही के द्वारा 1100 घरों के लगभग 2200 बच्चों को शिक्षा से जोड़ा गया है। नगर पालिका क्षेत्र के 2600 घरों में केबल कनेक्शन का उपयोग किया जा रहा है। इससे यहां के 6000 बच्चों को नवाचार माध्यम से शिक्षा प्रदान की जाएगी। स्कूल शिक्षा मंत्री डॉ. प्रेमसाय सिंह टेकाम को यह जानकारी आज जिला मुख्यालय जशपुर के कलेक्टोरेट सभाकक्ष में आयोजित समीक्षा बैठक में दी गई। डॉ. टेकाम ने बच्चों को शिक्षा देने के लिए किए जा रहे नवाचारों की सराहना करते हुए इसे अन्य विकासखंडो में भी संचालित करने के निर्देश दिए। डॉ. टेकाम आज उन्होंने आदिमजाति विभाग द्वारा निर्माणाधीन भवनों को शीघ्र पूर्ण करने और वन अधिकार प्राप्त पट्टों के हितग्राहियों को भूमि में लाख की खेती करने के लिए प्रोत्साहित करने के भी निर्देश दिए।
    मंत्री डॉ. टेकाम को स्कूल शिक्षा विभाग के अधिकारियों ने बताया कि कोई भी बच्चा कोरोना महामारी के दौरान अपनी शिक्षा से वंचित न हो, इसके लिए जिले में बच्चों को शिक्षा से जोड़ने एवं उनकी नियमित पढ़ाई जारी रखने के लिए जिला प्रशासन के सहयोग से विभिन्न माध्यम, केबल टी.व्ही., मोटर सायकिल गुरूजी, मोहल्ला क्लास, लाउडस्पीकर शिक्षा तथा राज्य शासन की पढ़ई तुहर दुआर योजना के तहत् वर्चुअल कक्षा का संचालन किया जा रहा है। मोटर सायकिल गुरूजी के माध्यम से शिक्षक गांव-गांव पहुंचकर मोटरसायकल पर ही बोर्ड रखकर किसी सुरक्षित स्थान पर निश्चित संख्या में बच्चों की कक्षाएं संचालित कर रहे हैं। बगीचा विकासखंड में भी पहाड़ी कोरवा परिवार के बच्चों को गिटार, हारमोनियम एवं अन्य वाद्य यंत्र का भी उपयोग कर शिक्षा दी जा रही है।
    मंत्री टेकाम ने आदिम जाति विकास विभाग की समीक्षा करते हुए छात्र-छात्राओं के लिए निर्मित किए जा रहे समस्त आश्रम-छात्रावास भवनों एवं अन्य निर्माण कार्य को जल्द से जल्द पूर्ण कराने के निर्देश दिए। पोस्ट-मैट्रिक एवं प्री मैट्रिक छात्रवृत्ति योजना के संबंध में बच्चों के खातों को बैंक से पुष्टि कराकर छात्र-छात्राओं के खातों में सीधे छात्रवृत्ति प्रदान करने की बात कही। उन्होंने अल्पसंख्यक एवं अंतर्राज्यीय छात्रवृत्ति का भी समय पर भुगतान करने, वन अधिकार मान्यता पत्र के संबंध में पात्र हितग्राहियों की जांच कराकर उन्हें योजना से लाभांवित करने के निर्देश दिए। डॉ. टेकाम ने कहा कि जिन हितग्राही को वन अधिकार पत्र प्राप्त हो गया है उनकी आय बढ़ाने के लिए लाख की खेती करने के लिए प्रोत्साहित किया जाए। उन्होंने सरगुजा विकास प्राधिकरण एवं मध्य क्षेत्र विकास प्राधिकरण के तहत् स्वीकृत कार्यों को समय-सीमा में पूर्ण कराने के निर्देश दिए।
    मंत्री डॉ. टेकाम ने खाद-बीज, ऋण वितरण, धान उठाव, चबुतरा निर्माण, गोधन न्याय योजना की समीक्षा करते हुए सोसायटी के लिए स्थान का चिन्हांकन कर चबुतरा निर्माण कार्य शीघता से पूर्ण करने के निर्देश दिए। सहकारिता विभाग के अधिकारी ने बताया कि जिले में 8907 किसानों को 7776 मीट्रिक टन खाद का वितरण कर दिया गया है। 11,123 क्विंटल धान बीज का वितरण किया गया है। जिले में खरीफ फसल के लिए 20 करोड़ 21 लाख 67 हजार ऋण वितरण वितरण किया गया है। उन्होंने बताया कि सहकारी समितियों से धान उठाव का कार्य पूर्ण कर लिया गया है। उन्होंने बताया कि जिले में वर्तमान में 17 सोसायटी संचालित है और 7 नए सोसायटी के प्रस्ताव भेजे गए हैं। गोधन न्याय योजना के तहत् ग्रामीण क्षेत्रों के 64 गौठान एवं 5 नगरीय क्षेत्र में 5 अगस्त तक 849 क्विंटल गोबर खरीदी की गई जिसके एवज में हितग्राहियो ंको 1 लाख 69 हजार का भुगतान उनके खाते में किया गया है।
    बैठक में जशपुर विधायक विनय भगत, माध्यमिक शिक्षा मंडल बोर्ड के सदस्य पवन अग्रवाल, कलेक्टर महादेव कावरे, पुलिस अधीक्षक बालाजी राव, जिला पंचायत सीईओ के.एस. मण्डावी सहित अन्य विभागों के जिला अधिकारी उपस्थित थे।

    लाइफस्टाइल / शौर्यपथ / एक शोध की मानें तो बगैर लक्षण वाले मरीजों की भूमिका कोरोना पर नियंत्रण पाने में मददगार हो सकती है। ऐसे मरीजों की उच्च दर समाज के लिए अच्छी बात है। दुनिया भर में कोरोना वायरस से संक्रमित ऐसे मरीज बड़ी संख्या में हैं, जिनमें इस बीमारी के कोई भी लक्षण नजर नहीं आ रहे हैं।

    हॉपकिंस विश्वविद्यालय के अनुसार, पिछले सात महीनों में कोविड-19 जैसी महामारी ने विश्व स्तर पर दो करोड़ से अधिक लोगों को संक्रमित किया है, जबकि सात लाख से अधिक लोगों की इस वासरस से मौत हो चुकी है। सैन फ्रांसिस्को में कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय में एक संक्रामक रोग विशेषज्ञ मोनिका गांधी द्वारा हाल ही में एक शोध किया गया।

    उन्होंने अपने इस अध्ययन में यह खुलासा किया कि एसिम्प्टोमैटिक यानी बगैर लक्षण वाले मरीज कोविड-19 के खात्मे में एक अहम भूमिका निभा सकते हैं। उन्होंने कहा कि कोरोना वायरस के बगैर लक्षण वाले मरीजों की उच्च दर अच्छी बात है। यह निजी तौर पर और समाज के लिए एक अच्छा संकेत है।

    जर्नल ऑफ इंटरनल मेडिसिन में इस महीने प्रकाशित एक लेख में मोनिका गांधी ने बताया कि महामारी की शुरुआत में जब लोगों ने मास्क पहनना शुरू नहीं किया था, तब 15 फीसदी लोग एसिम्प्टोमैटिक(बगैर लक्षण वाले) थे, लेकिन बाद में जब लोगों ने मास्क पहनना शुरू किया तो आंकड़ा बढ़ गया। इसके 40 से 45 फीसदी लोग बगैर लक्षण वाले हो गए।

    कोरोना पर जारी रिसर्च के बीच यह भी सामने आया है कि इसका असर बच्चों पर कम है। ज्यादातर मरीजों में या तो कोई लक्षण नहीं है या फिर सामान्य लक्षण हैं। अमेरिका की शोधकर्ता मोनिका के मुताबिक दुनिया में अब 40 फीसदी कोरोना मरीज बगैर लक्षण वाले हैं, जिन्हें उम्मीद की किरण के रूप में देखा जा सकता है।

    फिलहाल यह भी पता लगाया जा रहा है कि उम्र और शरीर के जीन भी क्या यह तय करते हैं कि वायरस कितना हमला करेगा। यह भी देखा जा रहा है कि क्या मास्क लगाने की वजह से ही लोगों में मामूली या बिना लक्षण वाला कोरोना हो रहा है।

     

    सेहत / शौर्यपथ / भारतीय मूल के एक शोधकर्ता सहित वैज्ञानिकों के दल ने एक अध्ययन में दावा किया है कि एन-95 मास्क को 50 मिनट तक इलेक्ट्रिक कुकर में बिना पानी गर्म कर रोगाणु मुक्त किया जा सकता है और इससे मास्क की वायरस से बचाव करने की क्षमता में भी कोई कमी नहीं आती है।

    इनवायरमेंटल साइंस ऐंड टेक्नोलॉजी लेटर नामक जर्नल में प्रकाशित शोध के नतीजों के मुताबिक सीमित आपूर्ति होने पर मास्क को सुरक्षित तरीके से बार-बार इस्तेमाल किया जा सकता है जबकि मौजूदा समय में इनका एक बार ही इस्तेमाल किया जाता है।

    हवा में मौजूद वायरस से युक्त वाष्प की बूंदों और कण से बचाव के लिए एन-95 मास्क सबसे प्रभावी है। इन्हीं से कोविड-19 होने का खतरा होता है। अमेरिका स्थित यूनिवर्सिटी ऑफ इलिनॉय अर्बारना-शैम्पेन में प्रोफेसर थान्ह न्गुयेन ने कहा, 'Ó कपड़े का मास्क या सर्जिकल मास्क पहनने वाले के मुंह से निकलने वाली बूंदों से अन्य लोगों का बचाव करता है लेकिन एन-95 मास्क उन बूंदों को फिल्टर कर पहनने वाले को बचाता है, जिसमें वायरस हो सकते हैं।

    इलिनॉय विश्वविद्यालय के प्रोफेसर विशाल वर्मा ने कहा, 'Ó रोगाणु मुक्त करने के कई अलग-अलग तरीके हैं लेकिन अधिकतर में एन-95 मास्क के विषाणु युक्त वाष्प कणों को छानने की क्षमता नष्ट हो जाती है। उन्होंने कहा, 'Ó रोगाणु मुक्त करने की किसी भी प्रक्रिया में मास्क को पूरी सतह को संक्रमण मुक्त करने की जरूरत होती है लेकिन साथ ही यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि उसके फिल्टर करने की क्षमता बनी रहे और इसे पहनने वाले के लिए सुरक्षित रहे। अन्यथा इससे सही सुरक्षा नहीं होगी।

    शोधकर्ताओं ने इलेक्ट्रिक कुकर पद्धति में मास्क को रोगाणु मुक्त करने की संभावना देखी जो स्वास्थ्य कर्मियों के लिए लाभदायक हो सकती है, खासतौर पर छोटे क्लीनिक और अस्पतालों के लिए जहां पर ऊष्मा आधारित रोगाणु मुक्त करने के बड़े उपकरण मौजूद नहीं है।

    शोधकर्ताओं ने ऐसी पद्धति की परिकल्पना की जो तीनों मानकों- रोगाणुमुक्त, फिल्ट्रेशन (छानने की क्षमता), फिट (इस्तेमाल करने योग्य)- को बिना किसी विशेष प्रक्रिया अथवा रसायन को छोड़े पूरा करे। वह ऐसी पद्धति की खोज करना चाहते थे जिसका इस्तेमाल लोग अपने घर में कर सकें। इसके मद्देनजर शोध दल ने इलेक्ट्रिक कुकर को लेकर परीक्षण किया, जो लोगों के रसोई घर में उपलब्ध रहता है।

    शोधकर्ताओं ने इसकी पुष्टि की कि कुकर में 50 मिनट तक 100 डिग्री सेल्सियस पर मास्क को गर्म करने से कोरोना वायरस सहित चार तरह के वायरस नष्ट हो जाते हैं। यह पैराबैंगनी रोशनी से रोगाणु मुक्त करने की पद्धति से भी अधिक प्रभावी है।

    वर्मा ने बताया, 'Óएयरोसोल (हवा में मौजूद वाष्प कण) जांच प्रयोगशाला में चैम्बर बनाया और उसमें एन-95 मास्क से गुजरने वाले कणों की गणना की। हमने पाया कि 20 बार इलेक्ट्रिक कुकर में रोगाणु मुक्त करने की प्रक्रिया किए जाने के बावजूद मास्क ठीक से काम कर रहा था। शोधकर्ताओं ने कहा कि मास्क को बिना पानी कुकर में गर्म किया जाना चाहिए न कि पानी में। कुकर के तल पर एक छोटी तौलिया रखनी चाहिए ताकि मास्क सीधे गर्म धातु के संपर्क में नहीं आए।

     

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