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धर्म संसार / शौर्यपथ / यह माना जाता है की इस मंदिर का निर्माण करीबन 700 साल पहले पंडित श्रीधर द्वारा हुआ था, जो एक ब्राह्मण पुजारी थे जिन्हें
मां के प्रति सच्ची श्रद्धा भक्ति थी जबकि वह गरीब थे। उनका सपना था कि वह एक दिन भंडारा (व्यक्तियों के समूह के लिए भोजन की आपूर्ति) करें, मां वैष्णो देवी को समर्पित भंडारे के लिए एक शुभ दिन तय किया गया और श्रीधर ने आस पास के सभी गांव वालो को प्रसाद ग्रहण करने का न्योता दिया।
भंडारे वाले दिन पुन: श्रीधर अनुरोध करते हुए सभी के घर बारी-बारी गए ताकि उन्हें खाना बनाने की सामग्री मिले और वह खाना बना कर मेहमानों को भंडारे वाले दिन खिला सके।
जितने लोगों ने उनकी मदद की वह काफी नहीं थी क्योंकि मेहमान बहुत ज्यादा थे। जैसे-जैसे भंडार का दिन नजदीक आता जा रहा था, पंडित श्रीधर की मुसीबतें भी बढ़ती जा रही थी। वह सोच रहे थे इतने कम सामान के साथ भंडारा कैसे होगा। भंडारे के एक दिन पहले श्रीधर एक पल के लिए भी सो नहीं पा रहे थे यह सोचकर की वह मेहमानों को भोजन कैसे करा सकेंगे,इतनी कम सामग्री और इतनी कम जगह.. दोनों ही समस्या थी।
वह सुबह तक समस्याओं से घिरे हुए थे और बस उसे अब देवी मां से ही आस थी। वह अपनी झोपड़ी के बाहर पूजा के लिए बैठ गए,दोपहर तक मेहमान आना शुरू हो गए थे श्रीधर को पूजा करते देख वे जहां जगह दिखी वहां बैठ गए। सभी लोग श्रीधर की छोटी से कुटिया में आसानी से बैठ गए और अभी भी काफी जगह बाकी थी।
श्रीधर ने अपनी आंखें खोली और सोचा की इन सभी को भोजन कैसे कराएंगे, तब उसने एक छोटी लड़की को झोपडी से बाहर आते हुए देखा जिसका नाम वैष्णवी था। वह भगवान की कृपा से आई थी, वह सभी को स्वादिष्ट भोजन परोस रही थी, भंडारा बहुत अच्छी तरह से संपन्न हो गया था।
भंडारे के बाद, श्रीधर उस छोटी लड़ी वैष्णवी के बारे में जानने के लिए उत्सुक थे, पर वैष्णवी गायब हो गई और उसके बाद किसी को नहीं दिखी। बहुत दिनों के बाद श्रीधर को उस छोटी लड़की का सपना आया उसमें स्पष्ट हुआ कि वह मां वैष्णो देवी थी। माता रानी के रूप में आई लड़की ने उसे सनसनी गुफा के बारे बताया और चार बेटों के वरदान के साथ उसे आशीर्वाद दिया।
श्रीधर एक बार फिर खुश हो गए और मां की गुफा की तलाश में निकल पड़े, जब उन्हें वह गुफा मिली तो उसने तय किया की वह अपना सारा जीवन मां की सेवा करेंगे। जल्द ही पवित्र गुफा प्रसिद्ध हो गई और भक्त झुंड में मां के प्रति आस्था प्रकट करने आने लगे।
आज इस वैष्णो देवी के मंदिर में पुरे भारत वर्ष से भक्त आते हैं। माता रानी का यह असीम ऊर्जावान केंद्र है।
वैष्णो देवी गुफा मंदिर का इतिहास और पौराणिक कथा
वैष्णो देवी का विश्व प्रसिद्ध और प्राचीन मंदिर भारतीय राज्य जम्मू और कश्मीर के जम्मू क्षेत्र में कटरा नगर के समीप की पहाडिय़ों पर स्थित है। इन पहाडिय़ों को त्रिकुटा पहाड़ी कहते हैं। यहीं पर लगभग 5,200 फीट की ऊंचाई पर स्थित है मातारानी का मंदिर। यह भारत में तिरूमला वेंकटेश्वर मंदिर के बाद दूसरा सर्वाधिक देखा जाने वाला धार्मिक तीर्थ स्थल है।
भवन वह स्थान है जहां माता ने भैरवनाथ का वध किया था। प्राचीन गुफा के समक्ष भैरो का शरीर मौजूद है और उसका सिर उड़कर तीन किलोमीटर दूर भैरो घाटी में चला गया और शरीर यहां रह गया। जिस स्थान पर सिर गिरा, आज उस स्थान को 'भैरोनाथ के मंदिरÓ के नाम से जाना जाता है। कटरा से ही वैष्णो देवी की पैदल चढ़ाई शुरू होती है जो भवन तक करीब 13 किलोमीटर और भैरो मंदिर तक 14.5 किलोमीटर है।
मंदिर की पौराणिक कथा :मंदिर के संबंध में कई तरह की कथाएं प्रचलित हैं। एक बार त्रिकुटा की पहाड़ी पर एक सुंदर कन्या को देखकर भैरवनाथ उससे पकडऩे के लिए दौड़े। तब वह कन्या वायु रूप में बदलकर त्रिकूटा पर्वत की ओर उड़ चलीं। भैरवनाथ भी उनके पीछे भागे। माना जाता है कि तभी मां की रक्षा के लिए वहां पवनपुत्र हनुमान पहुंच गए। हनुमानजी को प्यास लगने पर माता ने उनके आग्रह पर धनुष से पहाड़ पर बाण चलाकर एक जलधारा निकाली और उस जल में अपने केश धोए। फिर वहीं एक गुफा में गुफा में प्रवेश कर माता ने नौ माह तक तपस्या की। हनुमानजी ने पहरा दिया।
फिर भैरव नाथ वहां आ धमके। उस दौरान एक साधु ने भैरवनाथ से कहा कि तू जिसे एक कन्या समझ रहा है, वह आदिशक्ति जगदम्बा है, इसलिए उस महाशक्ति का पीछा छोड़ दे। भैरवनाथ ने साधु की बात नहीं मानी। तब माता गुफा की दूसरी ओर से मार्ग बनाकर बाहर निकल गईं। यह गुफा आज भी अद्र्धकुमारी या आदिकुमारी या गर्भजून के नाम से प्रसिद्ध है। अद्र्धकुमारी के पहले माता की चरण पादुका भी है। यह वह स्थान है, जहां माता ने भागते-भागते मुड़कर भैरवनाथ को देखा था।
अंत में गुफा से बाहर निकल कर कन्या ने देवी का रूप धारण किया और भैरवनाथ वापस जाने का कह कर फिर से गुफा में चली गईं, लेकिन भैरवनाथ नहीं माना और गुफा में प्रवेश करने लगा। यह देखकर माता की गुफा कर पहरा दे रहे हनुमानजी ने उसे युद्ध के लिए ललकार और दोनों का युद्ध हुआ। युद्ध का कोई अंत नहीं देखकर माता वैष्णवी ने महाकाली का रूप लेकर भैरवनाथ का वध कर दिया।
मंदिर की कथा : उपरोक्त कथा को वैष्णो देवी के भक्त श्रीधर से जोड़कर भी देखा जाता है। 700 वर्ष से भी अधिक समय पहले कटरा से कुछ दूरी पर स्थित हंसाली गांव में मां वैष्णवी के परम भक्त श्रीधर रहते थे। वे नि:संतान और गरीब थे। लेकिन वे सोचा करते थे कि एक दिन वे माता का भंडारा रखेंगे। एक दिन श्रीधर ने आस-पास के सभी गांव वालों को प्रसाद ग्रहण करने का न्योता दिया और भंडारे वाले दिन श्रीधर अनुरोध करते हुए सभी के घर बारी-बारी गए ताकि उन्हें खाना बनाने की सामग्री मिले और वह खाना बनाकर मेहमानों को भंडारे वाले दिन खिला सके। जितने लोगों ने उनकी मदद की वह काफी नहीं थी क्योंकि मेहमान बहुत ज्यादा थे।
वह सोच रहे थे इतने कम सामान के साथ भंडारा कैसे होगा। भंडारे के एक दिन पहले श्रीधर एक पल के लिए भी सो नहीं पा रहे थे यह सोचकर की वह मेहमानों को भोजन कैसे करा सकेंगे। वह सुबह तक समस्याओं से घिरे हुए थे और बस उसे अब देवी मां से ही आस थी। वह अपनी झोपड़ी के बाहर पूजा के लिए बैठ गए, दोपहर तक मेहमान आना शुरू हो गए थे, श्रीधर को पूजा करते देख वे जहां जगह दिखी वहां बैठ गए। सभी लोग श्रीधर की छोटी-सी कुटिया में आसानी से बैठ गए।
श्रीधर ने अपनी आंखें खोली और सोचा की इन सभी को भोजन कैसे कराएंगे, तब उसने एक छोटी लड़की को झोपडी से बाहर आते हुए देखा जिसका नाम वैष्णवी था। वह भगवान की कृपा से आई थी, वह सभी को स्वादिष्ट भोजन परोस रही थी, भंडारा बहुत अच्छी तरह से संपन्न हो गया था। भंडारे के बाद, श्रीधर उस छोटी लड़ी वैष्णवी के बारे में जानने के लिए उत्सुक थे, पर वैष्णवी गायब हो गई और उसके बाद किसी को नहीं दिखी। बहुत दिनों के बाद श्रीधर को उस छोटी लड़की का सपना आया उसमें स्पष्ट हुआ कि वह मां वैष्णोदेवी थी। माता रानी के रूप में आई लड़की ने उसे गुफा के बारे बताया और चार बेटों के वरदान के साथ उसे आशीर्वाद दिया। श्रीधर एक बार फिर खुश हो गए और मां की गुफा की तलाश में निकल पड़े और कुछ दिनों बाद उन्हें वह गुफा मिल गई। तभी से वहां पर माता के दर्शन के लिए श्रद्धालु जाने लगे।
मंदिर की कथा : उपरोक्त कथा को वैष्णो देवी के भक्त श्रीधर से जोड़कर भी देखा जाता है। 700 वर्ष से भी अधिक समय पहले कटरा से कुछ दूरी पर स्थित हंसाली गांव में मां वैष्णवी के परम भक्त श्रीधर रहते थे। वे नि:संतान और गरीब थे। लेकिन वे सोचा करते थे कि एक दिन वे माता का भंडारा रखेंगे। एक दिन श्रीधर ने आस-पास के सभी गांव वालों को प्रसाद ग्रहण करने का न्योता दिया और भंडारे वाले दिन श्रीधर अनुरोध करते हुए सभी के घर बारी-बारी गए ताकि उन्हें खाना बनाने की सामग्री मिले और वह खाना बनाकर मेहमानों को भंडारे वाले दिन खिला सके। जितने लोगों ने उनकी मदद की वह काफी नहीं थी क्योंकि मेहमान बहुत ज्यादा थे।
वह सोच रहे थे इतने कम सामान के साथ भंडारा कैसे होगा। भंडारे के एक दिन पहले श्रीधर एक पल के लिए भी सो नहीं पा रहे थे यह सोचकर की वह मेहमानों को भोजन कैसे करा सकेंगे। वह सुबह तक समस्याओं से घिरे हुए थे और बस उसे अब देवी मां से ही आस थी। वह अपनी झोपड़ी के बाहर पूजा के लिए बैठ गए, दोपहर तक मेहमान आना शुरू हो गए थे, श्रीधर को पूजा करते देख वे जहां जगह दिखी वहां बैठ गए। सभी लोग श्रीधर की छोटी-सी कुटिया में आसानी से बैठ गए।
श्रीधर ने अपनी आंखें खोली और सोचा की इन सभी को भोजन कैसे कराएंगे, तब उसने एक छोटी लड़की को झोपडी से बाहर आते हुए देखा जिसका नाम वैष्णवी था।
वह भगवान की कृपा से आई थी, वह सभी को स्वादिष्ट भोजन परोस रही थी, भंडारा बहुत अच्छी तरह से संपन्न हो गया था। भंडारे के बाद, श्रीधर उस छोटी लड़ी वैष्णवी के बारे में जानने के लिए उत्सुक थे, पर वैष्णवी गायब हो गई और उसके बाद किसी को नहीं दिखी। बहुत दिनों के बाद श्रीधर को उस छोटी लड़की का सपना आया उसमें स्पष्ट हुआ कि वह मां वैष्णोदेवी थी। माता रानी के रूप में आई लड़की ने उसे गुफा के बारे बताया और चार बेटों के वरदान के साथ उसे आशीर्वाद दिया। श्रीधर एक बार फिर खुश हो गए और मां की गुफा की तलाश में निकल पड़े और कुछ दिनों बाद उन्हें वह गुफा मिल गई। तभी से वहां पर माता के दर्शन के लिए श्रद्धालु जाने लगे।
मेरी कहानी / शौर्यपथ /हर पल ऐसा लगता था कि सामने एक विशाल पहाड़ है। उसे हटाने के लिए धक्का मारो, तो वह और आगे बढ़ आता है। क्या इस पहाड़ में कहीं कोई गलियारा या खिड़की है, जहां से पार हो जाएं? पहाड़ के सामने रोने का कोई अर्थ नहीं था, लगता था कि वह भी जवाबी रुलाई से चिढ़ा रहा है। उस लड़के को उस शाम उम्मीद थी कि सामने खडे़ पहाड़ में एक खिड़की खुलेगी। वैसे यह उम्मीद तो दिन-रात साथ रहती थी, लेकिन उस दिन कुछ ज्यादा ही दिल से आ लगी थी। लगता था कि अब टीचर आने ही वाली हैं। टीचर के आते ही इस निष्ठुर पहाड़ में एक खिड़की खुलेगी, जहां से जिंदगी का एक नया आसमान नजर आएगा। टीचर ने कहा था कि ‘तैयार रहना, आज शाम आऊंगी, नाटक दिखाने ले जाऊंगी। तुम्हारा असली नाटक देखना जरूरी है’।
क्या ऐसे लोग होते हैं, जो अनजान से लड़के को भी नाटक दिखाने ले जाएं? जो अनजान से किसी लड़के के भले की सोचें? ऐसी भी टीचर होती हैं क्या, जो अपने पैसे और समय खर्च करके अपने एक अदने से छात्र को नाटक दिखाने ले जाएं? टीचर ने आने का तो कहा है, लेकिन अगर नहीं आईं, तो क्या होगा? फिर तो सामने पहाड़ ज्यों का त्यों रह जाएगा और उसके साथ एक इंतजार भी।
पिता डेविड अक्सर कहते रहते हैं कि किसी से उम्मीद मत रखना? तुम जैसे दुनिया के सबसे बदसूरत लड़के को कोई उम्मीद रखनी भी नहीं चाहिए। पिता सौतेले थे, अपने सौतेले बेटे को नीचा दिखाने का कोई मौका हाथ से नहीं जाने देते थे। कोई छोटी कमी भी दिख जाती, तो सौतेले पिता नीचा दिखाने की बड़ी गुंजाइश निकाल लेते थे। टीचर आने वाली थीं, कायदे से पिता और मां को बता देना चाहिए था, लेकिन भय के मारे हिम्मत ही नहीं पड़ी। वैसे भी जवाब तय था, तो वह लड़का पूछकर क्यों मुसीबत मोल लेता? चर्च से जुड़े उसके परिवार में नाटक देखने को बुरा माना जाता था। चुपचाप वह समय से पहले तैयार होकर घर में ही दुबक गया। टीचर किसी भी समय आ सकती थीं, उनकी राह पर लड़के की पलकें बिछी हुई थीं। डरा हुआ गमगीन मन पुकार रहा था, ‘टीचर, आ जाओ। मुझे बाहर ले चलो। मैं कब से तैयार हूं’।
पल-पल भारी पड़ते इंतजार के बाद टीचर दिखाई पड़ने लगीं। खुशी से मन उछल पड़ा, ‘थैंक्यू टीचर’। टीचर कुछ ही पल में पिता-मां के सामने आ खड़ी हुईं, यथोचित अभिवादन के बाद कहा,‘जेम्स कहां है? मैं उसे साथ ले जाने आई हूं।’
पिता स्तब्ध थे कि एक संभ्रांत महिला उनके सबसे बदसूरत बेटे के लिए आई है? टीचर ने बताया, ‘आपको पता है? आपका बेटा कमाल का लिखता है। पिछले दिनों एक नाटक लिखा, जो स्कूल में खेला गया, सबने पसंद किया। मुझे लगता है, उसे सही दिशा दी जाए, मैं उसे नाटक दिखाने ले जाऊंगी। वहां जाएगा, तो सीखेगा कि रंगमंच की दुनिया में क्या चल रहा है?’
उस लड़के जेम्स ने गौर किया, पिता का चेहरा सूख गया था। वह भौचक्क थे कि नामुराद लड़के ने नाटक लिखा है और खुश होकर टीचर खुद आई हैं। अब इसके साथ नाटक देखने जाएंगी? मां भी अचंभित थीं, लेकिन थोड़ी खुश भी थीं। आखिर क्या गलत है? टीचर ही तो हैं, ले जा रही हैं अपने साथ, नाटक दिखाकर छोड़ जाएंगी। लेकिन पिता का मन नहीं मान रहा था कि ऐसा भी हो सकता है। पिता इनकार की कोशिश करना चाहते थे। मचल रहे थे। उन्हें पहले से ही आशंका थी कि शिक्षा लड़के को बिगाड़ देगी, जमाने की हवा लग जाएगी और कहीं उनकी नजर में नाकारा लड़का सफल हो गया, तो उनके अपशब्दों व बुरी भविष्यवाणियों का क्या होगा? और कोई होता, तो तत्काल मना कर देते, पर सामने गोरी चमड़ी वाली टीचर थीं, तो हिम्मत पस्त हो गई। मन मारकर झल्लाते हुए पिता ने मुंह फेर लिया और मां ने कहा, ‘आप जेम्स को ले जाइए?’
और तब जेम्स बाल्डविन (1924-1987) अपनी टीचर के साथ चल पड़े, यह एक लेखक के रूप में उनकी जीवन यात्रा की नई शुरुआत थी। मन में बैठी यह धारणा ढेर हो चुकी थी कि कोई श्वेत कभी किसी अश्वेत का भला नहीं चाह सकता। उस दिन पाबंदियों और भ्रांतियों के ढहने की शुरुआत हुई थी। उसी दिन उस पहाड़ का टूटना शुरू हुआ, जिसे जेम्स के जैविक पिता उसके सामने उगा गए थे और जिसे उनके सौतेले पिता ने बड़ा व भयावह बना दिया था। किताबें उन्होंने बहुत लिखीं, लेकिन एक किताब गो टेल इट ऑन द माउंटेन में उन्होंने अपने दोनों पिता पर प्रकाश डाला। एक पिता, जो कभी दिखे नहीं और एक पिता, जो हमेशा रूठे रहे, लेकिन जिंदगी में वह टीचर और ऐसे बहुत लोग मिले, जिन्होंने उंगली पकड़कर चलना सिखा दिया।
प्रस्तुति : ज्ञानेश उपाध्याय जेम्स बाल्डविन, प्रसिद्ध अमेरिकी साहित्यकार
जीना इसी का नाम है / शौर्यपथ / साल 2005 की बात है। जबर्दस्त बारिश ने करोड़ों भारतीयों के ख्वाबों के शहर को जैसे अचानक बेपरदा कर दिया था। कहां तो रंग-बिरंगी रोशनी में डूबी उसकी मादक रातें दुनिया भर के लोगों को ललचाया करती थीं, और कहां वह बजबजाती हुई सुबह! मुंबइकर उस रोज अपने शहर पर किसी सूरत नाज नहीं कर पा रहे थे। मीठी नदी समेत तमाम नालियों ने जैसे सारी गंदगी सागर से उधार मांग ली थी। शहर की हर सड़क पर इंसानी खुदगर्जी सड़ांध मार रही थी।
अफरोज शाह की उम्र तब 22 साल थी, और हर संजीदा शहरी की तरह उन्हें भी अपने शहर से भरपूर इश्क था। मगर जिस हालत में मुंबई उस रोज फंसी थी, उसकी बेचैनी अफरोज के भीतर उतर आई। उन दिनों वह कानून की पढ़ाई कर रहे थे। एक तरफ करियर था, दुनियादारी थी और दूसरी तरफ, जिंदगी को अपनी शर्तों पर जीने का नजरिया। लॉ की पढ़ाई मुकम्मल हुई और वह वकालत भी करने लगे। वकालत कुछ चली, तो यह ख्याल आया कि अपना भी एक आशियाना होना चाहिए, और उनकी तलाश वर्सोवा इलाके में पूरी हुई। अपने घर की खिड़की से समुद्री लहरों की अठखेलियां देखना कितनों को नसीब होता है? अफरोज की यह मुराद पूरी हो गई थी। मगर एक रोज उन्होंने गौर किया कि अरब सागर के इस तट पर भारी मात्रा में कचरे का ढेर जमा है। समुद्र के नीले सौंदर्य को ग्रहण लगाता हुआ। साल 2005 की पुरानी पीड़ा जैसे एक नई टीस के साथ उभर आई।
इस दौरान पूरे एक दशक का वक्फा गुजर चुका था। अफरोज को लगा, जैसे उनका शहर उनसे अपना कर्ज मांग रहा है। भीतर के पेशेवर वकील ने सलाह दी कि अदालत का दरवाजा खटखटाया जाए, मगर प्रेमी मुंबइकर मन ने कहा, मोहब्बत की है, तो म्युनिसिपैलिटी और कोर्ट का मुंह किसलिए देख रहे हो, अपना किरदार निभाओ। और फिर हाथों में ग्लब्स पहन अफरोज चल पड़े वर्सोवा तट पर!
कचरे के बीच पहुंचकर उन्हें बचपन के वे दिन याद आए, जब छुट्टियों के दिन घर वालों के साथ वह समुद्र तट पर आते थे। तब ऐसी गंदगी कहां थी? दरअसल, आर्थिक उदारीकरण के वे शुरुआती साल थे। उन दिनों लोग सौदे-सुलफ के लिए घर से झोले वगैरह लेकर चला करते थे। देखते-देखते प्लास्टिक की सस्ती थैलियों ने पहले महानगरों की, और फिर छोटे-छोटे शहरों तक की आदत बदल डाली।
वह अक्तूबर, 2015 की एक सुबह थी। पहले दिन अफरोज ने कचरे से भरे पांच बैग उठाए। फिर तो हर सप्ताहांत में वह तट पर पहुंचने लगे। उनकी इस कोशिश को कोई और भी गौर से देख रहा था। अफरोज की ही बिल्डिंग में रहने वाले हरबंश माथुर ने सबसे पहले उनके साथ अपना कदम मिलाया और फिर तो देखते ही देखते आस-पड़ोस के कई लोग आ गए। कचरा काफी था। मगर अफरोज ने 109 हफ्ते की एक अवधि तय की कि इसके भीतर हमें वर्सोवा बीच की सूरत बदलनी है।
उनकी ईमानदार पहल ने अनगिनत स्वच्छता प्रेमियों को आकर्षित किया। अगस्त 2016 में तो बॉलीवुड की कई नामचीन हस्तियों और वैश्विक संगठनों के अधिकारियों ने कूड़ा-कचरा उठाकर अफरोज शाह के साथ अपनी एकजुटता दिखाई। अफरोज और उनके साथी काफी संजीदगी से अपने उद्यम में जुटे हुए थे, मगर कोई भी अच्छा कार्य बिना विघ्न-बाधा के कभी संपन्न हुआ है, जो अफरोज और उनके लोग पूरा कर लेते! जो लोग वर्सोवा तट को कूडे़दान के रूप में इस्तेमाल कर रहे थे, उन्होंने वॉलंटीयर्स को मुहिम बंद करने की धमकियां देनी शुरू कर दीं। अफरोज साथियों की जान जोखिम में नहीं डाल सकते थे, लिहाजा उन्होंने कुछ वक्त के लिए काम बंद कर दिया।
लेकिन यह मुहिम अब तक एक जन-आंदोलन का रूप ले चुकी थी। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस तक बात पहुंची, उन्होंने अफरोज को बुलाया और सुरक्षा मुहैया कराते हुए अभियान जारी रखने को कहा। शिवसेना के बडे़ नेताओं ने भी अफरोज को अपना समर्थन दिया। फिर तो तेजी से सब जुट गए। 28 मई, 2017 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी अपने मन की बात कार्यक्रम में अफरोज व उनके साथियों के प्रयासों का जिक्र करते हुए उनकी खूब सराहना की। अमिताभ बच्चन ने तो न केवल कौन बनेगा करोड़पति में उन्हें बुलाया, बल्कि अफरोज की मुहिम को उन्होंने एक ट्रैक्टर व एक एक्स्क्वेटर भी भेंट की। शुरुआत में हरेक शनिवार-रविवार को अफरोज तकरीबन 50 वॉलंटीयर्स का खाना अपने घर से लेकर आते थे। बाद में दाऊदी बोहरा समुदाय ने यह जिम्मेदारी ले ली।
आज वर्सोवा तट की काया बदल चुकी है, यहां से 20 हजार टन से भी अधिक प्लास्टिक और कचरा हटा चुके अफरोज को संयुक्त राष्ट्र ‘चैंपियन्स ऑफ अर्थ’ सम्मान से नवाज चुका है। पिछले साल सीएनएन ने उन्हें दुनिया के शीर्ष 10 नायकों में शुमार किया। कुदरत से बेपनाह मोहब्बत करने वाले इस 37 वर्षीय आशिक का कहना है- ‘हर नदी, हर सागर तट के पास अपना एक अफसाना है, आप सुनिए तो सही।’
प्रस्तुति : चंद्रकांत सिंह अफरोज शाह, वकील, प्रकृतिप्रेमी
नजरिया / शौर्यपथ / डेमोक्रेटिक पार्टी की तरफ से उप-राष्ट्रपति पद की उम्मीदवार कमला हैरिस आंशिक तौर पर भारतीय मूल की हैं, पूरी तरह से नहीं। फिर भारतीयों को यह भी नहीं भूलना चाहिए कि वह अमेरिका में चुनाव लड़ रही हैं, भारत में नहीं। यह एक बड़ा अंतर है, और यह बात हमें अपने मन में बैठा लेनी चाहिए कि जब चुनावी आरोपों-प्रत्यारोपों के दौर शुरू होंगे, तब यही कहा जाएगा कि वह अपनी भारतीयता को बहुत ज्यादा स्वीकार नहीं करती हैं। यह बात मैं बखूबी जानता हूं, क्योंकि मैंने एक बार लिखा भी था कि हैरिस को अपनी भारतीय विरासत को कहीं ज्यादा अपनाने की जरूरत है। मैं तो अब भी अपनी विरासत जी रहा हूं। पर मैं वह उम्मीदवार नहीं, जो अब उप-राष्ट्रपति पद के लिए चुनावी मैदान में है।
हैरिस एक अश्वेत महिला के तौर पर चुनाव लड़ेंगी। यही वह मूल वजह है, जिसके लिए डेमोक्रेटिक पार्टी के राष्ट्रपति उम्मीदवार जो बिडेन ने उनका चयन किया है। अमेरिकी सीनेटर, अमेरिका के सबसे बडे़ राज्य की पूर्व अटॉर्नी-जनरल, अपेक्षाकृत अधिक नौजवान उम्मीदवार (जो बिडेन की उम्र 77 वर्ष है, जबकि कमला हैरिस 55 वर्ष की हैं) और उप-राष्ट्रपति पद की दावेदारी के लिए आक्रामक व्यवहार का प्रदर्शन जैसी उनकी अन्य तमाम मौलिक योग्यताओं को इसके बाद तरजीह दी गई है। अमेरिका के एक पूर्व वरिष्ठ डेमोक्रेट सीनेटर हैरी रीड ने न्यूयॉर्क टाइम्स से कहा भी है, ‘मैं समझता हूं, वह इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि उन्हें इस पद के लिए एक अश्वेत महिला को चुनना चाहिए। अश्वेत हमारे सबसे वफादार मतदाता हैं और मुझे लगता है, अमेरिका की अश्वेत महिलाएं इसकी हकदार हैं कि उप-राष्ट्रपति पद के लिए उनमें से उम्मीदवार चुना जाए’। साफ है, कमला हैरिस का चयन एक चुनावी मजबूरी है। इसीलिए, उनसे और अधिक भारतीय होने की उम्मीदों से भारतीयों, खासतौर से भारतीय मूल के अमेरिकियों को अब बचना चाहिए। हैरिस के लिए ऐसा करना आसान भी नहीं होगा, क्योंकि जैसे-जैसे चुनाव के दिन करीब आते जाएंगे, वह पूरी तरह से अश्वेत होती जाएंगी। दरअसल, बिडेन के चुनावी अभियान में उन्हें अफ्रीकी-अमेरिकी वोटरों की करीबी के तौर पर पेश किया जाएगा, जो अमेरिका का दूसरा सबसे बड़ा मतदाता-वर्ग है। वे फ्लोरिडा, एरिजोना, पेंसिल्वेनिया, ओहियो, विस्कॉन्सिन, मिशिगन, वर्जीनिया व उन राज्यों में महत्वपूर्ण साबित होंगे, जहां रिपब्लिकन की अपेक्षाकृत कमजोर सरकारें हैं।
हालांकि, इन सबमें भी हैरिस अपनी भारतीयता का संकेत देने का वक्त और अवसर निकाल लेंगी। वह उन लोगों से अपील करेंगी, जो उन्हें वर्षों से जानते हैं। और यह वर्ष 2009 में दिवंगत हो चुकी अपनी मां श्यामला गोपालन का जिक्र करते हुए वह करेंगी, जो स्तन कैंसर के रिसर्च से जुड़ी थीं। हैरिस अपने जीवन के खास मौकों पर और अपनी उपलब्धियां बताते समय अमूमन मां की तस्वीर ट्वीट करती हैं, अपने जमैकाई पिता की कभी नहीं, जिनका नाम डोनाल्ड जैस्पर हैरिस है। वह स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर हैं। उप-राष्ट्रपति पद की दावेदार के रूप में नाम घोषित होने के बाद जो बिडेन के साथ पहली बार सार्वजनिक मंच साझा करते समय हैरिस ने बेशक अपनी मिश्रित विरासत के बारे में बताया, मगर भावुक होकर वह अपनी मां के बारे में ही ज्यादा बातें करती रहीं कि कैसे सार्वजनिक जीवन में आने के लिए उन्होंने उन्हें प्रेरित किया था, और अब यही प्रेरणा उन्हें राष्ट्रपति पद का टिकट पाने वाली पहली अश्वेत महिला के रूप में इतिहास में जगह दिलाएगी।
बहरहाल, 3 नवंबर को, या जब भी चुनाव नतीजों की घोषणा होगी, वह अमेरिका की पहली महिला उप-राष्ट्रपति बन सकती हैं। हम इस बार अब तक के सबसे अप्रत्याशित चुनाव का गवाह बन सकते हैं। उनकी मां श्यामला गोपालन भविष्य में भी वह कड़ी बनेंगी, जो हैरिस को भारत से जोडे़गी।
चेन्नई में पली-बढ़ी श्यामला गोपालन अमेरिका की अपनी यात्रा शुरू करने से पहले दिल्ली में लेडी इरविन कॉलेज में पढ़ती थीं। हालांकि, कमला हैरिस आज भी डोसा बनाना नहीं जानती हैं, क्योंकि महीनों पहले शूट किए गए वीडियो में उन्होंने मेंडी कलिंग के सामने यह बात खुद मानी है। मगर उनके बारे में कोई भी राय बनाने से पहले हमें उनको कुछ और वक्त देना चाहिए। और इसकी वह हकदार हैं।
यशवंत राज, अमेरिका में हिन्दुस्तान टाइम्स संवाददाता
सम्पादकीय / शौर्यपथ / कोरोना का समय पूरी दुनिया के लिए जितना अभूतपूर्व है, उतना ही चुनौतीपूर्ण भी। हम अपने चारों ओर सेहत की अत्यधिक चिंता, तनाव, काम में व्यवधान और साथ ही अपने स्वजनों, दोस्तों से दूरी का दुखद एहसास कर रहे हैं। जिंदगी को खुशनुमा ढंग से जीने के बहाने कम हो गए हैं। लोगों की मानसिक स्थिति पर गहरा असर पड़ा है। नई पीढ़ी का मन खास रूप से आहत हुआ है। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन यानी आईएलओ द्वारा किए गए वैश्विक स्वास्थ्य सर्वेक्षण के अनुसार, दुनिया में हर दूसरा युवा चिंता व अवसाद से ग्रस्त हो गया है। कोविड-19 के प्रभाव में 17 प्रतिशत से अधिक युवा ज्यादा पीड़ित हुए हैं। सर्वेक्षण रिपोर्ट के निष्कर्षों को ‘यूथ ऐंड कोविड-19 : नौकरियों, शिक्षा, अधिकारों और मानसिक हित पर प्रभाव’ शीर्षक से प्रकाशित किया गया है। इस सर्वेक्षण के लिए दुनिया के 112 देशों से 12,000 से अधिक प्रतिक्रियाएं ली गईं, जिनमें एक बड़ा हिस्सा शिक्षित युवाओं व इंटरनेट का उपयोग करने वालों का है।
सर्वेक्षण में 18 से 29 वर्ष की आयु के नौजवान शामिल थे, जिन्हें रोजगार, शिक्षा, मानसिक स्वास्थ्य और सामाजिक कल्याण जैसे मुद्दों पर बात करने के लिए कहा गया था। सर्वेक्षण के अनुसार, युवाओं ने मानसिक सेहत संबंधी समस्याओं में बढ़ोतरी के लिए एक से अधिक कारण गिनाए। शिक्षा के साधनों में बदलाव और जीवन को लेकर अनिश्चितता ने उन्हें चिंता की ओर धकेला है। कक्षाओं और परीक्षाओं के न होने का असर भी समाज पर पड़ा है। ऑनलाइन कक्षाओं से भी एक अलग ही तरह की जिंदगी शुरू हुई है, उससे तनाव कम नहीं हुआ, बल्कि बढ़ गया है। उम्र के तीसरे व चौथे दशक में चल रहे युवाओं को रोजगार के अभाव और वर्तमान रोजगार के छूटने की चिंता ने घेर लिया है। घर से काम करने के साथ ही काम के घंटे भी बढ़ गए हैं। लोगों की जिम्मेदारियां बढ़ी हैं, थकावट व कुछ गंवा देने के भाव का असर मानसिक सेहत पर पड़ा है। सर्वेक्षण से पता चला है कि युवा छात्रों पर ज्यादा असर हुआ है। नया हुनर सीखने, सुधारने और आगे शिक्षा के लिए तरसते युवाओं के लिए यह समय बोझिल बन गया है। रिपोर्ट के अनुसार, शिक्षा में परिवर्तन व ऑनलाइन कक्षा के कारण 65 प्रतिशत युवाओं ने जरूरत से कम सीखा है। करीब 50 प्रतिशत युवाओं को आशंका है कि उनकी शिक्षा देर से पूरी होगी। कम से कम नौ प्रतिशत को अपनी परीक्षा में फेल होने की आशंका है, जिससे उन्हें मानसिक तनाव का अनुभव हो रहा है। एक और बात महत्वपूर्ण है कि महिलाओं की मानसिक खुशहाली ज्यादा प्रभावित हुई है, उसमें भी 18 से 24 वर्ष की महिलाओं पर ज्यादा असर हुआ है।
आईएलओ के अध्ययन में बताया गया है कि इन मानसिक चुनौतियों का जवाब हमें अभी ही खोजना होगा, वरना महामारी के खत्म होने के बाद दुनिया को स्वास्थ्य के और बड़े संकट का सामना करना पड़ सकता है। जीवन की गुणवत्ता बनाए रखने के लिए सभी सरकारों को तनाव बढ़ाने वाले उपक्रमों या हरकतों से बचना होगा। सकारात्मक सोच वाले लोगों को आगे आकर मानसिक रूप से कमजोर हुए लोगों को सहारा देना होगा। आज सरकारों, डॉक्टरों, शिक्षकों व अभिभावकों की चुनौती बहुत बढ़ गई है। हमें समझना होगा कि एक-एक युवा हमारे लिए मूल्यवान है, तभी हम उन्हें अवसाद से बचाने में कामयाब होंगे।
मेलबॉक्स / शौर्यपथ / अमेरिकी चुनाव में भारतीय मूल की कमला हैरिस का डेमोक्रेटिक पार्टी द्वारा उप-राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाया जाना भारतीयों के लिए गौरव की बात है। इसमें कोई शक नहीं कि भारतीय प्रतिभा का दुनिया के सभी देशों में सम्मान होता है। इसकी वजह हमारी योग्यता तो है ही, हमारी मजबूत सामाजिक-सांस्कृतिक पृष्ठभूमि भी है। कमला हैरिस के भी पारिवारिक रिश्ते काफी गहरे हैं, जिसका उन्होंने बार-बार प्रदर्शन भी किया है। अपने भाषणों में तो वह मां को हमेशा याद करती रहती हैं। यही कारण है कि राष्ट्रपति पद के डेमोक्रेट उम्मीदवार जो बिडेन और पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा उनकी खुलकर तारीफ करते हैं। हैरिस की यही खासियत संभवत: उन्हें उप-राष्ट्रपति पद तक पहुंचा सकती है।
हरिकृष्ण बड़ोदिया
रतलाम, मध्य प्रदेश
बेहतर होती सड़कें
यह अच्छी खबर है कि केंद्र सरकार ने देश के ग्रामीण इलाकों में डेढ़ लाख किलोमीटर लंबी नई सड़कें 130 लाख करोड़ रुपये के निवेश से बनाया है। इसकी जरूरत भी थी, क्योंकि सड़कें देश की प्रगति और विकास का प्रमुख आधार हैं। जब भारत गांवों में बसता है, तो उनके सुधार और विकास के लिए सड़कों का निर्माण बहुत जरूरी है। तभी देश सही से आगे भी बढ़ सकता है। अच्छी सड़कों, पुलों, चौराहों, फुटपाथों आदि के अभाव के कारण ही आज देश के महानगर जाम और हादसों से जूझते रहते हैं। इन सबसे प्रतिवर्ष न जाने कितनी पूंजी और ऊर्जा की बर्बादी होती है। सरकार इस समस्या के समाधान को लेकर अब गंभीर हुई है, तो उसका स्वागत किया जाना चाहिए।
वेद मामूरपुर, नरेला
नेपोटिज्म के खिलाफ
सुशांत सिंह राजपूत की मौत से देश भर में जिस तरह से नेपोटिज्म के खिलाफ एक उबाल पैदा हुआ है, वह शायद ही कभी दिखा है। साफ है,जनता इस मामले को जल्द से जल्द सुलझता हुआ देखना चाहती है। जिस तरह से सीबीआई, आईडी जैसी एजेंसियां सक्रिय हुई हैं, उससे यह उम्मीद भी है कि जल्द ही इस मौत पर खुलासा होगा और दूध का दूध, पानी का पानी हो जाएगा। मगर तब तक लोगों का गुस्सा बना हुआ है। ‘सड़क-2’ फिल्म का ट्रेलर उनके निशाने पर है, जिसको नापसंद करके लोगों ने महेश भट्ट को साफ संदेश दे दिया है। जनता के न्यायालय में देर नहीं होती। नेपोटिज्म को बढ़ावा देने वाले कलाकारों और फिल्मकारों को इससे सबक मिला होगा। ऐसे तमाम कलाकारों और फिल्मकारों के बहिष्कार से ही सुशांत सिंह राजपूत को न्याय मिल सकेगा।
कृष्ण गोपालन कुमार
कोंच डीह, गया
वायरस से लड़ती राजनीति
जहां हमारा देश कोरोना से ग्रस्त है, वहीं हमारे देश की राजनीति तीन खतरनाक वायरसों से जूझ रही है। ये वायरस हैं- परिवारवाद, सत्ता के लिए मोल-भाव व वीवीआईपी संस्कृति। इन सबके अंत का समय आ गया है। आज नहीं, तो कल कोरोना की वैक्सीन वैज्ञानिक बना ही लेंगे, पर राजनीति को संक्रमित कर रहे इन वायरसों का समाधान जनता को ही निकालना होगा। इस विषय पर सकारात्मक व संवेदनशील संवाद की आवश्यकता है। मगर दुख की बात यह है कि जमात से चला विमर्श जाति, परिवार पर आकर रुक जाता है। इसी तरह, राजनीति को पेशा, यानी कारोबार नहीं, बल्कि त्यागपूर्ण जीवन के रूप में देखना चाहिए। एक समय था, जब लाल बहादुर शास्त्री, कर्पूरी ठाकुर ,दीन दयाल उपाध्याय जैसे लोगों के लिए सादगी ही शृंगार थी। मगर आज यह नहीं दिखता, जबकि समाज के अंतिम छोर पर खडे़ व्यक्ति की आंखों की भाषा समझने के लिए जिस संवेदना की आवश्यकता होती है, उसकी पूर्ति तभी संभव है, जब हमारे नेतागण सादगीपूर्ण जीवन बिताएं। पर क्या ऐसा हो सकेगा?
सत्य प्रकाश, लखीमपुर खीरी
ओपिनियन / शौर्यपथ / भारतीय क्रिकेट में कप्तान तो एक से एक हुए, लेकिन महेंद्र सिंह धौनी सबसे सफलतम और सबसे अलग रूप-स्वरूप में याद किए जाएंगे। भारतीय क्रिकेट में जितना आकर्षक उनका पदार्पण था, उनका अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट को अलविदा कहना भी उतना ही यादगार रहेगा। पहले हम अनेक दिग्गज खिलाड़ियों को बहुत मुश्किल से क्रिकेट छोड़ते देखते रहे हैं, लेकिन धौनी जिस सहजता से डटे हुए थे, लगभग उतनी ही सहजता से वह अपने आप विदा हुए हैं। उन्होंने अपने संन्यास की घोषणा इंस्टाग्राम पर पोस्ट करते हुए की है, उनकी वीडियो की पृष्ठभूमि में...मैं पल दो पल का शायर हूं गीत चल रहा था। यह गीत चलाकर उन्होंने अपने प्रशंसकों को भाव-विभोर कर दिया। उनके विदा कहने के इस अंदाज में एक ऐसा इंसान साफ तौर पर नुमाया हो गया, जिस पर भारतीयों ने बेहिसाब प्यार लुटाया है।
धौनी के संन्यास पर वर्तमान भारतीय कप्तान विराट कोहली ने ट्वीट किया, ‘हर क्रिकेटर को एक दिन अपना सफर खत्म करना पड़ता है, लेकिन फिर भी जब कोई ऐसा संन्यास की घोषणा करता है, जिसे आप करीब से जानते हैं, तो आप भावना को और अधिक महसूस करते हैं। आपने देश के लिए जो किया है, वह हमेशा सभी के दिल में रहेगा, लेकिन जो सम्मान और गर्मजोशी मुझे मिली है, वह हमेशा मेरी रहेगी। दुनिया ने उपलब्धियां देखी हैं, मैंने इंसान को देखा है।’
धौनी को देश में सचिन तेंदुलकर जैसी लोकप्रियता मिलने से भी उनके महत्व को समझा जा सकता है। यह कोई भूलने वाली बात नहीं है कि सचिन का विश्व कप जीतने का सपना धौनी के नेतृत्व में ही साकार हुआ था। विश्वविजयी होने के उन भावुक विरल क्षणों को कौन भुला सकता है? धौनी ने अपनी कप्तानी में अपनाई जाने वाली रणनीतियों की छाप ही नहीं छोड़ी, बल्कि वह भारतीय क्रिकेट की दिशा बदलने वाले क्रिकेटर रहे।
महेंद्र सिंह धौनी ने दिखाया कि रांची जैसे छोटे शहर का क्रिकेटर भी क्रिकेट की इस ऊंचाई तक पहुंच सकता है। बिहार-झारखंड के युवाओं के लिए वह एक ऐसे आदर्श रहेंगे, जिनसे हमेशा प्रेरणा मिलेगी। पहले भारतीय क्रिकेट चार-पांच बड़े शहरों तक सीमित था। मुंबई, दिल्ली, चेन्नई, हैदराबाद और कर्नाटक के खिलाड़ी ही राष्ट्रीय टीम तक पहुंच पाते थे, पर धौनी ने छोटे शहरों के बच्चों को क्रिकेट अपनाने के लिए प्रेरित ही नहीं किया, बल्कि उनमें यह विश्वास बनाया कि वे भी राष्ट्रीय टीम में स्थान पा सकते हैं। सही मायनों में वह छोटे शहरों के क्रिकेटरों के लिए रोल मॉडल साबित हुए। इसका परिणाम यह हुआ कि भारतीय क्रिकेट मेट्रो शहरों से गांवों तक पहुंच गया। इसे धौनी इफेक्ट ही कहेंगे कि अब भारतीय टीम में बड़े शहरों के मुकाबले छोटे शहरों के खिलाड़ी ज्यादा नजर आते हैं।
भारतीय क्रिकेट को विजय मर्चेंट, सुनील गावस्कर, कपिल देव और सचिन तेंदुलकर जैसे दिग्गज मिले हैं, पर हम धौनी की बात करें, तो वह इन सबसे हटकर हैं। धौनी के आने से न केवल दिशा बदली, बल्कि भारतीय क्रिकेट की चमक और धमक भी बढ़ी। यह इतिहास में दर्ज है कि धौनी के नेतृत्व में जब टी-20 क्रिकेट में जीत हासिल हुई, तब भारत में आईपीएल क्रिकेट संभव हुआ, जिससे दुनिया के सैंकड़ों नए-पुराने खिलाड़ियों को पहले से बहुत बेहतर जिंदगी नसीब हुई।
धौनी के संन्यास लेने के कुछ ही समय के अंदर सुरेश रैना ने भी संन्यास की घोषणा करके सभी को हतप्रभ कर दिया। चेन्नई सुपरकिंग्स के शिविर में शामिल होने से पहले तक यह कहा जा रहा था कि रैना रंगत पा लें, तो उनके अभी भी टीम इंडिया में आने की संभावना है। रैना को खुद भी ऐसा लगता था, लेकिन धौनी और रैना की जोड़ी को जय-वीरू की जोड़ी कहा जाता है। इसलिए लगता है कि दोस्त के फैसले के पीछे उन्होंने भी चलने का फैसला कर लिया। रैना आक्रामक बल्लेबाज होने के साथ जबर्दस्त फील्डर भी हैं। रैना ने भारत को जिताने वाली तमाम पारियां खेली हैं, पर अब उनके करियर पर भी विराम लग गया है। वह भी अब धौनी की तरह आईपीएल में ही नजर आएंगे।
धौनी का आगमन ‘फेब फोर’ यानी सचिन, द्रविड़, सौरव और कुंबले के जमाने में हुआ था। यह वह दौर था, जब भारतीय क्रिकेट में इस चौकड़ी की तूती बोला करती थी। इनके बीच अपनी जगह बना पाना किसी भी खिलाड़ी के लिए आसान नहीं था। ये चारों प्रदर्शन के मामले में तो धुरंधर थे ही, टीम योजनाओं में भी इनकी ही चला करती थी। बाकी खिलाड़ी टीम मामलों में बोलने की हिम्मत नहीं रखते थे, पर धौनी बेखौफ रहने वाले खिलाड़ी हैं। शुरुआती करियर में उन्होंने पहले टीम में अपनी जगह पक्की की और फिर खुलकर अपनी बात रखने का चलन भी शुरू कर दिया। धौनी ने पहला दौरा बांग्लादेश का किया था। सचिन कहते हैं कि इस दौरे पर धौनी के लगाए कुछ शॉटों ने यह साबित कर दिया था कि वह प्रतिभाशाली तो हैं। धौनी 2005 में विशाखापत्तनम में पाकिस्तान के खिलाफ नाबाद 148 रन बनाने में कामयाब हुए और टीम में उनकी जगह पक्की हो गई।
सही मायनों में धौनी के करियर को 2007 के टी-20 विश्व कप में कप्तानी का मौका मिलने से पंख लगे। इस समय तक टी-20 क्रिकेट में भारत की कोई खास पहचान नहीं थी, लेकिन विश्व कप जीतकर धौनी ने सभी को हैरत में ही नहीं डाला, बल्कि अपनी कप्तानी का सिक्का भी जमा दिया। बाद में टीम इंडिया की नियमित कप्तानी मिलने पर उन्होंने टीम की सोच को ही एकदम से बदल दिया। वह सही मायनों में टीम में जुझारूपन लाने वाले कप्तान रहे। उन्होंने खुद टीम के मुश्किल स्थिति में फंसने पर ठंडे दिमाग से खेलते हुए कई बार टीम की नैया पार लगाकर एक अच्छे फिनिशर की अपनी छवि बनाई। इसे देखकर टीम के अन्य सदस्यों ने भी मुश्किल स्थिति में होने पर भी संघर्ष करने का जज्बा विकसित कर लिया। अपनी इसी खूबी की वजह से ही टीम इंडिया दुनिया की नंबर वन टीम बन सकी।
आज विराट कोहली ने भले ही टेस्ट जीत के मामले में धौनी को पीछे छोड़ दिया है, फिर भी धौनी देश के सफलतम कप्तान हैं। वह आईसीसी की तीनों चैंपियनशिप जीतने वाले दुनिया के इकलौते कप्तान हैं। मैदान पर लोग उन्हें खोजेंगे। आगे कौन लेगा उनकी जगह? और वह विकेट के पीछे जो जगह छोड़ गए हैं, वहां उनकी नामौजूदगी न जाने कितने वर्षों तक खलेगी।
(ये लेखक के अपने विचार हैं) मनोज चतुर्वेदी, वरिष्ठ खेल पत्रकार
सेहत / शौर्यपथ / हम में से बहुत से लोग ऐसे होते हैं, जिनका शरीर तो जवां लगता है लेकिन उनके चेहरे पर रौनक नहीं होती। इसके अलावा उनके चेहरे पर बहुत कम उम्र में झुर्रियां आने लगती है। बदलते मौसम में तो चेहरे का रुखापन बढ़ने से कई परेशानियां सामने आ जाती है। ऐसे में सर्दियों में आपको अपनी डाइट में कुछ खास फलों को शामिल करना चाहिए-
दही
दही से बना रायता या लस्सी आपके हाजमे को ठीक रखती है। आप दही को चावल के आटे या बेसन के साथ मिलाकर चेहरे पर भी लगा सकते हैं। इससे आपके दाग-धब्बे दूर हो जाएंगे।
नीबू
नीबू का रस आपके पेट के लिए ही नहीं बल्कि त्वचा के लिए भी बहुत गुणकारी है। रोजाना नीबू पानी पीने से आपको पेट से जुड़ी परेशानियों से मुक्ति मिलती है। साथ ही आप नीबू के रस को सादा पानी या ग्लिसरीन के साथ मिलाकर चेहरे पर भी लगा सकते हैं।
तरबूज
ज्यादातर लोगों को तरबूज खाना पसंद होता है। ऐसे में आप तरबूज को खाने के अलावा इसके जूस को चेहरे पर भी लगा सकते हैं।
दूध
आप जानते ही हैं, कि दूध को संपूर्ण आहार कहा जाता है। आपको कम से कम रोजाना दो गिलास दूध पीना चाहिए। आप सुबह और रात में एक-एक गिलास दूध पी सकते हैं। आप चेहरे पर कच्चा दूध यानी बिना उबाला हुआ दूध भी लगा सकते हैं।
सेब
आपको अपने खाने में रोजाना एक सेब जरूर शामिल करना चाहिए। साथ ही आप सेब को पीसकर उसमें से रस निकालकर अपने चेहरे पर लगा सकते हैं। सेब से सिरका भी बनता है, जो चेहरे के लिए बहुत अच्छा होता है।
खाना /खजाना / शौर्यपथ सामग्री
बटर- 1 चम्मच
कटा प्याज- 1/2 कप
लहसुन पेस्ट- 1/2 चम्मच
कटी हुई शिमला मिर्च- 1 कप
कटा टमाटर- 1/2 कप
लाल मिर्च पाउडर- 1/2 चम्मच
पाव भाजी मसाला- 1/2 चम्मच
उबले आलू के टुकड़े- 1 कप
कटे-उबले मिक्स वेजिटेबल- 3/4 कप
कटी हुई धनिया पत्ती- 2 चम्मच
नीबू का रस- 1/2 चम्मच
नमक- स्वादानुसार
बर्गर बन-6
बटर-आवश्यकतानुसार
प्याज के छल्ले- सजावट के लिए
विधि
नॉनस्टिक पैन में मक्खन गर्म करें और उसमें प्याज और लहसुन का पेस्ट डालें। 30 सेकेंड तक भूनें। शिमला मिर्च, टमाटर, लाल मिर्च पाउडर और पाव भाजी मसाला डालकर एक मिनट तक भूनें। आलू, सब्जियां, धनिया पत्ती, नीबू का रस और नमक डालें और सभी सामग्री को अच्छी तरह से मैश करें। बीच-बीच में मिश्रण को मिलाते हुए मध्यम आंच पर एक से दो मिनट तक पकाएं। गैस ऑफ कर दें। तैयार मिश्रण को हल्का ठंडा होने दें और छह बराबर हिस्सों में बांट दें। बर्गर बन को बीच से काटें और नॉनस्टिक पैन में डालकर हल्का-सा टोस्ट करें। तैयार मिश्रण का एक हिस्सा बर्गर के ऊपर रखें। उसके ऊपर प्याज का एक छल्ला डालें। बर्गर का एक और टुकड़ा उसके ऊपर डालें और हल्के हाथों से दबाएं। इसी तरह से पांच और बर्गर तैयार करें और सर्व करें।
सेहत / शौर्यपथ / मुंहासें एक सामान्य स्किन प्रोबल्म है, जो कई महिलाओं को परेशान करते हैं. कई तरह के महंगे स्किन प्रोडक्ट्स और ट्रीटमेंट्स के बाद बहुत सी महिलाओं ने अपने मुंहासों से छुटकारा पाने के लिए घरेलू नुस्खों का इस्तेमाल करना शुरू किया औरर उन्हें सही में इसका असर भी दिखाई दिया. ऐसे में गुलाब जल को आपको मुंहासें दूर करने के लिए जरूर ट्राय करके देखना चाहिए. न केवल गुलाब जल आपकी त्वचा के पीएच स्केल को बैलेंस करता है, बल्कि यह मुंहासों से भी छुटकारा दिलाता है और आपकी त्वचा को जवां बनाता है.
मुंहासों के लिए गुलाब जल का क्यों करें इस्तेमाल?
गुलाब जल में एस्ट्रिजेंट प्रोपर्टीज होती हैं, जो आपकी त्वचा के लिए टोनर का काम करती है. यह आपकी त्वचा से धूल मिट्टी और कीटाणुओं को निकालकर पोर्स को खोलता है और चेहरे की डीप क्लेंजिंग करता है. साथ ही ये ढीली त्वचा को वापस से टाइट भी करता है. ये आपकी त्वचा पर बहुत ही कोमल रहता है और एक्सेस ऑयल को भी रोकता है.
हालांकि, गुलाब जल में मौजूद एंटी बैक्टीरियल, एंटीमाइक्रोबायल और एंटी इंफ्लामेटरी प्रोपर्टीज इसे मुंहासों से छुटकारा दिलाने के लिए लाभकारी बनाती हैं. इसकी एंटी बैक्टीरियल और एंटीमाइक्रोबायल प्रोपर्टीज मुंहासे पैदा करने वाले बैक्टीरिया को दूर रखती हैं और त्वचा को साफ करती हैं.
वहीं इसक एंटी इंफ्लामेटरी प्रोपर्टीज आपके दर्द को कम करती है और त्वचा को जल्दी से ठीक करने में मदद करती है. इसलिए हम आपके लिए कुछ ऐसे तरीके लाए हैं, जिनसे आप भी मुंहासों से छुटकारा पा सकती हैं.
1. गुलाब जल का स्प्रे
गुलाब जल को स्प्रे के रूप में लगाने से भी मुंहासें करने वाले बैक्टीरिया दूर रहते हैं.
आपको चाहिए
- गुलाब जल
- एक छोटी स्प्रे बोतल
ऐसे करें इस्तेमाल
- सबसे पहले स्प्रे बोतल में गुलाब जल डाल लें और साइड में रख लें.
- अपने चेहरे को क्लेंजर से साफ करें और सुखा लें.
- अब अपने चेहरे पर गुलाब जल छिड़कें.
- इसे 20 से 30 सेकेंड के लिए चेहरे पर रहने दें.
- अब टिशू से अपना चेहरा साफ कर लें.
- आप चाहें तो मोइश्चराइजर में मिला कर भी इसे लगा सकती हैं.
- आप रोज इस स्प्रे को अपने चेहरे पर लगाएं और कुछ ही वक्त में आपको बदलाव नजर आने लगेगा.
2. गुलाब जल और मुल्तानी मिट्टी
ऑयली त्वचा के लोगों के लिए ये फेस मास्क एक दम परफेक्ट है. मुल्तानी मिट्टी चेहरे से एक्सेस ऑयल को सोख लेती है और चेहरे को डीप क्लेंज करती है. ये घरेलू नुस्खां त्वचा को ऑयल और मुंहासों से दूर रखने में मदद करेगा.
आपको चाहिए
- 1 टेबलस्पून मुल्तानी मिट्टी
- 1 टेबलस्पून गुलाब जल
ऐसे करें इस्तेमाल
- दोनों को अच्छे से मिला लें और एक स्मूथ पेस्ट बना लें.
- अपना चेहरा धो लें और पानी सुखा लें.
- अब इस पेस्ट को अपने चेहरे और गले पर लगाएं.
- पेस्ट के सूखने तक इसे लगा रहने दें.
- अब अपने चेहरे को सामान्य पानी से धो लें.
- इस मास्क का अपने चेहरे पर दो बार इस्तेमाल करें.
3. गुलाब जल और सेब का सिरका
सेब के सिरके को इसकी एंटी बैक्टीरियल और एंटी इंफ्लामेटरी प्रोपर्टीज के लिए जाना जाता है. ये दोनों ही मुंहासों को दूर करती हैं और त्वचा को साफ और स्वस्थ बनाती हैं.
आपको चाहिए
- आधा कप गुलाब जल
- 2 टीस्पून सेब का सिरका
ऐसे करें इस्तेमाल
- अपने चेहरे को क्लेंजर से धो लें और सुखा लें.
- अब एक कप में सेब के सिरके और गुलाब जल को मिला लें.
- एक रुई का टुकड़ा लें और इसे मिक्स्चर में डालें और फिर चेहरे पर लगाएं.
- अब अपने चेहरे को सूखने दें.
- इसके बाद अपने चेहरे पर मोइश्चराइजर लगाएं.
- इस घरेलू नुस्खे का हफ्ते में कम से मक 2 बार इस्तेमाल करें.
4. गुलाब जल और चंदन
नेचुरल स्किनकेयर की बात आती है तो चंदर जादू की तरह काम करता है. चंदन में मौजूद एंटी इंफ्लामेटरी प्रोपर्टीज जलन को कम करती है और धूल मिट्टी को बाहर निकालकर त्वचा को साफ करती है.
आपको चाहिए
- 2 टेबलस्पून चंदन का पाउडर
- 1 टेबलस्पून गुलाब जल
ऐसे करें इस्तेमाल
- गुलाब जल और चंदन के पाउडर को एक बाउल में मिक्स कर के पेस्ट बना लें.
- अब अपने चेहरे को क्लेंजर से धो लें और सुखा लें.
- इस पेस्ट को अपने चेहरे पर लगाएं और सूखने तक छोड़ दें.
- अब अपने चेहरे को ठंडे पानी से धो लें.
- आप इस नुस्खे का हफ्ते में 3 से 4 बार इस्तेमाल कर सकते हैं.
5. गुलाब जल और नींबू
नींबू में काफी अधिक मात्रा में विटामिन सी होता है, जो मुंहासों के लिए काफी लाभकारी है. इसके अलावा नींबू बहुत ही अच्छा स्किन ब्राइटनिंग एजेंट भी है, जो आपकी त्वचा के स्कार्स को हटाता है. ये नुस्खा आपको मुंहासें से मुक्स साफ त्वचा देगा.
नजरिया /शौर्यपथ / कई मौके आते हैं, जब देश हमें प्रेरित करता है। वर्ष 1992 के ओलंपिक के समय मैं छोटा था, वहां भारतीय खिलाड़ियों की टीम को देश का प्रतिनिधित्व करते हुए देखना मेरे लिए बहुत प्रेरणादायी था। तब लिंबा राम ने कैसे निशाना साधा था, उत्सव-तमाशे का कैसा माहौल था! खिलाड़ी कैसे अपने बेहतरीन प्रदर्शन के अभियान में लगे थे। तब मुझे ओलंपिक में हॉकी महाशक्ति के रूप में हमारी विरासत के बारे में भी पता था, और यह कुछ ऐसा था, जिसने मुझे अपनी खेल यात्रा और भारत को गौरव दिलाने के लिए प्रेरित किया।
मुझे याद है, जब 11 अगस्त, 2008 को बीजिंग ओलंपिक में मैंने स्वर्ण पदक जीता, तब मुझे नहीं लगा था कि मैंने जीत लिया है। जीतने के बाद भी मेरा ध्यान जीत की प्रक्रिया पर लगा था। कैसे सर्वश्रेष्ठ करना है, यही बात मेरे दिमाग में चल रही थी। हालांकि जैसे-जैसे चीझें साफ हुईं, मुझे स्थिति की गंभीरता का एहसास हुआ। जीवन के एक लक्ष्य तक पहुंचने की खुशी महसूस हुई। इस बात ने मेरे मन को छू लिया कि मेरे एक काम ने पूरे देश को कैसे प्रभावित किया है।
पिछले वर्षों में खेलों में बढ़ती भागीदारी बहुत प्रोत्साहित करती है। एथलीटों का समर्थन करने के लिए आगे आने वाले अधिक से अधिक लोगों को देखना बहुत अच्छा लगता है। उदाहरण के लिए, एक औसत जिला स्तरीय प्रतियोगिता में भी भागीदारी बढ़ गई है, जब मैं इस स्तर पर प्रतिस्पद्र्धा करता था, तब इतने लोग नहीं आते थे। आज हर खेल में किसी न किसी रोल मॉडल का उदय खिलाड़ियों को पेशेवर खेल की राह दिखाता है, इसे पोषित-प्रोत्साहित करने की जरूरत है। अगले दशक में मैं निश्चित ही अधिक एथलीटों को विश्व विजेता बनते देख सकता हूं, और उम्मीद है, मैं लंबे समय तक भारत का एकमात्र व्यक्तिगत स्वर्ण पदक विजेता नहीं रहूंगा।
आज खेलों में निवेश की जरूरत है। देश में प्रचुर प्रतिभा है। सही खेल ढांचा हो और खिलाड़ी विकास में दूरदर्शिता हो, तो प्रतिभाओं को प्रोत्साहन मिलेगा। कई मायने में यह हो भी रहा है। मैंने सरकार में खेलों के लिए नए सिरे से प्रतिबद्धता देखी है। यही वजह है, मैं इस देश में खेलों के विकास को बहुत आशावादी रूप से देखता हूं। खेल विकास के लिए सरकार भी करे और कॉरपोरेट सेक्टर जितना ज्यादा शामिल हो, उतना बेहतर होगा।
कोरोना न होता, तो इस समय ओलंपिक का माहौल होता। यह उन खिलाड़ियों के लिए निराशा की बात है, जिन्होंने टोक्यो खेलों को ध्यान में रखते हुए वर्षों से तैयारी की है। हालांकि, इससे कई युवा एथलीटों को तैयार होने के लिए अतिरिक्त समय मिलेगा। कोरोना ने हमें एक कदम पीछे लेने और आगे के कदमों की योजना बनाने का समय दिया है। यह अंतत: इस पर निर्भर करता है कि आप स्थिति को कैसे देखते हैं और इससे भी महत्वपूर्ण कि आप इसका अधिकतम उपयोग कैसे करते हैं। बेशक, जो अवसर का लाभ उठाएगा, वह जरूर जीतेगा।
आज जो दौर है, उसका हममें से कई लोगों पर प्रभाव पड़ा है और इस पर काबू पाने के लिए सेहतमंद और सुरक्षित रहना हमारे लिए अहम है। जितना संभव हो, घर पर रहने और सुरक्षा प्रोटोकॉल का पालन करने, जैसे मास्क पहनने और हाथ धोने से भी एक बड़ा फर्क आएगा। आप एक दिनचर्या रखें और बिना अपवाद पालन करें। जो छोटे व्यायाम घर पर किए जा सकते हैं, जितना संभव हो, करें। साथ ही, अच्छे भोजन से न केवल शारीरिक, बल्कि मानसिक सेहत में भी मदद मिलेगी।
हमें अपनी मजबूती के साथ देश की मजबूती के बारे में भी जरूर सोचना है। इस देश को कैसे आकार दिया जाएगा, यह बात भारत के युवाओं के परस्पर सामंजस्य और सामूहिक विकास में योगदान के लिए सक्षम होने पर निर्भर है। हमें अपने देश के युवाओं का साथ देना होगा। युवा जो कुछ कर सकते हैं, उन्हें उसी दिशा में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन के लिए प्रोत्साहित करना होगा। ऐसा करते हुए हम भारतीयों की एक पूरी पीढ़ी को प्रेरित कर सकते हैं, जो देश को नई ऊंचाइयों पर ले जाएगी।
एक उद्यमी, खिलाड़ी या किसी अन्य पेशे में सफलता के लिए आप जिस भी क्षेत्र को चुनें, अपने इरादे को बुलंद रखें। सीखने के लिए हमेशा तैयार रहें। दुनिया का परिदृश्य तेजी से बदल रहा है, आपका भी बदलेगा, अगर आप पूरी लगन से अपनी मंजिल पर पूरा ध्यान लगाएंगे।
(ये लेखक के अपने विचार हैं) अभिनव बिंद्रा, ओलंपिक स्वर्ण पदक विजेता
सम्पादकीय / शौर्यपथ / स्वतंत्र भारत ने विकसित राष्ट्र होने की ओर एक लंबा सफर तय कर लिया है, और अभी आगे का लंबा सफर हमें जल्दी पूरा करना है। बताते हैं, भारत कम से कम 2035 तक युवाओं का देश है, उसके बाद हमारी आबादी में युवाओं की तादाद कम होती जाएगी। इसलिए अगले 15 वर्ष हमारे लिए बहुमूल्य हैं। हमें 1947 में जो भारत मिला था, वह अंग्रेजी शासन द्वारा बुरी तरह प्रताड़ित व शोषित था। कृषि अर्थव्यवस्था भारत की रीढ़ थी, गुलामी के दौर में सबसे पहले उसी पर प्रहार हुआ था। साल 1901 से 1941 के बीच भारत में प्रति व्यक्ति खाद्यान्न उत्पादन में 24 प्रतिशत की गिरावट आई थी। तब देश की 70 प्रतिशत जमीन पर जमींदारों का कब्जा हो गया था। अंग्रेज और जमींदार मिलकर फसल व मेहनत का आधा हिस्सा छीन लेते थे, लेकिन आज न तो अंग्रेज हैं और न जमींदार। व्यापक समाज को सामने आने का मौका मिला। नतीजा सामने है, भारतीय अर्थव्यवस्था का आकार पीपीपी (परचेजिंग पावर पैरिटी) के हिसाब से दुनिया में तीसरे स्थान पर है और भारतीय अर्थव्यवस्था का स्थान दुनिया में पांचवां माना जाता है। आज हमारी अर्थव्यवस्था उस ब्रिटेन से भी बड़ी है, जिसने हमें कभी गुलाम बना रखा था। अनेक पैमाने हैं, जिनसे भारत की आर्थिक मजबूती को देखा जा सकता है। 1946 के आसपास भारतीय अर्थव्यवस्था में कुल बचत सकल राष्ट्रीय उत्पाद का महज 2.75 प्रतिशत थी, जो 1971-75 में 12.35 प्रतिशत और मार्च 2019 में 30.1 प्रतिशत पहुंच गई। बचत से यह संकेत मिलता है कि हम नए निवेश में कितने सक्षम हैं। निवेश की हमारी क्षमता बढ़ती जा रही है। ज्यादा दशक नहीं बीते हैं, दुनिया भारत की आर्थिक ताकत नहीं जानती थी। मंदी से मुकाबले के दौर में भी भारतीय अर्थव्यवस्था ने दुनिया में अपने महत्व को बेहतर ढंग से स्थापित किया।
बेशक, हमारी आर्थिक आजादी में कमियां भी हैं और तभी तो पांचवें नंबर की अर्थव्यवस्था वाला देश प्रति व्यक्ति आय के मामले में दुनिया में 100 देशों में भी शामिल नहीं है। सामाजिक पैमाने पर भारत के विकास को लंबा सफर तय करना है। संकेत स्पष्ट है कि अर्थव्यवस्था के आकार मात्र से पूरे देश को नहीं देखा जा सकता। अगर हम अंतरिक्ष विज्ञान के मामले में अग्रणी पांच देशों में शामिल हैं, तो सामाजिक विकास के पैमाने पर भी हमें पांच नहीं, तो टॉप 50 में तो रहना ही चाहिए। यदि हम टॉप सामरिक शक्तियों में शुमार किए जाते हैं, तो हमें कम से कम पांच टॉप रक्षा सामान उत्पादक देशों में भी होना चाहिए। बेशक तरक्की हुई है, सामाजिक, आर्थिक, सामरिक, हर मोर्चे पर, और आज जो भारत है, वह 1962 में नहीं था। लेकिन उतना ही सच है कि पूरे समर्पण के साथ अगर स्वतंत्र देश की सेवा होती, तो हम आज से कहीं ज्यादा मजबूत और सुरक्षित होते।
भारत में जितनी कमियां हैं, उससे कहीं ज्यादा संभावनाएं हैं। हाल के वर्षों के आंकड़ों को देखें, तो कहीं न कहीं सेवा क्षेत्र पर देश का अत्यधिक भार पड़ रहा है। सेवा क्षेत्र देश के विकास में 50 प्रतिशत से अधिक योगदान कर रहा है। चिंता यह है कि औद्योगिक योगदान 29 प्रतिशत और कृषि योगदान महज 17 प्रतिशत है। सेवा क्षेत्र को मजबूत करते हुए हमें कृषि और उद्योग पर पहले से ज्यादा ध्यान देना होगा, तभी हमारी स्वतंत्रता विकसित और सशक्त होगी।
मेलबॉक्स / शौर्यपथ / अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी, आंचल में है दूध और आंखों में पानी...’ कवि मैथिलीशरण गुप्त की ये पंक्तियां नारी जीवन की दयनीय अवस्था को सटीक बयां करती हैं। हमारे देश में महिलाओं के खिलाफ हिंसा थमने का नाम नहीं ले रही है। विडंबना है कि यहां देवियों की पूजा की जाती है, पर महिलाओं को आमतौर पर खिलौना समझ लिया जाता है। देश की लचर न्याय-व्यवस्था इसके लिए जिम्मेदार है। महिलाओं के खिलाफ अपराध करने वाले भली-भांति जानते हैं कि कानून उन्हें कठोर दंड नहीं दे सकता। फिर, हमारा समाज अब भी इतना पुरुष प्रधान तो है ही कि आजादी के इतने वर्षों के बाद भी महिलाओं को सारे अधिकार देने से बचता है। हालांकि, सरकारें अपनी तरफ से लगातार प्रयास करती रही हैं, लेकिन अब भी संकीर्ण सोच में बदलाव लाने की कई कोशिशें करनी होंगी। यदि सरकार और समाज मिलकर प्रयास करें, तो इसमें कोई दोराय नहीं कि हम महिलाओं के लिए एक आदर्श देश बना सकते हैं।
राजेंद्र प्रसाद, रांची, झारखंड
स्वतंत्रता दिवस का जश्न
आज देश आजादी का महान पर्व मना रहा है। देश को स्वतंत्र हुए 73 वर्ष हो गए। इन वर्षों में हमने काफी कुछ हासिल किया है। वर्ष 1947 से 2020 तक की यात्रा पर गौर करें, तो यही लगता है कि फर्श से अर्श तक का सफर हमने तय किया है। एक वक्त यहां खाने के भी लाले थे, मगर अब हम इतना अनाज उगा लेते हैं कि जरूरतमंद देशों को भी भेजते हैं। नई-नई तकनीक और प्रौद्योगिकी को भी हमने खूब अपनाया है। कहा तो यह भी जाता है कि भारतीय प्रतिभा के बूते ही अमेरिका का सिलिकॉन वैली आकार ले सका। फिर भी, काफी कुछ किया जाना अभी शेष है। गरीबी उन्मूलन की दिशा में लगातार काम करने के बाद बावजूद हमें अब तक इसमें बहुत सफलता नहीं मिली है। इसी तरह, पठन-पाठन का माहौल भी बेहतर बनाना एक बड़ी चुनौती है। स्वास्थ्य सेवाओं पर भी खर्च भी बढ़ाने होंगे। अगर ये सब हम कर सके, तो निश्चय ही आने वाले वर्ष भारत के हैं।
समिधा, महरौली, नई दिल्ली
संकल्प लें आज
स्वतंत्रता दिवस भारतीयों के लिए हर्षोल्लास का दिन है, लेकिन कोरोना-काल ने इस दिन मनने वाले विभिन्न कार्यक्रमों को स्थगित कर दिया है, जिससे जश्न मानो फीका पड़ गया है। आजादी की सुखद अनुभूति जिस तरह आज से सात दशक पहले लोग किया करते थे, आज भी वैसा ही करते हैं। हालांकि, आजाद होने के बाद लोगों ने सोचा था कि अपना मुल्क होगा, तो बेहतर शासन प्रणाली कायम होगी। मगर दुर्भाग्य से लोकतंत्र की सभी खूबियों को हम अपना नहीं सके हैं। राजनेताओं-नौकरशाहों के गठजोड़ से आम जन कितने संतुष्ट हैं, यह आसानी से समझा जा सकता है। सरकार ने बेशक कई योजनाएं शुरू की हैं, लेकिन जब तक भ्रष्टाचार का खात्मा नहीं होगा, तब तक आजादी का वास्तविक एहसास मुश्किल है।
मिथिलेश कुमार, भागलपुर
हर नागरिक प्रहरी
आज क्यों देशभक्ति दो राष्ट्रीय पर्वों में सिमटकर रह गई है? 15 अगस्त और 26 जनवरी के अलावा पूरे साल शायद ही कोई इसकी बात करता है। सवाल यह है कि हम हर समय देशभक्त जैसा आचरण क्यों नहीं करते, ताकि रामराज्य कायम हो? आज आजादी के लिए नहीं, बल्कि देश के भीतर जड़ें जमा रहे आतंकवाद और भ्रष्टाचार के खिलाफ हमें लड़ना है। मुखौटा पहने अपनों से टकराना है। यह लड़ाई पहले से कहीं ज्यादा गंभीर और बड़ी है, क्योंकि इसमें कौन अपना है और कौन पराया, यह समझना मुश्किल है। इसलिए आज हर नागरिक का कर्तव्य होना चाहिए कि वह प्रहरी बनकर भ्रष्टाचारियों, अपराधियों और आतंकवादियों से लडे़।
शिवांगी खत्री, माछरा, मेरठ
ओपिनियन / शौर्यपथ / वह साल 1918 था। महात्मा गांधी को दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटे तीन वर्ष हो चले थे। अहमदाबाद में बापू को लगा कि उन्हें हल्का पेचिश हो गया है। फिर भी, कस्तूरबा द्वारा बनाई गई खीर देखकर वह लोभ रोक न पाए और अपनी सेहत बुरी तरह बिगाड़ बैठे। बाद के वर्षों में सत्य के साथ प्रयोग में उन्होंने लिखा, ‘यह यमदूत के लिए पर्याप्त निमंत्रण था’। गांधी को दरअसल स्पेनिश फ्लू के कारण पेट संबंधी दिक्कतें हुई थीं। इस फ्लू ने पहले विश्व युद्ध के आखिरी वर्ष में पूरी दुनिया को तबाह कर दिया था। लेखिका लौरा स्पिने ने अपनी किताब द पेल राइडर में इस महामारी के बारे में काफी कुछ बताया है।
महज एक साल पहले तक हमारी दुनिया भी स्थिर लग रही थी। राजनीति, अर्थव्यवस्था, प्रभुत्व और रिश्तों के वैश्विक तार इस तरह आपस में गुंथे हुए थे कि उनकी गांठों का खुलना असंभव लग रहा था। मगर दिसंबर, 2019 में सब कुछ बदल गया। चीन के वुहान में एक वायरस ने एक इंसान को संक्रमित किया। यह वह वायरस था, जो चमगादड़ों में रहता है। अमूमन इस तरह के मामले जल्द ही अंजाम तक पहुंच जाते हैं। इंसान संक्रमण-मुक्त हो जाता है और हालात पटरी पर लौट आते हैं। मगर इस बार वायरस के पास यह क्षमता थी कि वह एक इंसान से दूसरे को संक्रमित कर सके। अगर 1918 का स्पेनिश फ्लू तालाब में उठने वाली तरंग की तरह फैला, तो कोरोना वायरस ने तालाब में ऐसी हिलोरें पैदा कर दी हैं, जो पत्थर के लगातार उछलते रहने से बनती रहती हैं। यह बीमारी न सिर्फ हमारी सेहत और कमजोर वर्गों की आजीविका पर कहर बनकर टूटी है, बल्कि दुनिया की अर्थव्यवस्था और मनोबल को भी इसने पर्याप्त नुकसान पहुंचाया है। पूरा जनजीवन अस्त-व्यस्त हो गया है। इससे मानसिक सेहत पर नकारात्मक असर पड़ा है, उसको कम करके नहीं आंका जाना चाहिए।
आज स्वतंत्रता दिवस के दिन, जब पीछे मुड़कर हम देखते हैं, तो हमें उन तीन डोर की जरूरत महसूस होती है, जो भारत व दुनिया को आपस में बांधकर रख सकती है। पहली डोर है, अपने नागरिकों को सम्मान के साथ स्वीकार करना। दूसरी डोर है, इस महामारी से बाहर निकलने का तरीका समझना और तीसरी, नई राह पर चलना।
भारत से अपरिचित किसी के लिए भी यह जानना अद्भुत होगा कि लॉकडाउन-1 के बाद से देश ने किस तरह से काम किए हैं। हमारे डॉक्टरों, नर्सों और अस्पतालों ने बिना थके मेहनत की है। छोटे शहरों से लेकर महानगरों तक के प्रशासनिक अधिकारियों ने भी अपनी-अपनी नींद त्याग दी। हमारे वैज्ञानिक, इंजीनियर, उद्योगपति, किसान, सभी एक साथ आगे आए। सरकार और नौकरशाही में हर स्तर पर इस महामारी के तमाम पहलुओं से निपटने की प्रतिबद्धता दिखी, जो आज भी कायम है। वाकई, यह असाधारण समय है, जहां हर दिन फैसले लेने पड़ रहे हैं, और वह भी पेचीदा व विविध इनपुट के आधार पर।
इस भयावह साल की करीब-करीब दो-तिहाई यात्रा हमने पूरी कर ली है, अब पहले से कहीं अधिक जरूरी है कि हम संजीदा हो जाएं, अपने दायित्व को समझें और अपनी आजीविका फिर से हासिल करें। हाथ पर हाथ धरे बैठकर किसी चमत्कार की उम्मीद कतई न करें। बेशक, हमने इस वायरस के बारे में काफी कुछ जाना है, और हमें अब भी बहुत कुछ समझना है। लेकिन विज्ञान के कुछ निष्कर्ष बेहद यकीनी हैं। उन पर अमल करके हम इस वायरस को हरा सकते हैं और पुरानी जीवनशैली फिर से पा सकते हैं। मास्क का इस्तेमाल, दैहिक दूरी का पालन जैसे व्यवहार, दवा और वैक्सीन हमें इस महामारी से निश्चय ही बाहर निकाल देंगे, लेकिन हमें इससे उबरने और अपनी समृद्धि फिर से हासिल करने के लिए नए रास्ते खोजने होंगे। कोरोना के प्रकोप ने हमारे लोगों, उनकी उम्मीदों और हमारी सरकारों को एक धरातल पर ला दिया है। हमें अब एक साथ काम करना होगा, क्योंकि हमारे पास यही एकमात्र भविष्य है।
हमें भारत-निर्माण की तरफ बढ़ना होगा और इसके लिए यह सुनिश्चित करना होगा कि हमारे नौजवानों के पास अवसर उपलब्ध हों। भारत के विकास की इस नई गाथा में नेतृत्व सिर्फ युवा ही संभाल सकते हैं। जल जीवन मिशन, स्वच्छ भारत अभियान जैसी कई प्रमुख योजनाएं हमारे पास हैं, तो स्टार्ट-अप, कृषि व उद्यमिता में तमाम अवसर, जहां योग्यता को भरपूर तवज्जो मिलती है। इन सबको भुनाने के लिए हमारे युवाओं को उच्च शिक्षा और कौशल हासिल करने के हर मौके ढूंढ़ने होंगे। कुछ क्षेत्र तो ऐसे हैं, जहां बहुत कम उम्र के नौजवान भी प्रशिक्षण पाकर विश्व स्तर पर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा सकते हैं। इसके लिए उन्हें कोडिंग या मशीनों के संचालन में प्रशिक्षण की जरूरत है। इसी तरह, कृषि उपकरणों का विकास व रखरखाव भी अब बहुत महत्वपूर्ण हो चला है। लिहाजा कंप्यूटर विज्ञान और कोडिंग सीखने के हर उपलब्ध मौके को हाथ से जाने नहीं देना चाहिए। अगर हमारे ग्रामीण इलाकों में ऐसे कार्यक्रम चलाए जाते हैं, तो वे मूल्य-वद्र्धित उत्पादों के निर्यात के बडे़ गढ़ बन सकते हैं। साथ ही, बेहतर जीवन-यापन के लिए वे लोगों को लुभाने भी लगेंगे।
जाहिर है, यहां विज्ञान और तकनीक की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है और उनको केंद्र में रखकर ही नीतियां बननी चाहिए। वर्षों बाद लोगों ने शोध और अनुसंधान की मांग की है, जो बताता है कि वैज्ञानिकों से कैसी अपेक्षाएं हैं। इसीलिए हमारे ऊपर बहुत भारी जिम्मेदारी है। महामारी ने बता दिया है कि हमारा लक्ष्य क्या होना चाहिए। हमें आत्म-विश्वास और आत्म-निर्भरता से पर्यावरण, जैव विविधता और टिकाऊ विकास पर पर्याप्त ध्यान देना होगा। 1918 में फ्लू के शिकार महात्मा गांधी कमजोर नहीं पड़े थे, बल्कि उन्होंने पूरी दृढ़ता से उसका मुकाबला किया था। इस स्वतंत्रता दिवस पर हमें फिर से वही रास्ता अपनाने की ओर बढ़ना चाहिए।
(ये लेखक के अपने विचार हैं) के विजय राघवन, प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार, भारत सरकार
Feb 09, 2021 Rate: 4.00
