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रायपुर / शौर्यपथ / महिलाओं को गौठानों से तरक्की की नई राह मिल गई है। कुछ महीनों तक रोजगार के अभाव में आर्थिक तंगी से जूझ रही बिलासपुर जिले की ग्राम परसदा की महिलाओं पर यह कहावत सही साबित हो रही है। ग्राम परसदा की गौठान में जय मां लक्ष्मी स्व सहायता समूह की 10 महिलाएं जैविक खाद बनाकर आर्थिक रूप से सशक्त हो रही हैं। साथ ही गांव की अन्य महिलाओं को वर्मी कम्पोस्ट खाद बनाने के लिए प्रेरित कर रही हैं। शासन द्वारा समूह की 10 महिलाओं को वर्मी कम्पोस्ट खाद बनाने का प्रशिक्षण भी दिया गया है। प्रशिक्षित होने के बाद अब ये महिलाएं खाद का उत्पादन कर रही हैं, जिससे उनके जीवन में आर्थिक समृद्धि आ रही है।
जय मां लक्ष्मी स्व सहायता समूह की महिलाओं ने बताया कि उन्होंने 56 क्विंटल वर्मी कम्पोस्ट खाद बनाया और उसमें से 36 क्विंटल खाद की बिक्री भी कर ली है। खाद बेचने से उन्हें 33 हजार रूपये प्राप्त हुए हैं। खाद की खरीदी उद्यानिकी विभाग द्वारा की गई है। अब समूह की महिलाओं ने गोधन न्याय योजना के तहत गोबर से खाद बनाना शुरू कर दिया है। पूर्व में गोबर कम मात्रा में मिलने से वर्मी कम्पोस्ट बनाने का कार्य सुचारू रूप से नहीं हो पा रहा था लेकिन अब गोधन न्याय योजना के लागू होने से पर्याप्त मात्रा में गोबर मिल रहा है। राज्य शासन की गोधन न्याय योजना से यहां की महिलाओं में आत्मविश्वास बढ़ा है और भविष्य में इस योजना से और अधिक तरक्की करने की नयी आस उनमें जगी है। राज्य शासन को धन्यवाद देते हुए समूह की महिलाएं कहती है कि इन योजनाओं के चलते ही अब वे किसी पर आर्थिक रूप से निर्भर नहीं है।
धर्म संसार / शौर्यपथ / भाद्रपद माह में शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को हरतालिका तीज व्रत रखा जाता है। इस साल यह व्रत 21 अगस्त 2020 को पड़ रहा है। हरतालिका तीज व्रत का उत्तर भारत में विशेष महत्व है। इस व्रत में महिलाएं अखंड सौभाग्य की प्राप्ति के लिए माता पार्वती और भगवान शिव की अराधना करती हैं।
ज्योतिषाचार्यों के मुताबिक, हरतालिका तीज व्रत में मिट्टी से बनी शिव-पार्वती प्रतिमा का विधिवत पूजन किया जाता है। इसके साथ ही हरतालिका तीज व्रत कथा को सुना जाता है। मान्यता है कि कुंवारी कन्याएं मनचाहे वर के लिए इस व्रत को रखती है। कहते हैं कि एक बार व्रत रखने के बाद इस व्रत को जीवनभर रखा जाता है। बीमार होने पर दूसरी महिला या पति इस व्रत को रख सकता है।
हरतालिका तीज व्रत का विशेष महत्व-
शास्त्रों के अनुसार, हरतालिका तीज व्रत में कथा का विशेष महत्व होता है। मान्यता है कि कथा के बिना इस व्रत को अधूरा माना जाता है। इसलिए हरतालिका तीज व्रत रखने वाले को कथा जरूर सुननी या पढ़नी चाहिए।
हरतालिका तीज व्रत कथा-
शास्त्रों के अनुसार, हिमवान की पुत्री माता पार्वती ने भगवान शंकर को पति के रूप में पाने के लिए बालकाल में हिमालय पर्वत पर अन्न त्याग कर घोर तपस्या शुरू कर दी थी। इस बात पार्वती जी के माता-पिता काफी परेशान थे। तभी एक दिन नारद जी राजा हिमवान के पास पार्वती जी के लिए भगवान विष्णु की ओर से विवाह का प्रस्ताव लेकर पहुंचे। माता पार्वती ने यह शादी का प्रस्ताव ठुकरा दिया।
पार्वती जी ने अपनी एक सखी से कहा कि वह सिर्फ भोलेनाथ को ही पति के रूप में स्वीकार करेंगी। सखी की सलाह पर पार्वती जी ने घने वन में एक गुफा में भगवान शिव की अराधना की। भाद्रपद तृतीया शुक्ल के दिन हस्त नक्षत्र में पार्वती जी ने मिट्टी से शिवलिंग बनकर विधिवत पूजा की और रातभर जागरण किया। पार्वती जी के तप से खुश होकर भगवान शिव ने माता पार्वती को पत्नी के रूप में स्वीकार कर लिया था।
Hartalika Teej 2020 Puja: हरतालिका तीज की पूजा में इन चीजों की होगी जरूरत
Hartalika Teej :हरतालिका तीज के दिन सुहागिन महिलाएं अपने पतियों की लंबी आयु के लिए व्रत रखती है। यूपी, उत्तराखंड, बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में भाद्रपद महीने की तृतीया तिथि को यह त्योहार मनाया जाता है। इस दिन महिलाएं पूरे दिन निर्जला रहकर अगले दिन व्रत का पारण करती हैं। सबसे पहले इस व्रत को माता पार्वती ने भगवान शिव के लिए रखा था। इस व्रत में भगवान शिव-पार्वती के विवाह की कथा सुनी जाती है।
पूजा साम्रगी
भगवान शिव और पार्वती की मूर्ति रखने के लिए प्लेट
जिस पर पूजा की जाएगी लकड़ी का पाटा
लकड़ी के पाटे पर बिछाने के लिए लाल या पीले रंग का कपड़ा
पूजा के लिए नारियल
पानी से भरा कलश
आम के पत्ते
घी
दिया
अगरबत्ती और धूप
दीप जलाने के लिए देसी घी
आरती के लिए कपूर
पान के पत्ते
सुपारी
केले
दक्षिणा
बेलपत्र
धतूरा
शमी की पत्तियां
जनेऊ
चंदन
माता के लिए चुनरी
सुहाग का सामान
मेंहदी
काजल सिंदूर
चूड़ियां, बिंदी
गौर बनाने के लिए मिट्टी और पंचामृत
सिद्ध व साध्य योग में 21 को हरितालिका तीज, पति की खातिर महिलाएं रखेंगी व्रत, होगी शिव-पार्वती की पूजा
महिलाएं अखंड सौभाग्य के लिये भाद्रपद शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि शुक्रवार 21 अगस्त को हरितालिका तीज करेंगी। महिलाएं 24 घंटे का निर्जला व्रत रखकर भगवान शिव और पार्वती की पूजा करेंगी। पौराणिक मान्यता है कि माता पार्वती सबसे पहले भगवान शिव को वर को रूप में प्राप्त करने के लिए हरितालिका तीज का व्रत रखा था। इधर बाजार में तीज को लेकर फल-फूल, सौंदर्य प्रसाधन की जमकर खरीदारी हो रही है।
21 को रात दो बजे तक पूजन का शुभ मुहूर्त
आचार्य विप्रेंद झा माधव के मुताबिक शुक्रवार को सूर्योदय से लेकर रात 2 बजे तक तृतीया तिथि है। महिलाएं उस दिन सिद्ध तथा साध्य योग में शिव व पार्वती की पूजा करेंगी। शास्त्र के अनुसार इस दिन सुहागन स्त्रियों द्वारा उपवास रहकर श्रद्धापूर्वक शिव-पार्वती का पूजन करने से अखंड सौभाग्य, संतान, धन-वैभव की प्राप्ति होती है। शिव के समान पति की कामना के लिए कुंवारी लड़कियां भी इस व्रत को पूरे विधि-विधान के साथ करती हैं। इसी दिन भगवान विष्णु ने वाराह अवतार लेकर हिरण्याक्ष का वध किया था।
गजकेशरी योग में होगी पूजा
ज्योतिषाचार्य पीके युग के मुताबिक 21 अगस्त को मंगल, गुरु, शनि व सूर्य अपनी खुद की राशि में रहेंगे। इससे गजकेशरी और बुधादित्य योग का संयोग बनेगा। यह बहुत ही शुभ संयोग है। महिलाओं के सौभाग्य के कारक ग्रह गुरु भी खुद की राशि धनु में रहेंगे।
प्रदोष काल में पूजन सर्वोत्तम
आचार्य के मुताबिक हरितालिका तीज का पूजन प्रदोष(संध्याकाल) काल में सबसे बढ़िया माना जाता है। महिला व्रती प्रदोष काल में भगवान शिव, मां पार्वती और गणेश भगवान की मिट्टी की प्रतिमा बनाकर पूजा करती हैं। पूजन में फल-फूल के साथ सौंदर्य प्रसाधन की सभी वस्तुएं रखी जाती हैं। हरितालिका तीज व्रत की परंपरा त्रेता युग से चली आ रही है। माता पार्वती ने पहली बार शिव की बालू की प्रतिमा बनाकर पूजा किया था। तब शिव ने उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर पार्वती को पत्नी के रूप में स्वीकार किया। आज भी महिलाएं मिट्टी से भोलेनाथ-गौरी की मूर्ति बनाकर उनकी पूजा करती हैं। पूरे दिन निराहार या फलाहार रहकर विधि-विधान से पूजा कर कथा श्रवण करती हैं।
पूजा का शुभ मुहूर्त
सुबह 6 बजे से 9 बजे
दोपहर 12. 08 बजे से 02.25 बजे
शाम 6. 16 बजे से रात 9.16 बजे
पूजन में करें अर्पण
- पंचामृत से शिव स्नान के बाद रेशमी वस्त्र अर्पित करें
- गुलाब व इत्र अर्पण कर धूप दिखाएं
- हरा-लाल या पीला वस्त्र धारण कर पूजा करें
- मां पार्वती को हल्दी व भोलेनाथ को सफेद चंदन अर्पित करें
- शिव का शृंगार तथा ओम नमः शिवाय का जाप करें
- शिव-पार्वती को पीला फूल का हार चढ़ाकर रुद्राष्टकम का पाठ करें
- शिव जी को बेलपत्र और दूर्वा चढ़ाए, मेहंदी जरूर लगाएं
- शृंगार की वस्तुओं का दान करें
- शिव-पार्वती को सुगंधित पुष्प अर्पित करें
- सफेद चंदन तथा घी का दीपक प्रज्वलित करें
- महादेव को श्वेत पुष्प अर्पित करें
नजरिया / शौर्यपथ / जैसे-जैसे वैश्विक अर्थव्यवस्था डिजिटल होती जा रही है, वैसे-वैसे रोजगार बाजार का परिदृश्य भी बदलता जा रहा है। स्थिति यह है कि भविष्य में कई रोजगार ऐसे भी होंगे, जिनके नाम हमने अब तक सुने भी नहीं हैं। हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वतंत्रता दिवस पर देश को संबोधित करते हुए कहा कि पिछले वर्ष में देश में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) में 18 फीसदी की वृद्धि हुई और देश तेजी से डिजिटलीकरण की ओर बढ़ रहा है। ऐसे में, डिजिटल होती भारतीय अर्थव्यवस्था के तहत स्थानीय एवं वैश्विक, दोनों ही स्तरों पर कौशल प्रशिक्षित भारतीय युवाओं के लिए रोजगार के मौके बढ़ गए हैं।
यह स्पष्ट दिख रहा है कि कोविड-19 के बीच भी वैश्विक डिजिटल कंपनियां भारत में डिजिटलीकरण के लिए स्वास्थ्य, शिक्षा, कृषि व खुदरा क्षेत्र के ई-कॉमर्स में बड़ी मात्रा में निवेश करती दिखाई दे रही हैं। कोविड-19 के बीच भारत में डिजिटल भुगतान उद्योग, ई-कॉमर्स तथा डिजिटल मार्केटिंग जैसे सेक्टर तेजी से आगे बढे़ हैं और इनमें रोजगार के मौके भी बढ़े हैं। यदि हम डिजिटल भुगतान उद्योग की ओर देखें, तो पाते हैं कि नोटबंदी में भी डिजिटल भुगतान उतनी तेजी से नहीं बढ़ा था, जितनी ऊंची छलांग उसने कोरोना महामारी के पिछले चार महीनों में लगाई है।
नेशनल एसोसिएशन ऑफ सॉफ्टवेयर ऐंड सर्विसेज कंपनीज (नैसकॉम) की अध्यक्ष देवयानी घोष द्वारा डिजिटल अर्थव्यवस्था में भारतीय प्रतिभाओं के रोजगार मौकों पर हाल ही में दी गई टिप्पणी का उल्लेख करना उपयुक्त होगा। देवयानी ने कहा है कि इस समय प्रतिभा के संदर्भ में भारत डिजिटल अर्थव्यवस्था में लाभ की स्थिति में है, लेकिन कोरोना महामारी के बाद की दुनिया में मौजूदा आईटी प्रतिभाओं को उभरते तकनीकी कौशल से फिर से लैस करने और दुनिया में खुद को खड़ा रखने के लिए नवाचार यानी इनोवेशन पर जोर देना होगा। निस्संदेह, सरकारी कदमों से डिजिटलीकरण को बढ़ावा मिला है, पर अभी इस दिशा में बहुआयामी प्रयासों की जरूरत बनी हुई है। हमें डिजिटलीकरण के लिए आवश्यक बुनियादी जरूरत संबंधी कमियों को दूर करना होगा। चूंकि बिजली डिजिटल अर्थव्यवस्था की महत्वपूर्ण जरूरत है, अत: ग्रामीण क्षेत्रों में बिजली की पर्याप्त पहुंच और आपूर्ति जरूरी है।
चूंकि हमारी आबादी का एक बड़ा भाग अब भी डिजिटल बैंकिंग व्यवस्था की दृष्टि से पीछे है, अत: उसे डिजिटल बैंकिंग की ओर आगे बढ़ाना होगा। खासतौर से अभी ग्रामीण क्षेत्रों में बड़ी संख्या में लोगों के पास डिजिटली भुगतान के लिए बैंक-खाते, इंटरनेट की सुविधा वाले मोबाइल फोन या क्रेडिट-डेबिट कार्ड जैसी सुविधाएं नहीं हैं, इसलिए ऐसी सुविधाएं बढ़ाने का अभियान जरूरी होगा। फिर ऑनलाइन धोखाधड़ी की बढ़ती घटनाओं के कारण बड़ी संख्या में ग्रामीणों का ऑनलाइन लेन-देन में अविश्वास बना हुआ है, इसलिए ऑनलाइन धोखाधड़ी रोकने के लिए सरकार को अपनी साइबर सुरक्षा मजबूत करनी पड़ेगी।
देश में डिजिटलीकरण को आगे बढ़ाने के लिए मोबाइल ब्रॉडबैंड स्पीड के मामले में देश को आगे बढ़ाना जरूरी है। मोबाइल ब्रॉडबैंड स्पीड टेस्ट करने वाली वैश्विक कंपनी ओकला के मुताबिक, अप्रैल 2020 में मोबाइल ब्रॉडबैंड स्पीड के मामले में 139 देशों की सूची में भारत 132वें पायदान पर है। ओकला के मुताबिक, अप्रैल 2020 में भारत की औसत मोबाइल ब्रॉडबैंड डाउनलोड स्पीड 9.81 एमबीपीएस रही, वहीं इसकी औसत अपलोड स्पीड 3.98 एमबीपीएस थी। मोबाइल ब्रॉडबैंड स्पीड के मामले में दक्षिण कोरिया, कतर, चीन, यूएई, नीदरलैंड, नॉर्वे बहुत आगे हैं। इतना ही नहीं, स्पीड के मामले में भारत को पाकिस्तान और नेपाल जैसे देशों ने भी पीछे छोड़ रखा है। ऐसे में, भारत को डिजिटल अर्थव्यवस्था में रोजगार के मौकों का फायदा लेने के लिए इंटरनेट स्पीड बढ़ाने के अधिकतम प्रयास करने होंगे।
डिजिटल अर्थव्यवस्था के आधार को मजबूत करने की जरूरत है, तभी यह क्षेत्र ज्यादा से ज्यादा रोजगार देने की स्थिति में होगा। उम्मीद है कि देश की नई पीढ़ी डिजिटल अर्थव्यवस्था के पीछे छिपे अवसरों को तलाशेगी और देश-दुनिया की नई जरूरतों के मुताबिक अपने आप को सुसज्जित करेगी।
(ये लेखक के अपने विचार हैं) जयंतीलाल भंडारी, अर्थशास्त्री
मेलबॉक्स / शौर्यपथ / फिल्म ‘दामिनी’ में सनी देओल वकील की भूमिका निभाते हुए एक डायलॉग कहते हैं, तारीख पे तारीख-तारीख पे तारीख, पर इंसाफ नहीं मिलता... ठीक इसी तरह सरकार सिर्फ योजनाएं लाती है, उनकी सफलता या विफलता का विवेचन नहीं किया जाता। कहीं-कहीं तो योजनाएं भ्रष्टाचार के तहखाने में दब जाती हैं और जनता मुंह ताकती रह जाती है। आज का सच यही है कि सरकारें जनता को लुभाने के लिए या सीधे शब्दों में कहें, तो राष्ट्र-हित के लिए योजनाएं लाती हैं, लेकिन वे कहां तक सफल हो पाती हैं, इस पर कभी मनन नहीं किया जाता। मौजूदा सरकार जब सत्ता में आई थी, तब कुछ योजनाएं लेकर आई, जिनको 2020 में काफी हद तक पूरा हो जाना था। इनमें प्रमुख हैं, नमामि गंगे योजना, दीनदयाल उपाध्याय ग्रामीण कौशल योजना, स्वच्छ भारत अभियान, सांसद आदर्श ग्राम योजना, मिशन इंद्रधनुष आदि। बावजूद सरकार नित्य नई योजना बनाने के लिए तत्पर दिख रही है। सवाल है, पुरानी योजनाओं का मूल्यांकन किए बिना नई योजनाएं भला कितनी सार्थक होंगी?
उदय कुमार आजाद
अश्लीलता और वेब सीरीज
ओटीटी प्लेटफॉर्म पर वेब सीरीज में जिस तरह से गाली-गलौज और नग्नता परोसी जा रही हैं, उससे देश के युवाओं की मानसिकता तो बुरी तरह प्रभावित हो ही रही है, सवाल भी उठ रहे हैं कि आखिर क्यों इन वेब सीरीज को फिल्म एवं सेंसर बोर्ड के दायरे से बाहर रखा गया है? एक तरफ तो सरकार पोर्न वेबसाइट्स व अश्लील फिल्मों पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा चुकी है, जबकि दूसरी तरफ ओटीटी प्लेटफॉर्म पर इनके खुलेआम प्रसारण की अनुमति दी जा रही है। इसका नतीजा दुष्कर्म और हिंसा की बढ़ती घटनाओं के रूप में देखने को मिल रहा है। हैरत की बात यह है कि बडे़-बडे़ प्रोडक्शन हाउस और नामचीन कलाकार भी ऐसे दृश्यों को करने से परहेज नहीं कर रहे हैं। ऐसे में, जिस तरह से सरकार द्वारा पोर्न साइट्स पर पाबंदी लगाई गई है, उसी तरह से वेब सीरीज पर भी सख्ती बरतने की आवश्यकता है।
प्रत्यूष आनंद, नवादा, बिहार
योग शामिल करें
हमारी शिक्षा-नीति में चरित्र-निर्माण काफी पीछे छूट गया है। इसके लिए शिक्षा-व्यवस्था में योग को शामिल किया जाना अनिवार्य था। इसका कोई विकल्प नहीं है। योग मात्र आसन या प्राणायाम तक सीमित नहीं है, नई शिक्षा-व्यवस्था के अंतर्गत इसके अष्टांग रूप (यम, नियम, आसन, प्रत्याहार, प्राणायाम, धारणा, ध्यान और समाधि) का विधिवत अभ्यास कराया जाना चाहिए, तभी हमारे देश के नौजवानों का चारित्रिक और मानसिक विकास हो सकेगा। स्वस्थ तन और मन वाला कुशल नागरिक ही देश की पूंजी होता है।
सत्य प्रकाश, लखीमपुर खीरी
इंस्टाग्राम पर क्यों
पिछले तीन दिनों से महेंद्र सिंह धौनी की महानता बताते हुए खूब लिखा जा रहा है। लंबी-लंबी तकरीरें हो रही हैं। उनके जैसा न कोई था, न कोई आगे होगा का एहसास कराया जा रहा है। यहां तक कि बीसीसीआई से जुड़े लोग भी धौनी को महानतम खिलाड़ी की संज्ञा दे रहे हैं। वाकई, धौनी की महानता पर किसी को कोई संदेह नहीं है, लेकिन क्या किसी ने यह सोचने की जहमत उठाई कि इस महान खिलाड़ी को आखिर क्यों मैदान की जगह इंस्टाग्राम पर अपने संन्यास की घोषणा करनी पड़ी? ऐसा इसलिए, क्योंकि उन्हें मालूम चल गया था कि बीसीसीआई अब उन्हें मैदान पर उतरने का मौका नहीं देने वाला है। आशीष नेहरा ने धौनी के बारे में एक बात बताई थी कि उनके अंदर वह क्षमता है कि वह विरोधी खिलाड़ियों का दिमाग तुरंत पढ़ लेते हैं। धौनी ने बीसीसीआई के कर्ता-धर्ताओं का दिमाग पढ़ लिया था, इसलिए उन्होंने मैदान के बाहर ही अपने संन्यास की घोषणा कर दी।
जंग बहादुर सिंह, जमशेदपुर
सम्पादकीय / शौर्यपथ / पीएम केयर्स फंड पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला न केवल महत्वपूर्ण, बल्कि अनुकरणीय है। इस फंड को लेकर शुरू से ही जो विवाद रहे हैं, उन पर अलग से विचार-विमर्श की जरूरत भले हो, लेकिन सुप्रीम कोर्ट में जाने का कोई विशेष औचित्य नहीं था। इस मामले में अदालत की भावनाएं कमोबेश पहले ही सामने आ गई थीं। अप्रैल के महीने में ही जब अलग से पीएम केयर्स फंड बनाने को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी, तभी उस याचिका को सुप्रीम कोर्ट ने बिना समय गंवाए खारिज कर दिया था। कोर्ट ने चुनौती देने को खड़े हुए वकील से तब कहा था, ‘आपके पास दो ही विकल्प हैं, या तो आप याचिका वापस ले लीजिए या आप पर हम भारी जुर्माना लगाएंगे।’ जाहिर है, इस फंड को दोबारा चुनौती नहीं दी जा सकती थी, इसलिए इसके फंड को एनडीआरएफ अर्थात राष्ट्रीय आपदा राहत कोष में जमा कराने के लिए याचिका लगाई गई। सुप्रीम कोर्ट ने अपने रुख को बरकरार रखा है। इससे निश्चित रूप से उन लोगों को निराशा होगी, जिनको यह आशंका है कि इस फंड में गड़बड़ी हुई है या की जाएगी। कहना न होगा, केवल आशंका के आधार पर कोई शिकायत करने से बचना चाहिए। सरकार की किसी भी बड़ी पहल को मजबूत आधार पर ही चुनौती देनी चाहिए। कोर्ट ने अप्रैल में ही फंड के गठन को चुनौती देने वाली याचिका के बारे में कहा था कि इससे राजनीति की बू आ रही है। अब इस मामले का यहीं पटाक्षेप हो जाना चाहिए।
यह हमारे समय का सच है कि कोरोना के खिलाफ लड़ाई में केंद्र सरकार ने एक पीएम केयर्स फंड बना रखा है, जिसमें 3,100 करोड़ रुपये से ज्यादा देश और विदेश के लोगों ने स्वेच्छा से जमा किए हैं। इस धन का उपयोग चिकित्सकीय साजो-सामान से लेकर वैक्सीन की खोज तक में हो रहा है। तमाम राज्यों को भी इस फंड के तहत मदद नसीब हो रही है। सरकार के अनुसार, पीएम केयर्स फंड के 3,100 करोड़ में से 2,100 करोड़ रुपये से वेंटिलेटर खरीदने; 1,000 करोड़ रुपये प्रवासी मजदूरों पर; और 100 करोड़ रुपये वैक्सीन बनाने पर खर्च होने हैं।
आज जरूरत यह नहीं कि पीएम केयर्स फंड पर बहस की जाए, जरूरी है कि इस फंड का देश को सेहतमंद बनाने के लिए बेहतर से बेहतर सदुपयोग हो। केंद्र सरकार पहले ही यह इशारा कर चुकी है कि इस फंड का ऑडिट किया जाएगा। जहां तक विपक्षी दलों का प्रश्न है, तो यह उनका दायित्व है कि वे सरकारी व्यवस्था में खामी खोजें और उसका राजनीतिक इस्तेमाल भी करें। कोरोना के लिए जो धन लोगों ने दिया है, उसकी एक-एक पाई सही जरूरतमंदों तक पहुंचनी चाहिए। पीएम केयर्स फंड में धन दान करने वाले सभी लोग यही चाहेंगे कि उनके धन का देशहित में ईमानदारी से सदुपयोग हो जाए। यह हमारी सरकारों के लिए भी चुनौती है कि वे ऐसे किसी विशेष कोष को पूरी ईमानदारी से निचले स्तर तक पारदर्शिता के साथ खर्च करके देश के सामने पूरा खाता रख दें। ऐसे कोषों पर शंका-आशंका नई बात नहीं है, अपने देश में राहत कोषों पर हमेशा से सवाल उठते रहे हैं, लेकिन महाविपत्ति के समय के इस विशेष फंड को एक आदर्श स्थापित करना चाहिए। पुरानी आशंकाओं को झुठला देना चाहिए। हमारे विशाल विकासशील देश में ऐसे विशेष कोष की सफलता से दान और सेवा का भविष्य भी तय होगा।
रायपुर / शौर्यपथ / छत्तीसगढ़ शासन द्वारा संचालित प्रदेश के समस्त शासकीय औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थाओं एवं विशेष (आदिवासी) औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थाओं में सत्र अगस्त 2020-21 एवं 2020-22 में प्रवेश के लिए इच्छुक आवेदक 25 अगस्त तक ऑनलाईन रजिस्ट्रेशन (आवेदन) करा सकते हैं। संचालक रोजगार एवं प्रशिक्षण, नवा रायपुर अटल नगर द्वारा इस संबंध में सूचना जारी कर दी गई है।
जारी सूचना के अनुसार छत्तीसगढ़ स्थित शासकीय आईटीआई में संचालित एनसीव्हीटी/एससीव्हीटी के पाठ्यक्रमों में प्रवेश के लिए इच्छुक छत्तीसगढ़ के मूल निवासी आवेदक, स्वयं अथवा छत्तीसगढ़ स्थित किसी भी लोक सेवा केन्द्र (च्वाइस सेंटर) के माध्यम से संचालनालय रोजगार एवं प्रशिक्षण की वेबसाईटcgiti.cgstate.gov.in के ’ऑनलाईन एप्लिकेशन 2020’ पर क्लिक कर अपना पंजीयन एवं प्रवेश हेतु व्यवसाय का चयन कर सकते हैं। आवेदकों के पंजीयन के लिए वेबसाईट पर यूजर मैन्यूवल दिया गया है, जिसका अवलोकन किया जा सकता है।
पंजीयन के पूर्व, प्रवेश विवरणिका जो कि cgiti.cgstate.gov.in पर उपलब्ध है, जिसमें छत्तीसगढ़ शासन कौशल विकास विभाग के अधीन संचालनालय रोजगार एवं प्रशिक्षण के अंतर्गत शासकीय औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थाओं में संचालित विभिन्न व्यवसायों में सत्र अगस्त 2020-21 एवं 2020-22 में प्रवेश हेतु निर्धारित संस्थावार/व्यवसायवार सीटों एवं आवश्यक शैक्षणिक अर्हता एवं अन्य समस्त जानकारी दर्शित है, उसे डाउनलोड कर आवेदक उसका सावधानी पूर्वक अध्ययन कर लें।
छत्तीसगढ़ शासन के विद्यमान नियमों एवं नीति के अंतर्गत औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थाओं में प्रवेश के लिए ऑनलाईन रजिस्ट्रेशन करने की अंतिम तिथि 25 अगस्त 2020 तक निर्धारित है। आवेदक को ऑनलाईन रजिस्ट्रेशन (पंजीयन) के लिए अनुसूचित जाति, जनजाति के आवेदक को पोर्टल पर रजिस्ट्रेशन शुल्क 40 रूपए तथा पिछड़ा वर्ग एवं सामान्य वर्ग के आवेदक को 50 रूपए देना होगा। वेबसाईट पर पंजीयन के दौरान रजिस्ट्रेशन शुल्क लोक सेवा केन्द्र (च्वाइस सेंटर) में नगद अथवा स्वयं ऑनलाईन पेमेंट द्वारा शुल्क का भुगतान किया जा सकता है। ऑनलाईन भुगतान हेतु निम्न सुविधाओं का उपयोग कर सकते हैं। इंटरनेट बैंकिंग, एटीएम सह डेबिट कार्ड, क्रेडिट कार्ड या अन्य किसी ऑनलाईन पेमेंट माध्यम से शुल्क का भुगतान किया जा सकता है। एक बार आवेदन रजिस्ट्रेशन होने के पश्चात अपने आवेदन में मोबाइल नम्बर को छोड़कर आवेदन भरने की अंतिम तिथि तक सुधार कर सकते हैं। यदि आवेदक ने अनुसूचित जाति या जनजाति के लिए रजिस्ट्रेशन शुल्क जमा किया है और सुधार के पश्चात अनारक्षित (सामान्य) या अन्य पिछड़ा वर्ग करना चाहता है तो उसे आवेदन शुल्क के अंतर की राशि जमा करनी होगी। व्यवसाय ड्रायवर कम मैकेनिक में प्रवेश के लिए आवेदक की न्यूनतम आयु 1 अगस्त 2020 को 18 वर्ष एवं शेष व्यवसायों के लिए 14 वर्ष से कम नहीं होनी चाहिए। उच्चतम आयु सीमा का बंधन नही है। प्रवेश हेतु स्थानों की संख्या परिवर्तनीय है। चूंकि चयन संबंधी जानकारी एसएमएस के माध्यम से भेजी जाती है, अतः ऑनलाईन रजिस्ट्रेशन के समय आवेदक अपना मोबाइल नम्बर एवं ई-मेल आईडी की जानकारी अवश्य दें, ताकि प्रवेश हेतु चयन संबंधी जानकारी एस.एम.एस. के माध्यम से प्राप्त हो सके। आवेदक का चयन होने पर आवेदक को संबंधित संस्था में आवश्यक समस्त अभिलेखों, प्रमाण पत्रों एवं निर्धारित शुल्क सहित स्वयं उपस्थित होकर प्रवेश लेना होगा। आवेदन हेतु वेबसाईट का लिंक इस प्रकार है-
ओपिनियन / शौर्यपथ / हमारे राष्ट्रीय मानस में पंडित मार्तंड जसराज गहरे बसे रहे। वह हमारे सांस्कृतिक लोकाचार का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रहे हैं। उनके गुजर जाने से जो खालीपन पैदा हुआ है, उसको कभी भरा नहीं जा सकता। यह शून्य मेरे निजी जीवन के लिए कहीं अधिक गहरा है। ऐसा कोई शुभ अवसर मुझे याद नहीं आता, जब उन्होंने अपनी जादुई आवाज में मुझे शुभकामना न दी हो, फिर चाहे वह मौका मेरे गृह प्रवेश का हो या मेरे बेटे की शादी का।
पंडित जसराज हमारी शास्त्रीय गायन परंपरा के महान चटुष्टय के आखिरी स्तंभ थे। ये चार महान गायक थे- किराना घराने से ताल्लुक रखने वाले पंडित भीमसेन जोशी; जयपुर घराने की किशोरी अमोनकर; सेनिया और बनारस घराने की गिरिजा देवी, और मेवाती घराने के खुद पंडित जसराज। भारतीय संगीत के प्रति अपने गहरे लगाव के कारण मुझे इन चारों के साथ निजी ताल्लुकात बनाने का सौभाग्य मिला। हालांकि, कुछ खासियत सिर्फ पंडित जसराज में थीं।
सदाशयता, दुलार और समभाव उनके स्वभाव के खास गुण थे। किसी भी मौके पर मैंने उन्हें नाराज होते नहीं देखा। न तो उनको बेअदब श्रोताओं से कोई शिकायत रही और न ही किसी बीमारी से वह खीझते हुए देखे गए। एक बार उन्हें वायरल बुखार हुआ, तो जब मैंने उनसे अपना ख्याल रखने को कहा, तो मजाकिया अंदाज में उन्होंने जवाब मिला, ‘प्रतिष्ठित संगीत प्रेमियों की उपस्थिति और उनका उत्साह मेरी पीड़ा खत्म कर देती है’।
हिसार में जन्मे पंडित जसराज ने विभिन्न शैलियों के गायन को अपनाते हुए एक लंबी यात्रा तय की। मैंने उनके बड़े भाई पंडित मणिराम द्वारा सिखाए जा रहे कुछ बोलों को भी उनसे सुना है, और वाकई सर्वश्रेष्ठ गुरु-शिष्य परंपरा को एक साथ सुनना मेरे लिए एक अनमोल अनुभव है। मेवाती घराने से संबंध रखने की वजह से उन्होंने विभिन्न संगीत शैलियों का मिश्रण बनाने की कोशिश की। इस अर्थ में उनके पास एक दूरदर्शी नजरिया था। उनका मानना था कि अपनी निर्मलता और मूल को खोए बिना शास्त्रीय परंपरा को आगे बढ़ाना चाहिए। यही कारण है कि मेवाती घराने से सीखने के दौरान उन्होंने अपनी संगीत-शैली, खासतौर से कीर्तन को काफी निखारा। देश-दुनिया में चर्चित ‘जसरंगी’ के वह प्रणेता हैं, जिसमें महिला गायिका के साथ मिलकर वह साथ-साथ गायन किया करते थे। कई अवसरों पर वह ऊं नमो भगवते वासुदेवाय नम: गाया करते, जो श्रोताओं को अध्यात्म के चरम भाव पर में पहुंचा देता था। उनकी एक बड़ी खूबी यह थी कि शास्त्रीय परंपरा को आत्मसात करते हुए वह लगातार उसे सुधारते रहे।
मुझे याद है। 8 मई, 1998 को एक उमस भरी दोपहर में उन्होंने राग धुलिया मल्हार गाने का फैसला किया था। इस राग के बारे में बताते हुए उन्होंने कहा था कि यह बारिश का अग्रदूत है और इसमें बारिश की बूंदें अक्सर धूल कणों से मिलती हैं, ताकि तेज बरसात से पहले धूल का तूफान पैदा हो सके। जब उन्होंने अपना गायन शुरू किया, तब बादल का नामो-निशान नहीं था। मगर गायन के साथ ही दूर बादल दिखने लगे और बूंदाबांदी भी शुरू हो गई, जिससे वातावरण काफी ठंडा हो गया। बादलों की जादुई उपस्थिति और सुदूर हो रही बारिश से वहां मौजूद सभी लोगों को तानसेन की याद हो आई। कहते हैं कि जब तानसेन राग मल्हार गाया करते थे, तो बारिश होने लगती थी और दीपक राग से दीपक जल उठते थे। निश्चय ही, वैसा कि हम सभी ने उस शाम अनुभव किया। पंडित जसराज 21वीं सदी के तानसेन थे।
एक अर्थ में यह विडंबना ही है कि एक व्यक्ति, जिसका जन्म हिसार में हुआ और जो भारत की संगीत परंपराओं को संपूर्णता में जीता रहा, उसने अपनी अंतिम सांस न्यू जर्सी में ली। दुख की इस घड़ी में सांत्वना की बात बस यही है कि वह एक ऐसी विरासत छोड़ गए हैं, जिससे वह बेपनाह प्यार करते थे, यानी छात्रों को शास्त्रीय संगीत की महान भारतीय परंपरा को सिखाने का काम, जिसके वह सर्वश्रेष्ठ वाहक थे। भारतीय शास्त्रीय संगीत परंपरा को वैश्विक बनाने के अपने आह्वान के बाद पंडितजी ने अटलांटा, टम्पा, वैंकूवर, टोरंटो, न्यूयॉर्क, न्यू जर्सी, पिट्सबर्ग, मुंबई और केरल में स्कूलों की स्थापना की।
उनकी बेटी दुर्गा जसराज आखिरी पल तक पंडित जी की देखभाल करती रहीं। वह उनकी प्यारी बेटी हैं और उनसे प्रशिक्षित भी हैं। पंडित जसराज ने उन्हें तिरंगा कार्यक्रम को बढ़ावा देने के लिए खासा प्रोत्साहित किया था, इससे जाने-माने कवि व गीतकार जावेद अख्तर भी जुड़े थे। पंडित जी का यूं जाना मुझे इसलिए और ज्यादा गमगीन कर रहा है, क्योंकि न्यू जर्सी के इस प्रवास में मैं उनसे अक्सर बातें किया करता था और बातचीत में वह अक्सर उत्सुक होकर कहते कि भारत लौटने पर वह संगीत प्रेमियों के लिए अपने गायन का एक कार्यक्रम करेंगे। मेरा यह सपना अब अधूरा ही रहेगा।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उनके निधन पर कहा है, ‘पंडित जसराज जी के निधन से भारतीय सांस्कृतिक क्षेत्र में एक गहरा शून्य पैदा हुआ है। न केवल उनकी प्रस्तुतियां उत्कृष्ट थीं, बल्कि उन्होंने कई अन्य गायकों के एक असाधारण गुरु के रूप में अपनी पहचान भी बनाई’। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी भी, जिनके साथ भी मैंने काम किया है, उन्हें खूब पसंद किया करते थे। वह उन्हें ‘रसराज’ कहकर संबोधित करते थे, जिसका अर्थ होता है रसों का राजा। अंतरराष्ट्रीय खगोलीय संघ ने 2019 में मंगल और बृहस्पति ग्रहों के बीच परिक्रमा करने वाले एक लघु ग्रह का नाम ‘जसराज’ रखा था। अब वह उसी ग्रह-नक्षत्र का हिस्सा बन गए हैं।
भारतीय शास्त्रीय संगीत जिस आध्यात्मिकता की महान विरासत का प्रतिनिधित्व करता है, वह हमेशा आगे बढ़नी चाहिए। पंडित जसराज हम सभी को यह जिम्मेदारी सौंप गए हैं कि सुरीली परंपराएं आम भारतीयों के जीवन में प्रासंगिक बनी रहें। भारतीय शास्त्रीय संगीत में आम लोगों की भागीदारी के लिहाज से उनका अतुलनीय योगदान है। उनका तिरंगा और ऊंची उड़ान भरता रहे।
(ये लेखक के अपने विचार हैं) एन के सिंह, अध्यक्ष, वित्त आयोग
खाना खजाना / शौर्यपथ / आज हम आपके लिए बेसन मेथी थेपला की रेसिपी लेकर आए हैं। यह बड़ी मजेदार डिश है, क्योंकि बच्चे भी इसे बड़े पसंद से खाते हैं। साथ ही ब्रेकफास्ट के लिए भी यह बेस्ट ऑप्शन है।
सामग्री :
1 कप गेहूं का आटा
1/4 कप दही
1/4 कप तेल
1/4 कप बेसन
1/2 कप बारीक कटी हुई हरी मेथी
1/2 छोटा चम्मच धनिया पाउडर
1/4 छोटा चम्मच लाल मिर्च पाउडर
1/4 छोटा चम्मच हल्दी पाउडर
1/4 छोटा चम्मच अजवाइन
नमक स्वादानुसार
विधि :
मेथी थेपला बनाने के लिए सबसे पहले एक बर्तन में गेहूं का आटा, बेसन, लाल मिर्च पाउडर, हल्दी पाउडर, धनिया पाउडर, अजवायन, नमक, कटी हुई मेथी, दही और 2 छोटे चम्मच तेल डालकर अच्छी तरह से मिला लें।
इस मिश्रण को पानी की मदद से गूथ लें। गुथ हुआ आटा नरम रहना चाहिए। गूथने के बाद को आटे को ढक से और बीस मिनट के लिए रख दें। बीस मिनट के बाद हाथों में थोड़ा सा तेल लगाकर आटे को हल्के हाथों से एक बार और गूथ लें, जिससे आटा चिकना हो जाए।
अब तवा को गैस पर रख कर गरम करें। तैयार आटे की लोई बनाकर गेहूं के आटे की मदद से चकले पर रखकर पतला बेल लें। तवा गरम होने पर उस पर थोड़ा सा तेल डालें और पूरे तवे पर फैला लें। इसके बाद बेले हुए थेपले को तवे पर डाल दें और मीडियम आंच पर सेकें।
जब थेपला एक तरफ हल्का सिक जाए, तो उसे पलट दें। इसके बाद एक छोटा चम्मच तेल थेपला पर फैला कर डालें। फिर थेपला को पलट कर थोड़ा सा तेल डालें और उसे उलट-पलट कर सेक लें। इसी तरह से सारे थेपले सेक लें।
लीजिए मेथी का थेपला तैयार है। इन्हें मनचाहे अचार, चटनी या दही के साथ गरमा गर्म सर्व करें।
सेहत / शौर्यपथ / हर किसी को गुस्सा आता है और यह बेहद स्वाभाविक है। लेकिन, अगर आप उनमें से हैं जो अपने गुस्से का इजहार नहीं करते तो सर्तक हो जाइए। अपने गुस्से को व्यक्त करने में न सिर्फ आपकी मानसिक भलाई है बल्कि मस्तिष्काघात (ब्रेन स्ट्रोक)को रोकने में भी यह अहम भूमिका निभाता है। यूनिवर्सिटी ऑफ पिट्सबर्ग के शोधकर्ताओं की टीम ने पाया है कि गुस्से को दबाकर रखने से महिलाओं के कारोटिड धमनियों में गंदगी (प्लाक)जमने लगती है जिससे मस्तिष्काघात का खतरा बढ़ जाता है।
दिमाग को खून सप्लाई करती हैं धमनियां-
यह धमनियों दिमाग तक होने वाली खून की सप्लाई को नियंत्रित करते हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार इन धमनियों में सिकुड़न आने से मस्तिष्काघात का खतरा जानलेवा हो सकता है। पूर्व के शोधों के अनुसार लंबे समय तक तनाव में रहने से दिमाग में सूजन पैदा होती है जिससे मस्तिष्काघात, दिल के दौरे, और सीने में दर्द के खतरे बढ़ जाते हैं।
भावनात्मक अभिव्यक्ति और दिमागी स्वास्थ्य में संबंध-
प्रमुख शोधकर्ता कारेन जाकुबोवस्की ने कहा, हमारे शोध से पता चलता है कि महिलाओं में सामाजिक-भावनात्मक अभिव्यक्ति और दिमाग के स्वास्थ्य के बीच संबंध पाया गया है। इस तरह के शोध महत्वूपर्ण होते हैं क्योंकि यह दर्शाता है कि कैसे किसी महिला का भावनात्मक स्वभाव उसके शारीरिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकता है। इन परिणामों से प्रोत्साहित होकर स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं को अपने रोगियों के सामाजिक-भावनात्मक कारकों को ध्यान में रखते हुए एक निवारक देखभाल योजना की रूपरेखा तैयार करनी चाहिए।
मस्तिष्काघात अमेरिका में मौत का तीसरा सबसे बड़ा कारण है। स्ट्रोक सेंटर के आंकड़ों के अनुसार अमेरिका में हर साल मस्तिष्काघात से 140,000 लोगों की मौत हो जाती है। यूके में मस्तिष्काघात चौथा सबसे बड़ा मौता का कारण है। यहां साल भर में करीब 100,000 लोगों की मौत मस्तिष्काघात के कारण हो जाती है।
एथेरोस्क्लेरोसिस ब्रेन स्ट्रोक का कारण-
एथेरोस्क्लेरोसिस ब्रेन स्ट्रोक का एक प्रमुख कारण है। यदि पट्टिका फट जाती है, तो यह एक रक्त का थक्का बना सकता है जो आगे मस्तिष्क तक ऑक्सीजन युक्त रक्त के प्रवाह को अवरुद्ध करता है। महिलाओं में पुरुषों की तुलना में स्ट्रोक का खतरा अधिक होता है और उनके ठीक होने की संभावना कम होती है। यह मासिक धर्म चक्र, हार्मोनल गर्भ निरोधकों और गर्भावस्था की जटिलताओं से जुड़ा हुआ है।
शोधकर्ता इस बात की जानने के इच्छुक थे कि गुस्से को स्वयं दबा लेने से महिलाओं पर क्या प्रभाव पड़ता है। उन्होंने लिखा, कई लोगों ने तर्क से बचने या किसी रिश्ते के टूटने से बचाने के प्रयास में अपने विचारों और भावनाओं को अंदर ही छुपा या दबा लेते हैं। गुस्से को दबा लेने से महिलाएं के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य में गिरावट आती है।
ऐसे किया गया अध्ययन-
इसे समझने के लिए वैज्ञानिकों ने 40 से 60 साल के उम्र की 304 महिलाओं पर शोध किया। यह सभी महिलाएं धूम्रपान नहीं करती थीं। इन महिलाओं से पूछा गया कि यह कितनी जल्दी-जल्दी अपने गुस्से को व्यक्त करती थीं। अल्ट्रासाउंड स्कैन की मदद से उनके कारोटिड धमनियों ने जमा गदंगी के स्तर को आंका गया।
इन परिणामों से पता चला कि जो महिलाएं अपने गुस्से को दबा रही थीं उनमें एथेरोस्क्लेरोसिस का खतरा ज्यादा था। पूर्व के शोधों में कहा गया है कि दिमाग के तनाव का स्तर बढ़ने से दिमाग बोन मैरो को संकेत भेजता है कि वो और सफेद रक्त कोशिकाएं बनाए। यह सफेद कोशिकाएं धमनियों में सूजन पैदा कर सकती हैं।
गुस्से का इंसानी शरीर पर असर-
- शरीर में एड्रिनालिन और नोराड्रिनलिन हॉर्मोंस का स्तर बढ़ जाता है
- उच्च रक्तचाप, सीने में दर्द, तेज सिर दर्द, माइग्रेन, एसिडिटी जैसी कई शारीरिक बीमारियां हो सकती हैं।
- जो लोग जल्दी-जल्दी और छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा हो जाते हैं, उन्हें स्ट्रोक, किडनी की बीमारियां और मोटापा होने का जोखिम होता है।
- ज्यादा पसीना आना, अल्सर और अपच जैसी शिकायतें भी गुस्से की वजह से हो सकती हैं।
- ज्यादा गुस्से की वजह से दिल के रक्त को पंप करने की क्षमता में कमी आती है और इसकी वजह से दिल की मांसपेशियों को क्षति पहुंचती है।
- लगातार गुस्से से रैशेज, मुंहासे जैसी स्किन से जुड़ी बीमारियां हो सकती हैं।
लाइफस्टाइल / शौर्यपथ / प्राकृतिक नियमों के अनुसार एक महिला तभी तक गर्भधारण कर सकती है जब तक उसे मासिक धर्म आता है। सामान्तय महिलाएं 50 साल की उम्र में रजोनिवृत्ति (मेनोपॉज) की अवस्था प्राप्त कर लेती हैं। रजोनिवृत्ति वो अवस्था होती है जब मासिक धर्म बंद हो जाते हैं और गर्भधारण करने की क्षमता समाप्त हो जाती है। लेकिन, अब वैज्ञानिकों ने एक ऐसा प्रजजन संबंधी इलाज ढूंढ़ निकाला है जिसकी मदद से रजोनिवृत्ति के बाद भी महिलाएं मां बन सकेंगी।
ग्रीस में वैज्ञानिकों ने ऐसा ही एक इलाज विकसित किया है जिसकी मदद से रजोनिवृत्ति प्राप्त कर चुकी तीन महिलाओं ने बच्चों को जन्म दिया है। ग्रीस के जेनेसिस एथेंस फर्टिलिटी क्लीनिक के विशेषज्ञों ने इस इलाज में एक ऐसी तकनीक का इस्तेमाल किया है जिसका इस्तेमाल घावों को जल्द ठीक करने के लिए किया जाता है। यह तकनीक ऊतकों और रक्त वाहिकाओं को बढ़ावा देती है। इस तकनीक को प्लेटलेट रिच प्लाजमा (पीआरपी) कहते हैं।
ऐसे किया गया शोध-
क्लीनिक के विशेषज्ञों ने 46 से 49 साल के उम्र की महिलाओं के अंडाशय में पीआरपी इंजेक्ट किया। यह सभी महिलाएं रजोनिवृत्ति को प्राप्त कर चुकी थीं। जब महिलाएं रजोनिवृत्ति प्राप्त कर लेती हैं तब वे गर्भधारण नहीं कर पातीं। नए इलाज की मदद से 70 फीसदी प्रतिभागियों में मासिक धर्म को दोबारा शुरू किया जा सका।
इनमें वे महिलाएं शामिल थीं जिन्हें पांच साल से मासिक धर्म नहीं हुआ था। शोधकर्ताओं की टीम ने तीन महिलाओं से अंडे लिए और उन्हें लैब में निषेचित किया। फिर इससे उन्हें गर्भधारण कराया गया।
ज्यादा उम्र में मां बनना होगा आसान-
क्लीनिक के विशेषज्ञ कोंस्टानटिनोस पानटोस ने कहा कि यह इलाज ज्यादा उम्र में भी महिलाओं को मां बनने में मदद करेगा। उन्होंने कहा, कई महिलाएं 40 की उम्र तक अपने करियर पर ध्यान देती हैं और फिर बच्चों के बारे में सोचती हैं। ऐसे में कई महिलाओं के रजोनिवृत्ति की उम्र आ जाती है और वे बच्चे पैदा नहीं कर पाती। पानटोस ने कहा कि इस इलाज के लिए भी महिलाओं की उम्र सीमा तय करना जरूरी है।
लाइफस्टाइल / शौर्यपथ / शहद को सेहत और स्किन दोनों के लिए बेहद कारगर माना जाता है। रोजाना एक चम्मच शहद के सेवन से आपकी सेहत ठीक रहती है बल्कि इससे आपकी स्किन में भी निखार आता है लेकिन अक्सर शहद की शुद्धता को लेकर मन में सवाल उठते हैं, ऐसे में आप इन उपायों से असली-नकली शहद की पहचान कर सकते हैं-
ऐसे करें शहद की पहचान
विनिगर और पानी के सॉलूशन में शहद की कुछ बूंदें डालें। अगर इस मिश्रण में फोम यानी झाग बनने लगता है तो इसका मतलब है कि आपके शहद में मिलावट की हुई है और शहद शुद्ध नहीं है। जब शहद को गर्म चीज के संपर्क में लाया जाता है तो शहद जलता नहीं है। इस टेस्ट को करने के लिए शहद में कॉटन बड या माचिस की तीली को डुबोएं और फिर उसे जलाने की कोशिश करें। अगर वो जल जाता है तो इसका मतलब है कि शहद शुद्ध है। अगर शहद मिलावटी है तो वह सही तरीके से जलेगा नहीं, अगर आपका शुद्ध शुद्ध है तो वह पानी में पूरी तरह से घुलेगा नहीं और एक बार घोलने के बाद आपको काफी मेहनत करनी पड़ेगी ताकि शहद पानी में घुल जाए लेकिन अगर शहद मिलावटी है और उसमें चीनी का ग्लूकोज की मिलावट की गई है तो वह आसानी से पानी में घुल जाएगा और फिर सफेद मार्क छोड़ देगा।
धर्म संसार / शौर्यपथ / 18 अगस्त 2020, मंगलवार को कुशोत्पाठिनी अमावस्या है। इस दिन पोला पिठोरा पर्व मनाया जाता है। भाद्रपद मास की इस अमावस्या तिथि को कुशग्रहणी अमावस्या कहते हैं।
अगस्त महीने में खेती-किसानी का काम समाप्त हो जाने के बाद भाद्रपद मास की कृष्ण पक्ष की अमावस्या को पोला त्योहार मनाया जाता है। प्रतिवर्ष पिठोरी अमावस्या पर मनाया जाने वाला पोला-पिठोरा पर्व मूलत: खेती-किसानी से जुड़ा त्योहार है। भाद्रपद कृष्ण अमावस्या को यह पर्व विशेषकर महाराष्ट्र, कर्नाटक एवं छत्तीसगढ़ में मनाया जाता है।
महाराष्ट्रीयन समाज में पिठोरी अमावस्या पर पोला (पोळा) पर्व धूमधाम से मनाया जाता है और यह छत्तीसगढ़ का लोक पर्व भी है। इस दिन अपने पुत्रों की दीर्घायु के लिए चौसष्ठ योगिनी और पशुधन का पूजन किया जाएगा। इस अवसर पर जहां घरों में बैलों की पूजा की जाएगी, वहीं लोग पकवानों का लुत्फ भी उठाएंगे। इसके साथ ही इस दिन 'बैल सजाओ प्रतियोगिता' का आयोजन किया जाता है।
पोला त्योहार मनाने के पीछे यह कहावत है कि अगस्त माह में खेती-किसानी का काम समाप्त होने के बाद इसी दिन अन्नमाता गर्भ धारण करती है यानी धान के पौधों में इस दिन दूध भरता है इसीलिए यह त्योहार मनाया जाता है। यह त्योहार पुरुषों-स्त्रियों एवं बच्चों के लिए अलग-अलग महत्व रखता है। इस दिन पुरुष पशुधन (बैलों) को सजाकर उनकी पूजा करते हैं।
स्त्रियां इस त्योहार के वक्त अपने मायके जाती हैं। छोटे बच्चे मिट्टी के बैलों की पूजा करते हैं। इस दिन पोला पर्व की शहर से लेकर गांव तक धूम रहती है। इस दौरान जगह-जगह बैलों की पूजा-अर्चना होती है। गांव के किसान भाई सुबह से ही बैलों को नहला-धुलाकर सजाएंगे और फिर घरों में लाकर विधि-विधान से उनकी पूजा-अर्चना करके घरों में बने पकवान उन्हें खिलाते हैं।
पर्व के 2-3 दिन पहले से ही बाजारों में मिट्टी के बैलजोड़ी बिकते दिखाई देते हैं। बढ़ती महंगाई के कारण इनके दामों में भी बढ़ोतरी हो गई है। इसके अलावा मिट्टी के अन्य खिलौनों की भी भरमार बाजारों में दिखाई देती है। लेकिन इस बार कोरोना वायरस के चलते पोला पर्व पर हमेशा जैसी रौनक नहीं होगी। महाराष्ट्र में कोरोना की अधिकता के कारण यह पर्व बेजान और फीका-फीका रहने की संभावना है। इस दिन मिट्टी और लकड़ी से बने बैल चलाने की भी परंपरा है। पहले कई गांवों में इस अवसर पर बैल दौड़ का भी आयोजन किया जाता था, लेकिन समय के साथ यह परपंरा अब समाप्त होने लगी है। इस अवसर पर बैल दौड़ और बैल सौंदर्य प्रतियोगिता का आयोजन किया जाता है। इसमें अधिक से अधिक किसान अपनी बैलों के साथ भाग लेते हैं। खास सजी-संवरी बैलों की जोड़ी को इस दौरान पुरस्कृत भी किया जाता है। लेकिन इस बार यह रौनक नजर नहीं आ पाएगी।
दरअसल, यह त्योहार कृषि आधारित पर्व है। वास्तव में इस पर्व का मतलब खेती-किसानी, जैसे निंदाई-रोपाई आदि का कार्य समाप्त हो जाना है, लेकिन कई बार अनियमित वर्षा के कारण ऐसा नहीं हो पाता है। बैल किसानों के जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा होता है। किसान बैलों को देवतुल्य मानकर उसकी पूजा-अर्चना करते हैं।
महाराष्ट्रीयन परिवारों में पोला पर्व के दिन घरों में खासतौर पर पूरणपोली (पूरणपोळी/ पोसाटोरी) और खीर बनाई जाती है। बैलों को सजाकर उनका पूजन किया जाता है, फिर उन्हें पूरणपोली और खीर भी खिलाई जाती है। शहर के प्रमुख स्थानों से उनकी रैली निकाली जाती है।
जिन-जिन घरों में बैल होते हैं, वे इस दिन अपने बैलों की जोड़ी को अच्छी तरह सजा-संवारकर इस दौड़ में लाते हैं। मोती मालाओं तथा रंग-बिरंगे फूलों और प्लास्टिक के डिजाइनर फूलों और अन्य आकृतियों से सजी खूबसूरत बैलों की जोड़ी हर इंसान का मन मोह लेती है।
कई समाजवासी पोला पर्व को बहुत ही उत्साहपूर्वक मनाते हैं। बैलों की जोड़ी का यह पोला उत्सव देखते ही बनता है। खासतौर पर छत्तीसगढ़ में इस लोकपर्व पर घरों में ठेठरी, खुरमी, चौसेला, खीर-पूरी जैसे कई लजीज व्यंजन बनाए जाते हैं।
इस पूजन के बाद माताएं अपने पुत्रों से पहले 'अतिथि कौन?' इस तरह पूछेंगी और इस दौरान पुत्र अपना नाम माता को बताएंगे, उसके बाद ही पूरणपोली और खीर का प्रसाद ग्रहण करेंगे। महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ में मनाया जाने वाला लोक पर्व का यह नजारा देखने में बहुत ही खूबसूरत दिखाई देता है, लेकिन इस बार शायद यह संभव नहीं हो पाएगा।
कुशोत्पाटनी अमावस्या 2020 : जानिए इस दिन क्या करें,क्या न करें
18 अगस्त 2020 को कुशोत्पाटनी अमावस्या है। इसे कुशग्रहणी अमावस्या भी कहते हैं। कुशोत्पाठिनी अमावस्या और पोला पिठोरा भी कुछ लोग कहते हैं...कुशोत्पाटनी अमावस्या पर उखाड़ा गया कुश 1 वर्ष तक प्रयोग किया जा सकता है। सामान्यत: किसी भी अमावस्या को उखाड़ा गया कुश 1 मास तक प्रयोग किया जा सकता है।
कुश को हमारे शास्त्रों में विशेष शुद्ध माना गया है। हमारे शास्त्रों में जप इत्यादि करते समय कुश को पावित्री के रूप में धारण करने का नियम है। कुश उखाड़ने के लिए श्रद्धालुओं को निम्न रीति का प्रयोग करना चाहिए। श्राद्ध पक्ष में कुश की महती आवश्यकता होती है।
1. प्रात: काल स्नान के उपरांत सफेद वस्त्र धारण कर कुश उखाड़ें।
2. कुश उखाड़ते समय अपना मुख उत्तर या पूर्व की ओर रखें।
3. सर्वप्रथम 'ॐ' बोलकर कुश का स्पर्श करें। फ़िर निम्न मंत्र पढ़कर प्रार्थना करें-
'विरंचिना सहोत्पन्न परमेष्ठिनिसर्जन।
नुद सर्वाणि पापानि दर्भ! स्वस्तिकरो भव॥'
4. तत्पश्चात् हथेली और अंगुलियों के द्वारा मुट्ठी बनाकर एक झटके से कुश उखाड़ें। कुश को एक बार में ही उखाड़ना चाहिए। अत: पहले उसे लकड़ी के नुकीले टुकड़े से ढीला कर लें, लोहे का स्पर्श ना करावें।
5. कुश उखाड़ते समय 'हुं फ़ट्' कहें।
प्रयोग करने योग्य कुश-
1. जिसका अग्रभाग कटा न हो।
2. जो जला हुआ ना हो।
3. जो मार्ग या गंदे स्थान पर ना हो।
नजरिया / शौर्यपथ / शनिवार को जब देश स्वतंत्रता दिवस के जश्न में डूबा था, तमिलनाडु के वरिष्ठ मंत्री मुख्यमंत्री ई पलानीसामी और उप-मुख्यमंत्री ओ पनीरसेल्वम के बीच सुलह-समझौते कराने में व्यस्त थे। देर शाम मुख्यमंत्री व उप-मुख्यमंत्री ने एक साझा बयान जारी करते हुए पार्टी के नेताओं को सख्त निर्देश दिया कि वे मीडिया में पार्टी या नेतृत्व पर किसी तरह की टीका-टिप्पणी से बचें। यह बयान, दरअसल दोनों नेताओं के बीच सरकार व पार्टी पर नियंत्रण बनाने के सवाल पर चल रहे परोक्ष युद्ध का नतीजा है, जिसका दायरा बढ़कर समर्थकों तक पहुंच गया है। इन सबकी शुरुआत एक मंत्री के उस बयान से हुई, जिसमें जोर दिया गया कि अन्नाद्रमुक पार्टी अपने नेता ई पलानीसामी को बतौर चेहरा पेश करते हुए विधानसभा चुनाव लड़ेगी। जवाब में एक अन्य मंत्री ने कहा कि चुनाव के बाद विधायक अपना नेता खुद चुनेंगे। स्वतंत्रता दिवस के दिन हालात बिगड़ गए, जब पनीरसेल्वम के समर्थकों ने उन्हें मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करने की मांग वाले पोस्टर उनके गृहनगर में चिपकाए और पलानीसामी के समर्थकों ने उसे फाड़ दिया। नतीजतन, चेन्नई में पनीरसेल्वम के घर पर शांति बैठक हुई, जिसमें पलानीसामी के 10 मंत्रियों ने उप-मुख्यमंत्री के साथ गंभीर विमर्श किया। इसके बाद प्रस्ताव मुख्यमंत्री को भेजे गए थे, जिसका नतीजा यह संयुक्त बयान रहा। हालांकि, इसमें असल मुद्दा गौण है और उस पर चर्चा की बजाय पार्टी के नेताओं के लिए सलाह जारी की गई है।
पनीरसेल्वम दो बार कार्यवाहक मुख्यमंत्री बन चुके हैं, जब जयललिता को भ्रष्टाचार के मामले में जेल जाना पड़ा था। दोनों बार उन्होंने वफादार की तरह अपने कर्तव्यों का पालन किया। अम्मा की मौत के बाद उनकी सहयोगी वी के शशिकला ने उन्हें तीसरी बार यह दायित्व सौंपा। संदेश साफ था कि पिछली दो पारियों की वजह से उनको यह पद सौंपा गया है, इसलिए उन्हें अपनी महत्वाकांक्षा जाहिर नहीं करनी चाहिए। 31 दिसंबर, 2016 को शशिकला ने औपचारिक रूप से अन्नाद्रमुक की बागडोर संभाल ली और 5 फरवरी, 2017 को उन्हें विधायक दल का नेता भी चुन लिया गया। नतीजतन, अगले दिन ही पनीरसेल्वम ने पद छोड़ दिया, लेकिन राज्यपाल ने उन्हें पद पर बने रहने का कहा, क्योंकि आय से अधिक संपत्ति के मामले में वह एक फैसले का इंतजार कर रहे थे, जो शशिकला के खिलाफ आया और उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। लिहाजा शशिकला की नई पसंद पलानीसामी बने।
पलानीसामी और पनीरसेल्वम के बीच गुटीय लड़ाई रोकने के लिए केंद्र ने एक सौदा किया, क्योंकि एकजुट अन्नाद्रमुक हर किसी के हित में था। शायद इसी सौदे के तहत पलानीसामी के पद पर बने रहने की सहमति बनी और पनीरसेल्वम उप-मुख्यमंत्री बनाए गए। पनीरसेल्वम को पार्टी संयोजक बनाकर अन्नाद्रमुक की बागडोर भी उन्हीं के हाथों में सौंपी गई। पर यह पूर्ण व्यवस्था नहीं थी, पलानीसामी को सह-संयोजक बनाया गया व महासचिव का पद खाली रखा गया। भाजपा की मंशा शायद यह थी कि जब तक राज्य में उसका समर्थन-आधार नहीं बन जाता, तब तक सूबे की मित्र-सरकार की मदद से अपनी पकड़ मजबूत बनाकर रखी जाए। अगर उसकी यह योजना थी, तो यह कारगर साबित नहीं हुई है, क्योंकि पलानीसामी धीरे-धीरे मजबूत हुए हैं।
बहरहाल, मुख्यमंत्री ने पिछले पखवाड़े में नई शिक्षा नीति की मुखालफत करके अपने प्रशंसकों व आलोचकों को चौंका दिया। गणेश चतुर्थी के जुलूस पर पाबंदी लगााने से भी उनके आलोचक मुखर हुए हैं। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष ने तो यह तक दावा किया है कि उनकी पार्टी अगले विधानसभा चुनाव में एजेंडा तय करेगी। आमतौर पर तमिलनाडु में राष्ट्रीय पार्टियां जूनियर सहयोगी रही हैं, इसलिए उनका यह बयान चौंकाने वाला है, क्योंकि सूबे में भाजपा का आधार सीमित है। चूंकि सितंबर के पहले हफ्ते में शशिकला की रिहाई हो सकती है, इसलिए माना जा रहा है कि उनके सक्रिय होने से पहले ही पलानीसामी और पनीरसेल्वम अपनी हैसियत मजबूत बनाना चाहते हैं। अब जबकि विधानसभा चुनाव आठ महीने दूर है, दोनों नेता अपने-अपने तरीके से नैरेटिव गढ़ना चाहते हैं। पैर जमाने के लिए भाजपा की आक्रामक नीति ने भी यहां के चुनावी माहौल को दिलचस्प बना दिया है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं) एस श्रीनिवासन, वरिष्ठ पत्रकार
सम्पादकीय / शौर्यपथ / सोशल मीडिया के जिस मंच को दुनिया भर में अभिव्यक्ति की आजादी का सबसे बड़ा अलंबरदार माना जाता रहा है, उस ‘फेसबुक’ पर इन दिनों जैसी तोहमतें लग रही हैं, वे यकीनन स्वतंत्र अभिव्यक्ति के पैरोकारों को निराश करने वाली हैं। लेकिन उतनी ही चिंताजनक बात यह भी है कि इस कंपनी की एक वरिष्ठ अधिकारी को धमकाने की कोशिश की गई है। फेसबुक की क्षेत्रीय पब्लिक पॉलिसी डायरेक्टर अंखी दास ने दिल्ली पुलिस में इस बाबत शिकायत दर्ज कराई है। विडंबना देखिए, जिस नफरती प्रवृत्ति के खिलाफ कथित नरमी बरतने के आरोपों पर फेसबुक को सफाई देनी पड़ रही है, उसकी अधिकारी अब दूसरी तरफ के असहिष्णु लोगों के निशाने पर हैं। दरअसल, पिछले दिनों एक बड़े अमेरिकी अखबार ने खबर छापी थी कि फेसबुक कंपनी भारत में पक्षपाती भूमिका अपना रही है और सत्ताधारी नेताओं की घोर सांप्रदायिक टिप्पणियों को भी प्रतिबंधित नहीं कर रही। जाहिर है, विपक्ष को एक मौका हाथ लग गया है और वह इसे यूं ही नहीं छोड़ना चाहता।
‘हेट स्पीच’ और नुकसानदेह सामग्रियों के खिलाफ फेसबुक में बाकायदा एक बड़ा विभाग है और उसका काम ही है ऐसी सामग्रियों की निगरानी करना और उन्हें प्रकाशित-प्रसारित होने से रोकना, जो न सिर्फ नस्लीय घृणा, सांप्रदायिक विद्वेष को बढ़ावा देने वाली हों, बल्कि जो मानव स्वास्थ्य को किसी भी रूप में नुकसान पहुंचाने वाली हों। मौजूदा कोरोना काल में हमने देखा और महसूस भी किया कि इसके इलाज के तरह-तरह के टोटकों और फर्जी तजवीजों के खिलाफ फेसबुक ने तत्परता से कदम उठाया। इसमें कोई दोराय नहीं कि यह बेहद मुश्किल काम है, क्योंकि दुनिया भर में हर सेकंड छह नए यूजर इस माध्यम से जुड़ रहे हैं और रोजाना लाखों तस्वीरें व टिप्पणियां इस पर पोस्ट की जा रही हैं। ऐसे में, इस माध्यम की बुनियादी खूबी की रक्षा करते हुए इसके दुरुपयोग को रोकना एक बहुत बड़ी चुनौती है। कंपनी ने प्रकारांतर से स्वीकार भी किया है कि उसे अभी इस दिशा में काम करने की जरूरत है।
लेकिन फेसबुक एक कारोबारी कंपनी है और व्यावसायिक हित-अहित से संचालित उसकी नीतियां तभी तक मान्य हैं, जब तक उसकी पहुंच वाले देशों के आंतरिक मामलों में वे कोई बाधा नहीं खड़ी करतीं। भारत में जो ताजा विवाद खड़ा हुआ है, वह राजनीतिक पक्षधरता से जुड़ा है, इसीलिए इसे गंभीरता से लिया जा रहा है। हालांकि, फेसबुक ने अपनी सफाई पेश की है कि उसकी नीतियां तटस्थता पर आधारित हैं और वे किसी देश की किसी पार्टी से प्रभावित नहीं हैं। लेकिन दुर्योग से कई अन्य देशों में ऐसे ही आरोप उस पर पहले भी लग चुके हैं। तुर्की में तो इस पर प्रतिबंध लगाने के लिए सांसद बाकायदा एक कानूनी मसौदा तैयार कर रहे हैं। हमारे यहां फेसबुक यूजर्स की संख्या 34 करोड़ से भी अधिक है। इतने बड़े बाजार को कंपनी नजरअंदाज नहीं कर सकती, क्योंकि किसी भी कंपनी की तरक्की में साख का बड़ा योगदान होता है। बहरहाल, हमें यह तो देखना ही पडे़गा कि कोर्ई भी बाहरी तत्व हमारी लोकतांत्रिक प्रक्रिया को किसी रूप में प्रभावित न करने पाए। अपनी सुरक्षा के मद्देनजर हमने चीन के दर्जनों एप को अभी हाल में ही प्रतिबंधित किया है, तो फेसबुक और ट्विटर जैसे जन-प्रभावशाली माध्यमों पर भी हमें हर पल नजर रखनी होगी।
Feb 09, 2021 Rate: 4.00
