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May 31, 2026
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शौर्यपथ / पंचांग शब्द सुनकर यह जिज्ञासा होती है कि इसके पंच अंग कौन-कौन से हैं। पंचांग में तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण को शामिल किया जाता है। तिथियां, प्रतिपदा से पूर्णिमा-अमावस्या सहित, कुल 16 हैं। वहीं अभिजित को मिलाकर कुल 28 नक्षत्र होते हैं। योग की संख्या 27 और करण की 16 है।

वार सात हैं। जन्म के नक्षत्रों से पता चल जाता है कि आदमी किस ग्रह की दशा के प्रभाव में है। नौ ग्रह- केतु, शुक्र, सूर्य, चंद्रमा, मंगल, राहु, गुरु, शनि और बुध 27 नक्षत्रों के स्वामी हैं। अभिजित नक्षत्र, जो हर दिन दोपहर में सदैव विराजमान होता है, उसका स्वामी सूर्य-चंद्रमा को माना जाता है। देवी-देवताओं में प्रथम पूज्य विनायक का जन्म शतभिषा नक्षत्र में, भगवान राम का जन्म पुष्य नक्षत्र, तो कृष्ण का जन्म रोहिणी नक्षत्र में हुआ था।

अश्विनी, मघा और मूल नक्षत्र के स्वामी केतु हैं। शुक्र स्वामी हैं भरणी, पूर्वा फाल्गुनी और पूर्वाषाढ़ा के, वहीं सूर्य कृतिका, उत्तरा फाल्गुनी और उत्तराषाढ़ा के स्वामी हैं। चंद्रमा राोहिणी, हस्त और श्रवण के स्वामी हैं, तो मंगल मृगशिरा, चित्रा और धनिष्ठा के स्वामी हैं। राहु आद्र्रा, स्वाति और शतभिषा नक्षत्र के स्वामी हैं, जबकि गुरु पुनर्वसु,विशाखा और पूर्वाभाद्रपद के। शनि पुष्य,अनुराधा और उत्तराभाद्रपद के और बुध अश्लेषा, ज्येष्ठा और रेवती नक्षत्र के स्वामी हैं। सभी नक्षत्रों के राजा पुष्य हैं।
नक्षत्रों के देवता इस प्रकार हैं- देव वैद्य अश्विनी कुमार अश्विनी नक्षत्र के देवता हैं। भरणी के देवता यम, तो कृतिका के अग्निदेव हैं। रोहिणी के ब्रह्मा, तो मृगषिरा के देवता चंद्रमा हैं। आद्र्रा के देवता रुद्र-शिव, तो पुनर्वसु की देवी अदिति हैं। पुष्य के देवता बृहस्पति और अश्लेषा के सर्प हैं। मघा के देवता पितर, पूर्वा फाल्गुनी के भग और उत्तराफाल्गुनी के अर्यमा हैं। हस्त के देवता सूर्य हैं, चित्रा के विश्वकर्मा व स्वाति के वायु हैं। विशाखा के देवता इंद्राग्नि, अनुराधा के मित्र और ज्येष्ठा के इंद्र हैं। मूल नक्षत्र के देवता निऋर्ित (राक्षस) हैं। पूर्वाषाढ़ा के देवता जल और उत्तराषाढ़ा के विष्वदेव हैं। अभिजित नक्षत्र के देवता सृष्टिकर्ता ब्रह्माजी हैं। श्रवण के देवता विष्णु और धनिष्ठा के वसु हैं। शतभिषा के देवता वरुण, पूर्वाभाद्रपद के अजैकपाद, उत्तराभाद्रपद के देवता अहिर्बुधन्य और रेवती के देवता पूषा हैं।

 

धर्म संसार / शौर्यपथ / श्रीमद्भागवत पुराण के अनुसार, सतयुग में उत्तर प्रदेश के हरदोई में ही नरसिंह व वामन अवतार हुआ था। कथा है कि देव व दैत्यों के युद्ध में दैत्य पराजित होने लगे। दैत्य राज बलि भी इंद्र के वज्र से मृत हो गए। तब दैत्यों के गुरु शुक्राचार्य ने अपनी मृत संजीवनी विद्या से बलि और दूसरे दैत्यों को जीवित कर दिया। राजा बलि के लिए गुरु शुक्राचार्य ने एक यज्ञ का आयोजन किया और अग्नि से दिव्य रथ, वाण व अभेद्य कवच प्राप्त किए। इससे असुरों की शक्ति बढ़ गई। असुर सेना ने इंद्र की राजधानी अमरावती पर आक्रमण कर दिया। देवराज इंद्र को पता चला कि सौ यज्ञ पूरा करने के बाद बलि स्वर्ग को पाने में सक्षम हो जाएगा।

तब देवराज इंद्र सहायता के लिए श्रीहरि के पास पहुंचे। भगवान विष्णु ने उनकी सहायता के लिए आश्वासन दिया और माता अदिति के गर्भ से वामन रूप में जन्म लेने का वचन दिया। बलि द्वारा देवों के पराभव के बाद ऋषि कश्यप के कहने पर माता अदिति ने पयोव्रत का अनुष्ठान किया। तब भगवान विष्णु भाद्रपद शुक्ल पक्ष की द्वादशी को माता अदिति के गर्भ से जन्मे और ब्राह्मण रूप धारण किया।

इस दिन भगवान वामन की पूजा-आराधना की जाती है। विष्णु के 10 अवतारों के क्रम में पांचवां अवतार वामन का था और 24 अवतारों के क्रम में 15वां अवतार था। वामन अवतार पिता से आज्ञा लेकर राजा बलि के पास दान मांगने के लिए गए। उस समय राजा बलि नर्मदा के तट पर अंतिम यज्ञ कर रहे थे। राजा बलि ने भगवान का आतिथ्य सत्कार कर आसन प्रदान किया। तब राजा बलि को भगवान ने दान की महत्ता को समझाकर यज्ञ के लिए तीन पग भूमि की याचना की। वामन भगवान की शिक्षा से प्रभावित होकर राजा बलि ने और अधिक मांगने का आग्रह किया। लेकिन भगवान अपनी तीन पग भूमि की याचना पर ही अड़े रहे।

गुरु शुक्राचार्य ने बलि को सतर्क भी किया, पर बलि ने इस पर ध्यान नहीं दिया। फिर वामन भगवान ने विराट रूप धारण कर दो पग में ही तीनों लोकों को नाप लिया और बलि से पूछा- राजन अब मैं अपना तीसरा पैर कहां रखूं? राजा बलि के समक्ष संकट उत्पन्न हो गया कि वचन न पूरा करने पर अधर्म होगा। इसलिए बलि ने कहा- ‘भगवान अब तो मेरा सिर ही बचा है। आप इस पर पैर रख दीजिए, क्योंकि संपत्ति का मालिक संपत्ति से बड़ा होता है।’ राजा की इस बात से वामन प्रसन्न हो गए। बलि की दानवीरता से प्रसन्न होकर भगवान ने उसे चिरंजीवी रहने का वरदान देकर पाताललोक का स्वामी बना दिया और बलि के साथ सदा पाताल लोक में द्वारपाल बनकर रहने का वर भी दिया।

इस दिन भगवान वामन की मूर्ति या चित्र की पूजा करें। मूर्ति है तो दक्षिणावर्ती शंख में गाय का दूध लेकर अभिषेक करें। चित्र है तो समान्य पूजा करें। इस दिन भगवान वामन का पूजन करने के बाद कथा सुनें और बाद में आरती करें। अंत में चावल, दही और मिश्री का दान कर किसी गरीब या ब्राह्मण को भोजन कराएं।

 

धर्म संसार / शौर्यपथ / हिंदी पंचांग के अनुसार, भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को महालक्ष्मी व्रत होता है। इस वर्ष महालक्ष्मी का व्रत आज 25 अगस्त दिन मंगलवार से प्रारंभ हो रहा है। धन-संपदा और समृद्धि की देवी माता महालक्ष्मी की पूजा भाद्रपद शुक्ल अष्टमी से प्रारंभ होकर 16 दिनों तक आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि तक होती है। महालक्ष्मी का व्रत गणेश चतुर्थी के चार दिन बाद से प्रारंभ होती है। जो लोग 16 दिनों तक महालक्ष्मी का व्रत नहीं रख पाते हैं, वे पहले और आखिरी दिन महालक्ष्मी व्रत रखते हैं। आइए जानते हैं महालक्ष्मी व्रत, पूजा मुहूर्त और महत्व के बारे में।

महालक्ष्मी व्रत प्रारंभ: 25 अगस्त 2020, दिन मंगलवार से।

महालक्ष्मी व्रत समापन: 10 सितंबर 2020, दिन गुरुवार तक।

महालक्ष्मी व्रत मुहूर्त: भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी ति​थि का प्रारंभ 25 अगस्त को दोपहर 12 बजकर 21 मिनट से हो रहा है, जो 26 अगस्त को सुबह 10 बजकर 39 मिनट तक है।

महालक्ष्मी व्रत का महत्व

भाद्रपद शुक्ल अष्टमी को महालक्ष्मी व्रत होता है, इस दिन राधा अष्टमी यानी राधा जयंती भी मनाई जाती है। अष्टमी के दिन प्रारंभ होने वाला महालक्ष्मी व्रत अत्यंत महत्वपूर्ण होता है क्योंकि इस दिन दूर्वा अष्टमी व्रत भी होता है। दूर्वा अष्टमी को दूर्वा घास की पूजा की जाती है। महालक्ष्मी व्रत धन, ऐश्वर्य, समृद्धि और संपदा की प्रात्ति के लिए किया जाता है। इस दिन लोग धन-संपदा की देवी माता लक्ष्मी को प्रसन्न करने का प्रयास करते हैं।

महालक्ष्मी पूजा

जो लोग माता महालक्ष्मी का व्रत करते हैं, वे पहले दिन पूजा के समय हल्दी से रंगे 16 गांठ वाला रक्षासूत्र अपने हाथ में बांधते हैं। 16वें द‍िन व्रत का व‍िध‍िपूर्व उद्यापन क‍िया जाता है और उसे रक्षासूत्र को नदी या सरोवर में व‍िसर्जित क‍िया जाता है। महालक्ष्‍मी की पूजा में हर द‍िन मां लक्ष्‍मी के इन आठ नामों ऊं आद्यलक्ष्म्यै नम:, ऊं विद्यालक्ष्म्यै नम:, ऊं सौभाग्यलक्ष्म्यै नम:, ऊं अमृतलक्ष्म्यै नम:, ऊं कामलक्ष्म्यै नम:, ऊं सत्यलक्ष्म्यै नम:, ऊं भोगलक्ष्म्यै नम: और ऊं योगलक्ष्म्यै नम: का जाप करते हैं।

 

   खाना खजाना /शौर्यपथ / सामग्री :
ब्रेड- 6 
बटर- आवश्यकतानुसार
बारीक कटा प्याज- 1 
उबले आलू- 2 
उबला राजमा- 1/2 कप
बारीक कटा अदरक-लहसुन- 2 चम्मच 
हल्दी पाउडर- 1 चम्मच
लाल मिर्च पाउडर- 1 चम्मच
गरम मसाला पाउडर- 1 चम्मच
चाट मसाला पाउडर- 1 चम्मच
नमक- स्वादानुसार
तेल- आवश्यकतानुसार

विधि :
पैन में एक चम्मच तेल गर्म करें और उसमें अदरक-लहसुन को कुछ सेकेंड तक भूनें। अब उस पैन में मैश किया आलू, उबला राजमा, नमक और अन्य सभी मसाले डालें। मध्यम आंच पर मिश्रण को अच्छी तरह से पकाएं और गैस बंद कर दें।  जब मिश्रण पूरी तरह से ठंडा हो जाए तो उसमें बारीक कटा प्याज और हरी मिर्च डालकर मिलाएं।

ब्रेड स्लाइस के ऊपर यह राजमा वाला मिश्रण डालकर फैलाएं। ऊपर से दूसरा ब्रेड रखें। तीनों सैंडविच इसी तरह से तैयार कर लें। सैंडविच के ऊपर बटर लगाएं। नॉनस्टिक पैन में सैंडविच को दोनों ओर से सुनहरा होने तक सेंकें और सर्व करें।

 

सेहत / शौर्यपथ / बरसात के मौसम में मच्छरों का खतरा सबसे ज्यादा रहता है। मच्छरों के काटने से नींद उड़ने से ज्यादा डेंगू-मलेरिया जैसी बीमारियों का खतरा रहता है। इन बीमारियों में बुखार से छुटकारा पाना आसान नहीं होता। इस दौरान मरीज के जोड़ों में दर्द और सिर में भी दर्द रहता है। साथ ही प्लेटलेट्स काफी कम हो जाते हैं। आपकी जानकारी के लिए घर में भी कुछ ऐसी असरदार चीजें मौजूद हैं, जो इस बीमारी से लड़ने में आपकी मदद कर सकती हैं।

-डेंगू के बुखार से राहत पाने के लिए नारियल पानी खूब पिएं। इसमें मौजूद जरूरी पोषक तत्व जैसे मिनरल्स और एलेक्‍ट्रोलाइट्स शरीर को मजबूत बनाने में मदद करता है।

-तुलसी के पत्तों को गर्म पानी में उबाल लें और फिर इस पानी को पिएं। ऐसा करने से शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बेहतर होती है। इसे दिन में चार बार पी सकते हैं।

-डेंगू बुखार में मेथी की पत्तियां उबालकर चाय बनाकर पिएं। ऐसा करने से शरीर के विषाक्त पदार्थ बाहर निकलते हैं और डेंगू का वायरस दूर होता है।

-पपीते के पत्ते भी काफी असरदार हैं। इसमें मौजूद पपेन शरीर के पाचन को सही रखता है। इसका जूस पीने से प्लेटलेट्स तेजी से बढ़ते हैं।

-तुलसी के पत्तों के साथ काली मिर्च को पानी में उबाल लें और पिएं। इससे इम्यून सस्टिम मजबूत होता है और यह एंटी बैक्टीरियल की तरह काम करता है।

लाइफस्टाइल / शौर्यपथ / किसी भी व्यक्ति में आत्मविश्वास से अधिक जरूरी है उसके अंदर स्पष्टता का होना। यदि आप किसी भीड़ को पार कर कहीं पहुंचना चाहते हैं, आपकी दृष्टि सही जगह पर है और आप देख पा रहे हैं कि भीड़ कहां खड़ी है, तो आप बहुत आसानी से बिना किसी से टकराए अपना रास्ता बनाते हुए अपनी मंजिल तक पहुंच जाएंगे। लेकिन आपकी नजर अगर सही जगह पर नहीं है और महज विश्वास है, तो आप हर किसी से टकराते रहेंगे। आइए पढ़ते हैं यह छोटी से प्रेरक कहानी-


कहानी :
एक प्रयोग में एक रिसर्च बायोलॉजिस्ट ने एक बड़े से टैंक में शार्क मछली को रखा और फिर उसी टैंक में छोटी मछलियों को भी डाल दिया। शार्क ने छोटी मछलियों को खाना शुरू कर दिया और कुछ ही घंटों में सभी छोटी मछलियां शार्क का आहार बन चुकी थीं। हर बार यही होता। बायोलॉजिस्ट ने अब अपने प्रयोग में थोड़ा परिवर्तन किया और एक मजबूत फाइबर स्लाइड को उस टैंक में डाल कर टैंक को दो भागों में बांट दिया। एक भाग में शार्क और दूसरे भाग में छोटी मछलियों को रखा। आदतन शार्क ने छोटी मछलियों पर हमला करना चाहा तो वे उस स्लाइड से टकरा गईं। शार्क ने प्रयास नहीं छोड़ा और हमला करती रही।

यह प्रयोग कुछ हफ्तों तक जारी रहा। शार्क ने हमला करना जारी रखा, लेकिन उसके प्रयास में लगातार कमी आती गई। फिर एक समय ऐसा आया कि शार्क ने यह मान लिया कि वह छोटी मछलियों को नहीं खा सकती। उसने प्रयास करना ही छोड़ दिया। बायोलॉजिस्ट ने अब फाइबर की स्लाइड को वहां से हटा दिया। लेकिन यह क्या, शार्क को तो इससे कोई फर्क हीं नहीं पड़ा। उसने यह मान लिया था कि एक दीवार है, एक अवरोध है, जिसे वह पार नहीं कर सकती। उसने प्रयास करना ही छोड़ दिया अब छोटी मछलियां आराम से उसी टैंक में तैर रहीं थी और उसे शार्क से कोई खतरा भी नहीं था।


कहानी की सीख:
हममें से कई लोगों के साथ अक्सर ऐसा होता है। हम प्रयास करना ही छोड़ देते हैं। कोई रुकावट नहीं होने के बावजूद हमें ऐसा लगता है कि अवरोध है, जिसे पार नहीं किया जा सकता। यकीन मानिए, अगर किसी चीज को पाने के लिए हम ईमानदारी से लगातार प्रयास जारी रखते हैं, तो वह हमें जरूर मिलती है।

 

भिलाई / शौर्यपथ / भिलाई इस्पात संयंत्र के सहायक महाप्रबंधकों के लिए आज बहुत ही खुशी का दिन रहा क्योंकि आज 47 सहायक महाप्रबंधकों को डीजीएम के पद पर प्रमोशन हुआ, जिसका अर्डर ईडी पी एंड ए कार्यालय में कार्यपालक निदेशक कार्मिक एवं प्रशासन एस के दुबे एवं ईडी वक्र्स कार्यालय में मुख्य महाप्रबंधक प्रभारी लौह एस आर सूर्यवंशी ने नवपदोन्नत उप महाप्रबंधकों को प्रमोशन ऑर्डर वितरित किये। इस दौरान वर्तमान महामारी कोविड-19 के मद्देनजर इसके अनिवार्य दिशा-निर्देशों का पालन करते हुए सोशल डिस्टेंसिंग का भी अनुपालन किया गया।
इस गरिमामयी अवसर पर कार्यपालक निदेशक कार्मिक एवं प्रशासन एस के दुबे एवं मु य महाप्रबंधक प्रभारी लौह एस आर सूर्यवंशी ने सभी पदोन्नत उप महाप्रबंधकों को बधाई व शुभकामनाएँ देते हुए अपने सारगर्भित स बोधन में कहा कि वर्तमान चुनौतीपूर्ण स्थिति में आप सभी प्रबंधन द्वारा दी गई नई जि मेदारियाँ का निर्वहन करने के लिए अग्रसर हों। साथ ही आप क पनी को और भी उत्कृष्टता के शिखर पर ले जाने में अपना श्रेष्ठतम योगदान दें।

धर्म संसार / शौर्यपथ / श्रीकृष्‍ण और बलराम को गुप्तचर आकर बताता है संभरासुर और उसका पुत्र मयासुर दोनों की सेना द्वारिका पर आक्रमण के लिए निकल चुकी है। यह सुनकर बलराम जी कहते हैं कि उससे पहले में उन दोनों को नष्ट करके हटा दूंगा। यह सुनकर श्रीकृष्‍ण कहते हैं- नहीं दाऊ भैया, यदि वह युद्ध करना चाहते हैं तो हम अवश्य युद्ध करेंगे परंतु पहला वार हमारा नहीं होगा
दैत्यराज संभरासुर और उसका पुत्र तीनों लोकों पर आधिपत्य की इच्छा से सबसे पहले द्वारिका पर आक्रमण कर देते हैं। दोनों ही मायावी युद्ध में कुशल होते हैं। बलराम और श्रीकृष्‍ण उन दोनों से भयंकर युद्ध लड़ते हैं। दोनों ही यादव सेना में हड़कंप मचा देते हैं तब श्रीकृष्ण कहते हैं कि इन दोनों से नीति की अपेक्षा नहीं की जा सकती। अनीति से राज्य करना और अनीति से युद्ध करना यही इन मायावी पिता और पुत्र की नीति है।
संभरासुकर कहता है अब मुझे कोई नहीं रोक सकता ग्वाले। फिर मायासुर कहता है- इसलिए हे कृष्ण! तुम हमारी शरण में आ जाओ, हम तुम्हें क्षमा देंगे। बलरामजी मायासुर को कई तरह से मारने का प्रयास करते हैं परंतु वह अपनी माया से सभी को हैरान कर देता है। श्रीकृष्ण संभरासुर से लड़ते हैं तो वह भी अपनी माया के जाल में श्रीकृष्‍ण को उलझा देता है। तब मायासुर कहता है- कृष्ण अपने दाऊ भैया को समझाओ की असुर सम्राट संभरासुर की शरण में आने मैं ही उसकी भलाई है। यह सुनकर बलरामजी कहते हैं- संभरासुर अपने इस मायावी पुत्र के साथ तुम भी अपनी नगरी लौट जाओ वर्ना तुम भी मेरे क्रोध की आग में जल जाओगे।

फिर चारों में भयंकर मायावी युद्ध होता है कभी श्रीकृष्ण का तो कभी संभरासुर का पलड़ा भारी रहती है। एक समय ऐसा आता है कि संभरासुर के सारे अस्त्र असफल हो जाते हैं तब संभरासुर एक भयंकर अस्त्र का आह्‍वान करता है। यह देखकर श्रीकृष्ण बलराम की ओर देखने लगते हैं बलराम भी श्रीकृष्ण की ओर देखकर फिर संभरासुर की ओर दोनों देखते हैं। संभरासुर का पुत्र मायासुर यह देखकर प्रसन्न होता है।

फिर वह उस अस्त्र को श्रीकृष्ण की ओर छोड़ देता है। वह अस्त्र सीधा श्रीकृष्ण के हृदय में जाकर लगता है और श्रीकृष्ण दर्द से कराहने लगते हैं। यह देखकर बलरामजी चीखते हैं- कन्हैया। दोनों असुर जोर-जोर से हंसने लगते हैं। श्रीकृष्ण कराहते हुए रथ में गिरकर मर जाते हैं। बलरामजी अपने रथ से उतरकर श्रीकृष्ण के रथ पर जाते हैं और उन्हें जगाने का प्रयास करते हैं। बलराम कहते हैं ये कैसे हुआ कन्हैया? तुम तो संसार में सबसे अधिक शक्तिशाली हो भगवान हो, तुमको कैसे इस मायावी राक्षस के आगे मृत्यु आ गई? अब मैं द्वारिका को क्या मुंह दिखाऊंगा? कैसे उन्हें समझाऊंगा? कन्हैया जिस संसार में तुम नहीं, उस संसार में मेरा मर जाना ही बेहतर है। अब मैं भी एक पल भी जीना नहीं चाहता।
ऐसा कहकर बलरामजी अपनी तलवार निकालकर अपनी गर्दन काटने ही वाले रहते हैं कि तभी श्रीकृष्ण उनका हाथ पकड़कर उन्हें रोककर कहते हैं- दाऊ भैया रुको। यह देखकर बलरामजी आश्चर्य करते हैं कि ये कैसी माया! श्रीकृष्ण तो रथ में पड़े हैं और ये दूसरे श्रीकृष्ण उन्हें रोक रहे हैं। दाऊ भैया कहते हैं- कन्हैया...ऐसा कहकर वो दोनों कृष्‍ण को देखकर हैरान रह जाते हैं तब वे श्रीकृष्ण को हाथ लगाकर कहते हैं- कन्हैया तुम जीवित हो? यह सुनकर श्रीकृष्ण कहते हैं- हां दाऊ भैया, ऐसे मायावी असुर के हाथ से मरने के लिए हमने इस पृथ्वीलोक पर जनम नहीं लिया है। यह सुनकर बलरामजी अतिप्रसन्न होकर कृष्‍ण को गले लगा लेते हैं। अरे कन्हैया तुम्हें जीवित देखकर मैं कितना खुश हूं ये तुम नहीं समझ सकते। फिर बलरामजी रथ में मृत पड़े कृष्ण को देखकर कहते हैं- परंतु कन्हैया ये कौन है?
इस पर श्रीकृष्ण कहते हैं- वो! वो मायावी संभरासुर की माया है। अरे, आपको भ्रम में डालने के लिए संभरासुर ने ये माया रचाई थी और आप उसके मायाजाल में फंस गए दाऊ भैया। फिर श्रीकृष्‍ण कहते हैं- ये देखिये और वह मृत श्रीकृष्‍ण गायब हो जाते हैं। फिर श्रीकृष्ण कहते हैं- अब आप जान गए संभरासुर की नीति। मृत्युलोक में माता, पिता, भ्राता, पुत्र, कन्या, पौत्र इस तरह के अटूट नाते बन जाते हैं। उसी का लाभ उठाने का प्रयास ये मायावी संभरासुर करता है। अपनी माया से अपने शत्रु को शोकाकुल कर देता है। फिर ऐसे शत्रु पर उसे विजय प्राप्त करने में किसी भी तरह की कठिनाइयों का सामना नहीं करना पड़ता है। दाऊ भैया आप रणभूमि पर हैं। यदि मुझे सचमुच ही मृत्यु आ जाती तो भी आपको शस्त्र नीचे नहीं रखना चाहिए।

फिर बलरामजी कहते हैं- मुझसे भूल हो गई कन्हैया। परंतु अब में इन मायावी पिता और पुत्र को ऐसा दंड दूंगा कि ये द्वारिका की ओर आंख उठाने का साहस भी नहीं करेंगे। ऐसा कहकर बलरामजी अपने रथ पर चले जाते हैं। दोनों असुर जोर-जोर से उनकी हंसी उड़ाते हैं। फिर बलराम क्रोधित होकर अपनी गदा फेंकते हैं जो आसमान में जाकर दो रूप लेकर दोनों असुरों के रथ को तोड़ देती हैं। फिर बलरामजी अपने हल को विशालकाय बनाते हैं और उससे असुरों की सेना का संहार करने लगते हैं। यह देखकर संभरासुर घबरा जाता है और अपने पुत्र से कहता है- मायासुर! बलराम तो साक्षात मृत्यु दाता नजर आने लगा है। अब हमें निकल चलना चाहिए। यह सुनकर मायासुर कहता है- नहीं पिताश्री! मैं तो इस युद्ध में विजय प्राप्त करके ही लौटूंगा। फिर मायासुर शिवजी का आह्‍वान करता है तब उसके पास एक दिव्य धनुष आ जाता है जिसमें बाण के रूप में त्रिशूल होता है।
बलराम और श्रीकृष्ण यह देखकर अचंभित हो जाते हैं। फिर मायासुर कहता है- पिताश्री ये अस्त्र मुझे महादेव शंकर दे दिया था। ये कभी विफल नहीं होगा। बलराम को इस अस्त्र के कारण निश्चत ही मृत्यु आएगी। यह सुनकर श्रीकृष्ण बलराम की ओर देखने लगते हैं। फिर वे आंखें बंद करके भगवान शिव से कहते हैं- हे जगत के पालनहार कैलाशपति निलकंठ महादेव शंकर कृपाकर आप मुझे दर्शन दीजिये।

फिर भगगवान शंकर कहते हैं- हे वासुदेव आंखें खोलिये। कहिये आप हमसे क्या चाहते हैं? भगवान श्रीकृष्‍ण आंखें खोलते हैं तो उन्हें शिवजी दिखाई देते हैं तब वे उन्हें प्रणाम करके कहते हैं- हे महादेव! संभरासुर का पुत्र मायासुर आपका दिया हुआ अस्त्र दाऊ भैया पर छोड़ने वाला है जिसे केवल आप ही विफल कर सकते हैं। आप ही दाऊ भैया की रक्षा कर सकते हैं। यह सुनकर भगवान शंकर कहते हैं- नहीं देवकीनंदन! हमारा दिया हुआ अस्त्र कभी विफल नहीं हो सकता। परंतु हमारे अस्त्र के प्रभाव से बलराम को मृत्यु नहीं आएगी। हां, उन्हें मूर्च्छा अवश्‍य आएगी। यह सुनकर श्रीकृष्‍ण कहते हैं- हे महादेव आपकी कृपा और आशीर्वाद जिस पर हो उसे मृत्यु कैसे आ सकती है। ऐसा कहकर श्रीकृष्ण उन्हें प्रणाम करते हैं और महादेव अदृश्य हो जाते हैं।

उधर, मयासुर धनुष पर लगे त्रिशूल से कहता है- जाओ और अपना लक्ष्य साधो। वह त्रिशूल धनुष से निकलकर सीधा बलरामजी के हृदय में जाकर लगता है और बलरामजी कन्हैया कहते हुए मूर्च्छित हो जाते हैं। यह देखकर मायासुर ‍चीखकर कहता है- हे ग्वाले ये मेरी माया नहीं है, ये मेरा पराक्रम है। अपने बड़े भाई की मृत्यु से कुछ बोध लो और हमारी शरण में आ जाओ। हम तुम्हें अभय देंगे। नहीं तो तुम भी इसी प्रकार मृत्यु के आधीन हो जाओगे।

यह सुनकर श्रीकृष्ण अपनी अंगुली ऊपर करते हैं तो तुरंत ही उनके हाथ में सुदर्शन चक्र घर्राने लगता है। यह देखकर संभरासुर और मायासुर घबरा जाते हैं। तब श्रीकृष्ण सुदर्शन चक्र को मायासुर की ओर छोड़ देते हैं। तक्षण ही मायासुर की गर्दन से सिर अलग हो जाता है यह देखकर संभरासुर चीखता है- मायासुर। मायासुर धरती पर गिर पड़ता है और सुदर्शन चक्र पुन: लौटकर श्रीकृष्ण की अंगुली पर विराजमान होकर गायब हो जाता है।

उधर, संभरासुर चीखना हुआ अपने पुत्र के पास जाता है तो इधर श्रीकृष्ण बलराम के पास। फिर श्रीकृष्ण अपने दाऊ भैया को मूर्च्छा से जागते हैं। जागकर बलरामजी कहते हैं- कन्हैया क्या मैं मूर्च्छित हो गया था? तब श्रीकृष्ण कहते हैं- हां दाऊ भैया परंतु अब कोई चिंता करने की आवश्‍यकता नहीं। संभरासुर परास्त हो गया है और मायासुर का मैंने वध कर दिया है। यह सुनकर बलरामजी आश्चर्य करने लगते हैं।

उधर, संभरासुर अपने पुत्र के शव को अपने नगर ले जाता है और वहां मायासुर की माता अपने पुत्र के शव के पास विलाप करती है और अपने पति को कहती है कि धिक्कार है आप पर और आपके बल पर। आपके सामने आपके पुत्र का वध होता है और आप उसकी रक्षा भी नहीं कर सके, कैसे पिता हैं आप? जिस कृष्ण ने मेरे पुत्र का वध किया है आप उसे क्या दंड देंगे? जब आप उसे दंड देंगे तभी मेरा शोकग्रस्त्र मन शांत होगा। यह सुनकर संभरासुर कहता है कि मायावती ये संभरासुर प्रतिज्ञा करता है कि जिस प्रकार कृष्ण ने मेरे पुत्र को मुझसे छीना है उसी प्रकार मैं भी उसके पुत्र को उससे छीन लूंगा। पुत्र के वियोग में जिस तरह मेरी पत्‍नी शोक मना रही है उसी तरह कृष्ण की पत्नी भी शोकाकुल हो जाएगी। ये मेरी प्रतिज्ञा है।

उधर, नारादमुनि कामदेव से कहते हैं- कामदेव देख लिया ना। आपके जन्म लेने के पूर्व ही आपके शत्रु ने जनम ले लिया है जो अब आपकी मृत्यु की तैयारियां कर रहा हैं। यह सुनकर रति कहती हैं कि मुनिवर कम से कम ऐसी घड़ी पर तो अशुभ बातें न किया करें। लाखों वर्षों से मैं इसी शुभ घड़ी की प्रतीक्षा कर रही थी वो शुभ घड़ी जब प्रद्युम्न का जन्म होगा और मेरे सुहाग को शरीर मिल जाएगा। फिर कामदेवजी कहते हैं कि परंतु प्रद्युम्न के रूप में मेरा जन्म कब और कैसे होगा होगा? तब नारदमुनि कहते हैं कि श्रीकृष्‍ण की आज्ञा से ही रुक्मिणी के गर्भ से होगा। इसके लिए आपको उनकी आज्ञा लेने के लिए धरती पर जाना होगा।...
फिर कामदेव और रति श्रीकृष्‍ण के पास जाते हैं और वे देखते हैं कि भगवन तो ध्यानस्थ बैठे हैं और रुक्मिणी माता सो रही है। कामदेव रति से कहते हैं कि तो क्या हुआ मैं उन्हें अभी जगा देता हूं। यह सुनकर रति कहती है- नहीं नहीं, फिर वही भूल करना चाहते हैं क्या, जिस भूल ने आपसे आपका शरीर छीन लिया था। याद रखिये आप यहां अपना शरीर पाने आए हैं खोने नहीं। तब कामदेवजी कहते हैं कि परंतु मेरे पास अब शरीर तो रहा नहीं तो अब मैं क्या खोऊंगा? तब रति कहती हैं कि शरीर न सही पर शरीर की यह निशानी तो है जिसे अब मैं नहीं खोना चाहती।

तभी श्रीकृष्ण की आंखें खुल जाती है। वह उन दोनों को देखकर मुस्कुराते हैं। यह देखकर वे दोनों श्रीकृष्‍ण को प्रणाम करते हैं। तब श्रीकृष्‍ण कहते हैं- सुखीभव:। यह सुनकर रति कहती है कि भगवन! आपने हमें सुखी होने का आशीर्वाद दिया है ना। इस पर श्रीकृष्ण कहते हैं- हां देवी मेरा कहा सत्य है। इस पर रति कहती हैं- तो बताइये जब मैं मेरे पतिदेव के दर्शन नहीं कर सकती। उनका मेरा मिलन लाखों वर्षों से अधूरा है। ऐसे में मैं और मेरे पतिदेव कैसे सुखी हो सकते हैं?

तब श्रीकृष्‍ण कहते हैं कि कामदेव तुम भाग्यवान हो जो तुम्हें देवी रति जैसी पत्नि मिली है। पति से मिलन की आस में इसने लाखों वर्षों तक किसी जोगन की भांति तपस्या की है। युग-युगों तक प्रतीक्षा की है और अब ये प्रतीक्षा समाप्त होने जा रही है। यह सुनकर कामदेवजी कहते हैं सच भगवन! मुझे नया शरीर मिल जाएगा? तब श्रीकृष्ण कहते हैं- हां कामदेव जिस घटना का समय यहां तक की पल भी लाखों वर्ष पूर्व शिवजी ने स्वयं निश्चय कर दिया था। उस घटना के घटने का वो पल अब आ गया है।

यह सुनकर रति कहती हैं- अर्थात आप मेरे पतिदेव को अपने पुत्र रूप में स्वीकार करते हैं? तब श्रीकृष्‍ण कहते हैं- हां, कामदेव आज से तुम मेरे पुत्र हो। यह सुनकर रति प्रसन्न हो जाती है। कामदेव कहते हैं- धन्यवाद भगवन। रति कहती हैं- भगवन आपके इस उपकार के लिए मैं सदा आपकी आभारी रहूंगी। यह सुनकर श्रीकृष्‍ण कहते हैं कि अपने पुत्र या कुलवधू के लिए कुछ करना उपकार नहीं होता देवी रति। जब कामदेव हमारा पुत्र बनने जा रहा है तो इस नाते तुम हमारी बहू ही तो बनोगी ना? यह सुनकर रति अति प्रसन्न होकर कहती है- आप धन्य हैं प्रभु! आप धन्य हैं।

फिर श्रीकृष्‍ण कहते हैं- कामदेव मेरा पुत्र बनने के लिए तुम्हें अपनी माता लक्ष्मी के शरीर का एक अंग बनकर जन्म लेना है। इसलिए मैं तुम्हें आज्ञा देता हूं कि तुम अपनी होने वाली माता के गर्भ में समा जाओ। यह सुनकर कामदेव कहते हैं- धन्यवाद प्रभु।...फिर कामदेव पास ही की पलंग पर सोई माता रुक्मिणी के गर्भ में प्रवेश कर जाते हैं। यह देखकर देवी रति अति प्रसन्न हो जाती है।
फिर देवी रुक्मिणी की गोद भराई की रस्म बताई जाती है। सत्यभामा, जामवंती आदि सभी उनकी आरती उतारती हैं। अर्जुन, बलराम और श्रीकृष्‍ण आदि सभी सिंहासन पर बैठे हुए ये कार्यक्रम देख कर प्रसन्न होते रहते हैं।

आगे श्रीकृष्‍ण और रुक्मिणी के पुत्र का जन्म होता है। सत्यभामा और जामवंती भी उसको दुलारकर दाई मां को भेंट देती हैं। फिर उस बालक को सभी बारी-बारी अपनी गोद में लेते हैं। फिर बलराम और बाद में श्रीकृष्‍ण उसे गोद में लेकर दुलारते हैं।... उधर रति भी ये समाचार देवर्षि नारद से सुनकर प्रसन्न हो जाती है।

फिर नारदजी संभरासुर और उनकी पत्नी मायावती को भी ये समाचार सुनाते हैं कि श्रीकृष्ण के यहां पुत्र का जन्म हुआ है और वे आनंद उत्सव मना रहे हैं। यह सुनकर संभरासुर कहता है- नि:संदेह मुनिवर शुभ समाचार है ये, इसी दिन की तो प्रतीक्षा थी। फिर नारदजी वहां से चले जाते हैं।

फिर संभरासुर कहता है- इसी दिन की प्रतीक्षा में तो मेरी तलवार को जंग लग गया था परंतु अब मैं इस तलवार को धार लगाऊंगा। परंतु जल छीड़कर नहीं, कृष्‍ण पुत्र का रक्त छीड़कर। आज रात में ही कृष्‍ण पुत्र का वध करूंगा। ये बालवध आज रात ही हो जाना चाहिए। तब उसकी पत्नी मायावती कहती है कि नहीं नाथ, इतनी जल्दी ना करें। इसलिए कि जैसे-जैसे समय बितेगा कृष्‍ण और रुक्मिणी की अपने पुत्र के प्रति स्नेह भावना बढ़ेगी तो उसके वियोग में उनका शोक भी उतना ही कठिन होगा। इसलिए कुछ दिन और धैर्य रखिये नाथ। कृष्‍ण और रुक्मिणी को उनके पुत्र के भविष्य के सपने तो सजा लेने दो। शत्रु पुत्र का नाम तो रख लेने दो उन्हें। जय श्रीकृष्‍णा।

दुर्ग / शौर्यपथ /भारत में प्रत्येक वर्ष 5 सितंबर को शिक्षक दिवस मनाया जाता है . शिक्षक दिवस के अवसर पर भारत सरकार द्वारा सम्पूर्ण देश से चयनित शिक्षको को पुरस्कृत कर उनका सम्मान किया जाता है . प्रतिवर्ष की तरह इस वर्ष भी ५ सितम्बर को चयनित शिक्षको का भारत सरकार सम्मान करेगी और भारत के प्रथम नागरिक राष्ट्रपति के हांथो ये सम्मान उत्कृष्ट कार्य करने वाले शिक्षको को मिलेगा इस वर्ष सम्मान प्राप्त शिक्षकों की घोषणा कर दी गयी गई है। जिसमें पूरे देश से 47 शिक्षकों को चयनित किया गया है। जिसमें छत्तीसगढ़ से एकमात्र शिक्षिका सपना सोनी, व्याख्याता (भौतिक शास्त्र) जो कि शासकीय उच्चतर माध्यमिक शाला जेवरा सिरसा में पदस्थ हैं का चयन किया गया है। पूरे देश से विभिन्न राज्यों केन्द्र शासित प्रदेश एवं स्वतंत्र एजेंसियों से 153 शिक्षकों का राष्ट्रीय ज्यूरी द्वारा साक्षात्कार लिया गया। जिसमें से सपना सोनी का चयन किया गया है।
सपना सोनी ने अपनी समर्पित शिक्षण नवीन व आधुनिक शिक्षण विधियों के द्वारा अथक प्रयास से विद्यार्थियों के शिक्षा व जीवन में सकारात्मक बदलाव लाया है। जिसमें जनसहयोग से वह 2014 में जिले के शासकीय स्कूलों में पहला स्मार्ट क्लास, वर्ष 2014 से ही आईसीटी के माध्यम से नवीन शिक्षण प्रविधियों द्वारा अध्यापन, हिंदी माध्यम में ई कंटेन्ट विकसित कर विद्यार्थियों के अधिगम को सरल, रुचिकर व प्रभावशाली बनाया, एजुकेशनल वीडियोज के माध्यम से बच्चों की पढ़ाई को आसान बनाना, संस्था में अंतरिक्ष विज्ञान क्लब के स्थापना व क्रियान्वयन द्वारा विद्यार्थियों में वैज्ञानिक दृृष्टिकोण उत्पन्न करना, संस्था में विज्ञान कार्नर के माध्यम से वैज्ञानिक अभिवृत्ति उत्पन्न किया।
विगत 12 वर्षों से संस्था के विद्यार्थीगण इनके उत्कृष्ट मार्गदर्शन में विभिन्न प्रतियोगिता में राष्ट्रीय स्तर पर पुरस्कृृत हो रहे हैं आदि प्रमुख उपलब्धियों के आधार पर इनका चयन राष्ट्रीय पुरस्कार के लिए किया गया है।

टिप्स /ट्रिक्स / शौर्यपथ / गूगल प्लेस्टोर पर मौजूद MaskChat - Hides Whatsapp Chat एक शानदार एंड्रॉयड एप है जिसे यूजर की चैटिंग को प्राइवेट रखने के लिए बनाया गया है। जब आप अपने स्मार्टफोन पर प्राइवेट चैट करते हैं, तब यह एप आपके चैट के उपर की स्क्रीन को डिजिटल पर्दे से छिपा देता हैं। इससे आपके आसपास के झांकने वाले पड़ोसी से आपके मैसेज प्राइवेट रखने में मदद मिलती हैं।

अन्य चैटिंग एप के लिए भी कारगर
MaskChat - Hides Whatsapp Chat एप सिर्फ व्हाट्सएप तक ही सीमित नहीं है बल्कि इसका इस्तेमाल फेसबुक मैसेंजर, वीचैट,हाइक और स्नैपचेट के लिए भी किया जा सकता है। इसके साथ ही पासवर्ड टाइप करते समय या बैंक की इनफॉर्मेशन टाइप करते समय अपनी स्क्रीन को हाइड करने के लिए इसका इस्तेमाल कर सकते हैं।

कैसे करें इस्तेमाल
इस एप को डाउनलोड करने के बाद यूजर को स्क्रीन पर एक फ्लोटिंग मास्क चैट आइकॉन दिखाई देगा, जिस स्क्रीन को आप दूसरों से हाइड करना चाहते हैं, उस स्क्रीन पर इस आइकॉन को ऊपर से नीचे की ओर ड्रैग करें। अब एक डिजिटल पर्दा नीचे आ जाएगा, जो आपकी स्क्रीन को छिपा देगा और आप किसी भी शर्मिंदा पलों से बच सकते है जब आपके माता-पिता या बड़े आपके आसपास होते हैं।

पर्दे की बढ़ा सकते हैं डार्कनेस
इस एप में कंपनी की तरफ से दिए गए पर्दे की मोटाई औसतन होती है, जो आपको कम लग सकती है। इसके लिए आप पर्दे के दाईं ओर दिए गए तीन लाइन वाले विकल्प पर क्लिक कर सकते हैं। इससे स्क्रीन के बीच में तीन नए विकल्प आएंगे। उनमें से बीच वाले विकल्प की मदद से आप पर्दे की ब्राइटनेस को नियंत्रित कर सकते हैं। बंद करने के लिए क्रॉस आइकॉन पर क्लिक कर आप पर्दे को क्लोज कर सकते हैं, लेकिन फ्लोटिंग मास्केचैट आइकॉन को पीछे छोड़ देगा। गियर आइकॉन पर टैप कर आप थीम को बदल भी सकते हैं। थीम को सिलेक्ट करने के बाद उसके नीचें के Apply theme बटन पर टैप कर अप्लाई करें।

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