July 24, 2026
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    सेहत / शौर्यपथ / हम आपको बता रहे हैं ऐसी चीजों के बारे में जिनका सेवन यदि आप रात के समय करते हैं तो सेहत के लिए हानिकारक हो सकता है। जहां तक संभव हो इन 8 चीजों को रात के समय खाने से बचें -
    1 स्नैक्स - रात के वक्त कुछ चीजें खाने से आप तौबा ही करें तो बेहतर होगा। इनमें स्नैक्स या चिप्स जैसी चीजें भी शामिल है। हालांकि इनका सेवन दिन के वक्त भी नुकसानदेह ही होता है। दरअसल इनमें अत्यधिक मात्रा में मोनोसोडियम ग्लूटामेट होता है, जो आपको नींद संबंधी समस्याएं देने के साथ ही, अन्य स्वास्थ्य परेशानियां भी दे सकता है।
    2 एल्‍कोहल - रात को सोने से ठीक पहले किसी भी प्रकार का नशा या अल्कोहल का सेवन आपके लिए बेहद हानिकारक हो सकता है। यह आपकी नींद को भी प्रभावित कर सकता है। खास तौर से वाइन नींद की गुणवत्ता को खराब करती है नींद के समय को कम कर देती है। इसमें कैलोरी भी बहुत अधिक मात्रा में होती है।
    3 पिज्‍जा - अक्सर रात के वक्त पार्टी या बाहर जाकर खाने में लोग पिज्जा पसंद करते हैं। लेकिन इसे पचाने में आपके पाचन तंत्र को काफी मेहनत करनी पड़ती है। इसके अलावा पिज्‍जा में चिकनाई बहुत अधिक होती है और इसमें जो सॉस व अन्य मसाले प्रयोग किए जाते हैं, वे आपके लिए हार्टबर्न का खतरा बढ़ा देते हैं। इसलिए कोशिश करें कि रात के वक्त इसका प्रयोग बिल्कुल न करें।

    4 बर्गर - सोने से पहले बर्गर खाना भी सेहत के लिए हानिकारक होता है। बर्गर में चीज व सॉस का प्रयोग कर हम इसे भले ही इसका स्वाद बढ़ा लेते हैं, लेकिन यही चीजें पेट में प्राकृतिक एसिड के उत्पादन को बढ़ाती हैं, जिससे हार्टबर्न की समस्या हो सकती है। इसलिए कोशिश करें की चीज और सॉस से युक्त बर्गर का सेवन न ही करें।
    5 पास्ता - पास्ता कैलोरी से भरपूर होता है,और इसमें सबसे अधि‍क कैलोरी होती है। इसमें अधि‍क मात्रा में कार्बोहाइड्रेट होता है जो वसा में बदल जाता है। इसके अलावा इसे चीज और अन्य फैटी चीजों के साथ बनाया जाता है जिससे इसका ग्लासिमिक सूचकांक बहुत अधि‍क होता है। रात के समय इसका प्रयोग हृदय और पाचन तंत्र के लिए हानिकारक होता है।
    6 ऐसी सब्जियां - कुछ सब्जियों में अघुलनशील फाइबर की मात्रा अधिक होती है, जो लंबे समय तक आपका पेट भरा रखती है, और पाचन तंत्र धीमी गति से कार्य करने लगता है। ऐसे में आपको गैस या पाचन संबंधी अन्य समस्याएं हो सकती है। ऐसी सब्जि‍यों को रात के वक्त खाने से बचना चाहिए। प्याज, ब्रोकोली, पत्तागोभी आदि सब्जियां इनमें शामिल है।
    7 रेड मीट - रेड मीट प्रोटीन और आयरन का स्रोत है। लेकिन इसका अधिक सेवन करने से आपको बेचैनी हो सकती है और यह आपकी नींद को भी प्रभावित कर सकता है। तो अगर आप शांति से गहरी नींद लेना चाहते हैं, तो रात में रेड मीड को नजरअंदाज करें।

    8 डॉर्क चॉकलेट - डार्क चॉकलेट में बहुत अधि‍क मात्रा में कैफीन व अन्य उत्तेजक पदार्थ होते हैं, जो हृदय को आराम देने के बजाए कार्यशील रखते हैं तथा मस्तिष्क को केंद्रित रखते हैं। इससे आपकी नींद बुरी तरह से प्रभावित हो सकती है।

    धर्म संसार / शौर्यपथ / क्या है श्री गणेश और संगीत का रिश्ता
    हिन्दू धर्म का नृत्य, कला, योग और संगीत से गहरा नाता रहा है। हिन्दू धर्म मानता है कि ध्वनि और शुद्ध प्रकाश से ही ब्रह्मांड की रचना हुई है। भारत में संगीत की परंपरा अनादिकाल से ही रही है।


    हिन्दुओं के लगभग सभी देवी और देवताओं के पास अपना एक अलग वाद्य यंत्र है। विष्णु के पास शंख है तो शिव के पास डमरू, नारद मुनि और सरस्वती के पास वीणा है, तो भगवान श्रीकृष्ण के पास बांसुरी। देवर्षि नारद के हाथों में एकतारा हमेशा रहता है। खजुराहो के मंदिर हो या कोणार्क के मंदिर, प्राचीन मंदिरों की दीवारों में गंधर्वों की मूर्तियां आवेष्टित हैं। उन मूर्तियों में लगभग सभी तरह के वाद्य यंत्र को दर्शाया गया है। गंधर्वों और किन्नरों को संगीत का अच्छा जानकार माना जाता है।
    सामवेद उन वैदिक ऋचाओं का संग्रह मात्र है, जो गेय हैं। संगीत का सर्वप्रथम ग्रंथ चार वेदों में से एक सामवेद ही है। इसी के आधार पर भरत मुनि ने नाट्यशास्त्र लिखा और बाद में संगीत रत्नाकर, अभिनव राग मंजरी लिखा गया। दुनियाभर के संगीत के ग्रंथ सामवेद से प्रेरित हैं।

    गणेशजी का वाद्ययंत्र ढोल : गणेशजी को मूर्ति और उनके चित्रों में वीणा, सितार और ढोल बाजाते हुए दर्शाया जाता है। कहीं कहीं पर उन्हें बांसुरी बजाते हुए भी चित्रित किया गया है। वैसे गणेशजी भी संगीत प्रेमी हैं। अक्सर तो उन्हें ढोल व मृदंग बजाते हुए ही चित्रित किया गया है। ढोल सागर ग्रंथ के अनुसार ब्रह्मा, विष्णु और महेश ने ढोल का निर्माण किया था। कहते हैं कि विष्णुजी ने तांबा धातु को गलाया और ब्रह्माजी ने उस ढोल में ब्रह्म कनौटी लगाई और ढोल के दोनों ओर सूर्य और चंद्रमा के रूप में खालें लगाई गईं।

    जब ढोल बन गया तो भगवान शंकर ने खुश होकर नृत्य किया तब उनके पसीने से एक कन्या 'औजी' पैदा हुई जिन्हें इस ढोल को बजाने की जिम्मेदारी दी गई। कहते हैं कि औजी ने ही इस ढोल को उलट-पलट कर चार शब्द- वेद, बेताल, बाहु और बाईल का निर्माण किया था।
    श्री गणेश के ये 7 दुर्लभ धन मंत्र आपको कहीं नहीं मिलेंगे
    श्रीगणेश के कई मंत्र हैं जो गणेशोत्सव के 10 दिनों में भक्तों द्वारा जपे जाते हैं... वेबदुनिया के पाठकों के लिए हम पुराणों से लाए हैं 7 दुर्लभ धन मंत्र... ये गणेश धन मंत्र निश्चित रुप से असरकारी हैं...
    * श्रीपतये नमः,

    * रत्नसिंहासनाय नमः

    * मणिकुंडलमंडिताय नमः

    * महालक्ष्मी प्रियतमाय नमः

    * सिद्ध लक्ष्मी मनोरहप्रियाय नमः

    * लक्षाधीश प्रियाय नमः
    * कोटिधीश्वराय नमः

    भगवान श्री गणेश इस समय घर-घर में विराजित हैं,आइए जानते हैं कि लम्बोदर विनायक को कौन से मंत्र से प्रसन्न करें....
    1. ॐ सुमुखाय नम:,

    2. ॐ एकदंताय नम:,

    3. ॐ कपिलाय नम:,

    4. ॐ गजकर्णाय नम:,

    5. ॐ लंबोदराय नम:,

    6. ॐ विकटाय नम:,

    7. ॐ विघ्ननाशाय नम:,

    8. ॐ विनायकाय नम:,

    9. ॐ धूम्रकेतवे नम:,

    10. ॐ गणाध्यक्षाय नम:,

    11. ॐ भालचंद्राय नम:,

    12. ॐ गजाननाय नम:।

    श्रीगणेश को प्रिय है यह गणेश कुबेर मंत्र

    मंत्र - 'ॐ नमो गणपतये कुबेर येकद्रिको फट् स्वाहा'।


    गणेशोत्सव में प्रतिदिन इस मंत्र की एक माला (108 बार मंत्र जाप) करने से मनुष्य के धन संबंधी सारे संकट दूर होते हैं।
    श्री गणेश के 108 नामों के हिन्दी अर्थ
    भारतीय धर्म और संस्कृति में भगवान गणेशजी सर्वप्रथम पूजनीय और प्रार्थनीय हैं। उनकी पूजा के बगैर कोई भी मंगल कार्य शुरू नहीं होता। उनकी पूजा के दौरान इन 108 नामों का जपने से सभी तरह के मांगलिक कार्य के विघ्न हट जाते हैं।
    गणेश नामावली-108

    1. बाल गणपति : सबसे प्रिय बालक।
    2. भालचन्द्र : जिसके मस्तक पर चंद्रमा हो।
    3. बुद्धिनाथ : बुद्धि के भगवान।
    4. धूम्रवर्ण : धुएं को उड़ाने वाला।
    5. एकाक्षर : एकल अक्षर।
    6. एकदन्त : एक दांत वाले।
    7. गजकर्ण : हाथी की तरह कान वाला।
    8. गजानन : हाथी के मुख वाले भगवान।
    9. गजवक्र : हाथी की सूंड वाला।10. गजवक्त्र : जिसका हाथी की तरह मुंह है।
    11. गणाध्यक्ष : सभी गणों का मालिक।
    12. गणपति : सभी गणों के मालिक।
    13. गौरीसुत : माता गौरी का बेटा।
    14. लम्बकर्ण : बड़े कान वाले देव।
    15. लम्बोदर : बड़े पेट वाले।
    16. महाबल : अत्यधिक बलशाली वाले प्रभु।
    17. महागणपति : देवातिदेव।18. महेश्वर : सारे ब्रह्मांड के भगवान।
    19. मंगलमूर्ति : सभी शुभ कार्य के देव।
    20. मूषक वाहन : जिसका सारथी मूषक है।
    21. निदीश्वरम : धन और निधि के दाता।
    22. प्रथमेश्वर : सबके बीच प्रथम आने वाला।
    23. शूपकर्ण : बड़े कान वाले देव।
    24. शुभम : सभी शुभ कार्यों के प्रभु।
    25. सिद्धिदाता : इच्छाओं और अवसरों के स्वामी।
    26. सिद्धिविनायक : सफलता के स्वामी।
    27. सुरेश्वरम : देवों के देव।
    28. वक्रतुण्ड : घुमावदार सूंड।
    29. अखूरथ : जिसका सारथी मूषक है।
    30. अलम्पता : अनन्त देव।
    31. अमित : अतुलनीय प्रभु।
    32. अनन्तचिदरुपम : अनंत और व्यक्ति चेतना।
    33. अवनीश : पूरे विश्व के प्रभु।
    34. अविघ्न : बाधाओं को हरने वाले।
    35. भीम : विशाल।
    36. भूपति : धरती के मालिक।
    37. भुवनपति : देवों के देव।
    38. बुद्धिप्रिय : ज्ञान के दाता।
    39. बुद्धिविधाता : बुद्धि के मालिक।
    40. चतुर्भुज : चार भुजाओं वाले।
    41. देवादेव : सभी भगवान में सर्वोपरि।
    42. देवांतकनाशकारी : बुराइयों और असुरों के विनाशक।
    43. देवव्रत : सबकी तपस्या स्वीकार करने वाले।
    44. देवेन्द्राशिक : सभी देवताओं की रक्षा करने वाले।
    45. धार्मिक : दान देने वाला।
    46. दूर्जा : अपराजित देव।
    47. द्वैमातुर : दो माताओं वाले।
    48. एकदंष्ट्र : एक दांत वाले।
    49. ईशानपुत्र : भगवान शिव के बेटे।
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    50. गदाधर : जिसका हथियार गदा है।
    51. गणाध्यक्षिण : सभी पिंडों के नेता।
    52. यशस्कर : प्रसिद्धि और भाग्य के स्वामी।
    53. गुणिन : जो सभी गुणों के ज्ञानी।
    54. हरिद्र : स्वर्ण के रंग वाला।
    55. हेरम्ब : मां का प्रिय पुत्र।
    56. कपिल : पीले भूरे रंग वाला।
    57. कवीश : कवियों के स्वामी।
    58. कीर्ति : यश के स्वामी।
    59. कृपाकर : कृपा करने वाले।
    60. कृष्णपिंगाश : पीली भूरी आंख वाले।
    61. क्षेमंकरी : माफी प्रदान करने वाला।
    62. क्षिप्रा : आराधना के योग्य।
    63. मनोमय : दिल जीतने वाले।
    64. मृत्युंजय : मौत को हरने वाले।
    65. मूढ़ाकरम : जिनमें खुशी का वास होता है।
    66. मुक्तिदायी : शाश्वत आनंद के दाता।
    67. नादप्रतिष्ठित : जिसे संगीत से प्यार हो।
    68. नमस्थेतु : सभी बुराइयों और पापों पर विजय प्राप्त करने वाले।
    69. नन्दन : भगवान शिव का बेटा।
    70. सिद्धांथ : सफलता और उपलब्धियों के गुरु।
    71. पीताम्बर : पीले वस्त्र धारण करने वाला।
    72. प्रमोद : आनंद।
    73. पुरुष : अद्भुत व्यक्तित्व।
    74. रक्त : लाल रंग के शरीर वाला।
    75. रुद्रप्रिय : भगवान शिव के चहेते।
    76. सर्वदेवात्मन : सभी स्वर्गीय प्रसाद के स्वीकार्ता।
    77. सर्वसिद्धांत : कौशल और बुद्धि के दाता।
    78. सर्वात्मन : ब्रह्मांड की रक्षा करने वाला।
    79. ओमकार : ओम के आकार वाला।
    80. शशिवर्णम : जिसका रंग चंद्रमा को भाता हो।
    81. शुभगुणकानन : जो सभी गुण के गुरु हैं।
    82. श्वेता : जो सफेद रंग के रूप में शुद्ध है।
    83. सिद्धिप्रिय : इच्छापूर्ति वाले।
    84. स्कन्दपूर्वज : भगवान कार्तिकेय के भाई।85. सुमुख : शुभ मुख वाले।
    86. स्वरूप : सौंदर्य के प्रेमी।
    87. तरुण : जिसकी कोई आयु न हो।
    88. उद्दण्ड : शरारती।
    89. उमापुत्र : पार्वती के बेटे।
    90. वरगणपति : अवसरों के स्वामी।
    91. वरप्रद : इच्छाओं और अवसरों के अनुदाता।
    92. वरदविनायक : सफलता के स्वामी।
    93. वीर गणपति : वीर प्रभु।
    94. विद्यावारिधि : बुद्धि के देव।
    95. विघ्नहर : बाधाओं को दूर करने वाले।
    96. विघ्नहर्ता : बुद्धि की देव।
    97. विघ्नविनाशन : बाधाओं का अंत करने वाले।
    98. विघ्नराज : सभी बाधाओं के मालिक।
    99. विघ्नराजेन्द्र : सभी बाधाओं के भगवान।
    100. विघ्नविनाशाय : सभी बाधाओं का नाश करने वाला।
    101. विघ्नेश्वर : सभी बाधाओं के हरने वाले भगवान।
    102. विकट : अत्यंत विशाल।
    103. विनायक : सबका भगवान।
    104. विश्वमुख : ब्रह्मांड के गुरु।
    105. विश्वराजा : संसार के स्वामी।
    105. यज्ञकाय : सभी पवित्र और बलि को स्वीकार करने वाला।
    107. यशस्विन : सबसे प्यारे और लोकप्रिय देव।
    108. योगाधिप : ध्यान के प्रभु।
    भगवान गणेश जी का संपूर्ण परिचय
    भगवान गणेशजी को भारतीय धर्म और संस्कृति में प्रथम पूज्य देवता माना जाता है। उनकी पूजा के बगैर कोई भी मंगल कार्य शुरू नहीं होता। सभी मांगलिक कार्य में पहले गणेश जी की स्थापना और स्तुति की जाती है। आओ जानते हैं भगवान गणेशजी के संबंध में संपूर्ण परिचय।

    गणेश जन्म : माता पार्वती द्वारा पुण्यक व्रत के फलस्वरूप गणेशजी का जन्म हुआ था। बाद के पुराणों में उनके जन्म के संबंध में कहा गया है माता ने अपनी सखी जया और विजया के कहने पर एक गण की उत्पति अपने मैल से की थी। जन्म समय माथुर ब्राह्मणों के इतिहास अनुसार अनुमानत: 9938 विक्रम संवत पूर्व भाद्रपद माह की शुक्ल चतुर्थी को मध्याह्न के समय हुआ था। पौराणिक मत के अनुसार सतुयग में हुआ था।
    गणेश जन्म स्थान : उत्तरकाशी जिले के डोडीताल को गणेशजी का जन्म स्थान माना जाता है। यहां पर माता अन्नपूर्णा का प्राचीन मंदिर हैं जहां गणेशजी अपनी माता के साथ विराजमान हैं। डोडीताल, जोकि मूल रूप से बुग्‍याल के बीच में काफी लंबी-चौड़ी झील है, वहीं गणेश का जन्‍म हुआ था। यह भी कहा जाता है कि केलसू, जो मूल रूप से एक पट्टी है (पहाड़ों में गांवों के समूह को पट्टी के रूप में जाना जाता है) का मूल नाम कैलाशू है। इसे स्‍थानीय लोग शिव का कैलाश बताते हैं। केलसू क्षेत्र असी गंगा नदी घाटी के सात गांवों को मिलाकर बना है। गणेश भगवान को स्‍थानीय बोली में डोडी राजा कहा जाता हैं जो केदारखंड में गणेश के लिए प्रचलित नाम डुंडीसर का अपभ्रंश है। मान्यता अनुसार डोडीताल क्षेत्र मध्‍य कैलाश में आता था और डोडीताल गणेश की माता और शिव की पत्‍नी पार्वती का स्‍नान स्‍थल था। स्‍वामी चिद्मयानंद के गुरु रहे स्‍वामी तपोवन ने मुद्गल ऋषि की लिखी मुद्गल पुराण के हवाले से अपनी किताब हिमगिरी विहार में भी डोडीताल को गणेश का जन्‍मस्‍थल होने की बात लिखी है। वैसे कैलाश पर्वत तो यहां से सैंकड़ों मील दूर है परंतु स्थानीय लोग मानते हैं कि एक समय यहां माता पार्वती विहार पर थी तभी गणेशजी का जन्म हुआ था।

    गणेश के नाम : कहते हैं कि गणेशजी का मूल नाम विनायक है। इसके बाद गणेश और गणों के ईश गणपति हुए। देव समुदाय ने उन्हें गांगेय कहकर सम्मान दिया और ब्रह्मा जी ने उन्हें गणों का आधिपत्य प्रदान करके गणेश नाम दिया। दुनिया के प्रथम धर्मग्रंथ ऋग्वेद में भी भगवान गणेशजी का जिक्र है। ऋग्वेद में 'गणपति' शब्द आया है। यजुर्वेद में भी ये उल्लेख है। बाद के नाम किसी न किसी कथा से जुड़े हैं। गणेशजी नाम : सुमुख, एकदन्त, कपिल, गजकर्णक, लम्बोदर, विकट, विघ्ननाशक, विनायक, धूम्रकेतु, गणाध्यक्ष, भालचन्द्र, विघ्नराज, द्वैमातुर, गणाधिप, हेरम्ब, गजानन, अरुणवर्ण, गजमुख, लम्बोदर, अरण-वस्त्र, त्रिपुण्ड्र-तिलक, मूषकवाहन। उन्हें एकदंत इसलिए कहा जाता है क्योंकि परशुरामजी ने उनका एक दांत तोड़ दिया था। उन्हें गजानन इसलिए कहा जाता है क्योंकि वे गज (हाथी) के मुख के थे।
    गणेश जी का मस्तक : उन्हें गजानन इसलिए कहा गया कि उनके सिर को भगवान शंकर ने काट दिया था। बाद में उनके धड़ पर हाथी का सिर लगा कर उन्हें पुन: जीवित किया गया। यह भी कहा जाता है कि शनिदेव जब बाल गणेश को देखने गए तो उनकी दृष्टि से उनका मस्तक भस्म हो गया था बाद में विष्णुजी ने एक हाथी का सिर उनके धड़ पर लगाकर उन्हें पुनर्जिवित कर दिया था।

    अग्रपूजक कैसे बने : एक बार देवताओं में धरती की परिक्रमा की प्रतियोगिता हुई जिसमें जो सबसे पहले परिक्रमा करके आ जाता उसे सर्वश्रेष्ठ माना जाता। प्रतियोगिता प्रारंभ हुई परंतु गणेश जी का वाहन तो मूषक था तब उन्होंने अपनी बुद्धि का प्रयोग किया और उन्होंने अपने माता पिता शिव एवं पार्वती की ही परिक्रमा कर ली। ऐसा करके उन्होंने संपूर्ण ब्रह्माण्ड की ही परिक्रमा कर ली। तब सभी देवों की सर्वसम्मति और ब्रह्माजी की अनुशंसा से उन्हें अग्रपूजक माना गया। इसके पीछे और भी कथाएं हैं। पंच देवोपासना में भगवान गणपति मुख्य हैं।

    गणेश जी का परिवार : उनकी माता का नाम पार्वती और पिता का नाम शिव। भाई कार्तिकेय और बहन अशोक सुंदरी है। उनकी पत्नी प्रजापति विश्वकर्मा की पुत्री ऋद्धि और सिद्धि हैं। सिद्धि से 'क्षेम' और ऋद्धि से 'लाभ' नाम के दो पुत्र हुए। लोक-परंपरा में इन्हें ही शुभ-लाभ कहा जाता है। शुभ और लाभ के पुत्र आमोद और प्रमोद हैं।

    गणेशजी की पसंद : उनका प्रिय भोग मोदक लड्डू, प्रिय पुष्प लाल रंग के फूल, प्रिय वस्तु दुर्वा (दूब), प्रिय वृक्ष शमी-पत्र, केल, केला आदि हैं। केसरिया चंदन, अक्षत, दूर्वा अर्पित कर कपूर जलाकर उनकी पूजा और आरती की जाती है। उनको मोदक का लड्डू अर्पित किया जाता है। उन्हें रक्तवर्ण के पुष्प विशेष प्रिय हैं।
    गणेशजी का स्वरूप : जल तत्व के अधिपति, बुधवार और चतुर्थी के स्वामी और केतु एवं बुध के ग्रहाधिपति गणेश जी के प्रभु अस्त्र पाश और अंकुश है। वे मूषक वाहन पर सवार रहते हैं। वे एकदन्त और चतुर्बाहु हैं। अपने चारों हाथों में वे क्रमश: पाश, अंकुश, मोदक पात्र तथा वरमुद्रा धारण करते हैं। वे रक्तवर्ण, लम्बोदर, शूर्पकर्ण तथा पीतवस्त्रधारी हैं। वे रक्त चंदन धारण करते हैं।

    भगवान गणेशजी का सतयुग में वाहन सिंह है और उनकी भुजाएं 10 हैं तथा नाम विनायक। श्री गणेशजी का त्रेतायुग में वाहन मयूर है इसीलिए उनको मयूरेश्वर कहा गया है। उनकी भुजाएं 6 हैं और रंग श्वेत। द्वापरयुग में उनका वाहन मूषक है और उनकी भुजाएं 4 हैं। इस युग में वे गजानन नाम से प्रसिद्ध हैं और उनका वर्ण लाल है।कलियुग में उनका वाहन घोड़ा है और वर्ण धूम्रवर्ण है। इनकी 2 भुजाएं हैं और इस युग में उनका नाम धूम्रकेतु है।
    गणेशजी के जीवन से जुड़े महत्वपूर्ण प्रसंग : मस्तक प्रसंग, पृथ्‍वी प्रदक्षिणा प्रसंग, मूषक (गजमुख) वाहन प्राप्ति प्रसंग, गणेश विवाह प्रसंग, संतोषी माता उत्पत्ति प्रसंग, विष्णु विवाह में उन्हें नहीं बुलाने का प्रसंग, असुर (देवतान्तक, सिंधु दैत्य, सिंदुरासुर, मत्सरासुर, मदासुर, मोहासुर, कामासुर, लोभासुर, क्रोधासुर, ममासुर, अहंतासुर) वध प्रसंग, महाभारत लेखन प्रसंग आदि। उन्होंने अपने भाई कार्तिकेय के साथ कई युद्धों में लड़ाई की थी।

    गणेश ग्रंथ : गणेश का गाणपतेय संप्रदाय है। उनके ग्रंथों में गणेश पुराण, गणेश चालीसा, गणेश स्तुति, श्रीगणेश सहस्रनामावली, गणेशजी की आरती, संकटनाशन गणेश स्तोत्र, गणपति अथर्वशीर्ष, गणेशकवच, संतान गणपति स्तोत्र, ऋणहर्ता गणपति स्तोत्र, मयूरेश स्तोत्र आदि।
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    सेक्स वर्कर्स को लेकर कोई ठोस रेगुलेशन न होने के बावजूद भारत में दुनिया के कई बड़े रेड लाइट एरिया हैं. आइए नजर डालते हैं इनमें से कुछ खास पर...

    1. सोनागाछी, कोलकाता
    इसे एशिया का सबसे बड़ा रेड लाइट एरिया भी कहा जाता है. रिपोर्ट्स के मुताबिक, यहां करीब 11 हजार सेक्स वर्कर्स काम करती हैं. इनमें कम उम्र से लेकर 40 साल से अधिक उम्र की महिलाएं भी शामिल हैं. यहां सैकड़ों बहुमंजिला इमारते हैं जहां सेक्स वर्कर्स रहती हैं और ग्राहकों का इंतजार करती हैं. सोनागाछी रेड लाइट एरिया के ऊपर बनाई गई डॉक्युमेंट्री Born into Brothels को ऑस्कर अवॉर्ड भी मिल चुका है.


    2. कमाठीपुरा, मुंबई
    यह देश का दूसरे सबसे बड़ा रेड लाइट एरिया है. 25 साल पहले यहां करीब 50,000 सेक्स वर्कर्स हुआ करती थीं. लेकिन बाद के सालों में इनकी संख्या में कमी आई. जगह की कमी और रहने की दिक्कत की वजह से कई सेक्स वर्कर्स महाराष्ट्र के दूसरे जगहों पर चली गईं. 2005 में डांस बार पर बैन लगने के बाद काफी लड़कियां कोई और रोजगार नहीं मिलने पर सेक्स वर्कर के रूप में यहीं काम करने लगी थीं.


    3. बुधवार पेठ, पुणे
    यहां करीब 5 हजार सेक्स वर्कर काम कर रही हैं. बुधवार पेठ में करीब 400 कोठे हैं और 7 हजार सेक्स वर्कर्स काम कर रही हैं. यहां दिन में जहां बाजार पसरा होता है, दुकानों की रौनक होती है, उसी जगह पर शाम में सेक्स वर्कर अपने ग्राहकों की तलाश करती हैं.


    4. मीरगंज, इलाहाबाद
    इलीगल ट्रैफिकिंग के लिए इस रेडलाइट एरिया को अधिक बदनाम माना जाता है. कई बार पुलिस ने यहां कार्रवाई करके महिलाओं को छुड़ाया है. यहां 4 गलियां हैं जहां सेक्स वर्कर रहती हैं. शुरुआत में मीगरगंज में मुजरा का भी आयोजन होता था.
    5. जीबी रोड
    नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के पास स्थित जीबी रोड रेड लाइट एरिया में करीब 1000 सेक्स वर्कर्स काम करती हैं. दो से तीन मंजिली इमारतों में यहां महिलाएं रहती हैं. इन घरों के निचले फ्लोर में दुकानें हैं. रोड का नाम गार्स्टिन बैस्टन होने की वजह से इसे जीबी रोड कहा जाता है. हालांकि, बाद में सड़क का नाम बदलकर स्वामी श्रद्धानंद मार्ग कर दिया गया, लेकिन लोग इसे जीबी रोड के नाम से ही याद रखे हैं.


    6. चतुर्भुज स्थान, मुजफ्फरपुर, बिहार
    यहां एक मशहूर मंदिर के पास रेड लाइट एरिया है. यहां सेक्स वर्कर्स प्राचीन काल से ही रह रही हैं. यहां भी काफी संख्या में सेक्स वर्कर्स काम करती हैं.

    लाइफस्टाइल / शौर्यपथ / भागती दौड़ती जिंदगी में जीवनशैली अस्त-व्यस्त हो चुकी है, ऐसे में अक्सर हम सेहत से जुड़ी परेशानियों से जूझते रहते हैं। लेकिन फिर भी ऐसे कई तरीके हैं, जिससे हम स्वस्थ रह सकते हैं। आज हम आपको ऐसे डांस स्टाइल बताने जा रहे हैं, जिससे न सिर्फ आपका वजन भी कंट्रोल में रहेगा बल्कि आपको टेंशन से भी मुक्ति मिलेगी-
    हिप हॉप डांस
    हिप हॉप डांस एक तरह का स्ट्रीट डांस स्टाइल, जिसे हिप हॉप म्यूजिक पर परफॉर्म किया जाता है। इसमें पॉपिंग, लॉकिंग से लेकर ब्रेकिंग स्टाइल तक शामिल है। यह एक ऐसा डांस फॉर्म है जो वजन घटाने के लिए सबसे बेस्ट है क्योंकि इसमें सबसे ज्यादा कैलरी बर्न होती हैं। हिप हॉप स्टाइल को आमतौर पर क्लब में किया जाता है, लेकिन आप इसे घर पर भी आसानी से कर सकते हैं।
    बेली डांस
    हिप्स, बैक और ऐब्स को टोन करना चाहती हैं और कमर से चर्बी घटाना चाहती हैं तो फिर बेली डांस बेस्ट है। इसमें मूवमेंट एक नियंत्रित तरीके से और स्लो मोशन में की जाती हैं। फोकस कमर और हिप्स पर ही रहता है।
    फ्री स्टाइल
    यह डांस फॉर्म दुनिया के कई हिस्सों में पॉप्युलर है और वजन घटाने के लिए सही ऑप्शन हो सकता है। ऐसा इसलिए क्योंकि फ्री स्टाइल में आपको डांस स्टेप्स या बॉडी मूवमेंट्स पर खास ध्यान देने की जरूरत नहीं होती और आप जिस भी दिशा में चाहें और जैसे भी चाहें डांस कर सकते है।
    जुंबा डांस
    यह एक मिक्स्ड डांस फॉर्म है जिसमें सालसा, रुंबा और हिप हॉप भी शामिल है। इस डांस फॉर्म में बॉडी सबसे ज्यादा मूव होती है। यह एक तरह का कार्डियो वर्कआउट माना जा सकता है। यह डांस फंकी बीट्स पर किया जाता है, जिसमें ऐब्स से लेकर लेग्स और बाजुओं की भी एक्सर्साइज होती है। इस डांस फॉर्म को युवा काफी पसंद कर रहे हैं।

     

    खाना खजाना / शौर्यपथ / समोसे किसे पसंद नहीं होते। आप चाय के साथ कितने ही स्नैक्स खा लीजिए लेकिन समोसे की बात ही कुछ और होती है। आइए, आज जानते हैं कैसे बनाएं मटर के समोसे-
    साम्रगी
    आलू- 2 उबले हुए
    हरे मटर के दाने - 1/4 कप
    पनीर - 1 1/2 इंच का चौकोर टुकड़ा
    काजू - 4-5 ( छोटे छोटे कटे हुए)
    किशमिश - 1 टेबल स्पून
    अदरक की पेस्ट 1 छोटी चम्मच
    धनिया पाउडर 1 छोटी चम्मच
    हल्दी का पाउडर 1/2 छोटी चम्मच
    जीरा पावडर 1 छोटी चम्मच
    नमक स्वाद के लिए
    चीनी 1 छोटी चम्मच
    हरी मिर्च - 1 (बारीक कटी हुई)
    लाल मिर्च पाउडर - 1/4 छोटी चम्मच से आधी
    गरम मसाला - 1/4 छोटी चम्मच से आधा
    हरा धनियां - 2 टेबल स्पून (बारीक कतरा हुआ)

     

    विधि: पोटली समोसा बनाने के लिए पहले आप 2 कप मैदा में एक चुटकी नमक मिलाए और 1/2 टेबल स्पून तेल या घी के साथ गूंथ लें। गूंथे हुए आटे को कुछ देर के लिए रख दें। एक नॉन स्टिक पैन में एक बड़ा चम्मच तेल गरम करें। उसमें अदरक पेस्ट, धनिया पाउडर, हल्दी पाउडर, जीरा पाउडर, नमक, चीनी, काजू और किशमिश को अच्छे से मिला कर 2 मिनट तक भूनें। फिर डालें हरे मटर, अच्छे से मिलायें और भूनें। गूंथे हुए आटे को फिर से मसल कर थोड़ा और चिकना कीजिये और गूंथे आटे से छोटी छोटी लोई बनाकर तैयार कर लीजिए। अगर आपको पोटली बनाना है तो इसे गोल रहने दें नहीं तो इसे समोसे की पट्टी में बदल सकते हैं। इन बेली गई पट्टियों में तैयार की गई स्टफिंग भरें और इसी प्रकार बाकी के समोसे बना लें। एक कढ़ाई में जरूरत के मुताबिक तेल गरम करें और इसमें समोसों के गोल्डन ब्राउन और करारे होने तक तलें।

     

    शौर्यपथ / पंचांग शब्द सुनकर यह जिज्ञासा होती है कि इसके पंच अंग कौन-कौन से हैं। पंचांग में तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण को शामिल किया जाता है। तिथियां, प्रतिपदा से पूर्णिमा-अमावस्या सहित, कुल 16 हैं। वहीं अभिजित को मिलाकर कुल 28 नक्षत्र होते हैं। योग की संख्या 27 और करण की 16 है।

    वार सात हैं। जन्म के नक्षत्रों से पता चल जाता है कि आदमी किस ग्रह की दशा के प्रभाव में है। नौ ग्रह- केतु, शुक्र, सूर्य, चंद्रमा, मंगल, राहु, गुरु, शनि और बुध 27 नक्षत्रों के स्वामी हैं। अभिजित नक्षत्र, जो हर दिन दोपहर में सदैव विराजमान होता है, उसका स्वामी सूर्य-चंद्रमा को माना जाता है। देवी-देवताओं में प्रथम पूज्य विनायक का जन्म शतभिषा नक्षत्र में, भगवान राम का जन्म पुष्य नक्षत्र, तो कृष्ण का जन्म रोहिणी नक्षत्र में हुआ था।

    अश्विनी, मघा और मूल नक्षत्र के स्वामी केतु हैं। शुक्र स्वामी हैं भरणी, पूर्वा फाल्गुनी और पूर्वाषाढ़ा के, वहीं सूर्य कृतिका, उत्तरा फाल्गुनी और उत्तराषाढ़ा के स्वामी हैं। चंद्रमा राोहिणी, हस्त और श्रवण के स्वामी हैं, तो मंगल मृगशिरा, चित्रा और धनिष्ठा के स्वामी हैं। राहु आद्र्रा, स्वाति और शतभिषा नक्षत्र के स्वामी हैं, जबकि गुरु पुनर्वसु,विशाखा और पूर्वाभाद्रपद के। शनि पुष्य,अनुराधा और उत्तराभाद्रपद के और बुध अश्लेषा, ज्येष्ठा और रेवती नक्षत्र के स्वामी हैं। सभी नक्षत्रों के राजा पुष्य हैं।
    नक्षत्रों के देवता इस प्रकार हैं- देव वैद्य अश्विनी कुमार अश्विनी नक्षत्र के देवता हैं। भरणी के देवता यम, तो कृतिका के अग्निदेव हैं। रोहिणी के ब्रह्मा, तो मृगषिरा के देवता चंद्रमा हैं। आद्र्रा के देवता रुद्र-शिव, तो पुनर्वसु की देवी अदिति हैं। पुष्य के देवता बृहस्पति और अश्लेषा के सर्प हैं। मघा के देवता पितर, पूर्वा फाल्गुनी के भग और उत्तराफाल्गुनी के अर्यमा हैं। हस्त के देवता सूर्य हैं, चित्रा के विश्वकर्मा व स्वाति के वायु हैं। विशाखा के देवता इंद्राग्नि, अनुराधा के मित्र और ज्येष्ठा के इंद्र हैं। मूल नक्षत्र के देवता निऋर्ित (राक्षस) हैं। पूर्वाषाढ़ा के देवता जल और उत्तराषाढ़ा के विष्वदेव हैं। अभिजित नक्षत्र के देवता सृष्टिकर्ता ब्रह्माजी हैं। श्रवण के देवता विष्णु और धनिष्ठा के वसु हैं। शतभिषा के देवता वरुण, पूर्वाभाद्रपद के अजैकपाद, उत्तराभाद्रपद के देवता अहिर्बुधन्य और रेवती के देवता पूषा हैं।

     

    धर्म संसार / शौर्यपथ / श्रीमद्भागवत पुराण के अनुसार, सतयुग में उत्तर प्रदेश के हरदोई में ही नरसिंह व वामन अवतार हुआ था। कथा है कि देव व दैत्यों के युद्ध में दैत्य पराजित होने लगे। दैत्य राज बलि भी इंद्र के वज्र से मृत हो गए। तब दैत्यों के गुरु शुक्राचार्य ने अपनी मृत संजीवनी विद्या से बलि और दूसरे दैत्यों को जीवित कर दिया। राजा बलि के लिए गुरु शुक्राचार्य ने एक यज्ञ का आयोजन किया और अग्नि से दिव्य रथ, वाण व अभेद्य कवच प्राप्त किए। इससे असुरों की शक्ति बढ़ गई। असुर सेना ने इंद्र की राजधानी अमरावती पर आक्रमण कर दिया। देवराज इंद्र को पता चला कि सौ यज्ञ पूरा करने के बाद बलि स्वर्ग को पाने में सक्षम हो जाएगा।

    तब देवराज इंद्र सहायता के लिए श्रीहरि के पास पहुंचे। भगवान विष्णु ने उनकी सहायता के लिए आश्वासन दिया और माता अदिति के गर्भ से वामन रूप में जन्म लेने का वचन दिया। बलि द्वारा देवों के पराभव के बाद ऋषि कश्यप के कहने पर माता अदिति ने पयोव्रत का अनुष्ठान किया। तब भगवान विष्णु भाद्रपद शुक्ल पक्ष की द्वादशी को माता अदिति के गर्भ से जन्मे और ब्राह्मण रूप धारण किया।

    इस दिन भगवान वामन की पूजा-आराधना की जाती है। विष्णु के 10 अवतारों के क्रम में पांचवां अवतार वामन का था और 24 अवतारों के क्रम में 15वां अवतार था। वामन अवतार पिता से आज्ञा लेकर राजा बलि के पास दान मांगने के लिए गए। उस समय राजा बलि नर्मदा के तट पर अंतिम यज्ञ कर रहे थे। राजा बलि ने भगवान का आतिथ्य सत्कार कर आसन प्रदान किया। तब राजा बलि को भगवान ने दान की महत्ता को समझाकर यज्ञ के लिए तीन पग भूमि की याचना की। वामन भगवान की शिक्षा से प्रभावित होकर राजा बलि ने और अधिक मांगने का आग्रह किया। लेकिन भगवान अपनी तीन पग भूमि की याचना पर ही अड़े रहे।

    गुरु शुक्राचार्य ने बलि को सतर्क भी किया, पर बलि ने इस पर ध्यान नहीं दिया। फिर वामन भगवान ने विराट रूप धारण कर दो पग में ही तीनों लोकों को नाप लिया और बलि से पूछा- राजन अब मैं अपना तीसरा पैर कहां रखूं? राजा बलि के समक्ष संकट उत्पन्न हो गया कि वचन न पूरा करने पर अधर्म होगा। इसलिए बलि ने कहा- ‘भगवान अब तो मेरा सिर ही बचा है। आप इस पर पैर रख दीजिए, क्योंकि संपत्ति का मालिक संपत्ति से बड़ा होता है।’ राजा की इस बात से वामन प्रसन्न हो गए। बलि की दानवीरता से प्रसन्न होकर भगवान ने उसे चिरंजीवी रहने का वरदान देकर पाताललोक का स्वामी बना दिया और बलि के साथ सदा पाताल लोक में द्वारपाल बनकर रहने का वर भी दिया।

    इस दिन भगवान वामन की मूर्ति या चित्र की पूजा करें। मूर्ति है तो दक्षिणावर्ती शंख में गाय का दूध लेकर अभिषेक करें। चित्र है तो समान्य पूजा करें। इस दिन भगवान वामन का पूजन करने के बाद कथा सुनें और बाद में आरती करें। अंत में चावल, दही और मिश्री का दान कर किसी गरीब या ब्राह्मण को भोजन कराएं।

     

    धर्म संसार / शौर्यपथ / हिंदी पंचांग के अनुसार, भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को महालक्ष्मी व्रत होता है। इस वर्ष महालक्ष्मी का व्रत आज 25 अगस्त दिन मंगलवार से प्रारंभ हो रहा है। धन-संपदा और समृद्धि की देवी माता महालक्ष्मी की पूजा भाद्रपद शुक्ल अष्टमी से प्रारंभ होकर 16 दिनों तक आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि तक होती है। महालक्ष्मी का व्रत गणेश चतुर्थी के चार दिन बाद से प्रारंभ होती है। जो लोग 16 दिनों तक महालक्ष्मी का व्रत नहीं रख पाते हैं, वे पहले और आखिरी दिन महालक्ष्मी व्रत रखते हैं। आइए जानते हैं महालक्ष्मी व्रत, पूजा मुहूर्त और महत्व के बारे में।

    महालक्ष्मी व्रत प्रारंभ: 25 अगस्त 2020, दिन मंगलवार से।

    महालक्ष्मी व्रत समापन: 10 सितंबर 2020, दिन गुरुवार तक।

    महालक्ष्मी व्रत मुहूर्त: भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी ति​थि का प्रारंभ 25 अगस्त को दोपहर 12 बजकर 21 मिनट से हो रहा है, जो 26 अगस्त को सुबह 10 बजकर 39 मिनट तक है।

    महालक्ष्मी व्रत का महत्व

    भाद्रपद शुक्ल अष्टमी को महालक्ष्मी व्रत होता है, इस दिन राधा अष्टमी यानी राधा जयंती भी मनाई जाती है। अष्टमी के दिन प्रारंभ होने वाला महालक्ष्मी व्रत अत्यंत महत्वपूर्ण होता है क्योंकि इस दिन दूर्वा अष्टमी व्रत भी होता है। दूर्वा अष्टमी को दूर्वा घास की पूजा की जाती है। महालक्ष्मी व्रत धन, ऐश्वर्य, समृद्धि और संपदा की प्रात्ति के लिए किया जाता है। इस दिन लोग धन-संपदा की देवी माता लक्ष्मी को प्रसन्न करने का प्रयास करते हैं।

    महालक्ष्मी पूजा

    जो लोग माता महालक्ष्मी का व्रत करते हैं, वे पहले दिन पूजा के समय हल्दी से रंगे 16 गांठ वाला रक्षासूत्र अपने हाथ में बांधते हैं। 16वें द‍िन व्रत का व‍िध‍िपूर्व उद्यापन क‍िया जाता है और उसे रक्षासूत्र को नदी या सरोवर में व‍िसर्जित क‍िया जाता है। महालक्ष्‍मी की पूजा में हर द‍िन मां लक्ष्‍मी के इन आठ नामों ऊं आद्यलक्ष्म्यै नम:, ऊं विद्यालक्ष्म्यै नम:, ऊं सौभाग्यलक्ष्म्यै नम:, ऊं अमृतलक्ष्म्यै नम:, ऊं कामलक्ष्म्यै नम:, ऊं सत्यलक्ष्म्यै नम:, ऊं भोगलक्ष्म्यै नम: और ऊं योगलक्ष्म्यै नम: का जाप करते हैं।

     

       खाना खजाना /शौर्यपथ / सामग्री :
    ब्रेड- 6 
    बटर- आवश्यकतानुसार
    बारीक कटा प्याज- 1 
    उबले आलू- 2 
    उबला राजमा- 1/2 कप
    बारीक कटा अदरक-लहसुन- 2 चम्मच 
    हल्दी पाउडर- 1 चम्मच
    लाल मिर्च पाउडर- 1 चम्मच
    गरम मसाला पाउडर- 1 चम्मच
    चाट मसाला पाउडर- 1 चम्मच
    नमक- स्वादानुसार
    तेल- आवश्यकतानुसार

    विधि :
    पैन में एक चम्मच तेल गर्म करें और उसमें अदरक-लहसुन को कुछ सेकेंड तक भूनें। अब उस पैन में मैश किया आलू, उबला राजमा, नमक और अन्य सभी मसाले डालें। मध्यम आंच पर मिश्रण को अच्छी तरह से पकाएं और गैस बंद कर दें।  जब मिश्रण पूरी तरह से ठंडा हो जाए तो उसमें बारीक कटा प्याज और हरी मिर्च डालकर मिलाएं।

    ब्रेड स्लाइस के ऊपर यह राजमा वाला मिश्रण डालकर फैलाएं। ऊपर से दूसरा ब्रेड रखें। तीनों सैंडविच इसी तरह से तैयार कर लें। सैंडविच के ऊपर बटर लगाएं। नॉनस्टिक पैन में सैंडविच को दोनों ओर से सुनहरा होने तक सेंकें और सर्व करें।

     

    सेहत / शौर्यपथ / बरसात के मौसम में मच्छरों का खतरा सबसे ज्यादा रहता है। मच्छरों के काटने से नींद उड़ने से ज्यादा डेंगू-मलेरिया जैसी बीमारियों का खतरा रहता है। इन बीमारियों में बुखार से छुटकारा पाना आसान नहीं होता। इस दौरान मरीज के जोड़ों में दर्द और सिर में भी दर्द रहता है। साथ ही प्लेटलेट्स काफी कम हो जाते हैं। आपकी जानकारी के लिए घर में भी कुछ ऐसी असरदार चीजें मौजूद हैं, जो इस बीमारी से लड़ने में आपकी मदद कर सकती हैं।

    -डेंगू के बुखार से राहत पाने के लिए नारियल पानी खूब पिएं। इसमें मौजूद जरूरी पोषक तत्व जैसे मिनरल्स और एलेक्‍ट्रोलाइट्स शरीर को मजबूत बनाने में मदद करता है।

    -तुलसी के पत्तों को गर्म पानी में उबाल लें और फिर इस पानी को पिएं। ऐसा करने से शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बेहतर होती है। इसे दिन में चार बार पी सकते हैं।

    -डेंगू बुखार में मेथी की पत्तियां उबालकर चाय बनाकर पिएं। ऐसा करने से शरीर के विषाक्त पदार्थ बाहर निकलते हैं और डेंगू का वायरस दूर होता है।

    -पपीते के पत्ते भी काफी असरदार हैं। इसमें मौजूद पपेन शरीर के पाचन को सही रखता है। इसका जूस पीने से प्लेटलेट्स तेजी से बढ़ते हैं।

    -तुलसी के पत्तों के साथ काली मिर्च को पानी में उबाल लें और पिएं। इससे इम्यून सस्टिम मजबूत होता है और यह एंटी बैक्टीरियल की तरह काम करता है।

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