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नजरिया /शौर्यपथ / सभ्य समाज में सार्वजनिक स्थानों पर थूकने को कभी अच्छा नहीं माना गया है, लेकिन खेलों में खिलाड़ियों का थूकना आम बात है। फुटबॉल और बेसबॉल खिलाड़ियों को थूकते देखना बहुत आम है, लेकिन कोरोना संक्रमण थूक के छींटे के माध्यम से भी होता है, तो खेल जगत खिलाड़ियों की इस आदत से दहला हुआ है। फुटबॉल और क्रिकेट में खिलाड़ियों के मैदान में थूकने पर एकदम से रोक लगाने पर आजकल बहस चल रही है।
पिछले दिनों रोमानिया फुटबॉल फेडरेशन ने सुझाव दिया कि कोई भी खिलाड़ी मैदान में थूकता पाया जाए, तो उस पर छह से 12 मैचों का प्रतिबंध लगा दिया जाए। इसके अलावा कुछ लोग मैदान में थूकने वाले खिलाड़ी को येलो कार्ड दिखाकर बुक करने का सुझाव दे रहे हैं। इनका मानना है कि बिना सजा इस समस्या से निजात पाना संभव नहीं है। लेकिन विश्व फुटबॉल की संचालक संस्था फीफा को लगता है कि मैच का संचालन करने वाले अधिकारियों के लिए यह पता लगाना संभव नहीं होगा कि कौन खिलाड़ी कब थूक रहा है। इसलिए फीफा रेफरी कमेटी के चेयरमैन कोलिना का कहना है कि लीग या टूर्नामेंट के आयोजक मसविदा बनाएं और थूकने वाले खिलाड़ियों पर मैच के बाद हिसाब से कार्रवाई की जाए। कोलिना कहते हैं कि मैदान में थूकने वाले खिलाड़ी को येलो कार्ड दिखाना थोड़ा अव्यावहारिक भी होगा, क्योंकि एक तो मैच के संचालक के लिए हर घटना पर निगाह रखना संभव नहीं होगा और कुछ पर कार्रवाई करना उनके साथ अन्याय हो जाएगा। फुटबॉल में किसी खिलाड़ी का दूसरे खिलाड़ी पर थूकना रेड कार्ड वाला अपराध है और सामान्य तौर पर थूकने वाले के प्रति इतनी कठोर कार्रवाई उचित नहीं लगती।
क्रिकेट में तेज गेंदबाज गेंद चमकाने के लिए लार का प्रयोग करते हैं। लार से संक्रमण की आशंका बढ़ जाती है। तेज गेंदबाज गेंद के एक हिस्से को चमकाकर गेंद का संतुलन बिगाड़ देते हैं, जिससे गेंद स्विंग होने लगती है। आईसीसी की क्रिकेट समिति ने फिलहाल गेंद पर लार के इस्तेमाल पर रोक लगा दी है, लेकिन उसने तेज गेंदबाजों के मैदान पर थूकने पर कोई प्रतिबंध नहीं लगाया है। आने वाले दिनों में मैदान पर थूकने पर भी पाबंदी की मांग उठ सकती है। समिति के प्रमुख अनिल कुंबले का कहना है कि गेंद पर लार का इस्तेमाल नहीं करना अंतरिम व्यवस्था है, कोरोना की समस्या खत्म होने पर यह प्रतिबंध खत्म हो सकता है।
अब सवाल यह है कि खिलाड़ी मैदान में थूकते क्यों हैं? तमाम अध्ययनों के अनुसार, ज्यादा कसरत या मेहनत करने पर लार में प्रोटीन की मात्रा बढ़ जाती है। खासतौर से म्यूकस की मात्रा बढ़ने से थूक गाढ़ा हो जाता है, जिसे निगलना मुश्किल होता है। ऐसे में, सांस लेने में दिक्कत होने लगती है और थूकने से ही स्थिति सामान्य होती है। क्रिकेट में खिलाड़ियों को लगातार नहीं दौड़ना पड़ता, इसलिए थूकने की समस्या कम होती है। इसमें आमतौर पर तेज गेंदबाज लंबे रनअप की वजह से थूकते मिल जाते हैं। टेनिस खिलाड़ी ब्रेक के समय ड्रिंक के कारण थूकने की समस्या से बचे रहते हैं। थूकने की मजबूरी फुटबॉल में ज्यादा है।
क्या फुटबॉलरों के थूकने पर रोक लगने से उनके खेल पर गलत प्रभाव तो नहीं पड़ेगा? शायद मैच के दौरान खिलाड़ियों का गला तर रखने की व्यवस्था करनी पडे़गी। इसके अलावा खिलाड़ियों को मैदान पर मिलकर जश्न मनाने से बचने की सलाह दी गई है। अक्सर खिलाड़ी खुशी में एक-दूसरे पर कूद पड़ते हैं। मैचों में आमतौर पर दोनों टीमों के कप्तान सद्भाव के तौर पर एक-दूसरे से जर्सी बदलते हैं, इस पर भी रोक लगा दी गई है।
ऐसी समस्याएं अनेक खेलों में आएंगी। खिलाड़ियों द्वारा मिलकर घेरा बनाना बंद हो जाएगा। टेनिस में तो अपनी गेंदें और तौलिया लाने की शुरुआत की जा रही है। सवाल यह है कि इतना सब होने के बाद भी क्या खेलों में पहले जैसा लुत्फ बना रहेगा? पिछले दिनों शुरू हुई जर्मन फुटबॉल लीग के मैच बिना दर्शक खेले जा रहे हैं। इसी तरह इंग्लिश प्रीमियर लीग की भी शुरुआत होने जा रही है। जुलाई में इंग्लैंड और वेस्ट इंडीज के बीच क्रिकेट सीरीज भी बिना दर्शक खेली जानी है। इन हालात में दर्शकों का खेलों के प्रति कितना लगाव बना रहता है, यह भी शायद कोरोना से ही तय होगा।
(ये लेखक के अपने विचार हैं) मनोज चतुर्वेदी, वरिष्ठ खेल पत्रकार
सम्पादकीय लेख / शौर्यपथ / केरल में एक हथिनी की जिस तरह दर्दनाक मौत हुई है, उससे न केवल कानून-व्यवस्था, बल्कि मानवीयता पर भी सवाल खडे़ हो गए हैं। अब जब भारी विरोध और आलोचना के बाद इस मौत या हत्या के दोषियों की गिरफ्तारी शुरू हो गई है, तब हमें पशु क्रूरता निवारण की दिशा में हर पहल का स्वागत करना चाहिए। गांधीजी ने स्पष्ट इशारा किया था कि आपकी सभ्यता की परख इस बात से होगी कि आप अपने पशुओं के साथ कैसा व्यवहार करते हैं। लेकिन पता यह लगा है कि फल में छिपाकर पशुओं को बारूद या पटाखे खिला देना नई बात नहीं है। चुपचाप न जाने कितने पशु मार दिए गए होंगे। वह गर्भवती हथिनी भी बारूद वाला अनानास खाकर वहीं मारी जाती, तो यह खबर देश-दुनिया में सुर्खियां नहीं बनती, शायद अब तक ऐसा ही होता आया होगा। पर वर्षों से चल रहे इस अत्याचार का घड़ा शायद भर गया था। निर्दोष बेजुबानों की पीड़ा तब दूर तलक गई, जब उस बुरी तरह घायल हथिनी ने तीन दिन पानी में खड़े होकर लगभग सत्याग्रह या विलाप किया। हथिनी अकेली नहीं थी, उसके पेट में शिशु था। यह एक ऐसा घटनाक्रम है, जो दशकों तक याद रखा जाएगा और संवेदनशील लोगों को रुलाता रहेगा। आम तौर पर घायल होने के बाद जानवर आक्रामक हो जाते हैं, लेकिन वह हथिनी आक्रामक नहीं हुई, असह्य वेदना से बचने के लिए और शायद अपने गर्भ की चिंता में वह पानी की गोद में जा खड़ी हुई। काश! उसे तुरंत पानी से बाहर निकाल लिया जाता और उसका हरसंभव इलाज हो पाता, तो मानवता यूं शर्मसार नहीं हो रही होती।
दोषियों को कतई माफ न किया जाए, साथ ही, अपनी फसलों को बचाने के इस बारूदी तरीके पर भी पूरी कड़ाई से रोक लगनी चाहिए। अभी पशुओं के साथ होने वाली क्रूरता को रोकने के लिए जो कानून हैं, वे शायद अपर्याप्त हैं और उन्हें लागू करने में सरकारी एजेंसियों की कोई खास रुचि नहीं है। ऐसी घटनाओं से निपटने के लिए केरल सरकार को अपने स्तर पर पूरे इंतजाम करने होंगे। केरल की व्यापक छवि में हाथियों की अपनी गरिमामय उपस्थिति है। इसी प्रेम भाव के विकास के लिए पूरे राज्य में काम होने चाहिए। केरल या उसके किसी जिले या किसी समुदाय के खिलाफ नफरत की राजनीति समस्या का निदान नहीं है, लेकिन यह विवाद जिस तरह से बढ़ रहा है, उससे लगता है, यह सड़क, कोर्ट से विधानसभा तक गरमाएगा। अत: पशुओं के अधिकारों के लिए सक्रिय लोगों को पूरी सावधानी और संयम से स्थाई समाधान की ओर बढ़ना होगा, तभी वे लक्ष्य तक पहुंचेंगे।
वैसे हाथियों के प्रति क्रूरता केवल केरल की समस्या नहीं है। छत्तीसगढ़, कर्नाटक, महाराष्ट्र, झारखंड, ओडिशा, पूर्वोत्तर से भी शिकायतें आती रहती हैं। इन हाथियों को जंगल से बाहर न आना पडे़, इसके प्रबंध बार-बार चर्चा व सिफारिश के बावजूद नहीं हो रहे हैं। कई बार चर्चा हुई है कि हाथियों के लिए जंगलों में फलदार पेड़ों के गलियारे होने चाहिए, ताकि उनकी जरूरत वहीं पूरी हो जाए। अब समय आ गया है, जब हाथी ही नहीं, तमाम वन्य जीवों-पशुओं को तरह-तरह से मारने की प्रवृत्ति पर अंकुश लगना चाहिए। तभी अपार पीड़ा से लाचार उस हथिनी का जल-सत्याग्रह सफल होगा और हम अपने हृदय में मानव होने का तार्किक गर्व सहेज सकेंगे।
मेलबॉक्स / शौर्यपथ / धरती पर मानव ही ऐसा प्राणी है, जो अच्छे और बुरे का भेद कर सकता है। मगर केरल की घटना ने ईश्वर की सबसे सुंदर रचना पर शक की चादर चढ़ा दी है। वहां एक गर्भवती हथिनी के साथ किया गया व्यवहार दुखी करने वाला है। इस घटना से यह समझ नहीं आ रहा कि वास्तव में जानवर कौन है? वह हथिनी, जो पीड़ा में भी शांत होकर पानी में खड़ी रही या फिर वे इंसान, जिन्होंने इस बेजुबान को फल में बम खिला दिया। हथिनी के पेट में पल रहे बच्चे ने भी शायद यही सोचा होगा कि अगर मानव ऐसे होते हैं, तो ठीक है कि मैं धरती पर नहीं आया। लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि जब-जब मानव इंसानियत से दूर हुआ है, तब-तब उसे इसका भारी खामियाजा भुगतना पड़ा है।
ललित शंकर, मावना, मेरठ
सबकी है दुनिया
विश्व पर्यावरण दिवस पर प्रकाशित अनिल प्रकाश जोशी का लेख ‘यह दुनिया सिर्फ इंसानों की नहीं’ पढ़ा। वाकई, इस दुनिया पर जितना हमारा अधिकार है, उतना ही उन लाखों जीव-जंतुओं और पेड़-पौधों का भी है, जिनको प्रकृति ने हमारे साथ जीवन दिया है। चूंकि इंसान सबसे बुद्धिमान प्राणी है, इसलिए उसे पर्यावरण संरक्षण पर विशेष ध्यान देना चाहिए। लेकिन दुखद यह है कि हम पर्यावरण को बचाने के लिए समय-समय पर बातें तो खूब करते हैं, लेकिन जिस तरह से उन पर काम होना चाहिए, वह नहीं करते। हमें अपने आसपास की आबोहवा साफ रखनी ही होगी, अन्यथा मानव जीवन शायद ही बचा रह सकेगा।
विजय कुमार धनिया, नई दिल्ली
बढ़ता तनाव
केरल के एक गांव में नौवीं कक्षा की एक छात्रा ने जिस तरह से आत्महत्या की, उससे कई सवाल उठ खड़े होते हैं। कहा जा रहा है कि ऑनलाइन पढ़ाई न कर पाने की वजह से वह दबाव में थी। यह बेहद अफसोस की बात है कि एक बच्ची पढ़ना चाहती थी, पर संसाधन के अभाव में हताशा के गर्त में चली गई और अपनी जान दे बैठी। सचमुच, सरकारी विद्यालयों में पढ़ने वाले बच्चे इतने संपन्न नहीं होते कि उनके पास स्मार्टफोन, टीवी, केबल आदि हों। ऑनलाइन पढ़ाई के लिए स्मार्टफोन और इंटरनेट की जरूरत पड़ती है। उस बच्ची के पिता दिहाड़ी मजदूर हैं। संभवत: पिता की आर्थिक मजबूरी रही होगी कि वह अपनी बेटी की ऑनलाइन पढ़ाई के लिए जरूरी संसाधन नहीं जुटा पाया। दिक्कत यह है कि सरकार ने ऑनलाइन पढ़ाई शुरू तो कर दी, लेकिन इसके लिए अपनी तैयारी पूरी नहीं की। कुछ समय लगाकर पहले अभिभावकों को तैयार करना जरूरी था। यह घटना सबक दे रही है कि हमें अपने आसपास ऐसे परिवारों की खोज-खबर जरूर लेनी चाहिए, जिनके मुखिया की आजीविका इस लॉकडाउन में चली गई हो और बुनियादी जरूरतें भी वह पूरी नहीं कर पा रहा हो।
विनय मोहन, सेक्टर 18, जगाधरी
अमानवीय कृत्य
केरल में गर्भवती हथिनी के साथ हुई बर्बरता हृदय-विदारक है। हमारे संविधान में सभी जीवों के प्रति दया की भावना रखने की बात मौलिक कर्तव्यों में कही गई है। हमारी संस्कृति में भी कई जीवों को पूजनीय माना जाता है और अहिंसा को महत्व दिया जाता है। ऐसे में, देश के सबसे शिक्षित राज्य में ऐसी अमानवीय घटना हमें चिंतित करती है। शत-प्रतिशत साक्षरता का भला क्या उद्देश्य होना चाहिए? क्या शिक्षा-व्यवस्था में सुधार की जरूरत है? जानवरों के अधिकारों को लेकर हमें ज्यादा गंभीर होना चाहिए। यह सही है कि देश में हर व्यक्ति को उनके अधिकार नहीं मिल पाते हैं, लेकिन मानवाधिकार और अन्य जीवों के अधिकार की बात एक साथ होनी चाहिए। ऐसा क्रूरतापूर्ण काम करने वालों से भला मानवता की क्या उम्मीद की जाए!
प्रीतीश पाठक
बलवाहाट, सहरसा
ओपिनियन / शौर्यपथ / प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री स्कॉट मॉरिसन के बीच हुई शिखर-वार्ता समोसा और गुजराती खिचड़ी की चर्चा के साथ खत्म हुई; इस वादे के साथ कि समोसे और खिचड़ी साझा किए जाएंगे। लेकिन फिलहाल यह मुमकिन नहीं था, क्योंकि वार्ता वर्चुअल (आभासी) थी, एक डिजिटल माध्यम के जरिए दोनों देशों के नेता एक-दूसरे से रूबरू हो रहे थे।
भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच यह शिखर-वार्ता द्विपक्षीय संबंधों के लिहाज से बहुत महत्वपूर्ण थी। दोनों देशों के बीच कई समझौते हुए, दोनों ने एक-दूसरे के मिलिट्री बेस के इस्तेमाल का बेहद महत्वपूर्ण समझौता भी किया। प्रधानमंत्री मोदी ने इसे व्यापार और साझेदारी का एक नया मॉडल बताते हुए शिखर-वार्ता के बाद ट्वीट भी किया। लेकिन यह सब बेहद सादगी से हुआ। इसमें पारंपरिक शिखर-वार्ता की रौनक गायब थी। न तो कोई भोज था, न फोटो-अप, न ही डिनर डिप्लोमेसी। एक स्क्रीन थी, और इस डिजिटल दीवार के आर-पार दोनों प्रधानमंत्री थे। उनमें बातचीत हुई और कई समझौते भी हुए। हालांकि, द्विपक्षीय रिश्तों की गरमी डिजिटल बंटवारे के आर-पार महसूस की गई।
कोरोना-काल के पूर्व की परंपरागत शिखर-वार्ताओं को याद कीजिए। पहले किसी शिखर-वार्ता का मतलब होता था- शासनाध्यक्ष के आने की तैयारियां, कई भोज, कई दौर की बातचीत, फिर कुछ समझौते, साझा बयान और फोटो-अप। ऐसे में, कहा जा सकता है कि असल की जगह अब वर्चुअल ले रहा है और इसकी अहमियत अब बढ़ती ही जाएगी। हां, इसमें आमने-सामने मिलने की गर्मजोशी और ‘पर्सनल टच’ की कमी जरूर महसूस होगी, लेकिन कोरोना-काल की यही असलियत है और इसमें भविष्य के संकेत भी हैं। वर्चुअल डिप्लोमेसी अब एक ऐसी सच्चाई है, जो आगे भी बनी रहेगी। ऑस्ट्रेलिया के हाई कमिश्नर बैरी ओ फैरेल ने इसी दौरान अपना कार्यभार संभाला और राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को डिजिटल माध्यम से ही अपना परिचय-पत्र पेश किया। इस मौके पर उन्होंने कहा भी कि कोरोना ने जीवन के हर क्षेत्र में बाधाएं खड़ी की हैं, कूटनीति इसका अपवाद नहीं।
दरअसल, कोरोना-काल की कूटनीति में द्विपक्षीय संवादों, शिखर-सम्मेलनों या किसी भी प्रकार के आदान-प्रदान के नियम बदल चुके हैं। असल की जगह वर्चुअल ने ले ली है। राजनयिकों ने एक-दूसरे के साथ संपर्क व सहयोग बनाए रखने का नया तरीका अपना लिया है, जिसमें शून्य शारीरिक नजदीकी अपनाई जा रही है। नाराजगी जाहिर करने का तरीका भी वर्चुअल हो गया है। अप्रैल महीने में भारत-पाक सीमा पर मारे गए नागरिकों को लेकर नई दिल्ली ने नाराजगी जताते हुए इस्लामाबाद को वर्चुअल आपत्ति-पत्र भेजा। फोन कॉल और फिर ई-मेल के जरिए आपत्ति दर्ज की गई।
वैश्विक कूटनीति इस दौरान कैसे डिजिटल माध्यम से काम कर रही है, इसकी एक दिलचस्प मिसाल है संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थाई प्रतिनिधि सैयद अकबरुद्दीन की सेवानिवृत्ति। वह रिटायर हुए और पद से उनकी विदाई एक आभासी नमस्ते के साथ हुई। इसी तरह, पिछले माह लगभग 20 सम्मेलन आभासी माध्यम से हुए। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की महासभा भी ऑनलाइन हुई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 4 मई को नाम शिखर-वार्ता में ऑनलाइन ही शिरकत की। कोरोना के शुरुआती दौर में ही प्रधानमंत्री ने सार्क देशों के नेताओं के साथ वीडियो कॉन्फ्रेंस के जरिए एक अहम बैठक की थी। यह सब सिर्फ भारत में नहीं हो रहा, सभी देश तकनीक के जरिए अब अपनी कूटनीति कर रहे हैं।
ऐसा नहीं है कि वर्चुअल माध्यम से कूटनीति पहले नहीं हुई। मोहित मुसद्दी और संजय पुलिपका ने देल्ही पॉलिसी ग्रुप के लिए लिखे अपने शोधपत्र में लिखा है कि कूटनीति के लिए वर्चुअल माध्यम अपनाना असामान्य नहीं है। जब से टेलीफोन ने कूटनीति में अपनी जगह बनाई है, वह वहां जम गया। उसकी भरपाई किसी अन्य चीज से नहीं की जा सकी। 1963 में शीत युद्ध के दौरान अमेरिका और सोवियत संघ के बीच हॉटलाइन की शुरुआत हुई थी, ताकि दोनों शीर्ष नेताओं के बीच सीधी बातचीत हो सके। देखते-देखते दूसरे देश भी कूटनीति के इस वैकल्पिक रास्ते का इस्तेमाल करने लगे। शीत युद्ध के बाद टेलीफोन द्वारा कूटनीति में गति आ गई। अब तो संयुक्त राष्ट्र भी वर्चुअल महासभा की संभावना पर गौर कर रहा है, जिसमें रिकॉर्ड किए गए भाषण चलाए जाएं।
डिजिटल माध्यम से कूटनीति के कई फायदे हैं। यह काफी किफायती है। शिखर सम्मलेन हो या फिर बहुपक्षीय बैठक, इनसे जुड़ी यात्राओं और आयोजनों का खर्च वर्चुअल माध्यम में काफी कम हो जाता है। यह पर्यावरण संरक्षण की नजर से भी बेहतर है, क्योंकि ऐसे में हवाई यात्राओं की संख्या में काफी कमी आएगी, जिसका सीधा असर ग्लोबल वार्मिंग पर पड़ता है। इन सभी फायदों को देखते हुए लगता है कि संबंधों के तार जोड़ने के लिए डिजिटल माध्यम ही भविष्य है।
लेकिन वर्चुअल डिप्लोमेसी पारंपरिक कूटनीति की जगह पूरी तरह से ले लेगी, यह मुश्किल है। भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच तो यह कामयाब हो सकती है, जहां दोनों पक्षों में कोई टकराव या मतभेद की स्थिति नहीं, लेकिन जहां मुश्किल परिस्थितियों से जूझना पड़ता है, वहां बंद दरवाजों के पीछे की कूटनीति और व्यक्तिगत संबंधों की अपनी अहमियत है। मिसाल के तौर पर, डोका ला टकराव के बाद भारत और चीन के रिश्तों में जमी बर्फ को पिघलाने में प्रधानमंत्री मोदी और शी जिनपिंग की वुहान में हुई पारंपरिक-वार्ता की अहम भूमिका थी। इसमें नदी किनारे की सैर, पारंपरिक भोज जैसी चीजों की अपनी जगह है, जो दोनों पक्षों के बीच एक आत्मीयता को जन्म देती है।
याद कीजिए, इंदिरा गांधी ने अपने दौर में अलफांसो आम की कूटनीति की थी, प्रधानमंत्री मोदी ने तत्कालीन पाकिस्तानी वजीर-ए-आजम नवाज शरीफ के साथ शॉल डिप्लोमेसी की थी। रूस तो वोदका डिप्लोमेसी के लिए दुनिया भर में जाना जाता है। प्रधानमंत्री मोदी और उनके ऑस्ट्रेलियाई समकक्ष के बीच भी समोसा और खिचड़ी की बात हुई, पर वह सिर्फ बात थी। जब उनकी आमने-सामने की मुलाकातें होंगी, तो बात आगे बढ़ेगी। संबंधों की जटिलताओं को सुलझाने के लिए या रिश्तों में जमी बर्फ को पिघलाने के लिए पुराने पारंपरिक तरीके जरूरी बने रहेंगे। हां, सामान्य बातचीत और कूटनीति के लिए वर्चुअल डिप्लोमेसी ही आगे का रास्ता है।
(ये लेखिका के अपने विचार हैं)नगमा सहर, टीवी पत्रकार व सीनियर फेलो, ओआरएफ
बेमेतरा । शौर्यपथ । संत आशारामजी बापू द्वारा प्रेरित युवा सेवा संघ जिला बेमेतरा ने विश्व पर्यावरण दिवस एवं वट पूर्णिमा व कबीरजी जयंती के उपलक्ष्य पर विभिन्न जगहों में किया वृक्षारोपण । युवा सेवा संघ जिला बेमेतरा के अध्यक्ष सोनू साहू ने बताया पीपल का वृक्ष दमानाशक, हृदयपोषक, ऋण-आयनों का खजाना, रोगनाशक, आह्लाद व मानसिक प्रसन्नता का खजाना तथा रोगप्रतिकारक शक्ति बढानेवाला है । बुद्धू बालकों तथा हताश-निराश लोगों को भी पीपल के स्पर्श एवं उसकी छाया में बैठने से अमिट स्वास्थ्य-लाभ व पुण्य-लाभ होता है । पीपल की जितनी महिमा गायें, कम है । पर्यावरण की शुद्धि के लिए जनता-जनार्दन एवं सरकार को बबूल, नीलगिरी (यूकेलिप्टस) आदि जीवनशक्ति का ह्रास करनेवाले वृक्ष सडकों एवं अन्य स्थानों से हटाने चाहिए और पीपल, आँवला, तुलसी, वटवृक्ष व नीम के वृक्ष दिल खोलके लगाने चाहिए । इससे अरबों रुपयों की दवाइयों का खर्च बच जायेगा । ये वृक्ष शुद्ध वायु के द्वारा प्राणिमात्र को एक प्रकार का उत्तम भोजन प्रदान करते हैं । पूज्य बापूजी कहते हैं कि ये वृक्ष लगाने से आपके द्वारा प्राणिमात्र की बडी सेवा होगी । यह लेख पढने के बाद सरकार में अमलदारों व अधिकारियों को सूचित करना भी एक सेवा होगी । खुद वृक्ष लगाना और दूसरों को प्रेरित करना भी एक सेवा होगी । जिसमे प्रदीप साहू, शिद्धान्त चौहान,कुश कश्यप, हेमलाल साहू, महेश, रेवाराम,राधेश्याम,सुमन साहू,अनूप, खेमलाल ,प्रह्लाद साहू,आदि पदाधिकारी उपस्थित रहे।*
दुर्ग । शौर्यपथ । 5 जून विश्व पर्यावरण दिवस है इस दिन आम जनता पेड़ पौधे लगा कर पर्यावरण की रक्षा की बात करती है कोई इसे लंबे समय तक निभाता है कोई कुछ दिनों के लिए किन्तु पर्यावरण दिवस के दिन दुर्ग पुलिस द्वारा ssp यादव के मार्गदर्शन में एक नई पहल की शुरुवात की है । दुर्ग पुलिस द्वारा बेजुबान पक्षियों के लिए गर्मी के मौसम में दाना पानी की व्यवस्था की । एक विशेष प्रकार के डब्बे में दाना पानी को रखकर थाना परिसरों में इसे लगाया जाएगा गर्मी के मौसम में बेजुबान पक्षियों के लिए दाना पानी की व्यवस्था । पहल का शुभारंभ SSP अजय यादव द्वारा पुलिस कंट्रोल रूम सेक्टर 6 से किया गया । इस मौके पर asp रोहित झा सहित वरिष्ठ पुलिस अधिकारी मौजूद रहे ।
भिलाई नगर / शौर्यपथ / नगर पालिक निगम भिलाई क्षेत्र मे मुख्यमंत्री स्लम स्वास्थ्य योजना के बेहतर क्रियान्वयन के लिए आयुक्त ऋतुराज रघुवंशी के निर्देश पर निगम सभागार में नोडल अधिकारी तरुण पाल लहरें ने बैठक ली! मुख्यमंत्री स्लम स्वास्थ्य योजना के लिए आरएफपी (रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल) जारी किया जा चुका है! इस योजना के तहत निगम क्षेत्र के नागरिकों को उनकी बस्ती, मोहल्ले, पारा में ही चिकित्सा की उन्नत सेवा मोबाइल मेडिकल यूनिट के माध्यम से मिल पाएगी! निवास के समीप ही सुविधा प्राप्त होने के कारण स्लम क्षेत्र के नागरिक इसका सहज ही लाभ प्राप्त कर पाएंगे साथ ही उन्हें अपने कार्यों से छुट्टी नहीं लेनी पड़ेगी एवं बच्चों की पढ़ाई भी निरंतर चल सकेगी! यह सेवा बिल्कुल निशुल्क होगी!
मोबाइल मेडिकल यूनिट से होगा परीक्षण इस योजना के अंतर्गत चलित वाहन जिसमें चिकित्सक एवं अन्य स्टाफ उपलब्ध होंगे के साथ पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार स्लम क्षेत्र में निर्धारित स्थल जो कि सामान्यतः सांस्कृतिक भवन/ सांस्कृतिक चबूतरा/ वार्ड कार्यालय/ निकाय के अन्य भवन के पास पहुंचेंगे जहां पर रोगियों के बैठने, पेयजल तथा अन्य अनुषांगिक सुविधाएं निगम द्वारा उपलब्ध कराई जाएगी! चिकित्सक द्वारा बारी-बारी से रोगियों का परीक्षण कर आवश्यक दवाइयां प्रदान की जाएगी! इसके अतिरिक्त पैथोलॉजी लैब की सुविधा भी मोबाइल मेडिकल यूनिट में उपलब्ध होंगी! चिकित्सा, दवाईयां तथा पैथोलॉजी टेस्ट की सुविधा नागरिकों को निशुल्क प्रदान की जाएगी! मोबाइल मेडिकल यूनिट में अनुपलब्ध परीक्षण की सुविधाएं समीपस्थ शासकीय चिकित्सालय से प्राप्त की जा सकेगी!
प्रतिस्पर्धात्मक निविदाओं के माध्यम से होगा एजेंसी का चयन अर्बन पब्लिक सर्विस सोसायटी के द्वारा निगम क्षेत्र में प्रतिस्पर्धात्मक निविदा के माध्यम से एजेंसी नियुक्त किया जाएगा जिसके लिए रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल जारी किया जा चुका है भिलाई क्षेत्र में जिसकी अंतिम तिथि 15 जून नियत की गई है तथा 8 जून को प्री बीट मीटिंग निगम सभागार में रखा गया है जहां पर कोई भी एजेंसी या इस कार्य में रूचि लेने वाले विस्तृत जानकारी एकत्रित कर सकते हैं, इनके प्रश्नों का निराकरण भी इस दिन किया जाएगा! कार्य लेने वाले एजेंसी के द्वारा मोबाइल मेडिकल यूनिट चालक एवं इंधन सहित, मेडिकल ऑफिसर, फार्मासिस्ट, महिला चिकित्सा मित्र तथा पैथोलॉजी लैब सहायक उपलब्ध कराए जाएंगे!
भिलाई के लिए तीन मोबाइल मेडिकल यूनिट की होगी व्यवस्था सहायक नोडल अधिकारी बीके देवांगन ने बताया कि भिलाई क्षेत्र के लिए 3 मेडिकल मोबाइल यूनिट की व्यवस्था की जानी है, अभी केवल एक मेडिकल मोबाइल यूनिट के लिए दर मंगाया गया है जिसके आधार पर बाकी का दर तय किया जाएगा! प्रत्येक मेडिकल मोबाइल यूनिट में मानिटरिंग हेतु सीसीटीवी तथा योजना के प्रचार-प्रसार हेतु टीवी, प्रोजेक्टर, मुनादी हेतु साउंड सिस्टम आदि की व्यवस्था होगी! मोबाइल मेडिकल यूनिट के संचालन हेतु समस्त आनुषांगिक अधिनियम, नियमों तथा पंजीयन आदि समस्त आवश्यक कार्य जैसे नर्सिंग होम एक्ट, बायोमेडिकल वेस्ट मैनेजमेंट एक्ट चयनित एजेंसी द्वारा किया जाएगा! मेडिकल मोबाइल यूनिट के माध्यम से होने वाले परीक्षण के उपरांत इसका रिपोर्ट भी दिया जाएगा तथा इसके लिए दिन एवं समय भी निर्धारित किया गया है!
मुख्यमंत्री स्लम स्वास्थ्य योजना को लेकर सभागार में हुई बैठक निगम आयुक्त श्री ऋतुराज रघुवंशी के निर्देश पर भिलाई क्षेत्र में मुख्यमंत्री स्लम स्वास्थ्य योजना के बेहतर क्रियान्वयन को लेकर सभागार में बैठक हुई जिसमें नोडल अधिकारी तरुण पाल लहरें ने विस्तृत जानकारी प्रदान की! चयनित एजेंसी को 5 साल के लिए कॉन्ट्रैक्ट दिया जाएगा!
उन्होंने बताया कि योजना के पात्र हितग्राही भिलाई निगम क्षेत्र के समस्त नागरिक होंगे एवं स्लम क्षेत्र में निवास करने वाले नागरिकों को प्राथमिकता दी जाएगी यदि शिविर स्थल पर दूसरे वार्ड के नागरिक आते हैं तो उन्हें भी समस्त सुविधाएं प्रदान की जाएगी! बैठक में कुछ चिकित्सक एवं एजेंसी भी उपस्थित रहे! इस कार्य से संबंधित अधिक जानकारी के लिए नोडल अधिकारी के मोबाइल नंबर 7509229781 से संपर्क किया जा सकता है!
भिलाई निगम क्षेत्र अंतर्गत 59 स्लम क्षेत्र नगर पालिक निगम भिलाई क्षेत्र मे स्लम क्षेत्र बात करें तो तकरीबन 59 स्लम क्षेत्र है जिसमें 24470 से अधिक परिवार निवासरत है! रहवासी क्षेत्र में इनको मोहल्ले में ही मेडिकल मोबाइल यूनिट का लाभ मिलेगा!
दुर्ग / शौर्यपथ / शहर के 132 मंदिरों के पुरोहितों को आज विधायक अरुण वोरा एवं महापौर धीरज बाकलीवाल ने कोरोना राहत केन्द्र विवेकानंद सभा भवन बुलाकर सूखा राशन प्रदान किया गया । इस दौरान एमआईसी प्रभारी दीपक साहू, कार्यपालन अभियंता मोहनपुरी गोस्वामी सहा0 अभियंता जितेन्द्र समैया, पूर्व पार्षद राजेश शर्मा व अन्य उपस्थित थे । महापौर श्री बाकलीवाल ने बताया कि शासन द्वारा 22 मार्च से जारी सभी लाॅकडाउन के बाद से पूरे देश और प्रदेश के सभी धार्मिक संस्थान, मंदिरों के पट को सार्वजनिक उपयोग के लिए बंद कर दिया गया है । एैसे में मंदिरों में भगवान की पूजा अर्चना और सेवा करने वाले पुरोहितों के सामने आर्थिक परेशानी होने लगी थी। इन्हीं मंदिरों में सेवा के बदले वे अपने और अपने परिवार का जीवन यापन करते आ रहे हैं । इन पुरोहितों को भी गरीबों की श्रेणी में मानते हुये आज करीब 132 मंदिरों के पुरोहितों को विवेकानंद सभा भवन बुलाकर उन्हें सूखा राशन आटा, दाल, तेल, मसाला, साबून, आदि आवश्यक सामग्री प्रदान की गई।
दुर्ग । शौर्यपथ । मनी बैक जीवन बीमा पॉलिसी लेने वाले शासकीय कर्मचारी को आठवें और बारहवें वर्ष में मनी बैक का बेनिफिट नहीं दिया, इस कृत्य को सेवा में निम्नता ठहराते हुए जिला उपभोक्ता फोरम के अध्यक्ष लवकेश प्रताप सिंह बघेल, सदस्य राजेन्द्र पाध्ये और लता चंद्राकर ने भारतीय जीवन बीमा निगम की पदमनाभपुर दुर्ग शाखा पर 21 हजार रुपये हर्जाना लगाया। *परिवादी की शिकायत* आनंद नगर दुर्ग निवासी शासकीय कर्मचारी ए.के. पाठक ने महासमुंद में पदस्थ रहते हुए भारतीय जीवन बीमा निगम से 28 फरवरी 2003 को जीवन सुरभि मनी बैक पॉलिसी ली थी, जिसका वार्षिक प्रीमियम 6170 था, इस पॉलिसी में 4 वर्ष बाद 30 प्रतिशत, 8 वर्ष बाद 30 प्रतिशत 12 वर्ष बाद 40 प्रतिशत मनी बैक बेनिफिट दिया जाना था एवं अंतिम वर्ष में परिपक्वता राशि का भुगतान किया जाना था। शासकीय कर्मचारी होने के कारण परिवादी का महासमुंद से दुर्ग स्थानांतरण हुआ तब उसने अपनी बीमा पॉलिसी को भी दुर्ग स्थानांतरित करा लिया। स्थानांतरण के पश्चात परिवादी को पॉलिसी से मिलने वाली मनी बैक बेनिफिट आठवें वर्ष (2011) और बारहवें वर्ष (2015) में नहीं मिली और दिनांक 28 फरवरी 2018 को पॉलिसी परिपक्व होने के बाद भी उसे इस लाभ से वंचित रखा गया। इसके बाद परिवादी ने लिखित में जानकारी भी बीमा कंपनी को दी लेकिन परिवादी को उसकी मनी बैक बेनिफिट रकम 41648 रुपये का भुगतान नहीं किया गया। *अनावेदक का जवाब* बीमा कंपनी ने प्रकरण में उपस्थित होकर जवाब दिया कि परिवादी ने अपनी पालिसी महासमुंद से क्रय की थी जिसका भुगतान महासमुंद शाखा से प्राप्त होना था और आठवें वर्ष में 15000 रुपये एवं बारहवें वर्ष में 20000 रुपये का चेक महासमुंद शाखा से समय पर भेजा गया था किंतु परिवादी के नाम से जारी पॉलिसी ट्रांसफर हो जाने के कारण और परिवादी द्वारा किसी प्रकार की सूचना नहीं दिए जाने के कारण परिवादी को भुगतान नहीं हो सका। कंपनी ने भुगतान करने का प्रयास किया था। परिवादी ने ही घोर लापरवाही की है। *फोरम का फैसला* प्रकरण में पेश दस्तावेजों एवं प्रमाणों तथा दोनों पक्षों के तर्को के आधार पर जिला उपभोक्ता फोरम के अध्यक्ष लवकेश प्रताप सिंह बघेल, सदस्य राजेन्द्र पाध्ये और लता चंद्राकर ने यह निष्कर्ष निकाला कि परिवादी का स्थानांतरण दुर्ग हुआ तब परिवादी ने नए पते की सूचना दी थी ऐसे में अनावेदक का यह दायित्व था कि आठवें एवं बारहवें वर्ष मिलने वाली राशि को परिवादी के पालिसी में दर्शित पते पर भेजता। इसके बाद जब बीमा कंपनी ने दिनांक 28 फरवरी 2018 को अंतिम भुगतान किया उस दौरान भी परिवादी को आठवें एवं बारहवें वर्ष की राशि का भुगतान किया जा सकता था किंतु उस समय भी परिवादी को उसकी राशि नहीं दी गई जबकि अनावेदक को परिवादी के पते का ज्ञान हो चुका था। उपभोक्ता फोरम के समक्ष प्रकरण के लंबित रहने के दौरान बीमा कंपनी ने 41648 रुपये का भुगतान आठवें और बारहवें वर्ष के लिए ब्याज सहित किया है। ये राशि परिवादी को वर्ष 2011 एवं 2015 में ही अनावेदक से प्राप्त होनी थे किंतु उसे राशि प्राप्त नहीं हुई और कई वर्षों तक पत्र व्यवहार करना पड़ा और अनावश्यक चक्कर लगाने पड़े। इससे उसे आर्थिक व मानसिक पीड़ा हुई है और परिवादी अपनी ही राशि से कई वर्षों तक वंचित रहा। यदि परिवादी ने फोरम के समक्ष परिवाद प्रस्तुत न किया गया होता तो उसे उसकी राशि भी प्राप्त नहीं होती। इस आधार पर परिवादी अनावेदक बीमा कंपनी से 20000 रुपये मानसिक क्षतिपूर्ति प्राप्त करने का अधिकारी है साथ ही बीमा कंपनी को वाद व्यय के रूप में 1000 रुपये भी परिवादी को देना होगा।
दुर्ग । शौर्यपथ । विधायक अरूण वोरा ने आईएएनएस.सी वोटर स्टेट ऑफ द नेशन 2020 सर्वे में देश के दूसरे सबसे लोकप्रिय मुख्यमंत्री चुने जाने पर मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को बधाई देते हुए कहा है कि छत्तीसगढ़ राज्य की जनता के नजर में मुख्यमंत्री भूपेश बघेल पूरे देश में सबसे उत्कृष्ट मुख्यमंत्री हैं। मुख्यमंत्री और उनके नेतृत्व में छत्तीसगढ़ सरकार का काम दूसरे नंबर पर नहीं बल्कि पहले नंबर पर है। वोरा ने कहा कि पिछले डेढ़ साल के कार्यकाल में भूपेश सरकार ने किसानों की कर्जमाफी और 25 रुपए प्रति क्विंटल पर धान खरीदी के साथ न्याय योजना शुरू कर बहुत बड़े राहत भरे फैसले किए हैं। देश में धान का सबसे ज्यादा मूल्य छत्तीसगढ़ सरकार दे रही है। इसी तरह वनोपज का मूल्य भी आदिवासियों को सबसे ज्यादा दिया जा रहा है। इन फैसलों से परेशानहाल किसानों व आदिवासियों की आर्थिक स्थिति सुधर रही है। इसी तरह भूपेश सरकार ने हाट बाजार क्लीनिक, मोहल्ला क्लीनिक जैसी योजनाएं शुरू कर लोगों के स्वास्थ्य का ध्यान रखते हुए उनके इलाज की चिंता की है। हाफ बिजली बिल जैसी योजना लागू कर पूरे छत्तीसगढ़वासियों को बड़ी राहत देने का महत्वपूर्ण फैसला किया गया है। भूपेश सरकार ने कोविड 19 महामारी से बचाव और इलाज के लिए जिस तरह से योजनाबद्ध ढंग से काम किया है उसकी देश विदेश में प्रशंशा हो रही है। वोरा ने कहा कि लॉकडाउन की विपरीत परिस्थितियों में लाखों गरीबों, मजदूरों को रोज भोजन देने, प्रवासी मजदूरों को राहत देने के लिए भोजन, नाश्ता, पेयजल के साथ चरणपादुका जैसी व्यवस्थाएं करते हुए मुख्यमंत्री के नेतृत्व में राज्य सरकार ने दूसरे राज्यों से मजदूरों को वापस लाने की दिशा में बहुत महत्वपूर्ण काम किया है। वोरा ने दावा किया कि सर्वे एजेंसियों की नजर में भले ही मुख्यमंत्री भूपेश बघेल दूसरे नंबर पर हों, लेकिन प्रदेश के हर नागरिक को राहत देने वाले मुख्यमंत्री भूपेश बघेल राज्य की जनता की नजर में पहले नंबर पर हैं।
मनोरंजन/ शौर्यपथ / अभिनेत्री सोनाक्षी सिन्हा लॉकडाउन के खत्म होने के बाद अपने दोस्तों के साथ मिलने और पार्टी करने को लेकर इंतजार में हैं। अभिनेत्री ने अपनी पोस्ट-लॉकडाउन विशलिस्ट का खुलासा किया है।
एक बार लॉकडाउन के हटने के बाद वह कौन सा काम है, जो वह करना चाहेंगी। इस पर उन्होंने कहा, “मैं बस अपने सभी दोस्तों के साथ पार्टी करना और काम पर वापस जाना चाहती हूं ! लेकिन वह भी केवल सुरक्षित रहने पर।”
अभिनेत्री ने कहा था कि भले ही वह अपने दोस्तों और काम को याद कर रही हैं, लेकिन अगर घर पर रहने से वायरस के प्रसार को रोका जा सकता है, तो लॉकडाउन में उन्हें ऐसा करने में कोई आपत्ति नहीं है।
सोनाक्षी कैसे लॉकडाउन से मुकाबला कर रही हैं, इस पर उन्होंने कहा, “मैं अपने दोस्तों को याद करती हूं, लेकिन यदि आप चीजों को परिप्रेक्ष्य में रखते हैं, तो वास्तव में यह एक मुद्दा भी नहीं है। मुझे लॉकडाउन से कोई दिक्कत नहीं अगर इससे हम वायरस के प्रसार को रोक सकते हैं। इसने सभी को एहसास दिलाया कि चीजों को हलके में नहीं लेना चाहिए।”
लॉकडाउन के दौरान सबसे चुनौती पूर्ण काम के बारे में पूछे जाने पर सोनाक्षी ने कहा, “कुछ भी नहीं। मैं अपने प्रियजनों के साथ घर पर रह रही हूं और मैं इसके लिए खुद को भाग्यशाली मानती हूं। जब आप चारों ओर उन लोगों को देखते हैं, जो अपने घर-परिवारों से दूर हैं और खुद के लिए भोजन जुटाने में भी सक्षम नहीं हैं, तो असल में चुनौतियों का सामना वे लोग कर रहे हैं। मेरा दिल उनके लिए व्यथित हो जाता है और मैं उनकी मदद करना चाहती हूं।”
सोनाक्षी कैसे लॉकडाउन से मुकाबला कर रही हैं, इस पर उन्होंने कहा, “मैं अपने दोस्तों को याद करती हूं, लेकिन यदि आप चीजों को परिप्रेक्ष्य में रखते हैं, तो वास्तव में यह एक मुद्दा भी नहीं है। मुझे लॉकडाउन से कोई दिक्कत नहीं अगर इससे हम वायरस के प्रसार को रोक सकते हैं। इसने सभी को एहसास दिलाया कि चीजों को हलके में नहीं लेना चाहिए।”
लॉकडाउन के दौरान सबसे चुनौती पूर्ण काम के बारे में पूछे जाने पर सोनाक्षी ने कहा, “कुछ भी नहीं। मैं अपने प्रियजनों के साथ घर पर रह रही हूं और मैं इसके लिए खुद को भाग्यशाली मानती हूं। जब आप चारों ओर उन लोगों को देखते हैं, जो अपने घर-परिवारों से दूर हैं और खुद के लिए भोजन जुटाने में भी सक्षम नहीं हैं, तो असल में चुनौतियों का सामना वे लोग कर रहे हैं। मेरा दिल उनके लिए व्यथित हो जाता है और मैं उनकी मदद करना चाहती हूं।”
अभिनेत्री समझती है कि 'हम सभी एक साथ' हैं और 'सर्वश्रेष्ठ के लिए' उम्मीद कर रहे हैं।
काम की बात करें, तो सोनाक्षी जल्द ही 'भुज: द प्राइड ऑफ इंडिया' में दिखाई देंगी। फिल्म में अजय देवगन, संजय दत्त, शरद केलकर, एम्मी विर्क और प्रणिता सुभाष ने भी काम किया हैं।
वास्तु टिप्स / शौर्यपथ / घर की किस दिशा में कौनसा वृक्ष, पेड़ या पौधा लगाना चाहिए और कौनसा नहीं यह जानना जरूरी है। यदि घर के आसपास नकारात्मक वृक्ष लगे हैं तो उससे जीवन में परेशानिया खड़ी होती है। आओ जानते हैं वृक्ष के वास्तु नियम।
1. पौधारोपण हेतु उत्तरा, स्वाति, हस्त, रोहिणी और मूल नक्षत्र अत्यंत शुभ होते हैं। इनमें रोपे गए पौधों का रोपण निष्फल नहीं होता है। जिन्हें अपना जन्म नक्षत्र ज्ञात हो वे जन्म नक्षत्र अनुसार रोपण करें। दूसरा यह कि पौधों के शुक्ल पक्ष में पौधारोपण करें। शुक्ल पक्ष की अष्टमी से कृष्ण पक्ष की सप्तमी तक का समय वृक्षारोपण के लिये शुभ रहता है।
2. कोई भी पौधा घर के मुख्य द्वार के सामने न रोपे, बड़े वृक्ष मुख्य द्वार की ऊंचाई के तीन गुना दूर लगाएं। वृक्ष की छाया प्रात: 9 से 3 बजे तक घर पर नहीं पड़ना चाहिए। घर की छाया से थोड़ी दूर पर पीपल, आम और नीम लगा सकते हैं। घर के उत्तर एवं पूर्व क्षेत्र में कम ऊंचाई के पौधे लगाने चाहिए।
3. पौधों को पहले मिट्टी के गमलों में व फिर जमीन में लगाना चाहिए। ऐसा करने से उनका विकास अच्छा रहता है। यदि किसी भी कारण से किसी वृक्ष को निकालना आवश्यक हो जाता है तो उसे माघ या भाद्रपद माह में ही निकालना चाहिए। साथ ही एक वृक्ष निकालने के स्थान पर एक नया वृक्ष लगाने का संकल्प लेना चाहिए। ऐसा तीन माह के भीतर कर देना चाहिए।
4. कहते हैं कि जो वृक्ष ऊंचे और मजबूत तथा कठोर तने वाले (शीशम इत्यादि) हैं, उन पर सूर्य का विशेष अधिकार होता है। दूध वाले वृक्षों (देवदार इत्यादि) पर चंद्र का प्रभाव होता है। लता, वल्ली इत्यादि पर चंद्र और शुक्र का अधिकार होता है। झाड़ियों वाले पौधों पर राहू और केतू का विशेष अधिकार है। जिन वृक्षों में रस विशेष न हो, कमजोर, देखने में अप्रिय और सूखे वृक्षों पर शनि का अधिकार है। सभी फलदार वृक्ष बृहस्पति के वर्ग में, बिना फल के वृक्षों पर बुध का और फल, पुष्प वाले चिकने वृक्षों पर शुक्र का अधिकार है।
5. सूर्य की दिशा पूर्व, बृहस्पति की दिशा उत्तर, मंगल की दिशा दक्षिण, शनि की दिशा पश्चिम है।
6. पूर्व दिशा : घर की पूर्व दिशा में बरगद का पेड़ होने से समस्त मनोकामनाएं पूरी होती हैं, लेकिन इसकी घर पर छाया नहीं पड़ना चाहिए और घर की छाया इस पर नहीं पड़ना चाहिए। पूर्व में पीपल से भय और निर्धनता आती है। पूर्व में लगे फलदार वृक्ष से संतति की हानि होती है। हालांकि घर की पूर्व दिशा की ओर पीपल और बरगद के वृक्ष लगाने शुभ नहीं होते। इनसे स्वास्थ्य हानि, प्रतिष्ठा में कमी एवं अपकीर्ति के संकेत मिलते हैं। घर की पूर्व दिशा में गुलाब, चंपा, गूलर, चमेली, बेला, दुर्वा, तुलसी आदि के पौधे लगाने चाहिए। इससे शत्रुनाश, धनसंपदा की वृद्धि व संतति सुख प्राप्त होता है।
7. पश्चिम : पश्चिम में लगे कांटेदार वृक्ष से शत्रु का भय उत्पन्न होता है। पश्चिम में पीपल का वृक्ष शुभ फलदायी होती है। घर के दक्षिण एवं पश्चिम क्षेत्र में ऊंचे वृक्ष (नारियल अशोकादि) लगाने चाहिए। इससे शुभता बढ़ती है।
8. उत्तर : तुलसी, कैथ, पाकड़ या केले के पेड़ को ईशान या उत्तर में लगाने से घर में सुख, शांति और समृद्धि आती है। यहां इस पौधे का अत्यंत शुभ फल मिलता है। लेकिन यदि गूलर और नींबू का पेड़ है तो आंखों से संबंधित रोग उत्पन्न होंगे। उत्तर दिशा में फलदार पेड़ लगाने से संतान पीड़ा अथवा बुद्धि का भी नाश होता है।
9. ईशान : तुलसी, कैथ, पाकड़ या केले के पेड़ को ईशान या उत्तर में लगाने से घर में सुख, शांति और समृद्धि आती है। ईशान कोण में लटजीरा लगा सकते हैं। ईशान कोण की वाटिका में हल्के फूलों वाले पौधे, बेल और लताएं और औषधीय गुणों वाले पौधे जैसे तुलसी, आंवला इत्यादि लगाए जाने चाहिए। मकान से कुछ दूरी पर ईशान में आंवला भी लगा सकते हैं।
10. दक्षिण : घर की दक्षिण दिशा में गुलाब, गूलर, खैर, नारियल, अशोक और नीम का पेड़ शुभ फलदायक होता है। घर के पिछवाड़े या दक्षिण की ओर फलदार वृक्ष शुभ होने चाहिए। इस दिशा में कांटेदार पेड़-पौधे होने से घर में रोग उत्पन्न हैं। तुलसी का पौधा कठोर यातना देता है। दक्षिण में दूधवाले वृक्ष लगे होने से धन नाश होता है। गुलमोहर, पाकड़, कटहल के वृक्ष लगाने से अकारण शत्रुता, अर्थनाश, असंतोष व कलह होने की आशंका रहती है। जिस व्यक्ति को संकटों से मुक्ति पाना और निरोगी रहना हो उसे घर के दक्षिण में नीम का वृक्ष लगाना चाहिए। घर की छाया से थोड़ी दूर नीम लगा सकते हैं।
11. आग्नेय कोण : दक्षिण पूर्व दिशा अर्थात आग्नेय कोण की ओर पलाश, ढाक, जवाकुसुम, बरगद, अनार, लाल गुलाब अशुभ एवं कष्टदायक होते हैं। इस दिशा में लाल फूलों के वृक्षों व लताएं तथा कांटे वाले वृक्ष अनिष्टकारक एवं मृत्युकारक माने गए हैं।
12. नैऋत्य : नैऋत्य में इमली का पेड़ शुभ फल देता है।
13. वायव्य : नीम के वृक्ष को वायव्य कोण में लगाना भी अत्यंत शुभ फलदायी होता है। बेल का वृक्ष भी वायव्य कोण में लगा सकते हैं।
14 कदम्ब, केला और नींबू जिसके घर में उत्पन्न होता है, उस घर का मालिक कभी विकास नहीं करता। अत: इसकी दिशा का ज्ञान होना जरूरी है।
15. पाकड़, गूलर, आम, नीम, बहेड़ा तथा कांटेदार वृक्ष, पीपल, अगस्त, इमली ये सभी घर के समीप निंदित कहे गए हैं।
16. कहते हैं कि पूर्व में पीपल, अग्निकोण में दुग्धदार वृक्ष, दक्षिण में पाकड़, निम्ब, नैऋत्य में कदम्ब, पश्चिम में कांटेदार वृक्ष, उत्तर में गूलर, केला, छाई और ईशान में कदली वृक्ष नहीं लगाना चाहिए। बैर, पाकड़, बबूल, गूलर आदि कांटेदार पेड़ घर में दुश्मनी पैदा करते हैं। इनमें जति और गुलाब अपवाद हैं। घर में कैक्टस के पौधे नहीं लगाएं।
17. जामुन और अमरूद को छोड़कर फलदार वृक्ष भवन की सीमा में नहीं होने चाहिए। इससे बच्चों का स्वास्थ्य खराब होता है। आवासीय परिसर में दूध वाले वृक्ष लगाने से धनहानि होती है। जिन पेड़ों से गोंद निकलता हो अर्थात चीड़ आदि घर के परिसर में नहीं लगाने चाहिए। यह धनहानि की आशंका को बढ़ाता है।
18. जिस घर की सीमा में निगुंडी का पौधा होता है वहां गृह कलह नहीं होती।
19. जिस घर में एक बिल्व का वृक्ष लगा होता है उस घर में लक्ष्मी का वास बतलाया गया है।
20. जिस व्यक्ति को उत्तम संतान एवं सुख देने वाले पुत्र की कामना हो, उसे पलाश का पेड़ लगाना चाहिए।
21. जिस व्यक्ति को राहु के दोष दूर करना हो उसे चंदन का वृक्ष लगाना चाहिए।
22. जिस व्यक्ति को शनि से संबंधित बाधा दूर करना हो उसे शमी का वृक्ष लगाना चाहिए।
23. अनार का पौधा घर में लगाने से कर्जे से मुक्ति मिलती है।
24. हल्दी का पौधा लगाने से घर में नकारात्मक उर्जा नहीं रहती।
25. नीले फूल वाली कृष्णकांता की बेल से आर्थिक समस्याएं खत्म होती हैं।
26. नारियल के पेड़ से मान-सम्मान में खूब वृद्धि होती है।
27. अशोक का वृक्ष लगाने से घर के बच्चों की बुद्धि तेज होती है।
28. तुलसी, आंवला और बहेड़ा का पौधा घर में लगाने से बीमारी नहीं आती है।
29. गेंदा लगाने से बृहस्पति मजबूत होता है और वैवाहिक जीवन सुखमय रहता है।
30. बांस का पेड़ लगाने से तरक्की होती है और घर में सुख-समृद्धि आती है। निगेटिव एनर्जी भी दूर होती है। लेकिन किसी विशेषज्ञ से पूछकर लगाएं।
31. गुड़हल का पौधा लगाने से कानून संबंधी सभी काम पूरे हो जाते हैं। बेलपत्र का पौधा लगाने से पीढ़ी दर पीढ़ी लक्ष्मी जी का वास बना रहता है।
धर्म संसार / शौर्यपथ / गर्ग मुनि के पास एक ऋषि आकर कहते हैं कि गुरुदेव आश्रम द्वार पर एक अंधा गाने वाला आया है और आपसे भेंट करने की आज्ञा चाहता है। गर्ग मुनि कहते हैं कि उस महान कलाकार को बड़े आदर के साथ ले आओ और हमारी कुटिया में बिठाओ।
यह सुनकर अक्रूरजी कहते हैं कि ये लीजिये, जिसकी दृष्टि की आप प्रशंसा कर रहे थे वो तो दृष्टिहिन निकला। तब गर्ग मुनि कहते हैं कि मैंने दृष्टि नहीं दूरदृष्टि की बात कही थी। चलिए...दोनों उठकर अंधे गायक से मिलने चले जाते हैं। एक ऋषि उन्हें आसन पर बिठाते हैं। गर्ग मुनि कहते हैं बिराजिए।
वह अंधा गायक गर्ग मुनि के श्रीचरणों में प्रणाम करता है। गर्ग मुनि आशीर्वाद देकर कहते हैं बिराजिये कविराज। कहिये क्या आज्ञा है? यह सुनकर वह अंधा गायक आंखों में आंसू भरकर कहता है प्रभु आप स्वयं ही ब्रह्माजी के पुत्र हैं। इसलिए आपको सर्वसमर्थ जानकर एक प्रार्थना लेकर आया हूं। तब गर्ग मुनि कहते हैं कि हम यथा शक्ति आपकी आज्ञा का पालन करेंगे, कहिये।
वह गायक कहता है कि आपका आशीर्वाद व्यथा नहीं जा सकता। इसलिए मुझे एक आशीर्वाद चाहिए। सुना है कि भगवान कृष्ण रूप में अवतार लेकर इस समय धरती पर विराजमान हैं।... यह सुनकर अक्रूरजी को आश्चर्य होने लगता है।
आगे अंधा गायक कहता है मुझे केवल उनके दर्शन मात्र के लिए थोड़ी देर के लिए ही सही आंखें प्रदान कर दीजिए। जिनसे मैं उन्हें एक बार देख लूं। फिर भले ही आप मुझे नेत्रहिन कर दीजिए। यह सुनकर गर्ग मुनि कहते हैं कि आपको आंखें प्रदान करना कोई मुश्किल काम नहीं। परंतु एक बात का उत्तर दीजिए आपके मन के अंतरमन में अभी तक उनके दर्शन नहीं हुए?
तब आंखें बंद करके वह श्रीकृष्ण को अपने अंतरमन में देखते हैं और कहते हैं कि मेरे मन ने एक आलौकिक बालक को शीशु अवस्था से लेकर बड़े होते हुए देखा है। क्या यह वही है? तब गर्ग मुनि कहते हैं कि हां ये वही है। यह सुनकर वह अंधे बाबा प्रसन्न हो जाते हैं। तब गर्ग मुनि कहते हैं कि ये रूप बड़े-बड़े तपस्वियों को भी इस प्रकार स्पष्ट रूप से नहीं दिखता जिस प्रकार आप देख रहे हैं और वह इसलिए कि आपकी दिव्य दृष्टि से आप एक ही दृश्य देख रहे हैं और यदि आपके चक्षू खोल दिए जाए तो आपको अनेक दृश्य दिखाई देंगे। इसलिए सोच लीजिए इसी एक ही दिव्य रूप को मन में स्थिर रखना है या माया द्वारा निर्मित अनेक रूपों को?
यह सुनकर वह अंधा गायक कहता है कि अब मुझे समझ में आया कि प्रभु ने मुझे ये नयनहिन शरीर देकर मुझ पर कितनी बड़ी कृपा की है। इसके बाद वह अंधा गायक कहता है कि आप महान ज्योतिष हैं इसलिए हे महामुनि आप मुझे मेरा भविष्य बता दीजिए। क्या इसी जन्म में मुझे प्रभु चरणों में मुक्ति प्राप्त हो जाएगी?
यह सुनकर गर्ग मुनि आंखें बंद करके भविष्य में झांकते हैं। यह देखकर अक्रूरजी फिर से आश्चर्य करने लगते हैं। फिर वे आंखें खोलकर कहते हैं कि अभी नहीं कविराज। यह सुनकर कविराज निराश हो जाते हैं। फिर आगे मुनि कहते हैं कि अभी तो आपकी आवश्यकता कलयुग में पड़ेगी। यह सुनकर वह अंधा गायक कहता है कलयुग में?
मुनि कहते हैं हां, कलयुग में करोड़ों प्राणियों को आपको अपने भक्ति रस में डूबोना है। जब कलयुग में भक्ति का हास होगा तो आपको अपनी दिव्य दृष्टि से प्रभु की लीला दिखाई देने लगेगी और आप उसका वर्णन अपनी वाणी से करेंगे। उस समय भी आपको नैनहिन शरीर की प्राप्त ही होगी। उसी जन्म में आपको मुक्ति भी मिलेगी। यह सुनकर कविराज प्रसन्न होकर वहां से विदा ले लेते हैं।
फिर गर्ग मुनि कहते हैं कि अक्रूरजी कविराज का भविष्य देखते देखते ज्योतिष विद्या के अनुसार शीघ्र ही आपका भी मानसिक कायाकल्प होने वाला है। जल्द ही आप पर प्रभु की महान कृपा होने वाली है और उस समय आप वह सब देखेंगे जिसे आपका मस्तिष्क अभी तक नहीं मानता। हम देख रहे हैं कि प्रभु की प्रेमलीला अपनी पराकाष्ठा तक पहुंचने वाली है। गोकुल की सारी ब्रज बालाएं एक माह तक कात्यायिनी मां का व्रत रखने के पश्चात आज मार्गशीर्ष संक्रांति के दिन अपने मन के अनुसार पति पाने के लिए गौरी पूजन कर रही हैं और उस प्रभु की माया तो देखो कि हर गोपिका श्रीकृष्ण को ही पति रूप में पाने की गुप्त कामना लिए इस व्रत का अनुष्ठान कर रही हैं।
दूसरी ओर राधा सहित सभी ब्रज बालाओं को गौरी व्रत पूजन करते हुए बताया जाता है। उनकी पूजन और व्रत से प्रसन्न होकर माता गौरी प्रकट होकर कहती है, मांगों क्या चाहिए। यह सुनकर राधा माता गौरी की प्रशंसा करने के बाद कहती हैं कि जिस प्रकार आपने व्रत करके अपना मनवांछित पति पाया उसी प्रकार हम भी अपना मनवांछित पति पाएं। हम सभी को अपना अपना श्रेष्ठ पति प्राप्त हों। यह कहकर सभी गोपिकाएं माता को प्रणाम करती हैं।
माता अपनी माया से सभी के बीच से राधा को उठाती है जिसे कोई दूसरी सखियां देख नहीं पाती हैं। फिर माता कहती हैं कि हे राधे आप तो श्रीकृष्ण की अर्धांगिनी हैं और इन सब गोपियों में तो श्रीकृष्ण को ही पति रूप में पाने की कामना हैं और मुझे तो इन सभी गोपियों में आपका ही रूप नजर आता है। फिर भी मैं आपको वर देती हूं कि आपका मनवांछित वर आपको हर जन्म में प्राप्त होगा। चैत्रमास के शुक्ल पक्ष में वृंदावन के रासमंडल में इन समस्त गोपिकाओं के सहित श्रीकृष्ण के साथ आपकी रासलीला सम्पन्न होगी।
फिर सभी गोपिकाएं प्रणाम करके राधा के साथ उठती है तो माता कहती हैं हम तुम सबके हृदय का रहस्य जानते हैं किसके हृदय में किस पति की कामना है वो भी हमें स्पष्ट दिखाई दे रहा है। हमारा वरदान है कि शीघ्र ही तुम्हारा मनोरथ सिद्ध होगा। आज से तीन मास व्यतीत होने पर जब मनोहर मधुमान का शुक्ल पक्ष आएगा तब तुम सबको अपने अपने मनवांछितकांत की प्राप्त होगी। हमारा ये वचन निष्फल नहीं होगा। यह वचन देकर माता चली जाती हैं।
सभी गोपिकाएं व्याकुल हो तीन माह का इंतजार करती हैं। तीन माह के निश्चित समय पर श्रीकृष्ण मुरली की धुन छेड़ते हैं और सभी गोपिकाएं बैचेन होकर सभी श्रीकृष्ण के पास पहुंच जाती हैं। फिर सभी सखियों के संग प्रभु का महारास होता है। सभी देवता इस नृत्य को देखते हैं और फूल बरसाते हैं और वे भी उनके साथ रास रचाते हैं। श्रीकृष्ण अनेक रूप धरकर सभी सखियों के संग नृत्य करते हैं।
फिर रामानंद सागर जी महारास का अर्थ बताते हैं और बताते हैं कि आगे चलकर अब श्रीकृष्ण की राजनैतिक लीलाओं और महान यादव वीरों का आततायी कंस से लोहा लेने का समय आ रहा है। जय श्रीकृष्णा।
नजरिया / शौर्यपथ / यह वाकया सुप्रीम कोर्ट में प्रवासियों से जुडे़ एक मामले की सुनवाई के दौरान सामने आया। सर्वोच्च न्यायालय ने स्वत: संज्ञान लेते हुए इस मामले की सुनवाई शुरू की थी। सुनवाई के दौरान फोटोग्राफर केल्विन कार्टर से जुड़ी एक प्रसिद्ध घटना का भी जिक्र आया और ऐसे हालात में हस्तक्षेप करने के इच्छुक लोगों के लिए एक मुहावरे का इस्तेमाल किया गया। वह मुहावरा है- दुर्भाग्य के पैगंबर! इसमें कोई दोराय नहीं कि तार्किक तौर पर किसी संदर्भ में समय व स्थान को ध्यान में रखते हुए विषय से जुड़े उपलब्ध साक्ष्यों के समुचित विश्लेषण के बाद ही कोई निष्कर्ष निकाला जाना चाहिए या कोई बयान देना चाहिए। अन्यथा इसे अप्रासंगिक या अनुचित माना जाता है। इस मुहावरे के साथ-साथ जिस घटना का जिक्र किया गया, वह दूसरों के एक विशेष आचरण को शायद अनुचित ठहराने के लिए ही था।
वैसे इस मुहावरे का इस्तेमाल कोई नया नहीं है। हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने जलवायु परिवर्तन के खिलाफ संघर्ष कर रहे कार्यकर्ताओं के लिए इसी मुहावरे का इस्तेमाल किया था। अत: ऐसा नहीं है कि भारतीय सुप्रीम कोर्ट में ही पहली बार किसी ने इसका इस्तेमाल किया। हालांकि, फर्क यह है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एक राजनीतिक बयान दे रहे थे, जबकि भारतीय कोर्ट में प्रवासियों की तकलीफ पर सुनवाई के दौरान इसका इस्तेमाल किया गया।
शब्दकोश के मुताबिक, इस मुहावरे का अर्थ है : ‘किन्हीं फैसलों या कदमों के नकारात्मक नतीजों की आशंका के प्रति आगाह करने वाला शख्स।’ फिर यह प्रवासियों से जुड़े तथ्यों पर कैसे लागू होता है? प्रवासियों की तकलीफों को सबने देखा है, सुबूत मौजूद हैं, बूढ़े, बच्चे, औरतें, दिव्यांग बिना भोजन-पानी की उचित व्यवस्था के सैकड़ों किलोमीटर पैदल सड़कों पर चले, भय के मारे उन्हें कंटेनरों तक में सफर करना पड़ा, उनमें से कई की सड़क हादसे में मौत तक हो गई। क्या इन तथ्यों से इनकार किया जा सकता है? यह स्थिति लगभग एक महीने तक रही, बल्कि देश के कुछ हिस्सों में तो आज तक बनी हुई है।
बाद में जब टे्रन सेवाओं की शुरुआत हुई, तो इसके साथ राज्य सरकारों की मंजूरी की शर्त नत्थी कर दी गई। फिर यात्रियों के पंजीकरण की प्रक्रिया जटिल थी, तो हताश लोग लंबी कतारों में खडे़ होने लगे। स्वाभाविक है, स्पष्ट सूचना के अभाव में पुलिस स्टेशनों और रेलवे स्टेशनों पर भारी भीड़ उमड़ पड़ी।
फिजिकल डिस्टेंसिंग की सावधानी कई जगह मजाक बनकर रह गई। अनेक जगह गरीबों के लिए खाना-पानी और छत को लेकर भी भारी भ्रम थे। फिर उनमें से कई को पुलिस की मार भी खानी पड़ी। भारत जैसे विशाल देश में जब अनेक राज्य कुछ उदासीन दिख रहे थे और केंद्र व कुछ राज्यों के बीच तालमेल दुरुस्त नहीं था, तब एक आम इंसान क्या करता? क्या किसी नुमाइंदे ने शुरू में ही सामने आकर यह कहा कि वे किसी को इतनी लंबी दूरी पैदल चलने की अनुमति नहीं देंगे और जिन्हें अपने गांव जाना ही है, उनके लिए बसों की व्यवस्था की जाएगी? देश के ज्यादातर नागरिक भी इन बदनसीब लोगों को बेबसी से देख रहे थे। उनमें से कई लोगों और संस्थाओं ने पैदल प्रवासियों को भोजन-पानी मुहैया कराने की चेष्टा की, मगर यह पर्याप्त नहीं था। कई जगहों पर तो मददगार लोगों को यह कहते हुए सहायता करने से रोका गया कि इससे संक्रमण फैलेगा और प्रशासन स्वयं प्रवासियों की जरूरतों का इंतजाम कर रहा है।
ऐसे में, कई लोगों को कानून के राज द्वारा संचालित लोकतंत्र में अदालती हस्तक्षेप ही एकमात्र विकल्प लगा। और सर्वोच्च न्यायालय का स्वत: संज्ञान लेना इस बात की तस्दीक करता है कि इस समस्या से निपटने के लिए सुविचारित पहल की कमी रही। इस तथ्यात्मक पृष्ठभूमि में कोर्ट का दरवाजा खटखटाने को क्या नकारात्मकता ढूंढ़ने का प्रयास कहा जा सकता है? और यदि कोई नागरिक या संगठन अपना यह फर्ज निभाता है और उचित नजरिये के साथ अदालत की सहायता करना चाहता है, तो इसकी देश में परंपरा रही है। इन तथ्यों को देखते हुए केल्विन कार्टर का जिक्र अप्रासंगिक है। प्रवासी मजदूरों की परेशानियों और दुखों को कोर्ट में उठाने वालों की तुलना गिद्ध से करना दुर्भाग्यपूर्ण है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं) संजय पारिख, वरिष्ठ अधिवक्ता, सुप्रीम कोर्ट
Feb 09, 2021 Rate: 4.00
