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May 31, 2026
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               ओपिनियन / शौर्यपथ / इसमें कुछ भी नया नहीं है। बंगाल की खाड़ी से एक चक्रवाती तूफान उठा और जान-माल के भारी नुकसान के झटके देकर विदा हो गया। तूफान गुजर जाने के बाद जब हम इसका आकलन कर रहे हैं, तो वही कहा जा रहा है, जो हर बार कहा जाता है- ‘प्राकृतिक आपदा को तो हम नहीं रोक सकते, लेकिन उससे होने वाले जान-माल के नुकसान को कम कर ही सकते हैं।’ यह सिर्फ चक्रवाती तूफान का चिंतन नहीं है। हर बार जब कहीं बाढ़ आती है, अतिवृष्टि होती है या भूकंप आता है, तो देश के बौद्धिक समुदाय में ऐसे वाक्यों को दोहराए जाने की होड़-सी लग जाती है। यह परंपरा काफी समृद्ध हो चुकी है। यही कोसी की बाढ़ में हुआ था, यही केदारनाथ की त्रासदी में और पिछले साल मुन्नार की अतिवृष्टि में भी यही दिखाई दिया। आपदा जब सिर पर आ चुकी होती है, तब हमें पता चलता है कि उसके मुकाबले के लिए हमारी तैयारियां पूरी नहीं थीं। अम्फान तो दो दिन पहले पश्चिम बंगाल और ओडिशा के तटों से टकराया है, पर पूरा देश तो पिछले दो महीनों से ही इस समस्या से लगातार दो-चार हो रहा है।
यह कहा जा सकता है कि हर कुछ साल बाद आने वाले चक्रवाती तूफान की तुलना में कोरोना वायरस के संकट को खड़ा नहीं किया जा सकता। महामारी का ऐसा संकट भारत में लगभग एक सदी बाद आया है, पिछली करीब चार पीढ़ियों ने महामारी के ऐसे प्रकोप को सिर्फ किताबों में पढ़ा है, और महामारी से कैसे निपटा जाता है, इससे आजाद भारत का प्रशासन पूरी तरह अनजान है। लेकिन बात शायद इतनी आसान नहीं है।
देश में पिछले डेढ़ दशक से एक राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण है। इसी के साथ हमने आपदा से निपटने के लिए एक आपदा राहत बल भी बनाया था। प्राधिकरण की स्थापना के समय ही इससे उम्मीद बांधी गई थी कि यह सभी तरह की प्राकृतिक और मानवीय आपदाओं के लिए देश को तैयार रखेगा। इस संस्था के आलिम-फाजिल से यह उम्मीद तो की ही जानी चाहिए कि किसी आपदा के समय क्या-क्या समस्याएं खड़ी हो सकती हैं, इसका एक खाका और इसके सभी परिदृश्य वे पहले से ही सोचकर रखें। मार्च में लॉकडाउन घोषित होने के बाद पूरा देश उस समय सोते से जागा, जब एक दिन अचानक पता चला कि पूरे देश में लाखों विस्थापित मजदूर अपने-अपने घरों को लौटने के लिए निकल पड़े हैं। ऐसा क्यों हुआ या ऐसी स्थिति क्यों पैदा हुई, यह एक अलग मामला है, परआपदा प्रबंधन के लिए बने संगठन ने ऐसे किसी परिदृश्य के बारे में सोचा भी नहीं था, यह जरूर एक परेशान करने वाला मसला है। अगर सरकार के सामने ऐसे परिदृश्य रखे गए होते, तो शायद उसके फैसले और इंतजाम अलग तरह के हो सकते थे।
मामला सिर्फ विस्थापित मजदूरों का नहीं है। हम यह पहले से ही जानते थे कि दुनिया के मुकाबले हमारे पास चिकित्सा सुविधाएं काफी कम हैं। न सिर्फ अस्पताल और उपकरण, बल्कि डॉक्टर और चिकित्साकर्मी भी आबादी के हिसाब से नाकाफी हैं। पर आपदा आई, तो अचानक ही हमें पता चला कि जो डॉक्टर और चिकित्साकर्मी हैं भी, उनके लिए भी हमारे पास न तो मानक स्तर के पर्याप्त मास्क हैं और न ही पीपीई किट। यह ठीक है कि जल्द ही देश के उद्यमियों ने मोर्चा संभाला, तो यह कमी कुछ ही समय में दूर हो गई, लेकिन कुछ मामलों में तो सचमुच देर हो गई। इसे इस तरह से देखें कि हमारे यहां आबादी के लिहाज से डॉक्टरों का जो अनुपात है, कोरोना का शिकार बनने वाले लोगों में डॉक्टरों का वह अनुपात कहीं ज्यादा है। यही बात बाकी चिकित्साकर्मियों के बारे में भी कही जा सकती है। उम्मीद है कि आगे ऐसी समस्या शायद न आए, लेकिन अभी तक जो हुआ, उसके लिए हम खुद को कभी माफ नहीं कर पाएंगे। और, इसमें एक बड़ा दोष निश्चित रूप से देश के योजनाविदों का है।
हालांकि एक सच यह भी है कि हालात पूरी दुनिया में लगभग ऐसे ही हैं। खासकर अमेरिका में जो हुआ, वह उसके बारे में कई धारणाएं बदलने को मजबूर कर देता है। एक ऐसा देश, जो पिछले कई दशकों से जीवाणु-युद्ध के खतरों का खौफ पूरी दुनिया को बांटता रहा हो, उससे यह उम्मीद तो की जानी चाहिए कि वह जीवाणुओं के किसी भी हमले के लिए हमेशा तैयार होगा। लेकिन इस पूरे दौर में अमेरिकी प्रशासन ने सिर्फ यही दिखाया कि उसका स्तर भी बहुत कुछ हमारे राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण जैसा ही है।
लेकिन एक फर्क जरूर है। चक्रवाती तूफान अमेरिका में भी आते हैं, और शायद ज्यादा ही आते हैं, पर भारत के मुकाबले वह अपने लोगों को इसके कहर से काफी कुछ बचा लेता है। भयानक चक्रवाती तूफानों के बीच अक्सर लंबा अंतराल होता है, न हम अपने लोगों को हर दूसरे साल आने वाली बाढ़ से बचा पाते हैं और न सूखे से। आपदा ही क्यों, हर साल जब बरसात शुरू होती है और देश के छोटे-बड़े तमाम शहरों की सड़कें व गलियां जलमग्न होने लगती हैं, तब पता चलता है कि नालियों की सफाई का सालाना काम अभी तक किया ही नहीं गया। आने वाली समस्याओं को लेकर यही परंपरागत रवैया हमारे नीति-नियामक अक्सर आपदाओं के मामले में भी अपनाते हैं। जो प्रशासनिक तंत्र हर साल आने वाली समस्याओं के लिए पहले से तैयारी नहीं रख पाता, उससे यह उम्मीद कैसे की जाए कि वह कोरोना और अम्फान जैसी अचानक आ टपकने वाली आपदाओं के लिए देश को पहले से तैयार रखेगा? इन दिनों आपदा को अवसर में बदलने की बातें बहुत हो रही हैं, लेकिन आपदा से सबक लेना हम कब शुरू करेंगे?
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

 

 रायपुर / शौर्यपथ /  मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने प्रदेशवासियों को ईद पर्व की मुबारकबाद दी है। मुख्यमंत्री ने कहा है कि ईद का पर्व प्रेम, सौहाद्र्र और भाईचारे का प्रतीक है। यह पर्व हमें ऊंच-नीच, छोटे-बड़े का भेदभाव भुलाकर एक दूसरे को गले लगाने का संदेश देता है। ईद वास्तव में सामाजिक समरसता का त्यौहार है। मुख्यमंत्री ने खुशी के इस पर्व को भाईचारे के साथ मनाने की अपील की है। मुख्यमंत्री ने कहा है कि कोरोना संक्रमण के मद्देनजर लोगों से अपील की है कि वे घरों में ही ईद की नमाज अदा करें और देश-प्रदेश की तरक्की, खुशहाली तथा अमन-शांति की दुआ करें।

       शौर्यपथ /  डाटा चोरी की घटनाएं सामने आने के बाद हर कोई अपने पर्सनल मोबाइल डाटा के प्रति सतर्क हो गया है। अब कोई थर्ड पार्टी एप डाउनलोड करते समय हम दुविधा में रहते हैं कि एप डाउनलोड करें या नहीं। आइए कुछ जरूरी बातें जानें जिससे हमारी दुविधा खत्म हो।किसी भी थर्ड पार्टी एप को डाउनलोड करते समय अगर हम सामान्य बातों का ख्याल रखेंगे तो थर्ड पार्टी एप के खतरों से बच सकेंगे।

1. एप के नाम पर दें विशेष ध्यान
किसी भी एप्लीकेशन को डाउनलोड करते समय उस एप के नाम पर विशेष ध्यान दें। अधिकतर देखा जाता है कि फर्जी एप का नाम किसी लोकप्रिय एप के नाम की नकल करके रखा जाता है। इससे ऐसी एप के डाउनलोड किए जाने की संभावना बढ़ जाती है। एन के नाम की स्पेलिंग, एप के लोगो के रंग और डिजायन पर ध्यान दें, कई बार फर्जी एप और असली एप के डिजायन में बेहद मामूली अंतर होता है।

2. डेवलपर के नाम को पढ़ें
एक ही नाम की एक से अधिक एप गूगल स्टोर पर मिल जाएंगी। ऐसे में अगर आप एप को डाउनलोड करना चाहते हैं तो बड़ी दुविधा होती है कि कौन सी एप्लीकेशन असली है। इसके लिए एप के डि्क्रिरशन में जाकर डेवलपर के नाम को ध्यान से पढ़ें। कई फर्जी एप बनाने वाले डेवलपर तो असली एप के डेवलपर के नाम की भी नकल कर लेते हैं। इसलिए ध्यान दें कि कहीं डेवलपर के नाम के आगे कोई विशेष संकेत या अक्षर न लिखा हो। साथ ही अक्षरों के बीच में गैप न दिया गया हो। अगर ऐसा है तो संभावना है कि नकली एप बनाने वाले डेवलपर ने यूजर्स को धोखा देने के लिए यह किया हो।


3. रिव्यू और रेटिंग पर दें ध्यान
प्ले स्टोर पर मौजूद सभी एप्लीकेशन पर पब्लिक फीडबैक सिस्टम होता है, यानी आम यूजर उस एप पर अपनी प्रतिक्रिया दे सकते हैं। आप जब भी कोई नई एप डाउनलोड करना चाहते हैं तो पहले रिव्यू को ध्यान से पढ़ें। अगर रिव्यू सकारात्मक हों तब ही एप को डाउनलोड करें।

4. एंटीवायरस का करें प्रयोग
अपने फोन को किसी भी फर्जी एप के खतरे से दूर रखने के लिए किसी विश्वसनीय एंटीवायरस का प्रयोग करें। एंटीवायरस होने पर फोन उस एप को डाउनलोड करने पर आपको चेतावनी देगा।

5. थर्ड पार्टी एप स्टोर से रहें दूर
जब भी आपको कोई एप डाउनलोड करनी हो तो किसी भी थर्ड पार्टी एप स्टोर से उसे डाउनलोड करने से बचें। अगर आप एंड्रायड यूजर हैं तो गूगल प्ले स्टोर से ही एप डाउनलोड करें, क्योंकि वहां सभी एप की स्क्रूटिनिंग की जाती है

    शौर्यपथ  /गर्मियों में बार-बार होंठ सूखते रहते हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह होती है कम पानी पीना और जब होंठ अपनी प्राकृतिक नमी खो देते हैं, तो भी यह परेशानी होती है। ऐसे में होंठों पर लिप बॉम लगाने से इस समस्या से काफी हद तक छुटकारा पाया जा सकता है। मार्केट के लिप बॉम में कई तरह के केमिकल्स होते हैं, जिससे आपके होंठ धीरे-धीरे काले पड़ते जाते हैं। ऐसे में होंठो का नेचुरल कलर बनाए रखने के लिए आप घर पर भी लिप बाम बना सकते हैं। आज हम आपको बता रहे हैं लिप बाम बनाने के दो आसान उपाय-

बिना कलर वाला लिप बाम बनाने का तरीका
कोकोनट आयल - न्यूटेला ( किसी भी कन्फेक्शनरी की दूकान पर उपलब्ध होगा ) - एक कंटेनर या डिब्बी एक हीटप्रूफ़ कप लें और उसमें 1 चम्मच मोम डालें। अब आधा चम्मच न्यूटेला डालें। ये डालने के बाद उसमें नारियल का तेल डालें। इसके बाद एक फ्राइंग पैन में पानी उबालें और हीटप्रूफ़ कप इस तरह उसमें रखें कि बनाया हुआ मिक्सचर न गिरे। जब मिक्सचर अच्छे से पिघल जाए तो उसको एक डिब्बी में डालकर फ्रीजर में 10 मिनट तक रख दें। आपकी लिप बाम तैयार है।


कलर्ड लिप बाम बनाने का तरीका
आईशेडो - शहद - वेसिलीन - 1 कंटेनर / डिब्बी एक चम्मच वेसिलीन को एक कांच के गिलास में डाल दें और फिर ओवन में दो मिनट तक पिघलाएं। इसके बाद अपने पसंदीदा रंग की आईशेडो के टुकडे करके उसमें दाल दें। इसके बाद मिक्सचर को अच्छे से हिलाएं। ये करने के बाद थोड़ा सा हनी डाल दें। फाइनल मिक्सचर को जिस कंटेनर में आपको रखना है उसमें डाल दें और फ्रिज में ठंडा होने के लिए रख दें। आपकी कलर्ड लिप बाम तैयार।

           सेहत / शौर्यपथ / बिना किसी उपकरण के सिर्फ शरीर के भार के साथ किए जाने वाले व्यायाम बॉडीवेट एक्सरसाइज कहलाते हैं। ये व्यायाम करने से पूरे शरीर की कसरत होती है इसलिए इन्हें बतौर वॉर्मअप सबसे पहले किया जाता है। ये व्यायाम हर स्तर के लोग कर सकते हैं, चाहे वे लंबे समय बाद व्यायाम करना शुरू कर रहे हों या फिर हर दिन व्यायाम करते हों। आज हम आपको ऐसे ही तीन बॉडीवेट एक्सरसाइज के बारे में बता रहे हैं जिन्हें आपको दो सेट में दस से 15 बार करना होगा।

ब्रिज-
इसमें शरीर के कोर एरिया और पीठ के हिस्से के बीच ऐसी समन्वय करना होता है कि पूरा शरीर एक पुल की आकृति बनाता दिखे। यह वार्मअप के लिए बेहतरीन व्यायाम है। इसे करने के लिए आप पीठ के बल जमीन पर लेट जाएं, घुटने मुड़े रहेंगे और पंजा जमीन पर सीधा रहेगा। दोनों हाथों को जमीन पर सीधा रखें। अब शरीर के कोर एरिया को पैरों की ओर ढकेलने का प्रयास करें। अपने पिछले हिस्से को जमीन से ऊपर तब तक उठाएं, जब तक नितंब पूरी तरह उठ नहीं जाता। अब स्टार्ट पोजिशन में लौटें और व्यायाम को दोहराएं।
लाभ : यह नितंब और नितंब से जांघ के बीच की मांसपेशियों की जकड़न दूर करती है। साथ ही उदर व पीठ पर मांसपेशियों पर भी सकारात्मक असर होता है।

चेयर स्क्वॉट-
कुर्सी के सामने खड़े हो जाएं, दोनों पैर और बांहें खुली रहेंगी और पंजे आशिंक रूप से बाहर की ओर केंद्रित होंगे। शरीर का भार नितंब पर ले जाएं और घुटने को झुका लें। अब निचले हिस्से को इतना नीचे ले जाएं कि वह कुर्सी की सतह को छू जाए। आपके दोनों हाथ सामने की ओर खुले रहेंगे, अब पैर के बल पुशअप करें और रिटर्न पोजिशन में लौटें।

लाभ : यह व्यायाम करने से पैर और शरीर के मुख्यभाग को मजबूती मिलती है जिससे रोजमर्रा की शारीरिक गतिविधियां करने में हम थकावट महसूस नहीं करते।

नी पुशअप-
स्टैंडर्ड पुशअप सीखना चाहते हैं तो नी-पुशअप से शुरूआत करें। इसे करने के लिए घुटने और दोनों हाथों के बल जमीन पर प्लांक की अवस्था में आ जाएं। इसमें शरीर का पूरा हिस्सा हवा में रहेगा और सिर से घुटने तक शरीर एक रेखा में रहना चाहिए। अब अपनी कोहनी मोड़कर खुद को जमीन तक झुकाएं। कोहनी को जमीन से 45 अंश के कोण पर रखें। अब कोहनी को ऊपर ले जाते हुए शरीर को ऊपर ले जाएं। फिर स्टार्ट पोजिशन में लौटें और दोहराएं।

लाभ : यह शरीर की मेटाबोलिक दर बढ़ाता है और हड्डी क्षरण को कम करता है। साथ ही शरीर के कोर एरिया की मांसपेशियां मजबूत होती हैं।

 

                  खाना खजाना / शौर्यपथ / कच्चे आम का नाम लेते ही मुंह में पानी आने लगता है। अक्सर लोगों को लगता है कि कच्चे आम से सिर्फ चटनी और अचार ही बनाए जाते हैं। लेकिन आपको बता दें, इससे अचार और चटनी ही नहीं यह दाल फ्राई को Tangy बनाने का काम भी करता हैं। आप सोच रहे होंगे आखिर कैसे तो चलिए जानते हैं पूजा रॉय से।

कच्चा आम दाल फ्राई-
सामग्री
-अरहर दाल- 1 कप
-कद्दूकस किया कच्चा आम- 2 चम्मच
-हल्दी पाउडर- 1/2 चम्मच
-लाल मिर्च पाउडर- 1/2 चम्मच
-कटा टमाटर- 1
-कटी हुई मिर्च- 2
-करी पत्ता- 10
-कटा प्याज- 1
-लाल मिर्च- 2
-लहसुन की कली- 4
-नमक- स्वादानुसार
-घी- 1 चम्मच

विधि-
प्रेशर कुकर में दाल, नमक, लाल मिर्च पाउडर, हल्दी पाउडर, कटी हुई हरी मिर्च, टमाटर और कद्दूकस किया हुआ आम डालें। दो कप पानी डालकर कुकर बंद करें और तीन से चार सीटी आने तक पकाएं। गैस ऑफ करें और कुकर की सीटी अपने-आप निकलने दें।

कुकर खोलें और दाल को अच्छी तरह से मैश कर दें। एक छोटी कड़ाही में घी गर्म करें और उसमें लाल मिर्च को तोड़कर डालें। अब कड़ाही में प्याज डालें और उसे सुनहरा होने तक भूनें। लहसुन की कलियों को चम्मच या किसी और चीज से हल्का-सा मैश कर दें और उसे कड़ाही में डालें।

एक मिनट बाद तैयार दाल को कड़ाही में डालकर मिलाएं और पांच से सात मिनट तक मध्यम आंच पर पकाएं। अगर दाल गाढ़ी हो गई है तो उसमें थोड़ा पानी डालकर गाढ़ापन एडजस्ट करें। नमक चख लें और किसी सूखी सब्जी और रोटी के साथ इस दाल को सर्व करें।

 

          लाइफस्टाइल/  शौर्यपथ / रमजान के पवित्र महीने के बाद ईद-उल-फितर का त्योहार मनाया जाता है। रमजान के पूरे महीने मुस्लिम समुदाय के लोग रोजा रखते हैं। सुबह सेहरी के साथ रोजा शुरू होता है और शाम को इफ्तार के बाद रोजा खत्म किया जाता है। रमजान का महीना तीस दिन का होता है और चांद के दिखने पर निर्भर होता है। जिस दिन चांद दिखता है उसके अगले दिन ईद का त्योहार मनाया जाता है। ईद उल फितर की सही तारीख चांद के दिखने पर ही तय की जाती है।

इसका समय अलग-अलग देशों में अलग-अलग हो सकता है। इस्लामिक कैलेंडर की मानें तो यह चांद पर निर्भर है जो 29 या 30 दिन का होता है। चांद के दिखने से नए महीने की शुरुआत होती है। आपको बता दें कि सऊदी अरब, यूएई और कई खाड़ी देशों में 22 मई को ईद का चांद दिखाई नहीं दिया इसलिए 23 मई को ईद नहीं मनाई गई। वहां इस बार 30 दिन के रोजे के बाद ईद मनाई जाएगी। इसलिए वहां अब रविवार को ईद मनाई जाएगी। भारत में ईद-उल-फितर का त्योहार 24 या 25 मई को मनाया जा सकता है। इसी तरह भारत में भी ईद के चांद का दीदार करने के लिए लोग बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं।भारत में भी आज ईद का चांद देखा जाएगा। अगर शनिवार को ईद का चांद दिखता है तो रविवार को ईद मनाई जाएगी। अगर शनिवार को चांद नहीं दिखा तो सोमवार को ईद मनाई जाएगी।

बिहार के फुलवारीशरीफ में इमारत-ए-शरिया व खानकाह मुबिजिया ने शनिवार को ईद की चांद देखने का एहतेमाम करने का ऐलान किया है। वहीं इमारत-ए-शरिया के काजी शरियत मोहम्मद जसीमुद्दीन व खानकाह-ए-मुजिबिया फुलवारीशरीफ के प्रबंधक मौलाना मिनहाजुद्दीन कादरी ने प्रेस रिलीज जारी कर ईद-उल-फितर की चांद देखने का शनिवार को ऐलान किया है। इस दौरान कहा गया है कि शनिवार को ईद का चांद दिखता है तो रविवार को ईद मनाई जाएगी। अगर शनिवार को चांद नहीं दिखा तो सोमवार को ईद मनाई जाएगी।

 

 

         लाइफस्टाइल / शौर्यपथ / मूंगा मंगल ग्रह का रत्न है, जिन जातकों की कुंडली में मंगल ग्रह क्रूर हो उसका मूंगा धारण करना अधिक लाभकारी है। 
मंगल का अर्थ तो कल्याणकारी होता है इसमें इक प्रत्य के इस्तेमाल से बने शब्द मांगलिक का अर्थ भी शुभ ही होता है लेकिन जब यह शब्द मंगल ग्रह के संदर्भ में जुड़ जाते हैं तो इनका एक अर्थ नकारात्मक भी हो जाता है। ऐसे ही ज्योतिष शास्त्र में मंगल दोष को शांत करने के लिये भी कई सुझाव दिये जाते हैं जिनमें से एक है पीड़ित जातक का मूंगा रत्न पहनना। मंगल की पीड़ा को शांत करने के लिए जातकों को मूंगा धारण करना चाहिये।

मूंगा यथासंभव सोने की अंगूठी में जड़वाया जाना चाहिए। यदि धारक के लिए सोना खरीदना संभव न हो तो चांदी में थोड़ा सोन मिलाकर या तांबे की अंगूठी में मूंगा जड़वाया जा सकता है। मूंगा पहनने वाले को पेट दर्द व सूखा रोग नहीं होता है। हृदय के रोग के लिए भी मूंगा लाभकारी होता है।

इस मंत्र का करें उच्चारण
मूंगा किसी भी शुक्ल पक्ष के मंगलवार को सूर्योदय के एक घंटे बाद दाएं हाथ की अनामिका उंगली में में धारण करना चाहिए। मूंगा धारण करते समय अंगूठी का पूजन करने के बाद ऊं अं अंगारकाय नम: मंत्र का दस हजार बार उच्चारण करें।

इन स्थितियों में पहनना चाहिए मूंगा

- कुंडली में अगर मंगल राहु या शनि के साथ कहीं भी स्थित हो तो मूंगा पहनना अत्यांत लाभदायक सिद्ध होता है।

-यदि मंगल प्रथम भाव में स्थित हो तो मूंगा धारण करना लाभकारी होता है।

-कंडली में मंगल अगर तीसरे स्थान पर हो तो भाई-बहनों में मदभेद होता , इसे दूर करने के लिए मूंगा पहनना चाहिए।

-कुंडली में यदि मंगल चतुर्थ भाव में हो तो जीवन-साथी के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल असर पड़ता है। अत: ऐसे जातक मूंगा अवश्य धारण करें।

-कुंडली में मंगल सप्तम या द्वादश भागव में शुभ नहीं होता, इससे जीवन साथी को कष्ट होता है। इसलिए ऐसे व्यक्ति को भी मूंगा पहनना चाहिए।

  

           जीना इस्सी का नाम है / शौर्यपथ / वह काफी सेहतमंद पैदा हुई थीं, और इस बात को लेकर घर में सब काफी खुश थे। खुश होने की बात ही थी। मीठी मुस्कान लिए नन्ही बच्ची घर में इधर-उधर ठुमकती, तो कोई भी उसे गोद में उठाकर दुलारने का लोभ नहीं छोड़ पाता था। मगर अम्मा-अप्पा को तब क्या पता था कि उनकी लाडली का वजन उसके बचपन को तकलीफदेह ख्यालों से भर देगा।
दीपा जब स्कूल पहुंचीं, तो वहां उन्हें एक बिल्कुल अलग दुनिया मिली। इस नए संसार में खूब सारे बच्चे थे, कई मैडम और खेलने की काफी सारी जगहें थीं। तमाम बच्चों की तरह दीपा को भी हमउम्र दोस्तों के बीच खेलना-कूदना खूब रास आता। मगर एक दिन कुछ ऐसा घटा, जिससे उनके कोमल मन को कुछ अच्छा नहीं लगा और वह सुबक पड़ीं। किसी ने उन्हें ‘बेबी एलिफैंट’ कहा था। फिर तो यह जैसे उन्हें चिढ़ाने का मुहावरा-सा बन गया।
दीपा के भीतर एक ग्रंथि बनने लगी थी। सहपाठियों के अलावा भी कई लोग थे, जो मौका पाकर उनके मोटापे पर अपना निशाना साध बैठते और इन सबका असर दीपा की पढ़ाई पर पड़ने लगा था। वह अब ज्यादातर खामोश रहने लगी थीं। अक्सर दोस्तों से कतराकर जल्द घर पहुंचने के रास्ते तलाशती रहतीं। वह क्लास में फेल हो गईं। दीपा के लिए स्कूल का माहौल अब और तकलीफदेह हो उठा था। लेकिन एक टीचर ने उनकी मनोदशा को पढ़ लिया।
तब दीपा कक्षा आठ में थीं। टीचर जानती थीं कि यदि इस बच्ची को निराशा के गड्ढे से अभी न निकाला गया, तो यह गहरी खाई में गिर सकती है। उन्होंने दीपा का हौसला बढ़ाना शुरू किया। यह एक टीचर का फर्ज था, मगर दीपा की जिंदगी में किसी फरिश्ते की आमद थी। टीचर ने उन्हें उनके गुणों का एहसास कराना शुरू किया और हताशा की ओर मुडे़ कदम जिंदगी की जानिब लौट लाए। बल्कि कुछ यूं लौटे कि दीपा पुरानी दीपा न रहीं। और स्कूली जिंदगी में ही एक मोड़ वह भी आया, जब दोस्तों से कन्नी काटकर घर भागने वाली इस लड़की ने उनकी नुमाइंदगी करने का दावा पेश कर दिया। दीपा ने स्कूली चुनाव लड़ा और उसमें जीत भी हासिल की। उसके बाद तो जैसे उनका कायांतरण ही हो गया। खुद उनके शब्द हैं, ‘उस जीत ने मुझे जिम्मेदार बना दिया, और मैं आत्मविश्वास से भरी एक लड़की के रूप में खिलने के लिए अपने खोल से बाहर आ गई।’
चेन्नई के ‘प्रिंस मैट्रिकुलेशन हायर सेकेंडरी स्कूल’से निकलकर दीपा शहर के ही ‘एथिराज कॉलेज फॉर वीमेन’ पहुंच गईं, जहां से उन्होंने ग्रेजुएशन की डिग्री हासिल की। और इसके बाद एमबीए। आरपीजी रिटेल ग्रुप में प्रशिक्षण के दौरान दीपा और अरविंद ने विवाह करने का फैसला किया था। लेकिन न तो दीपा का परिवार इस शादी के पक्ष में था, और न ही अरविंद का। इसके बावजूद दोनों विवाह-बंधन में बंध गए। शादी के नौवें महीने ही दीपा एक बेटे की मां बन गईं और उन्हें नौकरी छोड़नी पड़ी। अब सारा आर्थिक बोझ अरविंद के कंधे पर आ गया। दीपा को काफी बुरा लगता था कि वह पति की कोई मदद नहीं कर पा रही हैं। उसी समय उनके पुराने बॉस का फोन आया कि दीपा उनके बेटे की बर्थडे पार्टी का आयोजन देख लें।
यह 2002 के आसपास की बात है। दीपा ने ‘गो ग्रीन’नाम से थीम पार्टी का आयोजन किया, और रिटर्न गिफ्ट में सबको पौधे दिए गए। इस पार्टी में शरीक होने वाले लोगों को आइडिया काफी पसंद आया, और फिर दीपा का बिजनेस चल पड़ा। उसके बाद वह बच्चों के लिए समर कैंप का आयोजन करने लगीं। ‘लीडरशिप फॉर किड्स’कार्यक्रम के जरिए वह बच्चों को अपना जीवन बदलने के लिए प्रेरित करती थीं। उनका यह काम भी अच्छा चल निकला।
लेकिन जिंदगी इंसान का इम्तिहान लेना कब छोड़ती है? कारोबार में साझेदार की नीयत बदल गई और दीपा का सब कुछ लुट गया। कर्ज चुकाने के लिए उन्हें अपना घर, कार, सब कुछ बेचना पड़ा। यहां तक कि बेटे को उसके स्कूल से निकालना पड़ा, क्योंकि वह उसकी फीस नहीं चुका सकती थीं। लगभग उसी वक्त वह एक बेटी की भी मां बन गई थीं।
किसी तरह जीना था। मगर कैसे? दीपा ने बसंत नगर समुद्र तट पर बच्चों को बैलून बेचना शुरू किया। ‘बीच’ पर आने वाले बच्चों से पैसे लेकर वह उन्हें कहानियां सुनातीं और फिर बैलून बेचतीं। बच्चे उनकी कहानियों के मुरीद होकर खूब आने लगे। इस आइडिया पर स्थानीय मीडिया की नजर पड़ी, उन्होंने दीपा को खूब छापा। अखबार में पढ़कर मदुरई के एक स्कूल ने उन्हें अपने यहां दास्तानगोई के लिए बुलाया। उसी समय दीपा ने ‘स्कूल ऑफ सक्सेस’ की नींव रखी। आज उनका समूह 2,500 से ज्यादा स्कूलों में छात्रों, शिक्षकों और अभिभावकों के लिए कहानी सुनाने से लेकर प्रशिक्षण देने तक का कार्यक्रम आयोजित करता है। दीपा स्कूलों से कोई निश्चित फीस नहीं लेतीं, बल्कि उन्हें ही यह अख्तियार सौंप देती हैं। अब तक तीन लाख से अधिक बच्चे-बच्चियां स्कूल ऑफ सक्सेस से लाभ उठा चुके हैं।
प्रस्तुति : चंद्रकांत सिंह

 

          मेरी कहानी / शौर्यपथ / विदेश जाने की खुशी ऐसी थी कि पंख लग गए थे। मन सुने-सुनाए लंदन में पहुंचकर टहलने लगा था और तन को वहां पहुंचाने के लिए जल-जहाज का टिकट भी खरीद लिया गया था। बडे़ भाई साहब लंदन में ही रहते थे, तो उन्होंने छोटे को बुला भेजा कि आ जाओ, यहीं से इंजीनिर्यंरग पढ़ लो, जिंदगी संवर जाएगी। पिता भी फूले नहीं समा रहे थे। बड़ा बेटा पहले ही विलायत जा जमा था और अब दूसरा भी उसी नक्शेकदम पर चले, तो इससे अच्छा और क्या हो सकता है? पिता ने अंग्रेज शिक्षकों के स्कूल में बेटे को पढ़ाया भी यही सोचकर कि बेटा पठानों के इलाकाई खून-खराबे से अलग रहकर दुनिया के लायक बनेगा। एक तरह से पिता का सोचा हुआ ही साकार हो रहा था।
बेटे को इस बात की भी खुशी थी कि एक ठंडे देश में जाकर रहना-पढ़ना होगा। उन दिनों गरमी की छुट्टियां चल रही थीं। उस अलीगढ़ में कॉलेज बंद हो गया था, जहां बहुत गरमी थी। पेशावरी इलाके से अलग माहौल उसे बेचैन कर देता था। यह खुशी थी कि अब मंजिल अलीगढ़ नहीं, इंग्लैंड है। स्कूल में पढ़ाने वाले अंग्रेज शिक्षक रेवेरेंड विगरैम के भी आनंद का ठिकाना न था। आर्थिक रूप से सक्षम पिता बहराम खान कितनी खुशी से बेटे को लंदन भेज रहे थे, इसका पता इसी से चलता है कि जिस जमाने में दस ग्राम सोना 20 रुपये का भी नहीं था, तब पिता ने बेटे को 3,000 रुपये थमा दिए थे। अब न धन की कमी थी और न लंदन पहुंचकर ठौर-कौर की चिंता। देखते-देखते वह दिन भी आ गया, जब लंदन के लिए निकलना था। पूरा बिस्तर-सामान बंध चुका था। चंद मिनटों में घर से रवानगी थी। छह फुट से भी लंबा हो चला नौजवान बेटा लंबे-लंबे डग भरता मां के पास पहुंचा कि चलते-चलते आशीर्वाद ले लिया जाए।
झुककर अभिवादन करते हुए बेटे ने कहा, ‘मां, अब मैं चलूं’।
मां कुछ नहीं बोली। बेटे ने हाथ बढ़ाया और मां ने बेटे के हाथ को अपनी हथेलियों से घेर लिया। बेटा मां के पास बैठ गया। मां की हथेलियां बेटे की हथेलियों पर कसती गईं। बेटे की हथेलियां इतनी निर्मोही नहीं थीं कि मां की हथेलियों से खुद को छुड़ा लें। वैसे भी ऐसा नाजुक वक्त जब गुजरता है, तब थामने वाली हथेलियां सीधे दिल थामने लगती हैं। मां ने पूरे दिल से थाम लिया था। बेटे के दिल में भी नमी उमड़ने लगी थी, लेकिन वह बही पहले मां की आंखों से। मां के कांपते होंठों से गुहार फूटी, ‘नहीं, तुम नहीं।...मेरी आखिरी औलाद’।
फिर तो आंसू रोके न रुके। वह मां अड़ गई, जो बडे़ बेटे को पहले ही विलायत के हाथों गंवा चुकी थी। वह वहीं निकाह कर घर-बार बसा चुका था। परदेश को लोग इतना अपना क्यों मान लेते हैं कि अपना सगा घर-गांव पराया हो जाता है? बड़ा गया, अब छोटा भी चला जाएगा, तो फिर पीछे साथ कौन रह जाएगा? क्या यही इल्म है, जिसे हासिल करने जाने वाले लौटते नहीं हैं? कोई मां क्या इसलिए अपनी औलाद को अपने साये में पोसती है कि वह बच्चा जब सायादार हो जाए, तो किसी परदेश को फल-छांव दे और देश में बूढ़े मां-बाप सिर पर साये को मोहताज हो जाएं? एक पल को बेटे ने सोचा, क्या वह मां के बिना रह सकता है, और वह भी ऐसी मां, जो हथेलियां थामे जार-जार रो रही है? और ऐसी मां को यूं गंवाकर कौन-सी कमाई करने वह परदेश जा रहा है? यह वही मां है, जिसने खूंखार पठानी लड़ाइयों-झंझावातों से बचाकर सीने से लगाए पाला है।
फिर क्या था, फैसला हो गया। जो मन लंदन जा चुका था, वह मां की गोद में सिमट आया। तय हो गया, कहीं नहीं जाना, यहीं मां की निगहबानी में रहना है। मां की ही सेवा करनी है। अपनी मां, अपनी जमीन, अपना मुल्क, इनका भला क्या विकल्प है? मां ने रोक लिया। 3,000 रुपये पिता को वापस हो गए। भाई को खत चला गया कि अपना देश प्यारा है। फिर अलीगढ़ भी लौटना न हुआ। पढ़ाई छूट गई। वहीं अपने खेतों में पसीना लहलहाने लगा। तब तक जो इल्म हासिल हो चुका था, वह भी कम न था। महज 20 की उम्र में मां के उस दुलारे ने स्कूल खोलकर जननी जन्मभूमि की सेवा शुरू कर दी। पठानों के तमाम इलाकों में एक सेकुलर, सेवाभावी, एकजुट भारत के निर्माण के लिए उन्होंने स्वयंसेवकों का एक संगठन बनाया- खुदाई खिदमतगार। मातृभूमि की इतनी सेवा हुई कि अंग्रेजों को चुभने लगी। गिरफ्तारी के वारंट जारी होने लगे। अंग्रेज खोजने लगे कि कहां हैं वह अब्दुल गफ्फार खान, उर्फ बादशाह खान, उर्फ बच्चा खान? वही, जिन्हें दुनिया आज ‘सरहदी गांधी’ के नाम से जानती है। महात्मा गांधी के परमप्रिय, सत्य-अहिंसा के झंडाबरदार। विभाजन के दुर्भाग्य से पाकिस्तान के हिस्से में चले गए ऐसे पहले स्वजन-विदेशी, जो भारत रत्न हैं।
प्रस्तुति : ज्ञानेश उपाध्याय

 

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