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धर्म संसार / शौर्यपथ /पुराणों अनुसार कश्यप ऋषि की पत्नी कद्रू से उन्हें कई नागों की उत्पत्ति हुई है। जैसे अनंत, वासुकी, तक्षक, कर्कोटक, पिंगला, पद्म, महापद्म, शंख, कुलिक, चूड़, धनंजय आदि। अग्निपुराण में 80 प्रकार के नाग कुलों का वर्णन है। कहते हैं कि कालिया नाग भी कद्रू का पुत्र और वह पन्नग जाति का नागराज था।
कालिया नाग पहले रमण नामक द्वीप में निवास करता था। कहते हैं कि पक्षीराज गरुड़ से जब उसकी शत्रुता बढ़ गई तो वह अपनी पत्नियों सहित यमुना नदी के कुण्ड में आकर रहने लगा था। कालिया जानता था कि यही स्थान सुरक्षित है और यहां गरुड़ भगवान नहीं आ सकते हैं, क्योंकि यहीं पर गरुड़ ने तपस्वी सौभरि के मना करने पर भी कुंड से मछलियों को बलपूर्वक पकड़कर खा लिया था। इससे क्रोधित होकर महर्षि सौभरि ने गरुड़ को शाप दे दिया था कि अब यदि तुमने यहां आकर फिर कभी मछलियों को खाया तो उसी क्षण मृत्यु को प्राप्त हो जाओगे। यही कारण था कि कालिया नाग यहीं छुपकर रहता था।
उसके विष के कारण यमुना का जल एक स्थान से जहरिला हो चला था जिसके चलते गोकुलवासी उस पानी का उपयोग नहीं कर सकते थे। कालिया देह या कुंड के स्थान पर जो भी जाता था कालिया नाग उसे खा जाता था। इसीलिए उसे कालिया दाह कहने लगे थे।
कहा जाता है कि एक बार श्रीकृष्ण की गेंद उस यमुना कुंड में गिर गई थी। गेंद लेने के लिए श्रीकृष्ण यमुना के उस स्थान पर कूद जाते हैं और जल के अंदर जाकर वे कालिया नाग से युद्ध कर उसको सपर्मण करने के लिए मजबूर कर देते हैं। तब कालिया नाग दया की भीख मांगता है तो भगवान कहते हैं कि तुम वहीं जाओ जहां तुम पहले रहते थे। कालिया नाग कहता है प्रभु वहां तो आपका सेवक गरुड़ मेरी जान का दुश्मन है। तब श्रीकृष्ण कहते हैं कि तुम्हारे शीश पर मेरे चरणों के निशान देखकर गरुड़ तुम्हारा कुछ नहीं बिगाड़ेंगे। तब कालियान नाग अपनी पत्नियों सहित पुन: रमण द्वीप पर चला जाता है।
भारत में निम्न नागवंशी रहे हैं- नल, कवर्धा, फणि-नाग, भोगिन, सदाचंद्र, धनधर्मा, भूतनंदि, शिशुनंदि या यशनंदि तनक, तुश्त, ऐरावत, धृतराष्ट्र, अहि, मणिभद्र, अलापत्र, कम्बल, अंशतर, धनंजय, कालिया, सौंफू, दौद्धिया, काली, तखतू, धूमल, फाहल, काना, गुलिका, सरकोटा इत्यादी नाम के नाग वंश हैं।
शौर्यपथ / टीवी एक्ट्रेस प्रेक्षा मेहता ने इंदौर स्थित अपने घर में फांसी लगा कर आत्महत्या कर ली। वे महज 25 वर्ष की थीं।
दो साल पहले वे इंदौर से मुंबई गई थीं। उन्होंने क्राइम पेट्रोल के कुछ एपिसोड में काम भी किया था।
प्रेक्षा 'मेरी दुर्गा' और 'नाल इश्क' जैसे टीवी धारावाहिकों में भी नजर आईं। लॉकडाउन के कारण वे मुंबई से इंदौर अपने घर लौट आईं।
प्रेक्षा के पिता के मुताबिक वे तनाव में थीं और परेशान चल रही थीं। कल रात उन्होंने फांसी लगाकर अपनी जान ले ली। सुबह पिता जब प्रेक्षा को उठाने के लिए गए तो उन्होंने उसे फंदे पर लटका पाया।
वे तुरंत अस्पताल ले गए, लेकिन तब तक प्रेक्षा की मृत्यु हो चुकी थी। फिलहाल सुसाइड नोट नहीं मिला है और पुलिस मामले की जांच कर रही है।
प्रेक्षा उभरती हुई कलाकार थीं। उन्होंने कई नाटकों में अभिनय किया और पुरस्कार भी हासिल किए। उनका वीडियो अलबम भी जारी हुआ। अक्षय कुमार की फिल्म 'पैडमैन' में भी उन्हें अभिनय करने का अवसर मिला। कुछ शॉर्ट्स फिल्में भी की।
नजरिया / शौर्यपथ / कोरोना वैश्विक महामारी ने जिन मुद्दों और समस्याओं की तरफ सरकारों और लोगों का सर्वाधिक ध्यान आकर्षित किया है, उनमें से प्रवासी कामगारों की समस्या सबसे गंभीर है। नेशनल सैंपल सर्वे एवं भारतीय मानव विकास सर्वेक्षण के अनुसार, प्रवासी मजदूरों की अधिकांश जनसंख्या पिछड़े क्षेत्रों, राज्यों, आर्थिक एवं सामाजिक रूप से पिछड़े वर्गों, विशेष तौर पर एसटी, एससी एवं ओबीसी से संबंधित है। उदाहरण के लिए, जनगणना 2011 के आंकड़ों के अनुसार अंतर-राज्यीय प्रवास की 50 प्रतिशत जनसंख्या उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों से संबंधित है। इसमें उत्तर प्रदेश एवं बिहार का हिस्सा 37 प्रतिशत है। प्रवास निम्न आय वाले परिवारों की आजीविका का मुख्य स्रोत बन गया है, इसीलिए प्रतिवर्ष 4.5 प्रतिशत की दर से अंतर-राज्यीय प्रवास में वृद्धि हो रही है।
कोरोना वायरस संकट ने हमारा ध्यान उन समस्याओं की ओर आकर्षित किया है, जिनका सामना इन प्रवासी श्रमिकों को आए दिन करना पड़ता है। क्या अपने ही देश में संविधान प्रदत्त अधिकारों के बावजूद कामगारों को प्रवासी कहना, उनके साथ परायों जैसा व्यवहार करना उचित है? प्रवासी शब्द मात्र ही उन्हें बेघर, मेजबान राज्य पर निर्भर और आत्म स्वाभिमान से वंचित करता है। अब्राहम लिंकन ने कहा था, ‘श्रम पूंजी से पहले और स्वतंत्र है। पूंजी केवल श्रम का फल है और पूंजी कभी भी अस्तित्व में नहीं आ सकती थी, यदि श्रम का अस्तित्व नहीं होता। अत: श्रम पूंजी से श्रेष्ठ है और यह अधिक महत्व का हकदार है।’ श्रम भारत का एक आकर्षण है, लेकिन तब भी श्रमिक को उचित स्थान और अधिकार प्राप्त नहीं हैं। जहां एक ओर, कामगारों की समस्या को मानवीय दृष्टिकोण से देखने की जरूरत है। काम और श्रम को उचित महत्व व सम्मान देने की जरूरत है। वहीं दूसरी ओर, मजदूरों की समस्याओं के दूरगामी समाधान के लिए सरकारी प्रयासों को और व्यवस्थित करने की जरूरत है। इस प्रयास में कुछ बिंदुओं पर ध्यान दिया जा सकता है। पहला, आवास और शहरी गरीबी उपशमन मंत्रालय द्वारा 2015 में पार्थ मुखोपाध्याय की अध्यक्षता में 18 सदस्यीय कार्यकारी समूह बनाया गया था, जिसने प्रवासी कामगारों की समस्या पर जो सिफारिशें की थीं, उन्हें लागू करने की जरूरत है। दूसरा, असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के लिए एक व्यापक नीति बननी चाहिए, ताकि उन्हें काम करने की उचित परिस्थितियां, समय पर मजदूरी, उचित वेतन, अवकाश एवं कार्यस्थल पर सुरक्षा मिले। तीसरा, सभी प्रवासी मजदूरों की कार्यस्थल पर ही खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए ‘वन नेशन-वन राशन कार्ड स्कीम’ को प्रभावी बनाया जाए, ताकि कोई मजदूर किसी भी राज्य में सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) का लाभ उठा सके।
चौथा, राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा एवं जन वितरण प्रणाली के अंतर्गत मोटा अनाज, दाल, तेल जैसी जरूरी सामग्रियों को शामिल किया जा सकता है। इससे श्रमिकों को पोषण भी सही मिलेगा। पांचवां, श्रमिकों के बच्चों की शिक्षा के लिए कार्यस्थल पर ही श्रमिक स्कूल खोले जा सकते हैं, जो दूसरे कार्यस्थलों पर चल रहे ऐसे ही श्रमिक स्कूलों से जुडे़ हों, ताकि जब मजदूर एक जगह से दूसरी जगह जाएं, तो उनके बच्चों की शिक्षा बाधित या प्रभावित न हो। छठा, मनरेगा के अंतर्गत कार्य दिवसों की संख्या 100 से बढ़ाकर 200 की जा सकती है। सातवीं, अत्यधिक गरीब लोगों की न्यूनतम आय सुनिश्चित करने के लिए यूनिवर्सल बेसिक इनकम जैसी किसी योजना पर विचार किया जा सकता है। सरकारें सुनिश्चित करें कि उनके पास प्रवासी श्रमिकों का पर्याप्त डाटा रहे, ताकि कोई फैसला लेने में आसानी हो। योजनाओं के जरिए मजदूरों को रजिस्ट्रेशन के लिए प्रेरित करना चाहिए।
हमें प्रवासियों की समस्या को संपूर्णता में देखना होगा। तात्कालिक के साथ-साथ दीर्घकालिक रणनीति बनाने की जरूरत है। शहरों के साथ-साथ गांवों में भी लाभदायक रोजगार सृजित करने होंगे। इसके लिए ग्रामीण विकास पर विशेष ध्यान देना होगा। हम अपनी विशाल आबादी का फायदा तभी उठा सकेंगे, जब हम अपने युवाओं को प्रशिक्षित कर रोजगार देंगे। इस दिशा में सामूहिक प्रयासों की जरूरत है, ताकि मेहनतकश समाज को गरिमामय जीवन दिया जा सके।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)
सत्यपाल सिंह मीना, राजस्व अधिकारी
सम्पादकीय / शौर्यपथ / यह सचमुच कडे़ इम्तिहान की घड़ी है। प्रकृति जैसे हमारे समूचे धैर्य और संघर्ष-शक्ति को आजमाने पर उतर आई है। एक तरफ, दुनिया कोविड-19 के कहर से हलकान है, तो वहीं दूसरी ओर चक्रवाती तूफान कई देशों के लिए विनाशकारी बनकर आया, और अब लू के थपेड़ों ने धरती के जीवों को झुलसाना शुरू कर दिया है। भारत के कुछ हिस्सों में तो पारा सोमवार को 47 डिग्री के पार चला गया और मौसम विभाग का आकलन है कि इस बार मानसून देरी से केरल पहुंच रहा है यानी सूरज देव का कोपभाजन लंबे समय तक बनना पडे़गा, खासकर उत्तर भारत के लोगों को। चढ़ते पारे के कारण मौसम विभाग ने कल दिल्ली में ‘ऑरेंज अलर्ट’ तक जारी किया था। ऐसी सूचनाएं लोगों को आगाह करती हैं कि वे बेवजह धूप में न निकलें।
जब कोरोना महामारी के कारण देश-दुनिया में पूर्ण लॉकडाउन हुआ, और कारों-कारखानों के पहिए थमे, तब पर्यावरण में कई तरह के सुखद बदलाव दर्ज किए गए थे। शहरों की हवा, नदी-जल के प्रदूषण में कमी के अलावा सुदूर आर्कटिक क्षेत्र में ओजोन छिद्रों के भरने तक की खबरें आईं। लेकिन तब भी मौसम वैज्ञानिकों और पर्यावरणविदों ने किसी तात्कालिक राहत की उम्मीद नहीं बांधी थी, और अब जिस तरह से तापमान नए रिकॉर्ड दर्ज कराता जा रहा है, उसे देखते हुए शासन-प्रशासन के आगे एक और बड़ी चुनौती खड़ी हो सकती है। इसका अंदाजा इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि पिछले एक दशक में 6,000 से भी अधिक लोग लू के शिकार बन चुके हैं। और यह आंकड़ा सिर्फ उन लोगों का है, जिनके नाम सरकारी दस्तावेजों में इस खाते में दर्ज हुए। ऐसे में, शासन-प्रशासन के ऊपर अब दो-दो मोर्चों पर जूझने की जिम्मेदारी होगी। एक तरफ, उन्हें कोविड-19 के संक्रमितों के क्वारंटीन और इलाज की व्यवस्था करनी है, तो वहीं लू के लिहाज से बेहद संवेदनशील लोगों की मदद के लिए भी तत्पर रहना है। चिंता की बात बस यह है कि पिछले दो महीने से भी अधिक समय से अनिवार्य सेवाओं से जुडे़ लोग अनथक अपने कर्तव्य के निर्वाह में जुटे हुए हैं, तापमान के इस तीखे तेवर से उन पर काम का बोझ और बढ़ जाएगा।
देश के कई महानगर पहले ही भारी जल संकट झेल रहे हैं। खासकर गरमी के तीन-चार महीनों में तो उनकी हालत सबसे दयनीय होती है। पिछले साल मुंबई, बेंगलुरु में पानी की किल्लत का आलम यह रहा कि कई बडे़ आयोजन तक टाल देने पडे़ थे। आज जब मुंबई और चेन्नई जैसे महानगर कोरोना महामारी से सर्वाधिक त्रस्त हैं, तब किसी प्रकार का जल संकट उनके लिए परेशानी का एक नया सबब बन सकता है। लोगों की दैनिक जरूरतों के लिए पानी की कमी होगी, जबकि बेहतर सैनेटाइजेशन के लिए उन्हें अधिक पानी की जरूरत होगी। यह ठीक है कि बड़ी संख्या में उत्तर भारतीय कामगारों के वहां से पलायन के कारण नगर प्रशासन का दबाव कुछ घटा होगा, लेकिन विडंबना यह है कि हमारे नागरिक जीवन की जितनी जमीनी सेवाएं हैं, उनका दारोमदार काफी कुछ बाहर से आए मजदूरों के कंधों पर ही रहा है। इसके लिए किसी बड़े समाजशास्त्रीय अध्ययन की जरूरत भी नहीं। एक बात और। न तो कोरोना शहर-गांव, अमीर-गरीब में कोई फर्क कर रह रहा है और न ही लू के थपेडे़ करेंगे, इसलिए यहां भी एहतियात ही इलाज है।
मेलबॉक्स / शौर्यपथ / भले ही राजनीति में राहुल गांधी कम अनुभवी माने जाते हों और आए दिन अन्य राजनीतिक दल उनके बयान का अनर्थ निकालकर उनका मजाक उड़ाते हों, मगर कोरोना के खतरे को लेकर उनका कहना काफी हद तक सही साबित हुआ है। जब देश में महामारी के मामले बढ़ रहे थे, तभी राहुल गांधी ने प्रतिदिन जांच का दायरा एक लाख किए जाने की बात कही थी, जबकि उस समय चालीस हजार के आसपास जांच हो रही थी। इसके अलावा, उन्होंने मजदूरों को उनके घर पहुंचाने के लिए व्यवस्था किए जाने का भी सुझाव दिया, लेकिन राजनीतिक दांव-पेच के चलते उनकी दलीलों को अनसुना कर दिया गया। मगर आज सरकार खुद मजदूरों को गंतव्य तक पहुंचाने का काम कर रही है। यह देखकर लगता है कि यदि उनकी बातों पर गौर किया जाता, तो परिस्थितियां आज कुछ और होतीं।
अमृतलाल मारू ‘रवि’
ऐसा हो लोकतंत्र
स्वस्थ लोकतंत्र के लिए ऐसी सरकार की अपेक्षा होती है, जो सशक्त होकर राष्ट्रहित में कठोर निर्णय ले सके। इसके साथ ही एक मजबूत विपक्ष भी होना चाहिए, जो सत्तारूढ़ दल के अच्छे कार्यों का समर्थन और उसके जन-विरोधी कामों का विरोध करके सरकार की निरंकुशता को रोक सके। लिहाजा अपने देश का यह दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि यहां नेता प्रतिपक्ष का पद इसलिए खाली है, क्योंकि कोई विपक्षी दल इतनी सीटें नहीं जीत सका कि इस पद पर अपने नेता को बैठा सके। इसलिए स्वस्थ लोकतंत्र के लिए सभी विपक्षी दलों को चाहिए कि वे एकजुट होकर खुद को एक राष्ट्रीय दल के रूप में विकसित करें और देशहित में अपनी पृथक अस्मिता समाप्त करके एक नए युग की शुरुआत करें।
सत्य प्रकाश, लखीमपुर
विद्यार्थियों की दुविधा
कोरोना संकट काल में जहां एक ओर देश भर में डिजिटल शिक्षा का चलन बढ़ा है, तो वहीं दूसरी ओर सरकारी विद्यालयों में पढ़ रहे उन विद्यार्थियों के लिए दुविधा की स्थिति पैदा हो गई है, जिनके पास तकनीकी साधनों का अभाव है। भले ही सरकारी विद्यालयों में भी अब ऑनलाइन शिक्षा शुरू हो गई है, लेकिन यहां ऐसे विद्यार्थी बड़ी संख्या में पढ़ते हैं, जिनके परिजन अभी दो जून की रोटी के लिए भी संघर्ष कर रहे हैं। इसीलिए कुछ विद्यार्थी अपने गांव की ओर लौट चुके हैं। जाहिर है, सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले हर बच्चे के पास स्मार्टफोन और नियमित डाटा पैक का होना व्यावहारिक सोच नहीं है। इस कारण वे पढ़ाई से दूर हो रहे हैं, जिससे उनके मानसिक विकास में रुकावट पैदा हो रही है। इससे बच्चे गैर-उत्पादक कामों में भी शामिल हो रहे हैं, जो उन्हें भटकाव और दिशाहीनता की ओर ले जाएगा। इन बच्चों के लिए जल्द से जल्द जरूरी व्यवस्था सरकार को करनी चाहिए।
शंकर वर्मा, शाहदरा, दिल्ली
एक मुश्किल डगर
कहने और सुनने में स्वदेशी और आत्मनिर्भरता बहुत अच्छे शब्द लगते हैं, मगर इनकी डगर बहुत कठिन है। वर्तमान पूंजीवादी व्यवस्था में तो यह शायद ही संभव है। यह सही है कि स्वदेशी उत्पादों के इस्तेमाल से ही आत्मनिर्भर बना जा सकता है, क्योंकि ये एक-दूसरे के पूरक हैं, लेकिन इसके लिए अभी बहुत कुछ किया जाना शेष है। सर्वप्रथम जनसंख्या नियंत्रण का प्रयास करना होगा। उसके बाद प्राकृतिक संसाधनों के विकास और संरक्षण की व्यवस्था करनी होगी। निजीकरण को भी समाप्त करना होगा। जाहिर है, इसके लिए जरूरी नीयत और नीति का अपने यहां अभाव है। जनवादी नीतियां और ठोस प्रोग्राम न होने से ही सरकार शानदार काम करने वाले सार्वजनिक उपक्रमों को निजी हाथों में बेचने पर आमादा है। ऐसे में, स्वदेशी और आत्मनिर्भरता कतई नहीं आ सकतीं।
वेद मामूरपुर ,नरेला
ओपिनियन / शौर्यपथ / राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘आत्मनिर्भर भारत’ और ‘वोकल फॉर लोकल’ पर खासा जोर दिया था। अब उसका असर दिखने लगा है। खबरों के मुताबिक, कैंटीन स्टोर्स डिपार्टमेंट (सीएमडी) और सेंट्रल पुलिस कैंटीन (सीपीसी) जैसे सरकारी स्टोर्स अपने आपूर्तिकर्ताओं से यह पूछने लगे हैं कि उत्पाद कहां तैयार हुआ और कच्चा माल किन देशों से आया? इससे ऐसा लगता है कि प्रधानमंत्री अपने भाषण से वैश्विक आर्थिक ताकतों की उस जमात में शामिल हो गए हैं, जो वैश्वीकरण की राह छोड़कर संरक्षणवाद की ओर बढ़ने को तैयार है।
19वीं शताब्दी के आखिरी वर्षों से लेकर अब तक वैश्वीकरण के कई दौर आए हैं। पहले चरण का अंत 1929 में हुआ था, जिसमें यूरोपीय और अमेरिकी अर्थव्यवस्थाओं ने उल्लेखनीय रफ्तार पकड़ी और बाकी दुनिया के साथ उनका मेल-जोल बढ़ा। साल 1929 की महामंदी के बाद दुनिया की कई सरकारों ने संरक्षणवादी नीतियां अपनाईं। वैश्वीकरण-मुक्त यह अर्थव्यवस्था 1970 के दशक तक कायम रही। इसके बाद वैश्वीकरण का दूसरा दौर आया। भारत ने भी आजादी के बाद चार दशकों से अधिक समय तक संरक्षणवादी नीतियां अपनाईं। हालांकि, चीन में बाजार सुधार (1978 के बाद) और 1991 में सोवियत संघ के पतन के बाद विश्व अर्थव्यवस्था में रूस की वापसी के साथ ही विश्व की अर्थव्यवस्थाएं फिर से आपस में जुड़ने लगीं।
वैश्वीकरण का जो रूप हम आज देख रहे हैं, उसकी शुरुआत 2008 के आर्थिक संकट के साथ हुई, और बाद में 2018 में शुरू हुई अमेरिका-चीन की कारोबारी जंग से यह खासा प्रभावित हुई। अब कोविड-19 के कारण इस पर नकारात्मक असर पड़ा है। जापान जैसे देशों ने तो चीन में अच्छा कारोबार कर रही अपनी कंपनियों को वापस बुलाने के लिए करीब दो अरब डॉलर के पैकेज का एलान किया है। इकोनॉमिस्ट के मुताबिक, अमेरिका भी इंटेल और ताइवान सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग कंपनी (टीएसएमसी) जैसे उद्यमों को वापस आने का न्योता दे रहा है। कई अर्थशास्त्री तो यह भी अनुमान लगा रहे हैं कि कोविड-काल के बाद वैश्विक आपूर्ति शृंखला काफी कुछ क्षेत्रीय हो जाएगी।
भारतीय प्रधानमंत्री ने भी अपने भाषण में पीपीई किट और एन-95 मास्क का उदाहरण देकर आत्मनिर्भर भारत बनाने पर जोर दिया, साथ ही आपदा को अवसर में बदलने की बात कही। मगर, आयात के मामले में चीन पर हमारी निर्भरता अभी काफी ज्यादा (लगभग 14 प्रतिशत) है। दवाई उद्योग, मोटर गाड़ी के कल-पुर्जे, बिजली के उपकरण, सौर ऊर्जा उद्योग और खिलौना उद्योग के लिए हमें चीन की अधिक जरूरत पड़ती है। रसायन व उर्वरक मंत्रालय के अनुसार, भारत दवा के लिए जितना कच्चा माल यानी एपीआई दूसरे देशों से मंगवाता है, उसका दो-तिहाई चीन से आता है। इसके अलावा, हम करीब 60 फीसदी चिकित्सा उपकरण चीन से आयात करते हैं। मोबाइल उद्योग में इस्तेमाल होने वाले 88 फीसदी कल-पुर्जे भी चीन जैसे देशों से आते हैं। हालांकि, रत्न और आभूषण, भारी मशीनें, प्लास्टिक, वनस्पति तेल जैसे उत्पादों के लिए हम क्रमश: संयुक्त अरब अमीरात, जापान, दक्षिण कोरिया और मलेशिया पर निर्भर हैं।
जाहिर है, ‘आत्मनिर्भरता’ व ‘वोकल फॉर लोकल’ की राह में कई चुनौतियां हैं। सबसे पहले तो हमें आयातित उत्पादों का देशज विकल्प ढूंढ़ना होगा। यदि आत्मनिर्भरता की ओर हमें बढ़ना है, तो आयातित हर वस्तु का उत्पादन देश को स्वयं करना होगा, फिर चाहे हम उसके कुशल उत्पादन में सक्षम हों या नहीं हों यानी देश उन क्षेत्रों में भी अपने संसाधन खर्च करेगा, जहां उत्पादकता कम हैै। तुलनात्मक लाभ का सिद्धांत कहता है कि यदि अपेक्षाकृत कम लागत में गुणवत्तापूर्ण उत्पादन करने वाले क्षेत्रों को कम संसाधन मुहैया कराए जाते हैं, तो लाभ की स्थिति खत्म हो सकती है। नेहरू-इंदिरा के दौर में आत्मनिर्भरता पर केंद्रित संरक्षणवाद का हमारा अनुभव सुखद नहीं रहा। उन्हीं नीतियों के कारण विश्व व्यापार में भारत की हिस्सेदारी 1985 तक घटकर 0.45 प्रतिशत रह गई, जो 1950 में 2.2 फीसदी थी। आजादी के बाद के तीन दशकों में जीडीपी विकास दर महज 3.5 प्रतिशत थी। ऐसे में, उन्हीं नीतियों की ओर लौटने से कोरोना-प्रभावित अर्थव्यवस्था और बिगड़ सकती है। इसलिए दवाई, इलेक्ट्रॉनिक या मोटर वाहन से जुड़े जरूरी घटकों का आयात जारी रखना उचित होगा। हमें तब तक वैश्विक आपूर्ति शृंखला का हिस्सा बने रहना चाहिए, जब तक कि ये हमारी उत्पादकता में इजाफा करते हैं। हां, हमें अलग-अलग देशों से आयात करना चाहिए, ताकि किसी एक देश से मुश्किल होने पर आपूर्ति बाधित न हो।
दूसरी चुनौती सीमा और गैर-सीमा शुल्क से जुड़ी है। मीडिया में सरकारी अधिकारियों के हवाले से बताया गया है कि आने वाले समय में सरकार निर्यातकों को अधिक लाभ देकर विभिन्न क्षेत्रों में निर्यात को बढ़ावा देगी और गैर-सीमा शुल्क लगाकर आयात को हतोत्साहित करेगी। आयात पर सीमा और गैर-सीमा शुल्क जैसी रुकावटें पैदा करने से हालात बिगड़ सकते हैं, क्योंकि अन्य देश भी हम पर ऐसा प्रतिबंध लगा सकते हैं। अमेरिका-भारत का कारोबारी रिश्ता इसका ज्वलंत उदाहरण है। ऐसे में, आयातित उत्पादों पर ऐसी कोई बाधा अन्य देशों में भारतीय उत्पादों को नुकसान पहुंचा सकती है। यह कदम चीन के साथ भी हमारी मुश्किलें बढ़ा सकता है।
तीसरी चुनौती ब्रांड के मोर्चे पर है। प्रधानमंत्री ने कहा कि आज के वैश्विक ब्रांड पहले स्थानीय ब्रांड थे। मगर भारतीय ब्रांड के वैश्विक होने की राह में मुश्किल यह है कि गुणवत्ता के मामले में दुनिया आज भी हमारे उत्पादों पर भरोसा नहीं करती। इनोवेशन यानी नवाचार के मामले में भी हम अच्छी स्थिति में नहीं हैं। यह कमी तभी पूरी हो सकती है, जब हम विश्व अर्थव्यवस्था के साथ कदम बढ़ाएंगे। भारत सरकार चीन से आपूर्ति शृंखलाओं को अपनी ओर आकर्षित करना चाहती है, खासकर अमेरिकी कंपनियों को। यह आसान नहीं होगा, क्योंकि आर्थिक ताकतें उनकी घर वापसी चाहती हैं। लॉजिस्टिक सेवाओं, ऋण सुविधा और विनियामक माहौल बनाने से जुड़े बुनियादी ढांचे भी हमें बनाने होंगे, तभी बहुराष्ट्रीय कंपनियों को उत्पादन के लिए आकर्षित किया जा सकेगा और भारतीय ब्रांडों को वैश्विक मंच मिलेगा। जाहिर है, इसके लिए काफी काम किए जाने की जरूरत है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)
अनुज शर्मा, असोसिएट प्रोफेसर, बिमटेक
सेहत /शौर्यपथ / गुलाब की ताजी पंखुड़ियों और मिश्री से मिलाकर बनाया जाने वाला गुलकंद स्वाद में तो बेहद स्वादिष्ट होता ही है, स्वास्थ्य के लिए भी कई तरह से फायदेमंद होता है। इन फायदों को जानने के बाद आप आज से ही शुरू कर देंगे गुलकंद का सेवन-
1. गुलकंद शरीर के अंगों को ठंडक प्रदान करता है। शरीर में गर्मी बढ़ जाने पर गुलकंद का सेवन बेहद लाभदायक होता है और गर्मी से पैदा हुईं समस्याओं से निजात दिलाता है।
2. गुलकंद का नियमित सेवन दिमाग के लिए भी बेहद लाभकारी है। बस 1 चम्मच गुलकंद सुबह और शाम के वक्त खाने से न केवल आपके दिमाग को तरावट मिलेगी, दिमाग शांत भी रहेगा और गुस्सा भी नहीं आएगा।
3. कब्ज या अपच की समस्या होने पर यह रामबाण उपाय है। रोजाना गुलकंद का सेवन कब्ज से निजात दिलाएगा और भूख बढ़ाने के साथ ही पाचन तंत्र को भी सुचारु करने में सहायक होगा। गर्भावस्था में यह विशेष लाभकारी और सुरक्षित है।
4. आंखों की रोशनी बढ़ाने और ठंडक प्रदान करने के लिए गुलकंद का उपयोग करना बेहतर तरीका है। यह आंखों में जलन एवं कंजक्टिवाइटिस की समस्या से भी आपको निजात दिलाएगा।
5. मुंह के छालों एवं त्वचा समस्याओं के लिए भी गुलकंद का प्रयोग बेहद फायदेमंद है, वहीं थकान और ऊर्जा में कमी होने पर भी गुलकंद लाभदायक साबित होगा।
लाइफस्टाइल / शौर्यपथ / मई महीने के आखिरी दिनों में सूरज, धरती के बहुत करीब आ जाता है, जिससे भीषण गर्मी पड़ती है। इन दिनों को ही नौतपा कहा जाता है। इस दौरान धूप में बाहर निकलने से बचने के अलावा आपको खानपान का विशेष ध्यान रखना चाहिए वरना बीमार होते जरा देर नहीं लगेगी।
आइए, जानते हैं कि नौतपा में कैसा हो आपका खानपान और किन चीजों का करें परहेज -
1/ गर्मियों में आने वाले फलों में पानी की मात्रा काफी होती है, इसलिए इनका सेवन जरूर करें।
2/ तरबूज, खरबूज, खीरा आदि को नियमित रूप से खाने से शरीर में पानी के साथ खनिज-लवणों की भी पूर्ति होती है।
3/ इन दिनों सामान्य खाना जैसे दाल, चावल, सब्जी, रोटी आदि खाना ठीक रहता है। तीखी गर्मी में भूख से थोड़ा कम खाना चाहिए। इससे आपका हाजमा भी ठीक रहेगा और फुर्ती भी बनी रहेगी। इसके साथ तली हुई चीजों को ज्यादा न खाएं, यह आपका हाजमा बिगाड़ सकते हैं।
4/नौतपा की भीषण गर्मी में शरीर का अधिकांश पानी पसीने के रूप में निकल जाता है। इसलिए दिन में कम से कम 4 लीटर पानी जरूर पिएं।
5/ इन दिनों की भीषण गर्मी में नारियल पानी, छाछ और लस्सी पीने से भी जल का संतुलन बनाए रखने में मदद मिलती है। गर्मी के मौसम में तली और मसालेदार चीजें खाने की इच्छा ज्यादा होती है। लेकिन इस मौसम में इन चीजों से बचा जाना ही बेहतर होता है।
6/ खाने में बहुत ज्यादा नमक भी न लें। नमकीन, मूंगफली, तले हुए पापड़-चिप्स और तेल में तले हुए खाद्य पदार्थ न ही खाएं तो बेहतर होगा।
7/नौतपा की भीषण गर्मी में मछली, चिकन, मांस, समुद्री भोजन और अत्यधिक ग्रेवी वाले व्यंजन भी न ही खाएं तो बेहतर है। वास्तव में इससे व्यक्ति को और अधिक पसीना आता है और पाचन की समस्याएं भी हो जाती हैं।
8/ जंक फूड जैसे बर्गर, पिज्जा आदि भी नौतपा में खाने से बचें।
9/ चाय और कॉफी जैसे पेय पदार्थों से निश्चित रूप से इन दिनों परहेज करना चाहिए। कैफीन और अन्य पेय पदार्थ वास्तव में आपके शरीर में गर्मी बढ़ाने के साथ शरीर का निर्जलीकरण यानि डिहाइड्रेशन पैदा करते हैं।
10/ सॉस भी खाने से बचें, दरअसल सॉस में तकरीबन 350 कैलोरी होती है, जो आपको सुस्त बना सकती है। कुछ सॉस में बहुत ज्यादा नमक और MSG (मोनोसोडियम ग्लूटामेंट) होता है, जो आपके लिए हानिकारक है।
इसके बजाए गर्मी में पौष्टिक और प्राकृतिक भोजन के साथ छाछ, लस्सी, नींबू-पानी, शिकंजी और आम पना जैसे तरल पदार्थों का सेवन करें।
सेहत / शौर्यपथ / मौसम और सेहत से जुड़ी समस्या लोगों को परेशान कर रही है। वक्त है लॉकडाउन का और ऐसे समय में शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य का दुरुस्त रहना बहुत जरूरी है। यदि आप अपने घर से ही काम कर रहे हैं यानी 'वर्क फ्रॉम होम' हैं तो कुछ बातों का आपको विशेषतौर पर ध्यान रखना चाहिए।
साथ ही अपनी स्कीन केयर रूटीन पर भी ध्यान दें, क्योंकि इस वक्त 'वर्क फ्रॉम होम' होने पर आप लगातार लैपटॉप व डेस्कटॉप के सामने बैठकर काम करते हैं जिससे आंखों पर तो असर पड़ता ही है, साथ ही आपकी स्कीन पर भी इसका प्रभाव पड़ता है। काम की टेंशन आपकी त्वचा पर भी साफ नजर आ सकती है इसलिए अपनी स्कीन केयर रूटीन पर भी ध्यान दें।
कुछ खास टिप्स को अपनाकर आप शारीरिक और मानसिक दोनों रूप से स्वस्थ रह सकते हैं इसलिए कुछ छोटे-छोटे बदलाव अपनी दिनचर्या में जरूर करें। आइए जानते हैं कुछ सुपर क्वारंटाइन टिप्स...
खुद को स्वस्थ रखने के लिए अब आपको अपनी दिनचर्या में हाथ धोने की आदत को जरूर शामिल करना है इसलिए बार-बार हाथ धोने की आदत डालें। साथ ही साफ-सफाई का पूरा ध्यान दें।
मानसिक रूप से खुद को मजबूत रखने के लिए योग और हल्के-फुल्के व्यायाम को अपनी दिनचर्या में शामिल करें।
'वर्क फ्रॉम होम' हैं तो बीच में ब्रेक जरूर लें और स्ट्रेचिंग करें जिससे कि गर्दन और पीठ में होने वाले दर्द से आप बच पाएं।
अंकुरित अनाज को करें सुबह के नाश्ते में शामिल। दूध वाली चाय पीने की जगह हर्बल टी पीने की आदत डालें।
मानसिक तनाव महसूस कर रहे हैं तो अच्छी किताबें पढ़ें, साथ ही आप म्यूजिक भी सुन सकते हैं।
खुद के लिए समय निकालना जरूर सीखें और Me Time में अपनी स्कीन व अपने बालों की देखभाल करें। जो आपको खुशी दे, वो काम करें जैसे कुकिंग पसंद है तो वो करें। डांस करना पसंद करती हैं या पेंटिंग पसंद है तो वो करें जिससे कि आप खुद को तरोताजा महसूस कर पाएं।
रात में सोने से पहले दूध में बादाम का पेस्ट, शहद और चुटकीभर हल्दी डालें। इसे सोने से पहले पीकर सो जाएं। इससे आपको नींद भी अच्छी आएगी, साथ ही आपकी प्रतिरोधक क्षमता भी बढ़ेगी।
खाने में हल्दी, जीरा, अदरक और लहसुन को जरूर शामिल करें। ये आपको रोगों से लड़ने की शक्ति प्रदान करते हैं इसलिए इन्हें नजरअंदाज न करें।
खाना खजाना / शौर्यपथ / कच्चे आम का पना गर्मियों के मौसम में सर्वाधिक पसंद किया जाने वाला पारंपरिक भारतीय पेय हैं। यह बहुत ही स्वादिष्ट होता है। जब गर्मियां अपने चरम पर हों तब आप 'पना' बनाकर पी सकते हैं। यह आपके शरीर को शीतलता व तरावट देता है और आपको गर्मी व लू से भी बचाता है। इसे बनाना ना केवल बेहद आसान है, बल्कि यह बहुत जल्दी भी बन जाता है। तो आइए हम बनाते हैं आम का पना और जानते हैं सेहत के फायदे-
सामग्री :
300 ग्राम कच्चे आम (2-3 मीडियम आकार के), 2 छोटे चम्मच भुना जीरा पावडर, स्वादानुसार काला नमक, एक चौथाई छोटी चम्मच काली मिर्च, 100-150 ग्राम (1/2 - 3/4 कप) चीनी, 20-30 पुदीना की पत्तियां, सादा नमक आवश्यकतानुसार।
विधि :
पुराने समय में जब खाना चूल्हे पर बनाया जाता था, तब लोग कच्चे आम को चूल्हे की राख में दबा कर भून लिया करते थे और फिर इन भूने हुए कच्चे आमों से आम का पना बनाते थे।
आजकल हम कच्चे आम को उबाल कर पीस लेते हैं और फिर इससे आम का पना बना लेते हैं। लेकिन उबले हुए आमों को छील कर उनका गूदा निकालने की जगह कच्चे आमों को उबालने से पहले ही छील लेना ज्यादा सुविधाजनक होता है। आज हम आम का पना इसी तरीके से बनाएंगे।
इसके लिए सबसे पहले कच्चे आमों को धोकर उन्हें छील लीजिए और फिर उनकी गुठलियों से गूदे को अलग करके एक-दो कप पानी में डालकर उबाल लीजिए। अब मिक्सी में यह उबला हुआ गूदा, चीनी, काला नमक और पुदीने की पत्तियां डालकर अच्छी तरह से पीस लीजिए और फिर इसमें एक लीटर ठंडा पानी मिला कर इसे छलनी में छान लीजिए।
आम का पना तैयार है। अब इसमें काली मिर्च व भूना हुआ जीरा पावडर डालकर अच्छे से मिलाइए और फिर बर्फ के टुकड़े डालकर ठंडा-ठंडा परोसिए। यदि आप चाहें तो इस आम के पने को पुदीने की पत्तियों से सजा कर भी परोस सकते हैं।
कैरी का पना पीने के फायदे
1. गर्मी के दिनों में इसका रोजाना इस्तेमाल पेट की समस्याओं से दूर रखेगा और पाचनक्रिया को दुरुस्त रखने में भी सहायक होगा। यह एक बढ़िया पाचक पेय है।
2. कैरी का पना गर्मी के दुष्प्रभावों से बचाने में बेहद फायदेमंद है। यह आपको लू की चपेट में आने से बचाएगा और शरीर में तरलता बनाए रखने में मददगार होगा।
3. पेट की गर्मी को खत्म करने के साथ ही यह पाचक रसों के निर्माण में मदद करता है।
4. विटामिन सी से भरपूर हेने के कारण यह आपकी प्रतिरोधक क्षमता में इजाफा करता है और कई तरह की स्वास्थ्य समस्याओं से आपकी रक्षा करता है।
5. टीबी, एनिमिया, हैजा जैसी बीमारियों के लिए भी यह टॉनिक की तरह काम करता है। साथ ही पसीने में शरीर से निकलने वाले सोडियम और जिंक का स्तर भी बनाए रखता है।
धर्म संसार / शौर्यपथ / हिंदू धर्म ग्रंथों में स्कंदपुराण को महापुराण कहा जाता है। पुराणों के क्रम में इसका तेरहवां स्थान है इसके खंडात्मक और संहितात्मक उपलब्ध दो रूपों में से प्रत्येक में 81 हजार श्लोक हैं। इस पुराण का नाम भगवान शंकर के बड़े पुत्र कार्तिकेय के नाम पर है। कार्तिकेय का ही नाम स्कन्द है। यह शैव संप्रदाय का पुराण है जिसमें स्कन्द द्वारा तारकासुर के वध की कथा का वर्णन मिलेगा।
इस पुराण में काशीखंड, महेश्वर खंड, रेवाखंड, अवन्तिका खण्ड, प्रभास खण्ड, ब्रह्म खण्ड और वैष्णव खण्ड आदि कुल सात खंड है। कुछ विद्वान छह खंड बताते हैं। इसमें सती दाह, समुद्र मंथन, तारकासुर वध, शक्तिपीठ, 27 नक्षत्रों, 18 नदियों, भारत के 12 ज्योर्तिलिंगों, गंगा अवतरण सहित पर्वत श्रृंखलाओं के उल्लेख के साथ ही सोमदेव, तारा, उनके पुत्र बुध की उत्पत्ति की कथा का वर्णन भी मिलती है। इसके अलावा स्कंद पुराण में धर्म ज्ञान और नीतियों से संबंधित कई बातें बताई गई हैं। आओ जानते हैं स्कंद पुराण की 5 खास बातें।
1. शंकरजी होते हैं प्रसन्न : स्कंद पुराण का पाठ करने से भगवान शंकर प्रसन्न होते हैं। स्कंद पुराण की महाकाल कथा में इसका वर्णन मिलता है। इसमें 12 ज्योर्तिलिंगों की उत्पत्ति का वर्णन भी है।
2. प्रदोष व्रत का महत्व : स्कंद पुराण में प्रदोष व्रत के महामात्य का वर्णन मिलता है। इस व्रत को करने से सभी तरह की मनोकामना पूर्ण होती है। इसमें एक विधवा ब्राह्मणी और शांडिल्य ऋषि की कथा के माध्यम से इस व्रत की महिमा का वर्णन मिलेगा।
3. गृहस्थ जीवन :
जीवितं च धनं दारा पुत्राः क्षेत्र गृहाणि च। याति येषां धर्माकृते त भुवि मानवाः॥ [स्कंदपुराण:]
अर्थात- मनुष्य जीवन में धन, स्त्री, पुत्र, घर-धर्म के काम, और खेत– ये 5 चीजें जिस मनुष्य के पास होती हैं, उसी मनुष्य का जीवन इस धरती पर सफल माना जाता है।
4. वैशाख मास का महत्व : स्कंद पुराण के वैष्णव खंड अध्याय 4 में वैशाख मास के महामात्य का विस्तार से वर्णन मिलता है। इसके श्लोक 34 के अनुसार इस मास में तेल लगाना, दिन में सोना, कांसे के बर्तन में भोजन करना, दो बार भोजन करना, रात में खाना आदि वर्जित माना गया है। वैशाख के माह में पवित्र नदियों में स्नान करने से पुण्य की प्राप्ति होती है। स्कंदपुराण में उल्लेख है कि महीरथ नाम के राजा ने केवल वैशाख स्नान से ही वैकुण्ठधाम प्राप्त किया था। इस माह में पंखा, खरबूजा, अन्य फल, अनाज, जलदान, प्रदोष व्रत, स्कंद पुराण का पाठ करने का महत्व है।
वैशाखे मेषगे भानौ प्रातःस्नानपरायणः ।।
अर्घ्यं तेऽहं प्रदास्यामि गृहाण मधुसूदन ।। 34 ।।
5. श्रद्धा एवं मेधा का महत्व : संक्षिप्त स्कन्दपुराण के वैष्णवखण्ड-कार्तिकमास-माहात्म्य के अनुसार ब्रम्हाजी कहते हैं कि इस पृथ्वी पर श्रद्धा एवं मेधा ये दो वस्तुएं ऐसी हैं जो काम, क्रोध आदि का नाश करती हैं।
लाइफस्टाइल / शौर्यपथ / ना बीबी न भैया “सबसे बड़ा रुपइया” सभी ने सुना होगा। यह पैसा जो सिक्के में या नोटों में भले ही अलग-अलग आकार, रंग-रूप, वजन लिए हुए हो पर जिसकी जेब में ये बसते हैं वो ही इस दुनिया में सबसे रुतबेदार है। इसी के आस-पास सारी दुनिया घूमती है। फिर भी पैसा या धन बहुत कुछ हो सकता है लेकिन सबकुछ नहीं।
“न वित्तेन तर्पणीयोमनुष्यः” -
धन से मनुष्य की तृप्ति नहीं हो सकती।
जिस धन की महिमा इतनी अपरम्पार है उसके बारे में कभी जानने की कोशिश की ? तो आइए जानते हैं कि पैसे,
भारतीय मुद्रा कितनी ऐतिहासिक है?
क्या आप जानते हैं कि पंच-चिन्हित सिक्के ईसा से पहले भी मौजूद थे? भारत में सबसे प्रारंभिक सभ्यताओं में, सिक्कों को 6 वीं शताब्दी ईसा पूर्व के रूप में देखा जा सकता है। भारतीय मुद्रा/पैसों /रुपयों के बारे में कुछ रोचक तथ्य इस प्रकार हैं:
1.प्राचीन, मध्ययुगीन और मुगल काल, सभी में सिक्के के रूप में मुद्रा का उपयोग किया जाता था। सबसे उल्लेखनीय शेरशाह सूरी का रूपिया था, जो आधुनिक रुपए का अग्रदूत बन गया।
2.कागज का पैसा पहली बार अठारहवीं शताब्दी के अंत में जारी किया गया था। बैंक ऑफ हिंदोस्तान, बंगाल में जनरल बैंक और बंगाल बैंक ऐसे पहले बैंक हैं जिन्होंने कागजी मुद्रा जारी की है।
3. भारत सरकार के नोटों का पहला सेट विक्टोरिया पोर्ट्रेट श्रृंखला था। सुरक्षा कारणों से, इस श्रृंखला के नोट आधे में काट दिए गए थे; एक आधा डाक द्वारा भेजा गया था, और प्राप्ति की पुष्टि होने पर, दूसरा आधा भेजा गया था। उन्हें 1867 में 'अंडरप्रिंट' श्रृंखला द्वारा प्रतिस्थापित किया गया था।
4.भारतीय रिजर्व बैंक का औपचारिक रूप से 1935 में उद्घाटन किया गया था और भारत सरकार के नोट जारी करने का अधिकार दिया गया था। RBI द्वारा जारी किया गया पहला नोट किंग जॉर्ज VI के चित्र पर आधारित पांच रुपए का नोट था।
5. दृष्टिहीन लोगों के लिए उठाए गए प्रिंट (इंटैग्लियो) के रूप में प्रत्एक नोट के बाएं हाथ पर एक पहचान चिह्न (अलग-अलग ज्यामितीय आकार) है - 1000 रुपए में एक हीरा, 500 रुपए के लिए चक्र, 100 के लिए त्रिकोण , रुपए के लिए वर्ग, 20 रुपए के लिए आयत और 10 रुपए के लिए कोई चिह्न नहीं था।
6.क्या आपने कभी साल के नीचे अलग-अलग प्रतीकों पर ध्यान दिया है। ए प्रतीक वास्तव में निर्दिष्ट कर रहे हैं जहां उत्पत्ति हुई। निम्नलिखित जानकारी मान ली गई है और उन्हें आवंटित किया गया है ।।।
मनोरजन / शौर्यपथ / लॉकडाउन में इन दिनों बॉलीवुड एक्टर सोनू सूद सुर्खियों में बने हुए हैं। वह पिछले कई दिनों से मुंबई में फंसे प्रवासी मजदूरों को उनके घर भेजने का काम कर रहे हैं। सोनू के इस कदम की हर तरफ चर्चा हो रही है। इतना ही नहीं उन्होंने सोशल मीडिया पर एक नंबर जारी कर दिया है, जिसमें कॉल करके कोई भी मदद मांग सकता है। इस बीच एक यूजर ने सोनू सूद से कहा कि वह अपनी गर्लफ्रेंड से चाहता है। इस पर सोनू ने भी मजेदार जवाब दिया।
एक शख्स ने सोनू सूद को टैग कर ट्वीट करते हुए कहा, 'सोनू सूद भैया, एक बार मेरी गर्लफ्रेंड से मिलवा दीजिए, बिहार ही जाना है। सोनू ने इस शख्स के ट्वीट को भी नजरअंदाज नहीं किया और बहुत ही मजेदार जवाब दिया है। उन्होंने रिप्लाई देते हुए कहा, 'थोड़े दिन दूर रहकर देख ले भाई। सच्चे प्यार की परीक्षा भी हो जाएगी।'
इससे पहले एक यूजर ने सोनू सूद से शराब की दुकान तक पहुंचाने की बात कही थी इस पर भी सोनू ने बेहतरीन जवाब दिया था। सोनू ने कहा था कि भई ठेके से घर तक पहुंचाना हो तो बता देना। हाल ही में सोनू ने फीवर डिटजिटल 100 Hours 100 Stars में बात करते हुए कहा था, 'जो लोग इन दिनों बोर हो रहे हैं आप दूसरों के लिए समय निकाल सकते हैं। मैं अपने दोस्तों से भी कहता हूं कि आप थोड़ा एक्स्ट्रा खाना बनाएं और किसी जरूरतमंद इंसान या उनके परिवार को दें। अगर ऐसा होता है तो कोई भी खाली पेट नहीं सोएगा।'
नजरिया / शौर्यपथ / वे डॉक्टर, इंजीनियर और अन्य पेशेवर हैं, जो भारत से संयुक्त राज्य अमेरिका (यूएस) आए थे। कुछ लोग यहां अध्ययन के लिए इस योजना के साथ आए थे कि अगर सब ठीक रहा, तो यहीं बस जाएंगे। और कुछ अन्य ऐसे भी हैं, जो बिंदीदार लाइनों वाले उस अनुबंध के साथ यहां स्थाई निवास के इरादे से पहुंचे थे, जिसे ग्रीन कार्ड भी कहा जाता है और जिससे अंतत: नागरिकता हासिल हो जाती है।
अपने ग्रीन कार्ड का इंतजार करते उनमें से कुछ बूढ़े भी हो रहे हैं। वे असुरक्षित, निराश और अब पहले से कहीं अधिक भयभीत भी हो गए हैं। यदि कोरोना वायरस महामारी द्वारा पैदा आर्थिक संकट के कारण उनमें से कुछ की नौकरी चली गई, तो वे ग्रीन कार्ड के लिए अपनी पात्रता गंवा देंगे। कुछ की नौकरी जा भी चुकी है। ऐसे लोगों को प्रत्यर्पण का सामना करना पडे़गा। ऐसा ही उन लोगों के परिवारों के साथ भी होगा, जो कोरोना संक्रमण की वजह से जान गंवा चुके हैं।
वे हताश हैं और इतने हताश कि अपने विस्मय की हद तक वे एक शक्तिशाली अमेरिकी सीनेटर से मुकाबला कर रहे हैं। लोग आश्वस्त हैं कि यही इकलौता आदमी है, जो उनके और ग्रीन कार्ड के बीच खड़ा है : रिचर्ड डर्बिन, इलिनोइस के वरिष्ठ डेमोके्रटिक सीनेटर। ग्रीन कार्ड के भारतीय उम्मीदवार विश्वास करते हैं कि डर्बिन उनका प्रत्यर्पण कराने के लिए दृढ़ हैं। डर्बिन उनके साथ ही उनके उन बच्चों का भी प्रत्यर्पण कराएंगे, जो अमेरिका के अलावा किसी अन्य देश को जानते भी नहीं हैं। ग्रीन कार्ड के लिए आशावान ये लोग अगले सप्ताह से टीवी और अखबारों में पूरे पेज का विज्ञापन चलाने की योजना बनाए बैठे हैं, ताकि अपनी तकलीफ से ज्यादा से ज्यादा लोगों को अवगत करा सकें। इमिग्रेशन वॉयस, एक एक्टिविस्ट ग्रुप है, जो फिलहाल इन भारतीयों का प्रतिनिधित्व कर रहा है। यह गु्रप ग्रीन कार्ड प्रतीक्षा अवधि में कटौती के लिए कानूनों में संशोधन करने की दिशा में अभियान चला रहा है। इस एक्टिविस्ट गु्रप ने सीनेटर रिचर्ड डर्बिन पर ‘नस्लवादी’ होने का आरोप भी लगाया है।
अमेरिका हर साल रोजगार-आधारित और परिवार-आधारित लगभग दस लाख ग्रीन कार्ड देता है। अमेरिका ने कार्य-आधारित श्रेणी में किसी एक देश के आवेदकों के लिए सात प्रतिशत की कैप या कोटा तय कर रखा है। दूसरे देशों के प्रत्याशियों की तुलना में भारतीय प्रत्याशियों की संख्या प्रतीक्षा पंक्ति में बहुत ज्यादा है। जो लोग बच जाते हैं, बैकलॉग में जुड़ जाते हैं। इनमें ज्यादातर भारतीय होते हैं। जुड़ते-जुड़ते यह प्रतीक्षा सूची इतनी लंबी हो गई है कि अमेरिका के एक परंपरावादी थिंक-टैंक कैटो इंस्टीट्यूट का अनुमान है कि अभी कोई अगर आवेदन करे, तो उसे लगभग 150 वर्षों तक इंतजार करना पड़ सकता है, जाहिर है, यह एक असंभव स्थिति है।
समस्या के समाधान के लिए वर्षों से प्रयास चल रहे हैं। एक समाधान है, जो डेमोक्रेट और रिपब्लिकन, दोनों को सबसे अधिक स्वीकार्य है, वह है देश के लिए लगे सात प्रतिशत के कैप को हटाना। इसके लिए संशोधन को पिछले अगस्त में हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव में पारित किया गया था, लेकिन सीनेट में इसके पारित होने को सिर्फ एक सीनेटर रिचर्ड डर्बिन ने रोक दिया था। उन्होंने उस संशोधन के जवाब में एक प्रतिकूल विधेयक पेश कर दिया, जो ग्रीन कार्ड की संख्या के विस्तार के कारण निर्मित बैकलॉग के मुद्दे को संबोधित करने की कोशिश करता है।
भारत सरकार इन लोगों की मुश्किलों से वाकिफ है। यूएस सिटिजनशिप के अनुसार, इन भारतीयों की संख्या 3,06,000 है, जबकि एक अन्य संस्था इमीग्रेशेन वॉयस के अनुसार, इनकी संख्या 15 लाख है। भारत सरकार अमेरिका में अपने हितचिंतकों के साथ खामोशी से इस मुद्दे को उठाती है, लेकिन वह बहुत कुछ करने में असमर्थ है। स्थितियों की विषमता के आगे भारत सरकार विवश है। भारत सरकार लगातार यह पैरवी कर रही है कि अमेरिका भारत से ज्यादा अप्रवासियों को अपने यहां स्वीकार करे।
यह अमेरिका में रहने की आशा के साथ वहां अध्ययन या काम करने की योजना बनाने वाले भारतीयों के लिए एक बड़ा संदेश है। ग्रीन कार्ड की कतार में शायद जीवन की सार्थकता नहीं है। इस कतार की दूसरी छोर पर रिचर्ड डर्बिन जैसा कोई इंतजार कर रहा है और यह कोई सोच की आत्म-केंद्रित परिभाषा या मानसिकता भर नहीं है। यशवंत राज, अमेरिका में हिन्दुस्तान टाइम्स संवाददाता
Feb 09, 2021 Rate: 4.00
