January 09, 2026
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धर्म संसार / शौर्यपथ / प्रभु यीशु के जन्म की ख़ुशी में मनाया जाने वाला क्रिसमस का त्योहार पूरी दुनिया में मनाया जाता है। यह त्योहार कई मायनों में बेहद खास है। क्रिसमस को बड़ा दिन, सेंट स्टीफेंस डे या फीस्ट ऑफ़ सेंट स्टीफेंस भी कहा जाता है। प्रभु यीशु ने दुनिया को प्यार और इंसानियत की शिक्षा दी। उन्होंने लोगों को प्रेम और भाईचारे के साथ रहने का संदेश दिया। प्रभु यीशु को ईश्वर का इकलौता प्यारा पुत्र माना जाता है। इस त्योहार से कई रोचक तथ्य जुड़े हैं। आइए जानते हैं इनके बारे में।
क्रिसमस ऐसा त्योहार है जिसे हर धर्म के लोग उत्साह से मनाते हैं। यह एकमात्र ऐसा त्योहार है जिस दिन लगभग पूरे विश्व में अवकाश रहता है। 25 दिसंबर को मनाया जाने वाला यह त्योहार आर्मीनियाई अपोस्टोलिक चर्च में 6 जनवरी को मनाया जाता है। कई देशों में क्रिसमस का अगला दिन 26 दिसंबर बॉक्सिंग डे के रूप मे मनाया जाता है। क्रिसमस पर सांता क्लॉज़ को लेकर मान्यता है कि चौथी शताब्दी में संत निकोलस जो तुर्की के मीरा नामक शहर के बिशप थे, वही सांता थे। वह गरीबों की हमेशा मदद करते थे उनको उपहार देते थे। क्रिसमस के तीन पारंपरिक रंग हैं हरा, लाल और सुनहरा। हरा रंग जीवन का प्रतीक है, जबकि लाल रंग ईसा मसीह के रक्त और सुनहरा रंग रोशनी का प्रतीक है। क्रिसमस की रात को जादुई रात कहा जाता है। माना जाता है कि इस रात सच्चे दिल वाले लोग जानवरों की बोली को समझ सकते हैं। क्रिसमस पर घर के आंगन में क्रिसमस ट्री लगाया जाता है। क्रिसमस ट्री को दक्षिण पूर्व दिशा में लगाना शुभ माना जाता है। फेंगशुई के मुताबिक ऐसा करने से घर में सुख समृद्धि आती है। पोलैंड में मकड़ी के जालों से क्रिसमस ट्री को सजाने की परंपरा है। मान्यता है कि मकड़ी ने सबसे पहले जीसस के लिए कंबल बुना था।

शौर्यपथ लेख।

प्यार को अक्सर उम्र के तराजू पर तौला जाता है—जैसे भावनाएँ केवल जवानी की जागीर हों। लेकिन सच इससे कहीं ज़्यादा गहरा है। बड़ी उम्र की औरत का प्यार कोई क्षणिक आकर्षण नहीं, बल्कि अनुभव, समझ और आत्मिक स्थिरता से उपजा हुआ भाव होता है। यह प्यार दिखावे से दूर, भीतर तक उतरने वाला होता है—जो न सिर्फ़ रिश्ते को, बल्कि इंसान को भी संवार देता है।

अनुभव से उपजा भरोसा

ज़िंदगी के उतार-चढ़ाव देख चुकी औरत जानती है कि रिश्ते शब्दों से नहीं, व्यवहार से टिकते हैं। वह जल्दबाज़ी नहीं करती, न ही हर बात पर शक का बोझ डालती है। उसका भरोसा आँख मूँदकर नहीं, बल्कि समझदारी से दिया गया होता है—और इसी वजह से वह भरोसा मज़बूत भी होता है।

देखभाल जो दिखती नहीं, महसूस होती है

उसका प्यार बड़े-बड़े वादों में नहीं, रोज़मर्रा की छोटी-छोटी बातों में दिखता है—समय पर पूछा गया हाल, थकान में दिया गया सुकून, और मुश्किल वक्त में बिना शोर किए खड़ा रहना। वह जानती है कि साथ निभाना क्या होता है, इसलिए उसका सहारा दिखावे का नहीं, स्थायी होता है।

भावनात्मक समझ की गहराई

बड़ी उम्र की औरत को हर बात कहने की ज़रूरत नहीं पड़ती। वह आँखों की भाषा, खामोशी की आवाज़ और व्यवहार के उतार-चढ़ाव को पढ़ लेती है। बिना टोके, बिना जज किए—सिर्फ़ समझना और साथ देना—यही उसकी सबसे बड़ी खूबी है।

सम्मान और स्वीकृति

वह सामने वाले को बदलने की कोशिश नहीं करती। न उसे अपने साँचे में ढालना चाहती है, न ही तुलना के बोझ तले दबाती है। जैसा है, वैसा स्वीकार करना—यह उसकी परिपक्वता का सबसे सुंदर रूप है। ऐसे रिश्ते में इंसान को खुद होने की आज़ादी मिलती है।

स्थिरता जो समय के साथ बढ़ती है

उसका प्यार तेज़ हवा का झोंका नहीं, बल्कि धीमी बहती नदी की तरह होता है—जो समय के साथ और गहरी, और शांत होती जाती है। उसमें ड्रामा नहीं, भरोसा होता है; दिखावा नहीं, अपनापन होता है; और डर नहीं, सुरक्षा होती है।

कुल मिलाकर, बड़ी उम्र की औरत का प्यार शोरगुल वाला नहीं होता—वह सुकून देता है। यह ऐसा प्यार है जो रिश्ते को नहीं, इंसान को मज़बूत बनाता है। जो समय के साथ कम नहीं, बल्कि और निखरता जाता है।

ऐसा प्यार मिल जाए, तो उम्र मायने नहीं रखती—क्योंकि वहाँ दिल पूरी ईमानदारी से जुड़ता है।

बिलासपुर नगर निगम एवं आसपास के क्षेत्रों के विकास को लेकर मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में उच्चस्तरीय समीक्षा बैठक आयोजित
न्यायधानी बिलासपुर के समग्र विकास और मूलभूत सुविधाओं के विस्तार को लेकर हुई व्यापक चर्चा

रायपुर / शौर्यपथ / मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने आज मंत्रालय महानदी भवन में बिलासपुर नगर निगम एवं आसपास के क्षेत्रों के विकास को लेकर एक उच्चस्तरीय समीक्षा बैठक की। बैठक में बिलासपुर शहर तथा बाह्य क्षेत्रों में संचालित एवं प्रस्तावित विकास कार्यों, मूलभूत सुविधाओं के विस्तार और निर्माणाधीन परियोजनाओं की प्रगति पर विस्तृत चर्चा की गई। मुख्यमंत्री ने कहा कि न्यायधानी बिलासपुर प्रदेश का दूसरा सबसे बड़ा शहर है और बढ़ते शहरीकरण को ध्यान में रखते हुए यहां संतुलित, समावेशी और योजनाबद्ध विकास आवश्यक है।
मुख्यमंत्री साय ने कहा कि छत्तीसगढ़ तेजी से विकास की ओर अग्रसर है और इसी के अनुरूप शहरी अधोसंरचना को मजबूत किया जाएगा। उन्होंने अधिकारियों को निर्देश दिए कि सभी प्रगतिरत योजनाओं को तय समय-सीमा में गुणवत्तापूर्ण ढंग से पूर्ण किया जाए। उन्होंने विशेष रूप से स्वच्छ एवं नियमित पेयजल आपूर्ति सुनिश्चित करने और इससे जुड़ी परियोजनाओं पर गंभीरता से कार्य करने के निर्देश दिए। मुख्यमंत्री ने कहा कि बिलासपुर को उद्योग एवं पर्यटन की दृष्टि से प्राथमिकता में रखते हुए विकास की योजनाएं तैयार की जाएं। श्री साय ने बताया कि पिछले दो वर्षों में सरकार द्वारा निरंतर नए विकास कार्यों को स्वीकृति दी गई है। साथ ही आने वाला बजट भी अत्यंत महत्वपूर्ण होगा और इसके माध्यम से “विकसित छत्तीसगढ़” की संकल्पना भी साकार होगी। उन्होंने कहा कि विभागों के आपसी समन्वय से ही बेहतर परिणाम सामने आएंगे और गांवों के साथ-साथ शहरों के विकास में किसी प्रकार की कमी नहीं आने दी जाएगी।
बैठक में सड़क, पुल-पुलिया, पेयजल, ड्रेनेज, प्रदूषण मुक्त शहर, यातायात व्यवस्था, शिक्षा, स्वास्थ्य, खेल एवं युवा कल्याण, आवास, ई-बस सेवा, हवाई यातायात, ट्रांसपोर्ट नगर, उद्योग एवं व्यापार, पर्यटन तथा अरपा विशेष क्षेत्र विकास परियोजना (अरपा साडा) से जुड़े विषयों पर बिंदुवार मंथन किया गया और विभिन्न विषयों पर सहमति भी बनी। इसमें सिम्स के नए अस्पताल भवन के लिए एएस जारी करने की प्रक्रिया में तेजी लाने तथा सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल को पीपीपी मोड पर संचालित करने का निर्णय लिया गया। बिलासपुर एयरपोर्ट के विस्तार हेतु डिफेंस को राशि हस्तांतरित किए जाने की जानकारी दी गई, जिस पर जनप्रतिनिधियों ने मुख्यमंत्री का आभार व्यक्त किया। साथ ही एयरपोर्ट के अन्य विकास कार्यों एवं नाइट लैंडिंग सुविधा को शीघ्र शुरू करने के निर्देश दिए गए। ट्रांसपोर्ट नगर सिलपहरी के विकास का कार्य सीएसआईडीसी द्वारा किए जाने तथा भूमि हेतु आवेदन प्रस्तुत करने पर सहमति बनी। उसलापुर रेलवे ओवरब्रिज के लिए भूमि अधिग्रहण प्रक्रिया में तेजी लाने और इसे आगामी बजट में शामिल करने का निर्णय लिया गया।
इसके अतिरिक्त बिलासपुर के राजीव गांधी चौक, नेहरू चौक, महामाया चौक (वाय आकार) - रतनपुर मार्ग तक 305 करोड़ की लागत से फ्लाई ओवर ब्रिज निर्माण, पुराना बस स्टैंड चौक पर सीएमडी चौक-इमलीपारा रोड-टैगोर चौक-जगमल चौक तक 115 करोड़ की लागत से फ्लाई ओवर का निर्माण, एफसीआई गोडाउन व्यापार विहार क्षेत्र को सिरगिट्टी-महमंद बायपास से जोड़ने हेतु 320 करोड़ की लागत से तारबहार फोरलेन रेलवे ओवरब्रिज निर्माण के डीपीआर तैयार करने के निर्देश दिए गए। इसी प्रकार शहर के यातायात दबाव को कम करने हेतु 950 करोड़ की लागत से फोरलेन बिलासपुर रिंग रोड निर्माण के लिए एनएचएआई की सहमति के आधार पर लोक निर्माण विभाग द्वारा प्रस्ताव भेजने पर सहमति बनी। खारंग जलाशय में पाराघाट व्यपवर्तन योजना के लिए 328 करोड़ रुपये, नगर निगम क्षेत्र में अरपा नदी के एसटीपी एवं ड्रेनेज कार्यों के लिए 252 करोड़ रुपये तथा बिलासपुर शहर की जलभराव समस्या के समाधान हेतु आपदा प्रबंधन निधि से 150 करोड़ रुपये दिए जाने की सहमति बनी। बिलासपुर में कैंसर अस्पताल के लिए टाटा मेमोरियल अस्पताल से चर्चा करने, कानन पेंडारी के सामने अंडरपास निर्माण, कोनी से बिरकोना–खमतराई–बहतराई मार्ग के निर्माण, 24×7 जल आपूर्ति योजना हेतु डीपीआर तैयार करने तथा अरपा साडा क्षेत्र के विकास के लिए टीएनसीपी एवं जिला अधिकारियों की बैठक कर पूर्व योजनाओं पर चर्चा तथा इसे आगे बढ़ाने का निर्णय लिया गया।
बैठक में केंद्रीय राज्य मंत्री तोखन साहू, उप मुख्यमंत्री अरुण साव, वित्त मंत्री ओ.पी. चौधरी, विधायक अमर अग्रवाल, विधायक सुशांत शुक्ला, विधायक धरमलाल कौशिक, महापौर श्रीमती पूजा विधानी, मुख्य सचिव विकास शील, मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव सुबोध कुमार सिंह तथा विभिन्न विभागों के सचिव एवं वरिष्ठ अधिकारीगण उपस्थित थे।

  नई दिल्ली / शौर्यपथ / प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मंगलवार को कई अहम गतिविधियाँ और बयान चर्चा में रहे। उन्होंने आंध्र प्रदेश स्थित हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (HPCL) की विशाख रिफाइनरी में ‘रेसिड्यू अपग्रेडेशन फैसिलिटी’ (RUF) के सफल कमीशनिंग की सराहना करते हुए इसे भारत की ऊर्जा सुरक्षा और आत्मनिर्भरता की दिशा में एक बड़ा और निर्णायक कदम बताया। प्रधानमंत्री ने कहा कि ऐसी आधुनिक परियोजनाएँ देश की ईंधन जरूरतों को पूरा करने के साथ-साथ आयात पर निर्भरता कम करने में सहायक होंगी।
इसी क्रम में प्रधानमंत्री मोदी ने सार्वजनिक जीवन में संवाद की मर्यादा पर बल देते हुए एक सुभाषितम साझा किया और ‘मधुर वाणी’ यानी सौम्य एवं संयमित भाषा के महत्व को रेखांकित किया। उन्होंने संकेत दिया कि सकारात्मक और शालीन संवाद न केवल व्यक्तिगत संबंधों को सुदृढ़ करता है, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों को भी मजबूती प्रदान करता है।
इस बीच सरकारी गलियारों में आठवें वेतन आयोग के गठन को लेकर भी हलचल तेज रही। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, इससे संबंधित फाइलों पर चर्चा आगे बढ़ी है, जिससे केंद्र सरकार के एक करोड़ से अधिक कर्मचारियों और पेंशनभोगियों को भविष्य में लाभ मिलने की संभावना जताई जा रही है। हालांकि, इस संबंध में अभी कोई औपचारिक घोषणा नहीं की गई है।
प्रधानमंत्री के आगामी कार्यक्रमों को लेकर भी तैयारियाँ शुरू हो गई हैं। जानकारी के अनुसार, प्रधानमंत्री जनवरी के अंत में पश्चिम बंगाल का दौरा कर सकते हैं, वहीं इसी माह असम में काजीरंगा एलिवेटेड कॉरिडोर की आधारशिला रखने का कार्यक्रम भी प्रस्तावित है, जिसे क्षेत्रीय कनेक्टिविटी और वन्यजीव संरक्षण के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

नई दिल्ली / एजेंसी / वेनेजुएला के अपदस्थ राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को 5 जनवरी, 2026 को न्यूयॉर्क की एक संघीय अदालत में पेश किया गया, जिससे अंतरराष्ट्रीय राजनीति में हलचल…

   रायपुर / शौर्यपथ / राज्य शासन ने वित्तीय वर्ष 2026–27 के बजट निर्माण की प्रक्रिया प्रारंभ कर दी है। इसी क्रम में सोमवार को मंत्रालय में गृह विभाग के बजट निर्माण को लेकर उपमुख्यमंत्री एवं गृह मंत्री श्री विजय शर्मा की अध्यक्षता में एक महत्वपूर्ण समीक्षा बैठक आयोजित की गई, जिसमें गृह विभाग से संबद्ध सभी प्रमुख इकाइयों के बजट प्रस्तावों पर विस्तार से विचार-विमर्श किया गया।
बैठक में पुलिस, पुलिस हाउसिंग कॉर्पोरेशन, नगर सेना एवं एसडीआरएफ, जेल एवं सुधारात्मक सेवाएँ, लोक अभियोजन, राज्य न्यायालयिक विज्ञान प्रयोगशाला, सैनिक कल्याण, संपदा संचालनालय, छत्तीसगढ़ स्टेट गैरेज, मेडिको-लीगल संस्थान तथा छत्तीसगढ़ राज्य पुलिस जवाबदेही प्राधिकार सहित विभिन्न विभागों के विभागाध्यक्ष उपस्थित रहे। सभी इकाइयों द्वारा प्रस्तुत अनुदान प्रस्तावों पर बिंदुवार समीक्षा करते हुए आवश्यक सुझाव दिए गए।
उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा ने कहा कि बजट निर्माण में मितव्ययता के साथ-साथ प्राथमिकताओं का संतुलन बनाए रखना आवश्यक है। उन्होंने निर्देश दिए कि अनावश्यक व्ययों पर नियंत्रण रखते हुए कानून-व्यवस्था को मजबूत करने, पुलिस बल की क्षमता वृद्धि, आवास एवं आधारभूत संरचना विकास, आपदा प्रबंधन, फॉरेंसिक सुविधाओं के आधुनिकीकरण, जेल सुधार तथा अभियोजन व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाने के लिए पर्याप्त और समयोचित प्रावधान सुनिश्चित किए जाएँ।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि गृह विभाग के बजट प्रस्ताव पूरी तरह परिणामोन्मुखी होने चाहिए, ताकि उनसे जनसुरक्षा, त्वरित न्याय और सेवा-प्रदाय की गुणवत्ता में प्रत्यक्ष सुधार दिखाई दे। आधुनिक तकनीक के उपयोग, प्रशिक्षण, उपकरणों के उन्नयन और मानव संसाधन विकास पर विशेष ध्यान देने के निर्देश देते हुए उन्होंने कहा कि प्रत्येक विभाग अपने प्रस्तावों में स्पष्ट लक्ष्य, अपेक्षित परिणाम और व्यय-लाभ विश्लेषण को शामिल करे।
बैठक के दौरान उपमुख्यमंत्री शर्मा ने समन्वय और समयबद्धता पर विशेष जोर देते हुए कहा कि गृह विभाग का बजट राज्य की कानून-व्यवस्था, आपदा प्रबंधन क्षमता और न्यायिक प्रणाली को सुदृढ़ करने में अहम भूमिका निभाएगा। सभी संबंधित इकाइयों को निर्देश दिए गए कि वे निर्धारित समय-सीमा के भीतर संशोधित और सुदृढ़ बजट प्रस्ताव प्रस्तुत करें, ताकि बजट को शीघ्र अंतिम रूप दिया जा सके। बैठक में एसीएस मनोज पिंगुआ, डीजीपी अरूण कुमार गौतम, डीजी जेल हिमांशु गुप्ता, सचिव हिमशिखर गुप्ता, सचिव रमेश शर्मा, सचिव सुश्री नेहा चंपावत, अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक प्रदीप गुप्ता, उप पुलिस महानिरीक्षक मनीष शर्मा, संचालक अग्निश्मन चन्द्र मोहन सिंह सहित अन्य वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित रहे।

श्री शैलेश कुमार सिंह

(लेखक भारत सरकार के ग्रामीण विकास विभाग में सचिव हैं)

   शौर्यपथ लेख /  लोकतंत्र में लोकनीति पर सार्वजनिक बहस स्वाभाविक ही नहीं, बल्कि जरूरी भी है। आजीविकाओं (खास तौर से ग्रामीण परिवारों के लिए) को आकार देने वाले कानूनों की कड़ाई से समीक्षा की ही जानी चाहिए। लेकिन इस तरह की समीक्षा नए कानून के प्रावधानों के सावधानी पूर्वक अध्ययन पर आधारित होनी चाहिए। यह पिछले फ्रेमवर्क से निकाले गए अनुमानों या नुकसान के भय पर आधारित नहीं होनी चाहिए। मगर विकसित भारत-गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण) कानून 2025 की ज्यादातर आलोचनाएं इस जाल में फंस जाती हैं। इनमें जल्दबाजी में पिछली नाकामियों का विश्लेषण कर उनका ठीकरा सुधार पर ही फोड़ दिया जाता है।
दो दशक पहले बनाए गए रोजगार गारंटी कानून ने ग्रामीण आय को स्थिर करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और संकट के वक्त सुरक्षा प्रदान की। कोविड की वैश्विक महामारी जैसे संकट के समय में इसके योगदान को स्वीकार किया गया है। लेकिन समय के साथ अनुभव से इसकी दीर्घकालिक ढांचागत कमियां भी उजागर हुई हैं। मजदूरी के भुगतान में बार-बार देरी हो रही थी। प्रक्रियात्मक अवरोधों ने बेरोजगारी भत्ते को अप्रभावी बना दिया था। विभिन्न राज्यों में इस योजना तक पहुंच में काफी अंतर था। प्रशासनिक क्षमता असमान थी तथा फर्जी जॉब कार्ड, उपस्थिति के रजिस्टर में हेरफेर और खराब गुणवत्ता वाली संपदाओं के सृजन से बड़े पैमाने पर धन की बर्बादी हुई। ये छोटी नहीं, बल्कि प्रक्रियात्मक खामियां थीं। इसलिए मुख्य मुद्दा यह नहीं है कि क्या सुधार की जरूरत थी। मुद्दा यह है कि क्या नए फ्रेमवर्क में इन खामियों को सार्थक ढंग से दूर किया गया है।
आम दावा है कि नए कानून में बुनियादी कमियां तो बनीं रहीं और समूची बहस को संक्षिप्ताक्षरों की होड़ में समेट दिया गया। लेकिन हकीकत में इसका उलट ही सच के ज्यादा करीब है। नया कानून डिलीवरी की उन कमियों को दूर करने पर केंद्रित है जिनकी वजह से पिछले फ्रेमवर्क की विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचा था। कमजोर परंपरागत प्रणालियों की जगह सत्यापित कामगार पंजीकरण ने ले ली है। देरी के लिए स्वतः मुआवजे के प्रावधान के साथ मजदूरी भुगतान की वैधानिक समय सीमाएं तय की गई हैं। अयोग्यता के उन प्रक्रियात्मक प्रावधानों को खत्म कर दिया गया है जिनकी वजह से बेरोजगारी भत्ता अप्रभावी बन गया था। स्पष्ट समयसीमा और जवाबदेही के साथ शिकायत निवारण को मजबूत किया गया है। ये दिखावटी बदलाव नहीं हैं। ये उन खामियों को दूर करते हैं जिनसे कामगारों का विश्वास टूटता था।
एक अन्य आलोचना यह है कि रोजगार गारंटी को खत्म कर दिया गया है। इनके अनुसार नई योजना में पुरानी कमजोरियां बनी हुई हैं। इस तरह की आलोचना सही नहीं है। वेतन रोजगार के कानूनी अधिकार को बरकरार और न्यायसंगत रखा गया है। सबसे महत्वपूर्ण बात तो यह कि रोजगार की वैधानिक पात्रता को 100 दिनों से बढ़ाते हुए 125 दिन कर दिया गया है। बदलाव क्रियान्वयन की संरचना में किया गया है। पुराने कानून का मॉडल टुकड़ों में बंटा हुआ और प्रतिक्रियात्मक था। यह अक्सर संकट शुरू हो जाने के बाद ही हरकत में आता था। नए कानून का फ्रेमवर्क योजनाबद्ध और लागू करने योग्य है। इसे पूर्वानुमान के आधार पर कार्य सौंपे जाने के लिए डिजाइन किया गया है। वैधानिक सुधार के जरिए क्रियान्वयन की नाकामियों को दूर किए जाने को दोहराव नहीं, बल्कि संशोधन माना जाना चाहिए।
बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे अधिक गरीब आबादी वाले राज्यों को पहले के फ्रेमवर्क के तहत सबसे कम लाभ मिलने के सम्बन्ध में जो चिंताएं जताई गईं हैं, वे सही हैं लेकिन यह बात सुधार की जरूरत को और मजबूत करती है, न कि उसे कमजोर करती है। इन राज्यों में मनरेगा का लाभ कम पहुंचा यह योजना की एक बड़ी विफलता थी। बिना किसी ठोस योजना के सिर्फ मांग के आधार पर चलने वाला मॉडल उन राज्यों के पक्ष में रहा जिनकी प्रशासनिक क्षमता बेहतर थी, जबकि अधिक जरूरत और पलायन वाले राज्य पिछड़ गए। नया फ्रेमवर्क सीधे तौर पर इस असंतुलन को दूर करता है, यह रोजगार पैदा करने के काम को 'विकसित ग्राम पंचायत योजनाओं' से जोड़ता है, जहाँ स्थानीय मांग और कामों की पहले से मंजूरी को सुनिश्चित फंडिंग के साथ मिलाया जाता है। असमान वितरण ही सुधार की ज़रूरत की असली वजह थी; पुरानी व्यवस्था को बनाए रखने का मतलब केवल मौजूदा असमानताओं को और बढ़ाना होता। इसके अलावा, निष्पक्ष मानकों पर आधारित आवंटन से राज्यों के बीच संसाधनों के बंटवारे में अधिक पारदर्शिता और निष्पक्षता आएगी।
आलोचना का एक पक्ष यह भी है कि 125 दिनों का रोजगार देने का विस्तार केवल दिखावा है, क्योंकि अब राज्यों को भी खर्च का एक हिस्सा उठाना होगा। यह तर्क पहले के उदाहरणों और सुरक्षा उपायों दोनों को नज़रअंदाज़ करता है। केंद्र और राज्यों के बीच खर्च बांटने का यह तरीका केंद्र-प्रायोजित योजनाओं के पुराने नियमों के अनुसार ही रखा गया है। वहीं, उत्तर-पूर्वी और हिमालयी राज्यों तथा जम्मू-कश्मीर के लिए 90:10 के अनुपात (जहाँ केंद्र 90 और राज्य 10 प्रतिशत खर्च उठाते हैं) को जारी रखा गया है। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि योजना बनाकर काम करने से पैसों का बेहतर इस्तेमाल होता है, जिससे अनिश्चितता खत्म होती है और योजना को लागू करने में कम रुकावटें आती हैं। अधिकारों का दायरा बढ़ाना और साझा जिम्मेदारी केंद्र और राज्य सरकारों के बीच तालमेल को दर्शाता है, न कि कमज़ोरी को। ग्रामीण सड़कों से लेकर, आवास और पीने के पानी जैसे कई सफल राष्ट्रीय कार्यक्रम भी इसी तरह की व्यवस्था के तहत काम करते हैं।
आर्थिक रूप से कमज़ोर राज्यों को अक्सर नए फ्रेमवर्क का संभावित शिकार बताया जाता है। लेकिन सिर्फ़ आर्थिक कमज़ोरी ही राज्यों के बाहर होने का कारण नहीं है। पिछली व्यवस्था के तहत, राज्यों का इस योजना से बाहर होना अक्सर खराब प्लानिंग, सरकारी मशीनरी की कम क्षमता और काम करने के तरीके में आने वाली रुकावटों की वजह से था। नया कानून पहले से की गई तैयारी, जनता की भागीदारी और प्रौद्योगिकी के जरिये जोखिमों को कम करने की कोशिश करता है। नयी व्यवस्था में एक बार योजना मंजूर होने के बाद, काम देने से मना करने की अधिकारियों की शक्ति को कम किया गया है और पारदर्शिता तथा जवाबदेही को मजबूत किया गया है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि प्रशासनिक खर्च को 6% से बढ़ाकर 9% कर दिया गया है जिससे राज्य अपनी जमीनी क्षमता को कार्यक्रम की विशालता के अनुरूप मजबूत बना सकें। किसी राज्य विशेष की अपनी चुनौतियाँ उस राष्ट्रीय सुधार को गलत साबित नहीं करतीं, इसका उद्देश्य पूरी व्यवस्था की कमजोरियों को ठीक करना है।
आलोचक यह भी कहते हैं कि पहले के फ्रेमवर्क के तहत कई ज़रूरतमंद राज्यों में रोज़गार के सबसे कम दिन मिले, और बहुत कम परिवार ही कानूनी सीमा तक पहुँच पाए। यह बात सुधार के तर्क को कमजोर नहीं करती, बल्कि उसे और भी मजबूत बनाती है। नया फ्रेमवर्क, दर्ज की गई मांग को मंजूर किए गए कामों, तय समय सीमा में पूरा करने और बेरोजगारी भत्ते को सुनिश्चित करेगा। इसका मकसद सीधा है: कानूनी हक को असल और भरोसेमंद रोज़गार के दिनों में बदलना, खासकर उन इलाकों में जहाँ पहले सुविधाओं की कमी थी।
पुरानी 'मांग-आधारित' योजना और नई 'आपूर्ति-आधारित' योजना के बीच के अंतर को बहुत बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया है। व्यवहार में, यह अंतर इतना बड़ा नहीं है। नया फ्रेमवर्क डिमांड को कम नहीं करता; बल्कि यह योजना के माध्यम से इसे एक संस्थागत रूप देता है, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि मांगी गई मांग को पूरा भी किया जा सके। संसाधनों के भरोसे के साथ की गई एक नियोजित मांग, उस सैद्धांतिक अधिकार से कहीं ज्यादा सशक्त है जो कभी पूरा ही नहीं हो पाता।
रोजगार गारंटी का अधिकार-आधारित स्वरूप, कमजोर होने के बजाय और मजबूत हुआ है। काम के दिनों को बढ़ाकर 125 दिन करना, मजदूरी भुगतान के लिए कानूनी रूप से लागू समय-सीमा, देरी होने पर अपने-आप मिलने वाला मुआवजा, हक छीनने वाली शर्तों को हटाना, और शिकायत निवारण के लिए अपील की सुविधा—ये सब मिलकर 'काम के अधिकार' की व्यावहारिक उपयोगिता को बढ़ाते हैं। अधिकार सबसे ज़्यादा तब मायने रखते हैं जब उनका प्रशासनिक बाधाओं के बिना इस्तेमाल किया जा सके।
यहां तक ​​कि आलोचक भी मानते हैं कि योजना को लागू करने की विफलताएं—जैसे भ्रष्टाचार, फर्जी जॉब कार्ड, उपस्थिति रजिस्टर में हेरफेर और खराब गुणवत्ता वाली संपदाओं का निर्माण, पुराने फ्रेमवर्क की सबसे बड़ी कमजोरियां थीं। यह सुधार इन्हीं विफलताओं को दूर करने की कोशिश करता है, जिसके लिए सत्यापित लाभार्थी प्रणाली, मजबूत ऑडिट और अन्य योजनाओं के साथ मिलकर संपदा निर्माण का सहारा लिया गया है। पिछली विफलताओं को स्वीकार करना ही इस सुधार का ठोस आधार है, न कि इसके खिलाफ कोई तर्क।
योजना को कुछ समय के लिए रोकने को लेकर जो चिंताएं हैं, उन्हें सही संदर्भ में देखा जाना चाहिए। यह श्रम-बाजार के लिए एक सुरक्षा कवच है जिसे इसलिए बनाया गया है ताकि खेती के सबसे व्यस्त सीजन के दौरान श्रमिकों की कमी न हो और बाजार का संतुलन न बिगड़े। यह प्रावधान 125 दिनों के कानूनी अधिकार को कम नहीं करता है। यह प्रावधान सोची-समझी आर्थिक समझदारी को दिखाता है और उत्पादक कृषि रोज़गार को कमज़ोर किए बिना मजदूरों की आय की रक्षा करता है।
कुल मिलाकर, ज़्यादातर की जा रही आलोचनाएं पुराने फ्रेमवर्क की कमियों को बताती हैं और फिर उन कमियों का कारण खुद सुधारों को बताती हैं। विकसित भारत–रोज़गार और आजीविका मिशन (ग्रामीण) अधिनियम रोज़गार गारंटी को खत्म नहीं करता है बल्कि यह इसे और मजबूत और व्यापक बनाता है। खासकर उन कमज़ोरियों पर ध्यान देता है जहाँ ज़्यादा ज़रूरत वाले इलाकों और कमज़ोर मज़दूरों के बीच योजना के प्रभाव को सीमित कर दिया था। यहाँ सुधार का अर्थ सामाजिक सुरक्षा से पीछे हटना नहीं है; बल्कि यह काम के वादे को वास्तविक, भरोसेमंद और गरिमापूर्ण बनाने का एक प्रयास है।

दिव्यांग सोनी की ग्राउंड रिपोर्ट बिलासपुर। छत्तीसगढ़ की न्यायधानी बिलासपुर में मंगलवार दोपहर उस समय अफरा-तफरी मच गई, जब मोपका चौकी क्षेत्र के खुटिपारा स्थित 220 केवी विद्युत सब-स्टेशन में…

  रायपुर / शौर्यपथ / सिंगल यूज प्लास्टिक के दुष्प्रभावों पर प्रभावी नियंत्रण और पर्यावरण संरक्षण को मजबूती देने के उद्देश्य से नगरीय प्रशासन एवं विकास विभाग के अंतर्गत राज्य शहरी विकास अभिकरण (SUDA) ने राज्य के सभी नगरीय निकायों को सख्त परिपत्र जारी किया है। परिपत्र में केंद्र एवं राज्य सरकार द्वारा समय-समय पर जारी दिशा-निर्देशों का कड़ाई से पालन सुनिश्चित करने के स्पष्ट निर्देश दिए गए हैं। इसके साथ ही सभी नगरीय निकायों को सिंगल यूज प्लास्टिक पर रोक लगाने को लेकर की गई कार्यवाहियों की मासिक प्रगति रिपोर्ट स्वच्छ भारत मिशन (शहरी) 2.0 के मिशन संचालक को अनिवार्य रूप से भेजने के निर्देश भी दिए गए हैं।

सुडा द्वारा नगर निगमों के आयुक्तों तथा नगर पालिकाओं एवं नगर पंचायतों के मुख्य नगर पालिका अधिकारियों को भेजे गए परिपत्र में कहा गया है कि स्वच्छता दीदियों के माध्यम से डोर-टू-डोर अभियान चलाकर नागरिकों को सिंगल यूज प्लास्टिक के विकल्पों के प्रति जागरूक किया जाए। इसके साथ ही व्यावसायिक क्षेत्रों, साप्ताहिक बाजारों एवं अन्य सार्वजनिक स्थलों पर व्यापक जन-जागरूकता अभियान संचालित करने और प्रतिबंध का उल्लंघन करने वालों पर आर्थिक दंड की व्यवस्था को प्रभावी रूप से लागू करने के निर्देश दिए गए हैं।

परिपत्र में यह भी कहा गया है कि सिंगल यूज प्लास्टिक पर पूर्ण प्रतिबंध सुनिश्चित करने के लिए गैर-सरकारी संगठनों (NGOs), रहवासी कल्याण संघों (RWAs) एवं स्वसहायता समूहों की सहभागिता से घर-घर जागरूकता अभियान चलाया जाए। इसके अलावा शासकीय एवं अर्धशासकीय कार्यालयों, शैक्षणिक संस्थानों और सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों में कर्मचारियों एवं विद्यार्थियों को जोड़ते हुए जागरूकता कार्यक्रम आयोजित करने के निर्देश दिए गए हैं।

सुडा ने शहरों के तीर्थ स्थलों, पर्यटन स्थलों, प्रमुख चौक-चौराहों, बस स्टैंड, रेलवे स्टेशन, निस्तारी एवं गैर-निस्तारी तालाबों जैसे सार्वजनिक स्थलों पर विशेष अभियान चलाने पर भी जोर दिया है। इन अभियानों में जन-प्रतिनिधियों, धार्मिक गुरुओं, गणमान्य नागरिकों, स्वच्छताग्राहियों, ब्रांड एम्बेसडर्स, एन.जी.ओ. और स्वसहायता समूहों की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए हैं।

परिपत्र के माध्यम से नगरीय निकायों को यह भी निर्देशित किया गया है कि सिंगल यूज प्लास्टिक पर प्रतिबंध को लेकर आयोजित सभी कार्यक्रमों और अभियानों का लोकल एवं क्षेत्रीय मीडिया तथा नगरीय निकायों के सोशल मीडिया हैंडल के माध्यम से व्यापक प्रचार-प्रसार किया जाए। साथ ही विद्यालय स्तर पर चित्रकला प्रतियोगिता, नुक्कड़ नाटक और वेस्ट-टू-आर्ट प्रतियोगिताओं के आयोजन के जरिए बच्चों और युवाओं को भी इस अभियान से जोड़ा जाए।

नगरीय प्रशासन विभाग का यह कदम न केवल सिंगल यूज प्लास्टिक पर प्रभावी रोक लगाने की दिशा में अहम माना जा रहा है, बल्कि इससे स्वच्छ, हरित और पर्यावरण-संवेदनशील शहरों के निर्माण को भी नई दिशा मिलने की उम्मीद जताई जा रही है।

   खैरागढ़ / शौर्यपथ। छत्तीसगढ़ के खैरागढ़ जिले से मंगलवार को एक गंभीर और चिंताजनक मामला सामने आया, जिसने सरकारी स्कूलों में बच्चों की सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं। करमतरा स्थित शासकीय प्राथमिक विद्यालय में सुबह की प्रार्थना सभा के दौरान अचानक 17 बच्चे एक-एक कर बीमार होकर बेहोश होने लगे। बच्चों को चक्कर आने लगे और देखते ही देखते वे जमीन पर गिरने लगे, जिससे स्कूल परिसर में अफरा-तफरी मच गई।
प्रारंभिक जानकारी और स्थानीय स्तर पर सामने आई आशंका के अनुसार, स्कूल खुलने से पहले कुछ बच्चों ने परिसर अथवा आसपास उगे रतनजोत के जहरीले फल खा लिए थे, जिसका असर प्रार्थना सभा के दौरान दिखाई दिया। बच्चों की हालत बिगड़ते देख शिक्षकों और ग्रामीणों की मदद से सभी प्रभावित बच्चों को तत्काल सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र जालबांधा ले जाया गया, जहां चिकित्सकों की टीम द्वारा उनका उपचार किया जा रहा है। डॉक्टरों के मुताबिक, चार बच्चों पर जहरीले पदार्थ का असर अधिक पाया गया है, जबकि शेष बच्चों की हालत फिलहाल स्थिर बताई जा रही है। एक बच्चे की स्थिति गंभीर होने के कारण उसे खैरागढ़ रेफर किया गया है।
इस पूरे मामले पर शिक्षा विभाग की प्रतिक्रिया भी सवालों के घेरे में है। जिला शिक्षा अधिकारी लालजी द्विवेदी ने बताया कि उन्हें घटना की जानकारी मीडिया के माध्यम से मिली है और वे पूरे मामले की जानकारी एकत्र कर रहे हैं। वहीं, स्थानीय लोगों में इस घटना को लेकर गहरा आक्रोश है। ग्रामीणों का कहना है कि स्कूल परिसर और आसपास जहरीले पौधों की मौजूदगी स्पष्ट लापरवाही को दर्शाती है। उन्होंने स्कूल परिसर से सभी जहरीले पौधों को तत्काल हटाने, जिम्मेदार अधिकारियों व कर्मचारियों पर कार्रवाई करने तथा पूरे मामले की निष्पक्ष और उच्चस्तरीय जांच की मांग की है।
इस घटना ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि विद्यालय परिसर की सुरक्षा की प्राथमिक जिम्मेदारी स्कूल प्रबंधन, शिक्षा विभाग और स्थानीय प्रशासन की होती है। नियमित निरीक्षण, साफ-सफाई, खतरनाक पौधों की पहचान और उन्हें हटाने की जिम्मेदारी संबंधित प्रधानपाठक, संकुल समन्वयक, शिक्षा विभाग के अधिकारियों और ग्राम पंचायत की होनी चाहिए थी, जो इस मामले में गंभीर रूप से नजरअंदाज होती दिख रही है।
इस पूरे प्रकरण को देखते हुए अपेक्षा की जा रही है कि स्कूल शिक्षा मंत्री इस मामले को गंभीरता से लेते हुए स्पष्ट और कड़े निर्देश जारी करें। स्कूल शिक्षा मंत्री को चाहिए कि वे
— शिक्षा विभाग को सभी स्कूल परिसरों का तत्काल सुरक्षा ऑडिट कराने के निर्देश दें,
— स्वास्थ्य विभाग को ऐसे मामलों के लिए स्कूलों में तत्काल चिकित्सा प्रतिक्रिया प्रणाली मजबूत करने को कहें,
— पंचायत एवं नगरीय प्रशासन विभाग को स्कूलों के आसपास मौजूद जहरीले पौधों और खतरनाक वनस्पतियों को हटाने की जिम्मेदारी सौंपें,
— तथा लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों और कर्मचारियों पर अनुशासनात्मक कार्रवाई सुनिश्चित करें।

यह घटना केवल एक स्कूल तक सीमित मामला नहीं, बल्कि प्रदेश के सभी सरकारी स्कूलों में बच्चों की सुरक्षा को लेकर चेतावनी है। समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो भविष्य में ऐसे हादसे और भी गंभीर रूप ले सकते हैं।

इस रफ्तार से नीयत समय में सभी किसान धान नहीं बेच पायेंगे - दीपक बैज
रायपुर । शौर्यपथ
धान खरीदी की सुस्त व्यवस्था बता रही सरकार किसानों का पूरा धान नहीं खरीदना चाह रही। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज ने कहा कि 150 लाख मीट्रिक टन धान इस वर्ष खरीदने का लक्ष्य है, लेकिन जिस धीमी रफ्तार से खरीदी हो रही है। नियत समय में लक्ष्य की पूर्ति नहीं हो पायेगी। सरकार का इरादा ठीक नहीं लग रहा है। प्रदेश के सभी 2739 केंद्रों में खरीदी की रफ्तार बहुत धीमी है, कही जगह की कमी है तो कहीं टोकन की दिक्कत किसान भटक रहे है। लिमिट भी एक बड़ी बाधा बनी हुई है।
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज ने कहा कि धान खरीदी के 50 दिन बाद भी किसान एग्री स्टेक पोर्टल की खामियों के चलते टोकन नही मिलने, रकबा कम होने, धान खरीदी केंद्रों में खरीदी लिमिट नही बढ़ाये जाने एवं खरीदी केंद्रों से धान का उठाव नही होने से बेहद परेशान है, धान खरीद केंद्रों में जाम की स्थिति है, खरीदी बाधित हो रही है। किसान आक्रोशित है, आंदोलन कर रहे है लेकिन उनकी सुनवाई नहीं हो रही है। कांकेर जिले के ग्राम बारकोट के किसान 150 किलोमीटर चल कर कलेक्टर से मिले लेकिन उनकी समस्या का कोई संतोषजनक हल नहीं हुआ। लगभग हर गांव में यही समस्या है। ये भाजपा सरकार के द्वारा जानबूझकर रचा गया षड्यंत्र है ताकि किसान धान बेचने से वंचित रहे और सरकार धान बेचने से वंचित किसानों को जिम्मेदार ठहरा कर अपनी जिम्मेदारी से बच सके।
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज ने कहा कि 50 दिन में जिस प्रकार से धान खरीदी की गई है इससे स्पष्ट है कि तय तारीख में प्रदेश के 27 लाख से अधिक किसान धान नहीं बेच पाएंगे। इससे किसानों को आर्थिक नुकसान होगा किसान कर्ज में आ जाएंगे और भाजपा की सरकार किसानों को आर्थिक रूप से तंगहाल करना चाहती है भाजपा सरकार चाहती है की किसान हताश और परेशान होकर अपनी उपज को औने पौने दाम पर बिचौलिया के पास बेच दे ताकि भाजपा सरकार किसानों को 3100 रु क्विंटल की दर से भुगतान करने से बचे।धान खरीदी को लेकर जो आंकड़े जारी किए जा रहे है वो संदेहास्पद है।

प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज ने कहा कि सरकार धान खरीदी केदो में ही ऑफलाइन टोकन किसानों को दे किसानों के पूरे रकबा की धान खरीदी की जाए धान खरीदी की लिमिट बढ़ाई जाए और कस्टम मिलिंग के लिए धान का उठाव तत्काल किया जाये, ताकि सोसायटियों में जगह हो और धान खरीदी सुचारू हो सके।

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