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May 01, 2026
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शौर्यपथ

शौर्यपथ

आयुष्मान कार्ड से लाखों का मुफ्त इलाज, पुनर्वासित युवाओं में दिखा उत्साह

रायपुर / शौर्यपथ / मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के विशेष पहल पर माओवाद छोड़कर समाज की मुख्यधारा में लौटे पुनर्वासित युवाओं को शासन की विभिन्न योजनाओं का व्यापक लाभ मिल रहा है। इन युवाओं को राशन कार्ड, आधार कार्ड जैसे महत्वपूर्ण दस्तावेज़ तेजी से उपलब्ध कराए जा रहे हैं । इसी तरह प्रशासन द्वारा इन युवाओं को आयुष्मान कार्ड बनाकर लाखों रुपये तक मुफ्त इलाज की सुविधा दी जा रही है ।इन प्रयासों से युवाओं में आत्मविश्वास बढ़ा है और उन्हें आत्मनिर्भर व सम्मानजनक जीवन की दिशा में आगे बढऩे का अवसर मिल रहा है ।

दस्तावेजों से लेकर स्वास्थ्य तक पूरा सहयोग

पुनर्वासित युवाओं को सशक्त बनाने के उद्देश्य से उन्हें राशन कार्ड, आधार कार्ड सहित अन्य आवश्यक दस्तावेज सुगमता से उपलब्ध कराए जा रहे हैं। इसी क्रम में बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं से जोडऩे के लिए आयुष्मान कार्ड भी बनाए जा रहे हैं, जिससे वे आर्थिक चिंता के बिना इलाज करा सकें।

आयुष्मान योजनाओं से व्यापक स्वास्थ्य सुरक्षा

जिला चिकित्सालय बीजापुर में आयोजित कार्यक्रम में पुनर्वासित युवाओं को आयुष्मान कार्ड प्रदान किए गए। इस कार्ड के माध्यम से विभिन्न स्वास्थ्य योजनाओं के तहत उन्हें बड़ा लाभ मिलेगा—
प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना एवं शहीद वीर नारायण सिंह आयुष्मान स्वास्थ्य योजना के अंतर्गत
बीपीएल परिवारों को 5 लाख रुपये तक का निशुल्क इलाज
एपीएल परिवारों को 50 हजार रुपये तक का इलाज लाभ
मुख्यमंत्री विशेष स्वास्थ्य सहायता योजना के अंतर्गत
दुर्लभ एवं गंभीर बीमारियों के लिए 25 लाख रुपये तक की मुफ्त चिकित्सा सहायता
साथ ही लाभार्थियों को योजनाओं के उपयोग और प्रक्रिया की विस्तृत जानकारी भी दी गई।

युवाओं में दिखा नया आत्मविश्वास

आयुष्मान कार्ड प्राप्त करने के बाद पुनर्वासित युवाओं में उत्साह और आत्मविश्वास साफ नजर आया। उन्होंने शासन और प्रशासन के इस प्रयास की सराहना करते हुए बेहतर भविष्य की दिशा में आगे बढऩे की इच्छा जताई।

समावेशी विकास की ओर मजबूत कदम

यह पहल न केवल पुनर्वासित युवाओं को स्वास्थ्य सुरक्षा प्रदान कर रही है, बल्कि उन्हें समाज में सम्मानजनक जीवन जीने के लिए भी प्रेरित कर रही है। प्रशासन का लक्ष्य है कि ऐसे सभी युवाओं को योजनाओं से जोड़कर उन्हें आत्मनिर्भर बनाया जाए।

काठमांडू, ।
नेपाल की राजनीति में बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। गृह मंत्री सुदन गुरुंग ने वित्तीय अनियमितताओं और विवादित कारोबारी संबंधों के गंभीर आरोपों के बीच 22 अप्रैल को अपने पद से इस्तीफा दे दिया। हैरानी की बात यह है कि उनकी नियुक्ति को महज 26 दिन ही हुए थे, जिससे यह मामला नई सरकार के लिए एक बड़ा राजनीतिक झटका बन गया है।

क्या है पूरा विवाद?

गुरुंग पर आरोप है कि उन्होंने मनी लॉन्ड्रिंग जांच के घेरे में चल रहे व्यवसायी दीपक कुमार भट्ट की कंपनियों—लिबर्टी माइक्रो लाइफ इंश्योरेंस और स्टार माइक्रो इंश्योरेंस—में निवेश किया।
बताया गया कि उन्होंने दोनों कंपनियों में 25-25 हजार ‘फाउंडर शेयर’ खरीदे, जो सामान्य निवेश की तुलना में अधिक संवेदनशील माने जाते हैं।

जांच में सामने आए लेनदेन ने मामले को और गंभीर बना दिया। रिपोर्ट्स के अनुसार:

  • मई 2023 में उनके खाते में अलग-अलग व्यक्तियों द्वारा बड़ी रकम जमा कराई गई
  • चांग अग्रवाल ने ₹22.5 लाख और विजय कुमार श्रेष्ठ ने ₹37.5 लाख जमा किए
  • इसके अगले ही दिन इन पैसों का इस्तेमाल शेयर खरीद में किया गया

इस पैटर्न ने संभावित बेनामी निवेश और फंड रूटिंग की आशंकाओं को जन्म दिया।

संपत्ति छिपाने का भी आरोप

आलोचकों का कहना है कि गुरुंग ने इन ‘अनलिस्टेड’ फाउंडर शेयरों को अपनी संपत्ति घोषणा में स्पष्ट रूप से अलग नहीं दिखाया, बल्कि सामान्य प्रतिभूतियों के साथ जोड़ दिया।
नेपाल के कानून के तहत मंत्रियों के लिए पारदर्शिता अनिवार्य है, ऐसे में यह मुद्दा राजनीतिक रूप से संवेदनशील बन गया।

गुरुंग का बचाव

सुदन गुरुंग ने सभी आरोपों को खारिज करते हुए कहा:

  • शेयर उन्होंने वैध ऋण (Loan) के माध्यम से खरीदे
  • उनकी घोषित संपत्ति ₹2 करोड़ से अधिक है
  • किसी भी प्रकार की जानकारी छिपाने का उनका कोई इरादा नहीं था

इस्तीफे की वजह

गुरुंग ने अपने इस्तीफे में कहा कि:

“मैं निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करने और किसी भी तरह के हितों के टकराव से बचने के लिए पद छोड़ रहा हूं।”

उनके इस्तीफे के बाद प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह (बालेन शाह) ने गृह मंत्रालय का अतिरिक्त प्रभार खुद संभाल लिया है।

राजनीतिक असर: ‘एंटी-करप्शन’ छवि पर सवाल

यह मामला इसलिए भी अहम है क्योंकि:

  • सुदन गुरुंग ‘Gen Z’ आंदोलन के प्रमुख चेहरे थे
  • यह आंदोलन भ्रष्टाचार के खिलाफ जन समर्थन के साथ उभरा था
  • बालेन शाह की सरकार ने साफ-सुथरे शासन का वादा किया था

ऐसे में सरकार बनने के कुछ ही हफ्तों में इतना बड़ा विवाद सामने आना उसकी विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर रहा है।

विपक्ष का हमला और आगे की राह

नेपाल के विपक्षी दलों ने इस मुद्दे को लेकर सरकार पर तीखा हमला बोला है और उच्च स्तरीय स्वतंत्र जांच की मांग की है।
विशेषज्ञों का मानना है कि:

  • अगर जांच पारदर्शी और निष्पक्ष नहीं हुई, तो यह मुद्दा सरकार के लिए लंबी राजनीतिक परेशानी बन सकता है
  • वहीं, कड़ी और निष्पक्ष कार्रवाई सरकार की साख बचाने का एकमात्र रास्ता हो सकती है

निष्कर्ष:
सुदन गुरुंग का इस्तीफा केवल एक मंत्री का पद छोड़ना नहीं, बल्कि उस राजनीतिक वादे की परीक्षा है, जिसमें भ्रष्टाचार-मुक्त शासन का दावा किया गया था। अब सबकी नजर इस बात पर है कि जांच कितनी निष्पक्ष होती है और क्या बालेन शाह सरकार अपनी साख को बचा पाती है या नहीं।

शौर्यपथ लेख।

मुंबई की फिजाओं में जब अंडरवर्ल्ड और गैंगवार का शोर था, उस दौर में एक शख्स ऐसा भी था जिसकी ताकत न बंदूक थी और न बम। उसकी ताकत थी—जुबान और भरोसा। कराची से खाली हाथ आए एक शरणार्थी रतन खत्री ने कैसे 'मटका' जैसे अवैध धंधे को एक कॉर्पोरेट साम्राज्य की तरह खड़ा किया, यह कहानी किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं है।

?️ कराची से मुंबई: एक बेनाम शरणार्थी का उदय

विभाजन की आग के बीच रतन खत्री मुंबई आए थे। छोटी-मोटी नौकरियों के बाद उन्होंने सट्टे की दुनिया में कदम रखा। लेकिन उन्होंने इस खेल को केवल 'किस्मत' तक सीमित नहीं रखा, बल्कि इसे एक सिस्टम बना दिया।

⚖️ खत्री का 'पारदर्शिता' मॉडल: अंधेरे में उजाले का खेल

आमतौर पर जुए के धंधे में धोखाधड़ी आम बात थी, लेकिन खत्री ने इसे बदल दिया।

सार्वजनिक ड्रा: उन्होंने मटके से ताश के पत्तों की पर्चियां निकालने का खेल सबके सामने शुरू किया।

अटूट विश्वास: खत्री का मानना था कि अगर दांव लगाने वाले को खेल पर यकीन होगा, तभी धंधा बढ़ेगा।

नकद भुगतान: उस दौर में जब 1 करोड़ की रकम एक सपना थी, खत्री का रोजाना का टर्नओवर करोड़ों में था और जीतने वाले को उसकी रकम तुरंत मिल जाती थी।

? बॉलीवुड और 'रंगीला' रसूख

रतन खत्री का रसूख केवल सट्टा बाजार तक सीमित नहीं था, बल्कि फिल्मी गलियारों में भी उनकी तूती बोलती थी।

फिल्म प्रेरणा: 1975 की मशहूर फिल्म 'धर्मात्मा' में प्रेम नाथ का 'मटका किंग' वाला किरदार पूरी तरह खत्री से प्रेरित था।

प्रोड्यूसर की भूमिका: उन्होंने ऋषि कपूर की फिल्म 'रंगीला रतन' को प्रोड्यूस किया और उसमें एक छोटी सी भूमिका (कैमियो) भी निभाई।

? साम्राज्य का पतन और 'मटका' का अंत

हर बड़े साम्राज्य का अंत निश्चित होता है। खत्री के साथ भी यही हुआ:

इमरजेंसी का प्रहार: 1975 में आपातकाल के दौरान उन्हें 19 महीने जेल में बिताने पड़े।

गैंगवार और हिंसा: सट्टा बाजार में दाऊद और अन्य गिरोहों की एंट्री से खून-खराबा बढ़ने लगा।

स्वैच्छिक विदाई: अपनी 'साफ-सुथरी' छवि और सिद्धांतों के पक्के खत्री ने इस हिंसा से खुद को अलग कर लिया और 1990 के दशक तक इस धंधे को अलविदा कह दिया।

"रतन खत्री का इतिहास यह सिखाता है कि धंधा चाहे कानूनी हो या गैरकानूनी, अगर नींव 'भरोसे' पर टिकी है, तो आप एक बेताज बादशाह बन सकते हैं।"

? क्या आप इस रोमांच को परदे पर देखना चाहते हैं?

अगर आप रतन खत्री के इस रहस्यमयी और रोमांचक जीवन को और करीब से समझना चाहते हैं, तो नागराज मंजुले की नई वेब सीरीज 'मटका किंग' का इंतजार करें। इसमें वर्सेटाइल एक्टर विजय वर्मा खत्री के किरदार में जान फूंकते नजर आएंगे।

क्या आपको लगता है कि आज के डिजिटल दौर में रतन खत्री जैसा 'भरोसा' संभव है? अपनी राय हमें जरूर बताएं! ?️?

नई दिल्ली/रायपुर: छत्तीसगढ़ की सियासत के सबसे चर्चित हत्याकांडों में से एक, रामअवतार जग्गी मर्डर केस में जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ (J) के अध्यक्ष अमित जोगी को देश की सर्वोच्च अदालत से बड़ी राहत मिली है। गुरुवार, 23 अप्रैल 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के उस फैसले पर अंतरिम रोक लगा दी है, जिसमें जोगी को उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के प्रमुख बिंदु

सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय पीठ—जिसमें जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस विजय बिश्नोई शामिल हैं—ने मामले की गंभीरता को देखते हुए निम्नलिखित निर्देश जारी किए:

जेल जाने पर रोक: हाई कोर्ट द्वारा दिए गए 3 सप्ताह के भीतर सरेंडर करने के आदेश पर फिलहाल रोक लगा दी गई है। जोगी को अभी जेल नहीं जाना होगा।

दोषसिद्धि (Conviction) पर स्टे: कोर्ट ने अमित जोगी की सजा के साथ-साथ उनकी दोषसिद्धि पर भी रोक लगा दी है।

CBI को नोटिस: शीर्ष अदालत ने इस मामले में केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) को नोटिस जारी कर उनका पक्ष रखने को कहा है।

दिग्गज वकीलों की दलीलें आई काम

अमित जोगी की ओर से देश के तीन दिग्गज वकीलों—कपिल सिब्बल, मुकुल रोहतगी और विवेक तन्खा— ने पैरवी की। वकीलों ने हाई कोर्ट के फैसले की कानूनी बारीकियों और पूर्व में निचली अदालत से मिली रिहाई के तथ्यों को मजबूती से रखा, जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए राहत प्रदान की।

क्या है पूरा मामला?

यह विवाद 23 साल पुराना है, जिसने छत्तीसगढ़ की राजनीति को हिलाकर रख दिया था:

जून 2003: रायपुर में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) के नेता रामअवतार जग्गी की सरेराह गोली मारकर हत्या कर दी गई थी।

साल 2007: निचली अदालत ने साक्ष्यों के आधार पर अमित जोगी को इस मामले में बरी कर दिया था।

अप्रैल 2026: करीब 19 साल बाद छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को पलटते हुए अमित जोगी को हत्या की साजिश रचने का दोषी माना और आजीवन कारावास की सजा सुनाई।

निष्कर्ष: सुप्रीम कोर्ट के इस 'स्टे ऑर्डर' के बाद अमित जोगी के लिए कानूनी और राजनीतिक गलियारों में एक नई उम्मीद जगी है। फिलहाल यह मामला अब देश की सर्वोच्च अदालत के अधीन है, जहाँ इसकी विस्तृत सुनवाई होगी।

दुर्ग। शौर्यपथ । शहर के सबसे व्यस्त और प्रमुख चौराहों में शुमार मालवीय नगर चौक अब दुर्घटनाओं का केंद्र बनता जा रहा है। हाल ही में हुई एक बड़ी दुर्घटना के बाद भाजपा नेता विजय जलकारे ने दुर्ग की ट्रैफिक व्यवस्था और चौक के निर्माण में हुई तकनीकी खामियों पर गंभीर सवाल उठाए हैं।

बताया गया कि बुधवार, 22 जून की सुबह करीब 5 बजे राजनांदगांव से भिलाई की ओर जा रही फलों से भरी मिनी ट्रक (CG07CZ9808) के सामने अचानक एक कार आ गई, जो भिलाई से दुर्ग रेलवे स्टेशन की ओर मुड़ रही थी। कार को बचाने के प्रयास में ट्रक चालक नियंत्रण खो बैठा और वाहन पास स्थित एन.सी. नाहर के घर की बाहरी दीवार से जा टकराया।

इस हादसे में किसी की जान नहीं गई, लेकिन दीवार को भारी नुकसान पहुंचा और एक बड़ा हादसा टल गया।

⚠️ “तकनीकी त्रुटियों ने बनाया खतरनाक”

भाजपा नेता विजय जलकारे का कहना है कि मालवीय नगर चौक का नया निर्माण ही इसकी सबसे बड़ी समस्या बन गया है।

उनके अनुसार, चौक की डिजाइन ऐसी है कि भिलाई से आने वाले वाहन जब रेलवे स्टेशन की ओर मुड़ते हैं, तो सामने से आ रहे वाहन स्पष्ट रूप से दिखाई नहीं देते, जिससे टक्कर की आशंका बढ़ जाती है।

? सिग्नल बंद तो बढ़ता खतरा

स्थानीय लोगों के अनुसार, जब ट्रैफिक सिग्नल बंद रहते हैं, तब यहां हादसों की संख्या और बढ़ जाती है। जलकारे ने यह भी आरोप लगाया कि लगातार मांग के बावजूद इस चौक पर ट्रैफिक पुलिस की तैनाती नहीं की जाती, जिससे अव्यवस्था बनी रहती है।

? दुर्घटनाओं में सबसे आगे

पिछले कुछ वर्षों के आंकड़ों के अनुसार, दुर्ग शहर में सबसे अधिक सड़क दुर्घटनाएं इसी चौक पर दर्ज की गई हैं, जिससे यह क्षेत्र अब “ब्लैक स्पॉट” के रूप में चिन्हित होने लगा है।

?️ प्रशासन से तत्काल कार्रवाई की मांग

विजय जलकारे ने प्रशासन से मांग की है कि:

चौक की डिजाइन और तकनीकी खामियों की तत्काल जांच हो

नियमित रूप से ट्रैफिक पुलिस की तैनाती की जाए

सिग्नल व्यवस्था को दुरुस्त कर 24×7 चालू रखा जाए

उन्होंने चेतावनी दी कि यदि समय रहते सुधार नहीं किया गया, तो भविष्य में कोई बड़ा हादसा हो सकता है।

? निष्कर्ष:

मालवीय नगर चौक की बढ़ती दुर्घटनाएं प्रशासन के लिए एक गंभीर चेतावनी हैं। अब देखना होगा कि जिम्मेदार विभाग इस ‘ब्लैक स्पॉट’ को सुरक्षित बनाने के लिए कितनी तेजी और गंभीरता से कदम उठाते हैं।

रायपुर। शौर्यपथ  । पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के पहले चरण की वोटिंग के बीच छत्तीसगढ़ के उप मुख्यमंत्री अरुण साव ने बड़ा राजनीतिक बयान देते हुए कहा है कि राज्य में अब सत्ता परिवर्तन तय है। उन्होंने दावा किया कि मतदान के शुरुआती रुझान स्पष्ट संकेत दे रहे हैं कि जनता बदलाव चाहती है और ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली सरकार की विदाई निकट है।

अरुण साव ने भरोसा जताया कि इस बार पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी पहली पसंद बनकर उभरेगी और “कमल खिलने” के साथ राज्य को सुशासन, सुरक्षा और विकास की नई दिशा मिलेगी। उन्होंने कहा कि माताओं-बहनों की सुरक्षा और युवाओं को रोजगार के अवसर देना भाजपा की प्राथमिकता होगी।

? कांग्रेस पर तीखा प्रहार — “ओबीसी के मुद्दे पर दोहरा चेहरा”

उप मुख्यमंत्री साव ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पर सीधा हमला बोलते हुए कहा कि पार्टी का ओबीसी वर्ग के प्रति रवैया हमेशा से दोहरा रहा है।

उनके अनुसार, जब कांग्रेस सत्ता में थी तब उसने अन्य पिछड़ा वर्ग की उपेक्षा की, लेकिन अब सत्ता से बाहर होने के बाद वह ओबीसी हितैषी बनने का दिखावा कर रही है।

उन्होंने छत्तीसगढ़ की पूर्व भूपेश बघेल सरकार पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि उनके कार्यकाल में भी ओबीसी वर्ग के साथ न्याय नहीं हुआ।

? इतिहास का हवाला, कांग्रेस पर सवाल

नवा रायपुर अटल नगर स्थित निवास कार्यालय में पत्रकारों से चर्चा करते हुए साव ने कहा कि कांग्रेस ने लंबे समय तक सत्ता में रहने के बावजूद काका कालेकर आयोग की रिपोर्ट को दबाकर रखा और मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने में भी गंभीरता नहीं दिखाई।

उन्होंने यह भी याद दिलाया कि वी.पी. सिंह की सरकार ने मंडल आयोग लागू किया, जबकि उस समय राजीव गांधी ने इसका विरोध किया था।

? राजनीतिक संदेश स्पष्ट

अरुण साव ने कहा कि देश और प्रदेश का ओबीसी वर्ग अब कांग्रेस के “राजनीतिक दिखावे” को समझ चुका है और आने वाले समय में इसका जवाब लोकतांत्रिक तरीके से देगा।

? निष्कर्ष:

पश्चिम बंगाल चुनाव को लेकर भाजपा का आत्मविश्वास चरम पर है। अब सबकी नजरें चुनाव परिणामों पर टिकी हैं, जो यह तय करेंगे कि क्या वास्तव में “बदलाव की बयार” सत्ता परिवर्तन में बदलती है या नहीं।

रायपुर/नवा रायपुर। शौर्यपथ । 

छत्तीसगढ़ की साय सरकार ने प्रशासनिक निष्पक्षता और पारदर्शिता को मजबूत करने के उद्देश्य से एक बड़ा और सख्त फैसला लिया है। सामान्य प्रशासन विभाग द्वारा जारी ताजा निर्देशों में स्पष्ट कर दिया गया है कि कोई भी शासकीय सेवक अब किसी भी राजनीतिक दल, संगठन या अन्य पद पर आसीन नहीं रह सकेगा।

? क्या है आदेश का आधार?

यह निर्देश छत्तीसगढ़ सिविल सेवा (आचरण) नियम, 1965 के तहत जारी किया गया है, जिसमें सरकारी कर्मचारियों के आचरण, निष्पक्षता और कर्तव्यों को लेकर स्पष्ट दिशा-निर्देश पहले से ही निर्धारित हैं।

साथ ही, आदेश में 21 अप्रैल 2026 को जारी सामान्य प्रशासन विभाग के ज्ञापन का हवाला दिया गया है।

⚖️ क्या-क्या प्रतिबंध लगाए गए?

सरकार के आदेश के मुताबिक—

❌ कोई भी शासकीय सेवक किसी राजनीतिक दल का सक्रिय सदस्य नहीं होगा

❌ किसी भी प्रकार की राजनीतिक गतिविधियों में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष भागीदारी पूरी तरह प्रतिबंधित

❌ बिना अनुमति किसी भी सरकारी या गैर-सरकारी संस्था, समिति या संगठन में पद धारण नहीं कर सकेगा

❌ ऐसी किसी गतिविधि में शामिल नहीं होगा जिससे उसके सरकारी कार्यों की निष्पक्षता प्रभावित हो

? उल्लंघन पर क्या होगा?

सरकार ने साफ कर दिया है कि नियमों की अनदेखी करने वालों पर कड़ी कार्रवाई होगी।

⚠️ दोषी पाए जाने पर छत्तीसगढ़ सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियम, 1966 के तहत

⚠️ कठोर अनुशासनात्मक कार्यवाही सुनिश्चित की जाएगी

? सरकार का संदेश

इस फैसले के पीछे सरकार का स्पष्ट उद्देश्य है कि—

? सरकारी तंत्र पूरी तरह निष्पक्ष, पारदर्शी और राजनीतिक प्रभाव से मुक्त रहे

? जनता को निष्पक्ष और ईमानदार प्रशासनिक सेवा मिले

? क्या बदल सकता है?

इस आदेश के बाद प्रदेश में—

सरकारी कर्मचारियों की राजनीतिक सक्रियता पर लगाम लगेगी

प्रशासनिक निर्णयों में पारदर्शिता और भरोसा बढ़ेगा

शासन-प्रशासन में हितों के टकराव (Conflict of Interest) की स्थिति कम होगी

? निष्कर्ष:

छत्तीसगढ़ सरकार का यह कदम साफ संकेत देता है कि अब “सरकारी सेवा = पूर्ण निष्पक्षता”।

राजनीति और सरकारी जिम्मेदारी को अलग रखने की यह पहल आने वाले समय में प्रशासनिक व्यवस्था को और मजबूत बना सकती है।

अम्बिकापुर। शौर्यपथ । 

सरगुजा जिले में शिक्षा व्यवस्था से जुड़ा एक गंभीर मामला सामने आया है, जिसने न केवल शिक्षा प्रणाली बल्कि सामाजिक संवेदनशीलता पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। स्वरंग किड्स एकेडमी (पेशागी एजूकेशन सोसायटी), चोपड़ापारा द्वारा महज 4 वर्षीय मासूम बच्चे को केवल इसलिए प्रवेश देने से इंकार कर दिया गया क्योंकि वह हिन्दी के बजाय स्थानीय सरगुजिहा भाषा में बात करता था।

❗ मामला क्या है?

सोशल मीडिया और न्यूज चैनलों में वायरल इस घटना में बताया गया कि विद्यालय प्रबंधन ने बच्चे के पिता से यह तक कह दिया कि “यहाँ बड़े घर के बच्चे पढ़ते हैं, वे भी आपके बच्चे की तरह सरगुजिहा सीख जाएंगे।” साथ ही यह तर्क दिया गया कि शिक्षक बच्चे की भाषा समझ नहीं पा रहे हैं, इसलिए प्रवेश नहीं दिया जा सकता।

⚖️ जांच में क्या निकला?

मामले की गंभीरता को देखते हुए जिला शिक्षा अधिकारी ने तत्काल संज्ञान लेते हुए जांच के आदेश दिए।

जांच समिति का गठन वरिष्ठ प्राचार्य श्रीमती रूमी घोष की अध्यक्षता में किया गया।

जांच में यह पुष्टि हुई कि घटना सही है।

साथ ही यह भी सामने आया कि विद्यालय बिना विभागीय मान्यता के संचालित हो रहा था।

शाला प्रबंधन और शिक्षकों ने अपनी गलती स्वीकार कर ली।

? कानून का खुला उल्लंघन

यह पूरा मामला निःशुल्क एवं अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 (RTE Act) और नई शिक्षा नीति 2020 (NEP 2020) के प्रावधानों के सीधे उल्लंघन के रूप में सामने आया है, जिसमें मातृभाषा और स्थानीय भाषा को बढ़ावा देने पर विशेष जोर दिया गया है।

? सख्त कार्रवाई

जिला शिक्षा अधिकारी ने धारा 18(5) के तहत सख्त कदम उठाते हुए—

विद्यालय पर ₹1,00,000 (एक लाख रुपये) का आर्थिक दंड लगाया है।

साथ ही विद्यालय का संचालन तत्काल प्रभाव से स्थगित कर दिया गया है।

संस्था को निर्देश दिया गया है कि निर्धारित चालान के माध्यम से राशि शासन के खजाने में जमा कर उसकी प्रति प्रस्तुत करें।

? बड़ा सवाल

यह घटना शिक्षा के अधिकार और समानता के मूल सिद्धांतों पर चोट करती है। जब देश की शिक्षा नीति खुद स्थानीय भाषाओं को बढ़ावा देने की बात करती है, तब इस तरह का भेदभाव न केवल असंवैधानिक है बल्कि समाज में विभाजन को भी बढ़ावा देता है।

? निष्कर्ष:

सरगुजा में हुई यह कार्रवाई एक स्पष्ट संदेश है—

? शिक्षा के अधिकार से किसी भी बच्चे को वंचित नहीं किया जा सकता, चाहे उसकी भाषा, पृष्ठभूमि या परिस्थिति कुछ भी हो।

दुर्ग। शौर्यपथ ।  जिला कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष श्री धीरज बाकलीवाल के नेतृत्व में आज कांग्रेस पदाधिकारियों एवं कार्यकर्ताओं ने शहर की विभिन्न ज्वलंत जनसमस्याओं को लेकर जिला कलेक्टर को ज्ञापन सौंपा। ज्ञापन में आम नागरिकों, विशेषकर महिलाओं से जुड़ी समस्याओं को प्रमुखता से उठाते हुए त्वरित समाधान की मांग की गई।

ज्ञापन के माध्यम से कांग्रेस ने महतारी वंदन योजना में हितग्राही महिलाओं को आ रही तकनीकी एवं प्रशासनिक परेशानियों पर चिंता जताई। साथ ही शहर में बढ़ते जल संकट, अनियमित पेयजल आपूर्ति और इससे आम जनजीवन पर पड़ रहे प्रतिकूल प्रभाव को भी गंभीर मुद्दा बताया गया।

इसके अलावा स्वामी आत्मानंद शासकीय स्कूलों में प्रवेश प्रक्रिया में व्याप्त अव्यवस्थाओं को लेकर भी सवाल उठाए गए। कांग्रेस ने आरोप लगाया कि पारदर्शिता के अभाव में जरूरतमंद विद्यार्थियों को समय पर प्रवेश नहीं मिल पा रहा है।

ज्ञापन में हाल ही में हुए नसबंदी ऑपरेशन के दौरान महिलाओं की मृत्यु के मामलों को भी उठाया गया। कांग्रेस ने अब तक जांच रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं किए जाने और पीड़ित परिवारों को मुआवजा न मिलने पर प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े किए। उन्होंने इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कर दोषियों पर कार्रवाई तथा प्रभावित परिवारों को शीघ्र राहत प्रदान करने की मांग की।

कांग्रेस नेताओं ने स्पष्ट किया कि यदि इन जनहित से जुड़े मुद्दों पर शीघ्र ठोस कार्रवाई नहीं की गई, तो संगठन आगे और उग्र आंदोलन के लिए बाध्य होगा।

जनता की बुनियादी समस्याओं को लेकर सौंपे गए इस ज्ञापन के बाद अब निगाहें प्रशासन की कार्रवाई पर टिकी हुई हैं।

दुर्ग। शौर्यपथ। शहर के बस स्टैंड पार्किंग क्षेत्र में अवैध कब्जों का मामला लगातार गहराता जा रहा है। आरोप है कि प्रवीण इंजीनियरिंग संस्था के संचालक द्वारा एक छोटे से प्याऊ घर के निर्माण की आड़ में बड़े हिस्से पर कब्जा कर लिया गया है, लेकिन जिम्मेदार अधिकारी इस ओर आंखें मूंदे बैठे हैं।

स्थानीय लोगों का कहना है कि इस संबंध में बाजार विभाग के कर्मचारियों और अधिकारियों को कई बार सूचित किया गया, लेकिन हर बार “देखते हैं” कहकर मामले को टाल दिया गया। नतीजा यह हुआ कि अब पार्किंग क्षेत्र में धीरे-धीरे अतिक्रमण का दायरा बढ़ता जा रहा है।

गौरतलब है कि जिस स्थान पर प्याऊ घर बनाया जा रहा है, उसके ठीक पास ही नगर निगम द्वारा वाटर एटीएम पहले से संचालित है। ऐसे में सामाजिक सेवा के नाम पर यह निर्माण संदेह के घेरे में आ गया है। लोगों का आरोप है कि यह पूरा मामला दिखावे की आड़ में जमीन कब्जाने की सुनियोजित कोशिश है।

सबसे बड़ा सवाल बाजार अधिकारी अभ्युदय मिश्रा और बाजार प्रभारी शेखर चंद्राकर की कार्यप्रणाली पर उठ रहा है। क्षेत्रवासियों का कहना है कि दोनों अधिकारी इस पूरे मामले में निष्क्रिय बने हुए हैं, जिससे अवैध कब्जाधारियों के हौसले बुलंद हैं। बिना विभागीय मिलीभगत के इस तरह का कब्जा संभव नहीं माना जा रहा।

निगम प्रशासन की कार्यशैली पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। लोगों का कहना है कि अगर उच्च अधिकारी स्थल निरीक्षण करें तो पूरे कब्जे का खेल उजागर हो सकता है।

वहीं, अब निगाहें शहर की महापौर अलका बाघमार पर टिक गई हैं। जनता का मानना है कि निगम की कमान संभालने वाली महापौर की जिम्मेदारी बनती है कि वे अपने विभागीय प्रभारियों की कार्यप्रणाली पर नजर रखें और ऐसे मामलों में सख्त कार्रवाई सुनिश्चित करें।

स्थानीय नागरिकों की मांग है कि पार्किंग क्षेत्र को अतिक्रमण मुक्त कराते हुए दोषी अधिकारियों और कब्जाधारियों पर तत्काल कार्रवाई की जाए, ताकि सार्वजनिक स्थानों का संरक्षण हो सके और आम जनता को राहत मिल सके।

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