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आस्था / शौर्यपथ /अमरनाथ की गुफा श्रीनगर से करीब 145 किलोमीटर की दूरी हिमालय पर्वत श्रेणियों में स्थित है। समुद्र तल से 3,978 मीटर की ऊंचाई पर स्थित यह गुफा 150 फीट ऊंची और करीब 90 फीट लंबी है। अमरनाथ यात्रा पर जाने के लिए 2 रास्ते हैं- एक पहलगाम होकर जाता है और दूसरा सोनमर्ग बालटाल से जाता है। यानी देशभर के किसी भी क्षेत्र से पहले पहलगाम या बालटाल पहुंचना होता है। इसके बाद की यात्रा पैदल की जाती है। आओ जानते हैं अमरनाथ गुफा का पौराणिक इतिहास और 6 रहस्य।
अमरनाथ गुफा के 6 रहस्य :
1. दर्शन से मिलता हजार गुना पुण्य : पुराण के अनुसार काशी में दर्शन से दस गुना, प्रयाग से सौ गुना और नैमिषारण्य से हजार गुना पुण्य देने वाले श्री बाबा अमरनाथ के दर्शन हैं। और कैलाश को जो जाता है, वह मोक्ष पाता है।
2. बाबा बर्फानी नहीं अमरेश्वर कहो : अमरनाथ गुफा के शिवलिंग को 'अमरेश्वर' कहा जाता है। इसे बाबा बर्फानी कहना गलत है। यहां की यात्रा जुलाई माह में प्रारंभ होती है और यदि मौसम अच्छा हो तो अगस्त के पहले सप्ताह तक चलती है। हिन्दू माह अनुसार आषाढ़ पूर्णिमा से प्रारंभ होती है यात्रा और पूरे सावन महीने तक चलती है।
3. शिवजी ने की थी गुफा की यात्रा : ऐसी मान्यता है कि भगवान शिव इस गुफा में पहले पहल श्रावण मास की पूर्णिमा को आए थे इसलिए उस दिन को अमरनाथ की यात्रा को विशेष महत्व मिला। रक्षा बंधन की पूर्णिमा के दिन ही छड़ी मुबारक भी गुफा में बने हिमशिवलिंग के पास स्थापित कर दी जाती है।
4. इस तरह बनता है शिवलिंग : गुफा की परिधि लगभग 150 फुट है और इसमें ऊपर से बर्फ के पानी की बूंदें जगह-जगह टपकती रहती हैं। यहीं पर सेंटर में एक ऐसी जगह है, जिसमें टपकने वाली हिम बूंदों से लगभग दस फुट लंबा शिवलिंग बनता है। गुफा के सेंटर में पहले बर्फ का एक बुलबुला बनता है। जो थोड़ा-थोड़ा करके 15 दिन तक रोजाना बढ़ता रहता है और दो गज से अधिक ऊंचा हो जाता है। चन्द्रमा के घटने के साथ-साथ वह भी घटना शुरू कर देता है और जब चांद लुप्त हो जाता है तो शिवलिंग भी विलुप्त हो जाता है। चंद्र की कलाओं के साथ हिमलिंग बढ़ता है और उसी के साथ घटकर लुप्त हो जाता है। चंद्र का संबंध शिव से माना गया है। आश्चर्य की बात यही है कि यह शिवलिंग ठोस बर्फ का बना होता है, जबकि अन्य जगह टपकने वाली बूंदों से कच्ची बर्फ बनती है जो हाथ में लेते ही भुरभुरा जाती है। मूल अमरनाथ शिवलिंग से कई फुट दूर गणेश, भैरव और पार्वती के वैसे ही अलग-अलग हिमखंड बन जाते हैं।
5. अमरनाथ के अमर वचन : अमरनाथ की गुफा में ही भगवान शिव ने अपनी पत्नी देवी पार्वती को अमरत्व का मंत्र सुनाया था और उन्होंने कई वर्ष रहकर यहां तपस्या की थी, तो यह शिव का एक प्रमुख और पवित्र स्थान है। दरअसल, शास्त्रों के अनुसार इसी गुफा में भगवान शिव ने माता पार्वती को अमरत्व का रहस्य बताया था। माता पार्वती के साथ ही इस रहस्य को शुक (तोता) और दो कबूतरों ने भी सुन लिया था। यह शुक बाद में शुकदेव ऋषि के रूप में अमर हो गए, जबकि गुफा में आज भी कई श्रद्धालुओं को कबूतरों का एक जोड़ा दिखाई देता है जिन्हें अमर पक्षी माना जाता है।
6. इस तरह पहुंचे थे अमरनाथ शिवजी : भगवान शिव जब पार्वती को अमरकथा सुनाने ले जा रहे थे, तो उन्होंने छोटे-छोटे अनंत नागों को अनंतनाग में छोड़ा, माथे के चंदन को चंदनवाड़ी में उतारा, अन्य पिस्सुओं को पिस्सू टॉप पर और गले के शेषनाग को शेषनाग नामक स्थल पर छोड़ा था। ये सभी स्थान अभी भी अमरनाथ यात्रा के दौरान रास्ते में दिखाई देते हैं
खाना खजाना / शौर्यपथ / व्रत-उपवास में फलाहार करना हो या फिर सावन के मौसम का मजा लेना हो, दोनों ही चीजों के लिए यह रेसिपी एकदम परफेक्ट है। साबूदाना वड़ा अपने बेहतरीन स्वाद की वजह से बच्चों से लेकर बड़ों तक को बेहद पसंद होता है। ऐसे में अगर आप भी अपने फलाहार के लिए कोई चटपटी रेसिपी ढूंढ रहे थे तो ट्राई करें ये आसान रेसिपी।
साबूदाना वड़ा बनाने के लिए आवश्यक सामग्री-
-साबूदाना - 1 कप
-उबले आलू - 4
-मूंगफली - 1/2 कप (दरदरी कुटी हुई)
-हरा धनिया - 2-3 टेबल स्पून (बारीक कटा)
-काली मिर्च - 1/4 छोटी चम्मच (दरदरी कुटी)
-हरी मिर्च - 2 (बारीक कटी)
-घी - 4 टेबल स्पून
-सेंधा नमक - स्वादानुसार
साबूदाना वड़ा बनाने की विधि-
साबूदाना वड़ा बनाने के लिए सबसे पहले साबूदाने को धोकर साफ करने के बाद करीब डेढ़ कप साफ पानी में भिगोकर 2 घंटे के लिए फूलने के लिए रख दें। 2 घंटे बाद साबूदाने से एक्स्ट्रा पानी निकालकर फेंक दें।
इसके बाद आलू को छीलकर साबूदाने के साथ डालकर अच्छे से मसल लें और इसमें सेंधा नमक, काली मिर्च पाउडर हरी मिर्च और मूंगफली दरदरी कुटी हुई डाल लें। इन सभी को अच्छे से मिला लें। लीजिए तैयार हो चुका है साबूदाना वडा बनाने के लिए आपका मिश्रण।
हथेली को थोड़ा सा तेल लगाकर चिकना कर लीजिए और वडा का मिक्सचर लेकर गोलाकार बनाएं और फिर हथेली से थोड़ा बदकार चपटा आकार दें। इन वड़ों को एक थाली में दूर तक रखते जाएं।
चपटे तले वाली कढ़ाई में घी डालकर आंच पर चढ़ाएं। थोड़ी देर बाद वड़ों को एक-एक करके इसमें 4 से 5 मिनट तक सेंक लें। दोनों तेरफ गोल्डन ब्राउन होने तक सेंक लें। आपका साबूदान वडा बनकर तैयार है।
शौर्यपथ / कोरोना वायरस का प्रकोप हर आयु वर्ग के लोगों को घेर रहा है। नवजात बच्चा भी इसकी चपेट में आ सकता है। यह वायरस गर्भवती महिला को होने पर एक साथ दो जिंदगियां दांव पर लग जाती है। ऐसे में दोनों का ध्यान रखना जरूरी है। लेकिन एक तरफ जहां हर तरह की सावधानियां बरती जा रही है। इसके बाद भी यह वायरस किसी को भी अपनी चपेट में ले लेता है। लेकिन जहां दो जिंदगी का सवाल हो वहां अधिक ध्यान देना जरूरी है। वहीं अगर मां कोविड पॉजिटीव हो जाती है तो न्यू बोर्न बच्चे की देखभाल कैसे करना चाहिए। इसे लेकर वेबदुनिया ने गायनोकॉलोजिस्ट डॉ हेमा जाजू से चर्चा की। आइए जानते हैं। क्या सावधानियां रखें और कैसे बच्चे की देखभाल करें।
मां के कोविड पॉजिटीव हो जाती है तो नवजात शिशु की देखभाल कैसे करें?
अपने देश में बच्चे को मां से अलग नहीं रखा जाता है। दरअसल, ब्रेस्टफीडिंग के लिए बच्चा मां के पास ही रहता है। अगर केस गंभीर होता है तो बच्चे को अगल करना पड़ सकता है। लेकिन बच्चे का ख्याल रखते हुए कोविड नियमों का पालन करना जरूरी है। बच्चे को फीडिंग करा रहे हैं तो मुंह पर डबल मास्क जरूर लगाएं। ताकि बारिक पार्टीकल बच्चे के अंदर नहीं जा सकें। फीडिंग के दौरान बच्चा बहुत करीब होता है। इसलिए नाक और मुंह को मास्क से अच्छे से ढकें।
जब कभी भी बच्चे को अपने हाथों में लें, सबसे पहले हाथों को डिसइनफेक्ट करें। डॉ ने चर्चा में बताया कि अगर कोविड पॉजिटीव मां बच्चे को फीडिंग कराती है तो बच्चे को खतरा नहीं होता है। क्योंकि फीडिंग कराने से बच्चों के अंदर वायरस नहीं जाता है। वहीं आमतौर पर ब्रेस्टफीड में वायरस नहीं रहते हैं। लेकिन सही तरह से स्तनपान कराएं तो नवजात के
कोविड होने की संभावना कम हो जाती है।
सीवर (गंभीर) केस होने पर बच्चे की देखभाल कैसे करें?
जब बच्चे को मां नहीं संभाल पाती हैं तब उन्हें मां से अलग करना पड़ता है। वहीं अगर प्रीमेच्योर बेबी होता है तो उन्हें हॉस्पिटल में सेपरेट रखा जाता है। लेकिन बच्चा घर पर रहता है तो उन्हें बॉटल से दूध नहीं पिलाएं। कटोरी चम्मच से बच्चे को दूध पिलाएं, वहीं बच्चे को कटोरी - चम्मच से दूध पिलाते हैं तो उन्हें अच्छे से गर्म पानी में उबालें। बच्चे बहुत नाजुक होते हैं ऐसे में उनके लिए एक तकनीक अपनाई जाती है non-touch-technique.यानी की जब कटोरी चम्मच को बाहर निकाला जाएं तो अंदर की साइड से उसे टच नहीं करें।इसके बाद कटोरी में दूध डालकर बच्चे को पिलाएं।
स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा नवजात शिशुओं की देखभाल के लिए
जारी की गई
गाइडलाइन -
- बच्चे के कमरे को अच्छे से डिसइनफेक्ट करें।
-मां और बच्चे
दोनों घर में ही रहें।
-कोविड-19 से बचाव के लिए शारीरिक दूरी का ख्याल जरूर रखें।
-घर में अन्य छोटे बच्चे हैं तो उन्हें बच्चों से दूर रखें।
- मां बच्चे को हाथों में लेने से पहले हाथों को साफ पानी से धोएं।
- स्तनपान कराने से पहले हाथों को सैनिटाइज करें साथ ही मास्क जरूर लगाएं।
खुद का ख्याल भी रखें-
-डॉ की सलाह से उचित मात्रा में पानी पिएं।
-डॉ की सलाह से योग, मेडिटेशन जरूर करें।
-संतुलित और उचित आहार करें।
-नियमित अंतराल से चेकअप कराते रहें।
शौर्यपथ / जन्म 26 सितंबर, 1820 महान स्वतंत्रता सेनानी ईश्वरचंद्र विद्यासागर एक दार्शनिक, अकादमिक शिक्षक, लेखक, अनुवादक, समाज सुधारक और परोपकारी थे। उनका जन्म मेदिनीपुर में 26 सितंबर, 1820 को ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम ठाकुरदास बंद्योपाध्याय एवं माता का नाम भगवती देवी था।
वे संस्कृत भाषा और दर्शन में अगाध ज्ञान होने के कारण विद्यार्थी जीवन में ही संस्कृत कॉलेज ने उन्हें 'विद्यासागर' की उपाधि प्रदान की थी। इसके बाद से उनका नाम ईश्वर चंद्र विद्यासागर हो गया था। उनका कहना था की कोई भी व्यक्ति अच्छे कपड़े पहनने, अच्छे मकान में रहने तथा अच्छा खाने से ही बड़ा नहीं होता बल्कि अच्छे काम करने से बड़ा होता है।
अपनी सहनशीलता, सादगी तथा देशभक्ति के लिए विशिष्ट योगदान करने वाले ईश्वरचंद्र ने स्त्री शिक्षा तथा विधवा विवाह प्रथा को सुधारने का काम किया। बहुत-सी कठिनाइयों के बाद अंत में विधवा विवाह को कानूनी स्वीकृति प्राप्त हो गई। उन्हें गरीबों और दलितों का संरक्षक माना जाता है। पंडित ईश्वरचंद्र विद्यासागर के मन में प्राणीमात्र के प्रति अथाह करुणा को देखकर उन्हें लोग करुणा देखकर उन्हें लोग करुणा का सागर कहकर बुलाते थे। असहाय प्राणियों के प्रति उनकी करुणा व कर्तव्यपरायणता देखते ही बनती थी।
उन दिनों वे कोलकाता के एक समीपवर्ती कस्बे में प्राध्यापक के पद पर नियुक्त थे। वातावरण में भयानक ठंड बढ़ गई। एक दिन शाम से ही बूंदाबांदी हो रही थी। रात होते-होते मूसलाधार बारिश से वातावरण में भयानक ठंड बढ़ गई। ईश्वरचंद्र विद्यासागर अपने स्वाध्याय में व्यस्त थे, तभी किसी ने उनके दरवाजे पर दस्तक दी।
उन्होंने एक अजनबी को दरवाजे पर खड़ा देखा। अपनेपन से उस अजनबी को घर के भीतर बुलाया। उसे अपने नए कपड़े देकर भीगे वस्त्र बदलने को कहा। वह अतिथि उनके इस प्रेमभरे व्यवहार को देखकर भर्राए गले से बोला- 'मैं इस कस्बे में नया हूं, यहां मैं अपने एक मित्र से मिलने के लिए आया था। जब मैं उसके घर के बाहर पहुंचा तो पूछने पर पता चला कि वह इस कस्बे से बाहर गया हुआ है। ये सुनकर निरुपाय होकर मैंने कई लोगों से रात्रिभर के लिए शरण मांगी। लेकिन सभी ने मुझे संदेह की दृष्टि से देखकर दुत्कार दिया। आप पहले व्यक्ति हैं जिन्होंने ...।'
ईश्वरचंद्र ने कहा- 'अरे भाई, तुम तो मेरे अतिथि हो। हमारे शास्त्रों में भी तो कहा गया है कि अतिथि देवो भव। मैंने तो सिर्फ अपना कर्तव्य निभाया है।' कहकर उन्होंने अतिथि के सोने के लिए बिस्तर व भोजन की व्यवस्था की। फिर अपने हाथ से अंगीठी जलाकर उसके कमरे में रख दी। सुबह जब वह अतिथि पंडित ईश्वरचंद्र से विदा लेने गया तो वे हंसकर बोले - 'कहिए अतिथि देवता! रात को ठीक ढंग से नींद तो आई?'
अतिथि उनके सद्व्यवहार को मन ही मन नमन करते हुए बोला- 'असली देवता तो आप हैं, जिसने मुझे विपदग्रस्त देखकर मदद की।' पूरी जिंदगी उस व्यक्ति के मन में विद्यासागर की करुणामयी छबि बसी रही। ऐसी महान विभूति ईश्वरचंद्र विद्यासागर का निधन 29 जुलाई, 1891 को कोलकाता में हुआ था।
टिप्स ट्रिक्स / शौर्यपथ / हर कोई जल्दी से जल्दी सक्सेस होना चाहता है परंतु वह ऐसा कर पाने में सक्षम नहीं हो पाता है तो इसके कुछ कारण हो सकते हैं। यदि आपको सफलता नहीं मिल रही है तो कहीं ना कहीं आप गलत दिशा में प्रयास कर रहे होंगे। आओ जानते हैं जल्दी से सक्सेस होने के 10 टिप्स।
1. कल का काम आज करो : यदि कोई काम है जिसे आप कल करना चाहते हो तो यदि संभव होतो आज ही कर लो। कभी भी किसी भी काम को कल पर मत टालो, क्योंकि जो भी है वह आज ही है।
2. समय की कद्र करो : किसी भी कारण से अपने समय को बर्बाद मत करो। आपकी सफलता आपके समय से जुड़ी हुई है। समय का सही तरीके से मैनेज करो।
3. फालतू की चर्चा से दूर रहो : फालतू की बहस या चर्चा से दूर रहे। आपको उसी विषय पर बहस या चर्चा करना चाहिए जिस विषय या दिशा में आप सक्सेस होना चाहते हैं। जैसे उदाहरणार्थ आपको एक फिल्मकार बनना है परंतु आप राजनीति की बहस में उलझे हुए हैं। इससे आपका समय और ऊर्जा दोनों ही व्यर्थ ही खर्च हो जाएंगे।
4. सपनों का पीछा करो : आपने अपने जीवन में जो भी लक्ष्य बना रखे हैं या जो भी बनने का सपना देख रखा है उसका पीछा करो। जी जान से उसके पीछे दौड़ो। ध्यान रखें कि अपने लक्ष्य को कभी बदले नहीं। एक बार अच्छे से लक्ष्य को तय कर लें और दौड़ लगाना शुरू कर दें।
5. कमजोरियों से मत डरो : यदि आपको लगता है कि मैं इस विषय में या यहां पर कमजोर हूं तो आप उससे डरे नहीं बल्कि उसका समाधान खोजें। अपनी कमजोरियों से बचने का प्रयास मत करो। उदाहरणार्थ यदि आप अग्रेंजी या गणित में कमजोर हैं तो उसे छिपाएं नहीं या उससे बचने का प्रयास न करें बल्कि उसमें मजबूत बनने का प्रयास करें।
6. गणित और भाषा पर कमांड रखें : आपको यह अच्छे से समझ लेना चाहिए कि दुनिया गणित और भाषा से ही चलती है। आप भौतिक और गणित में खुद को मजबूत करें और कम से कम 3 भाषाओं पा अपनी कमांड हासिल करें। यदि आपने ऐसे कर लिया तो सफलता आपके कदम चूमेगी।
7. हमेशा कुछ ना कुछ नया सीखो : जिंदगी में कभी भी सीखना बंद ना करें। जब भी कुछ सीखने का मौका मिले आप जरूर सीखें। डीग्री के साथ हुनर का भी हौसला रखो। उदाहरणार्थ थ्योरी के साथ प्रैक्टिकल भी याद होना चाहिए।
8. हमेशा विनम्र बने रहें : अहंकार या घमंड से आपका मार्ग रुक जाएगा। इसीलिए हमेशा विनम्र बने रहे और बड़ों का आदर करें। यह याद रखें कि दुनिया में कोई भी अकेला सक्सेस नहीं होता है। सभी को किसी न किसी के सहयोग की आवश्कता होती है।
9. प्लान पर करो काम : हमारा जीवन योजनाओं भरा होना चाहिए। हर तरह के कार्य के लिए एक प्लान बनाएं और उस प्लान के तहत ही समयपूर्व की कार्य को डन कर दें। यदि आपने पास आपने जीवन का कोई प्लान नहीं है तो आप रैंडमली ही जिते रहेंगे।
10. कैलकुलेटड रिस्क लें : जीवन में रिस्क लेना जरूरी है लेकिन ज्यादा या कम रिस्क न लें। रिस्क लें सोच-समझकर कैलकुलेटिव रिस्क लें।
सेहत / शौर्यपथ / मानूसन के सीजन में दूषित पानी पीने या खाने से सबसे पहले पेट से संबंधित समस्या उत्पन्न होती है। घर में किसी बच्चे को पेट की समस्या होने परओआरएस का घोल दिया जाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं यहीं क्यों सबसे पहले दिया जाता है। 29 जुलाई को हर साल विश्व ओआरएस डे मनाया जाता है। वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन के मुताबिक, दुनिया में 5 साल से कम उम्र के बच्चों की म़त्यु का कारण डायरिया है। आसपास जमे पानी, गंदगी,
बारीक मच्छरों की वजह से बच्चे जल्दी इसकी चपेट में आते है। डायरिया इतनी गंभीर बीमारी है कि इंसान की जान भी जा सकती है। ऐसे में बच्चे या वयस्क को डायरिया होने पर ओआरएस का घोल दिया जाता है। इस महत्व को समझाने के लिए हर साल 29 जुलाई को विश्व ओआरएस दिवस मनाया जाता है। तो आइए जानते हैं ओआरएस कैसा है, कैसे काम करता है और डायरिया होने पर यह क्यों दिया जाता है।
ओआरस क्या होता है?
ओआरएस यानी ओरल रिहसइड्रेशन सॉल्ट। दरअसल, इंसान को पेट संबंधित समस्या होने लगती है। बीमारी में जब शरीर में मौजूद तत्वों में इलेक्ट्रोलाइट्स कम हो जाता है, तो ओआरएस मदद करता है। वह फिर से शरीर में इलेक्ट्रोलाइट्स को बनाने में मदद करता है। इसे बनाने के लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक 4 मुख्य तत्व होते हैं। सोडियम क्लोराइड यानी सामान्य नमक, ट्राईसोडियम साइट्रेट, पोटैशियम क्लोराइड और ग्लूकोज।
डायरिया होने पर ओआरएस करता है मदद ?
डायरिया के दौरान उल्टी और दस्त की वजह से शरीर के मुख्य मिनरल्स और इलेक्ट्रोलाइट्स बाहर हो जाते हैं। इसके बाद डिहाइड्रेशन की समस्या हो जाती है। इस दौरान मरीज को अतिरिक्त तरल पदार्थ दिए जाते हैं। ताकि पानी की कमी पूरी हो सकें। इसी के साथ ओआरएस का घोल भी दिया जाता है। यह एक तरह से ग्लूकोज - हलेक्ट्रोलाइट सॉलूशन दिया जाता है। यह शरीर में फिर से इलेक्ट्रोलाइट को उत्पन्न करते हैं। जॉन्स हॉपकिन्स ब्लूमबर्ग स्कूल ऑफ पब्लिक की ओर से शोध में सामने आया ओआरएस के सेवन से करीब 93 फीसदी लोगों की डायरिया से होने वाली मौत को टाला जा सकता है।
घर पर भी बना सकते हैं ओआरएस, जानिए कैसे?
इसके लिए आपको 1 लीटर पानी, 30 ग्राम चीनी और छोटा चम्मच नमक।
इन तीनों को अच्छे से मिला लें। इस मिश्रण को तब ही ले जब शक्कर पूरी नरह से घुल नहीं जाती। ध्यान रहे इस घोल को 24 घंटे के भीतर ही पिएं। इसके बाद नहीं। डायरिया किसी को भी हो सकता है तो ओआरएस सभी लोग पी सकतेहैं।
आस्था / शौर्यपथ / आइए जानते हैं कि श्रावण मास के गुरुवार का क्या महत्व है और क्या है इसके संबंध में रोचक बातें। बृहस्पति ग्रह का वार गुरुवार है। गुरुवार की प्रकृति क्षिप्र है। यह दिन ब्रह्मा और बृहस्पति का दिन माना गया है। यदि कुंडली में बृहस्पति की स्थिति निम्निलिखित अनुसार है तो श्रावण मास गुरुवार का व्रत करना चाहिए। आओ जानते हैं कि किसे श्रावण मास गुरुवार का व्रत रखना चाहिए।
1. कुंडली में 6वें, 7वें, 8वें और 10वें भाव में गुरु है तो श्रावण मास गुरुवार का उपवास करना चाहिए।
2. यदि आपकी राशि धनु और मीन है तो भी आपको श्रावण मास गुरुवार का उपवास करना चाहिए।
3. यदि गुरु शत्रु ग्रह के साथ बैठा है तो भी श्रावण मास गुरुवार का व्रत करना चाहिए। गुरु ग्रह के शुक्र और बुध शत्रु ग्रह हैं जबकि शनि और राहु सम ग्रह हैं।
4. कुंडली में यदि बृहस्पति कमजोर है, शुक्र, बुध या राहु के साथ है या किसी भी प्रकार से वह नीच हो रहा है तो जातक को श्रावण मास गुरुवार का व्रत अवश्य करना चाहिए क्योंकि बृहस्पति से ही भाग्य जागृत होता है।
5. श्रावण मास का गुरुवार करने से खुल जाते हैं भाग्य के द्वार क्योंकि बृहस्पति चौथा, पांचवां और नौवें भाव पर अपना प्रभाव रखते हैं।
6. यदि विवाह में कोई कठिनाई आ रही है या वैवाहिक जीवन सुखमयी नहीं है तो श्रावण मास गुरुवार का व्रत करना चाहिए।
7. यदि आपकी कुंडली में अल्पायु योग हैं या जीवन रेखा कमजोर है तो आपको श्रावण मास गुरुवार का व्रत निरंतर रखते हुए गुरु के उपाय भी करना चाहिए क्योकि गुरु ही लंबी आयु भी प्रदान करता है।
9. उथली व छिछली मानसिकता वाले व्यक्तियों को श्रावण मास बृहस्पतिवार का उपवास अवश्य रखना चाहिए।
10. यदि गुरु दशम भाव में है या किसी भी भी प्रकार से पितृदोष निर्मित हो रहा है तो जातक को श्रावण मास गुरुवार अवश्य करना चाहिए साथ ही प्रतिदिन हनुमान चालीसा भी पढ़ना चाहिए।
11. जीवन में हर मोड़ पर असफलता का सामना हो रहा है और किसी भी प्रकार का सुख नहीं मिल रहा है तो निश्चित ही गुरुवार का कठिन व्रत करना ही चाहिए।
12. किसी भी प्रकार की मनोकामना पूर्ण करने के लिए श्रावण मास गुरुवार से उपवास आरंभ कर 11 गुरुवार करना ही चाहिए।
13. गुरुवार के उपाय : सफेद चंदन, हल्दी या गोरोचन का तिलक लगाएं। हर तरह की बुरी लत को छोड़ने के लिए अति उत्तम दिन, क्योंकि इस दिन संकल्प की अधिकता रहती है। श्रावण मास गुरुवार को पापों का प्रायश्चित करने से पाप नष्ट हो जाते हैं, क्योंकि यह दिन देवी-देवताओं और उनके गुरु बृहस्पति का दिन होता है। उत्तर, पूर्व, ईशान दिशा में यात्रा करना शुभ। धार्मिक, मांगलिक, प्रशासनिक, शिक्षण और पुत्र के रचनात्मक कार्यों के लिए यह दिन शुभ है। सोने और तांबे का क्रय-विक्रय कर सकते हैं। इस दिन घर में धूप दीप देना चाहिए खासकर गुग्गुल की धूप देना चाहिए। इस दिन धूप देने से गृह कलह, तनाव और अनिद्रा और किया कराया में लाभ तो मिलता ही है साथ ही दिल और दिमाग के दर्द में राहत मिलती है। सबसे बड़ी बात यह कि इस दिन धूप देने से पारलौकिक मदद मिलती है।
14. यदि आपका गुरु अशुभ या कमजोर है तो आप नित्य पीपल में जल चढ़ाएं, सदा सत्य बोलें और अपने आचरण को शुद्ध रखें तो गुरु शुभ फल देने लगेगा। इसके अलावा गुरु को शुभ करने के लिए सदा पिता, दादा और गुरु का आदर कर उनके पैर छुएं। गुरु बनाएं। इसके अलावा अन्य अचूक उपाय यह कि गुरुवार के दिन पीली वस्तु का सेवन करें। घर में धूप-दीप दें। प्रतिदिन प्रात: और रात्रि को कर्पूर जलाएं। घर के वास्तु को बदलें और घर को गुरु के अनुसार बनाएं। घर के बर्तन आदि वस्तुएं पीतल की रखें। तिजोरी या ईशान कोण में हल्दी की गांठ को किसी सफेद कपड़े में हल्का से बांधकर रखें।
15. गुरु ग्रह का विज्ञान : बृहस्पति ग्रह का वार गुरुवार है। सौरमंडल में सूर्य के आकार के बाद बृहस्पति का ही नम्बर आता है। इस ग्रह का व्यास लगभग डेढ़ लाख किलोमीटर और सूर्य से इसकी दूरी लगभग 778000000 किलोमीटर मानी गई है। यह 13 कि.मी. प्रति सेकंड की रफ्तार से सूर्य के गिर्द 11 वर्ष में एक चक्कर लगा लेता है। यह अपनी धूरी पर 10 घंटे में ही घूम जाता है। लगभग 1300 धरतियों को इस पर रखा जा सकता है। जिस तरह सूर्य उदय और अस्त होता है, उसी तरह बृहस्पति जब भी अस्त होता है तो 30 दिन बाद पुन: उदित होता है। उदित होने के बाद 128 दिनों तक सीधे अपने पथ पर चलता है। सही रास्ते पर अर्थात मार्गी होने के बाद यह पुन: 128 दिनों तक परिक्रमा करता रहता है एवं इसके पश्चात्य पुन: अस्त हो जाता है। गुरुत्व शक्ति पृथ्वी से 318 गुना ज्यादा।
16. नवग्रहों में गुरु ही है सर्वश्रेष्ठ : गुरुवार की प्रकृति क्षिप्र है। यह दिन ब्रह्मा और बृहस्पति का दिन माना गया है। धनु और मीन राशि के स्वामी गुरु के सूर्य, मंगल, चंद्र मित्र ग्रह हैं, शुक्र और बुध शत्रु ग्रह और शनि और राहु सम ग्रह हैं। नवग्रहों में बृहस्पति को गुरु की उपाधि प्राप्त है। इनके शुत्र बुध, शुक्र और राहु है। कर्क में उच्च का और मकर में नीच का होता है गुरु। लाल किताब के अनुसार चंद्रमा का साथ मिलने पर बृहस्पति की शक्ति बढ़ जाती है। वहीं मंगल का साथ मिलने पर बृहस्पति की शक्ति दोगुना बढ़ जाती है। सूर्य ग्रह के साथ से बृहस्पति की मान-प्रतिष्ठा बढ़ती है।
17. गुरु से ही प्रारंभ होते मांगलिक कार्य : मानव जीवन पर बृहस्पति का महत्वपूर्ण स्थान है। यह हर तरह की आपदा-विपदाओं से धरती और मानव की रक्षा करने वाला ग्रह है। बृहस्पति का साथ छोड़ना अर्थात आत्मा का शरीर छोड़ जाना है। गुरु ग्रह के कारण ही धरती का अस्तित्व बचा हुआ है। सूर्य, चंद्र, शुक्र, मंगल के बाद धरती पर इसका प्रभाव सबसे अधिक माना गया है। गुरु ग्रह के अस्त होने के साथ ही मांगलित कार्य भी बंद कर दिए जाते हैं क्योंकि गुरु से ही मंगल होता है।
18. गुरुवार के देवता : ज्योतिष के अनुसार गुरुवार या गुरु ग्रह का संबंध, भगवान विष्णु, महर्षि बृहस्पति और भगवान दत्तात्रेय से है परंतु लाल किताब के अनुसार भगवान ब्रह्मा इसके देवता हैं और ब्राह्मण, दादा, परदादा को इससे संबंधित माना जाता है। पीपल, पीला रंग, सोना, हल्दी, चने की दाल, पीले फूल, केसर, गुरु, पिता, वृद्ध पुरोहित, विद्या और पूजा-पाठ यह सब बृहस्पति के प्रतीक माने गये हैं।
19. कुंडली में गुरु : कुंडली में चौथा, पांचवां और नौवें भाव पर अपना प्रभाव रखते हैं। चौथे में अच्छा फल देते हैं और नौवें में भाग्य खोल देते हैं। कुंडली में बृहस्पति शुभ है तो व्यक्ति कभी झूठ नहीं बोलता। उनकी सच्चाई के लिए वह प्रसिद्ध होता है। आंखों में चमक और चेहरे पर तेज होता है। अपने ज्ञान के बल पर दुनिया को झुकाने की ताकत रखने वाले ऐसे व्यक्ति के प्रशंसक और हितैषी बहुत होते हैं। यदि बृहस्पति उसकी उच्च राशि के अलावा 2, 5, 9, 12 में हो तो शुभ।
20. श्रावण मास गुरुवार करने से खुल जाते हैं भाग्य : गुरुवार करने से खुल जाते हैं भाग्य के द्वार कुंडली में यदि बृस्पति कमजोर है, शुक्र, बुध या राहु के साथ है या किसी भी प्रकार से वह नीच हो रहा है तो जातक को गुरुवार का व्रत अवश्य करना चाहिए क्योंकि बृहस्पति से ही भाग्य जागृत होता है। उसी से आसानी से विवाह होता है और वैवाहिक जीवन में सुख मिलता है। गुरु ही लंबी आयु भी प्रदान करता है। अत: गुरुवार करना जरूरी है। उथली व छिछली मानसिकता वाले व्यक्तियों को बृहस्पतिवार का उपवास अवश्य रखना चाहिए।
21. गुरु खराब की निशानी : बृहस्पति कमजोर होता है तो पितृदोष माना जाता है। सिर के बीचोबीच से बाल उड़ने लगते हैं। शिक्षा में व्यवधान उत्पन्न होने लगता है। नेत्र में पीड़ा होने लगती है। सपने में सर्प का दिखाई देने लगते हैं। व्यक्ति के बारे में बेकार की अफवाहें चलती रहती है। गले में दर्द और फेफड़े की बीमारी हो जाती है। ज्यादा ही खराब है तो जातक की आयु भी कम हो जाती है।
22. मंदिर जाने और पूजा करने का वार : हिन्दू धर्म में श्रावण मास गुरुवार को श्रेष्ठ और पवित्र दिन माना गया है। यह धर्म का दिन होता है। इस दिन मंदिर जाना जरूरी होता है। गुरुवार की दिशा ईशान है। ईशान में ही देवताओं का स्थान माना गया है। इस दिन सभी तरह के धार्मिक और मंगल कार्य से लाभ मिलता है अत: हिन्दू शास्त्रों के अनुसार यह दिन सर्वश्रेष्ठ माना गया है अत: सभी को प्रत्येक गुरुवार को मंदिर जाना चाहिए और पूजा, प्रार्थना या ध्यान करना चाहिए।
23. गुरुवार का दिशा शूल और राहु काल : यात्रा में इस वार की दिशा पश्चिम, उत्तर और ईशान ही मानी गई है। इस दिन पूर्व, दक्षिण और नैऋत्य दिशा में यात्रा त्याज्य है। इस दिन दोपहर 1:30 से 3:00 बजे तक रहता है।
24. श्रावण मास गुरुवार के दिन ये कार्य करें : सफेद चंदन, हल्दी या गोरोचन का तिलक लगाएं। हर तरह की बुरी लत को छोड़ने के लिए अति उत्तम दिन, क्योंकि इस दिन संकल्प की अधिकता रहती है। श्रावण मास गुरुवार के दिन पीली वस्तु का सेवन करें।
अक्सर गुरुवार को इसकी धूप घर में दी जाती है। इस दिन धूप देने से गृह कलह, तनाव और अनिद्रा और किया कराया में लाभ तो मिलता ही है साथ ही दिल और दिमाग के दर्द में राहत मिलती है। सबसे बड़ी बात यह कि इस दिन धूप देने से पारलौकिक मदद मिलती है।
25.श्रावण मास गुरुवार के दिन ये कार्य ना करें : इस दिन शेविंग न बनाएं और शरीर का कोई भी बाल न काटें अन्यथा संतान सुख में बाधा उत्पन्न होगी। दक्षिण, पूर्व, नैऋत्य में यात्रा करना वर्जित है। गुरुवार को नमक नहीं खाना चाहिए। इससे स्वास्थ्य पर असर पड़ता है और हर कार्य में बाधा आती है। इस दिन दूध और केला खाना भी वर्जित माना गया है। इस दिन कपड़े धोना और पोंछा लगाना भी वर्जित माना जाता है।
खाना खजाना / शौर्यपथ / बारिश के मौसम में गर्मा-गर्म गुलाब जामुन खाने का मजा ही कुछ और है। अगर आप भी बारिश के मौसम में बालकनी में बैठकर मौसम का लुत्फ उठाते हुए इस स्वीट डिश का मजा लेना चाहते हैं तो ट्राई कर सकते हैं ये टेस्टी रेसिपी। गुलाब जामुन बनाना भी बहुत ही आसान होता है। इसे बनाने के लिए आपको ना ही बहुत अधिक मेहनत या फिर समय की जरूरत होती है। तो आइए जान लेते हैं कैसे बनाई जाती है ये टेस्टी रेसिपी।
मावा से बने गुलाब जामुन बनाने के लिए सबसे पहले एक पैन में 2 कप चीनी और 3 कप पानी लेकर चाशनी तैयार करें। इसमें कोई तार नहीं बनाना है, लेकिन यह थोड़ा चिपचिपा होना चाहिए। एक प्लेट में 250 ग्राम मावा लेकर अच्छी तरह से मैश करें। अब इसमें दो छोटा चम्मच मैदा मिलाएं और फिर से इसे अच्छी तरह से मैश करें, ताकि इसमें गुठलियां न रहें। जब मावा मुलायम हो जाए तो इसमें एक चौथाई चम्मच बेकिंग पाउडर मिलाएं और इसे अच्छी तरह से मिला लें। अब इससे छोटी-छोटी गोल लोइयां तैयार करें। एक कड़ाही में घी गर्म करें और उसमें इन्हें डालें। इस दौरान आंच को मध्यम ही रखना है। गुलाब जामुन जब सुनहरे रंग के हो जाएं, तो इसे घी से निकालकर चाशनी में डालेंगे। ध्यान रहे, चाशनी हल्की गुनगुनी गर्म हो।
यदि गुलाब जामुन तलते समय घी में फट रहे हों या फिर ज्यादा नरम बन रहे हों, तो मावे के आटे में थोड़ा-सा मैदा मिलाकर अच्छी तरह से मल लें। इसी तरह अगर गुलाब जामुन ज्यादा सख्त बन रहे हों, तो मावा के आटे में थोड़ा-सा दूध मिलाकर अच्छी तरह से मल लें। और हां, अधिक गरम चाशनी में गुलाब जामुन ना डालें।
आप इन्हें रबड़ी या आइसक्रीम के साथ परोस कर पार्टी या रेस्तरां वाली फीलिंग अपने परिवार को दे सकती हैं। इससे आपके बच्चे भी खुश रहेंगे और बाहर से कुछ भी मीठा मंगवाने की जिद नहीं करेंगे।
सेहत / शौर्यपथ /शहद एक आयुर्वेदिक औषधि के रूप में जाना जाता है। इसका अलग -अलग प्रकार से सेहत और सुंदरता के लिए प्रयोग किया जाता है। शहद का इस्तेमाल सेहत के लिहाज से पिछले कुछ सालों में बेहद बढ़ गया है। लोग शक्कर की बजाएं शहद का चुनाव कर रहे हैं। ताकि सेहत पर बुरा असर नहीं पड़े। इसके एक नहीं अनेक फायदे हैं। बारिश के मौसम में अक्सर पेट से संबंधित समस्या बढ़ जाती है। खानपान का बहुत अधिक ध्यान रखा जाता है। ऐसे में बारिश के मौसम में आप शहद का सेवन कर सेहत का ख्याल रख सकते हैं।
हालांकि बाजार में शहद की डिमांड बहुत अधिक बढ़ गई है। लेकिन इस बीच शहद नकली और असली दोनों मिल रहे हैं। तो जांच परख कर ही शहद का इस्तेमाल करें। शहद एकदम गाढ़ा होता है। वह पानी में डालने के बाद एकदम से नहीं घुलता है। बल्कि गाढ़ा होने पर वह एकदम से नीचे बैठ जाता है। हालांकि शहद जांचने का यह सुनिश्चित पैमाना नहीं है लेकिन विशेषज्ञ इसे एक तरीका मानते हैं। तो आइए जानते हैं शहद के सेवन से होने वाले लाभ -
शहद के गुण - शहद प्राकृतिक रूप से मीठा होता है। इसमें फैट, फाइबर और प्रोटीन नहीं होता है। इसमें ग्लूकोज, सुक्रोज और माल्टोज होता है। विटामिन -6 बी, विटामिन सी, एमिनो एसिड, कार्बोहाइड्रेट मुख्य रूप से पाया जाता है। साथ ही शहद में एंटीबैक्टीरियल और एंटीसेप्टिक गुण भी पाए जाते हैं। यह घाव लगने पर उसे भरने में काफी मदद करता है।
आइए जानते हैं शहद के फायदे -
- शहद एक इम्यूनिटी बूस्टर के तौर पर काम करता है। इसमें मौजूद एंटीऑक्सीडेंट ह्रदय के लिए लाभदायक है। वहीं अगर रोग प्रतिरोधक क्षमता बेहतर होगी तो संक्रामक बीमारियों से बचा जा सकेगा। प्रतिदिन दूध में एक चम्मच शहद मिलाकर पिएं। ध्यान रहे शहद मिलाने के बाद दूध को खोलना नहीं है। दूध गर्म होने के बाद ही शहद डाले।
- बारिश के मौसम में गरमा - गरम चीजों के खाने का मजा ही अलग होता है। अधिक खाने पर वजन बढ़ने लगता है। लेकिन ऐसे में शहद का सेवन जरूर करना चाहिए। ताकि वजन एक दम तेजी से नहीं बढ़ें। इसके लिए रोज सुबह गुनगुने पानी में एक चम्मच शहद मिलाकर उसका सेवन करें। अगर वजन बढ़ रहा होगा तो कम जाएगा। वरना सामान्य रहेग।
- तेल की अधिक चीजें खाने से गले में खराश होने लग जाती है। साथ ही सर्दी-जुकाम में भी आराम दिलाता है। गले की खराश दूर करने के लिए दो चम्मच शहद और एक चम्मच अदरक का रस। दोनों को अच्छे से मिक्स कर लें। आप दिन में दो बार इसका सेवन कर सकते हैं।
- बारिश के मौसम में थोड़ा सा भी दूषित पानी पीने से पेट खराब हो जाता है। कब्ज की समस्या हो जाती है। लेकिन शहद में मौजूद पोषक तत्व कब्ज दूर करने में काफी मददगार होते हैं। ऐसे में रात में गुनगुने दूध में एक चम्मच शहद मिलाकर पिएं। इससे आराम मिलेगा ।
सेहत / शौर्यपथ /झमाझम बरसात का मौसम आ गया है। रिमझिम बारिश में भुट्टा न खाया जाए, ऐसा संभव ही नहीं... सिके हुए देशी भुट्टे हों या फिर स्टीम में पके अमेरिकन कॉर्न...दोनों का अपना ही मजा है।
स्वाद तो इनका मजेदार होता ही है, जानिए सेहत के 15 फायदे भी-
1 सबसे पहली बात तो यह है कि बड़ों को साथ-साथ बच्चों को भी भुट्टे अवश्य खिलाने चाहिए इससे उनके दांत मजबूत होते हैं।
2 दूसरी बात कि जब आप भुट्टे खाएं तो दानों को खाने के बाद जो भुट्टे का भाग बचता है उसे फेंकें नहीं बल्कि उसे बीच से तोड़ लें और उसे सूंघें। इससे जुकाम में बड़ा फायदा मिलता है। बाद में इसे जानवर को खाने के लिए डाल सकते हैं।
3 अगर आप इसे जानवर को नहीं देते हैं तो उन्हें सूखाकर रखें फिर इन्हें जलाकर राख बना कर रख लें। सांस के रोगों में यह बड़ा कारगर इलाज है। इस राख को प्रतिदिन गुनगुने पानी के साथ फांकने से खांसी का इलाज होता है। खांसी कैसी भी हो यह चूर्ण लाभ देता ही है। यहां तक कि कुकर खांसी में भी बड़ी राहत मिलती है।
4 आयुर्वेद के अनुसार भुट्टा तृप्तिदायक, वातकारक, कफ, पित्तनाशक, मधुर और रुचि उत्पादक अनाज है। इसकी खासियत यह है कि पकाने के बाद इसकी पौष्टिकता और बढ़ जाती है। पके हुए भुट्टे में पाया जाने वाला कैरोटीनायड विटामिन-ए का अच्छा स्रोत होता है।
5 भुट्टे को पकाने के बाद उसके 50 प्रतिशत एंटी-ऑक्सीअडेंट्स बढ़ जाते हैं। यह बढती उम्र को रोकता है और कैंसर से लड़ने में मदद करता है। पके हुए भुट्टे में फोलिक एसिड होता है जो कि कैंसर जैसी बीमारी में लड़ने में बहुत मददगार होता है।
6 इसके अलावा भुट्टे में मिनरल्स और विटामिन प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। भुट्टे को एक बेहतरीन कोलेस्ट्रॉल फाइटर माना जाता है, जो दिल के मरीजों के लिए बहुत अच्छा है।
7 बच्चों के विकास के लिए भुट्टा बहुत फायदेमंद माना जाता है। ताजे दूधिया (जो कि पूरी तरह से पका न हो) मक्का के दाने पीसकर एक खाली शीशी में भरकर उसे धूप में रखिए। जब उसका दूध सूख कर उड़ जाए और शीशी में केवल तेल रह जाए तो उसे छान लीजिए। इस तेल को बच्चों के पैरों में मालिश कीजिए। इससे बच्चों का पैर ज्यादा मजबूत होगा और बच्चा जल्दी चलने लगेगा।
8 इस तेल को पीने से शरीर शक्तिशाली होता है। हर रोज एक चम्मच तेल को चीनी के बने शर्बत में मिलाकर पीने से बल बढ़ता है। ताजा मक्का के भुट्टे को पानी में उबालकर उस पानी को छानकर मिश्री मिलाकर पीने से पेशाब की जलन व गुर्दों की कमजोरी समाप्त हो जाती है।
9 टीबी के मरीजों के लिए मक्का बहुत फायदेमंद है। टीबी के मरीजों को या जिन्हें टीबी होने की आशंका हो हर रोज मक्के की रोटी खाना चाहिए। इससे टीबी के इलाज में फायदा होगा।
10 मक्के के बाल (सिल्क) का उपयोग पथरी रोगों की चिकित्सा मे होता है। पथरी से बचाव के लिए रात भर सिल्क को पानी मे भिगोकर सुबह सिल्क हटाकर पानी पीने से लाभ होता है। पथरी के उपचार में सिल्क को पानी में उबालकर बनाये गये काढ़े का प्रयोग होता है।
11 यदि गेहूं के आटे के स्थान पर मक्के के आटे का प्रयोग करें तो यह लीवर के लिए अधिक लाभकारी है। यह प्रचूर मात्रा में रेशे से भरा हुआ है इसलिए इसे खाने से पेट अच्छा रहता है। इससे कब्ज, बवासीर और पेट के कैंसर के होने की संभावना दूर होती है।
12 भुट्टे के पीले दानों में बहुत सारा मैगनीशियम, आयरन, कॉपर और फॉस्फोरस पाया जाता है जिससे हड्डियां मजबूत बनती हैं। एनीमिया को दूर करने के लिए भुट्टा खाना चाहिए क्योंकि इसमें विटामिन बी और फोलिक एसिड होता है।
13 खुजली के लिए भी भुट्टे का स्टॉर्च प्रयोग किया जाता है। वहीं इसके सौंदर्य लाभ भी कुछ कम नहीं है। इसके स्टार्च के प्रयोग से त्वचा खूबसूरत और चिकनी बन जाती है।
14 भुट्टा दिल की बीमारी को भी दूर करने में सहायक है क्योंकि इसमें विटामिन सी, कैरोटिनॉइड और बायोफ्लेवनॉइड पाया जाता है। यह कोलेस्ट्रॉल लेवल को बढ़ने से बचाता है और शरीर में खून के प्रवाह को भी बढ़ाता है।
15 इसका सेवन प्रेगनेंसी में भी बहुत लाभदायक होता है इसलिए गर्भवती महिलाओं को इसे अपने आहार में जरुर शामिल करना चाहिए। क्योंकि इसमें फोलिक एसिड पाया जाता है जो गर्भवती के लिए बेहद जरूरी है।
टिप्स ट्रिक्स / शौर्यपथ / बारिश के दौरान अक्सर तौलिए में से बदबु आने लगती है जिससे पूरा मूड ऑफ हो जाता है। इतना ही नहीं त्वचा की निखार पर भी असर पड़ सकता है। ऐसा इसलिए क्योंकि गिले या नमी वाले तौलिये में बैक्टीरिया पनप जाते हैं। इस वजह से त्वचा संबंधित परेशानी भी हो सकती है। तो आइए जानते हैं कैसे आसान तरीकों से तौलिए से आ रही बदबू को भगाएं।
1.सबसे पहली बात, कई लोग टॉवेल को ठीक करके उन्हें बाथरूम में रख देते हैं। लेकिन नमी के कारण उनमें बैक्टीरिया पनप जाते हैं। और वह बदबू मारने लगते हैं। इसके बाद वहीं
टॉवेल का उपयोग त्वचा संबंधित कुछ भी परेशानी हो सकती है। इसलिए तौलिए को बारिश के दिनों में सुखी जगहों पर ही रखें।
2. अक्सर नहाने के बाद लोग तौलिए को कही भी डाल देते हैं। ऐसे में बहुत बदबू आने लगती है। मौसम कोई-सा भी हो नहाने के बाद तौलिए को हमेशा किसी भी स्टैंड या रस्सी पर
ही डालें। जिससे टॉवेल का गीलापन सुख जाएगा और बदबू भी नहीं आएगी।
3. बारिश में दो तौलिए का इस्तेमाल कीजिए। और तौलिए को हर 2 दिन में धोते रहिए। जिससे बदबू नहीं आएगी और बैक्टीरिया भी नहीं पनपेंगे। मानसून सीजन में धूप बहुत कम
निकलती है लेकिन जब भी धूप निकलती है तो गीले कपड़ों को धूप में जरूर डालें। इससे किसी भी कपड़ों में से बदबू नहीं आएंगी। साथ ही तौलिए को धूप में जरूर रखें।
4.बारिश के सीजन में कपड़ें अगर नहीं सूखते हैं तो उन्हें आप पंखे की हवा में सुखा लीजिए। इससे बदबू नहीं आएगी।
5.बारिश के दौरान सर्फ का इस्तेमाल थोड़ा अधिक कर लीजिए। इससे कपड़ों में से सर्फ की सुगंध के बीच बदबू दब जाएगी। साथ ही आप कपड़ों को धोने के दौरान हल्का सा डेटॉल का प्रयोग भी कर सकते हैं
इससे भी कपड़ों में से बहुत कम
दुर्गंध आएंगी।
हल्की बदबू आने पर आप हल्का स्प्रे भी कर सकते हैं।
आस्था / शौर्यपथ /भगवान भोलेनाथ के पूजन में अभिषेक व बिल्वपत्र का प्रथम स्थान है। ऋषियों ने कहा है कि बिल्वपत्र भोले-भंडारी को चढ़ाना एवं 1 करोड़ कन्याओं के कन्यादान का फल एक समान है।
बेल का वृक्ष हमारे यहां संपूर्ण सिद्धियों का आश्रय स्थल है। इस वृक्ष के नीचे स्तोत्र पाठ या जप करने से उसके फल में अनंत गुना की वृद्धि के साथ ही शीघ्र सिद्धि की प्राप्ति होती है। इसके फल की समिधा से लक्ष्मी का आगमन होता है। बिल्वपत्र के सेवन से कर्ण सहित अनेक रोगों का शमन होता है। बिल्व पत्र सभी देवी-देवताओं को अर्पित करने का विधान शास्त्रों में वर्णित है। 'न यजैद् बिल्व पत्रैश्च भास्करं दिवाकरं वृन्तहीने बिल्वपत्रे
समर्पयेत' के अनुसार भगवान सूर्यनारायण को भी पूरी डंडी तोड़कर बिल्वपत्र अर्पित कर सकते हैं।
यदि साधक स्वयं बिल्वपत्र तोड़ें तो उसे ऋषि आचारेन्दु के द्वारा बताए इस मंत्र का जप करना चाहिए-
'अमृतोद्भव श्री वृक्ष महादेवत्रिय सदा।
गृहणामि तव पत्राणि शिवपूजार्थमादरात्।।'
बिल्वपत्र कब न तोड़ें :-
लिंगपुराण में बिल्वपत्र को तोड़ने के लिए चतुर्थी, अष्टमी, नवमी, चतुर्दशी, अमावस्या, संक्रांति काल एवं सोमवार को निषिद्ध माना गया है। शिव या देवताओं को बिल्वपत्र प्रिय होने के कारण इसे समर्पित करने के लिए किसी भी दिन या काल जानने की आवश्यकता नहीं है। यह हमेशा उपयोग हेतु ग्राह्य है। जिस दिन तोड़ना निषिद्ध है उस दिन चढ़ाने के लिए साधक को एक दिन पूर्व ही तोड़ लेना चाहिए।
बिल्वपत्र कभी बासी नहीं होते। ये कभी अशुद्ध भी नहीं होते हैं। इन्हें एक बार प्रयोग करने के पश्चात दूसरी बार धोकर प्रयोग में लाने की भी स्कन्द पुराण के इस श्लोक में आज्ञा है-
'अर्पितान्यपि बिल्वानि प्रक्षाल्यापि पुन: पुन:।
शंकरार्यर्पणियानि न नवानि यदि क्वाचित।।'
बिल्वपत्र के वे ही पत्र पूजार्थ उपयोगी हैं जिनके तीन पत्र या उससे अधिक पत्र एकसाथ संलग्न हों। त्रिसंख्या से न्यून पत्ती वाला बिल्वपत्र पूजन योग्य नहीं होता है। प्रभु को अर्पित करने के पूर्व बिल्वपत्र की डंडी की गांठ तोड़ देना चाहिए।
सारदीपिका के 'स्युबिल्व पत्रमधो मुखम्' के अनुसार बिल्वपत्र को नीचे की ओर मुख करने (पत्र का चिकना भाग नीचे रहे) ही चढ़ाना चाहिए। पत्र की संख्या में विषम संख्या का ही विधान शास्त्रसम्मत है।
बिल्वपत्र चढ़ाने के शुभ फल :-
शिवरात्रि, श्रावण, प्रदोष, ज्योतिर्लिंग, बाणर्लिंग में इसे भगवान रुद्र पर समर्पित करने से अनंत गुना फल मिलता है। किसी भी पूजन में या शिव पूजन में बिल्वपत्र का अनंत गुना फल मिलता है। किसी भी पूजन में या शिव पूजन में बिल्वपत्र का उपयोग अति आवश्यक एवं पापों का क्षय करने वाला होता है।
यदि किसी कारणवश बिल्वपत्र उपलब्ध न हो तो स्वर्ण, रजत, ताम्र के बिल्वपत्र बनाकर भी पूजन कर सकते हैं। ऐसा करने का फल भी वनस्पतिजन्य बिल्वपत्र के समकक्ष है। यदि किसी संकल्प के निमित्त बिल्वपत्र चढ़ाना हो तो प्रतिदिन समान संख्या में या वृद्धि क्रम की संख्या में ही उपयोग करना चाहिए। अधिक संख्या के पश्चात न्यून संख्या में नहीं चढ़ाना चाहिए।
पुराणों में उल्लेख है कि 10 स्वर्ण मुद्रा के दान के बराबर एक आक पुष्प के चढ़ाने से फल मिलता है। 1 हजार आक के फूल का फल एवं 1 कनेर के फूल के चढ़ाने का फल समान है। 1 हजार कनेर के पुष्प को चढ़ाने का फल एक बिल्व पत्र के चढ़ाने से मिल जाता है।
इसके वृक्ष के दर्शन व स्पर्श से ही कई प्रकार के पापों का शमन हो जाता है तो इस वृक्ष को कटाने अथवा तोड़ने या उखाड़ने से लगने वाले पाप से केवल ब्रह्मा ही बचा सकते हैं। अत: किसी भी स्थिति में इस वृक्ष को नष्ट होने से बचाने के लिए प्रयत्नशील रहना आध्यात्मिक एवं पर्यावरण दोनों की दृष्टि से लाभकारी है।
बिल्वपत्र चढ़ाने के नियम :-
यदि बिल्वपत्र पर चंदन या अष्टगंध से ॐ, शिव पंचाक्षर मंत्र या शिव नाम लिखकर चढ़ाया जाता है तो फलस्वरूप व्यक्ति की दुर्लभ कामनाओं की पूर्ति हो जाती है। कालिका पुराण के अनुसार चढ़े हुए बिल्व पत्र को सीधे हाथ के अंगूठे एवं तर्जनी (अंगूठे के पास की उंगली) से पकड़कर उतारना चाहिए। चढ़ाने के लिए सीधे हाथ की अनामिका (रिंग फिंगर) एवं अंगूठे का प्रयोग करना चाहिए।
तीन जन्मों के पापों के संहार के लिए त्रिनेत्ररूपी भगवान शिव को तीन पत्तियोंयुक्त बिल्व पत्र, जो सत्व-रज-तम का प्रतीक है, को इस मंत्र को बोलकर अर्पित करना चाहिए-
'त्रिदलं त्रिगुणाकरं त्रिनेत्र व त्रिधायुतम्।
त्रिजन्म पाप संहारं एकबिल्वम शिवार्पणम्।।
शिव उपासना अर्थात मंगल की कामना की साधना के लिए यदि प्रत्येक शिवभक्त अर्थात कल्याण की आकांक्षा का प्रेमी यदि बेल पत्र के वृक्ष का रोपण एवं उसके पत्र का अर्पण करें तो देश की अनेक समस्याओं सहित पर्यावरण की समस्या से भी बहुत हद तक मुक्ति मिल सकती है। इसमें तनिक भी संदेह नहीं है। आवश्यकता मात्र ऐसे शिवभक्तों की है।
बिल्वपत्र के बारे में महत्वपूर्ण बातें
1
बिल्वपत्र 6 महीने तक बासी नहीं माना जाता। इसे एक बार शिवलिंग पर चढ़ाने के बाद धोकर पुन: चढ़ाया जा सकता है। कई जगह शिवालयों में बिल्वपत्र उपलब्ध नहीं हो पाने पर इसके चूर्ण को चढ़ाने का विधान भी है।
2
बिल्वपत्र को औषधि के रूप में भी प्रयोग किया जाता है। इसमें निहित इगेलिन व इगेलेनिन नामक क्षार-तत्व औषधीय गुणों से भरपूर होते हैं। यह चातुर्मास में उत्पन्न होने वाली विभिन्न स्वास्थ्य समस्याओं से भी निजात दिलाता है ।
3
यह गैस, कफ और अपचन की समस्या को दूर करने में सक्षम है। इसके अलावा यह कृमि और दुर्गंध की समस्या में भी फायदेमंद है । प्रतिदिन 7 बिल्वपत्र खाकर पानी पीने से स्वप्नदोष की बीमारी से छुटकारा मिलता है। इसी प्रकार यह एक औषधि के रूप में भी काम आता है।
4
मधुमेह के रोगियों के लिए बिल्वपत्र रामबाण इलाज है। मधुमेह होने पर 5 बिल्वपत्र, 5 कालीमिर्च के साथ प्रतिदिन सुबह के समय खाने से अत्यधिक लाभ होता है। बिल्वपत्र के प्रतिदिन सेवन से गर्मी बढ़ने की समस्या भी समाप्त हो जाती है।
5
शिवलिंग पर प्रतिदिन बिल्वपत्र चढ़ाने से सभी समस्याएं दूर हो जाती हैं भक्त को कभी भी पैसों की समस्या नहीं रहती है। बिल्वपत्र को तिजोरी में रखने से भी बरकत आती है।
6
कुछ विशेष तिथियों पर बिल्वपत्र को तोड़ना वर्जित होता है। चतुर्थी, अष्टमी, नवमी, द्वादशी, चतुर्दशी, अमावस्या, पूर्णिमा, संक्रांति पर बिल्वपत्र को नहीं तोड़ना चाहिए।
7
सोमवार के दिन बिल्वपत्र को नहीं तोड़ना चाहिए, इसमें शिवजी का वास माना जाता है। इसके अलावा प्रतिदिन दोपहर के बाद भी बिल्वपत्र नहीं तोड़ना चाहिए।
बिल्वपत्र चढ़ाने का मंत्रः-
त्रिदलं त्रिगुणाकारं त्रिनेत्रं च त्रयायुधम् ।
त्रिजन्मपाप-संहारमेकबिल्वं शिवार्पणम्।।1।।
त्रिशाखैर्बिल्वपत्रैश्च ह्यच्छिद्रै: कोमलै: शुभै: ।
शिवपूजां करिष्यामि ह्येकबिल्वं शिवार्पणम्।।2।।
अखण्डबिल्वपत्रेण पूजिते नन्दिकेश्वरे ।
शुद्धयन्ति सर्वपापेभ्यो ह्येकबिल्वं शिवार्पणम्।।3।।
शालिग्रामशिलामेकां विप्राणां जातु अर्पयेत्।
सोमयज्ञ-महापुण्यमेकबिल्वं शिवार्पणम्।।4।।
दन्तिकोटिसहस्त्राणि वाजपेयशतानि च ।
कोटिकन्या-महादानमेकबिल्वं शिवार्पणम्।।5।।
लक्ष्म्या: स्तनत उत्पन्नं महादेवस्य च प्रियम्।
बिल्ववृक्षं प्रयच्छामि ह्येकबिल्वं शिवार्पणम्।।6।।
दर्शनं बिल्ववृक्षस्य स्पर्शनं पापनाशनम्।
अघोरपापसंहारमेकबिल्वं शिवार्पणम्।।7।।
काशीक्षेत्र निवासं च कालभैरव दर्शनम्।
प्रयागमाधवं दृष्ट्वा एक बिल्वं शिवार्पणम्।।8।।
मूलतो ब्रह्मरूपाय मध्यतो विष्णुरूपिणे ।
अग्रत: शिवरूपाय ह्येकबिल्वं शिवार्पणम्।।9।।
बिल्वाष्टकमिदं पुण्यं य: पठेच्छिवसन्निधौ।
सर्वपापविनिर्मुक्त: शिवलोकमवाप्नुयात्।।10।।
इति बिल्वाष्टकं सम्पूर्णम्।।
धर्म संसार / शौर्यपथ / नाग पंचमी का त्योहार श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी को मनाया जाता है। इस दिन नागों की पूजा प्रधान रूप से की जाती है। कुछ प्रदेशों में चैत्र व भाद्रपद शुक्ल पंचमी के दिन भी नाग पंचमी मनाई जाती है। इस बार अंग्रेजी माह के अनुसार 13 अगस्त 2021 शुक्रवार को शुक्ल पक्ष की पंचमी को नागपंचमी का त्योहार रहेगा। आओ जानते हैं नागों के बारे में 40 रोचक तथ्य।
1. ज्योतिष के अनुसार पंचमी तिथि के स्वामी नाग हैं। इस दिन अष्ट नागों की पूजा प्रधान रूप से की जाती है।
2. अष्टनागों के नाम है- अनन्त, वासुकि, पद्म, महापद्म, तक्षक, कुलीर, कर्कट और शंख। भारत में उपरोक्त आठों के कुल का ही क्रमश: विस्तार हुआ जिनमें निम्न नागवंशी रहे हैं- नल, कवर्धा, फणि-नाग, भोगिन, सदाचंद्र, धनधर्मा, भूतनंदि, शिशुनंदि या यशनंदि तनक, तुश्त, ऐरावत, धृतराष्ट्र, अहि, मणिभद्र, अलापत्र, कम्बल, अंशतर, धनंजय, कालिया, सौंफू, दौद्धिया, काली, तखतू, धूमल, फाहल, काना, गुलिका, सरकोटा इत्यादी नाम के नाग वंश हैं।
3. नाग देवों की माता का नाम कद्रू है और पिता का नाम कश्यप।
4. नाग देवों की बहन मां मनसा देवी है।
5. शिवजी के गले में वासुकि नामक नाग लिपटा रहता है।
6. भगवान विष्णुजी शेषनाग की शैय्या पर सोते हैं।
7. खांडववन में जब आग लगाई थी तो अश्वसेन नामक का नाग बच गया था जो अर्जुन से बदला लेना चाहता था।
8. वास्तु के अनुसार मकान की नींव में चांदी या तांबें का नाग रखा जाता है।
9. पौराणिक मान्यता के अनुसार नागों के पास नागमणि रहती है।
10. राजा परीक्षित तो जब तक्षक नाग ने डंस लिया था तो उनके मरने के बाद उनके पुत्र जनमेजय ने नागयज्ञ करने सभी नागों को मार दिया था जिसमें वासुकि, तक्षक और कर्कोटक नामक नाग बच गए थे। वासुकि और तक्षक को इंद्र ने बचाया तो कर्कोटक उज्जैन में महाकाल की शरण में रहकर बच गए
थे।
11. नाग और सर्प में फर्क है। सभी नाग कद्रू के पुत्र थे जबकि सर्प क्रोधवशा के। कश्यप की क्रोधवशा नामक रानी ने सांप या सर्प, बिच्छु आदि विषैले जन्तु पैदा किए।
12. अग्निपुराण में 80 प्रकार के नाग कुलों का वर्णन है, जिसमें वासुकी, तक्षक, पद्म, महापद्म प्रसिद्ध हैं। जिस तरह सूर्यवंशी, चंद्रवंशी और अग्निवंशी माने गए हैं उसी तरह नागवंशियों की भी प्राचीन परंपरा रही है। महाभारत काल में पूरे भारत वर्ष में नागा जातियों के समूह फैले हुए थे। अथर्ववेद में कुछ नागों के नामों का उल्लेख मिलता है। ये नाग हैं श्वित्र, स्वज, पृदाक, कल्माष, ग्रीव और तिरिचराजी नागों में चित कोबरा (पृश्चि), काला फणियर (करैत), घास के रंग का (उपतृण्य), पीला (ब्रम), असिता रंगरहित (अलीक), दासी, दुहित, असति, तगात, अमोक और तवस्तु आदि।
13. पौराणिक कथाओं के अनुसार पाताल लोक में कहीं एक जगह नागलोक था, जहां मानव आकृति में नाग रहते थे। कहते हैं कि 7 तरह के पाताल में से एक महातल में ही नागलोक बसा था, जहां कश्यप की पत्नी कद्रू और क्रोधवशा से उत्पन्न हुए अनेक सिरों वाले नाग और सर्पों का एक समुदाय रहता था। उनमें कहुक, तक्षक, कालिया और सुषेण आदि प्रधान नाग थे।
14. जैन, बौद्ध देवताओं के सिर पर भी शेष छत्र होता है।
15. कुंती पुत्र अर्जुन ने पाताल लोक की एक नागकन्या से विवाह किया था जिसका नाम उलूपी था। वह विधवा थी।
16. भारत के कई शहर और गांव 'नाग' शब्द पर आधारित हैं। मान्यता है कि महाराष्ट्र का नागपुर शहर सर्वप्रथम नागवंशियों ने ही बसाया था।
17. नाग से संबंधित कई बातें आज भारतीय संस्कृति, धर्म और परम्परा का हिस्सा बन गई हैं, जैसे नाग देवता, नागलोक, नागराजा-नागरानी, नाग मंदिर, नागवंश, नाग कथा, नाग पूजा, नागोत्सव, नाग नृत्य-नाटय, नाग मंत्र, नाग व्रत और अब नाग कॉमिक्स।
18. इच्छाधारी नाग होते हैं, जो रूप बदल सकते हैं।
19. नाग-नागिन बदला लेते हैं। नाग और सर्प में फर्क होता है।
20. कुछ दुर्लभ नागों के सिर पर मणि होती हैं।
21. नागों की स्मरण शक्ति तेज होती है।
22. सौ वर्ष की उम्र पूरी करने के बाद नागों में उड़ने की शक्ति हासिल हो जाती है।
23. सौ वर्ष की उम्र के बाद नागों में दाढ़ी-मूंछ निकल आती है।
24. नाग किसी के भी शरीर में आ सकते हैं।
25. नाग कन्याएं होती हैं जो नागलोक में रहती हैं।
26. अजगर तो कई होते हैं लेकिन नाग प्रजाति का अजगर दूर से ही किसी को अपनी नाक से खींचने की ताकत रखता है।
27. नाग खुद का बिल नहीं बनाता, वह चूहों के बिल में रहता है।
28. नाग जमीन के अंदर गढ़े धन की रक्षा करता है। इसे नाग चौकी कहा जाता है।
29. नागों में मनुष्य को सम्मोहित कर देने की शक्ति होती है।
30. नाग संगीत सुनकर झूमने लगते हैं।
31. नाग को मारना या नागों की लड़ाई देखना पाप है।
32. नाग की केंचुल दरवाजे के ऊपर रखने से घर को नजर नहीं लगती।
33. बड़े सांप, नाग आदि शिव का अवतार माने जाते हैं।
34. कुछ नाग पांव वाले होते हैं।
35. नाग एक मुंह ही नहीं दोमुहे या 10 मुंह वाले भी होते हैं।
36. नाग रूप में देवता ही होते हैं जो इस धरती के सभी प्राणियों से कई गुना अपनी समझ रखते हैं।
37. नागों को ही सबसे पहले भूकंप, प्रलय या अन्य किसी प्राकृतिक आपता का पता चल जाता है।
38. कुंडली में कालसर्पदोष को नागदोष नहीं करते हैं यह राहु और केतु के कारण होता है।
39. सर्पधर नामक एक राशि होती है जिसे अंग्रेजी में ओफियुकस कहते हैं। समद्री नाग नामक भी एक राशि होती है जिसे अंग्रेजी में हाइड्रा कहते हैं।
40. लक्ष्मणजी और बलरामजी शेषनाग के अवतार थे। शेषनाग के और भी कई अवतार हुए हैं।
लाइफस्टाइल / शौर्यपथ /रिश्ता चाहे कोई भी हो, छोटी सी गलतफहमी और कम्यूनिकेशन का अभाव अकसर रिश्ते की डोर को कमजोर बनाने का काम करता है। आपका अपने पार्टनर के साथ कैसा रिश्ता रहने वाला है, यह काफी हद तक आपके नेचर पर भी निर्भर करता है। अगर आप भी अपने रिश्ते की मिठास और खुशबू पहले दिन की ही तरह सालों-साल फ्रेश बनाए रखना चाहते हैं तो फॉलो करें ये टिप्स।
आपसी बॉन्डिंग को बेहतर बनाएंगे ये टिप्स-
- साथी को डॉमिनेट करने की न करें कोशिश-
आपका अपने पार्टनर के साथ भले ही कई सालों का रिश्ता हो, लेकिन उसमें प्यार और सम्मान की मिठास कम न होने दें। एक दूसरे से बात करते समय एक दूसरे की भावनाओं का ध्यान रखें, गुस्सा या चिल्लाकर बात करने की जगह प्यार से बात करें।
थैंक यू है बड़े कमाल का-
कई बार आपका पार्टनर अपना फर्ज समझकर आपके लिए कुछ खास प्लान करता है। ऐसे में आपको भी चाहिए कि आप उनकी भावनाओं को महसूस करके उन्हें उस प्यार और केयर के लिए थैंक यू बोलें। आपके ऐसा करने से उन्हें काफी अच्छा फील होगा और आपकी बॉन्डिंग भी बेहतर बनेगी।
गलती पर माफी मांगने में न शर्माएं-
किसी भी रिश्ते में थोड़े बहुत झगड़े भी होते ही हैं, लेकिन आपको हमेशा याद रखना चाहिए कि आपका रिश्ता उन झगड़ों से कहीं बड़ा है। अगर आपसे गलती हुई है तो माफी मांगने में शर्म नहीं करनी चाहिए।
कॉम्प्लिीमेंट जरूर दें-
पार्टनर को दिया आपका एक कॉम्प्लिीमेंट बहुत बड़ा कमाल कर सकता है। आपके ऐसा करने से आपके साथी का कॉन्फिडेंस बढ़ जाता है और आपका पार्टनर काफी अच्छा फील करता है।
पार्टनर से डिसकस करना भी है जरूरी-
यदि आप कोई काम करने जा रहे हैं तो अपने पार्टनर से उसके बारे में डिसकस जरूर करें और उनसे सुझाव मांगें। आपके ऐसा करने से आपके भी सारे संशय दूर हो जाएंगे और आपके पार्टनर को भी अपनी अहमियत का अहसास होगा।
Feb 09, 2021 Rate: 4.00
