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सेहत / शौर्यपथ / एप्पल साइडर विनेगर की किचन में आम जगह बन गई है। कई तरह से इसका उपयोग किया जा रहा है ताकि खाने में और स्वाद बढ़ जाए। लेकिन इसका सही इस्तेमाल नहीं करने पर भारी पड़ सकता है। जी हां, साइडर विनेगर के जितने फायदे हैं उतने ही नुकसान भी है।
इसलिए इस पोस्ट में आप जानेंगे की साइडर विनेगर किस तरह से नुकसानदेह भी हो सकता है और उसे कब यूज नहीं करना चाहिए-
1. लेने का सही तरीका- जी हां, अगर आप साइडर विनेगर का असमय या गलत समय पर इस्तेमाल करते हैं तो यह भारी पड़ सकता है। इसलिए ध्यान रहें खाना खाने के बाद इसका तुरंत सेवन नहीं करें। पाचन क्रिया संबंधित परेशानी है तो आप इसे खाने से पहले ले सकते हैं।
2. सांस में जाने से बचें- अक्सर चीजों को सूंघ कर खाते हैं। लेकिन यह गलती एप्पल विनेगर के साथ नहीं करें। इसमें मौजूद केमिकल्स नाक और सांस में जाने से आपको नुकसान हो सकता है। इसलिए सूंघें नहीं सीधे पानी से उतारे लें।
3. ब्रश नहीं करें- सेब का सिरका जितना फायदेमंद है उतना ही नुकसानदेह भी है। इसे पीने के बाद ब्रश करने से बचें। दांतों में मौजूद एनेमल को इससे नुकसान होता है। इस वजह से दांत कमजोर होने लगते हैं।
4. सोने से पहले नहीं लें- विनेगर सोने से 1 घंटे पहले तक ले सकते हैं। इसे लेने के बाद आप सोने जाते हैं तो यह आपकी भोजन नली को नुकसान पहुंचा सकता है। इसके सेवन के बाद 30 मिनट घूमें या सीधे बैठे रहें।
5. अधिक सेवन से बचें- जी हां इसका अधिक सेवन आपके लिए नुकसानदेह है। अगर आप पहली बार इसे ले रहे हैं तो थोड़ा-थोड़ा ही सेवन करें। साथ ही यह भी ध्यान रखें कि आपको किसी प्रकार की जलन या दुष्प्रभाव तो नहीं हो रहा।
शौर्यपथ / मॉनसून हो या ठंड का मौसम अगर आपको पानी की प्यास नहीं लगती है तब भी आपको पानी पीना चाहिए। पानी नहीं पीने से बहुत सारी गंभीर समस्या होने लगती है। इसके बाद डॉक्टर सबसे पहले पानी पीने की मात्रा बढ़ाने पर जोर देता है। अगर आप स्वस्थ्य है तब भी पानी का सेवन जरूर करें। अगर आप परिवार में किसी भी सदस्य से जानेंगे कि आप दिनभर में कितना पानी पी लेते हैं कुछ 1 लोग बोलते हैं 2 लीटर पानी। शरीर में बीमारी बढ़ने की सबसे बड़ी वजह पानी की कमी। जिसे एक दिन में ढेर सारा पानी पीकर कम नहीं किया जा सकता है। अगर आपको पानी की प्यास नहीं लगती है तो कुछ आसान उपाय है जिन्हें रोज फॉलो करें। इसके बाद आपको पानी की प्यास जरूर लगेगी।
1.अक्सर खाना खाने के बाद 15 मिनट घूमने की सलाह दी जाती है ताकि भोजन पच सकें। लेकिन बहुत कम लोग घूमते हैं। अगर आप घूम नहीं सकते हैं तो खाना खाने के बाद नियमित रूप से सौफ मिश्री खाना शुरू कर दीजिए। आपको पानी की प्यास लगने लगेगी।
2.भोजन के बाद तुरंत पानी कभी मत पीजिएं।
इससे आपका पेट भी फूलने लगेगा और पाचन प्रक्रिया भी बिगड़ जाएगी। इसलिए भोजन करने के 45 मिनट बाद ही पानी पिएं। तब तक आपको पानी की जोर से प्यास लगेगी और पानी भी अधिक पिएंगे।
3.कच्ची हरी सब्जियों को अधिक से अधिक सेवन करें। बारिश के मौसम में आप सब्जियों को उबाल कर खा सकते हैं। हर सब्जी में मौजूद तत्व आपके पानी की प्यास को बढ़ाते हैं। इसलिए कोई सा भी मौसम हो हरी सब्जियों का सेवन करते रहें।
4. कई लोग ऑफिस में बैठकर काम करते हैं उन्हें पानी की बहुत प्यास नहीं लगती है। क्योंकि उनकी बॉडी का तापमान स्थिर रहता है। उन्हें किसी प्रकार की गर्मी नहीं लगती, पसीना नहीं आता है।ऐसे में शरीर को पानी की अधिक आवश्यकता नहीं होती है और कितना ही कुछ भी खाले प्यास ही नहीं लगती।
5.कई लोग रात को बहुत देरी से भोजन करते हैं जिस वजह से उन्हें पानी की प्यास नहीं लगती है। और कई बार बिना पानी पिएं ही सो जाते हैं। ऐसे में कोशिश करें रात का भोजन 7 बजे तक कर लें । इससे आपकों 9 बजे तक अत्यधिक प्यास लगने लगेगी। और इस तरह पानी की प्यास को बढ़ाया जा सकता है।
6. कई लोग पानी की प्यास लगने पर कॉफी या चाय का सेवन करने लगते हैं। जो पानी की प्यास को नहीं बुझा सकती है बल्कि आपको निर्जलित कर सकती है। इसलिए कॉफी या चाय का सेवन करते हैं तो पानी दो गुना पिएं।
7.दरअसल प्यास लगना आपके मेटाबॉलिज्म पर भी निर्भर करता है। आप जितना अधिक कार्य करेंगे आपको प्यास लगेगी। अगर आपको प्यास नहीं लगती है तो सुबह में एक्सरसाइज जरूर करें।इससे आपका मेटाबॉलिज्म रेट सही रहेगा।
पानी की कमी से बीमारियों का जमावड़ा बढ़ता है
-थकान लगना, कमजोरी आना, डिहाईड्रेशन होना, दिल की समस्या, चेहरे की चमक चले जाना, ड्राईनेस बढ़ना, मोटापा, मुंह से दुर्गंध आना और यूरिन हद से अधिक पीली आना इत्यादि। इसलिए अधिक से अधिक पानी पिएं।
टिप्स ट्रिक्स / शौर्यपथ /सुबह उठते ही सबसे पहले लोग चाय पीना पसंद करते हैं। इसके बाद उनके दिन की शुरूआत होती है। फिर वह कोई अन्य कार्य करते हैं। लेकिन कई बार लोग चाय पीने के बाद शिकायत करते हैं कि उन्हें एसिडिटी हो रही है, बदहजमी, पाचन क्रिया गड़बड़ हो रही और अन्य पेट से संबंधित बीमारियां। लेकिन सबसे पहली बात कही जाती है कि कभी भी खाली पेट चाय नहीं पीना चाहिए। वह सेहत के लिए सबसे अधिक हानिकारक है। लेकिन हर रोज होने वाली छोटी-छोटी बीमारी से तंग आ गए है तो उसकी दवा है खाली पेट पानी पीएं। जी हां, इस दवा की कोई कीमत नहीं है बस यह कि चाय से पहले और बांसी मुंह 1 गिलास पानी पीना है। आइए जानते हैं खाली पेट पानी पीने के फायदे -
1. आंतों को मिले आराम - खाली पेट पानी पीने से आंत साफ होती है और पाचन प्रक्रिया मजबूत होती है।
2. टॉक्सिंस को बाहर निकालें - खाली पेट पानी से रातभर में शरीर में टॉक्सिन्स जम जाते हैं। जो सुबह यूरिन के जरिए बाहर निकल जाते हैं।>
3. बेवजह दर्द को करें दूर - हर वक्त किसी न किसी कारण से सिरदर्द होता रहता है। ऐसे में सुबह पानी पीने से सिरदर्द की समस्या तो दूर होती ही है। साथ ही दांतों के दर्द में भी आराम मिलता है। >
4. चेहरा खिल जाएगा - दरअसल, खाली पेट पानी पीने से ब्लड सर्कुलेशन अच्छा हो जाता है। साथ ही शरीर में मौजूद टॉक्सिन्स बाहर निकल जाते हैं। इससे चेहरा दमकता है और निखार जरूर आता है।
5. पथरी में मिले आराम - पथरी होने पर अक्सर लोगों को अधिक से अधिक पानी पीने की सलाह दी जाती है। ताकि वह यूरिन के जरिए निकल जाएं। लेकिन रोज सुबह खाली पेट पानी पीते हैं तो पथरी की संभावना बहुत हद तक कम हो जाएगी। इसलिए सेहत बिगड़े इसके पहले ही अधिक पानी पीएं।
आस्था / शौर्यपथ / भगवान शिव को सावन का महीना अत्यंत ही प्रिय है। जो भी भक्त इस माह में उनकी विधिवतरूप से पूजा करता है उसकी सभी मनोकामना पूर्ण होती है। आओ जानते हैं कि आखिर शिवजी को क्यों प्रिय है सावना का महीना।
1. राजा दक्ष के यज्ञ में आत्मदाह करने के बाद माता सती का दूसरा जन्म माता पार्वती के रूप में हुआ था। माता पार्वती ने शिवजी को प्राप्त करने के लिए कठोर तप किया था जिसके चलते सावन के माह में शिवजी ने माता से विवाह किया था। इसलिए उन्हें यह माह प्रिय है। इस संबंध में ब्रह्मा के पुत्र सनत कुमारों ने शिवजी से प्रश्न किया था कि आपको सावन का माह क्यों प्रिय है तो शिवजी ने उपरोक्त बात बताई थी।
2. देव और दैत्यों ने मिलकर समुद्र मंथन किया था। मंथन करने से सबसे पहले विष निकला था। विष को शिवजी ने अपने गले में धारण कर लिया था। इसके कारण वे नीलकंठ कहलाने लगे। विष के काणण उनके शरीर का तापमान बढ़ने लगा तो देवताओं ने उन पर शीतल जल डालकर उस ताप को शांत किया। तभी से शिवजी को जल अतिप्रिय लगने लगता है।
3. कई जगहों पर बारिश में शिवलिंग पानी में डूबे रहते हैं। शिवलिंग के उपर एक कलश लटका रहता है जिससे बूंद-बूंद जल टपकता रहता है उसे जलाधारी कहती हैं। जहां भी प्राकृति शिवलिंग है वहां जल की धारा भी है।
4. शिवजी के मस्तक पर चंद्रमा और गंगा मैया विराजमान है जिनका संबंध में जल से ही है।
कैलाश पर्वत के चारों और बर्फ जमी रहती है और उसके पास है मान सरोवार। शिवजी को जल अति प्रिय है जबकि विष्णुजी तो जल में ही निवास करते हैं।
5. यह भी कहा जाता है कि भगवान शिव सावन के महीने में धरती पर अवतरित होकर अपनी ससुराल गए थे और वहां उनका स्वागत अर्ध्य देकर, जलाभिषेक कर किया गया था। अत: माना जाता है, कि प्रत्येक वर्ष सावन माह में भगवान शिव अपनी ससुराल आते हैं। इसीलिए यह माह उन्हें प्रिय है।
यही उपरोक्त सभी कारण है कि बारिश का मौसम और उसमें भी श्रावण का माह उन्हें अति प्रिय है जबकि सभी ओर हरियाली और शीतलता व्याप्त हो जाती है।
धर्म संसार / शौर्यपथ / भगवान शिव अर्थात पार्वती के पति शंकर जिन्हें महादेव, भोलेनाथ, आदिनाथ आदि कहा जाता है। शिवजी देव और असुर दोनों के ही भगवान हैं। उनकी गणों की संज्ञा अनगिनत है। उनके पार्षत और उनकी पंचायत भी है। आओ जानते हैं कि शिव पंचायत में कौन कौन शामिल है।
1. शिव पंचायक ये 5 देवता थे:- 1. सूर्य, 2. गणपति, 3. देवी, 4. रुद्र और 5. विष्णु ये शिव पंचायत कहलाते हैं।
2. शिव पंचायत : पंचायत का फैसला अंतिम माना जाता है। देवताओं और दैत्यों के झगड़े आदि के बीच जब कोई महत्वपूर्ण निर्णय लेना होता था तो शिव की पंचायत का फैसला अंतिम होता था। शिव की पंचायत में 5 देवता शामिल थे।
3. शिव पार्षद : जिस तरह जय और विजय विष्णु के पार्षद हैं उसी तरह बाण, रावण, चंड, नंदी, भृंगी आदि शिव के पार्षद हैं। यहां देखा गया है कि नंदी और भृंगी गण भी है, द्वारपाल भी है और पार्षद भी।
4. शिव के द्वारपाल : नंदी, स्कंद, रिटी, वृषभ, भृंगी, गणेश, उमा-महेश्वर और महाकाल।
5. शिव के गण : शिव के गणों में भैरव, वीरभद्र, मणिभद्र, चंदिस, नंदी, श्रृंगी, भृगिरिटी, शैल, गोकर्ण, घंटाकर्ण, जय और विजय प्रमुख हैं। इसके अलावा, पिशाच, दैत्य और नाग-नागिन, पशुओं को भी शिव का गण माना जाता है। शिवगण नंदी ने ही 'कामशास्त्र' की रचना की थी। 'कामशास्त्र' के आधार पर ही 'कामसूत्र' लिखा गया।
आस्था / शौर्यपथ / माना जाता है कि हिन्दू कैलेंडर अनुसार वैशाख माह की पूर्णिमा को गौतम बुद्ध का जन्म हुआ था और इसी दिन उन्हें ज्ञान भी प्राप्त हुआ था। बुद्ध जयंती को हिन्दू और बौद्ध दोनों ही धर्मों के अनुयायी मनाते हैं। भारत और विश्व में ऐसे कई संयुक्त मंदिर है जो भगवान बुद्ध और विष्णु को समर्पित हैं। विश्वभर में बुद्ध पूर्णिमा मनाने के अलग अलग तरीके हैं। आओ जानते हैं उत्सव की सामान्य परंपरा।
1. इस पूर्णिमा के दिन घर घर में खीर बनाई जाती है और भगवान बुद्ध को खीर का प्रसाद चढ़ाया जाता है। गौतम बुद्ध ने ज्ञान प्राप्त के बाद खीर पीकर ही अपना व्रत खोला था।
2. इन दिन बौद्ध मंदिरों के बहुत ही अच्छे से सजाया जाता है और वहां पर बौद्ध प्रार्थनाओं का आयोजन किया जाता है।
3. सूर्योदय होने से पहले पूजा स्थल पर इकट्ठा होकर प्रार्थना और नृत्य किया जाता है। कुछ जगह पर परेड और शारीरिक व्यायाम करके भी बुद्ध पूर्णिमा का उत्सव मनाया जाता है।
4. बुद्ध पूर्णिमा के दिन सूर्योदय के बाद मंदिर और धार्मिक स्थलों पर बौद्ध झंडा फहराया जाता है। यह झंडा नीले, लाल, सफ़ेद, पीले और नारंगी रंग का होता है। लाल रंग आशीर्वाद, सफेद रंग धर्म की शुद्धता का, नारंगी रंग को बुद्धिमत्ता का, और पीले रंग को कठिन स्थितियों से बचने का प्रतीक माना जाता है।
5. बुद्ध पूर्णिमा के अवसर पर दान देने का भी विशेष महत्व है। कई बौद्ध मंदिर इस उत्सव का आयोजन लोगों को मुफ्त सुविधा प्रदान करके मनाते हैं।
6. बुद्ध पूर्णिमा के दिन कुछ लोग पिंजरे में कैद पक्षियों और अन्य जानवरों को आजाद करके भी मनाते हैं।
7. श्रीलंकाई इस दिन को 'वेसाक' उत्सव के रूप में मनाते हैं जो 'वैशाख' शब्द का अपभ्रंश है।
8. इस दिन बौद्ध घरों में दीपक जलाए जाते हैं और फूलों से घरों को सजाया जाता है।
9. दुनियाभर से बौद्ध धर्म के अनुयायी बोधगया आते हैं और प्रार्थनाएं करते हैं।
10. बौद्ध धर्म के धर्मग्रंथों का निरंतर पाठ किया जाता है।
11. मंदिरों व घरों में अगरबत्ती लगाई जाती है। मूर्ति पर फल-फूल चढ़ाए जाते हैं और दीपक जलाकर पूजा की जाती है।
12. गया के बोधिवृक्ष की पूजा की जाती है। उसकी शाखाओं पर हार व रंगीन पताकाएं सजाई जाती हैं। जड़ों में दूध व सुगंधित पानी डाला जाता है। वृक्ष के आसपास दीपक जलाए जाते हैं।
13. इस दिन मांसाहार का परहेज होता है क्योंकि बुद्ध पशु हिंसा के विरोधी थे।
14. इस दिन किए गए अच्छे कार्यों से पुण्य की प्राप्ति होती है। अत: लोग अपने अपने तरीके से कोई भी एक पुण्य कार्य करते हैं।
15. गरीबों को भोजन व वस्त्र दिए जाते हैं।
16. दिल्ली संग्रहालय इस दिन बुद्ध की अस्थियों को बाहर निकालता है जिससे कि बौद्ध धर्मावलंबी वहां आकर प्रार्थना कर सकें।
क्या है भगवान बुद्ध का धर्म चक्र प्रवर्तन, जानिए
गौतम बुद्ध जी को जब आत्म ज्ञान उपलब्ध हुआ तो उसके पश्चात उन्होंने सारनाथ में अपने पहले 5 शिष्यों को गुरु पूर्णिमा के दिन धर्म के 8 सूत्र बताए जिन्हें अष्टांगिका कहा गया। आष्टांगिक अर्थात जीवन को सुधारने के 8 कदम। प्रारंभिक बौद्ध इसे 'काल चक्र' कहते रहे थे, अर्थात समय का चक्र। समय और कर्म का अटूट संबंध है। कर्म का चक्र समय के साथ सदा घूमता रहता है।
कालांतार में यही धर्म चक्र प्रवर्तन कहलाने लगा। बुद्ध के उपदेश देने के इस कार्य को ही धर्म चक्र के आरम्भ का अथवा प्रवर्तन का सूचक माना गया और इसे एक चक्र में आठ तीलियों के रूप में दर्शाया जाने लगा और इसे धर्मचक्र का नाम दिया गया। धम्मचक्र के आठ पहिए तथागत बुद्ध के बताए हुए अष्टांगिक मार्ग को दर्शाते हैं। बाद के अनुयायियों ने 24 आवश्यक गुण निर्धारित किए जैसे धैर्य, श्रद्धा, आत्म नियंत्रण आदि, इन्हें भी बाद के धर्मंचक्र में 24 आरियों के रूप में प्रतीक रूप दर्शाया जाने लगा। अशोक के प्रस्तर लेखों में भी धर्मचक्र है और अशोक स्तम्भ में यह चक्र 24 आरियों का है। इसे ही भारत के राष्ट्रीय ध्वज में अपनाया गया है।
गौतम बुद्ध जी को जब आत्म ज्ञान उपलब्ध हुआ तो उसके पश्चात उन्होंने सारनाथ में अपने पहले 5 शिष्यों को गुरु पूर्णिमा के दिन धर्म के 8 सूत्र बताए जिन्हें अष्टांगिका कहा गया। आष्टांगिक अर्थात जीवन को सुधारने के 8 कदम। प्रारंभिक बौद्ध इसे 'काल चक्र' कहते रहे थे, अर्थात समय का चक्र। समय और कर्म का अटूट संबंध है। कर्म का चक्र समय के साथ सदा घूमता रहता है।
कालांतार में यही धर्म चक्र प्रवर्तन कहलाने लगा। बुद्ध के उपदेश देने के इस कार्य को ही धर्म चक्र के आरम्भ का अथवा प्रवर्तन का सूचक माना गया और इसे एक चक्र में आठ तीलियों के रूप में दर्शाया जाने लगा और इसे धर्मचक्र का नाम दिया गया। धम्मचक्र के आठ पहिए तथागत बुद्ध के बताए हुए अष्टांगिक मार्ग को दर्शाते हैं। बाद के अनुयायियों ने 24 आवश्यक गुण निर्धारित किए जैसे धैर्य, श्रद्धा, आत्म नियंत्रण आदि, इन्हें भी बाद के धर्मंचक्र में 24 आरियों के रूप में प्रतीक रूप दर्शाया जाने लगा। अशोक के प्रस्तर लेखों में भी धर्मचक्र है और अशोक स्तम्भ में यह चक्र 24 आरियों का है। इसे ही भारत के राष्ट्रीय ध्वज में अपनाया गया है।
मछली पालन से जुड़े दो लाख से अधिक मत्स्य कृषकों और मछुआरों को मिलेंगी कई तरह की सहूलियतें
रायपुर / शौर्यपथ / मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की कैबिनेट द्वारा बीते 20 जुलाई को राज्य में मछली पालन को कृषि का दर्जा देने का फैसला सराहनीय है। सरकार के इस फैसले से मछुआरों को मत्स्य पालन के लिए किसानों के समान ब्याज रहित ऋण सुविधा मिलने के साथ ही जलकर और विद्युत शुल्क में भी छूट का लाभ मिलेगा। इससे राज्य में मछली पालन को बढ़ावा मिलने के साथ ही इससे जुड़े 2 लाख 20 हजार लोगों की स्थिति में सकारात्मक बदलाव आएगा।
छत्तीसगढ़ राज्य में बीते ढाई सालों में छत्तीसगढ़ सरकार के प्रयासों से मछली पालन के क्षेत्र में उत्तरोत्तर वृद्धि हुई है। राज्य में ढाई सालों में मत्स्य बीज उत्पादन के मामले में 13 प्रतिशत और मत्स्य उत्पादन में 9 प्रतिशत की उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की है। कृषि का दर्जा मिलने से मत्स्य पालन के क्षेत्र में राज्य अब और तेजी से आगे बढ़ेगा, यह संभावना प्रबल हो गई है। छत्तीसगढ़ राज्य में मत्स्य पालन के लिए अभी मछुआरों को एक प्रतिशत ब्याज पर एक लाख तक तथा 3 प्रतिशत ब्याज पर अधिकतम 3 लाख रुपए तक ऋण मिलता था। इस क्षेत्र को कृषि का दर्जा मिलने से अब मत्स्य पालन से जुड़े लोग सहकारी समितियों से अब अपनी जरूरत के अनुसार शून्य प्रतिशत ब्याज पर सहजता से ऋण प्राप्त कर सकेंगे। किसानों की भांति अब मत्स्य पालकों एवं मछुआरों को क्रेडिट कार्ड की सुविधा मिलेगी।
राज्य में मछली पालन के लिए 30 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई बांधों एवं जलाशयों से नहर के माध्यम से जलापूर्ति आवश्यकता पड़ती थी, जिसके लिए मत्स्य कृषकों एवं मछुआरों को प्रति 10 हजार घन फीट पानी के बदले 4 रूपए का शुल्क अदा करना पड़ता था, जो अब उन्हें फ्री में मिलेगा। मत्स्य पालक कृषकों एवं मछुआरों को प्रति यूनिट 4.40 रुपए की दर से विद्युत शुल्क भी अदा नहीं करना होगा। सरकार के इस फैसले से मत्स्य उत्पादन की लागत में प्रति किलो लगभग 10 रुपए की कमी आएगी, जिसका सीधा लाभ मत्स्य पालन व्यवसाय से जुड़े लोगों को मिलेगा। इससे उनकी आमदनी में इजाफा होगा और उनकी माली हालत बेहतर होगी।
राज्य में मत्स्य कृषकों मछुआरों को सरकार द्वारा दी जा रही सहूलियतों का ही यह परिणाम है कि छत्तीसगढ़ राज्य मत्स्य बीज उत्पादन एवं मत्स्य उत्पादन में देश में छठवें स्थान पर है। मछली पालन को कृषि का दर्जा मिलने से राज्य 6 वें पायदान से ऊपर की ओर अग्रसर होगा और मत्स्य पालन के क्षेत्र में देश का अग्रणी राज्य बनेगा, इसकी उम्मीद बढ़ गई है। राज्य में वर्तमान में 93 हजार 698 जलाशय और तालाब विद्यमान हैं, जिनका जल क्षेत्र एक लाख 92 हजार हेक्टेयर है। इसमें से 81 हजार 616 जलाशयों एवं तालाबों का एक लाख 81 हजार 200 हेक्टेयर जल क्षेत्र मछली पालन के अंतर्गत है, जो कुल उपलब्ध जल क्षेत्र का 94 प्रतिशत है।
मत्स्य बीज उत्पादन के मामले में छत्तीसगढ़ राज्य न सिर्फ आत्मनिर्भर है, बल्कि यहां से मत्स्य बीज की आपूर्ति पड़ोसी राज्य मध्य प्रदेश महाराष्ट्र आंध्र प्रदेश उड़ीसा और बिहार को होती है। छत्तीसगढ़ राज्य में वर्तमान में 288 करोड़ मत्स्य बीज फ्राई तथा 5.77 लाख मैट्रिक टन मछली का उत्पादन प्रतिवर्ष होता है। राज्य की मत्स्य उत्पादकता प्रति हेक्टेयर 3.682 मीटरिक टन है, जो राष्ट्रीय उत्पादकता 3.250 मीटरिक टन से लगभग 0.432 मीटरिक टन अधिक है।
छत्तीसगढ़ राज्य में मत्स्य उत्पादन में उत्तरोत्तर वृद्धि के लिए अब केज कल्चर को तेजी से बढ़ावा दिया जा रहा है। राज्य में अब तक 2386 केज स्थापित किए जा चुके हैं। कोरबा जिले के हसदेव बांगो जलाशय में 1000 केज की स्थापना की जा रही है। इस तकनीकी में जलाशयों में 6 बाई 4 बाई 4 मीटर में केज स्थापित कर तीव्र बढ़वार वाली मछली जैसे पंगेसिएश एवं तिलापिया प्रजाति का पालन किया जाता है, जिससे प्रति केज 3 मेट्रिक टन से अधिक मत्स्य उत्पादन होता है।
लैंडलॉक प्रदेश होने के कारण राज्य के मत्स्य कृषकों एवं मछुआ समूहों द्वारा स्वयं की भूमि पर बड़ी संख्या में तालाबों का निर्माण कराकर मत्स्य पालन करना, मत्स्य क्षेत्र के विस्तार का अच्छा संकेत है। बीते ढाई सालों में सरकार की मदद से लगभग एक हजार नवीन तालाबों का निर्माण मत्स्य पालन के उद्देश्य से हुआ है। सरकार इसके लिए सामान्य वर्ग के मत्स्य कृषकों को अधिकतम 4.40 लाख रुपए तथा अनुसूचित जाति जनजाति एवं महिला वर्ग के हितग्राहियों को 6.60 लाख रुपए की अनुदान सहायता तालाब निर्माण और मत्स्य आहार के लिए देती है। छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा मत्स्य पालन क्षेत्र को संवर्धित करने के उद्देश्य से मछुआरों को मछुआ दुर्घटना बीमा का कवरेज भी प्रदान करती है। बीमित मत्स्य कृषक की मृत्यु पर 5 लाख रूपए की दावा राशि का भुगतान किया जाता है। बीमारी के इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती होने पर 25 हजार रुपये तक के इलाज की सुविधा का प्रावधान है। मछुआ सहकारी समितियों को मत्स्य पालन के लिए जाल, मत्स्य बीज एवं आहार के लिए 3 सालों में 3 लाख रुपए तक की सहायता दी जाती है। बायोफ्लॉक तकनीकी से मत्स्य पालन को बढ़ावा देने के लिए मत्स्य कृषकों को 7.50 लाख रुपए की इकाई लागत पर 40 प्रतिशत की अनुदान सहायता दिए जाने का प्रावधान है।
राज्य में मत्स्य पालन को बढ़ावा देने और मत्स्य कृषकों मछुआरों को सहूलियत देने के लिए छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा नवीन मछली पालन नीति तैयार की जा रही है। इसके लिए कृषि एवं जल संसाधन मंत्री श्री रविंद्र चौबे की अध्यक्षता में गठित समिति ने मछुआरों को उत्पादकता बोनस दिए जाने, ऐसे एनीकट जिनका क्षेत्रफल 20 हेक्टेयर तक है, उसे स्थानीय मछुआरों के निःशुल्क मत्स्याखेट के लिए सुरक्षित रखने तथा मछुआ जाति के लोगों की सहकारी समिति को सर्वाेच्च प्राथमिकता के आधार पर जलाशयों को मछली पालन के लिए पट्टे पर देने की सिफारिश की है।
टिप्स ट्रिक्स / शौर्यपथ / स्किन पर एक भी दाग होने पर चेहरा अच्छा नहीं लगता है। सभी को कोमल और स्पॉटलेस स्किन पसंद आती है। ऐसे में आप भी चेहरे पर अलग-अलग नुस्खें आजमा कर थक गए है तो विटामिन ई कैप्सूल आपकी मदद करेगा। जी हां, विटामिन ई कैप्सूल में मौजूद तत्व से स्किन एकदम चमकदार और स्पॉटलेस बन जाती है। हालांकि कुछ लोगों के मन में इसे लेकर शंका भी होती है कि विटामिन ई के कैप्सूल लगाने से चेहरे पर बाल आने लगते हैं हालांकि ऐसा नहीं है। यह एक मिथ है। तो आइए जानते हैं अलग - अलग स्किन टाइप के अनुसार कैसे विटामिन ई का इस्तेमाल करें।
मुंहासे होने पर
चेहरे पर अनचाहे मुंहासे लगातार होने पर विटामिन ई कैप्सूल को चेहरे पर लगा लें या जहां पर हो रहे हैं वहीं पर लगाएं। इसमें मौजूद एंटीऑक्सीडेंट प्रभावित जगह की मरम्मत करते हैं। नियमित रूप से कैप्सूल को लगाते रहे। कुछ दिन में फर्क नजर आ जाएगा।
डार्क सर्कल्स
डार्क सर्कल्स होने पर पूरे चेहरे की रंगत उड़ जाती है। इन्हें छुपाने के लिए ढेर सारा फाउंडेशन लगाया जाता है। लेकिन वह तब भी उभरकर आते हैं। इसके लिए प्रभावित क्षेत्र में विटामिन ई का कैप्सूल लगाएं। और रात को लगाकर सो जाएं। नियमित रूप से इसे लगाते रहे। 2 सप्ताह में आराम मिल जाता है।
रूखी त्वचा
ड्राई स्किन होने पर चेहरे पर किसी भी तरह का क्रीम और मेकअप अच्छे से नहीं टिकता है। ऐसे में विटामिन ई के 2 कैप्सूल लें, 1 चम्मच शहद, और 2 चम्मच दूध। तीनों को अच्छे से मिक्स कर लें। और 20 मिनट के लिए लगाकर पानी से धो लें। समय मिलने पर सप्ताह में 3 बार इसका इस्तेमाल करें। इसे त्वचा को जरूरी पोषण मिलेगा। और त्वचा रूखी भी नहीं होगी।
सनटैन कैसे दूर करें
पपीता का गूदा चेहरे पर लगाने से ग्लो आता है। लेकिन सनटैन हाटाने के लिए विटामिन ई के 4 कैप्सूल लें, पपीता का पेस्ट दो बड़े चम्मच, और 1चम्मच शहद। तीनों को अच्छे से मिक्स कर लें। इसके बाद चेहरे पर लगाकर 25 मिनट के लिए लगा रहने दें। इसके बाद ठंडे पानी से चेहरे को धो लें।
हाइपरपिग्मेंटेशन
हाइपरपिग्मेंटेशन या झाइयां कह लों । चेहरे पर जब ये दिखने लग जाती है तो ये एहसास होने लगता है कि आप बुड्ढें होने लगे हैं। इसे मिटाने के लिए विटामिन ई कैप्सूल मदद करेगा। 2 विटामिन ई जैल, 1 चम्मच वर्जिन ऑयल। दोनों को अच्छे से मिक्स कर लें और चेहरे पर लगा लें। 10 मिनट तक हल्के हाथों से मसाज करते रहें। रात को इसे लगाने में फायदा है क्योंकि आप इसे लगाकर भी
सो सकते हैं। सप्ताह में 2 से 3 बार इसका इस्तेमाल कीजिए। इससे त्वचा को जरूरी पोषक तत्व मिलेंगे।
चिकित्सा, स्वास्थ्य संबंधी नुस्खे, योग, धर्म आदि विषयों पर आलेख एवं समाचार सिर्फ आपकी जानकारी के लिए हैं।
इनसे संबंधित किसी भी प्रयोग से पहले विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें।
ब्यूटी टिप्स / शौर्यपथ /बारिश के मौसम में अक्सर लोग बाहर निकलने से मना करते हैं। लेकिन मौसम ही इतना सुहाना होता है कि अपने आपको रोक नहीं पाते हैं।ऐसे में कही न कही आउटिंग का प्लान बन ही जाता है। लेकिन लड़कियां मेकअप नहीं करें ऐसा हो नहीं सकता है। लेकिन बारिश के मौसम में सबसे बड़ी समस्या है पानी में भीगने पर पूरा मेकअप उतर जाता है। लेकिन बारिश में अगर आप वाटरप्रूफ मेकअप करेंगे तो आपका मेकअप लंबे वक्त तक टिका रहेगा। तो आइए जानते हैं वॉटरप्रूफ मेकअप करते वक्त किन बातों का ध्यान रखना चाहिए और कैसे करना चाहिए।
1. मेकअप करने के लिए बेस तैयार करें - जी हां, बारिश में मेकअप करने के लिए पहले आपको अपनी स्किन पर बेस तैयार करना होगा। इससे आपकी त्वचा पर मेकअप लंबे वक्त तक टीका रहेगा। इसके लिए 15 मिनट तक अपने चेहरे पर बर्फ से हल्के हाथों से मसाज करें। मसाज के बाद हल्के हाथों से चेहरे को पोंछ लें।
2. मैट आधारित प्रोडक्ट्स का करें चयन - बारिश के मासैम लिक्विड फाउंडेशन बहुत अधिक लंबे वक्त तक नहीं टिकते हैं। वह पानी लगते ही त्वचा से धुल जाते हैं। मैटिफाइंग बेस या पाउडर का उपयोग करने से मेकअप चेहरे पर संतुलित रहेगा। दरअसल मैट बेस्ड प्रोडक्ट आपके चेहरे के ऑयल को सोख लेते हैं। जिससे चेहरा साफ और चमकदार लगता है।
3. मैट आईशैडो, आईलाइनर और काजल - बारिश के मौसम में मैटि मेकअप ही करें। ताकि पानी में भीगने पर आप मेकअप नहीं फैलेगा। आपने भी देखा होगा, लिक्विड बेस्ड आईशैडो, आईलाइनर और काजल लगाने पर पानी से फैलने लगता है। और चेहरे लंबी-लंबी काले पानी की लाइंस बन जाती है।
4. मैट लिपस्टिक - बनावट के अनुसार किसी के चेहरे पर सिर्फ लिक्विड लिपिस्टिक ही अच्छी लगती है। लेकिन बारिश में मैट लिपस्टिक ही लगाएं। वह लंबे वक्त तक टिकी रहेगी और पानी लगने पर भी नहीं फैलेगी।
5. मेकअप स्प्रे - वैसे तो मेकअप स्प्रे का उपयोग बहुत अधिक नहीं करना चाहिए। इसमें केमिकल्स होते हैं जो आंखों में जा सकता है। लेकिन बारिश के मौसम में आउटिंग पर जा रहे हैं तो मेकअप करने के बाद स्प्रे जरूर करें। इससे आपका मेकअप लंबे समय तक टिका रहेगा। नमी होने, पानी में भीगने या पसीना होने पर भी मेकअप नहीं निकलेगा।
खाना खजाना /शौर्यपथ /सामग्री : 100 ग्राम साबुत खड़ा धनिया, 100 ग्राम पिसी शकर, छोटी पाव कटोरी कटे हुए मखाने, 25 ग्राम सूखे खोपरे के टुकड़े, काजू और बादाम की कतरन, 2 -3 इलायची पिसी हुई, कुछेक किशमिश, 4-5 केसर के लच्छे, घी (अंदाज से)।
विधि :* सबसे पहले एक कड़ाही में छोटा आधा चम्मच घी गर्म करें।
* अब धनिया डालकर धीमी आंच पर भूनें।
* जब धनिए से खुशबू आने लगे तब आंच से उतारकर ठंडा कर लें।
* अब सभी मेवे भूनकर अलग रखें।
* धनिया ठंडा होने पर मिक्सी में बारीक बीस लें।
* अब इसमें पिसी शकर, तले मेवे और पिसी इलायची डालकर अच्छी तरह मिलाएं।
* केसर से सजाएं।
* लीजिए तैयार है शाही धनिया-मेवे की पंजीरी।
अब इस प्रसाद से भगवान को भोग लगाएं।
आस्था / शौर्यपथ /श्रावण मास में भगवान भोलेनाथ की पूजा, अर्चना, भक्ति करने से अनन्य फल की प्राप्ति होती है, पृथ्वी पर 12 ज्योतिर्लिंग हैं.. 12 ही राशि और 12 ही लग्न हैं। जन्म लग्न और राशि के अनुसार शिव पूजा करना शुभ फलदायी होता है।
मेष लग्न और राशि - ममलेश्वर ज्योतिर्लिंग की आराधना करें।
वृषभ लग्न और राशि - बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग की आराधना करें।
मिथुन लग्न और राशि - त्र्यम्बकेश्वर ज्योतिर्लिंग की आराधना करें।
कर्क लग्न और राशि - भीमशंकर ज्योतिर्लिंग की आराधना करें।
सिंह लग्न और राशि - महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग की आराधना करें।
कन्या लग्न और राशि - घृणेश्वर ज्योतिर्लिंग की आराधना करें।
तुला लग्न और राशि - रामेश्वर ज्योतिर्लिंग की आराधना करें।
वृश्चिक लग्न और राशि - नागेश्वर ज्योतिर्लिंग की आराधना करें।
धनु लग्न और राशि - सोमनाथ ज्योतिर्लिंग की आराधना करें।
मकर लग्न और राशि - मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग की आराधना करें।
कुंभ लग्न और राशि - केदारनाथ ज्योतिर्लिंग की आराधना करें।
मीन लग्न और राशि - विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग की आराधना करें।
आस्था / शौर्यपथ / भारतीय राज्य केरल में शबरीमाला में अयप्पा स्वामी का प्रसिद्ध मंदिर है, जहां विश्वभर से लोग अयप्पा स्वामी के दर्शन करने के लिए आते हैं। आओ जानते हैं स्वामी अयप्मा की 20 विशेष बातें।
1. भगवान अयप्पा के पिता शिव और माता मोहिनी हैं। विष्णु का मोहिनी रूप देखकर भगवान शिव का वीर्यपात हो गया था। उनके वीर्य को पारद कहा गया और उनके वीर्य से ही बाद में सस्तव नामक पुत्र का जन्म का हुआ जिन्हें दक्षिण भारत में अयप्पा कहा गया।
2. शिव और विष्णु से उत्पन होने के कारण उनको 'हरिहरपुत्र' भी कहा जाता है। इनके अलावा भगवान अयप्पा को अयप्पन, शास्ता, मणिकांता नाम से भी जाना जाता है।
3. कुछ पुराणों में अयप्पा स्वामी को शास्ता का अवतार माना जाता है। कम्बन रामायण, महाभागवत के अष्टम स्कंध और स्कन्दपुराण के असुरकाण्ड में जिस शिशु शास्ता का उल्लेख है, अयप्पन उसी के अवतार माने जाते हैं। कहते हैं, शास्ता का जन्म मोहिनी और शिव के समागम से हुआ था।
4. अयप्पा स्वामी के दक्षिण भारत में कई मंदिर हैं उन्हीं में से एक प्रमुख मंदिर है सबरीमाला। इसे दक्षिण का तीर्थस्थल भी कहा जाता है।
5. धार्मिक कथा के मुताबिक समुद्र मंथन के दौरान भोलेनाथ भगवान विष्णु के मोहिनी रूप पर मोहित हो गए थे और इसी के प्रभाव से एक बच्चे का जन्म हुआ जिसे उन्होंने पंपा नदी के तट पर छोड़ दिया। इस दौरान राजा राजशेखरा ने उन्हें 12 सालों तक पाला।
6. एक बार स्वामी अयप्पा अपनी माता के लिए शेरनी का दूध लाने जंगल गए और वहां पर अयप्पा स्वामी ने महिषासुर की बहन राक्षसी महिषि का भी वध किया था, क्योंकि वह राक्षसी अयप्पा स्वामी से विवाह करना चाहती थी। महिषी के वध के बाद भगवान अयप्पा ने पहाड़ों पर जाकर ध्यान किया था।
7. अय्यप्पा स्वामी के बारे में किंवदंति है कि उनके माता-पिता ने उनकी गर्दन के चारों ओर एक घंटी बांधकर उन्हें छोड़ दिया था। बाद में पंडालम के राजा राजशेखर ने अय्यप्पा स्वामी को पुत्र के रूप में पाला। लेकिन भगवान अय्यप्पा को ये सब अच्छा नहीं लगा और उन्हें वैराग्य प्राप्त हुआ तो वे महल छोड़कर चले गए।
8. अयप्पा स्वामी के मंदिर के पास मकर संक्रांति की रात घने अंधेरे में रह-रहकर यहां एक ज्योति दिखती है। इस ज्योति के दर्शन के लिए दुनियाभर से करोड़ों श्रद्धालु हर साल आते हैं। बताया जाता है कि जब-जब ये रोशनी दिखती है इसके साथ शोर भी सुनाई देता है। भक्त मानते हैं कि ये देव ज्योति है और भगवान इसे जलाते हैं। मंदिर प्रबंधन के पुजारियों के मुताबिक मकर माह के पहले दिन आकाश में दिखने वाले एक खास तारा मकर ज्योति है।
9. कहते हैं कि अयप्पा ने शैव और वैष्णवों के बीच एकता कायम की। उन्होंने अपने लक्ष्य को पूरा किया था और सबरीमाल में उन्हें दिव्य ज्ञान की प्राप्ति हुई थी।
10. अयप्पा स्वामी ब्रह्मचारी और तपस्वी हैं और इसीलिए उनके मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध था। यहां 10 से 50 साल तक की लड़कियां और महिलाएं नहीं प्रवेश कर सकतीं। वृद्ध महिलाएं और बालिकाएं उनके मंदिर में जा सकती थीं। हिन्दुस्तान के लाखों मंदिरों में से अनेक मंदिरों में मान्यता अनुसार कहीं पुरुषों को दर्शन की मनाही है, तो कहीं महिलाओं के बाहर से ही दर्शन की मान्यता है। मगर स्वतंत्रता के अधिकार को अहंकार मान चुका एक वर्ग इन धार्मिक व्यवस्थाओं को भंग करके खुद को आधुनिक और धर्म को रूढ़ी घोषित करने में खुद को धन्य समझ रहा है। इसके अपने राजनीतिक निहित और स्वार्थ हैं।
11. मलयालम में 'सबरीमला' का अर्थ होता है, पर्वत। सबरी पर्वत पर घने वन हैं। 18 पहाड़ियों को जंगलों से घिरे स्थान पर यह मंदिर है। यह स्थान सह्याद्रि पर्वतमाला से घिरे हुए पथनाथिटा जिले में स्थित है। पंपा से सबरीमला तक पैदल यात्रा करनी पड़ती है। कुछ लोग इसे रामभक्त शबरी के नाम से जोड़कर भी देखते हैं, क्योंकि पंपा सरोवर के पास ही मातंग ऋषि का आश्रम था जहां पर शबरी की कुटिया थी।
12. यह भी माना जाता है कि परशुरामजी ने अयप्पन पूजा के लिए सबरीमला में मूर्ति स्थापित की थी।
14. मंदिर में भगवान अयप्पा के दर्शन करने के लिए पहले भक्तों को 41 दिनों का कठिन व्रत का अनुष्ठान करना पड़ता है जिसे 41 दिन का 'मण्डलम' कहते हैं। यहां वर्ष में तीन बार जाया जा सकता है- विषु (अप्रैल के मघ्य में), मण्डलपूजा (मार्गशीर्ष में) और मलरविलक्कु (मकर संक्रांति में)।
15. धार्मिक मान्यता के अनुसार भक्त तुलसी या रुद्राक्ष की माल धारण करके व्रत रखकर यहां आते हैं तो उनकी सभी तरह की मनोकामना पूर्ण होती है, क्योंकि अयप्पा स्वामी को तुलसी और रुद्राक्ष की माला प्रिय है।
16. अयप्पा स्वामी के दर्शन करने के 2 माह पहले से ही भक्तों को मांस, मछली, मदिरा आदि का त्याग करके ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए 41 दिन का व्रत रखना होता है तभी मंदिर में दर्शन होते हैं। यदि कोई ऐसा नहीं करके दर्शन करता है तो अयप्पा स्वामी उस पर नाराज हो जाते हैं।
17. मंदिर में अयप्पा स्वामी को भोग लगाने के लिए खास तरह का सबरीमाला अरावन पायसम प्रसाद बनाया जाता है। पायसम का निर्माण परंरागत तरीके से किया जाता है।
18. माना जाता है कि 12वीं शताब्दी में मनीकंदन नाम के एक राजकुमार हुए जिन्होंने मंदिर तक पहुंचने का मार्ग खोज निकाला था। ये राजकुमार भगवान अय्यपा के अवतार माने गए। राजकुमार मनीकंदन कई अनुयायियों के साथ मंदिर तक गए थे, जिनमें वावर परिवार के पूर्वज भी शामिल थे।
19. मंदिर में दर्शन के लिए आते हैं तो उसके लिए भक्तों के पास पल्लिकेट्टू अनिवार्य है। पल्लिकेट्टू एक छोटा सा झोलेनुमा कपड़ा होता है जिसमें गुड़, नारियल और चावल इत्यादि प्रसाद का सामान रहता है।
20. इस मंदिर तक पहुंचने के लिए 18 पावन सीढ़ियों को पार करना पड़ता है, जिनके अलग-अलग अर्थ भी बताए गए हैं। पहली पांच सीढ़ियों को मनुष्य की पांच इन्द्रियों से जोड़ा जाता है। इसके बाद वाली 8 सीढ़ियों को मानवीय भावनाओं से जोड़ा जाता है। अगली तीन सीढ़ियों को मानवीय गुण और आखिर दो सीढ़ियों को ज्ञान और अज्ञान का प्रतीक माना जाता है।
दुर्ग । शौर्य पथ । 19 जुलाई से 25 जुलाई तक चलाए जा रहे विशेष अभियान के अंतर्गत आज गांधी चौक हिंदी भवन के सामने श्री राजेश श्रीवास्तव जिला न्यायाधीश/ अध्यक्ष जिला विधिक सेवा प्राधिकरण दुर्ग के मार्गदर्शन एवं निर्देश पर रोको टोको अभियान के अंतर्गत एवं कानूनी विधिक जानकारी दिये जाने के संबंध में श्रीमती मधु तिवारी अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश एवं श्रीमती नीरू सिंह अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश ने उपस्थित होकर बताया कि शिक्षा सफलता की पहली कुंजी है किसी भी समाज, राज्य एवं देश का विकास उसके युवा पीढ़ी पर बहुत ज्यादा निर्भर रहती है, ऐसे में अगर यह पीढ़ी शिक्षित है, तो इसका महत्व और भी बढ़ जाता हैै। बच्चों के लिए शिक्षा का अधिकार, एक मौलिक अधिकार है परंतु प्रायः यह देखा गया है कि कुछ माता-पिता अपने बच्चों को शिक्षा दिलाने में कोई रूचि नहीं रखते है। यह भी देखा गया है कि बच्चों को व्यवसाय हेतु पढ़ाई को महत्व नहीं देते। यह भी पाया जा रहा है कि ग्रामीण व स्लम एरिया में लड़कियों को शिक्षा से दूर रखा जाता है। वर्तमान समय में लड़का एवं लड़की दोनों बराबर है, आज लड़कियाँ लड़कों से कदम से कदम मिलाकर चल रही हैं, ऐसे में लड़का एवं लड़की में भेदभाव करना एक बिमार मानसिकता को दर्शाता है। अनुच्छेद 21क और आरटीई अधिनियम 1 अप्रैल 2010 को लागू हुआ। आरटीई अधिनियम के शीर्षक में "निः शुल्क शिक्षा" और "अनिवार्य शिक्षा" शब्द सम्मिलित हैं। निःशुल्क शिक्षा का तात्पर्य यह है कि किसी बच्चे जिसको उसके माता-पिता द्वारा स्कूल में दाखिल किया गया है को छोड़कर कोई बच्चा जो उचित सरकार द्वारा समर्थित नहीं है। किसी किस्म की फीस या प्रभार या व्यय जो प्रारंभिक शिक्षा जारी रखने और पूरा करने से उसको रोके अदा करने के लिए उत्तरदायी नहीं होगा। अनिवार्य शिक्षा उचित सरकार और स्थानीय प्रधिकारियों पर 6 से 14 आयु समूह के सभी बच्चों को प्रवेश, उपस्थिति और प्रारंभिक शिक्षा को पूरा करने का प्रावधान करने और सुनिश्चित करने की बाध्यता रखती है।
श्रीमती नीरू सिंह अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश ने नालसा की नशा उन्मूलन संबंधी स्कीम के संबंध में जानकारी प्रदत्त की उन्होंने बताया कि - ’’नशा व्यक्तिगत के साथ-साथ समाज में भी बुरा प्रभाव डालता है । मोटर दुर्घटना के अधिकांशतः मामले नशे के हालत में गाडी चलाने के ही कारण होती है। समाज में युवा वर्ग वर्तमान परिस्थिति में नशे की ओर आकर्षित होते हैं । कई जगहों पर अनुचित रूप से हुक्का बार भी चलाये जाते हैं जिसमें युवा वर्ग की भागीदारी ज्यादा रहती है, जो उनके भविष्य को अंधकार में डालती है तथा समाज में उसका बुरा प्रभाव पडता है । परिवार में नशा करने वाले व्यक्ति के परिवार टूटने लगते हैं तथा बिखर जाते हैं। व्यक्ति को जब नशे की लत पड़ जाती है तो वह समाज से दूर रहने की कोशिश करता है क्योंकि समाज में नशायुक्त व्यक्ति को अपमानित रूप से देखा जाता है। अच्छी शिक्षा एवं संस्कार संस्कार से नशे जैसी बुरी आदतों से दूर रहा जा सकता है ।
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सेहत / शौर्यपथ / सब्जियों में मशहूर खीरा हर किसी को पसंद होता है। कई लोग इसे सलाद के रूप में नियमित खाना पसंद करते हैं। शरीर को हाइड्रट रखने के साथ ही त्वचा की खूबसूरती तक कई अनमोल गुणों का खजाना है खीरा। लेकिन क्या आप जानते हैं कि खीरे खाने के तुरंत बाद पानी पीना सेहत के लिए नुकसानदायक हो सकता है, क्योंकि खीरे में पानी के साथ ही अन्य पोषक तत्व भी उचित मात्रा में मौजूद होते हैं और खीरा खाने के बाद पानी पीने से आप उन आवश्यक पोषक तत्वों से वंचित रह जाते हैं, जो शरीर को फायदा पहुंचाने वाले होते हैं।
खीरे की सबसे बड़ी खासियत है, कि इसमें 80 प्रतिशत पानी होता है। खीरा प्यास बुझाता है और शरीर में पानी की कमी को पूरा करता है। खीरा खाने के बाद शरीर को पर्याप्त मात्रा में पानी मिल जाता है। यह हमारे शरीर के आंतरिक अंगों और त्वचा की गहराई से सफाई करता है। इसके अलावा धूप से झुलसी हुई त्वचा को न केवल राहत देता है बल्कि त्वचा की जलन और टेनिंग भी कम करता है। हमें प्रतिदिन कुछ विटामिन्स लेना बेहद जरूरी होता है।
जैसे विटामिन ए, बी और सी हमें नियमित लेना चाहिए। खीरा अकेला हमें प्रतिदिन के विटामिन्स देता है। खीरे के छिलके में विटामिन सी होता है। खीरा में पौटेशियम, मैगनीशियम और सिलीकॉन अत्यधिक मात्रा में होता है। यह खनिज त्वचा के लिए बहुत जरूरी हैं। खीरा में जल की मात्रा ज्यादा होती है जबकि कैलोरी नहीं। इसलिए यह जल्दी पेट को तृप्त करती है।
आइए अब आप भी जान लीजिए खीरा खाने के बाद पानी पीने से सेहत को क्या नुकसान होता है ?
1. पाचन की समस्याएं- हम सभी जानते हैं कि भोजन को डाइजेस्ट करने के लिए पीएच लेवल की आवश्यकता होती है, लेकिन खीरे के साथ या इसे खाने के तुरंत बाद पानी पीने से पीएच लेवल कमजोर हो जाता है। और यह खाना या खाद्य पदार्थों को पचाने के लिए आवश्यक एसिड प्रभावी ढंग से काम नहीं कर पाता, जिससे पाचन संबंधी समस्याएं होने लगती है।
2. पोषक तत्व- खीरे में 80 प्रतिशत पानी और अन्य पोषक तत्व होते हैं। अत: अन्य पोषक तत्व भी उचित मात्रा में मौजूद होते हैं और खीरा खाने के बाद पानी पीने से आप उन आवश्यक पोषक तत्वों से वंचित रह जाते हैं।
3. प्राकृतिक प्रक्रिया को नुकसान- खीरे खाने के बाद पानी पीने से जीआई गतिशीलता बढ़ जाती है, अत: यह पाचन और अवशोषण की प्राकृतिक प्रक्रिया को भी नुकसान पहुंचता है।
4. लूजमोशन (दस्त), डायरिया की समस्या- विशेषज्ञों की मानें तो खीरा खाने से कब्ज की समस्या नहीं होती है। लेकिन अगर आप खीरे के बाद पानी पीते हैं तो इससे डायरिया और लूजमोशन की शिकायत हो सकती है।
5. इन चीजों के साथ भी न पीएं पानी- विशेषज्ञों के अनुसार सिर्फ खीरा ही नहीं बल्कि पानी से भरपूर कई फल जैसे अनानस, तरबूज और स्ट्रॉबेरी के बाद पीने न पीने की सलाह देते हैं। इसलिए खीरा खाने और पानी पीने के बीच कम से कम 20 से 30 मिनट का अंतराल रखना उचित रहता है।
6. और क्या-क्या न खाएं- इसके अलावा अगर आप सलाद के रूप में खीरा खाने के बाद भोजन के साथ लस्सी पीते हैं तो खीरे के ऊपर लस्सी पीना आपका पेट खराब कर सकती है और आपको पेट संबंधी परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है। अत: खीरा खाने के तुरंत बाद लस्सी कभी भी न पीएं। साथ ही खीरे के ऊपर दूध भी पीने से बचना चाहिए, क्योंकि खीरे की तासीर ठंडी होती हैं और इसके ऊपर गरम दूध पीने से व्यक्ति को खांसी, बुखार और अन्य कई परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है।
Feb 09, 2021 Rate: 4.00
