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शौर्यपथ राजनीतिक लेख। भारतीय राजनीति के इतिहास में दिल्ली की सत्ता का मोह बड़े-बड़े दिग्गजों के लिए 'मृगतृष्णा' साबित हुआ है। हालिया राजनीतिक घटनाक्रम इस बात का गवाह है कि जब-जब क्षेत्रीय क्षत्रपों ने देश की सबसे पुरानी पार्टी, कांग्रेस को दरकिनार कर खुद को 'विकल्प' के रूप में पेश करने की कोशिश की, तब-तब वक्त ने उन्हें कड़ा सबक सिखाया।
अरविंद केजरीवाल, नीतीश कुमार और ममता बनर्जी—ये तीन ऐसे नाम थे, जिनके पास अपनी-अपनी सल्तनत थी, लेकिन दिल्ली की लालसा ने उनके सियासी भूगोल को ही बदल कर रख दिया।
1. अरविंद केजरीवाल: 'सुपर सीएम' से 'जेल' और फिर कुर्सी गँवाने तक का सफर
आम आदमी पार्टी के मुखिया अरविंद केजरीवाल ने अपनी राजनीति की शुरुआत ही कांग्रेस के विरोध से की थी। पंजाब में जीत के बाद उनका सपना प्रधानमंत्री बनने का था। उन्होंने खुद को कांग्रेस का एकमात्र विकल्प घोषित किया, लेकिन दिल्ली की सत्ता और संगठन पर पकड़ ढीली होती गई। अंततः, भ्रष्टाचार के आरोपों और कानूनी पेचीदगियों के बीच उन्हें अपनी मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़नी पड़ी। कांग्रेस को 'अप्रासंगिक' बताने के चक्कर में वे खुद अपनी ही जमीन पर संघर्ष करते नजर आए।
2. नीतीश कुमार: 'पलटूराम' की छवि और पीएम बनने की अधूरी हसरत
बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में एक लंबी पारी खेलने वाले नीतीश कुमार ने जब 'इंडिया' (I.N.D.I.A.) गठबंधन की नींव रखी, तो उनके मन में दिल्ली के सिंहासन की छवि स्पष्ट थी। वे खुद को विपक्ष का चेहरा बनाना चाहते थे। लेकिन जब उन्हें लगा कि कांग्रेस उन्हें वह तवज्जो नहीं दे रही, तो उन्होंने फिर पाला बदला। आज स्थिति यह है कि वे सत्ता में तो हैं, लेकिन उस 'मुख्यमंत्री' की हैसियत और स्वायत्तता को खो चुके हैं, जिसके लिए वे जाने जाते थे। दिल्ली की दौड़ ने उन्हें उनके ही गढ़ में कमजोर कर दिया।
3. ममता बनर्जी: 'दीदी' का दिल्ली मिशन और थर्ड फ्रंट की नाकामी
बंगाल फतह करने के बाद ममता बनर्जी का अगला लक्ष्य 'थर्ड फ्रंट' के जरिए दिल्ली की कुर्सी थी। उन्होंने 'एकला चलो' की नीति अपनाई और कांग्रेस को बंगाल सहित पूरे देश में चुनौती दी। उनका दावा था कि कांग्रेस अब लड़ नहीं सकती। लेकिन ममता की इस जिद ने न केवल विपक्षी एकता में दरार डाली, बल्कि बंगाल के भीतर भी उनके वर्चस्व को हिलाकर रख दिया।
सियासत का कड़वा सच: कांग्रेस को नजरअंदाज करना भारी पड़ा
इन तीनों नेताओं के राजनीतिक हश्र से कुछ बड़े सबक सामने आते हैं:
अहंकार बनाम दूरदृष्टि: राजनीति में लोकप्रियता होना एक बात है, लेकिन देश की सबसे बड़ी पुरानी पार्टी के संगठनात्मक ढांचे और ऐतिहासिक उपस्थिति को नजरअंदाज करना एक रणनीतिक चूक है।
वोटों का बिखराव: कांग्रेस का विरोध करके इन नेताओं ने विपक्षी वोटों को ही बांटा, जिसका सीधा फायदा बीजेपी को मिला।
आईना दिखा गया वक्त: आज ये तीनों चेहरे अपनी पुरानी चमक खोते दिख रहे हैं। जो कांग्रेस को कमजोर मान रहे थे, आज वे खुद अपने राज्यों में अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं।
निष्कर्ष
सत्ता का सपना देखना गलत नहीं है, लेकिन राजनीति में 'दूरदृष्टि' का होना अनिवार्य है। जो देश की सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी को मिट्टी में मिलाने की कोशिश करते हैं, वक्त अक्सर उन्हें ही आईना दिखा देता है। 2026 के मुहाने पर खड़ी राजनीति चीख-चीख कर कह रही है— "कांग्रेस को नजरअंदाज करना आसान नहीं है।"
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क्या आपको लगता है कि क्षेत्रीय दलों के लिए कांग्रेस के साथ मिलकर चलना ही एकमात्र विकल्प बचा है?
कोलकाता/रायपुर / शौर्यपथ /
भाजपा प्रदेश मंत्री जितेन्द्र वर्मा ने पश्चिम बंगाल, असम और पुडुचेरी में पार्टी की जीत को “विकास, स्थिरता और पारदर्शिता के पक्ष में स्पष्ट जनादेश” बताया। उन्होंने कहा कि यह सफलता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की रणनीति और राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन के मार्गदर्शन का परिणाम है।
वर्मा ने बताया कि उन्होंने जनवरी से मई 2026 तक दुर्गापुर पश्चिम विधानसभा क्षेत्र में प्रवास कर बूथ मैनेजमेंट से लेकर जनसंपर्क तक सक्रिय भूमिका निभाई। प्रदेश महामंत्री (संगठन) पवन साय के सानिध्य में कार्य करते हुए उन्होंने कई क्षेत्रों में संगठन को मजबूत किया।
उन्होंने पश्चिम बंगाल में जीत को “भय और हिंसा के माहौल के विरुद्ध लोकतांत्रिक साहस की जीत” बताया, जहां मतदाताओं ने निडर होकर अपने अधिकार का प्रयोग किया। असम और पुडुचेरी के परिणामों को उन्होंने डबल इंजन सरकार के विकास मॉडल की स्वीकार्यता बताया।
वर्मा ने कहा कि यह विजय समर्पित कार्यकर्ताओं के परिश्रम को समर्पित है और “सबका साथ, सबका विकास” के संकल्प पर जनता के विश्वास की पुनर्पुष्टि है।
रायपुर / शौर्यपथ / उप मुख्यमंत्री अरुण साव ने पश्चिम बंगाल, असम और पुडुचेरी विधानसभा चुनावों में भाजपा-एनडीए की जीत को “ऐतिहासिक जनादेश” बताते हुए कहा कि यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व, सुशासन और जमीनी कार्यकर्ताओं के समर्पण पर जनता की स्पष्ट मुहर है।
उन्होंने कहा कि पश्चिम बंगाल में जनता ने विकास मॉडल और सांस्कृतिक अस्मिता के पक्ष में मतदान कर “सोनार बांग्ला” के संकल्प को बल दिया है। वहीं असम में लगातार तीसरी जीत को उन्होंने स्थिर नेतृत्व और डबल इंजन सरकार की उपलब्धियों की स्वीकृति बताया। साव ने कांग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा कि जनता ने “नकारात्मक और तुष्टिकरण की राजनीति” को खारिज किया है।
पुडुचेरी में एनडीए की सफलता पर उन्होंने विश्वास जताया कि केंद्र-राज्य समन्वय से विकास के नए आयाम स्थापित होंगे।
उप मुख्यमंत्री साव, जिन्हें असम के लखीमपुर लोकसभा क्षेत्र का प्रभार मिला था, ने बताया कि क्षेत्र की सभी आठ विधानसभा सीटों—धेमाजी, जोनाई, सिसिरबोरगांव, लखीमपुर, ढकुआखाना, डुमडुमा, सदिया और रोंगोनदी—पर भाजपा प्रत्याशियों ने प्रचंड जीत दर्ज की है, जिसे उन्होंने “राष्ट्रहित और विकास के संकल्प की विजय” करार दिया।
दुर्ग। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के संगठनात्मक ढांचे को मजबूती देने की दिशा में दुर्ग में एक महत्वपूर्ण नियुक्ति सामने आई है। दुर्ग जिला कांग्रेस कमेटी की अनुशंसा पर अनुसूचित जाति विभाग के दुर्ग शहर जिला कांग्रेस कमेटी में गुड्डा उरे को उपाध्यक्ष पद की जिम्मेदारी सौंपी गई है।
यह नियुक्ति ऐसे समय में हुई है जब संगठन को जमीनी स्तर पर और अधिक सक्रिय एवं प्रभावशाली बनाने की रणनीति पर काम किया जा रहा है। दुर्ग शहर जिला कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष धीरज बाकलीवाल के नेतृत्व में संगठन लगातार विस्तार और सामाजिक समावेश की दिशा में कदम बढ़ा रहा है।
जारी नियुक्ति पत्र के अनुसार—
उपाध्यक्ष: 5 पद
महामंत्री: 5 पद
सचिव: 5 पद
इन पदों के बीच गुड्डा उरे की नियुक्ति को विशेष रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि वे लंबे समय से सामाजिक सरोकारों और संगठनात्मक गतिविधियों में सक्रिय भूमिका निभाते रहे हैं।
गुड्डा उरे के उपाध्यक्ष बनने की खबर सामने आते ही उनके समर्थकों, समाजजनों और क्षेत्रीय कार्यकर्ताओं में उत्साह और खुशी का माहौल देखने को मिला। इसे संगठन में नई ऊर्जा और अनुसूचित जाति वर्ग के प्रतिनिधित्व को मजबूत करने की दिशा में एक निर्णायक कदम माना जा रहा है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह नियुक्ति आगामी समय में संगठन की जमीनी पकड़ को और सुदृढ़ करेगी तथा सामाजिक संतुलन के साथ कांग्रेस को नई मजबूती प्रदान करेगी।
भिलाई | भारतीय जनता युवा मोर्चा (भाजयुमो) भिलाई जिले की नवनियुक्त कार्यकारिणी विवादों के घेरे में आ गई है। पार्टी की नई टीम में 'युवा जोश' की जगह 'आपराधिक इतिहास' को तरजीह दिए जाने के गंभीर आरोप लग रहे हैं। जैसे ही कार्यकारिणी की सूची जारी हुई, पार्टी के भीतर और बाहर हड़कंप मच गया है।
प्रमुख बिंदु: जो पार्टी की साख पर सवाल उठा रहे हैं
दागी चेहरों का दबदबा: नई कार्यकारिणी में ऐसे युवाओं को पदाधिकारी बनाया गया है, जिन पर लूट, मारपीट, धोखाधड़ी और महिलाओं से बदसलूकी जैसे संगीन मामले दर्ज हैं।
महादेव सट्टा एप से कनेक्शन: चौंकाने वाली बात यह है कि कुछ पदाधिकारी चर्चित 'महादेव सट्टा एप' मामले में भी आरोपी हैं और जेल की हवा खा चुके हैं।
गैंगस्टर लिंक: रिपोर्ट के अनुसार, सूची में शामिल कुछ नामों का संबंध कुख्यात गैंगस्टरों के साथ भी बताया जा रहा है।
भीतरघात और बगावत: घोषणा के महज 24 घंटे के भीतर 10 मंडल अध्यक्षों ने इस सूची को खारिज करते हुए अपनी समानांतर सूची जारी कर दी है, जिससे पार्टी में गुटबाजी खुलकर सामने आ गई है।
पार्टी की फजीहत, नेतृत्व ने माँगा स्पष्टीकरण
मामले की गंभीरता और बढ़ते विरोध को देखते हुए प्रदेश अध्यक्ष किरण सिंह देव ने भिलाई जिलाध्यक्ष पुरुषोत्तम देवांगन और युवा मोर्चा अध्यक्ष सौरभ जायसवाल को तलब किया है।
जिलाध्यक्ष का बचाव: सौरभ जायसवाल ने सफाई देते हुए कहा है कि जिन लोगों पर आरोप हैं, उनसे "चरित्र प्रमाण पत्र" माँगे गए हैं। उन्होंने तर्क दिया कि अभी सिर्फ आरोप लगे हैं, अपराध सिद्ध नहीं हुआ है।
निष्कर्ष
शुचिता की राजनीति का दावा करने वाली पार्टी के लिए यह स्थिति बेहद शर्मनाक साबित हो रही है। एक तरफ जहां युवाओं को जोड़ने की बात हो रही है, वहीं 'लिस्टेड अपराधियों' को पद बांटने से निष्ठावान कार्यकर्ताओं में भारी रोष है। अब देखना यह है कि क्या प्रदेश नेतृत्व इन नियुक्तियों को रद्द कर 'छवि सुधार' की दिशा में कदम उठाता है या नहीं।
नई दिल्ली। आम आदमी पार्टी (AAP) द्वारा राज्यसभा के सभापति को राघव चड्ढा सहित 7 सांसदों की सदस्यता रद्द करने के लिए याचिका सौंपे जाने का दावा सामने आया है। आरोप है कि संबंधित सांसदों ने दल-बदल विरोधी कानून (10वीं अनुसूची) का उल्लंघन किया है।
हालांकि, इस पूरे घटनाक्रम को लेकर अब तक कोई आधिकारिक पुष्टि या विश्वसनीय सार्वजनिक रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है। विशेष रूप से राघव चड्ढा के बीजेपी में शामिल होने की बात भी स्थापित तथ्यों से मेल नहीं खाती, जिससे इस दावे पर सवाल उठ रहे हैं।
राजनीतिक और संवैधानिक जानकारों के अनुसार, यदि कोई सांसद स्वेच्छा से पार्टी छोड़ता है या व्हिप का उल्लंघन करता है, तो उसके खिलाफ अयोग्यता की कार्यवाही संभव है। लेकिन इसके लिए स्पष्ट साक्ष्य, औपचारिक प्रक्रिया और सभापति का निर्णय आवश्यक होता है।
कानूनी स्थिति क्या कहती है?
दलबदल कानून के तहत, यदि किसी दल के 2/3 सांसद एक साथ विलय का दावा नहीं करते, तो व्यक्तिगत स्तर पर पार्टी बदलने पर अयोग्यता लागू हो सकती है। ऐसे मामलों में अंतिम निर्णय राज्यसभा के सभापति द्वारा लिया जाता है, जिसे न्यायालय में चुनौती भी दी जा सकती है।
निष्कर्ष:
फिलहाल यह मामला दावों और अटकलों के स्तर पर है। जब तक आधिकारिक पुष्टि या दस्तावेज सामने नहीं आते, इसे सत्यापित खबर के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा।
रायपुर। शौर्यपथ । पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के पहले चरण की वोटिंग के बीच छत्तीसगढ़ के उप मुख्यमंत्री अरुण साव ने बड़ा राजनीतिक बयान देते हुए कहा है कि राज्य में अब सत्ता परिवर्तन तय है। उन्होंने दावा किया कि मतदान के शुरुआती रुझान स्पष्ट संकेत दे रहे हैं कि जनता बदलाव चाहती है और ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली सरकार की विदाई निकट है।
अरुण साव ने भरोसा जताया कि इस बार पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी पहली पसंद बनकर उभरेगी और “कमल खिलने” के साथ राज्य को सुशासन, सुरक्षा और विकास की नई दिशा मिलेगी। उन्होंने कहा कि माताओं-बहनों की सुरक्षा और युवाओं को रोजगार के अवसर देना भाजपा की प्राथमिकता होगी।
? कांग्रेस पर तीखा प्रहार — “ओबीसी के मुद्दे पर दोहरा चेहरा”
उप मुख्यमंत्री साव ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पर सीधा हमला बोलते हुए कहा कि पार्टी का ओबीसी वर्ग के प्रति रवैया हमेशा से दोहरा रहा है।
उनके अनुसार, जब कांग्रेस सत्ता में थी तब उसने अन्य पिछड़ा वर्ग की उपेक्षा की, लेकिन अब सत्ता से बाहर होने के बाद वह ओबीसी हितैषी बनने का दिखावा कर रही है।
उन्होंने छत्तीसगढ़ की पूर्व भूपेश बघेल सरकार पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि उनके कार्यकाल में भी ओबीसी वर्ग के साथ न्याय नहीं हुआ।
? इतिहास का हवाला, कांग्रेस पर सवाल
नवा रायपुर अटल नगर स्थित निवास कार्यालय में पत्रकारों से चर्चा करते हुए साव ने कहा कि कांग्रेस ने लंबे समय तक सत्ता में रहने के बावजूद काका कालेकर आयोग की रिपोर्ट को दबाकर रखा और मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने में भी गंभीरता नहीं दिखाई।
उन्होंने यह भी याद दिलाया कि वी.पी. सिंह की सरकार ने मंडल आयोग लागू किया, जबकि उस समय राजीव गांधी ने इसका विरोध किया था।
? राजनीतिक संदेश स्पष्ट
अरुण साव ने कहा कि देश और प्रदेश का ओबीसी वर्ग अब कांग्रेस के “राजनीतिक दिखावे” को समझ चुका है और आने वाले समय में इसका जवाब लोकतांत्रिक तरीके से देगा।
? निष्कर्ष:
पश्चिम बंगाल चुनाव को लेकर भाजपा का आत्मविश्वास चरम पर है। अब सबकी नजरें चुनाव परिणामों पर टिकी हैं, जो यह तय करेंगे कि क्या वास्तव में “बदलाव की बयार” सत्ता परिवर्तन में बदलती है या नहीं।
भिलाई / शौर्यपथ / दुर्ग जिले में एक ही पते पर संचालित हो रही कथित केमिकल फैक्ट्रियों का मुद्दा अब राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर तूल पकड़ता जा रहा है। भिलाई नगर विधायक देवेंद्र यादव द्वारा विधानसभा में उठाए गए इस मामले में विभागीय जवाब के बाद नए सवाल खड़े हो गए हैं। जवाब से असंतुष्ट विधायक ने आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो (EOW) को पत्र लिखकर पूरे प्रकरण में अब तक हुई कार्रवाई की विस्तृत जानकारी मांगी है।
विधानसभा में वाणिज्य एवं उद्योग विभाग ने अपने उत्तर में कहा कि इस प्रकार की कोई शिकायत प्राप्त नहीं हुई है। हालांकि, इसी जवाब में यह भी स्वीकार किया गया कि छत्तीसगढ़ पर्यावरण संरक्षण मंडल ने 24 फरवरी 2025 को चार सदस्यीय जांच समिति गठित कर जिले के 16 कोलतार प्रोसेसिंग आधारित उद्योगों की जांच कराई थी, जिसमें से 8 उद्योग पर्यावरणीय सहमति की शर्तों के उल्लंघन के दोषी पाए गए। विभाग ने इन पर नियमानुसार कार्रवाई की बात कही है, लेकिन कार्रवाई की प्रकृति और स्थिति स्पष्ट नहीं की गई।
मामले को और उलझाते हुए 24 जून 2025 को प्राप्त एक शिकायत में उद्योगों द्वारा तथ्यों को छिपाकर केंद्रीय पर्यावरण स्वीकृति लेने का आरोप सामने आया, लेकिन इस शिकायत पर कोई जांच समिति गठित नहीं की गई। वहीं, एक अन्य शिकायत के आधार पर पर्यावरण मंडल ने 7 जुलाई 2025 को पत्र क्रमांक 8879 जारी कर उद्योग संचालनालय समेत अन्य विभागों से पत्राचार किया।
यह मामला EOW तक भी पहुंच चुका है, जहां शिकायत क्रमांक 02/2025 के रूप में पंजीबद्ध है और जांच प्रतिवेदन अब तक लंबित है।
विधायक देवेंद्र यादव ने 20 अप्रैल 2026 को EOW को भेजे पत्र में विधानसभा में दिए गए जवाब को विरोधाभासी बताते हुए कहा है कि एक ओर शिकायत न होने की बात कही जा रही है, वहीं दूसरी ओर जांच समिति गठित कर उल्लंघन की पुष्टि भी की गई है। उन्होंने पूरे प्रकरण में अब तक की गई कार्रवाई, जांच की स्थिति और जिम्मेदार अधिकारियों पर हुई कार्यवाही का स्पष्ट विवरण मांगा है।
इस पूरे घटनाक्रम में शिकायतों के अस्तित्व पर भ्रम, जांच की आंशिक कार्रवाई और स्पष्ट निष्कर्षों के अभाव ने प्रशासनिक पारदर्शिता और जवाबदेही पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए हैं। अब निगाहें EOW की जांच और आगे की कार्रवाई पर टिकी हैं।
दुर्ग। दुर्ग की राजनीति हमेशा से छत्तीसगढ़ का एक प्रमुख केंद्र रही है। लेकिन पिछले चार दशकों से यहाँ कांग्रेस का संगठन एक ही 'परिवार' और 'रिमोट कंट्रोल' की राजनीति के इर्द-गिर्द घूमता रहा है। यह एक ऐसी व्यवस्था थी जहाँ निर्णय संगठन के कार्यकर्ताओं द्वारा नहीं, बल्कि एक खास दरबार में लिए जाते थे। परिणाम? जमीनी स्तर पर संगठन की कमजोरी, निष्क्रिय कार्यकर्ता और जनता से दूरी।
धीरज बाकलीवाल: ‘जमीनी संगठन’ और ‘बूथ मज़बूती’ का नया दौर
लेकिन अब दुर्ग शहर कांग्रेस में एक 'नयी रोशनी' दिखाई दे रही है, जिसका श्रेय शहर अध्यक्ष धीरज बाकलीवाल को जाता है। बाकलीवाल ने पुरानी परिपाटी को चुनौती देते हुए संगठन को फिर से सक्रिय करने का काम शुरू किया है। उनका स्पष्ट विश्वास है कि एक 'सशक्त बूथ ही सशक्त संगठन की आधारशिला' है।
संगठनात्मक कसावट: बाकलीवाल ने 5 ब्लॉक, 10 मंडल, 60 वार्ड और 275 बूथों पर संगठन को जमीनी स्तर तक मजबूत करने का अभियान चलाया है।
सक्रिय विपक्ष: वह केवल संगठनात्मक कार्यों तक ही सीमित नहीं हैं, बल्कि जनता के मुद्दों को भी मजबूती से उठा रहे हैं। चाहे वो ई-चालान का मुद्दा हो या हेमचंद यादव विश्वविद्यालय के छात्रों के भविष्य से जुड़ी लापरवाही, बाकलीवाल प्रशासन के सामने मजबूती से पक्ष रख रहे हैं।
सामाजिक सरोकार: धीरज बाकलीवाल सामाजिक रूप से भी जनता से जुड़ रहे हैं। तिरुपति से लौटे तीर्थयात्रियों का स्वागत और ऐसी अन्य गतिविधियाँ उन्हें जनता के करीब ला रही हैं।
अरुण वोरा की ‘गिरती साख’ और ‘गुटबाजी’ का घेरा
दूसरी ओर, पूर्व विधायक अरुण वोरा की कार्यशैली अब चर्चा का विषय बनी हुई है। उनके समय में संगठन के निर्णय एक ही दरबार से लिए जाते थे। पुराने जिला अध्यक्षों को तो संगठन की गतिविधियों की जानकारी तक नहीं होती थी; हर छोटे-बड़े सवाल का जवाब 'वोरा जी से पूछकर बताएंगे' में सिमट जाता था। जानकार मानते हैं कि पूर्व की राजनीति केवल चुनाव के समय कार्यकर्ताओं को याद करने और संगठन को अपनी मुट्ठी में रखने तक सीमित थी। यह 'एकल ध्रुवीय' व्यवस्था दुर्ग में कांग्रेस के लिए एक बड़ा झटका साबित हुई।
चुनौतियां अभी बाकी हैं: ‘मतलबपरस्त’ नेताओं और ‘चाटुकारों’ की फौज
यद्यपि यह 'नया उदय' सुखद है, लेकिन धीरज बाकलीवाल के सामने चुनौतियां भी कम नहीं हैं। संगठन में अभी भी ऐसे नेताओं की फौज है जो केवल सत्ता के लाभ के लिए मंचों पर आसीन हो जाते हैं, जबकि जमीनी स्तर पर उनकी कोई अहमियत नहीं है। चाटुकारों की यह फौज गुटबाजी को हवा देती है और संगठन के कार्यों में बाधा डालती है।
निष्कर्ष: ‘नयी रोशनी’ से ‘भविष्य की जीत’ की ओर
अगले 17-18 महीनों में चुनावी मोड शुरू हो जाएगा। बाकलीवाल के सामने सबसे बड़ी चुनौती उन 'मतलबपरस्त' नेताओं से बचते हुए कर्मठ कार्यकर्ताओं की ऐसी टीम तैयार करना है, जो कांग्रेस की विचारधारा को जन-जन तक पहुँचा सके। यदि धीरज बाकलीवाल इसी तरह संगठन और कार्यालय को आबाद रखने में सफल रहे, तो दुर्ग शहर कांग्रेस के लिए यह 'नया उदय' न केवल सुखद होगा, बल्कि भविष्य की जीत का मार्ग भी प्रशस्त करेगा।
यह राजनीतिक लेख दुर्ग कांग्रेस में चल रही इस बड़ी उथल-पुथल और 'नयी रोशनी' की शुरुआत को बयां करता है।
Feb 09, 2021 Rate: 4.00
