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शौर्यपथ / आज अचानक आसमान की तरफ नजर उठाकर मैने देखा,
आसमान की काली स्याह बादलों के बीच नजर आने लगी एक आशा की रेखा।
कई दिनों से चारो ओर जो मुसीबत के बादल छाए थे
उनको कमजोर पढ़ते देखकर हम मन ही मन मुस्कुराए।
मन कहने लगा कि चलो अब ये मुसीबत के दिन टल जाएंगे।
मुरझाए हुए थे जो जीवन के फूल वो फिर से खिल जाएंगे।
तभी आसमान से एक आवाज ने मुझे टोका
कहने लगा कि आखिर तुम किसको दे रहे हो धोखा।
तुम्हारी मुसीबतों को मिलने वाला यह एक छोटा सा विराम है।
तुम्हारी सावधानियों में ही तुम्हारे जीवन का समाधान है।
मुझे मालूम है तुम कभी बदल नही सकते।
जीवन की सच्चाई में कभी ढल नही सकते।
तुम्हे तो बस दौडऩा है, भागना है और प्रकृति को उजाडऩा है।
इस धरा के नियम को तुमको अपने तौर तरीके से बनाना और बिगाडऩा है।
आज क्रंकीट के सड़को पर तुमको सरपट दौडऩा है।
और धरती माता के गर्भ से एक एक बूंद पानी भी निचोडऩा है।
बस अब भी वक्त है थम जाओ,
अपने जीवन की सात रंगों में ही रंग जाओ।
जो उजाड़ा है उसे बसाने की अपने मन ठान लो।
और अपने जीवन के हरपल को तुम फिर से संवार लो।
नही तो मैं फिर आऊंगा जलजला बनकर,कहर बनकर
और चीखती हुई लाशों का शहर बनकर।
मुझसे जैसा सुलूक करोगे वैसा ही तुमको लौटाऊंगा।
चंद हरियाली के बदले तुम पर हर खुशी लुटाऊंगा।
कुमार नायर
शौर्य की बातें / क्षमा चाहूंगा आजकल की पीढ़ी दिग्भ्रमित है उनका विवेक नष्ट हो चुका है। अच्छाई बुराई का अंतर आज का अधिकतर युवा समझ नही पाता। भगवान कृष्ण को विराट अवतार लेना पड़ा क्योकि अर्जुन भ्रमित थे। अर्जुन ने यही सवाल कुरुक्षेत्र में किया था कि मैं अपने परिवार, अपने भाई अपने गुरु अपने पितामह पर कैसे हथियार उठाऊँ?
भगवान श्रीकृष्ण ने उनको शिक्षा दी थी कि कौन यहां तुम्हारा अपना है? तुम किसके अपने हो? आत्मा न पैदा होती है न मरती है। न उसका भाई होता है न पिता। धर्म युद्ध अपना पराया नही देखता।
उनकी आवाज पर अर्जुन को अहसास हुआ कि उसका युद्ध कोई ग्रह कलह का मामला नही है बल्कि एक धर्म युद्ध है।
भगवान कृष्ण ने भाई के हाथों भाई को नही मरवाया, पुण्य के हाथों पाप को खत्म करवाया।
जमदग्नि पुत्र भगवान परशुराम ने गुरु पिता की आज्ञा को धर्म मानकर माता का सर काटने में भी संकोच नही किया। धर्म रक्षा के लिए भगवान गणेश ने पिता से युद्ध किया, विभीषण ने भाई से बैर लिया।
आप सोचो यदि कोई जज न्याय के समय अपना मित्र अपना संबंधी देखकर फैसला करे तो क्या न्याय करेगा? पंच परमेश्वर की शिक्षा ही यही है। क्या बिगाड़ के डर से ईमान की बात ना करोगे?
आपने कहा आप छोटे हो इसलिए बहस नही करोगे तो आपने अपने धर्म का पालन नही किया जो आपका मन आपको धर्म बताता है। संबंध, उम्र, ये सब धर्म की लड़ाई में पीछे छोड़े जाते हैं।
पहले सत्य का साथ बाद में कोई भी बंधन।
हॉ पितामह भीष्म गलत थे, क्योकि धर्म के आगे प्रतिज्ञा का बंधन नगण्य है। जब कुलकलंकी शक्ति प्राप्त कर जाए तो उसकी बात सुनना मानना और अधर्म का साथ देना समान अपराध कहलायेगा।
कसाब आपका अभिन्न मित्र होता भी तो देश पर हमले में उसकी मदद करना मित्रधर्म का पालन तो कहलायेगा पर आंशिक। उसको सही सस्ते पर लाना उसे गलत राह से बचाना अच्छे मित्र का कर्तव्य है न कि गलत काम मे मित्रता के नाम पर सहयोग करना। विभीषण सही थे क्योकि उन्होंने अपने भाई को सही रास्ता दिखाया जो निश्चित कुलनाश से बचा सकता था पर जब रावण ने उसे निष्कासित किया तब धर्म की शरण मे आकर उसने सीता अपहरण का भाग न बनते हुए उस पाप के प्रतिकार का पुण्य कमाया।
कर्ण गलत थे क्योकि अत्याचारी की मदद करने वाला भी अत्याचारी ही कहलाता है। दान का मतलब आतंकी संगठन को परमाणु बम दान नही हो सकता। दान उसको दो जो उसके योग्य हो। कर्ण के सूर्यपुत्र होने के बाद भी सुदपुत्र का लांछन हमको उनसे जोड़ता है। हमदर्दी पैदा करता है लेकिन इस हमदर्दी के कारण उनको सही नही बताया जा सकता। पाप की रक्षा पुण्य भी करे तो मलिन हो जाता है। इसीलिए भगवान कृष्ण ने उनका अंत करवाकर उसका मित्र ऋण उतरवाकर उन्हें मोक्ष प्रदान किया .
लेख - डॉ.सिद्धार्थ शर्मा
शौर्य की बातें / भारत के युवाओं में असीम शक्ति और संभावनाएं हैं। यदि अवसर मिले तो ये भारत को विश्वगुरु बनाने की क्षमता रखते हैं इसमें कोई शक नही। लेकिन भारतीय युवा राजनीतिक धूर्तताओ का शिकार है जिनको ये सिखाते हैं कि पकोड़ा तलना रोजगार है. क्या भारत के संविधान निर्माता ने 70 साल बाद सोचा था कि पकोड़े तलना राष्ट्रीय रोजगार होगा?
वोट कमाए जाते थे आज खरीदे जाते हैं। यदि भारत का युवा शिक्षित कर्मठ और योग्य है तो सिर्फ पकोड़े तलने तक सीमित क्यों है? सिस्टम ही खराब है कह दु तो शायद काफी लोग अफेंड हो जाएंगे. पर नीतियां चाहे राज्य सरकार की हो या केंद्र सभी लोगों के जीवन को ऊंचा उठाने के बजाय सिर्फ जीवन बच पाए तक ही सीमित लगती है।
भिक्षावृत्ति कानूनन अपराध है। ईश्वर के दिये हाथों का अपमान है लेकिन जब किसी वस्तु को उसकी कीमत कम या बिना दिए खरीदा जाता है तब वो स्थिति या तो चोरी है या भीख। क्या आज भी हमारे युवा रोटी, कपड़ा, मकान की निम्नतम जरूरतों में ही उलझे हुए हैं। अगर आज भी मकान दुकान का किराया, बिजली का बिल भरना ही चुनौती है तो भारत विकसित देशों के पूंजीपतियों का मुकाबला कैसे करेगा ,कैसे विश्वगुरु बनेगा?
बिल गेट्स का कथन की भारत को फ़ाइज़र बना नही पायेगा एक दुखद पहलू पेश करता है। जब रोटी दाल ही मिलना असीम आनंद और आलीशान लाइफ का प्रतीक हो तो व्यक्तिगत उत्थान तो दूर की कौड़ी मालूम होती है। छत्तीसगढ़ सरकार ने सभी किसानों का कर्ज माफ कर दिया, और वो चुनाव जीत भी गए। पर उस कर्ज की कीमत किसी न किसी को तो चुकानी होगी। किसान नही तो शिक्षक चुकाएगा, दुकानदार चुकाएगा, मध्यमवर्ग चुकाएगा।
मुफ्त में तो जहर भी नही आता पर चावल 1 या 2 रुपये में मिल जाता है. पर इसकी कीमत पेट्रोल के दामों में नजर आती है महंगी होती वस्तुओं में छिपाई जाती है। छत्तीसगढ़ सरकार के विज्ञापनों से सड़के अटी पटी है जहां 2 रुपये गोबर खरीदने की बात को जोर शोर से उठाया गया है। आप इसपर सहमति जता सकते हैं कम से कम गरीबों को कुछ तो मिल रहा है पर ध्यान से सोचिए। क्या आप अपने बच्चो को इस काम को आगे बढ़ाता देखना चाहेंगे या खुद इसका हिस्सा बनना चाहेंगे?
जो लोग कम कीमतों में या बिना कीमत दिए समान लेते हैं उनकी कीमत कोई और जरूर चुकाता है। जब वस्तु मुफ्त में मिलती है तब व्यक्ति अपनी जरूरतों को पूरी करने की जहमत भी नही उठाता है। 35 किलो मुफ्त मिलता अनाज फिर बिकने पीछे दरवाजे से वापस आ जाता है और कई बार बचा पैसा शराब सेवन में इस्तमाल हो जाता है। तभी तो होम डिलीवरी चालू है सोम रस की ताकि हर परिवार स्वर्ग जैसा बन जाये।
यदि इन मधुशालाओ को आधारकार्ड से लिंक कर दिया जाए तो सरकार हैरान रह जायेगी की 2 रुपये चावल खरीदते लोग 100 रुपये शराब पर लगा रहे हैं। आखिर ये पैसा जनता का है तो इसका इस्तेमाल गरीबो को खरीदने के लिए क्यो होता है? आप गरीबो के हितैषी दिखने के लिए करोड़ो रूपये तो विज्ञापनों में लगा देते हो।
गरीबी का इलाज तब तक संभव नही जब तक इसे बीमारी समझकर इसका इलाज न किया जाए। गरीबो को वोट बैंक समझेंगे और सिर्फ जीने लायक बनाएंगे तो ये क्या नया भारत बनाएंगे? ये मुफ्त में पैसे बांटना बन्द कीजिये, जाति के नाम पर एकाउंट में जमा होता पैसा, किसानों को मिलता पैसा, अनाज ,इलाज के नाम पर मुफ्त सर्विस, इसकी कीमत मध्यमवर्ग ही चुकाता है। हवा भी मुफ्त नही हो सकती किसी को पेड़ लगाना पड़ता है।
वैक्सीन की कमी पड़ी तो फिर सरकार ने खुद को गरीबों का मसीहा दिखाने के लिए एपीएल , बीपीएल और अंत्योदय का कार्ड खेल दिया और जिंदा रहने के हक को अमीर गरीब में बांट दिया। इस वजह से इतना कंफ्यूजन हुआ कि पूछो मत। भाजपा की वैक्सीन बताकर कोवैक्सीन की डोज़ नही ली जिसका खामियाजा सीजी को कोरोना प्रदेश बनाकर चुकाना पड़ा।
पैसे कमाने सरकार को कभी घर घर दारू बेचना पैड रहा या कोरोना के मौके पर रोड सेफ्टी जैसे मैच करवाने पड़े जिसनी सुपर स्प्रेडर का काम किया और कोरोना की दूसरी लहर ने राज्य को घुटनों पर ला दिया।
कहावत है अगर किसी को आम खरीदकर दे दो तो एक दिन खायेगा, अगर आम तोड़ना सीखा दो तो जीवन भर खायेगा। ये नकली गरीब प्रेम दिखाने वाली कांग्रेस सरकार ने ही 10% गरीब जनरल वर्ग को आरक्षण नही लेने दिया ताकि बहुतायत समुदाय नाराज न हो जाये। आज पूरा प्रदेश सरकारी तंत्र से नाराज है। सरकार को जरूरत है अपनी नीतियों पर पुनः विचार करने की और
देश को दुबारा पटरी पर लाने की।
लेख - डॉ. सिद्धार्थ शर्मा
सुपेला भिलाई
शौर्य की बातें / जब लोकतंत्र का निर्माण हुआ था तब पक्ष और विपक्ष की रचना की गई थी इस सोच के साथ कि जब विपक्ष सरकार से सवाल करेगा तो तानाशाही, निरंकुशता पर रोक लगेगी। सरकार से सवाल पूछे जाएंगे तो सरकार अच्छे से अच्छा काम करने की कोशिश करेगी, देश को अपनी पैतृक संपत्ति समझकर राज नही करेगी। एक जिम्मेदार लोकतंत्र के लिए एक सशक्त विपक्ष का होना बहुत जरूरी है। पर अफसोस ये है कि कुछ वर्ग पूरा आशावादी बन बैठा है जिसको हर बात पर कोई छुपा मास्टर स्ट्रोक नजर आता है।
आप अगर हमारे साथ नही तो हमारे खिलाफ हो, ये अहंकार, ये असभ्यता ही तो निरंकुशता की पहचान है। मैं उनको भी सही नही कहूंगा जो हर मुद्दे पर केवल सरकार को कोसते नजर आते हैं। असल में समझदारी की लाइन इन दोनों के बीच है।
अगर हर व्यक्ति एक ही नेता एक ही पार्टी एक ही सिद्धांत को चुन लेगा तो विविधता तो खत्म हो जाएगी और एकरसता आ जायेगी जो सर्वांगीण विकास में निःसंदेह बाधक है। हांजी हांजी के चमचों को पसंद करने वाले अक्सर इन्ही चाटुकारों के बीच घुसे रहते हैं। इनकी दुनिया बहुत छोटी होती है। जब कोई दूसरा पक्ष दिखाता है तो इनका अहंकार गुस्से के रूप में फटकार बाहर आता है।
एक भाई साहब ने तो ये तक कह दिया कि देश के pm का विरोध नही कर सकते? अरे भाई तो विपक्ष क्यो बैठा है संसद में? सबको बाहर कर दीजिए और सारी पावर मोदीजी को दे दीजिए।
ये सुनने में उसी को अच्छा लगेगा जिसे लगता है मोदीजी वही करेंगे जैसे वो चाहता है क्योकि उनकी सोच एक है। यही सोच तो इटली में मुसोलिनी, जर्मनी में हिटलर जैसों को जन्म देती है। ये सभी नेता प्रसिद्ध रहे। निर्विरोध रहे, इनकी अवहेलना इनका अपमान राष्ट्र का अपमान माना जाता था। मिश्र के फराहो राजा को भी देवताओं के द्वारा नियुक्त माना जाता था और विरोध की मनाही थी।
इसी आधार पर आज भी एक किताब है जिस पर शक और शुबह नही की जा सकती। जरा सोचिए आप किस तरह के भारत का निर्माण चाहते हैं? केवल अच्छा अच्छा देखने वाला भी उतना ही समझदार है जितना सिर्फ बुरा बुरा देखने वाला।
आये दिन फेसबुक पर इन दो धड़ों में बहस होती रहती है। मेरी बात सुनो मैं सही, हमारी बात सुनो हम सही, हमारे नेता की बात सुनो हमारा नेता सही। ये तीनो विचार एक ही हैं बस इनका दायरा अलग अलग है। सच बताऊँ तो ये बचपना ही है क्योकि कोई व्यक्ति सम्पूर्ण नही हो सकता। कोई व्यक्ति हर बात हर काम सही नही कर सकता। गुण दोष सभी मे भरा हुआ है। पर जब बात एक राष्ट्र की आती है जिसके अंदर डेढ़ अरब लोग हैं तो गलती की गुंजाइश कम हो जाती है।
जनता मालिक है नौकर नही, हम वोटर है पार्टी के प्रवक्ता नही, अगर मान भी लिया जाए कि हमारा नेता देवतुल्य है तो भी क्या देवताओं ने गलतियां नही की? इसीलिए लोकतंत्र की रक्षा इसी में है कि शक्तिशाली से सवाल किया जाए। जब हमारा नेता सही होगा हम पीछे चलेंगे, जब गलती करेगा तो कुर्सी से उतारना भी हमारा अधिकार है। अपनी इज्जत पहले कीजिये आपके नेता तो इज्जतदार हैं ही।
आप जनता हैं, जनता ही रहिए .
लेख - डॉ. सिद्धार्थ शर्मा - सुपेला भिलाई
शौर्य की बातें / भूलोक पर कोरोना वायरस का तांडव भोलेनाथ के तांडव को भी मात दे रहा है। इससे मृत्यु दर इतनी बढ़ गई है कि यमलोक में जगह कम पड़ने लगी है। वहां हाहाकार मच गया है। कोरोना मरीजों की देखरेख के लिए जैसे चिकित्सालययों की कमी हो गई है। उसी तरह बढ़ती मौतों के कारण यमलोक में यमदूतों की भी कमी हो गयी है। भूलोक में मनुष्यों की बढ़ती मृत्युदर एवं कोरोना वायरस की तीसरे लहर का पूर्वानुमान लगाकर यमराज ने दूरदृष्टि का परिचय देते हुए अविलंब विशेष यमदूतों की भर्ती करने का विज्ञापन जारी किया है।
खास बात यह है कि यमदूतों की भर्ती के लिए शैक्षणिक योग्यता का बंधन नहीं है। बैंक ड्राफ्ट ,पोस्टल आर्डर भेजने की भी आवश्यकता नहीं है। लेकिन आवेदक की कद काठी राक्षसों की तरह भयानक होना अनिवार्य है। साथ ही ‘‘भैंसा वाहन’’ उड़ाने का वैध लाइसेंस भी होना चाहिए। दहेज के नाम पर बहुओं को प्रताड़ित करने, कन्याभ्रूण हत्या में लिप्त महिलाओं के लिए महिला यमदूतों के पद आरक्षित हैं। इसी तरह चिकित्सालयों में मृत मरीजों के जेवर नकदी पार करने में माहिर अधर्मी लोगों को भी प्राथमिकता दी जावेगी। दयालुजनों को आवेदन न करने की सलाह दी गई।
चयनित यमदूतों को मास्क, सेनिटाइजर, पर्सनल प्रोटेक्टिव इक्यूपमेंट कीट (पी पी ई किट), प्रदान किया जाएगा। कोरोना संक्रमण जानवरों में होने की आशंका को दृष्टिगत रखते हुए भैंस के लिए भी विशेष पी पी किट देने का प्रावधान है। यमदूतों की नियुक्ति कोरोना संक्रमण काल तक के लिए की जावेगी। यद्यपि मानव समुदाय की गलती से उपजे कोरोना वायरस के निकट भविष्य में समाप्त होने की संभावना नहीं है। वैज्ञानिकों के मुताबिक जिस बेरहमी से पर्यावरण और भौगोलिक व्यवस्था को मनुष्य चूर-चूर करने पर तुला है, उससे कोरोना से भी भयानक वायरसों की उत्पत्ति की प्रबल संभावना है।अतः महामारी के बढ़ने की स्थिति में नवनियुक्त यमदूतों की सेवा अवधि में भी वृद्धि की जा सकेगी।
महामारी पीड़ितों को महंगे दामों पर सामग्री बेचकर मुनाफा कमाने वालोें, और नकली जीवन रक्षक दवाईयों के गोरखधंधे में लिप्त इंसानियत के दुश्मनों तथा आक्सीजन, रेमडेसिविर की कालाबाजारी, जीवन रक्षक दवाओं का कृत्रिम संकट पैदा करने वाले मानव रुपी दानवों को चुन चुन कर यमलोक ले जाने की जवाबदारी नवनियुक्त यमदूतों की होगी।
विदित हो कि यमदूत का पद एक निष्कपट, निश्चल ‘‘मजिस्ट्रेट’’ के पद की तरह है, अतःकिसी भी प्रकार से राजनैतिक दबाव, पहुंच, पैसा का दम दिखाने वाले आवेदक को यमदूत पद हेतु अपात्र घोषित किया जावेगा। ऐसी ऊंची पहुंच का रूतबा दिखाने वाले को सूचित किया जाता हैै कि बड़े-बड़े नेता ,मंत्री, संतरी, साधु-संत और समाज के दो मुंहे, दोहरे चरित्र वाले कु-कमिर्यो से नर्क पहले ही ‘‘ओव्हरक्राउडेड’’ है। ऐसे कु-कर्मियों से सिफारिश करवाने के पहले इनकी असलियत को जान लें। यह ऐसे बहूरूपिए लोग हैं जो जीवन भर बड़े पैमाने पर व्यभिचार में लिप्त होते हैं,और बेहतर छवि बनाने हेतु जनता जनार्दन के सामने दान देने का ढोंग करते हैं। हकीकत में ये चोरी तो ‘‘सब्बल’’ की करते हैं और दान ‘‘सुई‘‘ की कर गरीबों के मसीहा के रुप में स्वयं को प्रचारित करते हैं। ऐसे झूठे ,मक्कार ,घूसखोर, मुनाफाखोरों का सत्यानाश करने कोरोना वायरस ने जन्म लिया है।
पृथ्वी की पवित्रता को बनाए रखने हेतु ऐसे कुकर्मियों को जल्द से जल्द भूलोक से यमलोक पहुंचाने का सुनहरा अवसर नव नियुक्त यमदूतों को मिलेगा। इस पुण्य कार्य में सर्वोत्कृष्ट प्रदर्शनकर्ता यमदूतों को ‘‘आउट आफ टर्न प्रमोशन पॉलिसी’’ का लाभ देते हुए यमदूत से देवदूत के पद पर पदोन्नति दी जावेगी।
विजय मिश्रा ‘अमित‘
अति. महाप्रबंधक(जनसंपर्क)
शौर्यपथ लेख / कोरोना महामारी ने देश की अर्थ व्यवस्था को सडक पर ला दिया है . इस कोरोना काल में जहां कई उद्योगपति अपने संपत्ति में इजाफा करते नजर आये है वही गरीबो के लिए राज्य व केंद्र सरकार योजनाये ला कर उनके जीवन को आसान कर रही है . सरकार कितना भी दावा कर ले कि देश में सब ठीक चल रहा है किन्तु ये बिलकुल ही गलत है . वर्तमान में देश एक साल से ज्यादा समय से कोरोना संकट के कारण कई तरह की मुसीबत से गुजर रहा है ऐसे में समाज का एक बड़ा वर्ग आज भी अपने आप को ठगा सा महसूस कर रहा है . ऐसे कई कारण है जिसके कारण देश का बड़ा वर्ग मिडिल क्लास आज कई तरह की परेशानियों से गुजर रहा है किन्तु केंद्र की मोदी सरकार को इनकी कोई चिंता नहीं है . लगातार नौकरिया जा रही है बेरोजगारी दर बढ़ रही है ऐसे में मिडिल क्लास जिसे ना तो गैस में सब्सिडी है , ना राशन फ्री है , ना स्कूल फीस में कोई कमी , ना आय के कोई स्रोत उलटे घर के राज्मर्रा के खर्च , बच्चो की आश्वश्यक ज़रुरतो को पूरी करने की कवायद स्कूलों द्वारा फीस जमा करने का दबाव , बिजिली बिल , राशन का खर्च , ईएमआई का तनाव कई उद्योग का सञ्चालन बंद जिससे मिडिल क्लास जुदा हुआ है जैसे माल का सञ्चालन बंद , ट्रांसपोर्ट में बंदी के कारण कई लोगो का बेरोजगार होना , उद्योगों में छटनी आदि ऐसे कई कारण है जिनके कारण मिडिल क्लास की परेशानिया बढती ही जा रही है किन्तु केंद्र सरकार द्वारा समाज के इस बड़े वर्ग के लिए कोई योजना नहीं है उलटे अपनी सभी जिम्मेदारियों को निभाने का दबाव है .
वर्तमान हालत में मिडिल क्लास ना तो वर्तमान स्थिति के कारण किसी से कर्ज ले पा रहा है ना कोई रोजगार तलाश कर पा रहा है उलटे इस आपदा और लॉक डाउन के फैसलों के कारण कर्जदार अलग हो गया कोई बैंक के किस्तों के क़र्ज़ में दब गया कोई स्कूल फीस के बोझ तले दब गया कोई परिवार की दो वक्त की रोटी के लिए तरस रहा है किन्तु समाज के मिडिल क्लास वर्ग के लिए ना तो राज्य शासन कोई ठोस कदम उठा रही है ना ही केंद्र सरकार शताब्दी बाद आये महामारी के कारण ये तो स्पष्ट हो गया कि किसी भी सरकार को मिडिल क्लास की चिंता नहीं जो ना तो मांग कर खा सकता है ना किसी योजना का हिस्सा बन सकता है और ना कमा कर खा सकता है अपनी ज़रुरतो को पूरा कर सकता है .
क्या राज्यों की सर्कार्कारे और केंद्र की सरकार के लिए मिडिल क्लास सिर्फ वोट बैंक है अब मिडिल क्लास को सोंचना है कि उन्हें कैसी सरकार का चयन करना है क्योकि वर्तमान की केंद्र सरकार जितना कार्य करती है उससे ज्यादा दिखावा करती है राज्य की सरकारे जो भी योजनाये बनाती है उसमे लाभी या तो गरीब वर्ग को होता है या धनवानों को मिडिल क्लास के बारे में आज कोई भी सरकारे ना कुछ सोंच रही है ना जमीनी स्तर पर कोई कार्य कर रही है ऐसे में मिडिल क्लास क्या करे इसका जवाब किसी के पास नहीं ....
ओपिनियन /शौर्यपथ /छत्तीसगढ़ में बैशाख शुक्ल की तृतीया को अक्षय तृतीया (अक्ती) का पर्व मनाया जाता है। इस वर्ष यह पर्व 14 मई को पड़ रहा है। इस पर्व पर मिट्टी के घड़े अथवा सुराही दान में देने की प्रथा प्रचलित है। इस पर्व पर मटके, सुराही दान देने का उद्देश्य यहीं है कि दीन हीन निर्धनजनों का परिवार ग्रीष्मकाल में सहजता से शीतल जल से प्यास बुझा सके। इस पर्व पर दो चार सुराही पक्षियों के बसेरा बनाने के लिये पेड़-पौधों, घरों की मुंडेर पर लटकाने की एक नई परंपरा छत्तीसगढ़ राज्य पाॅवर कंपनी के अतिरिक्त महाप्रबंधक श्री विजय मिश्रा ‘‘अमित’’ ने की है। उनका कहना है कि गर्मी बीत जाने के बाद प्रायः सुराही मटके को अनुपयोगी मानकर फेक दिया जाता है। इन्हे भी सुरक्षित स्थान पर लटका देने से यह भी पक्षियों का बसेरा बन सकते है।
सृष्टि की रचना के साथ ही मनुष्य का अटूट रिश्ता पेड़-पौधों, जीव-जन्तुओं और पशु-पक्षियों के साथ जुड़ा हुआ है। मानव समुदाय की जिंदगी को खुशनुमा बनाने में पक्षियों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। इसलिये विद्वानों का कहना है कि ‘‘परिंदे जिनके करीब होते हैं, वे बड़े खुशनसीब होते हैं’’। मानव मित्र ये पक्षी फसलों के कीड़ों को खाकर न केवल फसलों की रक्षा करते हैं। फूलों के परागकण को एक फूल से दूसरे फूल में पहुंचाने का भी कार्य करते हैं। इससे अनभिज्ञ अनेक लोग खुबसूरत पक्षियों को पिंजरे में कैद करके रखते है।
मनुष्य के तन-मन-धन सब को संवारने में पक्षी परिवार का महत्वपूर्ण योगदान होता है। इसीलिए बुद्धिमत्ता इसी में है कि पक्षियों को पिंजरे में कैद करके रखने के बजाय आंगन में दाना पानी रखना आरंभ करें। साथ ही साथ घर आंगन आस-पास उगे वृक्षों में सुराही को बांधकर लटका दे। ऐसे लटके हुये सुराही में गौरेया, गिलहरी, उल्लू, पहाड़ी मैना, जैसे अनेक प्राणी बड़ी सहजता से अपना बसेरा बना लेते हैं। ऐसे में बिना कैद किये हुये भी आसपास चहकते हुए पक्षी आपके परिवार के सदस्य बन जाते हैं। श्री विजय मिश्रा अब तक सैकड़ों सुराही, मटके से पक्षियों का बसेरा बनाकर पेड़ों पर लटकायें हैं साथ ही सुराही बांटने, घोसला बनाने के तरीके भी वे रूचि लेकर सिखाते हैं।
उनका कहना है कि पक्षियों से दूर होते इंसान की जिंदगी आज नीरस हो चली है। कोयल, कौआ, फाक्ता, बुलबुल, कबूतर जैसे पक्षियों से बढ़ती दूरी मानव समुदाय के लिए अनेक अर्थों में हानिकारक सिद्ध हो रही है। लुप्त होते पक्षियों को बचाने का उत्तम उपाय यही है कि उन्हें पिजरें में कैद करना तत्काल बंद कर दें और अपने करीब रखने के लिए घर आंगन के पेड़ पौधे, मुंडेर पर सुराही, मटकी बांधने के साथ ही हर सुबह दाना-पानी देना आंरभ करें। इससे बारहों महीना चैबीस घण्टे पक्षियों के कलरव से आपका मन आनंदित होगा और पक्षियाॅ भी आपको आशीष देते हुये कहेंगे- समाज उसे ही पूजता है जो अपने लिए ही नहीं दूसरों के लिए भी जीता है।
लेखक विजय मिश्रा
अति.महाप्रबंधक(जनसम्पर्क)
छ.रा.पाॅवर होल्डिंग कंपनी रायपुर
(छ.ग.)
शौर्यपथ लेख / 3 अप्रैल 2021 एक ऐसा दिन जब नक्सलियों के कायराना हमले में हमारे 22 जांबाज भाई शहीद हो गए। इस दुखद घटना से मेरे जेहन में अपने दंतेवाड़ा और सुकमा में बिताए 4 वर्षों की स्मृतियां उभरने लगीं। यहां घटित हर नक्सली घटना के बाद विशेषज्ञों और बुद्धिजीवियों में यही चर्चा होती है कि नक्सलवाद ग्रामीणों के समर्थन पर टिका है और इसी के बूते फलफूल रहा है। मुझे तब लगता है कि सबसे बड़ा दुष्प्रचार ग्रामीणों के लिए यही होगा कि उन्हें नक्सलियों से जोड़ा जाए और उन्हें नक्सलियों का हितैषी माना जाए। यह बात कॉरपोरेट ऑफिस में बैठकर या किसी ऐसी बड़ी घटना होने के बाद एक या 2 दिन घटनास्थल जाकर नक्सल प्रभावित क्षेत्र के गांव में भ्रमण कर नहीं जानी जा सकती, मैं ऐसा इसलिए कह रहा हूं, क्योंकि मैंने अपने कार्यकाल के 4 साल 2015 से 19 नक्सल प्रभावित क्षेत्र दंतेवाड़ा एवं सुकमा में बिताए हैं, जिसमें 3 साल मैंने एसडीओपी दोरनापाल के रूप में जो कि सुकमा जिले में स्थित है कार्य किया है। इस दौरान हमने वहां ग्रामीणों को जोडऩे वाला एक अभियान तेदमुन्ता बस्तर चलाया जिसके तहत हम नक्सल गढ़ कहे जाने वाले सुकमा के अति नक्सल प्रभावित गांव में जाकर ग्रामीणों के साथ बैठक कर उन से निरंतर संवाद स्थापित कर वहां की वास्तविक स्थिति को समझा है। इसलिए मैं यह दावे के साथ कह सकता हूं कि कोई भी ग्रामीण नक्सलियों का साथ नहीं देना चाहता, क्योंकि वह चाहते ही नहीं कि उनके क्षेत्र में नक्सलवाद रहे। ऐसा कहने के पीछे तार्किक कारण यह है कि तेदमुंता बस्तर अभियान के दौरान जब हम अनेक गांव में जाकर बैठक लेते थे। तब हम वहां उपस्थित ग्रामीणों को पूछते थे कि क्या आप नक्सलवाद का खात्मा चाहते हैं तो वह बोलते थे हां।
फिर हम उन्हें बताते थे कि 3 तरीके से नक्सलवाद को खत्म किया जा सकता है।
पहला शिक्षा जिसमें हम बताते थे कि शिक्षा के माध्यम से नक्सलवाद खत्म किया जा सकता हैं परंतु यह एक लंबी प्रक्रिया है जिसमें आने वाली पीढ़ी नक्सलवाद के चंगुल से मुक्त हो जाएगी। दूसरा एकता इसके माध्यम से प्रत्येक गांव नक्सलियों के खिलाफ खड़ा होकर उनसे प्रश्न करेगा कि 40 वर्षों में नक्सलियों ने उन्हें क्या दिया है? और इस प्रकार नक्सलियों का विरोध एक-एक करके सभी गांव वाले करना शुरू करेंगे और इस एकजुटता और एकता के माध्यम से नक्सलवाद खत्म किया जा सकता है।
तीसरा तरीका 1857 की क्रांति जैसा कुछ जिसमें हम कोई दिन निर्धारित करेंगे और इस दिन सभी गांव वाले एक साथ अपने अपने घरों एवम गांव से निकलेंगे, और बड़ी संख्या में उस क्षेत्र की ओर जाएंगे जहां पर नक्सली रहते हैं, और पूरी एक श्रृंखला बनाते हुए हम गांव, जंगल, नदी, पहाड़ पार करते उनको खोजते हुए आगे बढ़ते जाएंगे। हमारे हाथ में जो भी औजार हथियार, डंडा, हँसिया, धनुष आये उसे लेकर चलेंगे, और जो भी नक्सली मिले उसे बोलें या तो आत्मसमर्पण कर दे नहीं तो वह मारा जाएगा। इस प्रकार हम पूरे नक्सली खत्म कर देंगे। तब उनके बीच से कोई पूछता था इसमें पूरे गांव वाले जाएंगे ना ? क्योंकि उन्हें डर था कि कोई एक गांव वाले भी यदि नही जाएंगे तो उनको खतरा हो जाएगा।
तीसरे तरीक़े को सुनने के बाद एक अजीब सी खुशी उनके चेहरे में दिखाई देती थी। जैसे वह यह बोल रहे हो कि काश ऐसा हो पाता जब मैं यहां पूछता कि इन तीनों ही तरीकों में से कौन सा तरीका आप नक्सलवाद के खात्मे के लिए चुनेंगे? तो वह हंसते हुए तीसरे तरीके की ओर इशारा करते, उनके इस संकेतों से यह स्पष्ट था कि वो कितने आतुर हैं कि नक्सलवाद उनके क्षेत्र से समाप्त हो जाए। क्योंकि उन्हें भी पता है कि नक्सलियों ने उन्हें इन 40 सालों में कुछ नहीं दिया ना सड़क ना बिजली ना पानी ना स्वास्थ्य सुविधाएं अगर नक्सली जनता के लिए लड़ रहे हैं तो इन 40 वर्षों में नक्सली जनता को मूलभूत सुविधाए तो दे ही सकते थे। अपितु सरकार द्वारा दी जा रही सुविधाओं से भी उन्हें नक्सली मरहूम कर रहे है। नक्सलवाद की जमीनी हकीकत जानने के लिए यह जानना भी आवश्यक है कि छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद आया कैसे ? छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद 1980 के आसपास तेलंगाना क्षेत्र से आए 7 समूहों जो की 7 - 7 सदस्यों के रूप में आए थे, वहां से पनपा। इन लोगों ने कैसे छत्तीसगढ़ को पूरे भारत का नक्सलवाद का केंद्र बना दिया इसके लिए यहां की भौगोलिक सांस्कृतिक एवं पिछड़ेपन की परिस्थिति प्रमुख रही। मेरे विचार से इस क्षेत्र में नक्सल समस्या इसलिए नहीं है क्योंकि ये क्षेत्र विकसित नहीं है या यहाँ विकास नहीं हुआ है 7 बस्तर क्षेत्र के आदिवासी तो पकृति के साथ जीते है , एवं अपनी विकसित संस्कृति के साथ वे खुश थे। उन्हें शहरी मॉल संस्कृति या औद्योगीकरण की चाह नहीं थी , ना ही वे संचयी प्रवित्ति के लोग है वे तो सुबह जंगल जाकर वनोपज संग्रह कर शाम उसे उपभोग करना जैसी अपनी सिमित आवश्कताओं से खुश रहते थे 7 जब नक्सल लीडर इन क्षेत्र में आये तो उन्हें यहाँ के निवासियो का भोलापन तथा निस्वार्थ छबि तथा यहाँ की भौगोलिक स्थिति उपयुक्त लगी , फिर यहाँ के भोले भाले आदिवासियों को बहकाने का उन्होंने खेल खेला 7 इन लीडरो ने उन आदिवासियों को यह विशवास दिला दिया की सरकार या प्रशासन उनके जल , जंगल, जमीन पर अधिकार कर लेगी, और उन्हें यहाँ से बेदखल कर देगी। उन्होंने इस क्षेत्र में चलने एवम् खुलने वाले खनिज खदानों एवम् उनसे होने वाले विस्थापितों का उदाहरण प्रस्तुत किया। साथ ही व्यापारियो द्वारा किये जा रहे शोषण आदि का भी हवाला दिया , और उन्हें धीरे धीरे अपने साथ मिलाना शुरू किया 7 फिर इन खनिज खदानों के कारण होने वाले जमीन अधिग्रहण एवम् विस्थापन का विरोध शुरू हुआ , इन सब पर नियत्रण करने के लिए अधिक से अधिक पुलिस बल को यहाँ स्थापित किया गया 7 इस तरह नक्सलियो को यहाँ अपना विस्तार करने के लिए एक उपयुक्त नींव मिल गयी। इस प्रकार नक्सलियों के द्वारा इस झूठ के दम पर अपना प्रचार करना शुरू कर दिया गया। परंतु ऐसा नहीं था कि उस समय लोगों को यह समझ नहीं आ रहा था कुछ लोग ऐसे भी थे जिन्हें यह एहसास हो चुका था कि नक्सली झूठे है और जल, जंगल, जमीन की बात कर वे लोगों को बरगला रहे हैं। ऐसे लोगों ने जब उनका विरोध करना शुरू किया तो नक्सलियों ने अपना असली चेहरा दिखाना शुरू किया। नक्सलियों द्वारा ऐसी पहली राजनीतिक हत्या 1986 में माड़वी जोगा नामक ग्राम पटेल की गई, क्योंकि वह नक्सलियों की हकीकत जान कर उनके विरोध में उठ खड़ा हुआ था। उसके बाद लगातार नक्सलियों द्वारा हत्याओं का सिलसिला शुरू हुआ जो आज तक अनवरत जारी है। अब मैं फिर से उसी पुराने प्रश्न पर आता हूं क्या ग्रामीण नक्सलियों का समर्थन करते हैं ? इसके जवाब में मैं यहां बताना चाहूंगा कि तेदमुन्ता बस्तर अभियान के दौरान जब मैं विभिन्न गांव में बैठकें लेता तो उस संवाद में हमारा उनसे एक प्रश्न होता था कि इस गांव से कितने ग्रामीणों को की हत्या नक्सलियों द्वारा अभी तक की गई है ? आप विश्वास नहीं करेंगे हमने ऐसा कोई भी गांव नहीं पाया जहां नक्सलियों द्वारा ग्रामीणों की हत्या नहीं की गई हो और कोई कोई गांव उदाहरण दोरनापाल जगरगुंडा रोड से 5 किलोमीटर अंदर दूरी पर स्थित पालामडग़ू गांव में नक्सलियों ने विभिन्न समय पर 17 ग्रामीणों को मौत के घाट उतारा था। बैठकों के दौरान हमने पाया कि औसतन 4 से 5 ग्रामीणों की हत्या सभी गांव में नक्सलियों द्वारा की गई थी। उनमें से कुछ गांव का नाम मैं बताना चाहूंगा गोलगुंडा, पोलमपल्ली, पालामडग़ु, अर्र्णमपल्ली, जग्गावरम, डब्बाकोन्टा, रामाराम, पिडमेल, कांकेरलंका, पुसवाड़ा, तिमिलवाड़ा, बुर्कापाल, चिंतागुफा गोडेलगुड़ा, मेड़वाही, इत्तगुड़ा, पेंटा, मिसमा, पेदाकुर्ति, गगनपल्ली, एर्राबोर...... यूं तो गांव के नामों की सूची काफी लंबी है, परंतु इन उदाहरणों से मैं आपको यह बताना चाहता हूं कि, आप इन गांव में हुए नक्सली बर्बरता और हत्या की जानकारी ले सकते हैं।
अब मैं आपको यह पूछना चाहूंगा कि देश के बाहुबली गुंडे इनके खिलाफ कितने लोगों ने आवाज बुलंद करने की हिम्मत की है? जिन्होंने भी हिम्मत कि ऐसे गुंडों बदमाशों ने उनकी हत्या कर दिया या करवा दी तो नक्सली भी इन गुंडे बदमाशों से कहां अलग है? कोई उनके खिलाफ आवाज उठाता है, तो पूरे गांव वालों को बुलाकर जनअदालत लगाकर निर्ममता पूर्वक सबके सामने में उसकी हत्या कर दी जाती है। और उस पर झूठे आरोप लगाए जाते हैं कि वह पुलिस मुखबिर है, ऐसे झूठे आरोप लगाकर हत्या करना उनकी एक रणनीति का हिस्सा है, क्योंकि वे आतंक का माहौल बनाकर लोगों को अपने विरुद्ध ना खड़े हो इसके लिए हत्या का उदाहरण प्रस्तुत करते है। ग्राम पलामडग़ू में जब मैं एक बार बैठक लेने गया तो वहां पर ग्रामीणों से मैंने पूछा कि आप नक्सलियों का साथ क्यों देते हैं? तो वहाँ उपस्थित ग्रामीणों में से बैठा हुआ एक युवक खड़ा हुआ और बहुत हिम्मत करते हुए उसने बोला अगर हम उनका साथ नहीं देंगे सर तो वह ( नक्सली ) हमें मार देंगे। बाद में मुझे पता चला कि पूर्व में उस युवक के पिता की हत्या भी नक्सलियों के द्वारा कर दी गई थी।
यह लेख मैंने वहाँ रहते हुए अपने अनुभव के आधार पर लिखा है। और कोशिश की है कि वहाँ की सच्चाई आप लोगों तक पहुँचाऊ। मुझे पूरा विश्वास है कि एक दिन जरूर आएगा जब स्थानीय आदिवासी नक्सलवाद से त्रस्त होकर तीसरा तरीका अपनाते हुए अपने घरों से गांव से निकलेंगे, और उस दिन पूरे आदिवासी नक्सलवाद का खात्मा सुनिश्चित करेंगे। और वह दिन कोई सरकार द्वारा प्रायोजित या राजनीतिक आंदोलन (सलवा जुडूम जैसा) से प्रभावित ना होकर उनका स्वत:स्फूर्त आंदोलन होगा, जिसमें नक्सलवाद का खात्मा निश्चित ही होगा।
लेख - विवेक शुक्ला
सीएसपी , दुर्ग शहर ( छत्तीसगढ़ पुलिस )
शौर्यपथ विशेष / जो सुबह से उठकर मशीनों से भी ज्यादा गति से काम करे व सबका अच्छे बुरे का ख्याल रखे और खुद अपने बच्चों को गर्मा-गरम खाना बनाकर खिलाये और सबके खाने के बाद खुद ठंडा खाना खाएं...
ये वही मां है...ना?
अपने जान को खतरे में डालकर अपने बच्चे को जन्म देती है और पति व बच्चे को सामाज व परिवारों में एक नया पहचान एक नया नाम देती है...
ये वही माँ है...ना?
खुद की तबियत खराब होने के बाद भी अपने बच्चों के तबियत की चिंता करे व बच्चों की लाख गलतियां होने पर भी वह अपने बच्चों के लिए दुनिया से तो क्या भगवान से भी लड़ ले...
ये वही मां है...ना?
बुरे समय मे जब सब साथ छोड़ दे और वो अपने बच्चों का साथ मरते दम तक ना छोड़े व जो बच्चों की जीवन की हर एक खुशी में उनके पास हो तो उन्हें किसी दौलत की जरूरत ना हो...
ये वही मां है...ना?
उनके कांधों पर जब सर रख कर सोते है और रात भर जन्नत की सैर करते है व जिनके वजह से बच्चे इस दुनिया में सामाज में परिवार में जो जगह बनाये उनका हकदार कोई और नही¸ बल्कि वो मां है...
ये वही मां है...ना?
अतिश (दक्ष)
संस्कारधानी-राजनंदगांव (छ.ग.)
मुंगेली / शौर्यपथ / छत्तीसगढ़ प्रदेश को अपने आगोश में लेकर तांडव कराने वाले कोरोना 19 वायरस संक्रमण पर हम सब को सुरक्षा मुहैया कराने दिन रात एक कर लगातार कोरोना की दूसरी पारी को संभालने वाले कोरोना फाईटर्स के रूप में हमारे सफाई कर्मचारी तथा डॉक्टर एवं पुलिस के जांबाज नवजवानों को आवो हमारे सब मिलकर करें सम्मान और उनके हौसला को बढ़ाए जिससे हमारा गांव ही नहीं वरन पुरा देश से कोरोना संक्रमण पर विजय की पताका फहरा सके।
स्वच्छ भारत की मिसाल गढता - सफाई कर्मचारी
कोरोना संक्रमण काल से लेकर के लगातार सफाई कर्मचारी अपनी जान लगाकर के शहर के कोने-कोने को स्वच्छ वातावरण देने के लिए सफाई करते नजर आते हैं आवो फिर एक मिलकर करे सबका सम्मान वही सरकार से एक अपील सफाई कर्मचारीयों के लिए मेरी ओर से घर गृहस्ती चलाने की दिक्कतों का सामना ना करना पड़े सफाई कर्मचारियों को हमने अधिकतर देखा हे कि सबसे ज्यादा सफाई कर्मचारियों को ही किसी ना किसी सरकारी दफ्तरों के बाहर धरना प्रदर्शन करते देखने को मिलता है जबकि ऐसा नहीं होना चाहिए सरकार सफाई कर्मचारीयों को वेतन सही समय पर दे जो हम सब को एक स्वच्छ वातावरण मुहैया कराने का कार्य करने पर लगे हैं हम गर्व करते हैं हमारे सफाई कर्मचारियों पर जो देश की गन्दगी को साफ कर हम सब को स्वच्छ वातावरण प्रदान करते हैं।
निराशा के बीच में आशा की किरण जगा देते हैं... डॉक्टर
जीवन और मरण का जिम्मा हम सब ईश्वर के बाद किसी को दूसरा स्थान डॉक्टरों को देते हैं माता पिता के बाद हम सब के जीवन की देखभाल डॉक्टर के हाथों होता है जो निराशा को हमें आशा की उम्मीद देते हैं और पुनः एक बार जीवन की आशा मिल जाती है कोरोना संक्रमण में पूरी निष्ठा और जिम्मेदारी के साथ अपनी भूमिका अदा कर रहे हैं दिन रात एक कर के लोगों की जान बचाने के लिए लगे हुए हैं डॉक्टर एवं उनकी टीम को आवो मिलकर उन्हें सम्मान दे और डॉक्टर व उनकी टीम की हौसला बढ़ाऐ
सेवा ही धर्म को चरित्रार्थ करता छत्तीसगढ़ ...पुलिस
संकट की घड़ी में बिना छुट्टी लिए कड़ी धूप में आसमान में नीचे खड़े होकर हम सब को कोरोना 19 संक्रमण की बचाव हेतु सड़कों पर हम सब को बेवजह घरों से बाहर ना निकले और सोशल डिस्टेंस बनाने तथा मास्क का प्रयोग करते रहने की अपील करते आज भी आपको सड़कों पर आपको मिलेगा तो आवो हमारे सबके सुरक्षा व्यवस्था बनाने वाले पुलिस जवान जो आम नागरिकों की सुरक्षा पर डटे हुए पुलिस के जवानों को सलाम कर उनके हौसले को बढ़ाए और मिलकर फिर एक बार सम्मान करें।
पुलिस यानी सेवा सुरक्षा सहयोग कुछ लोगों का मानना है कि पुलिस आजकल सेवा बदमाशों की सेवा करती है जनता की सहयोग करने के बजाए गुमराह करते हैं किंतु ऐसा नहीं समझना चाहिए क्यो की कोई एक व्यक्ति की गलतीयो पर पुरा सिस्टम को बदनाम नहीं करनी चाहिए
शौर्य की बातें / ये क्या हो रहा है मेरे देश में अब इंसानों को गद्दार और देशभक्त की संज्ञा कानून नहीं कुछ लोगो द्वारा दिया जा रहा है ये कुछ लोग वो है जो समाज के अभिन्न अंग है जो दिनभर सभी कार्य सभी समाज के साथ मिलकर करते है ये कपडे के व्यापारी है जो अपने दूकान में आने वालो को ये नहीं पूछते की किस धर्म से हो जिस समाज से हो सभी को एक भाव से देखते है और कोशिश करते है कि उनके दूकान से कुछ खरीद कर जाए , ये होटल वाले है जो अपने ग्राहकों का धर्म पूछ कर अपने होटल में आने जाने से नहीं रोकते सभी को ग्राहक मानते है और इनकी सेवा करते है , ये मिल मालिक है जो अपने कर्मचारियों को काबिलियत के पैमाने में परख कर काम और पद देते है , ये राजनेता है जो चुनाव के समय सभी से हाँथ जोड़ कर अपने पक्ष में मतदान के लिए निवेदन करते है , ये वकालत से समबन्ध रखते है अपने यहाँ आने वाले हर फरियादी को न्याय के मंदिर से न्याय दिलाने के लिए प्रयासरत रहते है , ये बिल्डर है जो सभी को आदर भाव के साथ अपनी प्रॉपर्टी को बेचने के लिए उसकी अच्छे बताते है . कहने का तात्पर्य यह है कि जब सामन्य जीवन में अपनी आय बढाने के लिए किसी जाति धर्म का भेद भाव नहीं करते तो फिर सोशल मिडिया में आते ही कैसे किसी को भी देशभक्त या देश द्रोही करार दे देते है क्या तब उन्हें ये अहसास नहीं होता कि उनका चरित्र दोहरे मापदंड पर टिका हुआ है सोशल मिडिया में एक अलग रूप रहता है और सामाजिक जीवन में एक अलग रूप रहता है . आखिर कैसे इन लोगो की सोंच जहाँ कमाई के साधन की बात आती है तो समभाव के रूप में दर्शित होती है और जबी सोशल मिडिया पर ऊँगली चलती है तो आरोप प्रत्यारोप की झड़ी लग जाती है .
क्या हम अपना दोहरा चरित्र छोड़ कर एक ही मानसिकता से नहीं जी सकते . अगर हमें किसी जाति/ धर्म विशेष से नफरत है तो क्यों ना उनसे सामजिक जीवन में भी दुरी बना कर रखे ना तो उनसे बात करे ना तो उनके बनाये वास्तु को ईस्तमाल करे और ना ही उनको कोई सामान बेचे और ना ही उनके करीबियों से कोई सम्बन्ध रखे अगर ऐसा कर सकते है तो खुल कर अपने विचार समाज में और सोशल मिडिया में भी रखे अगर नहीं तो फिर क्यों दोहरे चरित्र के साथ जी कर अपने ही अस्तित्व को अपनी ही परछाई को धोखा दे रहे है .
कल देश के मशहूर पत्रकार रोहित सरदाना की मौत की खबर आयी . सभी को दुःख हुआ यह भी नहीं कह सकता क्योकि सोशल मिडिया में देखा कोई अच्छा हुआ कह रहा है कोई गलत हुआ करके दुःख जता रहा है कोई ऐसी तुलना कर रहा है कि हे भगवान् रोहित सरदाना की जगह फला व्यक्ति को ले जाना था नाम के मात्राओं में थोड़ी फेर बदल करके अपनी चतुराई तो पेश कर रहा है किन्तु किस ओर इशारा कर रहा सभी को समझ आता है किसी को कोरोना संक्रमण ने घेर रखा हो तो उसके पाप पुन्य गिनाने वालो की भी फौज सामने आ जाती है जैसे कि ईश्वर ने सबका हिसाब किताब उसे ही दे रखा हो और कह दिया हो कि जाओ इसे प्रचारित करो . मौत किसी की दुःख होता है और वो भी ऐसी मौत जिसकी जिम्मेदार वैश्विक आपदा और सही समय में सही इलाज का मिलना . वर्तमान समय में हमने कई अपनों को खोया ऐसे कई चेहरे सोशल मिडिया में दीखते है जिनसे हमारा कही न कही कोई सम्बन्ध रहा हो कभी व्यापारिक तो कभी सामजिक तो कभी दोस्ताना तो कभी पारिवारिक . कोरोना आपदा किसी पर भी भेदभाव नहीं कर रही है सभी के लिए एक काल बनकर आयी है और सभी की यही कोशिश है कि इस काल से जंग में जीत इंसानों की हो किन्तु यहाँ तो इंसान के जंग हारने के बाद उसके पाप पुन्य का फैसला और विश्लेषण शुरू होने लग गया है क्या यही समाज में रहना चाहते है हम क्या हमें ऐसे ही समाज की आवश्यकता है जहां उसके कर्मो का लेखा जोखा चंद मतलब परस्त लोग कर रहे है और अपने आप को समझदार समझने लगे है अपने आको को खुश करने के लिए अपनों के जाने के दुःख को भूल कर मौत को भी तुलनात्मक दृष्टी से देखने लगे है .
एक मौत का अर्थ सिर्फ एक इंसान की जान का जाना ही नहीं होता एक मौत के कारण किसी की खोख सुनी होती है तो कोई अनाथ होता है , कोई बहन अपने भाई को खो देती है , कोई दोस्त अपने जिगरी दोस्त से बिछड जाता है . एक मौत कई लोगो को दुःख पहुंचती है कई परिवार टूट जाते है कई लोगो के भविष्य अँधेरे की गर्त में चले जाते है . मेरी नजर में देश द्रोही वो है गद्दार वो है जिसे कानून ने सजा दी हो भारत के संविधान में उसे मुजरिम का दर्ज दिया हो उनकी मौत उनके कर्मो के आधार पर हो रहा है किन्तु कोरोना आपदा में हुई मौत का भी अगर विश्लेषण हो ये क्या सही है . शौर्यपथ समाचार पत्रकारिता की दुनिया में अपना मुकाम बनाने वाले रोहित सरदाना को श्रधांजलि अर्पित करता है और ईश्वर से ये प्रार्थना करता है कि काल के इस खेल से हमें और हमारे देश को बाहर निकाले . कोरोना से जंग में भारत की जीत हो सब कुशल से हो सभी का मंगल हो . जय हिन्द ( शरद पंसारी - संपादक , दैनिक शौर्यपथ समाचार पत्र )
दुर्ग / शौर्यपथ / दुर्ग जिले में 6 अप्रेल से जारी लॉक डाउन के बीच अब आम जनता का सब्र का बांध टूटता नजर आ रहा है, छोटी छोटी चीजों के लिए लोगो को तरसते देखा जा रहा है ! रोज मजदूरी कर जीवन यापन करने वाले परिवार अब सड़कों पर भीख मांग कर अपना काम चलाने को मजबूर हो गए है, तो वही मध्यम वर्गीय परिवार भी एक दुसरे की आगे क़र्ज़ के लिए हाथ फैलाते नजर आ रहे है ! पूर्व वर्ष में लगाए गए लॉकडाउन से सबसे ज्यादा निचले स्तर और मध्यम वर्गीय लोग प्रभावित हुए थे, और आज पहले से जयादा बद्तर स्थिति में जीवन यापन कर रहे है !
गंभीर सवाल है विचार करे सरकार क्योकि सिर्फ किसान किसान करने से नहीं चलेगा शहर में भी लोग बसते है
आज आम जनता का सवाल है शासन प्रशासन से अगर इस प्रकार से आपको लॉकडाउन करने का आदेश देता है, तो लॉकडाउन के दौरान घर का और दुकान बिजली का मीटर, टेलेफोन और मोबाइल का मीटर, दुकानों में काम करने वाले लोगो का सैलरी, बच्चों के स्कूल की फीस और घर में लगने वाला राशन ये सब शासन प्रशासन क्यों नहीं देता ! क्योकि हम तो शासन प्रशासन का सहयोग करने उनके आदेश का पालन करने घरों में बैठे है, कहा से आएगा ये पैसा !
शासन प्रशासन के लिए पूरी गंभीरता से विचार करने योग्य विषय
दुर्ग जिले की बात करे तो लगभग सभी ग्राम पंचायत में एक से दो मुक्तिधाम है इस हिसाब से दुर्ग जिले में लगभग 500 से अधिक मुक्तिधाम है जहा शवों का दाह संस्कार किया जाता है, लेकिन आज सभी के शवों का कुछ सिमित जगहों पर अंतिम संस्कार किया जा रहा है, तो स्वभाविक सी बात है कि वहा शवों की संख्या भी जयादा होगी और लोगो को आशंकित भी करेगी !
इसी तरह दुर्ग जिले में बहुत से छोटे और बड़े क्लिनिक और अस्पताल संचालित है, अब क्योकि मरीज और अस्पताल के बीच अब कोरोना टेस्ट आ गया है, जिसको लेकर नार्मल इलाज प्रतिबंधित है, अब मजबूरन लोगो को इलाज के लिए सिमित और शासन द्वारा चिन्हित अस्पतालों में ही आना पड़ रहा है, और शासन प्रशासन ने मेडिकल स्टोर पर कुछ दवाइयों को प्रतिबंधित किया हुआ है, जो बिना किसी डॉ की पर्ची के आपको नहीं दी जायेगी, इसलिए भी थोड़ी थोड़ी तकलीफ के लिए लोगो सिमित अस्पताल तक आना पड़ रहा है, तो स्वभाविक सी बात है कि जब सिमित जगह पर लोग इलाज करायेंगे तो भीड़ भी होगी और इलाज में लापरवाही भी होगी, और स्वाभाविक रूप से होने वाली मौतों के साथ कुछ तो भीड़ की वजह से इलाज के आभाव में भी मौत हो रही ! ऐसे में जिले भर की अनेक जगहों पर होने वाले दाह संस्कार को सिमित जगह पर किया जाए तो देखकर दहशत का माहौल बनना भी लाजमी है !
मै कोरोना के संक्रमण और उससे होने वाली मौतों पर सवाल खड़ा कर रहा हूँ जिसपर विचार तो जरुर किया जाना चाहिए, मै किसी भी प्रकार से ये नहीं कहता कि कोरोना है या नहीं है, लेकिन जिस तरह से अस्पतालों में बिना पीपीई किट और बिना दस्तानो के कोरोना मरीजों का इलाज जारी है, उसके मद्देनजर कोरोना मरीज को लेकर होने वाली गंभीरता, दहशतगर्दी और लॉकडाउन जैसी स्थिति से हमें बाहर जरुर आने का प्रयास करना चाहिए ! क्योकि गंभीरता और दहशतगर्दी के कारण जहा लोग मानसिक रूप से बीमार हो रहे है, तो वही लॉकडाउन के चलते आबादी का एक बड़ा हिस्सा भुखमरी के मुहाने पर पहुच गया है ! जिसमे से आने वाले समय में कई लोग के पास अपराध का रास्ता अपनाने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचेगा, क्योकि इंसान की तीन जरूरतें उनको अपराध की ओर खिचती है जहा वो अंजाम से बेपरवाह हो जाता है ! पहला अगर परिवार को भुखमरी का सामना करना पड़ रहा हो तो, दूसरा अगर उसका कोई अस्पताल में भर्ती हो और इलाज के लिए उसके पास पैसे ना हो तब और अगर फीस के आभाव में उसके बच्चों का स्कूल निकालने की बात हो तब, ये तीन ऐसी जरूरतें है जिसको लेकर कोई भी किसी भी हद तक जा सकता है !
शौर्य की बातें / आपदा में अवसर का मतलब आज हर कोई धन कमाने के बारे में सोंचने लगता है किन्तु जगदलपुर के इस चिकित्सक ने आपदा में अवसर मानव सेवा के रूप में अर्जित किया है . बहुत ही कम सुनने में आया कि कोई चिकित्सक इस समय मुफ्त में कार्य कर रहा हो , डॉक्टर अपनी गरिमा का ध्यान रख कर कुछ गरीब लोगों का इलाज़ फ्री कर देंगे तो शायद कुछ लोगों का जीवन बचाया जा सकेगा। भगवान का नाम बाद में पहले डॉक्टर याद आता है शारीरिक पीड़ा होने पर भगवान् से पहले कोई याद आता है तो वो चिकित्सक ही होता है इंसान बड़ी उम्मीद के साथ उसके पास
उसका केवल यह कहना कि चिन्ता की कोई बात नहीं मन को सुकून मिल जाता है आधी बीमारी भाग जाती है . प्रसव से लेकर मृत्यु तक साथ निभाने वाला ,नन्हें दूधमुँहे बच्चे को भी उसके इलाज पर छोड़कर निश्चिंत यहां सब कोई बराबर होता है न कोई अमीर न कोई गरीब न जात- पात न धर्म का बंधन अपनी जीवन की डोर उस पर सौंपते हैं .रात हो या दिन हर वक्त इलाज को तत्पर दंगा-फ़साद हो या दुर्घटना लाइलाज बीमारी हो या सर्दी-जुखाम वह भी अपनी पूरी ताकत और ज्ञान के साथ अगर अच्छा हो जाए तो तमाम दुआएं मिलती है .हर शख्स धन्यवाद देता है चेहरे खिल उठते हैं पर अगर वह सफल न हुआ तो तोड़-फोड़ शुरु हो जाती है .वह ईश्वर तो नहीं है वह भी जब ऑपरेशन करता होगा
तो कामना करता होगा कि उसके हाथ कांपें नहीं तभी तो कहता है ऑपरेशन सफ़ल है आगे ऊपर वाले के हाथ में है जीवन बचाने वाले का धन्यवाद तो करना ही चाहिए कोशिश तो की .डॉक्टर का सम्मान करना सभी की जिम्मेदारी है आखऱि उसके भरोसे तो हम हैं ऊपर वाला तो नहीं आ सकता तभी तो उसने अपने प्रतिनिधि के रूप में उसे भेजा है .
एक ऐसे ही चिकित्सक है जगदालपुर निवासी डॉ. भंवर शर्मा जिन्होंने इस आपदा के समय मोबाइल द्वारा निशुल्क परामर्श देने की पहल की और आम जनता से अपील की कि जो भी होम आइसोलेशन में है वो निर्धारित समय में स्वास्थ्य सम्बन्धी परामर्श ले सकते है . डॉक्टर भंवर शर्मा के विषय में जिन्होंने मानव सेवा में अपना 10 वर्ष लगा दिया तथा मरीजों का साथ कभी फीस के कारण नहीं छोड़ा अपनी सामथ्र्य अनुसार हर संभव मदद की धन्य हैं ऐसे डॉक्टर, यदि मैं डॉक्टर होता तो मैं भी ऐसा करने का प्रयत्न करता.
नरेन्द्र भवानी के कलम से - संभाग प्रमुख ( जगदलपुर - दैनिक शौर्यपथ समाचार )
शौर्यपथ नजरिया / ऑक्सीजन सिलेंडर पर गुजरात के नेताजी ने अपनी फोटो क्या लगाई बवाल मच गया है। इसकी आलोचना के साथ लोग तरह-तरह की टिप्पणियां कर रहे है। किंतु इस पर मेरा अपना एक नज़रिया है। मेरा मानना है कि कोई अपने जेब के पैसे खर्च कर सेवा कर रहा है तो सेवा का महत्व होना चाहिए। 200 बिस्तरों का कोविड अस्पताल बनाना और मरीजों को सिलेंडर उपलब्ध कराना कोई छोटा काम नही है। ऐसे में अगर वो पैसे खर्च कर नेम और फेम चाहता है तो इसमें गलत क्या है। यहा तो ऐसे भी है जो भ्रष्टाचार से करोड़ों-अरबों कमाकर भी आज के इस बुरे दौर में घर के भीतर दुबके बैठे है। मित्रों, मोदी जी हो या भुपेश बघेल जी किस सरकारी योजना में इनकी फोटो नही है यह बताइये? हमने तो मोबाइल बस्ते,राशनकार्ड तक में कभी रमन सिंह जी फिर भुपेश बघेल जी की फोटो देखी है।
इतना सब तर्क करने के पीछे मेरा यही मकसद है कि सेवा में लगे किसी व्यक्ति की आलोचना नही होनी चाहिए। अगर नाम और सम्मान के मकसद से ही सही अगर कोई जरूरतमंदों की मदद कर रहा है तो उसे सराहे। एक बात और ध्यान रखना चाहिए कि हमारे देश का सरकारी सिस्टम कोरोना से लड़ाई में बेहद कमजोर है। आज जो भी बेहतर स्थिति बन रही है उसके पीछे कही न कही विभिन्न सामाजिक संस्थाओं, स्वयंसेवी लोगों का अमूल्य योगदान है। ऐसे में उनसे जुड़े किसी तुच्छ विषय को अगर कोई बहस का मुद्दा बनाता है तो निश्चित ही वे हतोत्साहित होंगे। यह मेरी सोंच है, इस मुद्दे पर आपकी राय क्या है बताये?
( देवेन्द्र गुप्ता के फेसबुक वाल से )
Feb 09, 2021 Rate: 4.00
