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March 10, 2026
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शौर्य की बाते ( सम्पादकीय )

शौर्य की बाते ( सम्पादकीय ) (226)

सम्पादकीय लेख / शौर्यपथ /
‘‘मरे मौत अकाल का,
जो काम करे चण्डाल का।
काल उसका क्या बिगाड़े,
जो भक्त हो महाकाल का।‘‘
जब-इन पंक्तियों को सुनता-पढ़ता, तब-तब अमरनाथ बर्फानी बाबा के दर्शन की अभिलाषा जागृत हो उठती थी।प्रत्येक वर्ष आषाढ़ पूर्णिमा से प्रारंभ होकर श्रावण मास की पूर्णिमा तक संपन्न होने वाली इस यात्रा को साकार करने का सुनहरा अवसर जुलाई 2015 में प्राप्त हुआ। अमरनाथ यात्रा पर जाने के पूर्व जिला चिकित्सालय से स्वास्थ प्रमाणपत्र लेने तथा पंजाब नेशनल बैंक में पंजीयन कराने की अनिवार्य प्रक्रिया को यथासमय पूर्ण किया।

यात्रा की तैयारी पूरी कर रायपुर से दिल्ली हवाई यात्रा, दिल्ली से जम्मू की यात्रा ट्रेन से एवं जम्मू से श्रीनगर (300 किलोमीटर दूरी) की हवाई यात्रा हमनें पूरी की।
श्रीनगर पहुंचकर अमरनाथ जाने के लिए बालटाल मार्ग का चयन करके 95 किलोमीटर दूर स्थित बालटाल तक जाने के लिए हमनें 18 सीटर मिनी बस को माध्यम बनाया। बालटाल पहुंचने के उपरान्त हमने आगे की यात्रा हेतु अत्यावश्यक सामान यथा गरम कपड़े, छड़ी, टार्च, दवाईयां के अलावा शेष अन्य समानों को मिनी बस में ही दो दिन के लिए छोड़ दिया। आगे बालटाल बेस केम्प में प्रवेश करते समय सैनिकों के जांच शिविर से गुजरना पड़ा, जहां कि बड़ी सूक्ष्मता से हमारी और सामानों की जांच हुई। समुद्र तट से बालटाल की ऊंचाई 10,500 फीट हैं, वहां बर्फीली हवाओं की मार झेलते हमनें किराये पर उपलब्ध टेन्ट में रात्रि विश्राम किया।

अमरनाथ गुफा तक जाने के लिएअगली सुबह प्रातः 4 बजे हम किराये के खच्चर से रवाना हुये। हजारों की संख्या में वहां खच्चरों का मेला लगा हुआ था। खच्चरों की इस भीड़ में गुम हो जाने पर अपने खच्चर को ढूंढ पाना समुद्र में मोती ढूंढ लाने जैसा ही कार्य रहा। वहां एक मजेदार अनुभव हुआ ज्यादातर खच्चर वालों की निगाह दुबले-पतले तीर्थयात्रियों की तरफ रहती है। दाम पूरा और खच्चर पर बोझ कम पड़े, यह उनकी सोच होती हैं। हम आगे बढ़े तभी रास्ते ‘‘डोमैल कंट्रोल गेट‘‘ पर हमारें स्वास्थ प्रमाण पत्र, परिचय पत्र एवं पंजीयन तिथि पत्र की जांच सैनिकों द्वारा की गई्। (यात्रियों को निर्धारित पंजीकृत तिथि पर यात्रा करना होता है)।
डोमैल गेट पर वैधानिक प्रक्रियाएं पूर्ण करके भोलेनाथ का जयकारा लगाते हुये हमारी टोली अमरनाथ गुफा की ओर चल पड़ी। लगभग 13 किलोमीटर के रास्ते में बर्फ, कीचड़ ,और खच्चरों की लीद के कारण भारी फिसलन थी। अत्यंत संकरीले और सर्पीले घुमावदार उतार-चढ़ावयुक्त पहाड़ के ऐसे मार्ग पर खच्चरों को सधे हुये कदमों से चलते हुए देखकर लगता था मानो खाई में नहीं गिरने का उन्हें वरदान प्राप्त हैं। बालटाल से अमरनाथ गुफा तक जाने हेतु दूरूह-खतरनाक रास्ते से गुजरना होता है। यही वजह है कि ज्यादातर यात्री पहलगाम की ओर से यात्रा करना पंसद करते हैं। बालटाल से अमरनाथ गुफा पहुंचने में केवल एक दिन तथा पहलगाम से तीन दिन का समय लगता है।
पहाड़ी मार्ग पर एक ओर गहरी खाई थी तो दूसरी ओर पहाड़ी दीवार। नियमानुसार खच्चरों को पहाड़ी रास्ते के खाई की ओर किनारे-किनारे तथा पैदल यात्रियों को पहाड़ं से सट कर चलना होता है। ऐसे भयावह मार्ग में चलते हुए खच्चर पर सवार तीर्थ यात्री को मृत्यु अपनी मुट्ठी में नजर आती हैं और उसके मुख से उस समय केवल बम-बम भोले का सुर ही निकलता है।
ऐसे ही भोले भंडारी का नाम जपते सांस गिनते हम उस स्थल पर पहुंच गये जहां से अमरनाथ की गुफा हमें स्पष्ट दिखाई दे रहीं थी। उस समय आश्चर्यमिश्रित हर्ष से भाव-विभोर हमारे मुंह से शब्द नहीं निकल पा रहे थे। यहां खच्चर से उतरते ही हमारे पांव भुरभुरे सफेद बर्फ में धंस-धंस जा रहे थे। दूर-दूर तक वहां बर्फीली जमीन पर स्थापित रंग-बिरंगे टेन्ट यूं अहसास करा रहे थे मानो सफेद चादर पर विभिन्न रंगों के फूलों की कशीदाकारी की गई हो। सूर्य की किरणों से चमचमाते पर्वत शिखर पर नजरें टिक नहीं पा रही थी।
हमनें वहां एक टेन्ट किराये पर लिया। वहीं हमें 50 रूपये प्रति बाल्टी की दर पर गरम पानी उपलब्ध हो गया। बर्फीली सतह पर स्नान करने का अनुठा अनुभव लेकर हम भोलेनाथ की गुफा दर्शन करने चल पड़े। वहां रास्ता को आसान बनाने के लिए रास्ते पर जमे बर्फ को हटाने सैनिक दल सतत् जुटे हुये थे, फलस्वरूप सहजतापूर्वक हम पवित्र गुफा के द्वार पर पहुंच गये।
श्री अमरनाथ की गुफा समुद्र सतह से 12729 फीट की ऊंचाई पर स्थित है। यह मानव निर्मित मंदिर नहीं बल्कि प्रकृति द्वारा निर्मित एक उबड़-खाबड़ 30 फीट चौड़ी और करीब 60 फीट लम्बी प्रकृति निर्मित गुफा है। इसके द्वार पर कोई किवाड़ नहीं हैं। ऐसी मान्यता है कि भगवान शिव ने पार्वती मैया को इसी गुफा में अमर कथा सुनाया था। पवित्र गुफा के भीतर प्रकृति निर्मित हिम शिवलिंग (लगभग 17 फीट ऊंची) के साथ ही श्री गणेश पीठ तथा पार्वती पीठ के दर्शन हुये।
एक अद्भुत और आश्चर्यचकित कर देने वाली बात वहां दिखाई दी कि गुफा के बाहर बुरादे की भांति भुरभुरा बर्फ का संसार बिखरा पड़ा है ।वहीं गुफा के भीतर निर्मित शिव लिंग, श्री गणेश पीठ तथा पार्वती पीठ पक्के कड़े बर्फ निर्मित थे। गुफा के भीतर ऊपर से जल की बूंदें टप-टप टपक रही थी। वहां उपस्थित भक्तों ने बताया कि ऐसी मान्यता है कि गुफा के ऊपर पर्वत पर श्रीराम कुण्ड हैं। गुफा के भीतर वन कबूतरों का होना चमत्कृत करता हैं। इनका दर्शन शुभ माना जाता है अतः तीर्थयात्री बैचेन आंखों से गुफा के भीतर इन्हें तलाशते हैं।
पवित्र गुफा में मनभर समय बिताने के उपरान्त हम टेन्ट की ओर लौट चले। उस समय रास्ते भर लगे लंगरों में निःशुल्क बंट रहे केसरयुक्त दूध, खीर, दही, चांवल, छोले-भटूरे जैसे विभिन्न स्वादिष्ट व्यंजनों का भरपूर स्वाद हमनें लिया। रात में वहां बर्फीली सतह पर बने टेन्ट के भीतर बिछे मोटे तारपोलिन के ऊपर भारी-भरकम गददे और रजाई में सोने का अनुभव भी अद्भुत रहा। आंखों में नींद के बजाय भोलेनाथ की गुफा समाई हुई थी लेकिन भारी थकान की वजह से कब नींद आ गई, पता ही नहीं चला। सुबह चहुंओर फैली बर्फीली सतह पर ही दैनिक दिनचर्या से निवृत्त होकर हम वापस बालटाल के लिए लौट चले।
इस यात्रा पथ पर तैनात सैनिकों को देखकर सिर श्रद्धा से झुक जाता था। इनकी सक्रियता से ही कठिन मार्ग की यात्रा सुरक्षित सुगमता से संपन्न हो पाती हैं। यहां पर भक्ति भाव में डूबे लंगर संचालकों की सेवा भी नमन योग्य हैं जो कि सरसराती बर्फीली हवा के मध्य तीर्थयात्रियों की सेवा में निःशुल्क गरमा-गरम लजीज व्यंजन परोसने के लिए आतुर रहते हैं। उन्हें देखकर भगवान श्रीराम की सेवा में लीन भीलनी शबरी की याद बरबस आ गई थी।
कश्मीर की हसीन वादियों के बीच अमरनाथ की पवित्र गुफा आज भी अपनी ओर खींचती हैं और भाव-विभोर मन कह उठता है - ‘‘ऐसी फिजा न मिलेंगी सारे जहां में, जन्नत अगर हैं कहीं, तो हिन्दुस्तान में।‘‘
विजय मिश्रा‘‘अमित’’ पूर्वअति.महाप्रबंधक(जन)

विजय मिश्रा ‘‘अमित’’
पूर्वअति.महाप्रबंधक(जन.) सम्पादकीय लेख / शौर्यपथ /दुनिया में तरह-तरह के आदमी होते हैं। जिनमें से एक प्रकार ‘‘फोकट छाप पेपर पढ़ने वालों‘‘ का भी होता है । फोकट की चीज खाने-पीने के लिए हर घड़ी इनकी जीभलपलपाती रहती है। लाज-शरम से इन लोगों का दूर-दूर तक कोई नाता नहीं रहता। ऐसे लोगों के लिए ही कहावत चल पड़ी है कि ‘बेशरम सदा सुखी‘ ।
फोकट छाप पेपर पढ़ने वाले लोग रेलगाड़ी,बस और प्रतीक्षालयों में बहुतायत में पाये जाते हैं।
पिछले बुधवार की बात है, जब मैं दुर्ग से रायपुर जाने के लिए लोकल रेलगाड़ी में यात्रा कर रहा था । उस समय एक समाचार पत्र बेचने वाला आया। वह बेचारा पूरे डिब्बे घूम-घूम कर गला फाड़-फाड़ कर पेपर ले लो, पेपर चिल्लाता रहा। पर किसी भी यात्री के कान में जूं नहीं रेंगी।प्रतिदिन सुबह अखबार पढ़ने की मेरी आदत है। इसलिए मैने पॉकेट एक समाचार पत्र खरीद लिया।
बस, मैं पेपर क्या खरीदा फोकट छाप पेपर पढ़ने वालों की तो लाटरी लग गई। मैं अभी पेपर का पहला पन्ना पढ़ना शुरू किया था कि बाजू में बैठे सज्जन बोल पडे़-भाई साहब, बीच का पन्ना देंगे क्या ? उनका आग्रह सुनकर पेपर का एक पेज मैं उनके हवाले करने लगा। तभी मेरे सामने की सीट पर बैठे एक हीरोनुमा लड़के ने कहा-प्लीज अंकल, खेल पेज मुझे दे दीजिए।मेरा पेपर पढ़ना एक तरफ रह गया और मैं फोकट छाप पेपर पढ़ने वालों को एक एक पेज बांटते चला गया। अंत में मेरे हाथ एक भी पेज नहीं बचा,क्योंकि, जो एक पेज अपने पढ़ने के लिए रखा था, उसे भी सामने बैठी मेमसाहब लगभग झपटने के अंदाज में ले ली और बोली-मेरा स्टेशन आने वाला है, पहले मैं पेपर पढ़लेती हूं, आप तो बाद में आराम से पढ़ सकते है। रेलगाड़ीजैसे-जैसे आगे बढ़ते जा रही थी।उसी रफतार से मेरे पेपर के पन्ने फोकट छाप पेपर पढ़ने वालों के एक हाथ से दूसरे हाथ, दूसरे हाथ से तीसरे हाथ में चले जा रहे थे, अंत में यह स्थिति आ गई कि पेपर का असली मालिक कौन हैं? यह बताने वाला भी कोई नहीं बचा था ।एक फोकट छाप पेपर पढ़ने वाले ने तो अपनी सभी सीमायें लांघ दी। वह हरे चना बूट खा-खाकर मेरे पेपर के पन्नों में छिलकों को जमा करने लगा। उसकी यह हरकत देखकर मेरी भृकुटी तन गई। मैंने कहा-अरे भाई साहब, पेपर दे दीजिए, ये पढ़ने के लिए है न कि चना बूट का कचरा जमा करने के लिए।

मेरी बात सुनकर वह बिगड़ैल सांड की तरह मेरे ऊपर ही गरज उठा। वह बोला-देखो मिस्टर, मुझे समझाने की कोशिश मत करो, जिस आदमी से मैं पेपर लिया हूं, वह तो इसे छोड़कर पिछले स्टेशन में ही उतर चुका है। उसकी बात सुनकर मैं हैरान रह गया। मुझे लगा मानो मेरे हाथों से तोता उड़ गया हो। मन मार के हाथ मलते मैं मेरे पेपर के बाकी पेज की दशा-दुर्दशा देखने में जुट गया।
क्षक्षक्षमैंने देखा कि एक फोकटिया मेरे पेपर में छपे शिक्षाकर्मी की भर्ती के विज्ञापन को काट रहा है। तभी मुझे याद आया कि मेरी बेटी भी शिक्षाकर्मी के लिए आवेदन करने वाली है। मैंने झट से उसे रोका और बताया कि -भाई जी, ये विज्ञापन मेरे काम का हैं। इसे काटिए मत। मेरी यह बात सुनकर वह आंखे फाड़े मुझे घूरते हुए बोला- ठीक है न आपके काम का है तो अगले स्टेशन में इसकी फोटो कापी कराकर आपको दे दूंगा। कम से कम मानवता के नाते थोड़ा धीरज तो रखें। मैं चलती गाड़ी से कूद कर भाग नहीं जाऊंगा।
अगले स्टेशन पर गाड़ी रूकी तो वो फोकटिया पेपर की फोटो कापी करा के लाता हूं कहकर उतर गया। गाड़ी छूट गई पर वह लौटकर नहीं आया।मुझे मानवता सिखाने वाले उस फोकटिया के दिए धोखा की पीड़ा से उबरने के लिए मैं आंखें मीचें गश खाय चुपचाप बैठा रहा। थोड़ी देर बाद आंख खुली तो देखा कि एक संभ्रात महिला अपने रोते हुए बच्चों को मनाने लिए मेरे अखबार को चीर फाड़कर हवाई जहाज बनाने का उपक्रम कर रही है । ऐसा करने से मेरे रोकने पर वह खिसियाई बिल्ली की तरह गुर्राकर बोली-सड़ा सा दो पैसे के पेपर के लिए आपकी जान छूटी जा रही है। बच्चा कितना रो रहा हैं वह आपको दिखाई नहीं दे रहा है क्या ? उसके तेवर देखकर मेरी बोलती बंद हो गई । फोकट छाप पेपर पढ़ने वालो से अपना पेपर कैसे बचाऊं, यह सोच ही रहा थी तभी एक ओर नजारा देखने को मिला। मेरे पेपर की आड़़ में झाड़ काटते दो युवक-युवती दिखे। वे दोनों पेपर के बीच के पन्ने को खोलकर पेपर के एक एक छोर को एक-एक हाथ में पकड़कर ऐसे बैठे थे कि पेपर के पीछे वे क्या कर रहे हैं कोई भी देख पाने में असमर्थ था।
ये सब को देखते-देखते दोनों हाथ से सिर पकड़कर मैं सोचने लगा कि फोकट छाप पेपर पढ़ने वालों के लिए जब पेपर इतने काम की चीज है तो भगवान उन्हें पेपर खरीदने की सद्बुद्धि क्यों नहीं दे देता ? यही सोचते-सोचते गांठ बांध लिया कि अब कभी ट्रेन में समाचार पत्र खरीदने की भूल नहीं करूंगा ।
(ये लेखक के अपने विचार है )

शौर्यपथ की बातें / निक्की बेटा मेरी जिन्दगी में अब कुछ नहीं रहा है रे ना तो अच्छा पापा बन पाया ना अच्छा बेटा . जब तू दुनिया में आया तब भी तुझसे बहुत दूर था और जब गया तब भी . पर जब तक तू था तेरे लिए ही जीता था पर ये अब पता चला जब तू मुझसे दूर हो गया . जब तू पास था तब बस पैसे कमाने में लगा था पर अब क्या कृ इन पैसो का इन झूठी खुशियों का एक पल हँसता तो तो पल पल रोता हूँ ना कुछ कह सकता हूँ ना कुछ बोल सकता हूँ ना जी पा रहा हूँ ना मर पा रहा हूँ बस जिन्दा लाश बन गया हूँ . निक्की बेटा मै कैसे जियूं रे तेरी बहन को कैसे संभालू तेरी मा को कैसे संभालू . अकेला हो गया रे भीड़ भरी दुनिया में वीरान जिन्दगी जी रहा हूँ .
ऐसी जिन्दगी जिसमे मौत भी नहीं आती और जिन्दा भी रहने की इच्छा नहीं है बस सुबह से शाम और शाम से सुबह दिन गुजर रहा है कहा जाऊ क्या करू ये भी नहीं मालूम बस कुछ न कुछ करता रहता हूँ घुट घुट के जीता रहता हूँ . रोज तेरी बात सुनता हूँ तेरी आवाज़ सुनता हूँ पर देख नहीं पाता गोद में उठा नहीं सकता सीने से लगा नहीं सकता क्या ऐसा ही जीवन जीने के लिए छोड़ गया बेटा तू अब तो भगवान् के साथ है ना तो कह दे ना कि मुझे भी कही दूर भेज दे इस दुनिया से बहुत दूर जहाँ सब भूल जाऊ सिर्फ तेरी याद में ही जिन्दगी गुजार दू मुझे कुछ नहीं चाहिए सिर्फ तू ही चाहिए . तू जहाँ रहे वही मै भी रहू तुझे सीने से लगाये जिन्दगी गुजार दू बस इतना कर बेटा मुझे अपने पास बुला ले अब मुझसे ना तो तेरी मा का दुःख देखा जाता और ना सिद्धि की उदासी और खोखली हंसी देखि जाती अब सहन नहीं होता बेटा . मै अच्छा पापा नहीं हु तो क्या हुआ तू तो मेरा अच्छा बेटा है ना तू तो सब कर सकता है उस दुइय से इस दुनिया आ गया इस दुनिया से दूसरी दुनिया अकेले चला गया तो मुझे भी तो बुला सकता है ना अपने पास मुझे कुछ नहीं चाहिए बस तू ही चाहिए बेटा मेरा बेटा चाहिए भगवान् अगर तू कही है तो मिला दे ना मुझे मेरे बेटे से तू तो अपने लाल को जिन्दा कर लिया जब तू नहीं रह सकता तो बता ना मै कैसे रहूँगा अपने बेटे के बिना सब कहते है तो सबकी सुनता है सबके दुःख हर्ता है अपना दुःख कैसे दूर कर लिया जब मेरी बारी आये तो विधि का विधान बता रहा है क्यों . जब तू अपने बेटे बिना नहीं रह सकता तो मै कैसे रहूँगा . मेरा बेटा दे दे भोलेनाथ चाहे जो लेना हो ले ले पर मेरा लाल मुझे दे मेरा निकी बहुत मासूम है वो अकेले नहीं रह सकता घबरा जाता है उसके पापा उसकी हर बात मानते है उसे अपने पापा के पास आने दे भगवन मेरा निक्की दे दे या मुझे निक्की के पास भेज दे कुछ तो कर दे भोलेनाथ ...

विजय मिश्रा ‘‘अमित’’पूर्वअति. महाप्रबंधक (जनसंपर्क)
सम्पादकीय लेख / शौर्यपथ /सैर-सपाटा के महत्व को अनेक विद्वानों ने सिद्ध किया है। इसी संदर्भ में गालिब ने भी लिखा है कि- सैर कर दुनिया की गालिब, जिंदगानी फिर कहां, जिंदगानी गर रही, तो नौजवानी फिर कहां। इसका अनुपालन करते हुये बच्चों के ग्रीष्मावकाष का लाभ लेकर सपरिवार तीर्थाटन पर हम निकले हुये थे। हमारा परिवार एक बड़े प्रसिद्ध मंदिर में देवदर्षन के लिये पहुंचा। पहाड़ों की खड़ी चढ़ाई करके देवालय तक पहुंचते पहुंचते मेरे छोटे बेटे ‘‘विरासत’’ को प्यास लग आई थी। उसकी प्यास बुझाने के लिये देवालय के प्रागंण में स्थापित वॉटर कूलर तक उसे मैं लेकर गया। वॉटर कूलर से पानी पीने के लिये स्टील के अनेक गिलास वहां चैन से बंधे हुये थे।

उन गिलासों को देखते ही जिज्ञासा भरे लहजे में विरासत पूछ पड़ा- पापा जी ये गिलास क्या चोर हैं ? उसका यह सवाल मुझे बड़ा अटपटा लगा। प्रत्युत्तर में मैने पूछा- क्या मतलब। तब वह बोला - मेरा मतलब है कि इन गिलासों को चोरों के जैसे हथकड़ियों से क्यों जकड़ा गया है। उसकी बात मुझे समझ में आ गई और मैंने उसे समझाया कि चोरों से बचाने के लिये गिलासों को चोर की तरह चैन से बांधकर रखा गया है।

विरासत का यह छोटा सा सवाल मुझे यह सोचने को मजबूर कर गया कि चैन से बंधा बेचैन गिलास परोपकार के काम में संलग्न होने के बावजूद कैद की जिंदगी गुजर बसर करने को क्यों विवश हैं ? चैन से बिंधना और बंधना बेचारे गिलास के आजादी के छिन जाने का भी सूचक है। प्यासे को पानी पिलाना भारतीयता की पहचान है, पर चैन से बंधे गिलास सवाल उठा रहे हैं कि पानी पीने के लिये रखे गिलासों की चोरी भी क्या भारतीयता की पहचान बनेगी ?

दया,परोपकार, सहिष्णुता जैसे मानवीय गुण अनादिकाल से भारतीयों की विशिष्ठ पहचान रही है। ऐसे संस्कारिक देश के देवालय,विद्यालय,चिकित्सालय एवं प्रतीक्षालयों में शीतल पेय जल हेतु समुचित प्रबंध देखने को मिलता है। पर पेयजल हेतु स्थापित वॉटर कूलर से पानी पीने के लिये रखे गये गिलासों का चैन से बंधा होना मानव मन मे निहित ‘‘चोर प्रवृत्ति’’ एवं ‘‘स्वार्थ’’ जैसी अजीबों गरीब मानसिकता को उजागर करती है। विचित्र तथ्य यह भी है कि पापकर्मों को मिटाने के लिये देवालय पहुंचे दर्शनार्थी भी ऐसी विकृत मानसिकता से मुक्त नहीं हो पाते हैं। गिलासों को चैन से बांधने का एक बड़ा कारण संभवतः लोगों की लापरवाही भी है। अनेक उपयोगकर्ता ऐसे गिलासों को मनचाही जगह पर लेजाकर उपयोग करने के उपरांत वापस निर्धारित स्थान पर रखने के बजाय यहॉ-वहॉ छोड़ जाते हैं।
यह सर्वविदित है कि विद्यालयों में ईमानदारी का पाठ पढ़ाया जाता है। चिकित्सालयों में सेवा की भावना संचारित होती है। प्रतीक्षालय भाई बंधुत्व की भावना को बढ़ावा देते हैं, फिर भी ऐसे स्थानों पर गिलासों को लोेहे निर्मित चैन से बंधाकर रखना पड़े यह मानव जाति के चरित्र के दोयम दर्जे तक गिर रहे स्तर को शतप्रतिशत प्रदर्शित करता है। सेवाभावना और परोपकारिता की दृष्टि से पवित्र संस्थानों में चैन से बंधे हुये गिलासों को देखकर ‘‘होम करते हाथ जला’’ कहावत चरितार्थ होती दिखती है। इन गिलासों की व्यथा कथा तो यही कहती है कि अपने जीवनकाल में हजारों की प्यास बूझाने वाले ये गिलास अपनी आजादी की प्यास बुझाने छटपटा रहे हैं। ये गिलास उन तमाम लालची-स्वार्थी इंसानों को कोसते श्राप देते होंगे जो कि पवित्र स्थलों पर भी अपवित्र-अनैतिक चरित्रों का प्रदर्शन करने में नहीं हिचकते हैं।

स्टील-पीतल निर्मित बेचारे इन गिलासों से अच्छा तो भाग्य कांच-प्लास्टिक से निर्मित उन गिलासों का है, जो सड़क किनारे संचालित ठेले-ढाबे वालों के यहॉ शराब सेवन के काम आ रहे हैं। धोखे से ही सही ये यदाकदा गिरकर टूट जाते हैं और अपने नारकीय जीवन से मुक्ति पा जाते हैं। पवित्र स्थानों में पवित्र उद्देश्य से रखे गये स्टील-पीतल के गिलास जंजीरों में बंधकर लोगों की प्यास बुझाते बुझाते स्वयं प्यासे ही रह जाते हैं।

दूसरों को सुख देने के लिए तार से बींधे-बंधे इन गिलासों से बातचीत हो पाती और जब उनसे पूछते कि ‘‘यहॉ बंधे-बंधे हजारों के मुंह लगते तुम्हें दुख तो होता होगा’’ तो शायद वे यही उत्तर देगें कि दुख तो होता है, पर प्यासे व्यक्ति के चेहरे पर पानी पीने के बाद जो सुख-तृप्ति दिखाई देती है, उससे सारे दुख दूर हो जाते हैं।

शौर्य पथ लेख । अंडा फॉर्म का मालिक मुर्गी खरीद कर लाता है। उन्हें अनेक तरह के पौष्टिक और उत्तेजक आहार देता है, ताकि वे रोज अंडा दे सकें। दवाइयों के कारण अप्राकृतिक तरीके से मुर्गियां साल भर तक रोज अंडा देती हैं, जिससे मालिक का धंधा चलता है। मुर्गी को पता भी नहीं चलता कि उसके तीन सौ पैंसठ अंडे कहाँ गए। इस धंधे में उसका कुछ नहीं होता, जो होता है सब मालिक का होता है। फिर एक दिन मुर्गी के अंडे देने का समय समाप्त हो जाता है। मालिक एक बार भी नहीं सोचता कि उसने इस मुर्गी के साढ़े तीन सौ अंडे बेंच कर रुपया बनाया है। वह उसी दिन से मुर्गियों को कटवा कर उनका मांस बेचने लगता है। और हाँ! फार्म के लिए अगले ही दिन नई मुर्गियां मंगा ली जाती हैं। कहना नहीं चाहिए, पर लभ जिहाद में फँसी लड़कियां अपने शिकारी की दृष्टि में वही मुर्गी होती हैं। जिस दिन उनकी मियाद पूरी हो गयी, उसी दिन मालिक लात मार देता है। अंतर बस इतना है कि इनका मांस बिकता नहीं है; सो या तो सूटकेस में भर कर फेंक दिया जाता है, या यूं ही मरने के लिए छोड़ दिया जाता है। हो सकता है कि आप कुछ उदाहरण दिखा दें, कि फलाँ ने अपनी बीवी को मारा नहीं बल्कि वह सुखी जी रही है, और वहाँ खूब प्रेम है। पर यह पूरी तरह सच नहीं है। 90% मामलों में ऐसा तभी होता है जब उससे कोई और लडक़ी न फंसे... जैसे ही कोई दूसरी फंसती है, पहली को लात मार कर निकाल दिया जाता है। यदि वह नौकरानी की तरह रहना स्वीकार करे तो ठीक, नहीं तो... पर रुकिये! आमिर, किरन का मामला लव जिहाद का मामला नहीं है, बल्कि लभ जिहाद के विज्ञापन और प्रमोशन का मामला है। किरन फँसी नहीं हैं, बल्कि वे और आमिर इस प्रायोजित कार्यक्रम में अपना रोल प्ले कर रहे थे। उन्होंने पहले लभ-जिहाद को प्रमोट किया, फिर सरोगेसी को प्रमोट किया, और अब डिवोर्स को प्रमोट कर रहे हैं। उन्हें इसके लिए भरपूर राशि मिली होगी। बस यूँ समझ लीजिये कि वे एक लम्बी फ़िल्म की शूटिंग कर रहे थे, जो अब खत्म हो गयी है। और फिल्मों में तो कहानी की मांग के नाम पर कुछ भी फिल्माया जाता रहा है... यह भी सच है कि किसी शर्मिला टैगोर, अमृता सिंह, करीना कपूर या किरन राव को अधिक दिक्कत नहीं होती है, दिक्कत होती है उनकी देखा देखी किसी आमिर पर भरोसा कर लेने वाली गाँव-देहात की किरनों को। बोरे में भरी जाती हैं वे आम लड़कियां, जो इन सिनेमाई कहानियों को सच मान लेती हैं। पैसे के लिए विज्ञापन का हिस्सा बनती है कोई किरण राव, पर उसका दण्ड भुगतती है कोई नैना मंगलानी। कोई शिल्पी... खैर! इस आतंक को रोकने का एकमात्र तरीका यही है कि आप अपनी बच्चियों को आतंकियों का सत्य बताएं। उन्हें समझाएं कि किससे प्रेम किया जाना चाहिए और किससे घृणा... हाँ! घृणा भी जीवन का एक आवश्यक भाव है, घृणा पाप से भी करनी चाहिए और पापी से भी... सर्वेश तिवारी श्रीमुख गोपालगंज, बिहार। के फेसबुक वॉल से

वरिष्ठ रंगकर्मी विजय मिश्रा ‘अमित‘ की रंगयात्रा
सम्पादकीय लेख /शौर्यपथ / लोक कलाओं का कुबेर है छत्तीसगढ़ । यहां के मनोरम लोकगीत, नृत्य, वाद्य परम्पराओं को लुप्त होने से बचाने और पुनर्जीवित कर सांस्कृतिक क्रांति का शंखनाद करने में अग्रणी योगदान दुर्ग जिला के निकट स्थित ग्राम बघेरा के दाऊ रामचन्द्र देशमुखजी का है। उन्होंने छत्तीसगढ़वासियों के भीतर सांस्कृतिक चेतना जगाने के उद्देश्य से ‘चन्देनी गोंदा‘ का गठन किया था। इस संस्था के उद्देश्य के पूर्ण हो जाने के पश्चात उन्होंने 22 फरवरी 1983 को ‘चंदैनी-गोंदा‘ को विसर्जित कर लोकनाट्य ‘कारी‘ की तैयारियों पर अपना ध्यान केन्द्रित कर दिया था। ‘कारी‘ के निर्देशन का दायित्व अंचल के सुप्रसिद्ध रंगकर्मी श्री रामहृदय तिवारी जी को सौंप दिया था। ‘कारी‘‘ का प्रथम प्रदर्शन 22 फरवरी 1984 को सिलियारी में हुआ था। दाऊ रामचन्द्र देशमुख जी कालजयी सर्जना लोकनाट्य ‘कारी‘ में सरपंच तथा कथावाचक (छंततंजवत) की दोहरी भूमिका बहुमुखी प्रतिभा के धनी विजय मिश्रा ‘अमित‘ ने बड़ी ही कुशलता से निभायी थी। जहाँ सरपंच की भूमिका में उन्हें छत्तीसगढ़ी में संवाद करना होता था, वहीं कथावाचक की भूमिका में वे हिन्दी में कथानक को गति प्रदान करते थे। वर्तमान में वे छत्तीसगढ़ स्टेट पावर कंपनीज रायपुर में अतिरिक्त महाप्रबंधक (जनसंपर्क) के पद पर सेवारत रहते हुए अभिनय व लेखन के क्षेत्र में भी सतत साधनारत हैं।

रायपुर बस स्टेन्ड में जमीन पर सोया
लोकनाट्य ‘कारी‘ की प्रस्तुति के दौरान अपने संघर्ष को साझा करते हुए विजय मिश्रा ‘अमित‘ बताते हैं कि ‘‘ वर्ष 1984-85 में मैं महासमुंद के एक निजी स्कूल में उच्च श्रेणी शिक्षक के पद पर सेवारत था। तब रात को कारी नाटक की प्रस्तुति के उपरांत मुझे सुबह महासमुंद स्कूल पहुंचना होता था, अतः रात को एक-दो बजे कारी नाटक की समाप्ति के उपरान्त मेन रोड पर आकर खड़ा हो जाता था, ताकि रायपुर बस स्टैंड पहुँचने के लिए गाड़ी उपलब्ध हो सके, अतः किसी भी वाहन कभी ट्रक तो कभी कबाड़ी की गाड़ी को रोक कर मैं रायपुर बस स्टैंड पहुँचने का प्रयास करता था और बस स्टैंड में जमीन पर ही चादर बिछा कर सो जाता था क्योंकि सुबह 4 बजे मुझे महासमुंद के लिए बस मिलती थी। अनेक रातों को रायपुर के बस स्टैंड पर मैं ऐसे ही सोया करता था और सुबह स्कूल पहुंचने के लिए सफर करता था।
इसी दौरान छत्तीसगढ़ की सुप्रसिद्ध लोक-गायिका कविता विवेक वासनिक जी की संस्था ‘‘अनुरागधारा - राजनांदगाँव‘‘ से भी जुडने का अवसर मिला। अनुरागधारा में अभिनय करने के साथ-साथ उद्घोषक के रूप में भी विशेष पहचान व लोकप्रियता मिली। कविता वासनिक जी के प्रमुख कैसेट ‘धरोहर‘, ‘धनी‘, ‘धुन‘, ‘नहीं माने काली‘ के अलावा लक्ष्मण मस्तुरिया जी के कैसेट मैं छत्तीसगढ़ के माटी अंव में प्रारंभिक उद्घोष का भी बखूबी निर्वहन किया।

हिन्दी रंगकर्म में भी अभिनय का मनवाया लोहा
विजय मिश्रा ‘अमित‘ जी वर्ष 1976 में दुर्ग सुप्रसिद्ध संस्था क्षितिज रंग शिविर से जुड़े और अपनी अभिनय-कला का लोहा मनवाने लगे। इस दौरान वे नुक्कड़ नाटक में भी श्री राम ह्दय तिवारी जी के साथ सतत सक्रिय रहे। क्षितिज रंग शिविर के बैनर तले वर्ष 1980 से 1987 तक श्री संतोष जैन जी के निर्देशन में हम क्यों नहीं गाते, घर कहाँ है, अरण्य गाथा, मुर्गी वाला, विरोध, हाथी मरा नहीं है, जैसे कई सुप्रसिद्ध नाटकों का मंचन किया। सन् 1982 में जब टेलीविजन मोहल्ले के इक्का-दुक्का घरों में ही होता था तब उपग्रह दूरदर्शन केंद्र दिल्ली से लोरिक चंदा के दो एपिसोड प्रसारित हुए थे जिसमें विजय मिश्रा ‘अमित‘ ने राजा मेहर की महत्वपूर्ण भूमिका निभायी थी। वे दाऊ महासिंह चंद्रकार के सोनहा बिहान से भी जुड़े थे।

लोकनाट्यों की राष्ट्रीय मंचों पर प्रस्तुति - बलराज साहनी अवाॅर्ड से अंलकृत
छत्तीसगकढ़ के बहुचर्चित लोकनाट्य कारी और लोरिक चंदा की मूल स्क्रिप्ट भिलाई निवासी सुप्रसिद्ध लेखक श्री प्रेम साइमन ने लिखी थी। दोनों लोक नाट्यों के मंचन की अवधि तीन से चार घण्टों की होती थी। इन दोनों लोकनाटयों का हिन्दी रूपान्तरण एक घंटे की अवधि के लिए अमितजी ने किया। इन नाटकों के संवाद ही हिंदी में लिखे गए, छत्तीसगढ़ी वेशभूषा, छत्तीसगढ़ी नृत्य-गीत, छत्तीसगढ़ के तीज त्यौहार और परम्पराओं से सुसज्जित इन नाटकों को मूल रूप में ही प्रस्तुत किया गया। इनका मंचन ऑल इंडिया ड्रामा काम्पीटिशन इलाहाबाद, उड़ीसा, दिल्ली, महाराष्ट्र , हिमाचल प्रदेश, बरेली, कोलकाता, शिमला, सोलन, भोपाल, नागपुर और जबलपुर में किया गया। इन नाटकों को हर स्पर्धा में सर्वश्रेष्ठ नाटक के अलावा अन्य अनेक पुरस्कार प्राप्त हुए। हिमाचल प्रदेश में ऑल इंडिया आर्टिस्ट एसोसिएशन ने विजय मिश्रा को इन उपलब्धियों के लिए वर्ष 1996 में बलराज साहनी अवार्ड से अलंकृत किया ।
राजधानी रायपुर में रहते हुए इन्होंने अनेक छत्तीसगढ़ी फिल्म जैसे - ‘मोही डारे रे‘, ‘पहुना‘, ‘बहुरिया‘, ‘पंचायत के फैसला‘, ‘सोंचत सोंचत प्यार होगे‘ आदि में प्रभावी अभिनय किया। इसके साथ ही दूरदर्शन के अनेक सीरियल व अनेक टेली फिल्म में भी काम किया । विशेष उल्लेखनीय है कि विजय मिश्रा ‘अमित‘ द्वारा लिखित नाटक रिजेक्ट पंडित का प्रसारण, हवा महल से भी हुआ। इनके द्वारा लिखे गए नाटकों, कहानियों तथा कविताओं का प्रसारण आकाशवाणी रायपुर और जबलपुर से समय-समय पर होता रहा है। अनेक रचनाएँ राष्ट्रीय, राज्य स्तरीय पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं ।

चार दशक से अधिक की गौरवमयी कला यात्रा
40 वर्षों से अधिक की कला यात्रा के दौरान भीष्म साहनी, सुनील दत्त, मोहन गोखले, शफी ईनामदार, पंडित जसराज, जैसे अनेक ख्यातिलब्ध कलाकारों के करकमलों से पुरस्कृत होने का गौरव इन्हें प्राप्त हुआ। विजय मिश्रा ष्अमितष् जी बहुत गर्व के साथ बताते हैं कि उन्हें दाऊ रामचन्द्र देशमुख, दाऊ महासिंह चंद्रकार, दाऊ दीपक चंद्रकार, लक्ष्मण मस्तुरिया, केदार यादव, खुमानलाल साव, गिरिजा कुमार सिन्हा, संतोष कुमार टांक, पंचराम देवदास, शिव कुमार दीपक, भैयालाल हेड़ाऊ, मदन निषाद, गोविंद निर्मलकर, कविता वासनिक, विवेक वासनिक, साधना यादव, अनुराग ठाकुर, शैलजा ठाकुर, ममता चंद्राकर, रामहृदय तिवारी, संतोष जैन,चतरू साहू, कृष्णकुमार चैबे, विनायक अग्रवाल जैसी नामी-गिरामी छत्तीसगढ़ की विभूतियों के साथ काम करने का अवसर मिला ।

पशु पक्षियों और पर्यावरण संरक्षण में गहरी अभिरुचि
हिन्दी रंगकर्म, लोकनाट्य सहित लेखन के अलावा श्री विजय मिश्रा ‘अमित‘ जी को पशु पक्षियों और पर्यावरण संरक्षण में गहरी अभिरुचि है। इसके लिए इन्हें भास्कर समूह ने ‘वृक्ष-मित्र सम्मान‘ से सम्मानित किया है। विजय जी ‘पेड़-प्रहरी‘ नामक संस्था का गठन कर अभी तक हजारों वृक्षारोपण कर चुके हैं। वे पर्यटन के भी शौकीन हैं। इसी शौक के चलते उन्होंने कैलाश मानसरोवर, तिब्बत, श्रीलंका, पाकिस्तान, नेपाल और थाईलैंड की यात्रा की है।

अरुण कुमार निगम
आदित्य नगर, दुर्ग (छत्तीसगढ़)

शौर्यपथ लेख / माननीय मंत्री जी, शराबबंदी के सवाल पर आपके शानदार परफॉर्मेंस के बाद छत्तीसगढ़ राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री जी के बयान का अंश है कि, अब वक्त है पछतावे का । पूर्व चुनाव में आपकी पार्टी का नारा था अब वक्त है बदलाव का । उनके बयान और आपके नारे की तुकबंदी कमाल की है। प्रदेश के आम मतदाताओं के कवियों-लेखकों-बुद्धिजीवियों की ओर से दोनों पार्टियों के मंत्रियों को साष्टांग प्रणाम। बड़े चाहे जैसे भी हों उन्हें प्रणाम करने की भारतीय सनातन परम्परा के इस निर्वहन के बाद कृपया आप ये बतायें कि आपने पिछले विधानसभा चुनाव के समय नारा दिया था, वक्त है बदलाव का। हमने बदल दिया। पर आपको तो सुनाई ही नहीं देता। अब क्या करें ? राईट टू रिकॉल तो अभी है नहीं।
कोरोना प्रोटोकॉल की मैय्यत के बीच आनंदित भीड़ - रिपोर्टर ने कहा कि आप संस्कृति मंत्री हैं और शराब के कारण संस्कृति खराब हो रही है जिसे आप नहीं सुन पाए। रिपोर्टर ने सरल करके फिर दुहराया पर आप कोरोना प्रोटोकॉल की मैय्यत के बीच वहाँ मौजूद आपके कार्यकर्ताओं की भारी भीड़ और उनके आनंदमय सन्नाटे के कारण फिर नहीं सुन पाये। हालांकि दो-दो बार पूछे गये सवालों को आपने पूरी शालीनता से सुना,लेकिन आपको फ़िर भी सुनाई ही नहीं दिया तो इसमें आपकी क्या गलती ? उस पूरे सीन में आपका धैर्य और मीडिया के प्रति सम्मान भी देखने को मिला। जिस पर मीडिया का ध्यान ही नहीं गया। इन्हें तो केवल निगेटिव चाहिये।
बेमिसाल मुस्कान और नासमझ मीडिया - मेरे को सुनाई ही नहीं दिया आप क्या बोले,यह कहते हुए आप आगे बढ़ गए। आदरणीय मंत्रीजी, शराबबंदी के सवाल के जवाब में हल्की मुस्कान के साथ दोनों हाँथ जोड़े आपका आगे सरक जाने वाला वह सीन कमाल का था। आपकी संवाद अदायगी भी बेमिसाल है। पर मीडिया ने आपकी इस अदा को नोटिस ही नहीं किया। प्रॉपर हाईलाइट भी नहीं किया। मुद्दों के बीच मंचीय मैच्योरिटी की जरा भी समझ नहीं हैं मीडिया को। छी।
बाकी सब माया है - आपके साथ आप पर समर्पित भीड़ भी चुप्प आगे सरक गई। इस दृश्य में पॉजिटिव बात मुझे यह दिखी कि चलते समय मंत्रीजी के दोनों हाँथों की पूरी की पूरी दसों उंगलियां जुड़ी हुई थीं। यानी हमारे सर जी बहुत विनम्र जननेता हैं। जिन्हें जिले की कमान मिली है उनमें आलाकमान ने कुछ तो देखा होगा? सच्चाई यही है। बाकी सब माया है।
नशा शराब में होता तो नाचती बोतल - हमारे लोकतांत्रिक इतिहास के अनुसार नेताओं के कान की क़्वालिटी पर सवाल दागना या शराब की बंदी-बिक्री या नष्ट होती संस्कृति से संबंधित सवाल करना क्या एक्सपायरी डेट की रिपोर्टिंग नहीं थी ? सरेआम, दिनदहाड़े और वह भी मंत्री जी के प्रभारी बनने के बाद प्रथम नगर आगमन के शुभ दिवस में ऐतिहासिक उत्साह और आनंद के मौसम में रिपोर्टर का दारू पर प्रश्न उठाना निहायत ही असभ्य हरकत थी। तो सारे सुबूतों और गवाहों को मद्दे नज़र रखते हुये यह अदालत इस नतीजे पर पहुंचती है कि पूछने वाले का दिमाग ही खराब रहा होगा। कान एकदम ठीक थे। अदालत का यह भी मानना है कि रिपोर्टर ने शायद फिल्म शराबी भी नहीं देखी है। अन्यथा उसे पता होता कि नशा शराब में होता तो नाचती बोतल, नशे में कौन नहीं है ये बताओ जरा ?
आप आम निचोड़ कर खाते हैं कि चूसकर - शराब पर रिपोर्टर के सतही ज्ञान को देखकर मंत्रीजी रिपोर्टर पर तरस खाकर आगे बढ़ गये होंगे। कुछ तो ढंग का सवाल करना था। अभी आम का सीजन है तो उस बंबईया स्टार की तरह ही पूछ लेना था। मंत्री जी, आप आम कौन सा खाते हैं? कैसे खाते हैं ? पिजगोल (निचोड़) कर खाते हैं कि चूसकर खाते है ? पर रिपोर्टर ने तो खाने की जगह बेधड़क पीने पर ही सवाल दाग दिया। इसलिए भी चौथा स्तंभ बदनाम है। सरेआम ऐसी बेशर्म और बेधड़क रिपोर्टिंग ? छी।
अकेल्ला- दुकेल्ला में - आदरणीय मंत्री जी, इस घटना के वीडियो को देखने के बाद लोग बौरा गए हैं। वे तरह-तरह के गोठिया रहे हैं। एक पूछता है, जब मीडिया के द्वारा, इतने लोगों के बीच, वो भी माइक में,सरेआम पूछे गए सवाल का वे अइसन दुर्गति कर सकते हैं तो अकेल्ला- दुकेल्ला में आम आदमी का वे कतका जंउहर करेंगे? ये सवाल ला सुनके तो मोर कान के संग दिमाग हा तको काम नहीं करत हे।
: योगेश अग्रवाल, एक मतदाता ।

शौर्यपथ लेख / ‘‘शाम सुबह की हवा लाख रूपये की दवा‘‘ इस बात को अपने बुजुर्गों से सुनते मैंने बचपन से प्रातः भ्रमण को अपनी दिनचर्या में शामिल किया। इससे ताजी हवा से तन-मन प्रसन्न रहता है और अच्छे विचारों की उत्पत्ति भी होती है। अपनी इसी दिनचर्या के अनुरूप पिछले रविवार को सुबह चार बजे प्रातः भ्रमण के लिए मैं निकल पड़ा था। चलते-चलते मुझे अचानक किसी के सिसकने की आवाज सुनाई दी। मेरे कदम उस दिशा में बढ़ चले जहां से रोने-सिसकने की आवाज आ रही थी। आगे जाकर मैंने देखा कि काले धागे में गंूथे मिर्च और नीबू एक-दूसरे से लिपट कर रो रहे है। मैंने उन्हें बड़े प्यार से उठाया और पूछा, क्या बात हैं, क्यों रो रहे हो आप लोग i
मेरा यह प्रश्न सुनते ही मिर्च और नीबू गुस्से से लाल हो उठे। नीबू ने कहा - ज्यादा दया दिखाने की जरूरत नहीं है। तुम लोगों की वजह से ही हम नीबू और मिर्च परिवार के लोगों को ऐसी तकलीफ का सामना करना पड़ रहा है। सुई-धागा में एक साथ नीबू और मिर्च को पिरो कर तुम लोग घर-दुकान अथवा मोटर गाड़ी में लटका कर रखते हो। जरा सोचों तुम्हें जब सुई चुभती है, कांटा गड़ता है तो कितनी पीड़ा होती है। हमें भी सुई-धागे में तुम पिरोते हो तो हम दर्द के मारे कराह उठते है, पर दूसरे के दुख दर्द में हंसने वाले तुम लोग क्या समझोगे नीबू और मिर्च की पीड़ा।
मैंने इस पर नीबू को सहलाते हुए कहा - दरअसल टोना-टोटका और बुरी नजर से बचने के लिए ऐसा किया जाता है। मेरे इस जवाब से लाल मिर्ची भड़कते हुए बोली- यह पूरी तरह से अंधविश्वास है। कान खोल कर सुन लो, जिस नीबू और मिर्च को उपजाने में किसान की मेहनत, पसीना के साथ-साथ पानी, बिजली और खाद का उपयोग भी होता है। उसे दरवाजे पर लटका कर दूसरे दिन सडक पर फेंक देते हो, जो कि राहगीरों के जूते चप्पल, मोटर गाड़ियों के चक्के तले कुचल कर बरबाद हो जाते हैं। ऐसा करते समय भूल जाते हो कि बहुमूल्य नीबू-मिर्च को अंधविश्वास के चक्कर में टांगने-फेंकने से तुम्हारी सदगति नहीं, दुर्गति ही होगी।
मिर्च की बात सुनकर अपनी गलती का अहसास करते हुए मैंने कहा - हां मिर्च बहन, तुम ठीक कह रही हो। तुम्हारी बाते सुन कर मेरी आत्मा से यही आवाज आ रही है कि सेहत के लिए बहुपयोगी नीबू,मिर्च का ऐसा दुरूपयोग करना मानव समुदाय के लिए अनिष्टकारक है। दुनिया कहां से कहां पहंुच गई है, फिर भी अंधविश्वास में डूबे लोग अपना समय, श्रम और पैसों की बर्बादी के साथ मन को कमजोर बनाये हुए जी रहे है।
मेरी बात को बीच में टोंकते हुए नीबू ने कहा - इंसान बेहद स्वार्थी होता है, नीबू मिरची की तो बात ही छोड़ो, वह अपने स्वार्थ सिद्धि के लिए जीव जन्तुओं की बलि देने से भी बाज नहीं आता है। पढा-लिखा ज्ञानीजन भी अंधविश्वास के मकड़जाल में फंसा हुआ है। मेहनत की महिमा का मर्म समझने के बजाय नीबू मिर्च लटकाने और जीवों की हत्या को अपनी सदगति का राह मान रहा है। सच तो यह है कि सदगति तभी मिलेगी जब पेड़-पौधों, जीव-जंतुओं के प्रति इंसान दया भाव रखेगा। अपनी मेहनत से कमाये धन-दौलत में से कुछ अंश को दीनहीन, गरीब असहाय मानव सेवा में लगायेगा।
बिल्कुल सही बात कह रहे हो नीबू भाई, कहते हुए मिर्ची उंची आवाज में बोली - अगर थोड़ी भी समझदारी इंसानों में है तो हमारा तो यहीं कहना है कि नीबू और मिर्च रोज खरीदे, ताकि इसे बेचने वालों का भी जीवन निर्वाह हो सके। लेकिन इसे खरीद कर बर्बाद कर देने से अच्छा है कि किसी गरीब मजदूर को दान दे देना। ऐसा करने से इंसान के मेहनत की कमाई का सदुपयोग, किसान के श्रम का सम्मान और गरीब मजदूरों के आशीर्वाद की भी प्राप्ति होगी। यह ऐसा आशीर्वाद होगा जो कि सदैव दानदाता के मन को मजबूत बनायेगा और अंधविश्वास जैसे ढकोसलों से दूर रखेगा।
नीबू और मिर्च से बातचीत समाप्त करके मैं घर की ओर लौटने लगा। मेरे मन में उस समय यह भी विचार बार-बार आ रहे थे कि नीबू का उपयोग पूजा पाठ में होता है। मां दुर्गा और काली के लिए गहने का स्वरूप होता है, अतः इसे फेंकना सचमुच अनिष्टकारी हैं।
विजय मिश्रा 'अमित'
अतिरिक्त महाप्रबंधक (जनसंपर्क)
छत्तीसगढ़ स्टेट पावर कम्पनी

      सम्पादकीय लेख /शौर्यपथ /अब भाषा पर गौर फरमाइए। व्यक्ति लालची नही है। Dr लालची है। एक पद, एक टाइटल एक नाम। जब कोई आतंकी पकड़ा या मारा जाता है तो दुनिया भर के सेक्युलर आकर दुहाई देते हैं कि आतंकवाद की कोई जाति नही होती। कोई नेता भ्रष्टाचार के आरोप में अंदर हो जाता है तो संसद भवन बन्द कराने की मांग नही की जाती पर डॉक्टर लालची हो जाता है।
घर में जब कोई बच्चा पैदा होता है उस दिन से माँ बाप का सपना या तो उसे Dr बनाने का होता है या इंजीनियर। अगर औलाद वाकई काबिल हो तो कभी कभी ये सपना पूरा भी हो जाता है। भारत में जहां एक सीट पर लाखों के सपने सजे होते हैं वहां 67% तक पहुच चुके आरक्षण के बीच कोई विरला ही इस मुकाम को अपनी अथक मेहनत से हासिल कर पाता है।
इस कलियुग में Dr को जान बचाने वाला और धरती पर भगवान का रूप माना जाता है। लेकिन इतिहास गवाह है कि कोई भी पद, प्रतिष्ठान बिना व्यक्ति के लिए नही चल सकता और कोई व्यक्ति सम्पूर्ण नही हो सकता। ईमानदारी वो बीमारी है जो आजकल संक्रामक नही है। जितना मुश्किल इस देश मे डॉक्टर बनना है उतना ही मुश्किल ईमानदार रह पाना।
सेलेक्शन के बाद भी महंगे कॉलेज की मोटी फीस, 5 साल की डिग्री के बाद 3 साल की pg डिग्री लेकर एक युवा जब भारत के हेल्थ सिस्टम में उतरता है तब खुद को युवा नही पाता। कभी कर्जे से डूबा युवा अचानक इस बाजार में खुद को पाकर उस प्यासे की तरह हो जाता है जिसे अचानक रेगिस्तान में झील मिल गई हो। कुछ वाकई जल्दी सफल डॉक्टर होने की लालसा में अच्छा इंसान बनने में असफल हो जाते हैं।
एक प्रयोग की याद आती है। एक व्यक्ति ने तीन नई वस्तुएं 1 टायर ट्यूब एक टीवी और एक फ्रीज लिया। फिर तीनों को लेकर उनके उनके रिपेयरिंग शॉप्स पर लेकर गया और बताया कि इन सभी उपकरणों में शायद कोई समस्या आ रही है। फ्रीज वाले ने बताया भाई कंडेनसर खराब है 10000 लगेगा, टीवी वाले ने 5000 और टायर टयूब वाले ने 80 रुपये दो पंचर के बताए।
सभी का मेहनताना अदा करने के बाद जब व्यक्ति सभी उपकरणों के सही होने की जांच के कागजात लेकर सभी के पास पंहुचा तो सभी ने अपने काम मे कोई भी गड़बड़ी होने की संभावना से इनकार कर दिया। एक ने तो अमुक कंपनी को चीनी- फर्जी बता दिया दूसरे ने कस्टमर को झूठा कह दिया। टायर वाले ने थोड़ी ईमानदारी दिखाई और गलती मानीं पर साथ ही उंसने ये भी कह दिया कि वो ईमानदार है क्योकि उंसने दो पंचर गिनाए पर वो 4 भी बता सकता था। इस घटना से हमको इस बाद का पता चलता है कि भ्रष्टाचार का व्यक्ति की जरूरतों से नही उसकी इच्छाओं, उसके लालच उसके जल्द सफल होने की भावना से संबंध होता है। जो 10 रुपये का भ्रष्टाचार कर सकता है वो 10 का ही करता है क्योकि मौका उतना ही मिल पाता है। पर यदि इसे मौका मिला तो बड़े लेवल का भ्रष्टाचार भी जरूर करना चाहेगा। यदि अधिकारी होता तो लाखों का करता नेता बन पाता तो सपने करोडों के होते।
इससे एक बात सिद्ध होती है। भ्रष्टाचार की पहुच ऊपर से नीचे नही नीचे से ऊपर है। पैसे देखकर दिमाग नही फिरता, फिरे दिमाग को पैसा ही दिखता है।
आजकल बाबाजी के विवादित बयान के बाद एक अजीब जंग छिड़ी हुई है एलोपैथी और आयुर्वेद के बीच। आयुर्वेद समर्थक आयुर्वेद को इसलिए श्रेष्ठ बता रहे क्योकि आज तक किसी आयुर्वेदाचार्य ने किसी मरीज की किडनी नही बेची। सस्ते दरों पर काम किया और लाखों का बिल नही थमाया। पहली नजर में ये बात तो सही लगती है पर जब हम टायर वाले उदाहरण पर ध्यान देते हैं तब हमें अहसास होता है कि चोरी छोटी बड़ी तो हो सकती है लेकिन चोरी की नीयत एक समान ही होती है। जो जितना भ्रष्ट उतना सफल भ्रष्टाचारी।
कहने का मतलब ये बीमारी किसी पैथी विशेष से जुड़ी हुई नही है। अपनी योग्यता अनुसार ही कोई व्यक्ति भ्रष्टाचार कर सकता है। न एलोपैथी कोई गंदा नाला है न आयुर्वेद कोई बहती गंगा। अच्छे बुरे दोनो तरह के लोग दोनो ही विधा में पाए जाते हैं। पर आयुर्वेद का बाजार आज भारत मे तुलनात्मक रूप से कमजोर नजर आता है जिसमे हालिया कुछ वर्षों में जरूर सुधार हुआ है और स्वदेशी पद्धति का तमगा मिलने के चलते लोग खुद को आयुर्वेद से जोड़कर सपोर्ट करते नजर आ रहे।पर बड़े आश्चर्य की बात है कि एलोपैथी शब्द हमें एलोपैथी की किसी भी किताब में नही मिलता। विदेशी माने जाने वाली एलोपैथी का नाम विदेशियों ने भी कम ही सुना है। असल मे भारत पाकिस्तान और बांग्लादेश में ये शब्द ज्यादा प्रचलित है।
किताबें तो इन्हें मॉडर्न मेडिकल साइंस ही कहती है जिसमें कोई पैथियों का बंधन ही नही है। यहां तक कि माईग्रेन जैसी बीमारियों में किताबें योगा की अनुशंसा करती है।
आधुनिक मेडिकल साइंस एक एविडेंस बेस्ड सिस्टम है जिसने यूरोपीय चिकित्सा पद्धति, यूनानी चिकित्सा पद्धति, होमियोपैथी और हमारे आयुर्वेद सभी से कुछ न कुछ लिया है। बल्कि उसे और परिष्कृत किया है।
उदाहरण के तौर पर सिनकोना की छाल का उपयोग मलेरिया की दवा के तौर पर सदियों से किया जा रहा है जो घरेलू पद्धति है। इसी दवा को कुनैन के रूप में खोजकर उसे अलग कर इलाज करने में आधुनिक चिकित्सा ने सफलता प्राप्त की। अलग इसलिए किया गया क्योंकि सिनकोना की छाल में इस कुनैन के अलावा भी दूसरे अल्कालोइड होते थे जो नुकसान पहुचाते थे।जब कुनैन का असर कम होने लगा तब चीनी चिकित्सा पद्धति की सहायता से नई दवाएं खोजी गई। ये सभी पद्धतियों की एकता का एक खूबसूरत उदाहरण है। क्योकि यहां शत्रु कोरोना जैसी बीमारियां है न कि चिकित्सा पद्धतियां।
अब तो दूसरी पद्धति की टांग खिंचकर उसे स्टुपिड साइंस तक कहने तक हमारा पतन हो चुका है।
कोई राजनीतिक पार्टी इसलिए वैक्सीन का विरोध कर रही क्योंकि उसको राजनीतिक टांग खिंचाई करनी है। उसके अपने स्वार्थ हैं। कोई इसलिए कर रहा क्योकि अपनी दवा बेचना चाहता है पर इस लड़ाई में पीस तो वो जनता रही है जिसे न आयुर्वेद का पता है न एलोपैथी का।क्या आधुनिक चिकित्सा पद्धति को एलोपैथी नाम देकर उस भारतीय योगदान को भुलाने का षड्यंत्र रचा गया है जिसकी शुरु
वात आधुनिक चिकित्सा पद्धति के जनक चरक और आधुनिक शल्य चिकित्सा के प्रणेता सुश्रुत ने की थी। यदि नालंदा विश्वविद्यालय न जलाया गया होता खिलजी द्वारा तो संभव था आधुनिक चिकित्सा पद्धति में आयुर्वेद का स्थान बहुत ज्यादा होता।
ये जो लड़ाइयां चल रही कि तुम्हारा कुत्ता, कुत्ता,मेरा कुत्ता टॉमी ये बचकाने सोच की मिसाल है। सच तो यही है कि सभी पद्धतियों को आज कोरोना के खिलाफ खड़े होने की जरूरत है न कि आपस मे लड़ने की, वरना जो गलती पुराने हिन्दू राजाओं ने की वही फिर दोहराई जाएगी। युद्ध गौरी(कोरोना) से है तो जयचंद बनकर पृथ्वी की तबाही का कारण न बनें बल्कि कोरोना वारियर्स का सम्मान करें, उनकी मृत्यु का मज़ाक न बनाएं बल्कि उनका हौसला बढ़ाएं और मिलकर देश को कोरोना मुक्त बनाएं।

सम्पादकीय लेख / शौर्यपथ /बेटा चल छत पर चलें कल तो तेरी शादी है, आज हम माँ बेटी पूरी रात बातें करेंगे। चल तेरे सिर की मालिश कर दूँ, तुझे अपनी गोद में सुलाऊँ कहते कहते आशा जी की आँखें बरस पड़ती हैं। विशाखा उनके आंसू पोंछते हुए कहती है ऐसे मत रो माँ, मैं कौन सा विदेश जा रही हूँ। 2 घण्टे लगते हैं आगरा से मथुरा आने में जब चाहूंगी तब आ जाऊँगी।
विदा हो जाती है विशाखा माँ की ढेर सारी सीख लिए, मन में छोटे भाई बहनों का प्यार लिये, पापा का आशीर्वाद लिये। दादा-दादी, चाचा-चाची, मामा-मामी, बुआ-फूफा, मौसी-मौसा सबकी ढेर सारी यादों के साथ। जल्दी आना बिटिया, आती रहना बिटिया कहते हाथ हिलाते सबके चेहरे धुंधले हो गए थे विशाखा के आंसुओं से। संग बैठे आकाश उसे चुप कराते हुए कहते हैं सोच लो पढ़ाई करने बाहर जा रही हो। जब मन करे चली आना।
शादी के 1 साल बाद ही विशाखा के दादाजी की मृत्यु हो गयी, उस समय वो आकाश के मामा की बेटी की शादी में गयी थी, आकाश विशाखा से कहता है ऐसे शादी छोड़ कर कैसे जाएंगे विशु, दादाजी को एक न एक दिन तो जाना ही था। फिर चली जाना, चुप थी विशाखा क्योंकि माँ ने सिखा कर भेजा था अब वही तेरा घर है, जो वो लोग कहें वही करना। 6 महीने पहले आनंद भईया (मामा के बेटे) की शादी में भी नहीं जा पायी थी क्योंकि सासु माँ बीमार थीं।
अब विशाखा 1 बेटी की माँ बन चुकी थी, जब उसका पांचवा महीना चल रहा था तभी चाची की बिटिया की शादी पड़ी थी, सासू माँ ने कहा दिया ऐसी हालत में कहाँ जाओगी। वो सोचती है,कैसी हालत सुबह से लेकर शाम तक सब काम करती हूँ, ठीक तो हूँ इस बार उसका बहुत मन था, इसलिए उसने आकाश से कहा मम्मी जी से बात करे और उसे शादी में लेकर चले, चाची का फोन भी आया था आकाश के पास, तो उन्होंने कहा दिया आप लोग जिद करेंगे तो मैं ले आऊँगा लेकिन कुछ गड़बड़ हुई तो जिम्मेदारी आपकी होगी। फिर तो माँ ने ही मना कर दिया, रहने दे बेटा कुछ भी हुआ तो तेरे ससुराल वाले बहुत नाराज हो जाएंगे।
वैसे तो ससुराल में विशाखा को कोई कष्ट नहीं था, किसी चीज की कमी भी नहीं थी, फिर भी उसे लगता था जैसे उसे जिम्मेदारियों का मुकुट पहना दिया गया हो। उसके आने से पहले भी तो लोग बीमार पड़ते होंगे, तो कैसे सम्भलता था ! उसके आने से पहले भी तो उनके घर में शादी ब्याह पड़ते होंगे, तो आज अगर वो किसी समारोह में न जाकर अपने मायके के समारोह में चली जाए तो क्या गलत हो जाएगा।
दिन बीत रहे थे कभी 4 दिन कभी 8 दिन के लिए वो अपने मायके जाती थी और बुझे मन से लौट आती थी।विशाखा के ननद की शादी ठीक हो गयी है, उन दोनों का रिश्ता बहनो या दोस्तों जैसा है। अपनी ननद सुरभि की वजह से ही उसे ससुराल में कभी अकेलापन नहीं लगा। सुरभि की शादी होने से विशाखा जितनी खुश थी उतनी ही उदास भी थी, उसके बिना ससुराल की कल्पना भी उसके आंखों में आंसू भर देती थी।
विशाखा ने शादी की सारी जिम्मेदारी बहुत अच्छे से संभाल ली थी, उसको दूसरा बच्चा होने वाला है, चौथे महीने की प्रेगनेंसी है फिर भी वो घर-बाहर का हर काम कर ले रही है। सभी रिश्तेदार विशाखा की सास से कह रहे हैं बड़ी किस्मत वाली हो जो विशाखा जैसी बहु पायी हो।
शादी का दिन भी आ गया, आज विशाखा के आँसू रुक ही नहीं रहे थे, दोनों ननद भाभी एक दूसरे को पकड़े रो रही थीं, तभी विशाखा की सास उसे समझाते हुए कहती हैं, ऐसे मत रो बेटा, कोई विदेश थोड़े ही जा रही हो जब चाहे तब आ जाना। तब सुरभि कहती है, नहीं माँ जब दिल चाहे तब नहीं आ पाऊँगी। वो पूछती हैं ऐसे क्यों कहा रही हो बेटा, माँ के पास क्यों नहीं आओगी तुम ?
तब सुरभि कहती है, "कैसे आऊँगी माँ हो सकता जब मेरा आने का मन करे तब मेरे ससुराल में कोई बीमार पड़ जाए, कभी किसी की शादी पड़ जाए या कभी मेरा पति ही कह दे तुम अपने रिस्क पे जाओ कुछ हुआ तो फिर मुझसे मत कहना। सब एकदम अवाक रह जाते हैं, वो लोग विशाखा की तरफ देखने लगते हैं, तभी सुरभि कहने लगती है, नहीं माँ भाभी ने कभी मुझसे कुछ नहीं कहा लेकिन मैंने देखा था उनकी सूजी हुई आंखों को जब उनके दादा जी की मौत पर आप लोग शादी का जश्न मना रहे थे।
मैंने महसूस की है वो बेचैनी जब आपको बुखार होने के चलते वो अपने भईया की शादी में नहीं जा पा रही थीं। मैंने महसूस किया है उस घुटन को जब भैया ने उन्हें उनकी चाची की बेटी की शादी में जाने से मना कर दिया था, उन भईया ने जिन्होंने उनकी विदाई के वक़्त कहा था सोच लो तुम बाहर पढऩे जा रही हो जब मन करे तब आ जाना। आपको नहीं पता भईया आपने भाभी का विश्वास तोड़ा है।
कल को मेरे ससुराल वाले भी मुझे छोटे भईया की शादी में न आने दें तो, सोचा है कभी आपने। पापा हमारी गुडिय़ा तो आपकी जान है, कभी सोचा है आप सबने कल को पापा को कुछ हो जाये और गुडिय़ा के ससुराल वाले उसे न आने दें। कभी भाभी की जगह खुद को रख कर देखिएगा, एक लड़की अपने जीवन के 24-25 साल जिस घर में गुजारती है, जिन रिश्तों के प्यार की खुशबू से उसका जीवन भरा होता है उसको उसी घर जाने, उन रिश्तों को महसूस करने से रोक दिया जाता है।
मुझे माफ़ कर दीजिए भाभी मैं आपके लिए कुछ नहीं कर पाई, जिन रिश्तों में बांधकर हम आपको अपने घर लाये थे वही रिश्ते वही बन्धन आपकी बेडिय़ाँ बन गए और ये कहते-कहते सुरभि विशाखा के गले लग जाती है। आज सबकी आंखें नम थी, सबके सिर अपनी गलतियों के बोझ से झुके हुए थे।
दोस्तों ये किसी एक घर की कहानी नहीं बल्कि हर घर की यही कहानी है, हमारे देश के समाज में शादी होते ही लड़कियों की प्राथमिकताएं बदल दी जाती हैं। अपना परिवार अपना घर ही पराया हो जाता है और उसे वहाँ जाने के लिए उसे दूसरों की आज्ञा लेनी पड़ती है। अगर हो सके तो इस लेख को पढ़कर आप सब भी इस पर गौर जरूर फरमाइयेगा। और हो सके तो बहु को उसके माता-पिता के घर आने-जाने की आज़ादी जरूर दिजियेगा।
(लेखक के अपने विचार है )

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