
CONTECT NO. - 8962936808
EMAIL ID - shouryapath12@gmail.com
Address - SHOURYA NIWAS, SARSWATI GYAN MANDIR SCHOOL, SUBHASH NAGAR, KASARIDIH - DURG ( CHHATTISGARH )
LEGAL ADVISOR - DEEPAK KHOBRAGADE (ADVOCATE)
Google Analytics —— Meta Pixel
दुर्ग / शौर्यपथ लेख / राजनीती की जब भी बात आएगी तो मोतीलाल वोरा का नाम जरुर आएगा . कांग्रेस की राजनीती में एक विनम्र और बेदाग़ छवि के लिए जाना जाने वाला नाम है मोतीलाल वोरा . ५ दशक की लम्बी राजनीती में पार्षद से देश के मुख्य राजनीती दल कांग्रेस में मोतीलाल वोरा का नाम सदैव के लिए अमिट हो गया साथ ही इतिहास के पन्नो में दर्ज़ हो गया २१ दिसंबर का दिन . किन्तु जिस तरह पिछले दिनों शहर के एक तालाब का नाम मोतीलाल वोरा के नाम किये जाने का निगम ने प्रस्ताव पारित किया उससे उनके नाम को जरुर कुछ आघात लगा .शहर का ठगडा बाँध जो ठगडा दाऊ की सम्पाती थी जिसे उनके द्वारा जनहित में दान किया गया और एक बड़े तालाब का निर्माण इन दिनों चल रहा है ठगडा दाऊ के नाम से बने इस तालाब का नाम अंग्रेज शासन में भी नहीं बदला ऐसे में अब बदलना कहा तक सही है . . मोतीलाल वोरा एक ऐसी सोंच के व्यक्ति थे जो अपनी राह स्वयं बनाते थे अपनी मंजिल ऐसे तय करते जिससे किसी को आघात ना हो किसी को शर्मिदा ना होना पड़े . अपने जीवन काल में शायद ही कोई ऐसा होगा जिनका दिल मोतीलाल वोरा ने दुखाया हो , सदा विनम्र रहने वाले काम को ही पूजा समझने वाले व्यक्ति के रूप में पहचान बनाने वाले मोती लाल वोरा किस नाम के मोहताज नहीं थे किसी का नाम का सहारा लेकर आगे बढ़ना मोतीलाल वोरा को कभी गवारा नहीं था ऐसे में आज जब वो इस दुनिया में नहीं है उनके नाम को किसी और के नाम के सहारे अमिट करना स्व. मोतीलाल वोरा जी के नाम का ही अपमान है . ठगडा दाऊ की एक अलग पहचान है स्व. मोतीलाल वोरा की एक अलग पहचान है . चौक चौराहो में स्व. मोतीलाल वोरा की फोटो लगाने से क्या लोग उन्हें याद रखेंगे ऐसा बिलकुल भी नही है . दुर्ग की राजनीती में प्रदेश की राजनीती में देश की राजनीती में उनका नाम किसी फोटो का मोहताज़ नहीं उनको किसी नाम के सहारे अपना नाम अमिट करने की चाह कभी नहीं रही होगी उनके कर्म ही ऐसे है कि दुर्ग की जनता के दिलो में उनकी छवि है ऐसे में दुर्ग में ठगडा बाँध के नाम को मोतीलाल वोरा के नाम से करने से अच्छा यह है कि उनके नाम से शहर में कुछ ऐसा नव निर्माण हो जिससे जनता के मन में उनके लिए आदर और बढे . उनके जीवन काल में उनके नाम से दुर्ग में कभी कोई प्रतिरोध नहीं हुआ किन्तु वर्तमान में ठगडा बाँध के नाम को परिवर्तन कर मोतीलाल वोरा का नाम दिए जाने के प्रस्ताव पारित होने से भाजपा सहित छत्तीसगढ़ मंच व कई अन्य सामाजिक लोगो द्वारा जो विरोध हो रहा है वह जरुर उनकी आत्मा को तकलीफ दे रहा होगा क्योकि जिस व्यक्ति ने अपनी मंजिल पाने के लिए किसी का सहारा नहीं लिया अब उनके नाम के लिए प्रतिरोध क्या सही है ?
ठगडा दाऊ की उनके नाम की अपनी अहमियत है वैसे ही स्व. मोतीलाल वोरा के नाम की भी अपनी अहमियत है . ये विवाद उठते ही दुर्ग विधायक और स्व. मोतीलाल वोरा के पुत्र अरुण वोरा को ही तुरंत सामने आ कर इस विवाद का पटाक्षेप करना चाहिए . भले ही आज सत्ता कांग्रेस की है और निगम में सरकार उनकी है आज ठगडा बाँध का नाम मोतीलाल वोरा के नाम से कर दिया जाएगा लाख विरोध के बाद भी तो क्या इस बात की गांरंटी है कि सत्ता परिवर्तन के बाद भी ये प्रक्रिया को विराम लग जायेगा . ये राजनीती है हो सकता है कल को भाजपा या कोई अन्य मंच निगम की सत्ता में बैठे और एक बार फिर इस बाँध को ठगडा बाँध के नाम से करने का प्रस्ताव पारित कर दे तब ज्यादा तकलीफ होगी स्व. मोतीलाल वोरा के समर्थको को उनके चाहने वालो को .
मेरे विचार से स्व. मोतीलाल वोरा के नाम के लिए सरकार कोई ऐसा नव निर्माण करे जो अविवादित हो ताकि भविष्य तक उस नवनिर्माण सोंच का नाम स्व. मोतीलाल वोरा के नाम पर ही रहे ना कि दुसरे के नाम पर काबिज निर्माण . अज भले ही सरकार ये कह दे कि ठगडा बाँध उनके प्रयासों से निर्मित हो रहा है किन्तु निर्माण की राशी उनकी नहीं है जनता की है जनहित के लिए जनता के पैसो से निर्माण हो रहा है . जब जमीन सरकार (ठगडा दाऊ द्वारा दान की हुई जमीन पर निर्मित है ठगडा बाँध ) की नहीं पैसा किसी व्यक्ति विशेष का नहीं तो फिर ये नाम बदलने का खेल क्यों अगर ये खेल शुरू हुआ तो आगे भी बढेगा और भविष्य में फिर नाम परिवर्तन की आशंका रहेगी . क्या ऐसी ही सच्ची श्रधान्जली देना चाहती है दुर्ग निगम की सरकार और निविवाद जननेता रहे स्व. मोतीलाल वोरा के नाम से वर्तमान में चल रहे विवाद पर क्यों मौन है दुर्ग विधायक वोरा ...
शौर्य की बातें । मोहनी हाँ यही नाम दिया था जब पहली बार गोद मे लिया था मेरे निक्की को उसके नाना ने । जिंदगी में पल पल तकलीफ झेलते हुए भी ना किसी से कोई शिकायत की ना किसी को जिम्मेदार ठहराया हर पल गम के साये में रहकर भी सदा मुस्कुराते हुए ईश्वर को ध्यान करते हुए जिंदगी जी रहे थे मेरे अर्धांगनी के पिता । 22 साल के बेटे को खो देने के बाद 3 बेटियों की शादी की ससम्मान तीनो को विदा किया । मुझे याद है वो पल जब मैंने कहा बाबूजी अब आप हमलोगों के साथ रहिए अपनी जन्मभूमि को छोड़ते हुए एक पल भी नही सोंचा और साथ आ गए । आज की दुनिया मे जब कोई अपना एक खोटा सिक्का भी छोड़ने के लिए दस बार सोंचता है बाबूजी ने बिना एक पल सोंचे अपनी जन्मभूमि छोड़ दी । सालो से साथ रह रहे थे न कोई शिकायत की ना कोई फरमाइश हर हाल में खुश और शांत । जब मेरा निक्की हमसे बिछड़ गया तो सहारा दिया पल पल साथ रहे मेरे साथ , मेरे अर्धांगनी के साथ मेरी लाडो के साथ एक मजबूत चट्टान की तरह ना कुछ कहते न कोई शिकायत बस एक निस्वार्थ साथ । मेरी रत्ना उनकी जान थी उसे देखते और उसी में अपनी दुनिया तलाशते किन्तु ये कैसी दुनिया है ये कैसा लोक मेरी रत्ना को अपना सब कुछ मानने वाला मेरी रत्ना का जन्मदाता ही मेरी रत्ना की गोद मे अंतिम सांस लिया उन्होंने तो अपनी मौत में भी खुशी पा ली होगी पर अब मेरी रत्ना का क्या होगा पहले भाई को खोया फिर बेटे को खोया और अब अपने पापा को । ईश्वर ये क्या किया तूने ये तेरा कैसा इंसाफ है अब मैं कैसे जिंदगी के पल काटूंगा । मेरा लाल तो मेरे सीने में जो दर्द दिया वो अब तक ताज़ा है अब मेरी रत्ना के दुख को कैसे देख पाऊंगा कैसे सामना कर पाऊंगा । तू कोई ऐसा चमत्कार कर दे ईश्वर की हम सब तेरी शरण मे आ जाये क्या करेंगे ऐसी जिंदगी का जिसमे ना कोई खुशी ना कोई लक्ष्य ना कोई उमंग है बस सुबह उठने के बाद रात का इंतजार और रात के बाद सुबह का । यही रात दिन की जिंदगी काटते हुए इस लोक में जी रहे है कितनी परीक्षा लेगा अब तो पास कर दे और हमे अपने पास बुला ले सबको बुला ले हम सब साथ रहेंगे । मैं , रत्ना , सिद्धि अम्मा , बाबूजी और मेरा निक्की सब साथ रहेंगे वही जगह हमारे लिए स्वर्ग होगी भूखे रहे प्यासे रहे चाहे जैसे भी रहे साथ रहेंगे तो खुश रहेंगे । तू तो सब कर सकता है अपने बच्चो के लिए हम भी तेरे बच्चे है क्यो हमे भूल गया ... बाबूजी तुम बहुत याद आ रहे हो निक्की बेटा तेरे नाना तेरे पास आ गए रे अब हमारी बारी जल्दी हमे भी बुला ले रे ..
छत्तीसगढ़ सरकार के दो वर्ष पूरे होने पर संभागों, जिलों, विकासखंडों में फोटो-प्रदर्शनियां
हजारों लोगों ने उपलब्धियों को देखा, योजनाओं को समझा और सराहा
निरक्षरों तक भी सहज रूप से पहुंच रही हैं जानकारियां
लेख / शौर्यपथ / एक अच्छी तस्वीर में लाखों शब्दों की ताकत होती है। तस्वीरों की इसी ताकत का इस्तेमाल जनसंपर्क विभाग ने शासन की योजनाओं को दूरदराज के गांवों तक पहुंचाने के लिए किया है। विभाग ने संभागीय मुख्यालयों से लेकर जिलों और विकासखंड मुख्यालयों तक फोटो-प्रदर्शनी के आयोजनों का जो सिलसिला शुरु किया है, उसका अच्छा प्रतिसाद मिल रहा है। ग्रामीण क्षेत्र के लोगों की भीड़ इन प्रदर्शनियों में देखी जा रही है। तस्वीरों के जरिये योजनाओं की जानकारी उन लोगों तक भी पहुंच रही है, जिन तक अब तक साक्षरता की रौशनी नहीं पहुंच पाई।
मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के नेतृत्व वाली छत्तीसगढ़ सरकार के दो वर्ष पूरे होने के अवसर पर जनसंपर्क विभाग ने 17 दिसंबर से फोटो प्रदर्शनियों का आयोजन शुरु किया है। इन प्रदर्शनियों को योजनाओं की जानकारियों के साथ-साथ दो साल की उपलब्धियों पर भी केंद्रित किया गया है। प्रदर्शनी में आए लोगों को जानकारी परक प्रचार सामाग्री का भी वितरण किया जा रहा है। प्रदर्शनी की थीम गढ़बो नवा छत्तीसगढ़ रूबात हे स्वाभिमान के छत्तीसगढ़ के अभिमान के रखी गई है। इस आयोजन की खासियत यह भी है कि प्रदर्शनी के माध्यम से लोगों को विभिन्न शहरों और जिलों की ऐतिहासिकता से भी जोड़ा गया। मसलन, राजधानी रायपुर में प्रदर्शनी का आयोजन ऐतिहासिक बूढ़ातालाब स्थित स्वामी विवेकानंद उद्यान परिसर में किया गया तो जगदलपुर के सिरहासार भवन के ठीक सामने टाउन क्लब में प्रदर्शनी आयोजित की गई। धमतरी में मकई गार्डन में फोटो प्रदर्शनी का आयोजन किया गया तो बीजापुर के सांस्कृतिक भवन में यह आयोजित हुई। जशपुर के बाजार डांड में प्रदर्शनी लगाई गई, बिलासपुर में के रिवर व्यू रोड में चार दिनों तक लोगों ने प्रदर्शनी का अवलोकन किया। इस प्रदर्शनी के माध्यम से सांसदों, विधायकों, महापौरों समेत तमाम जनप्रतिनिधियों ने भी जनसामान्य के साथ संवाद किया। छत्तीसगढ़ में विगत दो वर्षों में हुए विकास कार्यों, नवाचारों और शासन की लोक हितैषी नीतियों की जानकारी लेकर लोगों द्वारा इसे सराहा गया। प्रदर्शनी में मुख्यमंत्री हाट बाजार क्लीनिक योजना, मुख्यमंत्री सुपोषण अभियान, डॉ. खूबचंद बघेल स्वास्थ्य सहायता योजना, राजीव गांधी किसान न्याय योजना, गोधन न्याय योजना, मुख्यमंत्री शहरी स्लम स्वास्थ्य योजना, ऐतिहासिक बूढ़ातालाब का निखरा स्वरूप, रायपुर शहर का विकास और सौंदर्यीकरण, बिजली बिल हाफ योजना, राम वन गमन पर्यटन परिपथ का विकास, वन आश्रितों के कल्याणकारी योजनाओं, नरवा, गरवा, घुरवा, बाड़ी, ग्रामीण विकास, दाई-दीदी क्लीनिक, सार्वभौम पीडीएस, गढ़ कलेवा योजना, पौनी पसारी योजना, साफ पेयजल की आपूर्ति हमारा लक्ष्य, पढ़ई तुंहर दुआर आदि योजनाओं से संबंधित तस्वीरें प्रदर्शित की जा रही हैं।
मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के नेतृत्व वाली सरकार के 2 वर्ष पूरे होने के अवसर पर सोशल मीडिया पर #CGSwabhimaanKe2Saal लगातार ट्रेन्ड करता रहा। फोटो प्रदर्शनी के अवलोकन के बाद सुशील प्रकाश ने कहा-फोटो प्रदर्शनी के माध्यम से राज्य में चल रहे विकास कार्यों की जानकारी मिली है। आगे भी ऐसी प्रदर्शनियां आयोजित होते रहनी चाहिए। तुषार देवांगन ने कहा की राज्य की जनहितैषी योजनाओं से ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत हुई है। गोधन न्याय योजना अपनी तरह की अनूठी योजना है जिससे लोगों के जीवन में परिवर्तन आया है। राकेश पाटले ने कहा कि उन्हें मुख्यमंत्री स्लम स्वास्थ्य योजना की जानकारी नहीं थी, इस प्रदर्शनी के माध्यम से योजना की जानकारी मिली। अजीत साहू ने कहा कि सरकार द्वारा किए जा रहे कार्यों को जनता तक पहुंचाने का यह अच्छा माध्यम है। उन्होंने कहा कि वे मुख्यमंत्री बघेल की रेडियो वार्ता लोकवाणी भी सुनते हैं। विनोद प्रजापति ने कहा कि प्रदर्शनी तो बढ़िया है ही, ब्रोशर और पांपलेट भी बहुत उपयोगी हैं।
अब तक छत्तीसगढ़ के सभी पांच संभागीय मुख्यालयों, सभी 28 जिला मुख्यालयों में प्रदर्शनी का आयोजन हो चुका है। अब क्रमश सभी विकासखंड मुख्यालयों में प्रदर्शनियां लगाई जा रही है।
आलेखः- श्री घनश्याम केशरवानी
बिलासपुर / शौर्यपथ / बिलासपुर में कई दिनों के बाद ऐसा हुआ कि प्रदेश के मुख्यमंत्री 2 दिन बिलासपुर में है । और 428 करोड़ की लागत के शिलान्यास तथा लोकार्पण कार्यक्रमों में हिस्सा लिया । लोकार्पण उन योजनाओं का होगा जिनका शिलान्यास पिछले शासन में हुआ था और शिलान्यास उन योजनाओं का होगा जो इस शासन के हैं। मुख्यमंत्री बिलासपुर आए और राजनैतिक कयास न लगे ऐसा नहीं हो सकता पिछले एक माह में कई बार निगम मंडलों में नियुक्ति का कयास लगाया जा रहा है।
कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष मरकाम ने दिसंबर माह में 15 दिनों के भीतर नियुक्ति का वादा किया था पर यह वादा अभी तक पूरा नहीं हुआ है। दिसंबर माह में ही कांग्रेस ने अपनी सत्ता में वापसी का त्यौहार मनाया और इस त्यौहार के बाद से ही कार्यकर्ताओं को यह लगने लगा है कि अब सरकार चुनाव वोट पर आ गई है।
भारतीय जनता पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व ने भी जिस तरह से अपने प्रदेश संगठन पर ध्यान दिया है उससे लगता है कि भाजपा ने भी चुनाव के लिए भी तैयारी शुरू कर दी है, और भाजपा का यह इतिहास है कि जब वह केंद्र में शासन में होती है और किसी भी राज्य में चुनाव की तैयारी करती है तब राज्य सरकार से उसके संबंध लगातार खट्टे होते जाते हैं । इन दिनों छत्तीसगढ़ की राजनीति में भी ऐसा दिखाई दे रहा है जानकारों की माने तो केंद्र और राज्य के बीच यह खटास अब बढ़ती ही जाएगी। जिसका सीधा अर्थ है की छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री का अधिकतर समय केंद्र के साथ मतभेद निपटाने में लगेगा एक तरफ से यह मुख्यमंत्री बघेल के लिए चुनौती भी रहेगा कि वे केंद्र से किस तरह के संबंध रखें, ममता जैसा टकराव या फिर एक परिपक्व नेता की तर्ज पर अपनी जनता का हित देखकर रोज अपना काम निकालने का रास्ता प्रदेश का मुख्यमंत्री होने के नाते जनता तो उनसे यही उम्मीद करेगी कि वे वैसा मार्ग निकालें जिससे उन्होंने अपने घोषणा पत्र में जो वादे किए हैं उसे पूरा कर सकें ।
जबकि भाजपा पग पग पर उन्हें धोखेबाज मुख्यमंत्री के रूप में प्रचारित कर रही हैं। और अब भाजपा के नेताओं की जुबान भी तीखी होती जाएगी इस बीच में भाजपा संगठन के दोनों बड़े नेता छत्तीसगढ़ में लगातार दौरा कर रहे हैं । और उनका लक्ष्य सीधे कार्यकर्ताओं से बात करना है जबकि कांग्रेसी नेताओं के पास दो काम है जनता के हित करने वाली योजनाओं को लागू करना और अपने ही कार्यकर्ताओं के बीच बढ़ रहे असंतोष पर काबू पाना । भूपेश सरकार के मंत्रिमंडल में रविंद्र चौबे, टी एस सिंह देव, मोहम्मद अकबर जैसे दिग्गज नाम के मंत्री तो हैं किंतु वे अपने विभागों के साथ प्रभावी नजर नहीं आते। जिला पंचायत के कार्यक्रमों के दम पर सरकार जनता के हित में काम करती नजर तो आती है किंतु इस विभाग का मंत्री प्रभावी तौर पर खड़ा नहीं दिखाई देता कारण योजनाओं का श्रेय सीएम अपने खाते में डालते हैं यही हाल स्वास्थ्य विभाग का है पिछला 1 साल कोविड-19 से जूझते हुए बीता पर यहां भी इस विभाग का मंत्री वैसा प्रभाव नहीं छोड़ पाया जैसा उम्मीद थी खेती किसानी के मुद्दे पर भी बघेल मंत्रिमंडल के सदस्य मीडिया में प्रभाव छोड़ते नहीं दिख रहे हैं। कांग्रेस का मीडिया प्रभारी रायपुर छोड़ किसी भी अन्य जिले में प्रभावी नहीं है लोकार्पण और शिलान्यास विज्ञापन की दम पर कुछ घंटे प्रभाव दिखाया जा सकता है किंतु इससे नए छत्तीसगढ़ की संकल्पना कैसे पूरी होगी, और अपने आखरी कार्यकाल में यही गलती विश्वसनीय छत्तीसगढ़ के नाम पर डॉक्टर रमन ने की थी।
रिसाली / शौर्यपथ राजनीती / चुनाव और नेता एक सिक्के के दो पहलु है किसी भी दल के नेता हो उनका लक्ष्य रहता है चुनाव में टिकिट मिले और विजयी होकर जनप्रतिनिधि के रूप में एक अलग पहचान हो इसके लिए नेता सालो से मेहनत करते है और लक्ष्य प्राप्ति के लिए निरंतर आगे बढ़ने का प्रयास करते है . अभी तक दुर्ग में कांग्रेसी सिर्फ महापौर या पार्षद तक के सपने देखते थे क्योकि इसके आगे का रास्ता दुर्ग कांग्रेसी के लिए बंद रहता था . दुर्ग कांग्रेस में कांग्रेस के कद्दावर नेता मोतीलाल वोरा के पुत्र अरुण वोरा ने जब से राजनीती कदम रखा है दुर्ग विधानसभा से कांग्रेस के उम्मीदवार रहे है जीत हो या हार ये कोई मायने नहीं रहा टिकिट मिलने के लिए क्योकि पार्टी में जो स्थान मोतीलाल वोरा का है उस स्थान का ये लाभ मिलना लाजिमी भी रहा है . वैसे भी कांग्रेस में परिवारवाद हावी रहा . दुर्ग के कई कांग्रेसी पार्षद या महापौर से आगे उड़ान भरने के लिए दुर्ग विधान सभा सीट को छोड़ भिलाई , वैशाली नगर या ग्रामीण क्षेत्र पर दावेदारी करते नजर आ चुके है .
१५ साल बाद कांग्रेस की सत्ता आयी और आते ही दुर्ग जिले में एक और नगर निगम का एलान हुआ रिसाली नगर पालिक निगम . सारी कानूनी अड्चनो को पार करते हुए आखिरकार रिसाली निगम अस्तित्व में आ ही गया . निगम के अस्तित्व में आने के बाद दिसंबर में चुनाव होने थे किन्तु कोरोना आपदा के कारन चुनाव की तारीख टल गयी जो कि अब अप्रैल या मई माह में होने की सुगबुगाहट हो रही है . रिसाली निगम के निर्माण में प्रमुख भूमिका प्रदेश के गृहमंत्री और दुर्ग ग्रामीण विधान सभा के विधायक ताम्रध्वज साहू की अहम् भूमिका रही या कहा जाए तो जो वादा उनके द्वारा चुनाव के पहले किया गया था वो वादा पूरा हुआ . अब चूँकि चुनावी माहौल गर्म होते ही राजनीती हलको में ये चर्चा जोरो पर है कि रिसाली निगम क्षेत्र के कार्यो में जिस तरह सक्रीय गृहमंत्री के पुत्र जितेन्द्र साहू हुए है उससे यही चर्चा जोरो पर है कि रिसाली निगम के महापौर की दावेदारी जितेन्द्र साहू की बन रही है . इसमें कोई दो राय नहीं कि रिसाली निअगम के जन्मदाता के रूप में गृह मंत्री ताम्रध्वज साहू को हमेशा याद किया जायेगा उसी तरह जो भी रिसाली निगम का महापौर बनेगा वो भी इतिहास के पन्नो में प्रथम महापौर के रूप में दर्ज हो जायेगा . ऐसे में सभी कोशिश कर रहे है कि इतिहास में अपना नाम दर्ज कराये किन्तु कांग्रेस पार्टी के कई नेता अपने सपनो को टूटते हुए देख रहे है कुछ का तो यह भी कहना है कि सालो से जमीनी रूप में कार्य करने के बाद अब जब एक सुनहरा मौका हाँथ आने की उम्मीद थी यो भी टूटती जा रही है और जैसा हाल दुर्ग निगम क्षेत्र का है वैसा ही हाल रिसाली निगम का भी हो सकता है .
जैसा कि सभी को मालूम है कि दुर्ग निगम में एल्डरमैन हो या प्रभारी या महापौर सभी पद विधायक की अनुशंषा के बैगर संभव नहीं है अगर दुर्ग में राजनीती करनी है तो वोरा निवास के तले ही चल सकती है भले ही राजनीती का ये सफ़र ऊँची उड़ान तक न पहुंचे . ठीक वही हालत अब रिसाली निगम की भी देखने को मिल सकती है रिसाली निगम का एक बड़ा क्षेत्र दुर्ग ग्रामीण में आता है ऐसे में दुर्ग ग्रामीण के विधायक के साथ साथ प्रदेश के गृह मंत्री के रूप में ताम्रध्वज साहू का एक अलग मुकाम है .अगर रिसाली निगम में महापौर के रूप में गृह मंत्री के पुत्र जितेन्द्र साहू दावेदारी करते है तो बगावत के स्वर तो उठेंगे ही किन्तु ये स्वर कितनी उंचाई तक पहुंचेंगे ये कहना मुश्किल है किन्तु ऐसे कांग्रेसी जो सालो से रिसाली क्षेत्र में जमीनी राजनीती कर रहे है वो निष्क्रिय हो जायेंगे जिसका फायदा भाजपा की मजबूत संगठन उठा लेगी . ऐसा नहीं है कि भाजपा संगठन में भीतरी घात नहीं है भाजपा में भी दो गुट आपस में परस्पर विरोधी है किन्तु रिसाली निगम और भिलाई निगम के चुनाव एक साथ होने से अगर दोनों गुट समझौता कर लेते है या प्रदेश संगठन से कोई कडा निर्देश मिल जाता है तो भाजपा रिसाली निगम में भारी पड़ सकती है .
हालाँकि अभी किसी भी दल के कोई नेता ने अधिकारिक रूप से महापौर की दावेदारी पेश नहीं की किन्तु राजनीती सक्रियता की माने तो चर्चो में जितेन्द्र साहू की दावेदारी के आसार नजर आ रहे है किन्तु ये राजनीती है जो हर पल बदलती रहती है जैसा की विधान सभा चुनाव के समय तुलसी साहू की टिकिट आखिरी दिन कटी और बद्दृद्दीन कुरैशी को टिकिट मिला वही प्रतिमा चंद्राकर की टिकिट कटी तो सांसद ताम्रध्वज साहू को टिकिट मिला इस अदला बदली में साहू तो जीत गए किन्तु कुरैशी की हार हुई यानी कि कही ख़ुशी कही गम ...
प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना से नक्सल प्रभावित दूरस्थ वनांचल ग्राम हालेपायली में लोगों को मिल रही आवागमन की सुविधा
तेज बारिश में भी अब बच्चों की पढ़ाई में नहीं आएगी बाधा
2 करोड़ 83 लाख 55 हजार रूपए की लागत से पुल-पुलिया एवं सड़क का निर्माण
राजनांदगांव / शौर्यपथ / जब रास्ते बनते हैं, तब जिंदगियां बदलती हंै, तरक्की की राहें खुलती हंै। ऐसी ही एक मिसाल है राजनांदगांव जिले के नक्सल प्रभावित विकासखंड मानपुर के दूरस्थ वनांचल ग्राम हालेपायली। जहां प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के तहत 4 किलोमीटर लंबी बारहमासी सड़क बनने पर ग्रामवासियों को आवागमन, स्वास्थ्य, खाद्यान्न एवं बच्चों को शिक्षा जैसी महत्वपूर्ण बुनियादी सुविधाएं मिल रही हैं। राज्य शासन द्वारा अधोसंरचना विकास के लिए निरंतर कार्य किए जा रहे हैं। नक्सल प्रभावित क्षेत्र में सड़क का निर्माण करना चुनौतीपूर्ण रहा है। लेकिन इसके बावजूद छत्तीसगढ़ ग्रामीण विकास अभिकरण के मार्गदर्शन में इस कार्य को सफलतापूर्वक पूरा किया गया।
वर्ष 2018 में 2 करोड़ 83 लाख 55 हजार रूपए की लागत से बने पुल-पुलिया एवं सड़क दो गांव गट्टेपायली से हालेपायली को जोड़ रहे हैं। यही वजह है कि यहां के ग्रामवासियों में उत्साह एवं खुशी है। तेज बारिश में नदी-नाले भर जाने पर बच्चों की पढ़ाई में अब बाधा नहीं आएगी। कलेक्टर श्री टोपेश्वर वर्मा ने दूरस्थ अंचलों में अधोसंरचना निर्माण पर विशेष ध्यान दे रहे हैं। प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के कार्यपालन अभियंता श्री पीपी खरे ने बताया कि जिला मुख्यालय से मानपुर विकासखंड 100 किलोमीटर दूर है। वहीं ग्राम हालेपायली 45 किलोमीटर दूरी पर स्थित है। यहां की जनसंख्या 305 है। ग्राम गट्टेपायली से हालेपायली में जानी वाली सड़क में 5 पुल-पुलिया बनाया गया है एवं डामरीकरण का कार्य पूर्ण हो चुका है।
शौर्य की बाते / शौर्य वो नाम जिस पर मेरी दुनिया टिकी है . शौर्य हाँ यही नाम है जिससे मेरी पहचान बनी किन्तु अब सिर्फ नाम ही रह गया मेरी जिदगी में . जिस शौर्य के बिना एक पल जीना दूभर था अब सारी जिन्दगी उसी के बिना जीना है क्योकि शौर्य ने जीने के लिए अपनी बहन को जो छोड़ दिया शायद शौर्य को भी मालूम था कि उसके मम्मी पापा उसके बिना नहीं रह इसलिए अपने जन्म के 9 साल बाद अपनी छोटी बहन को बुला लिया दुनिया में और खुद दुनिया से दूर एक अनजाने जगह पर लम्बी सफर के लिए चला गया . और दे दी जिम्मेदारी सिद्धि की . हम तो शौर्य के साथ ही चले जाते पर सिद्धि का क्या होता .उसके जीने के हक को कैसे छिनते . शायद यही हमारा भाग्य है कि एक पत्थर की तरह जिन्दगी जी रहे है जिसमे ना कोई अहसास ना कोई भाव बस सिर्फ सुनी सुबह और अँधेरी रात कब सुबह होती है कब रात इसका भी कोई अहसास नहीं .
आज त्यौहार का समय चल रहा है सब तरफ एक उमंग दिख रही है एक उत्साह है किन्तु ये सब हमारे लिए बेमानी है जिन्दगी तो हमने जी ली बस अब एक कहानी के अंत का इंतज़ार है कब हमारी कहानी का आखरी अध्याय लिखा जाएगा इसी पल के इंतज़ार में हम दोनों जी रहे है ताकि जब अंत हो तब नयी शुरुवात फिर से शौर्य के संग हो . हम तुझे बहुत याद करते है मेरे लाल बस तुझे ही याद करते है . आजा मेरे लाल आजा मेरा बेटा आजा निक्की ...( शरद पंसारी - एक बेबस बाप )
शौर्यपथ विशेष / बिहार में विधान सभा चुनाव की तारीख नजदीक आते ही नौकरियों का अम्बार लग गया तो कही शराबबंदी हटाने के वादे किये जा रहे तो कही दल बदलुओ को सबक सिखाने की बात हो रही है जिस के मन में जो आये वादे पर वादे किये जा रहा है . खैर चुनावी वादों का पिटारा कितना भरा होता है और कितना खाली अब आम जनता भी समझने लगी है और सोंचने पर विवश भी हो रही है . बिहार के चुनाव में तेजस्वनी यादव 10 लाख की नौकरी देने का वादा कर रहे है किन्तु इन नौकरी के वादे में करोडो का भुगतान कैसे होगा इसका कोई जवाब नहीं दे पा रहे है वही भाजपा के राष्ट्रिय अध्यक्ष देश में लगभग 300 आतंकी के प्रवेश की आशंका जता कर भाजपा को जिताने की अपील कर रहे है अब अचानक ये आतंकी कहा से आगये इसका जवाब भाजपा राष्ट्रिय अध्यक्ष ही दे सकते है .
बिहार विधानसभा चुनाव में हो रही रैली को देख कर ऐसा नहीं लगता कि ये वही भारत है जहां अभी कोरोना के मरीज सबसे ज्यादा पाए जा रहे है और लगातार संख्या में बढ़ोतरी हो रही है . सोशल डिस्टेंस का ज्ञान देने वाले नेता सिर्फ टीवी में ही ज्ञान दे रहे है उन्हें पुरे देश में इसका पालन करवाने की अपील की जा रही है किन्तु बिहार और मध्यप्रदेश के उपचुनाव में ये सोशल डिस्टेंस सिर्फ किवदंती बनकर रह गयी है . खैर ये चुनावी वादे है राजनैतिक पार्टी कितना सिद्धांत पर चलती है और कितने वादे पुरे करती है ये भविष्य की गर्त में है क्योकि यहाँ यह भी देखा गया है कि सत्ता के लिए सारे सिद्धांत ताक पर रख दिए जाते है एक दुसरे पर आरोप की छड़ी लगाने वाले नेता सत्ता के लालच में देशभक्त और देशद्रोही की श्रेणी में एक दुसरे को तौलने और पाला बदलने से भी नहीं चुकते ये चलता रहा है और भविष्य में भी चलता रहेगा .
किन्तु इन वादों के बीच देश की वित्त मंत्री ने जो ब्यान दिया उससे देश की जनता को काफी आहात हुई है . बिहार चुनाव के देश की वित्त मंत्री ने अपने चुनावी वादे में कोरोना आपदा की तकलीफ को भी भुनाने में देर नहीं की कुछ समय पहले यही वित्त मंत्री जी ने प्याज की बढ़ती कीमत पर कहा था कि प्याज की कीमत बढऩे पर मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता क्योकि हम प्याज नहीं खाते तब भी उनके इस तरह के ब्यान की काफी आलोचना हुई थी अब एक बार फिर वित्त मंत्री ने भारत के आम जनता के जिन्दगी में तूफ़ान मचने वाले कोरोना बिमारी पर एक ब्यान दे दिया वित्त मंत्री ने कहा कि अगर बिहार में भाजपा की जीत होगी तो बिहार की जनता को मुफ्त में कोरोना वेक्सिन दी जाएगी . वित्त मंत्री जी क्या भारत के सभी नागरिक और बिहार के नागरिक एक ही देश के निवासी नहीं है फिर ये कैसा सत्ता का नशा और कैसी सत्ता की ताकत आप वित्त मंत्री है जनता के द्वारा चुनी जनप्रतिनिधि है देश के लोकतंत्र में एक बड़े पद में विराजमान है आपने पद ग्रहण करते समय कसम खाई थी कि बिना भेदभाव के देश की सेवा करुँगी कहा गयी अब वो कसम .क्या आम जनो की जान की कीमत लगाना सही है . सिर्फ भारत ही नहीं पूरा विश्व कोरोना वेक्सिन का इंतज़ार कर रहा है और आप है कि सत्ता में जीत के बदले वेक्सिन की कीमत भी तय कर दी कि मुफ्त लगेगा या पैसे से लगाया जायेगा खैर आपकी गलती भी नहीं है भारत की विशाल जनसँख्या में अभी भी ऐसे कई लोग है जो आपके इस फैसले को देशभक्ति के रूप में प्रचारित करेंगे चलिए आपकी बात सही हो और बिहार में आपकी सत्ता आ जाये फिर कम से कम एक प्रदेश में तो मुफ्त में वेक्सिन लगवा दीजियेगा बस ये बता दीजिये कि वेक्सिन कब आएगी , क्या अच्छे दिन जैसे इंतज़ार करना पड़ेगा , क्या जिस तरह सालाना 2 करोड़ नौकरी के वादा पूरा होने का इंतज़ार कर रहे उस तरह इन्तजार करना पड़ेगा या सिर्फ जुमलेबाजी है जो भी हो एक बार तो सच बोल दीजिये कि हमारी जिन्दगी बचेगी कि नहीं हम भी उस देश के निवासी है जिस देश में आप वित्त मन्त्री है ...( शरद पंसारी की कलम से )
शौर्य की बाते / मेरा बेटा निक्की उसका जन्म दिन १२ अगस्त को और मेरा जन्मदिन १२ अक्तूबर को किन्तु देखिये कैसा योग है बचपन में जो भूल हुई वही भूल जिन्दगी के कुछ साल इतनी ख़ुशी दे गया कि उस भूल को अपना सौभाग्य समझने लगा और आज वही भूल जिन्दगी भर का दर्द बन गयी जिन्दगी का हर गुजरा कल एक दर्द बनकर उभर जाता है . भूल कुछ यु हो गयी थी कि फ़ार्म में १२ अक्तूबर की जगह १२ अगस्त हो गया और इस तरह १२ अगस्त के दिन जन्मदिन सभी शासकीय दस्तावेज में अंकित हो गए और एक दिन ऐसा आया कि वही १२ अगस्त मेरी खुशियों का सबसे बड़ा दिन हो गया जब मेरा लाल १२ अगस्त २००६ को इस दुनिया में कदम रखा तब से १२ अगस्त और १२ अक्तूबर दो दिन अपने जन्मकी खुशिया मनाने लगा किन्तु आज जब भी इस दिन को याद करता हूँ तो १२ अगस्त याद आ जाता है और मेरा लाल फिर से मेरे सामने खडा हो जाता है एक जिन्दा अहसास की तरह . अब तू ही बता ऐ जिन्दगी मै अपने जन्मदिन की खुशिया कैसे मनाऊ क्या खुदगर्ज बन जाऊ और अपने लाल को भूल जाऊ जिसने मुझे १४ साल खुशिया दी साल में दो बार जन्मदिन मनाने का मौका दिया अब क्या साल में दो बार मौत को गले लगाऊ .
मै तो इतना कमजोर हूँ की वो भी नहीं कर सकता तभी तो मेरा लाल मुझसे दूर हुए २० माह हो गए अब भी जी रहा हूँ खूब मजे कर रहा हूँ दिनभर ऐश करता हूँ पाखंडी हूँ मै जो बेटे के लिए रोता हूँ पर उसके पास जाने से डरता हूँ और इंतज़ार करता हूँ कि कोई ले जाए . चलो आज एक कदम तो आगे बढ़ ही गया हूँ बेटे तक जाने के लिए . कहते है ना सबकी जिन्दगी का समय उपर वाले ने तय किया है और सब को बस तय समय के इंतज़ार में दिन काटना है तो बेटा आज मैंने भी अपनी जिन्दगी के एक साल और काट लिए अब तेरे और करीब आ गया हूँ बस तू कही मत जाना बेटा मेरा इंतज़ार करना मेरे लाल फिर हम एक साथ रहेंगे हमेशा हमेशा के लिए कभी दूर नहीं होंगे मम्मी और मै एक साथ आयेंगे रे . तेरी मम्मी की ख़ुशी तो सिर्फ छलावा है तू तो अच्छे से जानता है ना अब सब तेरे ऊपर है कब हमे अपने पास बुलाता है सिद्धि से तो तू बात करता है बेटा हमसे ही नाराज है जब आयेंगे तो फिर बताना तेरी सारी नाराजगी दूर कर देंगे और एक बार फिर १२ अगस्त और १२ अक्तूबर को खुशियों की बारिश होगी बस अब खुशियों के सावन का इंतज़ार है बेटा वो भी जल्दी ही आ जायेगा बस तू धैर्य रखना . लव यु निक्की ..
शौर्यपथ । निक्की बेटा आज तेरी मम्मी का जन्मदिन है इस दुनिया मे लोग अपने जन्मदिन में खुश होते है खुशियां बांटते है पर बेटा हम तो ऐसे बदनसीब है कि खुशियां एक दरवाज़े से आती है तो दुख के 100 दरवाजे खुल जाते है । जिंदगी खुशियों से आबाद होने के बजाए दुख के सागर में डूब जाती है ऐसी जिंदगी हो गई हमारी । तू जानता है बेटा तेरे बिना एक एक पल मौत के इंतजार में जी रहे है हर पल मर रहे है तेरी मा को बेटा मैं कोई खुशी नही दे पाया कितनी भी कोशिश कर लूं खुशियां देने की खुशी कम दुख ज्यादा दिया । कभी कभी तो लगता है मेरी जिंदगी का कोई मकसद ही नही बेकार इस दुनिया मे जी रहा हूँ और इस सबका कारण तू है तू गया तो हमे भी साथ ले जाता बेटा हम भी तेरे साथ खुशी खुशी चलते लेकिन तू तो छलिया निकला रे अपने पीछे अपनी बहन को छोड़ गया तू तो सब जानता है कि तेरे बिना एक पल जीना भी हजार मौत के बराबर है पर तुझे तो अकेले जाना था और हमे नही लेजाने की सोंच कर सिद्धि को छोड़ दिया अब सिद्धि को कैसे छोड़े हम वो तो मासूम है उसे तो जीने का हक है उसका हक के छीन ले रे । देख ना बेटा तू तो भगवान है तुझे सब मालूम है कि तेरे बिना जिंदगी बंजर है हंसी के पीछे गम का सागर है अब इस भवसागर से पार तू ही लगा सकता है । कुछ ऐसा कर बेटा कि हम एक बार फिर साथ हो जाये तेरे लिए कोई भी काम असंभव नही है तो कुछ कर ताकि तेरी मम्मी के चेहरे में खुशी लौट आये । मैं तो मेरी रत्ना को लाया था पलको में बैठाकर किन्तु उसे कोई खुशी नही दे पाया कांटो के बिस्तर पर सुला दिया फूलों की जगह पथरीले रास्ते पर सफर करवा दिया कैसे करूँ क्या करूँ अब तू ही बता सकता है मेरे लाल तेरी जुदाई सहने की हिम्मत नही है और जिंदगी है कि लम्बी होती जा रही है इतनी लंबी की एक पल सदियों समान लगने लगी है देख न आज फिर खुशियों के रास्ते गम का सागर आ गया हमारी खुशी तुझसे है तेरे बिना जग वीराना आजा बेटा देख आज तेरी मम्मी का जन्मदिन है जो तेरे बिना अधूरा है तू है तो सब कुछ तू नही तो कुछ भी नही क्या तू अपनी मम्मी को हैप्पी बर्थडे नही बोलेगा मेरे लाल आजा मेरे लाल तेरा अभागा पापा तेरा इंतज़ार कर रहा है खुशियों का इंतजार कर रहा है इस पल को एक बार फिर खुशियों में बदल दे इस वीरान जिंदगी में बहार ले आ बेटा जो तेरे बिना अधूरा है अपनी मम्मी के लिए आजा निक्की आजा निक्की तेरा अभागा बाप विनती कर रहा आजा बेटा छोटी बहन के लिए आजा मम्मी के लिए लौट आ बेटा
शौर्यपथ लेख । कोरोना एक दहशत का नाम है अभी इस दुनिया मे इसका कोई इलाज मौजूद नही है ऐसे में दूरी और सफाई ही एक मात्र इलाज रह गया । इतनी दहशत की टेस्ट कराने में भी लोगो को भय हो रहा ऐसी खतरनाक बीमारी की पॉजिटिव आने से भला किसी को खुशी हो सकती है क्या किसी बेटे के पॉजिटिव रिपोर्ट आने से माँ की जिंदगी के दुख भरे दिन खुशियों में बदल सकते है । किंतु कहते है ना कि जिंदगी के हर मोड़ पर सुख पर दुख पर कोई न कोई सीख मिलती ही है बस ग्रहण करने वाला चाहिए ऐसी ही एक घटना ने एक माँ के एकांत को दूर कर दिया । 10 दिन की जद्दोजहद के बाद सुरेश अपनी कोरोना नेगटिव की रिपोर्ट हाथ मे लेकर अस्पताल के रिसेप्शन पर खड़ा था। आसपास कुछ लोग तालियां बजा रहे थे,उसका अभिनंदन कर रहे थे। एक जंग जो जीत कर आया था वो। लेकिन सुरेश के चेहरे पर बेचैनी की गहरी छाया थी। गाड़ी से घर के रास्ते भर उसे याद आता रहा "आइसोलेशन" नामक खतरनाक दौर का संत्रास। न्यूनतम सुविधाओं वाला छोटा सा कमरा,अपर्याप्त उजाला,मनोरंजन के किसी साधन की अनुपलब्धता,ये सब था वहां। कोई बात नही करता था ना नजदीक आता था। खाना भी बस प्लेट में भरकर सरका दिया जाता था। कैसे गुजारे उसने 10 दिन वही जानता था। बस! मन मे कुछ ठोस विचार और उस का चेहरा संतोष से भर गया। घर पहुचते ही स्वागत में खड़े उत्साही पत्नी,बच्चों को छोड़ कर सुरेश सीधे घर के एक उपेक्षित से कोने के कमरे में गया,माँ के पावों में पड़कर रोया और उन्हें ले कर बाहर आया। पिता की मृत्यु के बाद पिछले 5 वर्ष से एकांतवास/आइसोलेशन भोग रही माँ से कहा की आज से तुम हम सब एक साथ एक जगह पर ही रहेंगे। माँ को लगा बेटे की नेगटिव रिपोर्ट उन की जिंदगी की पॉजिटिव रिपोर्ट हो गयी है।
शौर्यपथ लेख / कंगना रनौत एक मशहूर हिरोइन देश की सबसे ज्यादा चर्चित महिला जो कभी ड्रग्स लेती थी , क्लबो में डांस करती थी , बीफ खाती थी आज फ़िल्मी दुनिया की पोल खोल रही है अपने आप को झाँसी की रानी , तो कभी अबला , तो कभी घर दुबारा बनाने के पैसे नहीं है की बात करने वाली एक ऐसी ज्ञानवान महिला जो चुनाव में उस जगह भी शिवसेना के उम्मीदवार को मज़बूरी में वोट डाल दी जहां शिवसेना का उम्मीदवार ही नहीं खडा था , एक ऐसी महिला जो अपने आप को महिलाओ की खैरख्वा बताती है जो इन्साफ की लड़ाई के लिए किसी से भी भीड़ जाती है यहाँ तक की मुंबई महानगर पालिका की कार्यवाही के लिए महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री को दोषी मानती है और मुबई को pok जैसे शब्द से तुलना करने में भी पीछे नहीं हटती है , एक ऐसी महिला जो अपने अवैध रूप से बने घर को राम मंदिर से जोडती है , एक ऐसी बहादुर महिला जिसे केंद्र सरकार ने वाई श्रेणी की सुरक्षा दी है क्योकि वो महाराष्ट्र सरकार पर आरोप लगा रही है क्योकि जिसने अवैधानिक रूप से अपने कार्यालय का निर्माण किया है जिस पर मामला अब अदालत में विचाराधीन है ऐसी महान महिला ने वर्तमान में देश के सबसे बड़े काण्ड हाथरस काण्ड में घटना के १६ दिन बाद मृत मासूम के लिए इन्साफ की आवाज़ उठाई .
अब भई कंगना ने आवाज़ उठाई है तो बात तो बड़ी होगी ही और चर्चा तो होगी ही क्योकि वो कंगना है देश की सबसे मशहूर सेलिब्रिटी जिसे तुरंत वाई श्रेणी की सुरक्षा मिल गयी उस कंगना ने मनीषा के साथ हुए उत्तर पप्रदेश की बेटी हाथरस जिले की रहने वाली मासूम मनीषा के साथ हुए घटना पर १६ दिन बाद अपना आक्रोश जताया . किन्तु इस बार आक्रोश जताने का अंदाज़ कुछ जुदा था जो कंगना अपने कार्यालय के टूट जाने पर सीधे महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पर आरोप लगाईं उस कंगना ने मनीषा के साथ हुए दुर्दांत हादसे पर एक ट्वीट किया उसके ट्वीट पर नज़र डालते है देखिये कंगना जी ने क्या कहा
"अपना गुस्सा ट्विटर पर ज़ाहिर किया. उन्होंने लिखा, “मुझे हमारे योगी आदित्यनाथ पर पूरी तरह से विश्वास हैं. उन्होंने जिस तरह से प्रियंका रेड्डी के दोषियों को घटनास्थल पर ही गोली मारने का हुकुम दिया था, वैसे ही हाथरस भी उनसे इस न्याय की उम्मीद कर रहा है.”

ट्वीट को ध्यान से पड़ने वालो को ये बात तो साफ़ समझ आ जाएगी की इतने बड़े काण्ड और १५ दिन बाद उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री जिन्होंने घटना को संज्ञान में तब लिया जब हमारे देश के यशस्वी , लोकप्रिय प्रधानमन्त्री नरेन्द्र दामोदर दास जी मोदी ने संज्ञान लेने की बात कही . वो तो भला हो हमारे प्रधानमंत्री जी का जिन्होंने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री को घटना की जानकारी दे दी और कार्यवाही की बात कही वरना अगर कही प्रधानमंत्री जी किसी राजनितिक यात्रा पर विदेश प्रवास में होते और किसी कारणवश कुछ दिन और बीत जाते तो ना जाने क्या होता खैर जो हुआ अब उस पर जांच होगी क्योकि अब उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री भारत के सच्चे देशभक्त मोहमाया से दूर श्री योगी आदित्यनाथ जी ने मामले को संज्ञान लिया और १५ दिन बाद कड़ी कार्यवाही की बात की तो ऐसे में १५ दिन तक मौन रहने वाली आदरणीय कंगना जी भला कैसे चुप रहती एक ट्वीट तो बनता ही है और दे मारा एक ट्वीट और करने लगी इन्साफ की उम्मीद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी से . इन्साफ तो खैर अब होगा ही मनीषा के साथ हुए कृत्य का , मनीषा की मृत देह के साथ हुए कृत्य का और उस कृत्य का भी जिसमे एक माँ को जिसने ९ माह अपनी कोख में जिस बेटी को पाला और दुनिया से १९ साल तक बचा के रखा जिसका अंतिम दर्शन करना भी नसीब नहीं हुआ चंद पुलिस वालो के कारण उन पुलिस वालो के कारण जो ला एंड आर्डर की रक्षा करते है जिसका नियंत्रण प्रदेश के मुखिया के हाथ में है किन्तु यहाँ कंगना जी ने प्रदेश के मुखिया से उम्मीद जाहिर की इन्साफ की अपनी ही नियत का दोहरा चेहरा दिखा दी कंगना ने अरे कंगना जी जब आपका कार्यालय टुटा तो वो कार्य बीएमसी का था तब क्यों नहीं आप प्रदेश के मुखिया से इन्साफ की उम्मीद करते हुए गुहार लगाईं क्या महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री ने आपका बंगला तोडा था जिस तरह मनीषा के साथ हुए हादसे में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री की कोई गलती नहीं है उसी तरह आपका आशियाना तोड़ने में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री की कोई गलती नहीं है . अगर आप सोंचती है कि प्रदेश के मुखिया की गलती है तो यह बात दोनों ही प्रदेश में लागू होगी अगर आप घटना की ही तुलना कर लेती तो घर टूटना और अस्मत लूटना दोनों में जमीन आसमान का अंतर है घर तो फिर बन जायेगा किन्तु क्या मनीषा वापस आएगी . दुनिया की कोई ताकत अब उसे वापस नहीं ला सकती . ऐसी दोहरी निति से आपने स्वयं ही साबित कर दिया की तलुवे चाटो और मौज करो ......
( शरद पंसारी - संपादक शौर्यपथ दैनिक समाचार )
शौर्यपथ लेख । कंगना एक ऐसा नाम जो भारतीय मीडिया की trp बनी हुई है अपना ईमान बेचकर कंगना को इंसाफ दिलाने का ढोंग रचने वाले महिलाओं के सम्मान की बात करने वाले गंदी राजनीति के सेनापतियों क्या कंगना के साथ कोई गलत हुआ जो ऐसे चीख चीख कर इंसाफ की दुहाई देने निकले या सिर्फ सत्ता के लिए ही सारी गन्दी राजनीति करने की सोंच ली है । जाहिलो अगर कंगना के साथ गलत हुआ है तुम्हारे हिसाब से तो क्या मनीषा के साथ गलत नही हुआ कंगना का तो हिसाब कोर्ट में हो जाएगा दो चार फिल्में करेगी तो बंगला एक बार फिर बन जायेगा किन्तु क्या मनीषा वापस आएगी क्या मा की सुनी गोद फिर भर जाएगी । कंगना की महाराष्ट्र सरकार से जंग शुरू हुई और y श्रेणी सुरक्षा मिल गयी वो भी तुरंत , कोर्ट में मामला पहुंच गया वो भी तुरंत , दलाल मीडिया की फौज पहुंच गई कंगना के आस पास वो भी तुरंत अपने आप को झांसी रानी कहने लगी जिसे घोड़े में बैठने तक की जानकारी नही अपने आप को नशा के विरुद्ध एक नायिका पेश करने लगी जो बीफ खाती है जो ड्रग्स लेती है यह बात उस कंगना ने ही स्वीकार आज वही अपने को एक लड़ाकू महिला घोषित कर रही । कंगना जो कर रही अपने लिए कर रही किन्तु कंगना को इंसाफ देने की बात करने वाले अब कहा है जब एक मासूम के साथ अत्याचार हुआ और जिंदगी और मौत के जंग में मौत की जीत हो गई अब क्यो बोल नही फुट रहे महिलाओं के सम्मान की बात करने वाले क्या उनकी नजर में मनीषा का कोई अस्तित्व नही क्या मनीषा देश की बिटिया नही । मनीषा के मामले में क्यो नही बोल फुट रहे उन लोगो के जो कंगना को इंसाफ दिलाने निकले थे यहाँ तक अपनी प्रोफाइल पर भी कंगना की फ़ोटो लगा रखी उस कंगना की जिसे यह भी याद नही कि एक साल पहले उसने किस पार्टी को वोट दिया था आज उनके लिए कंगना बड़ी हो गई और मनीषा का कोई अस्तित्व नही राह गया । शर्म आती है ऐसे देशभक्तों पर हिन्दू होने का अभिमान करने वाले तलुवे चाटने वालो पर जो 10 दिनों में एक बार भी मनीषा के लिए इंसाफ की दुहाई नही दे रहे । अरे भाई वो मनीषा एक मासूम बच्ची थी जिसे 4 दरिंदो ने मारा है एक झटके में नही टिल टिल पल पल तड़फा कर मारा है और वह रे हिंदुत्व की राग अलापने वाली सरकार एक हिन्दू लड़की को एक कुवारी हिन्दू लड़की की मृत देह को परिजनों की अनुमति के बिना रात में अंतिम संस्कार कर दिए और पूरी प्रशासन मौन है । योगी जी आप तो हिंदुत्व का झंडा उठाते हो क्यो हो गया ऐसा जघन्य कांड आपके राज में माना आपका कोई दोष नही मासूम के बलात्कार की घटना से और ना ही आपकी सरकार का कोई दोष किन्तु घटना के बाद जो कार्यवाही हुई क्या वो त्वरित कार्यवाही की श्रेणी में आता है घटना के बाद मृत शरीर का जो अपमान हुआ वो हिन्दू भावना को आघात नही पहुंचता । कुवारी कन्या को हम हिन्दू पूजते है देवी का रूप मानते है कहते है जिस बाप के सौ भाग्यो के पुण्य का नतीजा सौभाग्यवती कन्या का रूप में घर मे प्रवेश करता है आज उस बाप के दिल मे क्या गुजर रही होगी जिसकी मासूम निरपराध बेटी के अंतिम दर्शन और दाह संस्कार का भी अवसर नही मिला आपके राज में क्या ऐसा ही होता है राम राज्य अगर ऐसा राम राज्य है तो नही चाहिए मुझे राम राज्य जहां एक हीरोइन की अवैध इमारत टूटने पर उसे देशभक्त घोषित कर दलाल मीडिया उसके तलवे चाट रही हो और एक मासूम की मौत पर कन्या को देवी का रूप मानने वाले दिखावटी लोग एक शब्द भी नही बोल रहे । एक हथनी की क्रूरता से मौत हुई तो कुत्ते जैसे भौकने वाले सोशल मीडिया की गली में आ कर चिल्लाने लगे वही जब एक मासूम की क्रूरता से मौत हुई तो सारे मौन है क्या ऐसे लोगो को ही समाज दोगला कहता है । मैं एक साधारण सा इंसान हूँ एक बेटा और एक बेटी का बाप हूँ मै कुछ नही कर सकता किन्तु दिल से उस मासूम के पिता के साथ हूँ । मासूम मनीषा को इंसाफ मिले या ना मिले किन्तु उस मासूम के पिता को जिंदगी भर का दर्द पहले बलात्कारियों ने दिया और उसके बाद प्रशासन के उन अधिकारियों ने दिया जिन्होंने मासूम मनीषा का बिना विधान के आधी रात में अंतिम संस्कार किया । ( शरद पंसारी - संपादक शौर्यपथ दैनिक समाचार )
शौर्यपथ लेख । पत्रकार यानी कि चौथा स्तंभ जो कि अब नाम का ही चौथा स्तंभ है । कौन सा पत्रकार सुरक्षित रहेगा कौन सा पत्रकार असुरक्षित अब ये सत्ता के ऊपर निर्भर हो गया है । अगर पत्रकार सत्ता के अवैधानिक कार्यो को उजागर कर तो वह पत्रकार ज्यादा समय तक सुरक्षित नही हो सकता । आज पत्रकार को सुरक्षित रहना है तो सत्ता के हिसाब से चलना पड़ता है तभी पत्रकार सुरक्षित रह सकता है ये छोटे और बड़े बेनर के पत्रकार को अच्छे से मालूम है । किंतु आज भी ऐसे पत्रकार है जो 1947 से पहले की शैली अपना रहे है जब देश गुलाम था जब अंग्रेजो का शासन था तब के पत्रकार ऐसे थे जो कलमवीर थे और खुल कर अपनी बात लिखते थे गुलाम भारत मे भी पत्रकार उतने असुरक्षित नही थी जितने आज है । आज अधिकतर बेनर किसी ना किसी राजनैतिक पार्टी की विचारधारा के आगोश में है अगर वह विचारधारा सत्ताधारी के अनुसार हो तो सुरक्षित ही नही समृद्ध पत्रकार की श्रेणी में गिना जाएगा । ऐसा नही है कि सिर्फ छत्तीसगढ़ में ये हालात है पूरे देश मे यही आलम है तभी तो पत्रकार या तो किसी समिति के अध्यक्ष है किसी सदन के सदस्य है या फिर किसी दल के अघोषित प्रचारक । देश मे गरीबी , शिक्षा , स्वास्थ्य , रोजगार के मुद्दे अब गायब हो गए है उसकी जगह ले ली है बेतुकी बातों ने फला हीरोइन कितने बार कपड़े बदली कितने बार रोइ कितने बार हंसी क्या पहनी क्यो पहनी , फला आदमी देश भक्त है या समाज का दुश्मन ये फैसला कुछ चापलूस पत्रकार अपने आकाओं को खुश करने के लिए उछलते रहते है और खुद को न्याय पालिका तक समझते है । ऐसी ऐसी बाते सामने लाते है कि कभी कभी ऐसा लगता है देश की इंटेलिजेंस एजेंसी सिर्फ टाइम पास कर रही असली काम यही कर रहे एक प्रश्नवाचक चिन्ह और सूत्र की बात कर किसी को बजी देशद्रोही , समाज का दुश्मन , देशभक्त , समाज सुधारक तक का तमगा दे देते है । कुछ ऐसे ही पक्षपात और एकतरफा स्थिति के कारण भूपेश सरकार ने चुनाव के समय पत्रकार सुरक्षा कानून की बात की थी और इस चुनावी वादों को मूर्त रूप देने का आश्वासन दिया था । आज भूपेश सरकार को सत्ता संभाले लगभग दो साल हो गए किन्तु आज भी छत्तीसगढ़ में पत्रकार सुरक्षित नही है जब भी पत्रकारों पर कोई हमला होता है तो इसे आपसी रंजिश की बात कह कर मामले को दूसरा रूप देने की बात चालू हो जाती है । ऐसे कई मामले सामने आ भी चुके है लेकिन हम वर्तमान मामले की ही बात करे तो कमल शुक्ला के साथ जिस तरह जी घटना हुई उससे एक बार फिर पत्रकार समूह को सोचने पर मजबूर कर दिया कि क्या सरकार गठन के दो साल बाद भी पत्रकारों के लिए सुरक्षा कानून पर कोई ठोस पहल होगी । कई अखबारों में गृह मंत्री का बयान प्रकाशित हुआ कि दोनों पार्टी में वादी परिवादी में जो भी गलत होगा उस पर कार्यवाही होगी गृह मंत्री का यह बयान एक दक्ष राजनैतिक बयान था जिसमे उनके द्वारा पत्रकारों की सुरक्षा की बात पर कोई जवाब नही दिया गया वही दूसरी तरफ कांग्रेस के प्रवक्ता ने कहा कि घटना को अंजाम देने वालो को पार्टी से निष्काषित कर दिया गया क्या निष्कासन ही सही रास्ता है क्या कांग्रेस के मुखिया का वादा स्थानीय कांग्रेस संगठन भूल गया । वीडियो में देखने से साफ लग रहा है कि कमल शुक्ला पर आक्रमण करने वाला किस विश्वास के साथ बात कर रहा था जैसे कि शहर की प्रशासनिक व्यवस्था पर उसका ही राज हो और जब fir दर्ज हुई तो एक शिकायत कमल शुक्ला के खिलाफ प्रेषित कर दी ताकि मामला बराबर का हो जाये । हा भई हो भी सकता है क्योंकि सरकार के एक अपरोक्ष अंग हो सत्ताधारी दल के सक्रिय सदस्य हो इसलिए किसी बात का डर नही आज जब fir दर्ज हुई तो याद आ गया कि कमल शुक्ला ने पूर्व में कभी जान से मारने की धमकी दी थी । चलो याद तो आया पर तब क्यो मौन थे जब जान से मारने की धमकी दी थी तभी पहुंच जाते कानून के दरवाजे और शिकायत कर देते तब किस बात ने रोक रखा था महोदय आपको । एक पत्रकार को सरे आम मार कर कौन सी बहादुरी दिखा दिए पत्रकार ने तो कलम से लड़ाई लड़ी तुम भी कलम से लड़ लेते भाई तुम्हे तो किसी ने नही रोका था शिकायत से । आज जब चौतरफा वीडियो वायरल हुआ तो सब याद आ गया । वैसे तुम भी सही हो महोदय क्योकि पत्रकार एक नही है यहां तो पत्रकारिता में भी राजनीति जगजाहिर है पुराने और वरिष्ठ पत्रकार पर हमला होता है तो बवाल खड़ा हो जाता है किंतु जब मझोले और छोटे पत्रकार पर कोई विपदा आती है तो यही कुछ वरिष्ठ पत्रकार होते है जो समर्थन तो नही करते उल्टे विरोध के स्वर निकलते है । ऐसा नही कि सभी वरिष्ठ पत्रकार ऐसा करते है कुछ ऐसे वरिष्ठ आज भी है जो युवा पीढ़ी का दिल से स्वागत करते है और सही गलत के बारे में बताते है । आज जो भी घटना पत्रकारों के साथ हो रही उसमें कुछ हद तक जिम्मेदार पत्रकार भी है एकता में बल की बात तो करते है पर एकता में अभी भी अभाव है । आज पत्रकार अगर एक हो जाये तो मारपीट की बात तो दूर कोई तिरछी आंख भी नही करेगा । इस तरह की घटना से शासन को , पत्रकारों को भी सीख लेने की ज़रूरत है क्योंकि अगर देश के चार स्तम्भ में से एक स्तम्भ पत्रकार है तो उनकी मजबूती भी सबसे ज्यादा जरूरी है । बस एक बार दिल मे हांथ रखकर ज़रूरत है उस कल्पना की जिसमे ये देखे की तीन स्तम्भ के सहारे देश का लोकतंत्र कैसे और कब तक खड़ा रहेगा ...( शरद पंसारी - संपादक दैनिक शौर्यपथ समाचार पत्र )
Feb 09, 2021 Rate: 4.00
