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March 10, 2026
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शौर्य की बाते ( सम्पादकीय )

शौर्य की बाते ( सम्पादकीय ) (226)

शौर्यपथ लेख / शहर में लॉक डाउन की घोषणा हुई और इस घोषणा से पहले जिला प्रशासन ने आम जनता की राय ली ऐसा सुनने में आया जब इस बात की गहराई तक गए तो पता जला कि एक बैठक हुई और शहर के जनप्रतिनिधि , व्यापारी संगठन और जिला प्रशासन के बड़े अधिकारियों ने मिल कर ये फैसला लिया कि शहर में एक बार फिर लॉक डाउन होना चाहिए और बहुत ही सख्त इतना सख्त कि हवा भी इधर से उधर ना हो सके सभी दुकाने बंद रहेंगी , सभी पेट्रोल पम्प बंद रहेंगे , सब्जी दूकान बंद रहेगी , राशन दूकान बंद रहेगी . सुनकर अच्छा लगा कि चलो शासन ने कोई सख्त कदम उठाया और जनता के हित की बात सोंची . पर क्या किसी ने भी यह सोंचा कि इन १० दिनों के सख्त लॉक डाउन और उसमे भी ७ दिनों का अति सख्त लॉक डाउन का क्या परिणाम निकलेगा . और आम जनता मिडिल क्लास जनता , गरीब तबके के लोगो पर इसका क्या असर पड़ेगा . गरीब और मध्यम वर्ग की पीड़ा क्या जनप्रतिनिधि समझते है , क्या अधिकारी समझते है , क्या व्यापारिक संगठन के मठाधीश समझते है . मेरे नजर से तो कोई भी नहीं समझता इनमे से .
चलिए आप ही अपने दिल पर हाँथ रखकर बताइये फैसले लेने वाले महोदय १० दिन तो क्या अगर १०० दिन भी लॉक डाउन रहेगा तो भी शहर के किसी भी निर्वाचित जनप्रतिनिधि को कोई परेशानी नहीं आएगी ना ही उनके घर में राशन की दिक्कत होगी और ना ही किसी अन्य तरह की परेशानी १०० दिन भी अगर घर पर रहेंगे तो भी उनकी सेहत पर कोई असर नहीं पड़ेगा . ऐसी ही हालत व्यापारी संगठन की है शहर के व्यापारी संगठन वालो में से कोई ऐसा व्यापारी हो तो हमे जरुर बताइए जिसे १० तो क्या अगर १०० दिन भी लॉक डाउन रहे और घर के अंदर रहना पड़े तो कितने होंगे जिन्हें दो वक्त की रोटी के लिए मोहताज़ होना होगा . यहाँ बात नफ़ा नुक्सान की नहीं दो वक्त की भूख मिटाने की हो रही है . ऐसी ही हालत बड़े बड़े पद में विराजमान शासकीय अधिकारी की ही बात करे तो एक भी ऐसा अधिकारी बता दीजिये जिन्हें दो वक्त पेट की आग शांत करने की चिंता होगी . मेरी नजर में इनमे से कोई नहीं है .


क्या शहर में सिर्फ गणमान्य नागरिक ही रहते है जिनकी राय ली जाती है क्या शहर की आम जनता के जीवन का कोई मोल नहीं है ये वही गणमान्य नागरिक है जो अपने व्यापर में कई बार शासन के नियमो की धज्जी उड़ाते हुए व्यापार करते है और ये देते है अपनी राय कि शहर में लॉक डाउन होना चाहिए क्या कोई ऐसा जनप्रतिनिधि है जो गरीब जनता की बात सुने तकलीफ सुन कर समस्या का हल करे यहाँ तो स्थिति इसी है कि जनप्रतिनिधि ज्ञान पेलने पर माहिर है क्योकि पेट के आग की इन्हें चिंता नहीं है अपनी नाकामी हुपाने और झूठी वाहवाही लुटने में ही इन्हें आत्म संतुष्टि मिलती है .
क्या फैसला लेने वाले मठाधिशो ने कभी सोंचा है कि १० दिन के लॉक डाउन में उस परिवार का क्या होगा जो रोज मजदूरी करता है और रोज घर में दो वक्त का खाना खाता है क्या उस परिवार का सोंचा है जो घर में बेरोजगार बैठा है , क्या उस व्यक्ति की पीड़ा का आभास है इन्हें जो अपनी तकलीफों के बावजूद इस लिए काम करता है कि रात को अपने परिवार को दो वक्त की रोटी दे सके . साहब पेट की आग क्या होती है फैसले लेने वाले को कभी अहसास ही नहीं है छोटी छोटी जरुरत को भी ना पूरी करने वाला इन १० दिनों में कैसे एक एक दिन गुजारेगा इस बात का अहसास एसी कमरे में हॉट काफी और कोल्ड काफी पीने वालो को यक़ीनन नहीं होगा इनके लिए तो १० दिन एक टार्गेट है क्योकि सारी सुविधाए , सारी शक्तियों के बाद भी ये महामारी से लड़ने के लिए कोई रास्ता तो नहीं निकाल रहे जिसे जनता का हित हो अपितु यही रास्ता निकाल लिए कि १० दिन घर में आराम करो . अरे साहब कौन १० दिन घर में आराम करेगा गरीब व्यक्ति १० दिन ऐसे बिताएगा जैसे एक एक पल सजा काट रहा हो और नजरो के सामने परिवार के सदस्यों की जरुरत को पूरी न कर पाने की पीड़ा सहन करते हुए ११ वे दिन का इंतज़ार करते हुए एक एक पल गिनता रहेगा और दिल से उन लोगो को बद्दुआ देगा जो जो इसके कारण है क्योकि १० दिन शासन के नियम को मानने वाला यही गरीब परिवार होता है इन १० दिनों की पीड़ा का अहसास अगर करना है तो आप रहो अपने आलिशान बंगले में किन्तु साथ यह भी करो कि घर से दो वक्त की रोटी के सारे इंतजाम हटा दो और देखो फिर कैसे आपको भी ये १० दिन १० साल जैसे लगेंगे .


चलिए साहब आप लोगो का फैसला सर आँखों पर ये १० दिन आपके आदेश अनुसार घर पर किन्तु क्या इन दस दिनों के बाद आने वाला समय सामान्य हो जाएगा क्या १० दिनों बाद जो भीड़ बाजार में उतरेगी उसे नियंत्रण कर पायेंगे , १० दिनों बाद जो वातावरण निर्मित होगा उससे क्या कोरोना और विस्फोट नहीं लेगा क्या १० दिनों के लॉक डाउन के बाद सब सामान्य हो जायेगा अगर ऐसा है तो १० क्या आप १५ दिन कर दो लॉक डाउन किन्तु उसके बाद भी अगर स्थिति सामान्य नहीं होगी तो क्या फैसले लेने वाले गणमान्य शहर की जनता के सामने ये कबुल करेंगे कि हमारा फैसला गलत था . हमे मालूम है नहीं करेंगे क्योकि आप लोगो से गलती नहीं होती साहब गलती तो गरीबो से होती है कानून तो गरीबो के लिए है , सारे नियम गरीबो के लिए है अगर आप के फैसले को सफलता मिलेगी तो बड़े बड़े प्रोपोगंडा करके अपनी कामयाबी बताएँगे किन्तु असफल होते ही सारा दोष एक बार फिर गरीब जनता के उपर लगा कर अपनी बुद्धिमता का परिचय देंगे क्योकि आप तो धरती के भगवन बन गए है किन्तु साहब कभी दिल से सोंचना इस दुनिया के बाद भी एक दुनिया है जहा आपका रुतबा नहीं आपके कर्म काम आते है और जिसके दरबार में कोई राजा नहीं होता कोई रंक नहीं होता सब एक सामान होते है और कर्मो का हिसाब देते है उस दरबार में ही सबका निष्पक्ष फैसला होता है . साहब आप लोगो के फैसले शिरोधार्य बस फैसले लेते समय आम जनता की तकलीफों के बारे में आम जनता से ही सवाल कीजिये ख़ास जनता क्या जाने आम जनता की तकलीफ अब तो बस यही दुआ है कि ये १० दिन पल पल के हिसाब से निकल जाए क्योकि पल पल का हिसाब ऍम जनता और गरीब जनता को ही करना है और करेगा भी क्योकि यही वो जनता है जो कानून का सम्मान करती है नियमो का पालन करती है लोकतंत्र की रक्षा करती है एक समाज के निर्माण में अपना अहम् योगदान देती है और वैश्विक महामारी से कही ज्यादा इस बात की चिंता में लीन रहती है कि परिवार को दो वक्त की रोटी कैसे नसीब हो ...( शरद पंसारी - संपादक दैनिक शौर्यपथ समाचार पत्र )

शौर्यपथ लेख / कृषि बिल जिसे पास करवाने के लिए मेरी नजर में मत विभाजन होना था नहीं हुआ संख्या बल के आधार पर भारत के सबसे बड़े बिल को पास कर दिया गया . कृषि बिल पर कौन राजनीती कर रहा ये हमारा मुद्दा नहीं है मुद्दा ये है कि कृषि बिल को जो कि किसानो के लिए एक महत्तवपूर्ण बिल है क्योकि भारत को कृषि प्रधान देश कहा जाता है ऐसे में बिल पास करवाने का जो तरीका निकाला गया क्या हो सही था . क्या संख्या बल के दम पर चुने हुए सांसद बिना किसी की राय लिए कृषको के भाग्यविधाता बनने की कोशिश नहीं कर रहे है . इतने बड़े विधेयक को पास करने की इतनी जल्दबाजी क्यों की गयी क्या यही भारत का लोकतंत्र है जहा संख्या बल के दम पर विपक्ष को दबाया जा रहा है . इस बिल पर कौन राजनीति कर रहा है सत्ता पक्ष या विपक्ष ये अलग मुद्दा है किन्तु यहाँ जिस तरह नियमो की अनदेखी की जा रही है क्या ये एक नए प्रथा को जन्म नहीं दे रहा है . चलिए ये मान लिया जाए कि कृषि बिल किसानो के हित का है तो सरकार इस बात को लिखित में क्यों नहीं दे रही है कि किसानो को उनकी फसल का न्यूनतम समर्थन मूल्य मिलेगा . संसद में इस बात को ऑन रिकार्ड क्यों नहीं स्वीकार कर रही है कि किसानो को समर्थन मूल्य ( न्यूनतम मूल्य ) प्राप्त होगा . चलो मान लिया जाये कि मोदी सरकार किसानो के हित के लिए आगे बढ़ रही है तो इस बात में आखिर सरकार को परेशानी क्यों हो रही है संसद में लिखित में न्यूनतम समर्थन मूल्य की बात को स्वीकार करने में . आज राज्यसभा में सबको यह बात तो दिखी कि किस तरह से सांसदों का उग्र व्यवहार था किन्तु ये कोई क्यों नहीं देख रहा है कि आखिर इतने उग्र क्यों हुए सांसद कि उन्हें उप सभापति के चेयर तक जाना पडा रुल बुक फाड्नी पड़ी और माइक से छेड़खानी करने की नौबत आयी . चाहे कोई भी स्थिति हो इस तरह का व्यवहार निंदनीय है किन्तु क्या ये सही है कि रुल बुक के अनुसार अगर कोई भी सांसद किसी बिल के लिए मत विभाजन की मांग करता है तो सदन के सभापति / उपसभापति को नियमानुसार सदन के सदस्यों की मांग को माननी पड़ती है और मत विभाजन की प्रक्रिया निभानी होती है किन्तु यहाँ क्या हुआ एक से ज्यादा सदस्य मत विभाजन की मांग करते रहे रुल बुक के अनुछेद की याद दिलाते रहे सदन के लिए बनाए गए नियमो के अनुसरण की बात करते रहे किन्तु सदन के अनुछेद को नहीं माना गया . जब सदन के अनुछेद को नहीं माना जा रहा है तो फिर रुल बुक का क्या औचित्य शायद यही पीड़ा लेकर सदन के सदस्य / सदस्यों ने रुल बुक को फाड़ दिया होगा खैर रुल बुक को फाड़ने वाले और सदन के नियमो की अवहेलना करने वाले सांसदों को एक हफ्ते के लिए सस्पेंड कर दिया गया है किन्तु की सिर्फ सदस्यों की ही गलती हुई इस सारे घटना क्रम में और किसी की गलती नहीं है . क्या सदन में संख्या बल है तो जंगल राज की तरह व्यवहार होगा सरकार का . लोकतंत्र में सर्व सम्मति का उच्च स्थान है किन्तु साथ ही विपक्ष की बात को सुनने का और निराकरण करने की परम्परा भी रही है किन्तु क्या वर्तमान स्थिति में ऐसा हो रहा है कोई भी बात स्पष्ट रूप से आखिर क्यों नहीं कही जा रही है सदन के बाहर जिस बात के वादे किये जा रहे है वही बात सदन के अंदर कहने में आखिर क्या परेशानी . अगर मन साफ़ है और नियत सही है तो सदन के अंदर भी उसी बात को कही जा सकती है जिसे बाहर बार बार सफाई देने के लिए कहा जा रहा है .


कृषि बिल में आखिर ऐसी क्या बात है जो किसानो को तो परेशान कर रही है साथ ही सरकार के घटक दल भी विरोध कर रहे है किन्तु यहाँ एक बार फिर संख्या बल का नशा सर पर होने का दंभ दिख रहा है जिसके कारण यह भी नहीं दिख रहा है कि सालो पुरानी साथी पार्टी की नारजगी का भी कोई असर सरकार पर नहीं पड़ रहा है . आज भले ही सारी बाते आपके पक्ष में हो किन्तु ये समय है यहाँ इंदिरा गांधी जैसी सरकार को भी धुल चाटनी पड़ी है राजनितिक के मैदान में . इस देश में ऐसे ऐसे राजनितिक कारनामे हुए है कि जब सारा देश मोदी के पक्ष में था तब दिल्ली विधान सभा में भाजपा को मुह की खानी पड़ी , छत्तीसगढ़ में स्थिति बदतर हुई , सत्ता के कारण शिवसेना - भाजपा में दरार हो गयी - सत्ता के खेल में जनता की पसंद को दरकिनार कर मध्यप्रदेश , हरियाणा , गोवा , कर्णाटक ,बिहार में कैसे सरकार बनी ये सभी ने देखा यहाँ कितने बार लोकतंत्र की हत्या हुई इस पर सब मौन रहे .


कृषि बिल से सरकार का कहना है कि इससे किसानो को बहुत लाभ होगा और विपक्ष का कहना है कि नुक्सान होगा . किसानो को क्या और कैसे फायदा होगा ये किसान को समझाने की जिम्मेदारी बिल पास करवाने वालो की होती है / सरकार की होती है आखिर सरकार क्यों नहीं किसानो के शंकाओ का समाधान कर रही . सबसे बड़ा सवाल ये है कि क्या मर्यादा तोड़ने की सारी जिम्मेदारी सिर्फ विपक्ष की होती है सत्ता पक्ष की नहीं होती ताली एक हाँथ से नहीं बजती और यही हाल कल संसद में हुआ . कल के व्यवहार से ऐसा प्रतीत हो रहा था कि सरकार के बिल को पास करवाने के लिए प्रश्नकाल को भी दफन करने का फैसला क्या सही है आखिर उपसभापति ने विपक्ष की मांग को भी क्यों नहीं माना , प्रवर समिति में भेजने की मांग को भी क्यों नहीं माना क्या ये निति संगत है . कृषि बिल संसद में ध्वनी मत से पास हुआ किन्तु संसद फेल हो गया . हाउस रुल 252 के अनुसार कोई भी सदस्य चाहता है या चेयरमेन के फैसले को चेलेंज करता है तो रुल 252 के तहत मत विभाजन का आदेश देना होता है किन्तु जिस तरह से कल की कार्यवाही हुई उससे साफ सन्देश जाता है कि सरकार किसी भी तरह से बिल उसी दिन पास कराना चाहती थी और हुआ भी यही कृषि बिल ध्वनी मत से पास हो गया और आठ सांसद एक हफ्ते के लिए सस्पेंड हो गए .


इन सबमे सबसे बड़ी बात जो ध्यान देने वाली है उसके अनुसार वर्तमान सरकार एनडीए -2 में कुल 82 बिल पास हुए जिसमे से 17 बिल प्रवर समिति को / मत विभाजन के लिए भेजे गए यानी कि लगभग २० प्रतिशत बिल में विपक्ष की राय को महत्तव दिया गया उसी तरह एनडीए 1 में 25 प्रतिशत बिल को पास कराने के लिए विपक्ष के राय को महत्तव दिया गया वही अगर यूपीए 2 ( सरकार ) की बात करे तो 71 प्रतिशत बिल के लिए विपक्ष की राय ली गयी वही यूपीए -1 में 60 प्रतिशत बिल पास होने के लिए विपक्ष को महत्तव दिया गया . इन आंकड़ो से ही साफ़ नजर आता है कि वर्तमान सरकार संख्या बल के आधार पर किस तरह बिल पास करवा रही है . बिल पास होने के कई मायने है पूर्ण बहुमत से बिल पास होना मतलब सभी की पूर्ण सहमती , मत विभाजन से बिल पास होना मतलब वो बिल जिस पर विपक्ष सवाल उठा रही है और सत्ता पक्ष समर्थन कर रही है ऐसे बिल के पास होने के लिए सदन के चेयर पर्सन द्वारा मत विभाजन करवाना और बहुमत के आधार पर बिल को पास या फेल करना जिसमे विवाद की स्थिति अल्प समय के लिए होती है किन्तु ध्वनिमत से बिल पास करना यानी कि विपक्ष की शंकाओं को नजर अंदाज करते हुए सत्ता पक्ष बल संख्या के आधार पर बिल को पास करवा लेती है उसे ध्वनिमत से पास हुआ बिल करार दिया जाता है और ऐसा ही कृषि बिल के साथ हुआ राज्यसभा में कृषि बिल विवादों के बीच विपक्ष की मांगो को नजरंदाज कर यहाँ तक कि सत्ता के घटक दलों की भावना को भी नजर अंदाज कर पास करा लिया गया और एक नए प्रथा का श्री गणेश जो हुआ है उस पर एक सीढ़ी और आगे बढ़ गयी सरकार इस तरह कृषि प्रधान देश में जमीनी किसानो से चर्चा किये बिना सरकार ने एक नए नियम को लागू कर दिया अब इससे किसानो को फायदा है या नुक्सान ये तो आने वाला समय ही बताएगा . ( शरद पंसारी - संपादक - शौर्यपथ दैनिक समाचार पत्र )

दुर्ग / शौर्यपथ / कांग्रेस की सत्ता प्रदेश में लगभग दो साल का कार्यकाल पूरा कर ली है ऐसे में अब दो साल बाद दुर्ग निगम में एल्डरमैन की सूचि जारी हो गयी . राज्य शासन ने कई निकायों के एल्डरमैन की सूचि जारी कर दी जिसमे दुर्ग निगम भी शामिल है .सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार एल्डरमैन की सूचि को अंतिम रूप देने के लिए क्षेत्रीय विधायको की अनुशंसा की का ख़ास ख्याल रखा जाता है . दुर्ग निगम में जारी एल्डरमैन की सूचि भी स्थानीय विधायक वोरा की अनुशंसा को आधार माना गया है . दुर्ग निगम में ६ एल्डरमैन के नामो की घोषणा हुई है एक एल्डरमैन की घोषणा साल भर पहले ही हो चुकी है . जारी सूचि में ऐसे कई नाम है जिनको एल्डरमैन का पद मिलने की पूरी उम्मीद थी किन्तु जारी सूचि से उनका नाम गायब है . ऐसे नामो में पूर्व पार्षद राजेश शर्मा , रमेश श्रीवास्तव , कन्या ढीमर , शकुन ढीमर , प्रकाश गीते , गौरव उमरे , आयुष शर्मा , नासिर खोखर , अजय सिन्हा , रामकली यादव , राकेश शर्मा , मोहित वाल्दे , सरवर चौहान , अजय शर्मा , अजय मिश्रा , अल्ताफ , संदीप श्रीवास्तव जैसे कई नाम शामिल रहे जिनको निराशा हाँथ लगी है . ये ऐसे दावेदार थे जिनको उम्मीद थी कि एल्डरमैन के पद से नवाजा जायेगा . किन्तु इन नामो को दरकिनार कर अंशुल पाण्डेय , जगमोहन ढीमर , अजय गुप्ता , रत्ना नारमदेव , देव सिन्हा , राकेश ठाकुर को निगम में जगह मिली .
लिस्ट जारी होते ही दुर्ग में राजनितिक हलचल तेज हो गयी ऐसे में असंतुष्टो को संतुष्ट करने की सारी जिम्मेदारी अब एक बार फिर विधायक वोरा के ऊपर आ गयी है . जैसा कि सभी को ज्ञात है दुर्ग में किसी भी पद पर मोहर लगने के लिए विधायक की अनुशंसा की आवश्यकता होती है वैसे ही अब इन असंतुष्ट दावेदार जो दो साल से उम्मीद लगाये हुए थे कि एल्डरमैन में जगह मिलेगी अब एक प्रकार से उम्मीद खत्म सी हो गयी है . हालाँकि अभी ३ नामो की घोषणा होनी बची है ऐसे में विधायक द्वारा इन तीन नामो में कुछ को जगह दिलाने का वादा जरुर किया जाएगा किन्तु एक अनार सौ बीमार वाली कहावत के आगे सभी जानते है कि सिर्फ तीन को ही जगह भविष्य में मिलेगी ऐसे में बाकी असंतुष्टो को कैसे समझायेंगे वोरा ये देखने वाली बात होगी . वैसे भी अगर दुर्ग कांग्रेस में राजनीती करनी है तो वोरा बंगले से कोई भी सीधे सीधे विरोध नहीं करेगा . किन्तु वर्तमान में जिस तरह शहर में वोरा की प्रसिद्धि का ग्राफ कम होता जा रहा है उससे ना चाहते हुए भी सभी को किसी ना किसी तरह संतुष्ट करने की जिम्मेदारी अब विधायक के उपर आ गयी है . वर्तमान राजनितिक परिवेश में दुर्ग में कांग्रेस कहने को तो उपरी टूर से एक है किन्तु आंतरिक रूप से तीन गुट बन गए है ऐसे में कांग्रेस के असंतुष्ट दावेदार अब किस खेमें में जा कर अपने लिए भविष्य के रास्ते अपनाएंगे ये देखने वाली बात होगी . हर बार वोरा परिवार में चुनावी सीजन में दुर्ग के कांग्रेस के सर्वेसर्वा बनने वाले शानू वोरा क्या अब दुर्ग आ कर सभी को फिर से संतुष्ट करेंगे या सत्ता होने के कारण कार्यकर्त्ता मौन रहकर सही समय का इंतज़ार करेंगे . स्थिति चाहे जैसी भी निर्मित हो किन्तु आने वाले कुछ दिन दुर्ग की राजनितिक हलचल काफी गरम रहने वाली है . ( शरद पंसारी )

शौर्यपथ । अर्नब गोस्वामी एक वरिष्ठ पत्रकार जो वर्तमान में देश की सबसे बड़ी समस्या को देश के सामने ला रहे है । इन वरिष्ठ पत्रकार के अनुसार देश मे अभी सबसे बड़ी समस्या है सुशांत और कंगना इसके अलावा देश मे कोई बड़ी समस्या नही । जहां दुनिया मे अभी कोरोना सबसे बड़ी समस्या है वही इन महोदय के लिए कंगना और सुशांत ही बड़ी समस्या है जिसका पर्दा फाश करने के लिए देश के सबसे काबिल और जुझारू पत्रकार गोस्वामी जी रोज लगे हुए है अपने टीवी शो में । भुखमरी , कोरोना से हजारों मौत , देश की बिगड़ती अर्थ व्यवस्था , शिक्षा , स्वास्थ्य इनके लिए कोई मायने नही । मेरी नजर में देश के अन्य पत्रकारों को इनसे सीख लेनी चाहिए कि गरीबो की मौत , भुखमरी , बेरोजगारी के मुद्दे सब बेमानी है । ऐसा नही कि सुशांत की असामयिक मौत से दिल दुखी नही किन्तु वैसा ही दुख उन लोगो की मौत का भी है जो सफर करते हुए मौत के आगोश में गए जो रेल की पटरी में मौत के आगोश में गए , जो बेरोजगारी के कारण मौत के आगोश में गए ऐसे कई लोग है जो इन दिनों लॉक डाउन के कारण असामयिक मौत का शिकार हुए ऐसे कई लोग है जो कोरोना में सही इलाज न मिलने के कारण इस दुनिया से विदा हुए किन्तु उन सब की बाते शायद देश के वरिष्ठ पत्रकार अर्नब को नही मालूम होगी शायद यही वजह होगी कि सिर्फ सुशांत को न्याय दिलाने की बात हो रही है वैसे ही भारत मे सबसे ज्यादा पीड़ित महिला इस समय कंगना है जिसे इंसाफ दिलाने की जद्दोजहद में अब देश के जाने माने पत्रकार गोस्वामी भारत की सबसे बड़ी जांच एजेंसी को भी सिखा रहे है कि किस तरह से जांच होनी चाहिए । गजब के इंसान है गोस्वामी जी और गजब का ज्ञान है उनके पास जो आज अपने शो में सीबीआई से खुले आम पूछ रहे है कि सीबीआई ये क्यो नही कर रही वो क्यो नही कर रही । अब वो इतने बड़े ज्ञानी हो गए कि किससे सवाल पूछना चाहिए सीबीआई को किसे बुलाना चाहिए सीबीआई को ये तक बताने लगे है और गजब की शैली है वरिष्ठ पत्रकार की अपने शो में कई तरह के भावभंगिमा पेश करते है कि अगर आज राज कपूर जिंदा होते तो ये कला ज़रूर सीखते वैसे अगर वो एक नाट्य विद्यालय खोलेंगे तो बहुत से कलाकार उनसे शिक्षा भी ले ले तो कोई बड़ी बात नही । मुझे तो उनका शो देखने मे बहुत ही आनंद आता है जब वो बात करते करते एक से एक भावभंगिमा बनाते है ऐसा लगता है कि दुनिया के सबसे काबिल पत्रकार है तो सिर्फ अर्नब गोस्वामी ही है बांकी पत्रकार तो सिर्फ नाम मात्र के है । गोस्वामी जी जैसा पत्रकार सदियों में जन्म लेता है । मै खुद उनके हर शो का मुरीद हूँ क्योकि वो ही एक अकेले ऐसे पत्रकार है जो कोरोना आपदा के समय देश की आर्थिक स्थिति , स्वास्थ्य , शिक्षा जैसी फालतू बातों पर ध्यान नही दे रहे उनका सारा ध्यान कंगना अबला नारी जो कभी बीफ नही खाती , जो कभी क्लब में अधनगे होकर डांस नही करती , जो ड्रग्स नही लेती , जो पोर्न फिल्मों में काम नही की जो अपने छोटे से घर मे डरी सकुचाई रहती है जिसके पास सुरक्षा नही है जो कभी देश के बड़े बड़े नेता तो क्या एक वार्ड पार्षद को भी नही जानती को इंसाफ दिलाने के लिए प्रयासरत है । धन्य है हमारे देश के वरिष्ठ पत्रकार गोस्वामी जी । नमन है इनकी काबिलियत को , नमन है देश के एक मात्र ईमानदार और महाज्ञानी आर भारत के पत्रकार अर्नब गोस्वामी जी को । मेरा देश के प्रधानमंत्री जी से विनम्र निवेदन है कि देश के महान पत्रकार सदी के सबसे काबिल पत्रकार आदरणीय श्री अर्नब गोस्वामी जी को देश के सबसे बड़े सम्मान से नवाजे और विश्व मंच में भी ये प्रयास करे कि दुनिया के पत्रकार जगत के सबसे बड़े पुरस्कार के रूप में इन्हें सम्मानित करने के बजाए इनके नाम से पुरस्कार दिया जाए । जिस पत्रकार ने कोरोना आपदा में हजारों मौत को , स्वास्थ व्यवस्था को , सबसे बुरी स्थिति में गुजर रही अर्थ व्यवस्था को दरकिनार करते हुए सबसे ज्यादा महत्त्वपूर्ण मामला कंगना को इंसाफ दिलाने का बीड़ा उठाया है ऐसे महान पत्रकार को सम्मानित करना ही चाहिए । जिन्होंने देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी को भी ये ज्ञान दे रहे है कि काम क्या क्या करना है कैसे करना है किनसे मिलना है । जय हो ( शरद पंसारी - संपादक , शौर्यपथ दैनिक समाचार पत्र )

शौर्यपथ लेख । मीडिया किसी भी देश की छवि को राष्ट्रीय ही नही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने में अहम भूमिका निभाती है । मीडिया एक आईना की तरह होती है जो दुनिया को अपने देश की स्थिति चाहे अच्छी हो , गलत हो प्रसारित कर सत्ता पक्ष विपक्ष को उनके कार्यो को बता कर जनता को अवगत कराने का कार्य , उपलब्धि हो , असफलता हो सामने लाने का कार्य ही मीडिया का होता है । कहने का तातपर्य सच को सामने लाना वर्तमान स्थिति को सामने लाना , ज्वलंत मुद्दों को निष्पक्षता से रखना , देश की ज़रूरत को समझना , देश की वास्तविक हालत को सरकार के सामने रखना और प्रशासन की दबंगई , कुशल कार्य , उपलब्धि , भ्र्ष्टाचार पर खुलकर चर्चा करने का माध्यम मीडिया के रूप में स्थापित है । भारत मे भी मीडिया का अस्तित्व है किंतु विगत कुछ सालों से जितने आरोप सरकार पर लग रहे उतने आरोप मीडिया के पक्षपात पर भी लग रहे है । कहने को मीडिया देश का चौथा स्तंभ है किंतु इस चौथे स्तंभ की स्वतंत्रता पर भी सवाल उठने लगे है । देश का अधिकतर मीडिया ग्रुप आज चाटुकारिता की आगोश में आकर आम जनता को ज्वलंत मुद्दों की बात ना बता कर , देश की वर्तमान हालत ना बता कर चाटुकारिता की भाषा बोल रहा है । भारतीय मीडिया की निष्पक्षता पर लगातार सवाल उठ रहे है किंतु मीडिया ग्रुप इन सबसे पर अपनी ही दुनिया मे मस्त है । सच्चाई को सामने लाने की बात तो बहुत दूर अब वही परोसा जा रहा है जो उनके आका चाहते है । पहले मीडिया तथ्यों के साथ सच्चाई सामने लाती थी और सम्मानित व शालीन भाषा जिसमे व्यंग कटाक्ष का मिश्रण होता था का प्रयोग किया जाता था किंतु वर्तमान में मीडिया आपसी रंजिश , झूठे आत्मसम्मान की बात करती नजर आ रही है । अब मीडिया सच तो नही बता रही वो जो भी बता रही उसे आपके जेहन में थोप रही ये बताने की कोशिश कर रही कि वो जो कह रही वहीं सच है । बातों की जलेबी बना कर , तथ्यों को तोड़ मरोड़ कर किसी भी हद में जाकर अपने आका के तलुवे चाटने का पुरजोर प्रयास करती नजर आ रही है । अब पत्रकारिता स्वतंत्र नही रह गए इस चौथे स्तंभ को भी सरकार के सहारे की ज़रूरत हो गई है । वर्तमान समय की ही बात करे तो वर्तमान समय देश के लिए एक मुश्किल भरा समय है भारत की अर्थव्यवस्था चरमरा गई है । देश मे भुखमरी चरम पर है , बेरोजगारी चरम पर है , महंगाई चरम पर है , स्वास्थ्य व्यवस्था चरमरा गई है , शिक्षा का स्तर लगातार गिर रहा है किन्तु देश की मीडिया एक एक्टर के हत्या या आत्महत्या पर व्यस्त है , देश की मीडिया धर्म पर व्यस्त है , देश की मीडिया पड़ोसी मुल्कों की हरकत और बर्बादी पर व्यस्त है , देश की मीडिया अपने आकाओं की गुलामी पर व्यस्त है , देश की मीडिया तथ्यहीन बातों पर व्यस्त है । अब मीडिया आईना दिखने की बजाए गुलामी की जिंदगी पर व्यस्त है अब वही दिखा रही है जो उनके आका चाहते है फिर चाहे वो गलत हो या सही उनसे कोई सरोकार नही । ज्वलंत मुद्दे अब चौथे स्तंभ में बेमानी हो गए है । उसकी जगह अब चाटुकारिता परोसी जा रही है । ऐसी चाटुकारिता जिससे उसका अस्तित्व बना रहे । आईना अब पत्रकारिता का पर्यायवाची नही रह गया अब तो झूठ और बेमानी ही मीडिया का दूसरा रूप बन गया है । गुलाम भारत मे भी मीडिया खुलकर अपनी बात रख लेता था । कई बड़े बड़े आंदोलन में गुलामी के समय मे भी मीडिया स्वतंत्र था किंतु आजाद भारत मे मीडिया अब गुलामो की जिंदगी जी रहा है । मीडिया की स्वतंत्रता अब दिखावा मात्र हो गई । अब अगर जिंदा रहना है तो जिसके पास ताकत है उसके महिमा को वर्णित करते हुए ही अस्तित्व में बने रहने का समय आ गया है अगर विरोध करोगे तो सत्ता की ताकत के आगे नेस्तनाबूद कर दिए जाने का खतरा बन गया है । मीडिया अब आईना ना होकर प्रायोजित फ़िल्म का रूप ले लिया है जिसमे स्क्रीप्ट भी पूर्वनियोजित होती है और फिल्मांकन भी पुर्नियोजित सिर्फ वही दिखाया जा रहा है जो सत्ता की ताकत दिखाना चाहती है । भले ही देश आजाद हो गया किन्तु मीडिया अब गुलाम हो गई और हो भी क्यो ना अगर आपने सच्चाई दिखाई तो आप ही नही दिखेंगे जब आप ही नही दिखेंगे तो सच्चाई कहा दिखेगी । सच्चाई और जिंदगी में किसी एक के चुना में अब जिंदगी चुनने की मजबूरी ही मीडिया के स्वतंत्रता के रास्ते मे सबसे बड़ी रुकावट है । वर्तमान समय मे यही रीति के तहत मीडिया अपना कार्य कर रही है सच्चाई अब मीडिया जगत में विलुप्त सी नजर आ रही है और चाटुकारिता अब बलवान हो गई जो जितनी ज्यादा चाटुकारिता करेगा वो उतना सफल होगा । निष्पक्षता और चाटुकारिता में अब चाटुकारिता की जीत हो गई । और देश के चौथे स्तंभ को अब सहारे के लिए चाटुकारिता का दामन थामना ज़रूरी हो गया । चौथा स्तम्भ अब कब अपने दम पर स्थापित होगा ये भविष्य के कालचक्र में लुप्त है किंतु वर्तमान में इसे स्थापित होने के लिए सहारे की ज़रूरत पड़ रही है बिना सहारे के अस्तित्व खतरे में पड़ने का जो अंदेशा है । अब तो छोटी मोटी सच्चाई जिससे आकाओं को कोई फर्क नही पड़ता ऐसी ही सच्चाई सामने आती है बाकी तो झूठ का पुलिंदा ही बांकी रह गया है । ( शरद पंसारी - संपादक शौर्यपथ दैनिक समाचार पत्र )

शौर्यपथ लेख । कृष्ण आनंद चौधरी पिजरे में कैद चिड़िया कितनी भी रंगीन हो, सुन्दर नहीं लगतीं… चाहे कोई कितनी भी कविताएं लिख लें उन पर। क्या होता है चरित्र? चरित्र गुलामी है, एक बंधन। वो शर्तों से तय होता है। चरित्र गैर कुदरती है। प्रकृति विरोधी। अप्राकृतिक। चरित्र है, किसी तथ्य पर थोपीं गई शर्तें। हवा का चरित्र क्या है? शांत, धीमे, तेज कि आंधी? गर्म, ठंडा या बर्फ? पानी का चरित्र क्या है? और मिट्टी का चरित्र? मूरत या ईंट? जो चरित्रहीन होते हैं, सुंदर वही होते हैं। आजाद लोग ही खूबसूरत होते हैं। कोने में, अपनी ही कुठाओं में दबी खामोश चरित्रशील औरत? या किसी खुले में अपने मन से ठहाके लगाकर हंसती चरित्रहीन औरत?… कौन सुंदर है? कौन है सुंदर? वो जो चाहे तो आगे बढ़कर चूम ले। बोल दे कि प्यार करती हूं? या वो, जो बस सोचती रहे असमंजस में और अपने मन का दमन किए रहे। दमित औरतें निसंदेह सुंदर नहीं होती, पर स्वतंत्र चरित्रहीन औरतें होती हैं खूबसूरत। सोचना, जब अपनी टांगे फैलाई तुमने अपने पुरुष के सामने। अगर वो केवल पुरुष के लिए था तो ही वो चरित्र है। लेकिन वो तुम्हारे अपने लिए था तो चरित्रहीनता। अपने लिए, अपने तन और मन के लिए खुल कर जीती औरते सुन्दर लगती है। तुम उसे चरित्रहीन ही पुकारोगे। बच्चे चरित्रहीन होते हैं… उनका सबकुछ बेबाक… आजाद होता है। वो हंसते हैं खुलकर, रोते हैं खुलकर, दुख सुख, खुशी गम… सब साफ सामने रख देते हैं। वो दमन नहीं करते अपना। चरित्र दमन है। पहले अपना, फिर अपनों का, फिर अपने समाज का। गौर करना, जो जितना चरित्रवान होता है, वो उतना ही दमित होता है, और फिर उतना ही बड़ा दमनकारी होता है। जो चरित्रहीन होते हैं, सुंदर वही होते हैं। आजाद लोग ही खूबसूरत होते हैं। हां, चरित्रहीन औरते सुंदर होती हैं। वो, जिसका मन हो तो अपने पुरुष की हथेली अपने स्तनों तक खींच ले। वो, जिसका मन हो तो वो अपने पुरुष को अपनी बांहों में जोर से भींच ले। वो, जिसका मन करे तो रोटियां बेलते, नाच उठे। वो जिसका मन करे तो जोर से गा उठे। वो, जो चाहे तो खिलखिलाकर हंस सके। वो जो चाहे तो अपने प्रिये की गोद में धंस सके। वो, जो चाहे तो अपने सारे आवरण उतार फेंके। वो, जो चाहे तो सारे कपड़े लपेट ले। वो, जो चाहे तो अपने बच्चे को स्वतंत्रता से अपना स्तन खोल दूध पिला सके, उसे दुलरा सके। बच्चे को जन्म देते जब वो दर्द में चीखती है तो वो चरित्रहीनता है। आसपास की औरतें उसे चुप करातीं हैं। आवाज नहीं निकलाने की सलाह देती हैं। सारा दर्द खामोशी से सहने को कहती है। चरित्र का ये बंधन कबूल नहीं होना चाहिए। प्रसव पीड़ा… तकलीफ है, सृजन की तकलीफ… तो उससे धरती गूंजनी चाहिए। अपने पुरुष के साथ उसके मदमस्त खेल का दमन भी गैरकुरदती है। इसे भी मुक्त होना चाहिए, उसे भी चरित्रहीनता होना चाहिए। सुना है कभी किसी औरत को अपने परमानंद के क्षणों में एकदम खुलकर गाते? क्यों नहीं बोल पाती वो, अपने भावों को स्वरों में? क्योंकि ये उसे चरित्रहीना साबित करेगा। पर ऐसी औरतें ही भी बेहद सुन्दर लगती हैं। धरती की हर चीज का सुख लेते, अपने भीतर और बाहर हर चीज से खुलकर खुश होते…. प्यार में डूब सबकुछ से प्यार करती आजाद औरत। मुझे कुदरत पसंद हैं क्योंकि उसका कोई चरित्र नहीं। यह लेख इससे पहले "मेरा रंग " में प्रकाशित किया जा चुका है जिसे कृष्ण आनंद चौधरी ने लिखा है। वे वरिष्ट पत्रकार हैं।

शौर्यपथ विशेष / कहते है कि कुछ लोग दूसरों की सेवा को ही अपना प्रथम कर्तव्य मानते है। मानव सेवा ही माधव सेवा, जैसे सोच के साथ वनांचल मोहला में सेवा कार्य कर रहे समाजसेवी एवं व्यवसायी संजय जैन का नाम इस कड़ी में अग्रणी है।
तूफानों से आँख मिलाया, सैलाबों पर वार किया।
मल्लाहों का चक्कर छोड़कर, तैर के दरिया पार किया।
इस कथन को चरितार्थ करने वाले संजय जैन एक शख्सियत ही नही समाज के लिए एक मिशाल भी है। विकास के किसी भी आयाम में समुदाय की सहभागिता का विशेष महत्व होता है। समुदाय अगर शासन व प्रशासन के साथ जुड़ कर सहयोग करे तो विकास सुनिश्चित हो जाता है। राजनांदगांव जिले के मोहला विकासखंड में शिक्षा के विकास में एक अहम योगदान का उदाहरण है, शिक्षाविद और समाज सेवी संजय जैन। मोहला के प्रतिष्ठित व्यापारी परिवार में जन्मे संजय जैन पिता संपत लाल जैन ने सुदूर आदिवासी वनांचल में शिक्षा के विकास की धारा को तेज करने में विभाग के अधिकारियों के साथ मिलकर काफी कार्य किये है। स्वयं मोहला क्षेत्र में अपनी शिक्षा पूर्ण करने संजय जैन ने आदिवासी बच्चो को आगे बढाने के लिए संकल्पित होकर जो कार्य किया आज उसी का परिणाम है कि आज मोहला ब्लॉक शिक्षा के क्षेत्र में अपनी अलग पहचान रखता है।
निर्धन बच्चो की शिक्षा में आर्थिक सहायता
संजय जैन प्रारम्भ से ही निर्धन बच्चो की शिक्षा को पूर्ण करने के लिए आर्थिक मदद करते आ रहे है। बहुत से ऐसे बच्चे जो आर्थिक कारणों से पढ़ाई पूरी नही कर सकते उन्हें पुस्तक, फीस व अन्य पढ़ाई खर्च का सहयोग हमेशा से करते आ रहे है। सन् 2018 की दसवीं बोर्ड परीक्षा में टॉपर हरसिंग मंडावी को इन्होंने आगे की पढ़ाई में काफी मदद की है।

शिखर कार्यक्रम मोहला में विशेष सहयोग
वनांचल के बच्चो को प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए तैयार करने व शिक्षा में गुणवत्ता लाने के लिए मोहला में संचालित ’शिखर कार्यक्रम’ को सुदृढ़ करने में भी संजय जैन का विशेष योगदान रहा है। वे एबीईओ मोहला राजेन्द्र कुमार देवांगन के साथ मिलकर लगातार शिखर कार्यक्रम को विस्तार देते आ रहे है। एबीईओ राजेन्द्र देवांगन ने बतलाया है कि शुरुआती वर्षों में संजय जैन के आर्थिक सहयोग से ही शिखर निःशुल्क कोचिंग का संचालन प्रारंभ किया गया एवं आज भी उनके द्वारा बच्चो की शिक्षा के लिए उनसे मदद प्राप्त होती रहती है।
क्षेत्रीय जनप्रतिनिधियों के साथ मिलकर कर रहे विभिन्न विकास कार्य
मोहला मानपुर विधानसभा क्षेत्र के ऊर्जावान विधायक इन्द्रशाह मंडावी और अन्य स्थानीय जनप्रतिनिधियों के सहयोग से संजय जैन लगातार विभिन्न क्षेत्रों में विकास कार्यो में सफल सहभागिता निभाते आ रहे है। वे अपने क्षेत्र में शिक्षा के साथ साथ, चिकित्सा, सड़क, कृषि आदि के विकास में भी वे अपना योगदान देते रहे है। हाल ही मे उन्होंने मोहला मानपुर विधायक और एबीइओ मोहला के साथ मिलकर कई स्कूलों में स्मार्ट टीवी लगवाकर टेक्नोलॉजी के साथ पढ़ाई से बच्चो को जोड़ने का प्रयास किया है। उन्होंने प्रा शा कोर्रामटोला को स्मार्ट टीवी भी दान किया है । वर्तमान समय में मोहला को डिजिटल एजुकेशन हब बनाने मे इनकी अहम भूमिका है।
शिक्षको के बीच है लोकप्रिय और मोटिवेटर
संजय जैन हमेशा से ही शिक्षको को प्रोत्साहित करते आ रहे है। वे कई सेमिनार और प्रशिक्षण कार्यक्रमो में शिक्षको के बेहतर कार्य को सम्मानित करके उन्हें प्रोत्साहित करते रहते है। बहुत से शिक्षको को इनके प्रयासों से अपने कार्य की पहचान भी मिली है। संजय जैन शिक्षको के बीच अच्छे मोटिवेटर के रूप में जाने जाते है।
सरल स्वभाव व उच्च सोच के साथ कार्य को मिला प्रसिद्धि
संजय जैन प्रखर वक्ता होने के साथ ही सरल और विनम्र स्वभाव के धनी भी है और लोगो से सहजता के साथ मिलने के लिए मशहूर है। राजनीतिक क्षेत्र में भी अपनी विशिष्ट पहचान रखने वाले संजय जैन ने अपनी मातृभूमि वनांचल मोहला को प्रगति के पथ पर अग्रसर करने में काफी प्रयास किये है जिसे क्षेत्रवासी व स्थानीय अधिकारी भी सम्मान की नजर से देखते है।

शौर्यपथ लेख । देश सहित प्रदेश में कोरोना का विस्फोट हो गया दुर्ग जिला प्रदेश में कोरोना के मामले में रायपुर के बाद दूसरा स्थान है । दुर्ग में कोरोना आपदा से जहां बेरोजगारी बढ़ी वही जिला प्रशासन के एक फैसले से कुछ निजी अस्पताल की बल्ले बल्ले हो गई । यह हम सभी अस्पताल की बात ना कर एक एक अस्पताल की बात करे तो दुर्ग जिले में सबसे ज्यादा विवादित अस्पताल bsr अपोलो का नाम ले तो कोई गलत नही होगा । वर्तमान में bsr apollo हॉस्पिटल bsr super specialist के नाम से संचालित ज़रूर है किंतु अब इसे नए नाम से पुकारा जाने लगा है नया नाम है hitech । जी हां जनवरी माह में इस हॉस्पिटल का एक बार फिर उद्घाटन हुआ वो भी प्रदेश के गृहमंत्री के हांथो ये बात अलग है कि अभी तक इस हॉस्पिटल को स्वास्थ्य विभाग से अनुमति नही मिली और इस पर कमेटी बैठाकर जांच की बात जिला प्रशासन द्वारा भी किया गया । जिले के cmo गंभीर सिंह ठाकुर ने भी स्वीकारा था कि लाइसेंस की प्रक्रिया चालू है यानी कि अभी तक शासन द्वारा इसका भौतिक परीक्षण नही किया गया । किन्तु कहते है कि सारे नॉयम सिर्फ आम व गरीब जनता के लिए ही होते है जो आज प्रत्यक्ष दिख भी रहे है । करोड़ो रूपये के फर्जी बाड़े ( बीएसपी कर्मचारियों से इलाज के लिए लिए गए ) का प्रकरण का निपटारा भी नही हुआ और पूर्व संचालक डॉ खंडूजा ने हॉस्पिटल बेच दिया । प्राप्त जानकारी के अनुसार अब हॉस्पिटल में संचालक के तौर पर डॉ खंडूजा के पुत्र का नाम है यानी सिर्फ कागजो में ही फेर बदल और कई लोगो की मेहनत की कमाई अंदर । ऐसा नही कि यह फर्जीवाड़ा किसी से छुपी हुई है किंतु यह फर्जीवाड़ा का मास्टरमाइंड रसूखदार है तो प्रशासन मौन है । एक तरफ तो bsr super स्पेशिलिटी हॉस्पिटल को अभी तक शासन से अनुमति नही मिली वही दूसरी तरफ शासन ने इस हॉस्पिटल को कोविड के इलाज की अनुमति भी दे दी वो भी ए श्रेणी में रखकर । अब तो hitech ( bsr सुपर स्पेशिलिटी ) के संचालकों की चांदी ही चांदी । इसे दूसरी भाषा मे कहे तो आपदा में अवसर या खुलकर बिना अनुमति के ग्राहकों ( मरीज ) की जेब मे प्रवेश । मरीज इसलिए नही कह सकते क्योकि जो हॉस्पिटल बिना अनुमति के खुलेआम स्वास्थ्य क्षेत्र में कार्य कर रहा उसका मकसद स्वास्थ्य सेवाएं देने से ज्यादा जरूरी जेब की सेवा करना है । वैसे भी शुरुवात से अभी तक कई छोटे बड़े विवाद का नाता bsr से रह है अब जब सरकार ने कोविड की अनुमति दे दी फिर तो संचालकों के हांथ ही नही सिर भी कढ़ाई में होने जैसी कहावत चरितार्थ हो गई । इसे ही कहते है आपदा में अवसर का लाभ उठाना । खैर अब अवसर तो मिल ही गया एक गैर अनुमति प्राप्त हॉस्पिटल को बस अब देखना यह है कि यहां कोविड के इलाज के नाम पर क्या क्या खेल होता है और क्या क्या रंग देखने को मिलेंगे । वैसे सिर्फ bsr हॉस्पिटल ही अकेले नही है जिसे विभाग से अनुमति नही मिली हो ऐसे कई हॉस्पिटल सालो से दुर्ग में संचालित है जो शासन के नियमो का नर्सिंग होम एक्ट 2013 का मजाक उड़ाते हुए संचालित हो रहे है और हो भी क्यो ना क्योकि इतने सालों में ज़िम्मेदार अधिकारी नोटिस का खेल ही खेल रहे है यही सत्य है और सत्य को अब स्वीकार करना ही पड़ेगा क्योंकि नियम और कानून गरीबो के लिए कमजोरों के लिए ही है । ( शरद पंसारी की कलम से )

        शौर्यपथ लेख ( शरद पंसारी )/ कोरोना एक ऐसी महामारी बनकर दुनिया के सामने आयी जिसे सदियों तक याद रखा जायेगा . एक छोटे से शहर से जन्म कोरोना आज पूरी दुनिया पर राज कर रहा है . दुनिया में क्षेत्रफल की तुलना के हिसाब से सर्वाधिक जनसँख्या वाला देश भारत ही है . भारत में कहने को कोरोना का आगाज जनवरी माह के अंत में ही हो गया था किन्तु तब संख्या ऊँगली पर गिनी जा सकती थी . आज देश में कोरोना मरीज संक्रमितो की संख्या लाखो में है देश की अर्थव्यवस्था पूरी तरह चौपट हो चुकी है और ऐसी हालत में अर्थव्यवस्था सुधारने  की जिम्मेदारी देश के वित्त मंत्री की होती है किन्तु जिस तरह प्याज के दाम बढ़ने पर वित्त मंत्री ने कह दिया था कि वो तो प्याज खाती ही नहीं है . मतलब वो अगर प्याज ना खाए तो क्या आम इंसान भी प्याज का सेवन छोड़ दे . तब क्या प्याज के दाम बढ़ने से रोकने की जिम्मेदारी सरकार की नहीं रही . ऐसे ही ब्यान वर्तमान में वित्त मंत्री ने दे दिया कि कोरोना का प्रकोप ईश्वर की देन है मतलब सरकार अब कुछ नहीं कर सकती जब सरकार कुछ कर नहीं सकती तो फिर सत्ता में क्यों है . सत्ता भी त्याग दे इस्श्वर सब देख लेगा . तिरुमाला मंदिर के वे पुजारी जो सालो से भगवन की सेवा कर रहे है और कोरोना संक्रमित होने के बाद भी ईश्वर को दोष नहीं दिए फिर प्रभु राम की तथाकथित अनुयायी ये कैसे कह सकते है कि महामारी में उनका कोई दोष नहीं . फ़रवरी में देश के एक बड़े नेता ने सरकार से कहा था कि अगर जल्द ही कोई सार्थक कदम नहीं उठाया जाएगा तो परिणाम भयंकर होंगे किन्तु तब भी सत्ता में बैठे जिम्मेदार इस बात को मजाक में लिए और हल्लो ट्रम्प , सत्ता परिवर्तन का खेल चलता रहा फिर एक दिन अचानक बिना किसी तैयारी के बिना किसी राज्य सरकार को सूचित किया ये फैसला आ गया कि देश लॉक डाउन में जायेगा और जो जहां है वही रहेगा . तैयारी के नाम पर खूब ताली बजी थाली बजी ईश्वर को प्रसन्न किया गया किन्तु क्या हुआ भुखमरी बढ़ी , बेरोजगारी बढ़ी , अर्थव्यवस्था चौपट हो गयी इन सबके बीच अपने गृह ग्राम जाते हुए हजारो मौत के आगोश में समा गए , इधर संक्रमण का विस्तार होता रहा उधर संक्रमण का कारण एक समुदाय विशेष को दिया जाने लगा जिस पर बाद में कोर्ट की फटकार भी मिली किन्तु इसके बाद भी माहौल कोरोना का नहीं बना राफेल का स्वगत हुआ , राम मंदिर की चर्चा हुई ,20 लाख  हजार करोड़ से अर्थव्यवस्था पत्री पर उतारने का प्रचार हुआ जब सब खत्म हो गया और स्थिति बिगड़ने लगी तो देश का मुख्य मुद्दा सुशांत का हत्यारा कौन पर टिक गया . सुशांत की आत्महत्या से सभी दुखी है किन्तु क्या सिर्फ सुशांत की मौत हुई क्या उन हजारो लोगो की मौत जो सफ़र करते हुई , जो कोरोना संक्रमण से हुई , जो भुखमरी से हुई , जो दंगे से हुई की कोई कीमत नहीं . क्या उनका परिवार नहीं , बेरोजगारी पर चर्चा , व्यापार पर चर्चा , स्वास्थ्य पर चर्चा से ज्यादा जरुरी लगा विकाश दुबे कैसे मरा उसका एनकाउन्टर कैसे हुई , कितना दुर्दांत था . वाह क्या बात चली किन्तु इन सब बातो में उनकी बात नहीं चली जो रोजगार हीन हो गए उनकी बात नहीं चली जो भुखमरी में जी रहे है उनकी बात नहीं चली जो कोरोना काल में ड्यूटी करते हुए मौत के आगोश में चले गए .
         २० लाख हजार करोड़ तो पता नहीं कहा गए किसे मिले और किसे मिलेंगे किन्तु ५ किलो चलावल महिना देकर वाह वही का खेल चलता रहा , पेट्रोल डीजल के दाम बढ़ाकर देशभक्ति का परिचय दिया जाने लगा , तरह तरह के फोटो खिंचवाकर देश को उल्लू बनाने का खेल चलता रहा बस नहीं चला तो स्वास्थ्य की सेवा को कैसे बेहतर करे , रोजगार के लिए क्या कदम उठाये , शिक्षा के लिए क्या करे , भुखमरी से कैसे छुटकारा पाए . माना ऐसी महामारी १०० साल बाद आयी और पूरी दुनिया इसकी चपेट में है किन्तु जिस तरह से भारत में कोरोना संक्रमण तेजी से फ़ैल रहा है और बेकाबू होते जा रहा है ऐसे समय में सरकार के वित्त मंत्री जिसके एक एक फैसले से देश की व्यवस्था उपर नीचे होती है एक सर्वोच्च पद पर बैठकर इस तरह भगवान् को दोष देना कहा तक सही है क्या भगवान् अपनी औलाद को कभी तकलीफ दे सकता है जिन्दगी और मौत तो ईश्वर के हाँथ में है किन्तु बेहतर जिन्दगी देने का कार्य सुशासन का कार्य तो सत्ता में बैठे लोगो को ही करना है . सवाल तो उनसे ही पूछे जायेंगे जिनके पास सत्ता की शक्ति हो . जिनके पास फैसले लेने की ताकत नहीं हो उनसे कैसे सवाल करे . क्या देश में बेरोजगारी , महंगाई , स्वास्थ्य , शिक्षा , भुखमरी से निजात के लिए कोई कदम उठाएगी या अब सब भगवान् भरोसे ही चलेगा अगर ऐसा है तो ये लॉक डाउन - अनलाक का खेल किस लिए छोड़ दो भगवान् भरोसे जिसको जो करना हो वो करे जिसको जैसे जीना हो जिए क्या जरुरत कानून का , क्या जरुरत शासन का और क्या जरुरत सत्ता का जब सब भगवान् के ऊपर है तो भगवान् ही सब संभालेगा और बिगाड़ेगा .( लेखक के निजी विचार )

शौर्य की बातें / कशिश कुकरेजा की आसमयिक निधन ने एक बार फिर जख्म को हरा कर दिया कशिश कुकरेजा कौन है ना मै इन्हें जानता हूँ ना कभी मुलाकात हुई है . सुनील कुकरेजा मेरे फेसबुक मित्र है उनकी धर्मपत्नी है कशिश कुकरेजा जो ३ दिनों पहले सदा के लिए इस लोक से विदा हो गयी . सुनील कुकरेजा के प्रोफाइल में सभी ने उनकी अर्धांग्नी की आसमयिक नधन पर अपनी संवेदना व्यक्त की और कई पुरानी यादो को एक बार फिर जीवंत करने का प्रयास किया उसमे से एक दृश्य ने फिर से मेरे लाल की कमी को दिल से आँखों पर उतार दिया . सुनील जी अपने परिवार पत्नी और दो बच्चो के साथ एक खुशहाल जिन्दगी जी रहे थे और अचानक भविष्य के सपने बुनते बुनते अन्धकार की ओर चले गए जिस अन्धकार से शारीरिक तौर पर और समाज के लिए तो बाहर निकल आयेंगे किन्तु अंतरात्मा से सदैव उसी अन्धकार में खोये रहेंगे .
एक इन्सान के लिए उसकी दुनिया के अहम् किरदार उसका परिवार होता है मिया बीबी और बच्चे ये ऐसे रिश्ते है जो स्वयं के प्रयास से ही मजबूत बनते है और हर परिस्थिति में ये अपनी दुनिया में खुश रहते है . कुश रहने का सबसे बड़ा कारण होता है उनकी दुनिया में सब साथ है . किन्तु इस दुनिया से कोई एक भी अलग हो जाये तो करोडो अरबो की भीड़ में भी इंसान अकेला हो जाता है और ऐसा ही हाल वर्तमान में सुनील जी के साथ है उनके मासूम बच्चो के साथ है . सभी साथ है किन्तु उस साथ का कोई अर्थ ही नहीं होता जब उनका कोई अपना साथ ना हो . शायद इसी को कहते है मोहमाया की दुनिया . इस दुनिया में पैसे की भले कमी हो जिन्दगी खुशहाल रहती है किन्तु कोई अपना ना हो तो माया सिर्फ दिखावट का रूप ले लेती है . आज डेढ़ साल से उपर हो गए मेरी दुनिया का एक सितारा खो गया फिर भी जिन्दा है किन्तु सिर्फ दिखावट की दुनिया में जी रहे है . आज भी अंतर्मन वीरान है माया से जिन्दगी कट रही है किन्तु मोह तो अब लेश मात्र भी नहीं रहा फिर भी जी रहे है क्योकि इसी को शायद जिन्दगी कहते है . आज सुनील जी के साथ जो हुआ उसने दिल झंझोड़ दिया . दुःख की इस घडी में मेरी अंतरात्मा के साथ सुनील जी से संवेदनाये है ईश्वर कशिश भाभी जी को अपनी चरणों में स्थान दे और सुनील जी एवं उनके दोनों बच्चो को इतनी शक्ति दे कि जिन्दगी के बचे हुए इम्तिहान को सफलता पूर्वक पार करते रहे . जैसे हामरे जिन्दगी में शौर्य की जगह कोई नहीं ले सकता और उसकी याद को कोई नहीं मिटा सकता उसी तरह कशिश जी हमेशा सुनील जी के और उनके बच्चो के दिल में सदैव जीवित है और वही उनकी शक्ति है . निक्की बेटा तेरे पास कशिश आंटी आई है उन्हें उनके बच्चो जैसा प्यार देना . सुनील जी ईश्वर आपको दुःख की इस घडी में शक्ति प्रदान करे . ॐ शांति .

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