September 29, 2026
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    बस्तर

    बस्तर (1131)

    प्रशिक्षु डीएसपी के गनमैन विजय जेना ने घर में उठाया खौफनाक कदम, कंधे को छूते हुए निकल गई गोली; महारानी अस्पताल में उपचार जारी

    नरेश देवांगन की खास रिपोर्ट
    जगदलपुर / शौर्यपथ / शहर के पथरागुड़ा इलाके में सोमवार दोपहर उस समय हड़कंप मच गया, जब प्रशिक्षु डीएसपी के गनमैन के रूप में तैनात आरक्षक विजय जेना (30 वर्ष) ने अपने ही घर में अपनी सर्विस INSAS रायफल से खुद को गोली मार ली। गोली कंधे को छूते हुए बाहर निकल गई, जिससे आरक्षक गंभीर रूप से घायल हो गया। घटना की सूचना मिलते ही पुलिस महकमे में खलबली मच गई और कोतवाली थाना प्रभारी सहित पुलिस के अधिकारी एवं अन्य स्टाफ तत्काल मौके पर पहुंचे। घायल आरक्षक को तत्काल उपचार के लिए महारानी अस्पताल ले जाया गया, जहां उसका उपचार जारी है। अधिकारियों के अनुसार फिलहाल उसकी हालत खतरे से बाहर बताई जा रही है।

    कई दिनों से पारिवारिक विवाद को लेकर था परेशान
    प्रारंभिक जानकारी के मुताबिक आरक्षक विजय जेना पिछले कुछ दिनों से अपने घर में चल रहे पारिवारिक विवाद को लेकर मानसिक रूप से परेशान था। बताया जा रहा है कि उसने अपने विभाग के कुछ कर्मचारियों को भी इस पारिवारिक तनाव की जानकारी दी थी। सोमवार को घर में एक बार फिर विवाद हुआ, जिसके बाद विजय कथित तौर पर इस कदर टूट गया कि उसने अपने पास मौजूद सर्विस रायफल से स्वयं को गोली मार ली।
    बताया गया कि विजय जेना प्रशिक्षु डीएसपी सुमित चंद्रा के गनमैन के रूप में तैनात है। ड्यूटी से संबंधित सर्विस रायफल उसके पास थी। घटना के समय वह अपने घर में मौजूद था।

    कंधे पर रायफल टिकाकर चलाई गोली
    पुलिस अधिकारियों के अनुसार प्रथम दृष्टया सामने आया है कि विजय जेना ने अपनी रायफल को कंधे की ओर टिकाकर गोली चलाई। गोली कंधे को छूते हुए बाहर निकल गई। गोली चलने की आवाज सुनकर परिवार के सदस्यों और आसपास के लोगों को घटना की जानकारी हुई। इसके बाद घायल विजय को तत्काल अस्पताल पहुंचाया गया।
    घटना की जानकारी मिलते ही पुलिस विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों ने भी मामले को गंभीरता से लेते हुए अस्पताल पहुंचकर स्थिति की जानकारी ली। आला अधिकारियों की टीम महारानी अस्पताल में मौजूद है और चिकित्सकों से लगातार घायल आरक्षक के स्वास्थ्य की जानकारी ले रही है।

    पुलिस ने शुरू की मामले की जांच
    अधिकारियों ने प्रारंभिक तौर पर घटना के पीछे पारिवारिक विवाद को कारण बताया है। हालांकि पुलिस द्वारा घटना के सभी पहलुओं की जांच की जा रही है। सर्विस रायफल से गोली चलने की परिस्थितियों और घटना से जुड़े अन्य तथ्यों की भी जांच की जा रही है।
    फिलहाल विजय जेना का महारानी अस्पताल में उपचार जारी है और चिकित्सकों की निगरानी में उसकी स्थिति बताई जा रही है। पुलिस महकमा भी लगातार उसके स्वास्थ्य पर नजर बनाए हुए है।

    स्वतंत्रता दिवस पर शहीदों के स्मारक पर तिरंगा नहीं फहरने से उठे सवाल, प्रशासन की चुप्पी पर भी सवालिया निशान

    नरेश देवांगन की खास रिपोर्ट 

    जगदलपुर, शौर्यपथ। स्वतंत्रता दिवस… वह दिन जब पूरा देश तिरंगे के रंग में रंग जाता है। जब आसमान में लहराता राष्ट्रध्वज हमें उन अनगिनत बलिदानों की याद दिलाता है, जिनकी वजह से आज हम आजाद हवा में सांस ले रहे हैं। लेकिन जगदलपुर के लालबाग में शनिवार को एक ऐसा दृश्य भी सामने आया, जिसने कई संवेदनशील नागरिकों को सवालों के बीच खड़ा कर दिया।

    लालबाग मैदान में उप मुख्यमंत्री विजय शर्मा ने पूरे सम्मान के साथ राष्ट्रीय ध्वज फहराया। देशभक्ति के नारों और तिरंगे की शान के बीच स्वतंत्रता दिवस का मुख्य आयोजन हुआ। लेकिन इसी लालबाग मैदान से महज कुछ कदम की दूरी पर स्थित झीरम घाटी शहीद स्मारक में तिरंगा नजर नहीं आने की स्थिति सामने आई।

     

    वह स्मारक… जहां पत्थरों पर केवल नाम नहीं लिखे हैं, बल्कि उन परिवारों की अधूरी कहानियों की स्मृतियां जुड़ी हैं, जिनके अपने 25 मई 2013 को झीरम की धरती पर हुए नक्सली हमले में जान गंवा बैठे।

    किसी मां ने अपना बेटा खोया था…

    किसी पत्नी ने अपना सुहाग…

    किसी बच्चे ने अपने पिता…

    और देश ने लोकतंत्र के प्रहरी।

     

    झीरम की वह शाम आज भी बस्तर के इतिहास के सबसे दर्दनाक अध्यायों में गिनी जाती है। गोलियों की आवाज में कई सपने हमेशा के लिए खामोश हो गए। कई घरों के चिराग बुझ गए। लेकिन उनकी शहादत ने लोकतंत्र की लौ को बुझने नहीं दिया।

    इसी बलिदान को चिरस्थायी बनाने और आने वाली पीढ़ियों को लोकतंत्र तथा देशप्रेम का संदेश देने के उद्देश्य से लालबाग में झीरम घाटी शहीद स्मारक बनाया गया। परिसर में विशाल राष्ट्रीय ध्वज भी स्थापित किया गया है।

    स्मारक परिसर में लगे बोर्ड पर उल्लेख है कि इन शहीदों ने लोकतंत्र की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति दी और उनका बलिदान आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बनेगा।

     

    फिर सवाल उठता है—

    जिस दिन पूरा देश तिरंगे को सलाम कर रहा था, उसी दिन झीरम के शहीदों की याद में बने स्मारक पर तिरंगा क्यों नहीं लहराया गया?

    क्या यह महज प्रशासनिक चूक थी? क्या कार्यक्रम की तैयारियों में यह स्मारक शामिल नहीं हो सका? क्या संबंधित जिम्मेदार अधिकारियों का ध्यान इस ओर नहीं गया? या फिर इसके पीछे कोई अन्य प्रशासनिक कारण रहा?

    इन सवालों का जवाब संबंधित प्रशासन ही स्पष्ट कर सकता है। बिना आधिकारिक स्पष्टीकरण के किसी राजनीतिक मंशा या जानबूझकर की गई कार्रवाई का निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। मगर सवाल उठना इसलिए जरूरी है, क्योंकि शहादत का सम्मान किसी दल, विचारधारा या राजनीति की सीमा में नहीं बंधना चाहिए।

    झीरम में जान गंवाने वालों में जनप्रतिनिधि, आम नागरिक और सुरक्षा में तैनात जवान भी शामिल थे। उनके खून का रंग एक था… उनकी अंतिम पहचान एक थी—भारतीय। उनकी शहादत पर राजनीति नहीं होनी चाहिए।

    तिरंगा भी किसी पार्टी का नहीं है। वह उस मां का है, जिसने अपना बेटा देश के लिए खोया। वह उस पत्नी का है, जिसने अपने जीवनसाथी को खो दिया। वह उस बच्चे का है, जिसने अपने पिता को तस्वीरों में ही देखा। और वह उन शहीदों का है, जिन्होंने लोकतंत्र की रक्षा के लिए अपनी जिंदगी कुर्बान कर दी।

     

    लालबाग मैदान में तिरंगा शान से लहरा रहा था। हवा में राष्ट्रगान की गूंज थी। लोगों के चेहरों पर देशभक्ति थी। लेकिन कुछ ही कदम दूर… झीरम के शहीद स्मारक पर तिरंगा नजर नहीं आया। झीरम के शहीदों का स्मारक मौन था। 

    शायद वह मौन ही सबसे बड़ा सवाल पूछ रहा था—

    “क्या हमें आज याद नहीं किया जाना था?”

    “क्या हमारी शहादत इतनी जल्दी भुला दी गई?”

    “जिस लोकतंत्र के लिए हमने अपनी जान दी, क्या उसी लोकतंत्र के राष्ट्रीय पर्व पर हमारे स्मारक पर तिरंगे के लिए भी जगह नहीं थी?”

    ये सवाल किसी व्यक्ति या राजनीतिक दल पर आरोप नहीं हैं। ये उस संवेदनशील भावना से जुड़े सवाल हैं, जो शहीदों के सम्मान को लेकर समाज के मन में उठना स्वाभाविक है।

    इन सवालों का कोई राजनीतिक जवाब नहीं होना चाहिए। इनका जवाब संवेदना और जिम्मेदारी के साथ दिया जाना चाहिए।

    स्वतंत्रता दिवस हर भारतीय का पर्व है और शहीद हर भारतीय की विरासत।

       जनता की भावुक अपील— अगली बार जब 15 अगस्त आए और लालबाग मैदान में तिरंगा शान से लहराए, तो उसकी एक झलक झीरम के शहीद स्मारक तक भी पहुंचे। जिस धरती ने लोकतंत्र की रक्षा के लिए अपने बेटे खोए हैं, वहां राष्ट्रीय ध्वज का सम्मान भी उसी गरिमा के साथ होना चाहिए। शहीदों के परिवारों के जख्म शायद कभी नहीं भरेंगे, लेकिन तिरंगे की छांव उन्हें यह एहसास जरूर करा सकती है कि देश अपने शहीदों को भूला नहीं है।

    क्योंकि शहीदों की तस्वीरों पर भले वक्त की धूल जम जाए, लेकिन उनकी शहादत पर देश की याद कभी धुंधली नहीं होनी चाहिए।क्योंकि शहीद किसी दल के नहीं होते… शहीद सिर्फ देश के होते हैं। और शायद यही झीरम के शहीदों को स्वतंत्रता दिवस पर दी जा सकने वाली सबसे सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

    जगदलपुर, शौर्यपथ। बस्तर सुआर्य राजपुरोहित तिवारी ब्राह्मण समाज का वर्ष 2026 का वार्षिक बैठक आमसभा ग्राम घाटलोहंगा के सामुदायिक भवन में रविवार को सम्पन्न हुआ। इस बैठक आमसभा में ग्राम घाटलोहंगा सहित सभी पाँच ग्राम तोकापाल, चितालूर, कविआसना, अरण्डी एवं जगदलपुर के सदस्य उपस्थित हुए। इस वार्षिक आमसभा में समाज के मुख्य बिंदुओं को रखा गया जिसके आय - व्यय लेखा - जोखा का ब्यौरा दिया गया, जिसके साथ ही साथ समाज के हितों की चर्चा भी की गयी, जिसमें काफी संख्या में सदस्य उपस्थित रहे। सारी गतिविधियों की जानकारी देने के पश्चात् सभी सदस्यों से अपने-अपने वार्षिक सदस्यता शुल्क जमा 250 रुपये एवं स्वेच्छा अनुदान राशि 50 रूपये जमा करने के लिए आग्रह किया गया तत्पश्चात आमसभा का समापन किया गया। समाज के सदस्यों में प्रेसविज्ञप्ति के माध्यम से अवगत कराया कि, वर्ष 1324 ईस्वी में जब वारंगल से काकतीय राजवंश महाराज अन्नमदेव बस्तर आये उस समय से सूआर्य राजपुरोहित भी इनके साथ बस्तर में बस गए। इस आमसभा में समाज के अध्यक्ष मन्ना प्रसाद तिवारी, लक्ष्मी प्रसाद तिवारी, उपाध्यक्ष, नवरतन तिवारी, संरक्षक, मिथिला प्रसाद तिवारी, कोषाध्यक्ष, घनश्याम तिवारी, सचिव, चंद्रशेखर तिवारी, सह-सचिव, खीरेंद्र तिवारी, पूर्णप्रकाश तिवारी, सुखनाथ तिवारी, अनंत तिवारी, गजेंद्र प्रसाद तिवारी, विपिन कुमार तिवारी, कामेंद्र प्रसाद तिवारी, कोर कमिटी सदस्य के साथ साथ भारी संख्या में समाज के सभी सदस्यगण उपस्थित रहे।

    By - नरेश देवांगन

    जगदलपुर, शौर्यपथ। वन विद्यालय जगदलपुर में सरकारी निर्माण के लिए मंगाए गए सीमेंट के खराब होने की खबर शौर्यपथ अख़बार ने प्रमुखता से प्रकाशित किया था। खबर सामने आने के बाद अब विभाग ने इसके रखरखाव का एक नया तरीका खोज लिया है। जानकारी सामने आई है कि शेड के नीचे रखे कुछ सीमेंट को अब वन विद्यालय परिसर के एक कमरे के अंदर रख दिया गया है। वहीं शेष सीमेंट को भी कमरे के अंदर रखने की तैयारी की बात सामने आ रही है।

     *सवाल यह है कि जो सीमेंट पहले ही पत्थर जैसा जम चुका है, उसे कमरे में रखने से आखिर बचेगा क्या?* 

    पहले सीमेंट को नमी से बचाने के लिए सुरक्षित भंडारण नहीं किया गया और अब जब उसके खराब होने की तस्वीर सामने आई तो उसे कमरे के अंदर रखकर सुरक्षा देने की कवायद शुरू हो गई। मानो सीमेंट की हालत नहीं, सिर्फ उसका पता बदलना जरूरी हो!

     *सीमेंट खराब होने के बाद कमरे की सुरक्षा या सरकारी नुकसान पर पर्दा?* 

    यदि सीमेंट वास्तव में उपयोग योग्य है, तो विभाग को उसका तकनीकी परीक्षण कराकर स्पष्ट करना चाहिए कि कितनी मात्रा निर्माण में इस्तेमाल करने लायक है। और यदि सीमेंट जमकर पत्थर बन चुका है, तो उसे कमरे में रखने के बजाय यह स्पष्ट होना चाहिए कि जनता के पैसे से खरीदी गई इस सामग्री के खराब होने की जिम्मेदारी आखिर किसकी है?

    सबसे बड़ा सवाल यह भी है कि पहले खुले या अपर्याप्त सुरक्षित स्थान पर रखा गया सीमेंट अब अचानक कमरे के अंदर रखने लायक कैसे हो गया? क्या यह कदम सीमेंट को बचाने के लिए है या फिर खराब हो चुकी सामग्री को नजरों से बचाने के लिए?

    वन विद्यालय प्रबंधन ने पहले दावा किया था कि सीमेंट ठीक है और निर्माण कार्य जल्द शुरू होगा। अब यदि सीमेंट को कमरे में सुरक्षित रखा जा रहा है, तो विभाग को यह भी सार्वजनिक करना चाहिए कि क्या उसकी गुणवत्ता की कोई जांच हुई है और क्या उसे निर्माण में इस्तेमाल करने की अनुमति तकनीकी रूप से दी गई है?

    जनता के पैसे से खरीदी गई सामग्री का हिसाब सिर्फ स्टॉक रजिस्टर में नहीं, जमीन पर भी दिखना चाहिए। पत्थर बन चुके सीमेंट को कमरे में रखने से सरकारी धन नहीं बचता—सवाल तो यह है कि वह पत्थर बना ही क्यों?

    अब जरूरत कमरे बदलने की नहीं, जिम्मेदारी तय करने की है।

    कोंडागांव, छत्तीसगढ़ | 

    छत्तीसगढ़ की पहचान केवल उसकी प्राकृतिक संपदा और हरियाली से नहीं, बल्कि उसकी समृद्ध लोक-संस्कृति, पारम्परिक कला, लोकगीत, लोकनृत्य, स्थानीय बोलियों, साहित्य और कृषि परम्पराओं से भी है। विशेष रूप से बस्तर अंचल की सांस्कृतिक विरासत अपने आप में एक जीवंत इतिहास है, जिसे पीढ़ी-दर-पीढ़ी हमारे लोक कलाकारों, साहित्यकारों, शिल्पकारों और समाज ने अपने जीवन और सृजन के माध्यम से संजोकर रखा है।

    इसी गौरवशाली सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित, संवर्धित और आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाने के उद्देश्य से कोंडागांव जिले में “बस्तर सांस्कृतिक, साहित्यिक एवं कला परिषद” का गठन किया गया। स्थानीय कलाकारों एवं संस्कृति प्रेमियों की सर्वसम्मत सहमति से श्री गोकुल वैद्य को परिषद का अध्यक्ष नियुक्त किया गया। परिषद का यह प्रयास बस्तर की लोक परम्पराओं, स्थानीय भाषाओं-बोलियों, साहित्य, कला और कलाकारों को एक सशक्त मंच प्रदान करने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल है।

    इसी सांस्कृतिक संकल्प को आगे बढ़ाते हुए बस्तर सांस्कृतिक, साहित्यिक एवं कला परिषद, कोंडागांव द्वारा दिनांक 16 अगस्त 2026 को छत्तीसगढ़-बस्तर की माटी, संस्कृति, लोककला एवं कृषि परम्परा से जुड़े हमारे गौरवशाली हरेली (अमुस) तिहार के पावन अवसर पर “हरेली महोत्सव 2026” का भव्य आयोजन किया गया।

    हरेली केवल एक पर्व नहीं, बल्कि किसान, खेत, प्रकृति, पशुधन, कृषि औजार और धरती माता के प्रति हमारी कृतज्ञता का लोकपर्व है। इस अवसर पर आयोजित महोत्सव ने बस्तर की माटी में रची-बसी परम्पराओं को मंच पर जीवंत कर दिया।

    ? अतिथियों की गरिमामयी उपस्थिति

    हरेली महोत्सव 2026 में मुख्य अतिथि माननीया सुश्री लता उसेंडी, विधायक कोंडागांव एवं उपाध्यक्ष, बस्तर विकास प्राधिकरण, माननीया सुश्री मोना सेन, अध्यक्ष, राज्य फिल्म विकास निगम, छत्तीसगढ़ शासन तथा माननीया श्रीमती शालिनी राजपूत, अध्यक्ष, हस्तशिल्प विकास बोर्ड, छत्तीसगढ़ शासन की गरिमामयी उपस्थिति रही।

    वहीं विशिष्ट अतिथियों के रूप में छत्तीसगढ़ एवं बस्तर की कला-संस्कृति के गौरव—

    पद्मश्री श्री पंडी राम मंडावी — काष्ठ शिल्पकार एवं जनजातीय वाद्य यंत्र विशेषज्ञ,

    पद्मश्री श्रीमती ऊषा वारले — पंडवानी गायिका,

    पद्मश्री श्री अजय कुमार मंडावी — काष्ठ शिल्पकार,

    माननीय श्री राजेन्द्र बघेल — राष्ट्रपति पुरस्कृत अंतर्राष्ट्रीय बेलमेटल शिल्पकार,

    श्री पंचुराम सागर — राष्ट्रपति पुरस्कृत अंतर्राष्ट्रीय बेलमेटल शिल्पकार,

    श्री तीजु राम विश्वकर्मा — राष्ट्रपति पुरस्कृत अंतर्राष्ट्रीय लौह शिल्पकार,

    श्री अविनाश प्रसाद — फिल्म निर्देशक,

    श्री राकेश यादव — फिल्म अभिनेता,

    श्री नरपती पटेल — अध्यक्ष, नगर पालिका परिषद, कोंडागांव,

    तथा श्री जशकेतु उसेंडी — उपाध्यक्ष, नगर पालिका परिषद, कोंडागांव

    की उपस्थिति ने समारोह की गरिमा को और अधिक बढ़ाया।

    ? मंच पर साकार हुई बस्तर की आत्मा

    हरेली महोत्सव में छत्तीसगढ़ और बस्तर की लोक-संस्कृति का ऐसा मनोहारी रंग देखने को मिला, जिसमें लोकगीतों की मिठास, लोकनृत्यों की थिरकन, पारम्परिक वाद्य यंत्रों की गूंज और जनजातीय परम्पराओं की जीवंतता एक साथ दिखाई दी।

    मंच पर प्रस्तुत रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रमों में कलाकारों ने अपनी प्रतिभा के माध्यम से बस्तर की उस सांस्कृतिक आत्मा को अभिव्यक्त किया, जो सदियों से जल, जंगल, जमीन, प्रकृति और सामुदायिक जीवन के साथ जुड़ी हुई है।

    पारम्परिक वेशभूषा में सजे कलाकार, लोकवाद्यों की धुन पर थिरकते कदम, जनजातीय नृत्य की ऊर्जा और लोकगीतों की स्वर-लहरियाँ पूरे वातावरण को बस्तर की माटी की सुगंध से भर रही थीं। ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो बस्तर की संस्कृति स्वयं मंच पर उतरकर अपनी कहानी सुना रही हो।

    ? कलाकारों का सम्मान — हमारी संस्कृति का सम्मान

    इस महोत्सव की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में से एक रहा हमारे उन लोक कलाकारों, शिल्पकारों और संस्कृति साधकों का सम्मान, जिन्होंने अपना जीवन छत्तीसगढ़ की पारम्परिक कला एवं सांस्कृतिक विरासत को समर्पित किया है।

    काष्ठ शिल्प, बेलमेटल शिल्प, लौह शिल्प, जनजातीय वाद्य यंत्र, पंडवानी, लोकनृत्य और लोकसंगीत जैसे क्षेत्रों में अपनी विशिष्ट पहचान बनाने वाले कलाकारों का सम्मान वास्तव में केवल व्यक्ति का सम्मान नहीं, बल्कि उनकी कला, उनकी परम्परा और बस्तर की सांस्कृतिक अस्मिता का सम्मान है।

    समारोह के दौरान सम्मान एवं स्मृति-चिह्न प्रदान किए जाने के अनेक भावुक और गौरवपूर्ण क्षण कैमरे में कैद हुए। ये तस्वीरें आने वाले समय में इस बात की साक्षी रहेंगी कि कोंडागांव ने अपनी सांस्कृतिक विरासत को केवल याद नहीं किया, बल्कि उसे सम्मान के साथ मंच भी दिया।

    ? संस्कृति तभी जीवित रहती है, जब नई पीढ़ी उससे जुड़ती है

    आज आधुनिकता और तेजी से बदलते सामाजिक परिवेश के बीच स्थानीय बोलियों, पारम्परिक कलाओं, लोकगीतों, लोकनृत्यों और मौखिक साहित्य के संरक्षण की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक है।

    बस्तर सांस्कृतिक, साहित्यिक एवं कला परिषद का प्रयास इसी दिशा में एक सकारात्मक कदम है। आवश्यकता इस बात की है कि हम अपनी जड़ों से जुड़े रहें, अपने लोक कलाकारों को सम्मान दें, स्थानीय भाषाओं और बोलियों को बचाएँ तथा बच्चों और युवाओं को अपनी संस्कृति से जोड़ें।

    क्योंकि संस्कृति केवल संग्रहालयों में रखी कोई वस्तु नहीं है।

    संस्कृति हमारी पहचान है।

    संस्कृति हमारी स्मृति है।

    संस्कृति हमारी जड़ों की आवाज है।

    और संस्कृति ही आने वाली पीढ़ियों के लिए हमारी सबसे अनमोल विरासत है।

    ? हरेली महोत्सव का संदेश

    हरेली महोत्सव 2026 ने यह संदेश दिया कि कृषि और संस्कृति एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं। खेतों में अन्न उगाने वाला किसान हो या अपनी कला से बस्तर की पहचान बनाने वाला कलाकार—दोनों हमारी धरती और हमारी परम्परा के सच्चे संवाहक हैं।

    कोंडागांव की धरती पर आयोजित यह आयोजन निश्चित रूप से केवल एक सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि बस्तर की अस्मिता, गौरवशाली परम्पराओं और लोकजीवन को संरक्षित करने का एक सांस्कृतिक संकल्प था।

    आज जब हम इन तस्वीरों को देखते हैं तो इनमें केवल मंच, कलाकार और सम्मान समारोह दिखाई नहीं देते, बल्कि इनके पीछे बस्तर की सदियों पुरानी संस्कृति, लोकजीवन की सरलता, कलाकारों का समर्पण और अपनी पहचान को बचाए रखने का संकल्प दिखाई देता है।

    “हमारी संस्कृति • हमारी पहचान • हमारा अभिमान”

    हरेली महोत्सव 2026 की ये स्मृतियाँ कोंडागांव और बस्तर की उस जीवंत सांस्कृतिक यात्रा की अमिट तस्वीरें हैं, जिसे आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाना हम सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है।

    बस्तर की माटी को नमन।

    लोक कलाकारों को नमन।

    हमारी संस्कृति और परम्पराओं को नमन।

    हरेली तिहार की हार्दिक शुभकामनाएँ। ??

    नरेश देवांगन 

    जगदलपुर, शौर्यपथ। सुशासन के दावों के बीच वन मंत्री के गढ़ में ही कुशासन की तस्वीर सामने आई है। साय सरकार सरकारी धन की बर्बादी रोकने और लापरवाही बरतने वालों पर कार्रवाई की बात करती है, लेकिन वन मंत्री केदार कश्यप के विभाग से जुड़े वन विद्यालय जगदलपुर में सरकारी निर्माण सामग्री की दुर्दशा विभागीय निगरानी पर सवाल खड़े कर रही है। मंत्री के लगातार बस्तर दौरे के बावजूद जिला मुख्यालय पर ही यदि सरकारी सामग्री खराब होने की स्थिति में पहुंच जाए, तो सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर निगरानी हो कहां रही है और जिम्मेदारी किसकी है?

    वन विद्यालय जगदलपुर में निर्माण कार्य के लिए मंगाया गया बड़ी मात्रा में सीमेंट उचित रखरखाव के अभाव में बोरियों में ही जमकर पत्थर जैसा हो गया है। मौके पर पड़े ढेर को देखकर इसकी मात्रा लगभग 800 बोरी से अधिक होने का अनुमान है। हालांकि वास्तविक मात्रा विभागीय रिकॉर्ड और भौतिक सत्यापन के बाद ही स्पष्ट होगी।

    विभागीय सूत्रों के अनुसार, यहां बाउंड्रीवाल के साथ ऑडिटोरियम निर्माण का कार्य भी प्रस्तावित था। निर्माण अधूरा रहने के बाद सीमेंट को शेड के नीचे रखा गया, लेकिन पर्याप्त सुरक्षित भंडारण नहीं होने के कारण नमी आदि से सीमेंट खराब होने की स्थिति सामने आई है।

    सीमेंट खराब हुआ या सरकारी धन?

    सवाल यह है कि सीमेंट कब और कितनी मात्रा में खरीदा गया, उसकी कीमत कितनी थी, निर्माण कार्य कब से बंद है और सामग्री की सुरक्षा की जिम्मेदारी किस अधिकारी-कर्मचारी की थी? सरकारी पैसा लगाकर खरीदा गया सीमेंट निर्माण में इस्तेमाल होने से पहले ही पत्थर बन जाए, तो इसे महज संयोग मानें या निगरानी की नाकामी—इसका जवाब जांच से मिलना चाहिए।

    प्रशासन को तत्काल मौके का भौतिक सत्यापन कर सीमेंट की वास्तविक मात्रा, खरीद बिल-वाउचर, स्टॉक रजिस्टर, निर्माण कार्य और भंडारण व्यवस्था की जांच करनी चाहिए। यदि जांच में लापरवाही प्रमाणित होती है तो संबंधित अधिकारी-कर्मचारियों की जिम्मेदारी तय कर नियमानुसार सख्त कार्रवाई की जानी चाहिए।

    वही इस मामले पे जनता का कहना है की “सरकारी धन कोई निजी संपत्ति नहीं, जनता की गाढ़ी कमाई है; इसकी बर्बादी पर जवाबदेही तय होना जरूरी है।”

    इस मामले पर वन विद्यालय जगदलपुर के संचालक शमा फारुकी से जब फ़ोन पे जानकारी चाही गई तो उनका कहना है की सीमेंट ठीक है, ओर काम जल्द हि चालू हो जायेगा।

    " लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है की पत्थर बन चुके सीमेंट से जिम्मेदार अधिकारी निर्माण कार्य शुरू कैसे करेंगे? "

    By - नरेश देवांगन 

    जगदलपुर, शौर्यपथ। सुशासन के दावों के बीच वन मंत्री के गढ़ में ही कुशासन की तस्वीर सामने आई है। साय सरकार सरकारी धन की बर्बादी रोकने और लापरवाही बरतने वालों पर कार्रवाई की बात करती है, लेकिन वन मंत्री केदार कश्यप के विभाग से जुड़े वन विद्यालय जगदलपुर में सरकारी निर्माण सामग्री की दुर्दशा विभागीय निगरानी पर सवाल खड़े कर रही है। मंत्री के लगातार बस्तर दौरे के बावजूद जिला मुख्यालय पर ही यदि सरकारी सामग्री खराब होने की स्थिति में पहुंच जाए, तो सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर निगरानी हो कहां रही है और जिम्मेदारी किसकी है?

    वन विद्यालय जगदलपुर में निर्माण कार्य के लिए मंगाया गया बड़ी मात्रा में सीमेंट उचित रखरखाव के अभाव में बोरियों में ही जमकर पत्थर जैसा हो गया है। मौके पर पड़े ढेर को देखकर इसकी मात्रा लगभग 800 बोरी से अधिक होने का अनुमान है। हालांकि वास्तविक मात्रा विभागीय रिकॉर्ड और भौतिक सत्यापन के बाद ही स्पष्ट होगी।

    विभागीय सूत्रों के अनुसार, यहां बाउंड्रीवाल के साथ ऑडिटोरियम निर्माण का कार्य भी प्रस्तावित था। निर्माण अधूरा रहने के बाद सीमेंट को शेड के नीचे रखा गया, लेकिन पर्याप्त सुरक्षित भंडारण नहीं होने के कारण नमी आदि से सीमेंट खराब होने की स्थिति सामने आई है।

     

    सीमेंट खराब हुआ या सरकारी धन?

    सवाल यह है कि सीमेंट कब और कितनी मात्रा में खरीदा गया, उसकी कीमत कितनी थी, निर्माण कार्य कब से बंद है और सामग्री की सुरक्षा की जिम्मेदारी किस अधिकारी-कर्मचारी की थी? सरकारी पैसा लगाकर खरीदा गया सीमेंट निर्माण में इस्तेमाल होने से पहले ही पत्थर बन जाए, तो इसे महज संयोग मानें या निगरानी की नाकामी—इसका जवाब जांच से मिलना चाहिए।

    प्रशासन को तत्काल मौके का भौतिक सत्यापन कर सीमेंट की वास्तविक मात्रा, खरीद बिल-वाउचर, स्टॉक रजिस्टर, निर्माण कार्य और भंडारण व्यवस्था की जांच करनी चाहिए। यदि जांच में लापरवाही प्रमाणित होती है तो संबंधित अधिकारी-कर्मचारियों की जिम्मेदारी तय कर नियमानुसार सख्त कार्रवाई की जानी चाहिए।

    वही इस मामले पे जनता का कहना है की “सरकारी धन कोई निजी संपत्ति नहीं, जनता की गाढ़ी कमाई है; इसकी बर्बादी पर जवाबदेही तय होना जरूरी है।”

     

    इस मामले पर वन विद्यालय जगदलपुर के संचालक शमा फारुकी से जब फ़ोन पे जानकारी चाही गई तो उनका कहना है की सीमेंट ठीक है, ओर काम जल्द हि चालू हो जायेगा।

    " लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है की पत्थर बन चुके सीमेंट से जिम्मेदार अधिकारी निर्माण कार्य शुरू कैसे करेंगे? "

    पहले अपना घर तो साफ करिए साहब... मुख्य सड़क पर चालान, गौरव पथ पर महीनों से कचरे का अंबार

      रिपोर्टर : कृष्णा मंडल / लोकेशन : दंतेवाड़ा
    बचेली। स्वच्छ भारत मिशन और ‘स्वच्छ बचेली’ अभियान के तहत नगर पालिका द्वारा शहर को स्वच्छ रखने और गंदगी फैलाने वालों के खिलाफ लगातार चालानी कार्रवाई किए जाने के दावे किए जा रहे हैं। लेकिन इन दावों के बीच नगर के प्रमुख गौरव पथ पर जगह-जगह लगे कचरे के ढेर नगर पालिका की सफाई व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर रहे हैं।
    नगर पालिका द्वारा शहर के विभिन्न वार्डों, गलियों और मोहल्लों में घर-घर सूखा एवं गीला कचरा अलग-अलग रखने के लिए डस्टबिन वितरित किए गए हैं। घरों और दुकानों से नियमित कचरा संग्रहण के लिए कचरा वाहन तथा सफाई कर्मचारियों की व्यवस्था होने की बात भी कही जाती है। इसके बावजूद शहर के महत्वपूर्ण और व्यस्त मार्ग गौरव पथ के कई हिस्सों में कचरे के बड़े-बड़े ढेर दिखाई दे रहे हैं।

    कचरे के ढेर से दुर्गंध, राहगीर परेशान
    गौरव पथ पर लंबे समय से जमा कचरे के कारण आसपास के क्षेत्र में दुर्गंध फैल रही है। सड़क से गुजरने वाले राहगीरों और स्थानीय दुकानदारों को भी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। बरसात के मौसम में सड़क किनारे जमा कचरा और गंदगी नालियों में पहुंचकर जल निकासी की समस्या बढ़ा सकती है। साथ ही इससे मच्छरों और अन्य संक्रमण फैलाने वाले कीटों के पनपने का खतरा भी बढ़ सकता है।
    स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि नगर पालिका द्वारा नियमित रूप से कचरा उठाने और सफाई की व्यवस्था की जाए तो प्रमुख मार्ग पर इस तरह कचरे का ढेर लगने की स्थिति ही नहीं बनेगी।

    जनता पर चालान, लेकिन नगर पालिका की जवाबदेही कौन तय करेगा?
    इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि जब नगर पालिका द्वारा सार्वजनिक स्थानों पर गंदगी फैलाने वाले नागरिकों पर चालानी कार्रवाई की जा रही है, तो नगर पालिका की अपनी सफाई व्यवस्था की जवाबदेही कौन तय करेगा?
    स्वच्छता व्यवस्था केवल लोगों पर जुर्माना लगाने से प्रभावी नहीं हो सकती। इसके लिए नियमित कचरा संग्रहण, समय पर कचरा उठाव, सार्वजनिक स्थलों की सफाई और निगरानी की भी उतनी ही आवश्यकता है। नियम यदि नागरिकों के लिए हैं तो व्यवस्था की जिम्मेदारी नगर पालिका की भी है।
    स्थानीय नागरिकों का कहना है कि स्वच्छता के नियम सभी के लिए समान होने चाहिए। यदि आम नागरिकों से स्वच्छता बनाए रखने की अपेक्षा की जाती है और गंदगी फैलाने पर जुर्माना लगाया जाता है, तो नगर पालिका को भी अपने सफाई दायित्वों के प्रति जवाबदेह होना चाहिए।

    ‘स्वच्छ बचेली’ के दावों पर उठ रहे सवाल
    गौरव पथ जैसे प्रमुख मार्ग पर कचरे का अंबार नगर पालिका के ‘स्वच्छ बचेली’ अभियान के जमीनी क्रियान्वयन पर सवाल खड़े कर रहा है। नागरिकों का कहना है कि अभियान केवल प्रचार और चालानी कार्रवाई तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि उसका असर शहर की सड़कों और सार्वजनिक स्थानों पर भी नजर आना चाहिए।
    अब देखना होगा कि नगर पालिका इस मामले में कचरे के ढेर को हटाने के साथ-साथ नियमित सफाई व्यवस्था सुनिश्चित करती है या नहीं। साथ ही यह भी देखना महत्वपूर्ण होगा कि नगर पालिका अपने सफाई वाहनों और कर्मचारियों की व्यवस्था की प्रभावी निगरानी किस प्रकार करती है।
    फिलहाल गौरव पथ की तस्वीरें ‘स्वच्छ बचेली’ के दावों और जमीनी हकीकत के बीच अंतर की ओर इशारा करती नजर आ रही हैं।

    वन विभाग की सतर्कता से बची संरक्षित वन्यप्राणी की जान

    रायपुर / शौर्यपथ / वन मंत्री केदार कश्यप की मंशानुरूप और उनके संवेदनशील पहल के अनुरूप छत्तीसगढ़ में वन्यजीवों के संरक्षण के लिए लगातार प्रभावी कार्रवाई की जा रही है। इसी कड़ी में मोहला मानपुर अम्बागढ़ चौकी जिले के मोहला तहसील के ग्राम कुंजंटोला में वन विभाग की टीम ने दुर्लभ वन्यप्राणी पैंगोलिन का सफलतापूर्वक रेस्क्यू कर उसे सुरक्षित जंगल में छोड़ दिया।

    रविवार को ग्राम कुंजंटोला निवासी जयंत कुमार के घर में पैंगोलिन के घुसने की सूचना वन विभाग को मिली। सूचना मिलते ही वन विभाग की टीम तुरंत मौके पर पहुंची और पूरी सावधानी के साथ रेस्क्यू अभियान शुरू किया।

    वनमंडलाधिकारी के मार्गदर्शन में परिक्षेत्र अधिकारी पंकज पटेल के नेतृत्व में रेस्क्यू टीम ने पैंगोलिन को सुरक्षित पकड़कर आरक्षित वन क्षेत्र में छोड़ दिया। इस अभियान में डिप्टी रेंजर श्री महेंद्र बघेल और श्री शोभित राम यादव की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही।

    यह रेस्क्यू अभियान वन विभाग की त्वरित कार्रवाई, प्रशिक्षित टीम और वन्यजीव संरक्षण के प्रति संवेदनशील कार्यप्रणाली का अच्छा उदाहरण है। समय पर मिली सूचना और समन्वित प्रयासों के कारण एक दुर्लभ एवं संरक्षित वन्यप्राणी को सुरक्षित बचाया जा सका।

    वन विभाग ने ग्रामीणों से अपील की है कि यदि कहीं भी कोई वन्यजीव दिखाई दे, तो उसे नुकसान न पहुंचाएं और तुरंत वन विभाग को सूचना दें। लोगों की जागरूकता और सहयोग से वन्यजीवों का संरक्षण और भी प्रभावी ढंग से किया जा सकता है।

    उल्लेखनीय है कि पैंगोलिन वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 के तहत शेड्यूल-1 में शामिल अत्यंत संरक्षित प्रजाति है। इसके संरक्षण के लिए राज्य सरकार विशेष रूप से प्रतिबद्ध है। वन मंत्री श्री केदार कश्यप के निर्देश पर वन विभाग वन्यजीव संरक्षण, त्वरित रेस्क्यू और जनजागरूकता के क्षेत्र में लगातार सक्रिय रूप से कार्य कर रहा है।

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