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लाइफस्टाइल / शौर्यपथ / लंबे समय तक जिम बैग में आपके कपड़े रहते हैं, ऐसे में पसीने की बदबू आना लाजमी है। हम आपको इस लेख में कुछ घरेलू तरीके बता रहे हैं जिन्हें अपनाकर आप इस परेशानी से छुटकारा पा सकते हैं। आइए जानते हैं।
अधिकतर लोग जिम के कपड़ों को रोज नहीं धोते और वे उसे जिम बैग में रखना ज्यादा पसंद करते हैं। ऐसे में कपड़े ज्यादा दिनों तक गंदे रहते हैं और गंध आना शुरू हो जाती है। आप इस समस्या से निजात पाने के लिए जिम के कपड़ों को रोज धोएं, अच्छी तरह सुखाएं और फिर इस्तेमाल करें। इससे आपके कपड़े साफ और ताजे भी रहेंगे।
यदि आप अपने शुज को भी जिम बैग में रखते हैं तो आपको ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है। शूज को हफ्ते में 2 बार जरूर धोएं। इसके लिए आप डिटर्जेंट के पानी में अपने जिम के शूज को भिगोकर रखें और इसे अच्छी तरह साफ करके सुखा लें, फिर इनका इस्तेमाल करें।
आधी बाल्टी ठंडे पानी में 1 बड़ा चम्मच विनेगर मिलाएं। अब तैयार घोल में अपने जिम के कपड़ों को 20 मिनट के लिए भिगोएं, फिर साधारण तरीके से कपड़ों को धोएं। विनेगर बदबू को दूर करने में मददगार साबित होगा।
यदि आपके पास इतना समय नहीं है कि आप रोज जिम के कपड़े धोएं तो इन्हें आप सिर्फ धूप दिखाकर भी रख सकते हैं। ऐसा ही आप अपने शूज के साथ भी कर सकते हैं। ऐसे में कपड़ों और जूतों में से आ रही बदबू दूर हो जाएगी।
खाना खजाना /शौर्यपथ / पारंपरिक व्यंजन- घेवर
सामग्री :
2 कटोरी मैदा, 2 कप पानी, डेढ़ बड़ा चम्मच जमा गाढ़ा घी, डेढ़ कप बर्फ का ठंडा पानी, घी, सवा 2 कटोरी शकर, गुलाब पत्ती, चुटकी भर पीला रंग, कटे हुए पिस्ता व बादाम, 1 मटका रखने वाली रिंग।
विधि :
सबसे पहले जमा हुआ गाढ़ा घी लेकर एक बर्तन में बर्फ के ठंडे पानी के साथ खूब फेंटिए। करीबन 5-10 मिनट बाद घी में से पानी बाहर निकल जाता है। अब पानी निथारकर इसमें थोड़ा-थोड़ा कर मैदा मिलाकर फेंटिए।
जब भजिए से भी पतला घोल तैयार हो जाए, तब छोटी कड़ाही में मटका रखने वाली रिंग रखें। इसमें घी डालकर गर्म करें। जब घी अच्छी तरह गर्म हो जाए, तब रिंग के बीच में धीरे-धीरे धार-सी बनाते हुए मैदे का घोल छोड़ें। रिंग करीब आधा डूबा होना चाहिए।
हल्का बादामी होने लगे, तब सलाई की सहायता से घेवर उठा लीजिए। घेवर पर 3-4 बार डेढ़ तार की गर्म चाशनी डालें और तैयार घेवर को मेवे से सजाकर पारंपरिक व्यंजन पेश करें।
रक्षाबंधन विशेष- केसरी भात
सामग्री :
1 कटोरी बासमती चावल, डेढ़ कटोरी शकर, इलायची पावडर आधा चम्मच, 5-7 केसर के लच्छे, मीठा पीला रंग चुटकी भर या आधा चम्मच हल्दी, 15-20 किशमिश (गुनगुने पानी में भीगे हुए), 1 चम्मच घी, 2-3 लौंग, मेवे की कतरन (पाव कटोरी)।
विधि :
चावल बनाने के पूर्व 1 घंटे तक गलाकर रखें। अब एक बड़े मर्तबान में पानी उबाल लें। उसमें हल्दी डालें और चावल पकाकर थाली में ठंडा होने के लिए रख दें। दूसरी ओर एक से डेढ़ तार की चाशनी तैयार कर लें। उसमें पके चावल डालकर कुछ देर चलाएं।
अब इलायची एवं मीठा रंग मिलाएं। एक पैन या कड़छी में अलग से घी गर्म करके उसमें लौंग डालें और ऊपर से चावल पर बुरकाएं, साथ ही मेवे की कतरन और भीगे हुए किशमिश भी डालें और मिलाकर ठंडा या गर्म जैसे चाहे लजीज शाही केसरिया भात पेश करें।
राखी विशेष- शाही मखाना खीर
सामग्री :
1 लीटर दूध, 2 कप मखाने, 4 चम्मच चीनी, 1 चम्मच देसी घी, आधा चम्मच इलायची पावडर, किशमिश, काजू-बादाम की कतरन, किसा हुआ सूखा नारियल।
विधि :
सबसे पहले एक कड़ाही में घी गर्म करें और उसमें मखानों को डालकर भून लें, फिर भूनें हुए मखानों को प्लेट में निकालकर ठंडा करें और फिर उसे कूट लें।
अब दूध को उबलने दें, जब दूध उबल जाए तो उसमें कूटे हुए मखाने डालें और पकाएं, साथ ही चीनी भी डाल दें। जब दूध गाढ़ा हो जाएं तो उसमें किशमिश, काजू-बादाम की कतरन, इलायची पावडर और सूखा नारियल मिलाएं और तैयार मखाने की शाही खीर पेश करें।
राखी पर्व की स्वादिष्ट मिठाई- नारियल बर्फी
सामग्री :
250 खोपरा बूरा (नारियल का बूरा), 100 ग्राम मावा, 200 ग्राम शकर, 1 चम्मच घी, 1 चम्मच इलायची पावडर, चांदी का वर्क, 2-3 केसर के लच्छे, चुटकी भर मीठा पीला रंग (1 कटोरी में पाव चम्मच दूध में घोल लें)।
विधि :
बर्फी बनाना शुरू करने से पहले मावे को किसनी से कद्दूकस कर लें, फिर कड़ाही में धीमी आंच पर गुलाबी होने तक सेंक लें। मावा ठंडा होने पर खोपरा बूरा मिला दें। तत्पश्चात डेढ़ तार की चाशनी तैयार करें। इस चाशनी में खोपरा बूरा, मावा, मीठा पीला रंग व इलायची पावडर मिला दें तथा मिश्रण को अच्छी तरह मिक्स कर लें। अब इसमें घी मिलाएं तथा पुन: हिलाएं।
अब एक थाली में थोड़ा-सा घी लगाकर उसमें तैयार मिश्रण फैला दें। ठंडा होने पर चौकोर आकार में काट लें। ऊपर से चांदी का वर्क लगाएं एवं केसर बुरक दें। लीजिए तैयार है लाजवाब नारियल बर्फी।
रक्षाबंधन पर खास शाही बादाम पाक
सामग्री :
1 कटोरी बादाम (पिसी हुई), 2 कटोरी शकर, 3 कटोरी घी, 1 कटोरी पानी।
विधि :
शकर में पानी डालकर शकर गलने तक चाशनी बनाकर पिसी हुई बादाम डालकर एक हाथ से हिलाते हुए घी डालते जाएं और तब तक हिलाते रहें, जब तक कि घी छूटने न लगे। जब मिश्रण हल्का गुलाबी हो जाए, तब थाली में चलनी रखकर मिश्रण डालें। ऊपर से पानी के छींटें देकर बादाम मैसूर पाक के मनचाहे आकार के पीस कर लें।
राखी विशेष : नारियल-मिश्री के लड्डू
सामग्री :
150 ग्राम सूखे खोपरे का बूरा, 200 ग्राम मिल्कमेड, 1 कप गाय के दूध की ताजी मलाई, आधा कप गाय का दूध, इलायची पावडर, 5 छोटे चम्मच मिल्क पावडर, कुछेक लच्छे केसर।
भरावन की सामग्री : 250 ग्राम मिश्री बारीक पिसी हुई, पाव कटोरी पिस्ता कतरन, 1 चम्मच मिल्कमेड, दूध मसाला 1 चम्मच।
विधि :
सबसे पहले खोपरा बूरा, मिल्कमेड, दूध, मिल्क पावडर और पिसी इलायची को अच्छी तरह मिला लें। तत्पश्चात माइक्रोवेव में 5-7 मिनट तक इसे माइक्रो कर लें। अब भरावन सामग्री को अलग से एक कटोरे में मिक्स कर लें। एक छोटी कटोरी में 4-5 केसर के लच्छे कम पानी में गला दें।
अब माइक्रोवेव से निकले मिश्रण को 10-15 तक सूखने दें, फिर उसमें भरावन मसाला सामग्री डालकर मिश्रण को अच्छी तरह मिलाएं और उसके छोटे-छोटे लड्डू बना लें। सभी लड्डू तैयार हो जाने पर उनके ऊपर केसर का टीका लगाएं। ऊपर से केसर-पिस्ता से सजाएं और लाजवाब नारियल-मिश्री के लड्डू के लड्डू पेश करें।
राखी स्पेशल- मैसूर पाक
सामग्री :
150 ग्राम बेसन, घी आवश्यकतानुसार, शकर 200 ग्राम, 1 चम्मच इलायची पावडर, पिस्ता कतरन पाव कटोरी।
विधि :
एक कड़ाही में शकर और 1/2 कटोरी पानी डालकर गाढ़ी चाशनी बनाएं, दूसरी ओर घी में बेसन डालकर भूनें। अब चाशनी को धीरे-धीरे सिंके हुए बेसन में डालें व बराबर हिलाती रहें। दूसरे हाथ से गर्म घी 1-1 चम्मच करके बेसन पर डालती रहें।
बेसन जब भूरा होने लगे तो उसमें इलायची बुरकाकर घी लगी थाली में फैला दें। यह जल्दी ही जमता है अत: जमने की प्रक्रिया शुरू होते ही चाकू की सहायता से मनचाहे आकार में काट लें। लीजिए तैयार है लजीज रसभरा मैसूर पाक। यह बहुत सारे घी, बेसन, मेवा व शकर से निर्मित कर्नाटक का मीठा व्यंजन है।
टिप्स / शौर्यपथ / त्योहार का मौसम हो और पकवानों की बात न हो, ऐसा भला कैसे संभव है? आपके लिए हैं अलग-अलग तरह की मिठाई बनाने के कुछ विशेष टिप्स।
1. मालपुआ बनाते समय उसमें थोड़ी सूजी मिला दीजिए, इससे मालपुआ खस्ता बनेगा।
2. खीर बनाते समय कड़ाही में शक्कर पिघलाकर उसमें दूध मिलाकर औटा लेने से तो कम समय में दूध गाढ़ा हो जाता है और स्वादिष्ट खीर बनती है।
3. सेवइयां को गाढ़ी व स्वादिष्ट बनाने के लिए बनाते समय उसमें जरा-सा कस्टर्ड पावडर मिला दें। सेवइयों का स्वाद बढ़ जाएगा।
4. बेसन के लड्डू बनाते समय भुने बेसन में दूध के छींटे दें और गरम घी मिलाएं। जहां तक हो सके शक्कर का बूरा प्रयोग करें। ये लड्डू दिखने में दानेदार दिखेंगे और खाने में अधिक स्वादिष्ट लगेंगे।
5. बर्फी को और अधिक लुभावनी बनाने के लिए किसी भी बर्फी पर, किसी नए टूथब्रश पर कोई भी खाने वाला हल्का रंग लगाकर ब्रश को हल्के हाथ से दबाएं जिससे रंग बर्फी पर छिड़काव की तरह फैल जाएगा और बर्फी सुंदर दिखाई देगी। खासकर सफेद रंग की बर्फी पर तो अधिक लुभावनी दिखाई देगी।
6. बेसन के लड्डू बनाना हो तो बेसन रवेदार होना चाहिए।
7. कस्टर्ड में यदि गुठलियां पड़ गई है तो घबराएं नहीं उसे छलनी से छान लें और फिर गुठलियों में थोड़ा दूध डालकर मिक्सी में चला दें।
8. चावल या गाजर की खीर बनाते समय शकर अंत में डालें, वरना चावल या गाजर कच्चे रह जाएंगे। शकर डालने के बाद दूध को थोड़ी देर और उबालें।
9. मूंग दाल का हलवा बनाते समय पिसी दाल को भूनने पर वह कड़ाही में चिपकता है इसीलिए भूनते समय उसमें थोड़ा-सा बेसन मिला दिया जाए, तो दाल कड़ाही से चिपकेगी भी नहीं और भूनना भी आसान होगा।
10. किसी भी मिठाई को बनाते समय जो भी खुशबू डालना है, वह मिठाई ठंडी होने पर डालें, जैसे इलायची, जायफल आदि।
11. जब भी बर्फी बनाना हो तो मिश्रण को आंच से उतारने के बाद थोड़ी देर तक कड़ाही में अच्छी तरह चलाएं, इससे बर्फी अच्छी बनती है।
12. खीर बनाते समय यदि दूध पतला हो तो उसमें थोड़ी-सी खसखस या चावल पीसकर डाल देना चाहिए, इससे खीर गाढ़ी भी बनेगी और स्वाद भी बढ़ेगा।
13. घर पर बाजार में मिलने वाली दानेदार एवं खस्ता बेसन की बर्फी बनाने के लिए बेसन में थोड़ी-सी भुनी हुई सूजी मिला दें। इससे बर्फी खस्ता होकर उसका स्वाद भी बढ़ जाएगा।
धर्म संसार / शौर्यपथ / शिव के प्रिय मास श्रावण में चारों ओर धर्म का पवित्र वातावरण बन जाता है। इस माह का लाभ सभी को उठाना चाहिए। इस माह में जपे गए मंत्र सिद्ध और असरकारी होते हैं। शिव को प्रसन्न करते हैं।
इस माह में सर्वव्याधि नाश, बुद्धि, व ज्ञानवृद्धि, ऐश्वर्य प्राप्ति, सुख-सौभाग्य आदि के लिए भगवान शिव की पूजा करके दुग्ध की धारा से अभिषेक करते हुए निम्न मंत्रों का जाप करना चाहिए। आइए जानिए श्रावण मास के कुछ खास विशेष मंत्र-
श्रावण मास विशेष : 10 शिव मंत्र
1. ॐ जुं स:।
2. ॐ हौं जूं स:।
3. ॐ त्र्यंम्बकम् यजामहे, सुगन्धिपुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान्, मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्।।'
4. 'ॐ ऐं नम: शिवाय।
5. 'ॐ ह्रीं नम: शिवाय।'
6. 'ऐं ह्रीं श्रीं 'ॐ नम: शिवाय' : श्रीं ह्रीं ऐं
7. चंद्र बीज मंत्र- 'ॐ श्रां श्रीं श्रौं स: चंद्रमसे नम:', चंद्र मूल मंत्र 'ॐ चं चंद्रमसे नम:'।
8. शिव गायत्री मंत्र- ॐ तत्पुरुषाय विद्महे, महादेवाय धीमहि, तन्नो रूद्र प्रचोदयात्।।
9. ॐ नमः शिवाय
10. ॐ ऐं ह्रीं शिव गौरीमय ह्रीं ऐं ऊं।
श्रावण मास में सिर्फ 'दारिद्रयदहन शिवस्तोत्रम्' पढ़ने से बेशुमार धन संपदा मिलने के योग बनते हैं।
दारिद्रयदहन शिवस्तोत्रम् :
विश्वेश्वराय नरकार्णवतारणाय
कर्णामृताय शशिशेखरधारणाय।
कर्पूरकांतिधवलाय जटाधराय
दारिद्रयदुःखदहनाय नमः शिवाय ॥1॥
गौरीप्रियाय रजनीशकलाधराय
कालान्तकाय भुजगाधिपकङ्कणाय।
गङ्गाधराय गजराजविमर्दनाय ॥दारिद्रय. ॥2॥
भक्तिप्रियाय भवरोगभयापहाय
उग्राय दुर्गभवसागरतारणाय।
ज्योतिर्मयाय गुणनामसुनृत्यकाय ॥ दारिद्रय. ॥3॥
चर्माम्बराय शवभस्मविलेपनाय
भालेक्षणाय मणिकुण्डलमण्डिताय।
मञ्जीरपादयुगलाय जटाधराय ॥ दारिद्रय. ॥4॥
पञ्चाननाय फणिराजविभूषणाय
हेमांशुकाय भुवनत्रयमण्डिताय।
आनंतभूमिवरदाय तमोमयाय ॥दारिद्रय. ॥5॥
भानुप्रियाय भवसागरतारणाय
कालान्तकाय कमलासनपूजिताय।
नेत्रत्रयाय शुभलक्षणलक्षिताय ॥दारिद्रय. ॥6॥
रामप्रियाय रघुनाथवरप्रदाय
नागप्रियाय नरकार्णवतारणाय।
पुण्येषु पुण्यभरिताय सुरार्चिताय ॥ दारिद्रय. ॥7॥
मुक्तेश्वराय फलदाय गणेश्वराय
गीतप्रियाय वृषभेश्वरवाहनाय।
मातङग्चर्मवसनाय महेश्वराय ॥ दारिद्रय. ॥8॥
वसिष्ठेन कृतं स्तोत्रं सर्वरोगनिवारणम्।
सर्वसम्पत्करं शीघ्रं पुत्रपौत्रादिवर्धनम्।
त्रिसंध्यं यः पठेन्नित्यं स हि स्वर्गमवाप्नुयात् ॥9॥
उपरोक्त मंत्रों का जाप कम से कम 108 बार अवश्य करें। साथ इन मंत्रों के जाप और इस स्तोत्र का पाठ करने से आप सुख, सौभाग्य और ऐश्वर्य सभी कुछ पा सकते हैं।
मेरी कहानी / शौर्यपथ / वह स्याह दौर ऐसा था, जब घोड़े भी गुलामों से ज्यादा खुश नजर आते थे। घोडे़ कभी-कभी ही काम में लगते थे, खूब खाते थे, गुलामों के हाथों नहाने-सहलाने की सेवा पाते थे, पर गुलामों के लिए क्या दिन-क्या रात? लगे रहो मशीन की तरह। ऊपर से मालिक की नजर टेढ़ी हो जाए, तो खैर नहीं। उस दिन अस्तबल में 16 साल का गुलाम डगलस अपने मालिक के घोड़ों की सेवा में लगा था। पीछे से उसका श्वेत मालिक दबे पांव दाखिल हुआ। हाथों में रस्सी लिए आते ही डगलस का एक पैर पकड़ लिया। डगलस चौंका, अगले ही पल समझ गया कि मालिक उसे बांधने वाला है, फिर पीटेगा और हो सकता है, जान ही ले ले।
लड़के का अपराध था कि उसने अपने मूल मालिक से जाकर अत्याचार की शिकायत की थी। हालांकि वहां भी सुनवाई नहीं हुई थी। सब जानते थे कि कोवे नाम का यह खेत मालिक अश्वेतों का मनोबल तोड़ने के लिए कुख्यात है। गुलामों के शौकीन घटिया लोग कहते थे, जब किसी गुलाम के पर निकलने लगें, तो उसे कोवे के हवाले कर दो। कोवे की बड़ी दहशत थी। पिछली बार मालिक ने बीमार होने के बावजूद पैरों से ठोकर मार-मारकर अधमरा कर दिया था। जब पांच घंटे तक घिसटते हुए डगलस अपने मूल मालिक के पास पहुंचा, तो सिर से पैर तक सूखे, ताजा खून से सना हुआ था। फिर भी मूल मालिक ने कोवे को बढ़िया इंसान बताकर बचाव किया। वह हैवानियत का ऐसा दौर था, जब ज्यादातर श्वेत आपस में मिले होते थे। अश्वेतों के विलाप पर कान न देना उनकी आदत में शुमार था।
जाहिर है, डगलस को लौटना पड़ा और आते ही पैरों में रस्सी बांधकर जानवरों से भी बुरे बर्ताव की तैयारी नुमाया हो गई। उसने तत्काल कूदकर पैर को छुड़ाया। न जाने कहां से ताकत उमड़ आई कि नहीं, अब अपने को बचाना है, अब मार खाए, तो मर ही जाएंगे। डगलस अपनी चुस्त कद-काठी के साथ तनकर खड़ा हो गया, कोवे घूरकर झपटा, लेकिन उसके गिरेबां पर दो मजबूत हाथ आ लगे। कोवे चिल्लाया, ‘तो तुमने तय कर लिया है, तुम लड़ना चाहते हो?’ उसे उम्मीद थी कि डगलस इतना सुनते ही गिरेबां छोड़ देगा, पैरों में गिरकर गिड़गिड़ाएगा। लेकिन इस बार वक्त एक नई कहानी लिख रहा था।
दर्द से भरे डगलस ने कोवे के गिरेबां को और कसते हुए अपनी मंशा का इजहार कर दिया। कोवे के बुलाने पर एक आदमी दौड़ा-दौड़ा आया, उसने डगलस को जैसे ही पीछे से पकड़ा, छाती के ठीक नीचे पसलियों पर कोहनी का जोरदार वार पड़ा। चोट खाने वाला अपना दर्द थामे जमीन पर गोल हो गया। अब तो कोवे की हालत और बिगड़ी। एक और गुलाम दौड़कर आया, लेकिन यह कहते हुए मदद करने से मुकर गया कि वह यहां काम करने के लिए भेजा गया है, लड़ाई में भाग लेने के लिए नहीं। अब अस्तबल में रह गए कोवे और डगलस। गुत्थमगुत्था। कोवे सोच रहा था कि यह 16 साल का लड़का ही तो है, शुरुआती ताकत दिखा रहा है, पकड़ ढीली पड़ते ही इसे रगड़ दूंगा। यह बात डगलस भी जानता था कि कोवे को मौका नहीं देना है। एक भी मौका दिया, तो शामत टूट पड़ेगी। अब जब पकड़ ही लिया है, तो जोर आजमाइश हो ही जाए। कब तक इस गोरे का अत्याचार सहते रहेंगे? पिछले छह महीनों में इसने मार-मारकर शरीर को घाव बना दिया है। हमें भी दर्द होता है भाई, जैसे तुम्हें अभी मेरी जकड़न में हो रहा है।
जकड़ने-रगड़ने में दोनों जमीन पर गिर गए। कोवे ने जब नाखून गड़ाने की कोशिश की, तो उसे और ज्यादा प्यासे नाखूनों को भुगतना पड़ा। छोटी थप्पड़ का जवाब बड़ी थप्पड़ से और हल्के मुक्के का जवाब भारी मुक्के से मिला। कोवे को यह भी चिंता हो रही थी कि इलाके के लोग कहीं यह लड़ाई न देख लें। वह सिर घुमाकर इधर-उधर देख लेता था और कोशिश करता था कि किसी आड़ में ही लड़ाई हो। पूरे दो घंटे लड़ाई के बाद कोवे की हिम्मत टूट गई, पर वह पुलिस के पास नहीं गया। वह नहीं चाहता था, लोग जानें कि उसकी पिटाई हुई है, वह भी एक लड़के के हाथों। फायदा यह हुआ कि डगलस अत्याचार से बच गए।
मनोबल एकदम से बढ़ गया और बस चार साल लगे, गुलामी दूर हो गई। फ्रेडरिक डगलस (1818-1895) ने गुलामों को आजाद कराने, समाज सुधारने, नस्लभेद, रंगभेद से लड़ने, खूब लिखने और भाषण देने में अपना जीवन लगा दिया। फ्रेडरिक डगलस अमेरिका में उप-राष्ट्रपति पद की दौड़ में शामिल होने वाले पहले अश्वेत थे। आज उन्हें पूरा अमेरिका सम्मान देता है। वह आज भी प्रेरणास्रोत हैं, तन, मन, धन से बलवान बनो, क्योंकि बल न काला होता है, न गोरा। बल से कोई तुम्हें गुलाम बना सकता है और बल से ही तुम गुलाम बनने से बच सकते हो।
प्रस्तुति : ज्ञानेश उपाध्याय फ्रेडरिक डगलस समाज सुधारक नेता
जीना इसी का नाम है / शौर्यपथ / अमेरिकी प्रांत कैनसस में एक छोटा-सा शहर है जंक्शन सिटी। आज भी बमुश्किल पच्चीस-तीस हजार की आबादी होगी। वारेन एडम्स और मैरी एडम्स इसी शहर के बाशिंदे थे। फौजी पृष्ठभूमि होने की वजह से दोनों की मुलाकात दूसरे विश्व युद्ध के दौरान हुई थी। वारेन एक सैनिक थे और मैरी उन दिनों नर्सिंग की पढ़ाई कर रही थीं। जब युद्ध छिड़ा, मैरी ने अपने माता-पिता को बताए बिना ही फौज ज्वॉइन कर ली थी। उस समय लगभग डेढ़ लाख अमेरिकी महिलाओं ने मैरी की तरह देशसेवा का प्रण लिया था। नर्सिंग का प्रशिक्षण पूरा होने के बाद मैरी को कैनसस के फोर्ट रिले में नियुक्ति मिल गई, जहां वह जख्मी सैनिकों की खिदमत करती थीं।
एडम्स दंपति के पास दौलत भले न थी, मगर उनमें प्यार और हौसला खूब था, और इसकी बदौलत ही वे एक सुकून भरी जिंदगी जी रहे थे। मियां-बीवी, दोनों काफी मेहनत करते, ताकि अपने पांचों बच्चों को जमाने के लिहाज से सारी सुविधाएं दे सकें। इन्हीं पांच संतानों में से एक हैं मैरीलीन हेसन। मैरीलीन जब नौ साल की थीं, तब अचानक पिता का साया उन सबके सिर से उठ गया। वारेन एडम्स दिल के दौरे का शिकार हो गए थे। हालांकि, उसके पहले वह कभी बीमार नहीं पडे़ थे, इसलिए पांच से 15 साल के बच्चों को समझ में ही नहीं आ रहा था कि यह क्या हुआ?
मैरी एडम्स के पास पति की मौत का शोक मनाने का वक्त नहीं था। वह एक हिम्मती महिला थीं और फिर घर के हालात भी इसकी इजाजत नहीं देते थे। अपने बच्चों को मायूस, पस्तहिम्मत देखना उन्हें गवारा नहीं हुआ। उन्होंने ऑफिस जाना शुरू कर दिया। काम पर जाने से पहले वह पांचों बच्चों की एक-एक जरूरत का ख्याल रखतीं और सबको कोई न कोई एक सबक देकर निकलतीं, ताकि वे अनुशासन में रहें।
घर की कमाई आधी रह गई थी, मगर पांच-सात साल के बच्चे इतने होशमंद कहां होते हैं कि मां की मजबूरियों को समझ पाते? वे कई बार किसी चीज की जिद करने लगते, तो मां उदास हो जातीं। पर नौ साल की मैरीलीन मां की पीड़ा समझने लगी थीं। अतंत: मैरी एडम्स ने वॉर बॉन्ड की राशि से एक इमारत खरीदी, जिसमें चार छोटे-छोटे अपार्टमेंट थे। उन्होंने उनको किराये पर लगाया, ताकि कुछ पैसे आ सकें। लेकिन बच्चे बड़े हो रहे थे, और सबके स्कूल-कॉलेज के खर्चे व घर की जरूरतें भी बढ़ती जा रही थीं। पैसे कम पड़ ही जाते। अंतत: उन्होंने बच्चों के स्कूल के कैफेटेरिया में पार्ट टाइम नौकरी भी की, ताकि कुछ कमाई के साथ-साथ बच्चों के करीब रह सकें। उनका अब बस एक ही सपना था कि बच्चे अच्छी तालीम हासिल कर एक बेहतर मुकाम हासिल करें।
घर के प्रत्येक बडे़ बच्चे को यह हिदायत थी कि वह अपने से छोटे भाई-बहन की देखभाल करे। मैरीलीन अपनी मां के संघर्ष को काफी करीब से देख रही थीं। इसने उनके ऊपर गहरा असर डाला। पढ़ाई के साथ-साथ वह छोटे भाई-बहन को तो संभालतीं, और अपार्टमेंट में साफ-सफाई जैसे छोटे-मोटे काम भी कर देतीं, ताकि उससे कुछ पैसे मिलें और मां की मदद हो सके। मां हर महीने मैरीलीन को पांच डॉलर बिलों के भुगतान के लिए और सात डॉलर घर के राशन के लिए देतीं और कहतीं, ‘मुझे उम्मीद है तुम सही फैसले करोगी।’
मैरीलीन ने 1979 में अलबामा यूनिवर्सिटी से अर्थशास्त्र में एमए किया। उनके पास कोलंबिया बिजनेस स्कूल और हॉर्वर्ड बिजनेस स्कूल की भी डिग्रियां हैं। अलबामा यूनिवर्सिटी से पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने यूएस ब्यूरो ऑफ लेबर स्टैटिस्टिक्स में नौकरी शुरू की। लेकिन उनकी मंजिल तो कुछ और थी। साल 1983 उनके लिए एक बड़ा मौका लेकर आया और उन्होंने लॉखीद मार्टिन कंपनी ज्वॉइन की। रक्षा क्षेत्र की अमेरिका की अग्रणी कंपनी। दुनिया भर के देशों को लड़ाकू विमान, ब्लैक हॉक हेलीकॉप्टर और रक्षा उपकरण मुहैया कराने वाली सबसे बड़ी वैश्विक कंपनियों में एक।
मैरीलीन ने इसके बाद फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा। वह कंपनी के विभिन्न विभागों से अनुभव बटोरकर आगे बढ़ती रहीं। उनकी काबिलियत और दूरदर्शिता ने नवंबर 2012 में उन्हें कंपनी के निदेशक मंडल में पहुंचा दिया और महज तीन महीने के भीतर वह लॉखीद मार्टिन की सीईओ की कुरसी पर बैठी थीं। उनके नेतृत्व में लॉखीद के कारोबार ने शानदार ऊंचाइयां देखीं। और इसी मार्च में जब उन्होंने यह पद छोड़ा, तब तक इसकी पूंजी तीन गुनी हो चुकी थी।
साल 2010 से 2020 तक मैरीलीन हेसन को लगातार दुनिया की शीर्ष पचास प्रभावशाली, शक्तिशाली महिलाओं या फिर सीईओ में गिना जाता रहा। दो वर्ष पूर्व वह सर्वश्रेष्ठ सीईओ चुनी गईं। कभी एक-एक डॉलर को बेहद किफायत से खर्र्चने वाली मैरीलीन आज सात अरब से अधिक की संपत्ति की मालकिन हैं। मगर इस मुकाम पर भी वह अपनी मां को कहीं अधिक कर्मठ मानती हैं। ये उन्हीं के शब्द हैं, ‘मेरी मां ने वह सब किया, जो बडे़-बड़े नेता करते हैं। उन्होंने भविष्य के लीडरों को हौसले दिए।’
प्रस्तुति : चंद्रकांत सिंह मैरीलीन हेसन बिजनेस लीडर, पूर्व सीईओ
नजरिया / शौर्यपथ /भले ही भारत में कोविड-19 संक्रमण बढ़ रहा है, रोजाना करीब 50,000 मामले आ रहे हैं, लेकिन सरकार ने अनलॉक 3.0 लागू करने का फैसला लिया है। अनलॉक 3.0 निश्चित रूप से आर्थिक गतिविधियों को तेज करने वाला है। कुछ आर्थिक वृद्धि दर्ज भी हुई है, लेकिन इसे अर्थव्यवस्था में पूरी बहाली मान लेना अतिशयोक्ति होगी। आर्थिक गतिविधियों को रियायत मिली है, लेकिन अभी अर्थव्यवस्था मंदी से उबरने के किसी भी संकेत से दूर है। हालांकि, इस साल मानसून की बारिश अच्छी होने की उम्मीद है, साथ ही, कृषि ऐसा अकेला क्षेत्र है, जहां मजबूत वृद्धि की संभावना जताई जा रही है।
पिछले वित्त वर्ष में चार प्रतिशत से ज्यादा वृद्धि के साथ कृषि क्षेत्र देश में तीसरे स्थान पर रहा था। आज ऐसी संभावना नहीं है कि कृषि 2019-20 के समान विकास दर दर्ज करे। मुद्दा यह है कि क्या चार-पांच प्रतिशत की विकास दर के साथ हमारा कृषि क्षेत्र बाकी अर्थव्यवस्था को भी संभालने के लिए पर्याप्त है। ध्यान रहे, बाकी क्षेत्रों में नकारात्मक विकास दर देखी जा रही है। समग्र विकास को अगर देखें, तो कृषि विकास अप्रासंगिक लग सकता है, क्योंकि कृषि का राष्ट्रीय आय में योगदान सिर्फ 15 प्रतिशत है। लेकिन महत्वपूर्ण यह है कि कृषि विकास देश में आर्थिक गतिविधियों का एक मुख्य संचालक है। चूंकि ग्रामीण अर्थव्यवस्था में मांग घटी हुई है, इसलिए पूरी अर्थव्यवस्था लंबे समय से संकट में है।
इस पर अब आम सहमति है कि मौजूदा मंदी मुख्य रूप से घटती मांग का नतीजा है। कृषि विकास कितना प्रभावशाली है, इसे आंकने के लिए कृषि उत्पादन में वृद्धि की बजाय किसान की आय को देखना चाहिए। कृषि उत्पादन में वृद्धि का तात्पर्य किसानों की आय में वृद्धि से है। किसानों की आय अनेक चीजों पर निर्भर है। सबसे अहम बात, यह किसानों की उपज की कीमत पर निर्भर है, मगर अभी इस मोर्चे पर शुरुआती संकेतक बहुत उत्साहजनक नहीं हैं। थोक मूल्य सूचकांक पिछले तीन महीनों में थोक मूल्यों में गिरावट के साथ अपस्फीति की ओर इशारा कर रहा है। कीमतें घट रही हैं और किसानों की आय भी। मुद्र्रास्फीति में गिरावट का मतलब है कि अधिकांश खाद्य पदार्थों की कीमतों में गिरावट का रुख है। भले ही अनाज की कीमतों में सकारात्मक मुद्रास्फीति जारी है, लेकिन अन्य अधिकांश खाद्य पदार्थ, जैसे फल, सब्जियां, अंडे, मुर्गी और मछली की कीमतों में गिरावट जारी है। गिरावट का यह क्रम अब दूध की कीमतों में भी दिख रहा है और अन्य महत्वपूर्ण नकदी फसलों, जैसे कपास व तिलहन में भी। इसलिए भले ही कृषि उत्पादन में वृद्धि जारी हो, मगर यह वृद्धि किसानों के लिए बेहतर आय में नहीं बदल रही है। कृषि की लागत में वृद्धि के साथ अधिकांश छोटे और सीमांत किसानों की आय में वृद्धि की बजाय गिरावट की आशंका है।
पिछले दो वर्षों के दौरान किसान कुछ भाग्यशाली थे, जब राजनीतिक अभियानों के कारण सरकारों ने बड़ी मात्रा में अनाज खरीद की थी, पर इसका दूसरा पहलू यह है कि इस साल सरकारी खरीद की सुविधा पहले की तरह रहने की संभावना नहीं है। अनाज भंडार अभी भरे हुए हैं। किसानों की आय जब दबाव में है, तब कमजोर गैर-कृषि क्षेत्रों से भी ग्रामीण अर्थव्यवस्था को चोट पहुंचने की आशंका है। ग्रामीण अर्थव्यवस्था में कृषि अब कुल आय का केवल एक-तिहाई हिस्सा है। ग्रामीण अर्थव्यवस्था के बाकी दो-तिहाई हिस्से में छोेटे और मध्यम उद्यम हैं, जो महामारी से बुरी तरह प्रभावित हुए हैं। गांवों में आय या कमाई घटने का एक और कारण भी है कि कई शहरी प्रवासी अपने गांव लौट आए हैं।
ऐसे में, भारतीय अर्थव्यवस्था में सुधार के संकेत दिखने की संभावना तब तक नहीं है, जब तक कि कृषि को राजकोषीय प्रोत्साहन न हासिल हो। ऐसे वित्तीय उपाय करने होंगे, जिससे कृषि वस्तुओं की व्यापक मांग पैदा हो। सरकार को अपना खर्च बढ़ाने की जरूरत पड़ेगी। न केवल खरीद और सब्सिडी में वृद्धि के माध्यम से, बल्कि गैर-कृषि ग्रामीण क्षेत्र को भी बढ़ावा देकर मांग में वृद्धि की जा सकती है। राजकोषीय प्रोत्साहन का एक और बड़ा दौर न केवल जरूरी है, बल्कि खरीफ फसलों के इस मौसम में अर्थव्यवस्था को प्रभावित करने के लिए भी जरूरी है। भारतीय किसानों ने अपना काम किया है, अब समय है कि सरकार अपना काम करे।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)हिमांशु, एसोशिएट प्रोफेसर, जेएनयू
सम्पादकीय लेख / शौर्यपथ / बढ़ते कोरोना संक्रमण के समय डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों के वेतन सुनिश्चित करने के लिए यदि सुप्रीम कोर्ट की जरूरत पड़ रही है, तो यह न केवल दुखद, बल्कि शर्मनाक भी है। डॉक्टर और स्वास्थ्यकर्मी केवल देश के नागरिक ही नहीं, बल्कि इस वक्त कोरोना के खिलाफ लड़ रहे योद्धा हैं, ऐसे योद्धाओं के वेतन-भत्ते सुनिश्चित करना किसी भी सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारी है। पर पंजाब, महाराष्ट्र, कर्नाटक और त्रिपुरा जैसे राज्यों ने डॉक्टरों के भुगतान में देरी या ढिलाई की है। कुछ राज्यों ने डॉक्टरों के क्वारंटीन समय को भी छुट्टी माना है, यह तो और दुखद है। यह सब जानते हैं कि सौ से ज्यादा डॉक्टरों की मौत कोरोना से लड़ते हुई है और बड़ी संख्या में डॉक्टर कोरोना को पराजित करके ड्यूटी पर लौटे हैं, ऐसे में, तमाम सरकारों को इस सेवक बिरादरी का विशेष ध्यान रखना चाहिए था और शिकायत सुप्रीम कोर्ट में पहुंचने की नौबत नहीं आनी चाहिए थी। इन कोरोना योद्धाओं के उत्साह और समर्पण को बनाए रखने के लिए भी विशेष पहल जरूरी है। उन इलाकों में तो खास तौर पर संवेदनशील पहल-प्रोत्साहन की जरूरत है, जहां मरीजों की सेवा से डॉक्टरों के बचने की शिकायतें आ रही हैं। सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को केंद्र सरकार को निर्देश देते हुए आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 के तहत कदम उठाने का आदेश दिया, तो कोई आश्चर्य नहीं। केंद्र को इन बातों का खुद भी ध्यान रखना होगा और महामारी के समय सारा भार राज्यों के कंधों पर नहीं छोड़ना चाहिए। जिन राज्यों ने डॉक्टरों के वेतन में कोताही बरती है, उन्हें सुधार के लिए विवश करना समय की मांग है।
ध्यान रहे, आज कोरोना के खिलाफ युद्ध जिस मुकाम पर है, हम अपनी लड़ाई या तैयारी में कहीं से भी कमी नहीं आने दे सकते। भारत में अकेले गुरुवार को 55,000 से ज्यादा नए मामले सामने आए हैं। संक्रमितों ने 16 लाख का आंकड़ा पार कर लिया है। जाने गंवाने वालों की संख्या 36,000 के आंकड़े को छू चुकी है। आज चार लाख से अधिक संक्रमण के साथ महाराष्ट्र सबसे अधिक प्रभावित राज्य बना हुआ है, लेकिन यह ज्यादा अफसोसजनक है कि डॉक्टरों की वेतन संबंधी शिकायतें महाराष्ट्र से भी आई हैं। कहना न होगा, महाराष्ट्र, कर्नाटक, पंजाब जैसे अपेक्षाकृत विकसित राज्यों को कोरोना के खिलाफ लड़ाई का नेतृत्व करना चाहिए था।
केंद्र ने भले ही अनलॉक होने की ओर बढ़ने संबंधी कुछ घोषणाएं की हैं, लेकिन सच यही है कि राज्यों की चिंता लगातार बढ़ रही है। ठीक होने वालों की संख्या बढ़ी है, 10 लाख से ज्यादा लोग ठीक हो चुके हैं, चिंता यह कि संक्रमण के मामले अब 21 दिन में ही दोगुना होने लगे हैं। विशेषज्ञों का मामना है, संख्या देखकर घबराने की ज्यादा जरूरत नहीं, हो सकता है कि जैसे-जैसे जांच की संख्या बढ़ रही है, वैसे-वैसे मामले भी बढ़ते लग रहे हैं। ज्यादा से ज्यादा लोगों की जल्दी से जल्दी जांच व उसकी रिपोर्ट की ओर सरकार को और ध्यान देना चाहिए। जांच और नतीजों की खामियों को दूर करना भी जरूरी है। कोरोना के बढ़ते मामलों के बीच दिशा-निर्देशों का स्पष्ट होना भी जरूरी है। यह भी विडंबना ही है कि लॉकडाउन और अनलॉक होने की प्रक्रिया साथ-साथ चल रही है। राज्यों के अंदर व राज्यों के बीच बेहतर समन्वय अब और जरूरी हो गया है, साथ ही, केंद्र की जिम्मेदारी भी दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है।
मेलबॉक्स / शौर्यपथ / एक बहुप्रतीक्षित सपना साकार होने के करीब है, जब रामलला की मनोहारी छवि एक भव्य मंदिर में विराजेगी। निस्संदेह, करोड़ों देशवासियों की आस्था के विजय-पर्व पर भावनाओं का सैलाब उमड़ आना अपेक्षित है। लिहाजा, दशकों से तंबू-प्रवास में रह रहे रामलला के भव्य मंदिर की शुरुआत को उत्सव का स्वरूप क्यों न दिया जाए? एक तरफ, अयोध्या में इसकी तैयारियों की भव्यता अपने चरम पर है, तो वहीं मर्यादा पुरुषोत्तम की जन्मस्थली वाले प्रदेश में ही इंसानी संवेदनाओं की हत्या सारी मर्यादाओं को तार-तार कर रही है। हैवानियत की एक तस्वीर लिए मन बार-बार पूछ रहा है कि राम तो आएंगे, पर उनका रामराज्य कब आएगा? कहते हैं कि पैदा होने से पहले और मरने के बाद इंसान जाति-धर्म के बंधनों से मुक्त रहता है। फिर उस शव की जाति उसका पीछा क्यों नहीं छोड़ पाई, जो एक स्त्री का था? तथाकथित निम्न जाति की स्त्री होने में भला उसका क्या कुसूर था कि सम्मान के साथ विदा लेने का उसका हक भी उससे छीन लिया गया?
एमके मिश्रा, रातू, रांची, झारखंड
गरीबों की सुध
गरीबों का कोई नहीं होता, पर उसकी वजह से सब जरूर होते हैं। इतिहास से लेकर वर्तमान तक यह वाक्य सही जान पड़ता है। गरीबों का न कोई धर्म होता है, न जाति, और न कोई उनके सम्मान की कद्र करता है। वे तो बस इस भेड़चाल भरी दुनिया में पिसते रहते हैं। उनके लिए योजनाएं बंद एसी कमरों में बनती हैं, अफसरों व नेताओं को उनकी दयनीय स्थिति सुधारने के उपाय तलाशने के लिए विदेश भेजा जाता है, पर आजादी के सात दशकों के बाद भी गरीबी देश में बनी हुई है। यहां तक कि अब उसमें एक बार फिर वृद्धि होती दिख रही है। कोरोना संक्रमण ने गरीबों के लिए चुनौती बढ़ा दी है। क्या हमारे नीति-नियंता उनकी सुध लेंगे?
हर्ष कुमार, जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नई दिल्ली
एक नई चुनौती
कोरोना के गंभीर संक्रमण-काल में प्राकृतिक आपदा भी गंभीर चुनौती पेश कर रही है। ऐसा लग रहा है कि एक समस्या खत्म हुई नहीं कि दूसरी आ गई है। हालांकि, इसकी एक वजह हम खुद भी हैं, क्योंकि प्रकृति में मानव का हस्तक्षेप काफी भयावह है। उत्तर बिहार और असम में तो स्थिति कहीं ज्यादा चिंताजनक है, जहां एक बड़ी आबादी बाढ़ से घिरी हुई है। यहां न जाने कितने लोग बेघर हो चुके हैं और वे सड़कों पर ही रहकर अपना गुजारा कर रहे हैं। मुुश्किल यह भी है कि जब बाढ़ का पानी उतरता है, तो कई तरह की बीमारियां पैदा होती हैं, जिससे इंसानी जान-माल की व्यापक क्षति होती है। इसलिए यह जरूरी है कि बाढ़ पीड़ितों के हितों में सरकार विशेष कदम उठाए। हालांकि, यह आम लोगों का भी फर्ज है कि बाढ़ पीड़ितों की मदद के लिए वे आगे आएं और बढ़-चढ़कर मदद करें।
उदय कुमार ,जादोपुर, गोपालगंज
खत्म हो दादागिरी
पूरी दुनिया को कोरोना बीमारी देने के कारण चीन सभी के लिए सिरदर्द बना हुआ है। ऐसे में, उसके खिलाफ सभी राष्ट्रों को मिलकर ठोस रणनीति बनानी चाहिए। इसमें संयुक्त राष्ट्र को भी शामिल किया जाना चाहिए। दिक्कत यह भी है कि चीन अब भी विस्तारवादी नीति अपना रहा है। हमारे साथ लद्दाख में उलझने के अलावा वह कई अन्य देशों से भी सीमा विवाद में शामिल है। इसलिए यह समझ में नहीं आता कि परेशानी झेलने के बाद भी दुनिया के देश चीन के खिलाफ एकजुट प्रयास क्यों नहीं कर रहे? संभव है, इसके पीछे उसका एक बड़ी आर्थिक ताकत होना कारण हो। हालांकि, बड़ी से बड़ी आर्थिक ताकत को भी अकेला कर दिया जाए, तो वह सुधर जाती है। चीन के साथ यही रणनीति अपनाई जानी चाहिए। सभी देशों को उससे रिश्ता खत्म कर लेना चाहिए।
सुमित कुमार रस्तोगी
संभल, उत्तर प्रदेश
ओपिनियन / शौर्यपथ / चीन पिछले कई वर्षों से भारत को घेरने की योजना पर काम कर रहा है। इसके लिए वह हमारे पड़ोसी देशों पर किसी न किसी तरह से अपना प्रभाव लगातार बढ़ा रहा है। पाकिस्तान को तो वह अपना ‘आयरन ब्रदर’ बना ही चुका है, कुछ ऐसा ही कथित ‘मजबूत भाईचारा’ वह अफगानिस्तान और नेपाल के साथ भी निभाना चाहता है। इसके अलावा, म्यांमार के साथ आर्थिक गलियारे के निर्माण पर सहमति बनाकर, बांग्लादेश में भारी निवेश करके, मालदीव के साथ रक्षा सहयोग बढ़ाकर और श्रीलंका की निर्माण-परियोजनाओं पर अपनी पकड़ मजबूत करके वह क्षेत्र में भारत-विरोधी नीति को लगातार हवा दे रहा है। ऐसे में, असली सवाल यही है कि चीन की काट हम किस तरह निकालें? इसका सही-सही जवाब तभी मिल सकेगा, जब गंभीरता से यह चिंतन हो कि उप-महाद्वीप के तमाम पड़ोसी देशों से भौगोलिक, ऐतिहासिक व सांस्कृतिक रिश्ता चीन की तुलना में कहीं ज्यादा गहरा होने के बावजूद हमसे चूक कहां हुई?
दरअसल, भारत ने आसपास के देशों से रिश्ते बेहतर बनाने के बहुत सीमित प्रयास किए हैं। बेशक, हाल के वर्षों में ‘नेबरहुड फस्र्ट’ यानी पड़ोस-प्रथम की नीति अपनाई गई है, लेकिन इस पर फिलहाल संजीदा काम होता दिख नहीं रहा है। कुछ यही हाल दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन (सार्क) का भी है। पाकिस्तान के साथ खराब रिश्ते की वजह से यह मंच अब बहुत ज्यादा कारगर नहीं रहा। हां, बंगाल की खाड़ी पर निर्भर दक्षिण एशिया और दक्षिण पूर्व एशिया के सात देशों के संगठन बिम्सटेक से उम्मीद पाली जा सकती है, पर इसके लिए भी भारत को अपने तईं प्रयास करने होंगे। द्विपक्षीय और क्षेत्रीय सहयोग की भी यही तस्वीर है। बांग्लादेश, भूटान, नेपाल व भारत के बीच कनेक्टिविटी बढ़ाने पर सहमति बन चुकी है, लेकिन जमीनी स्तर पर इसमें मनमाफिक प्रगति नहीं हुई है। क्षेत्र में सभी देशों के लिए सुरक्षा और विकास की खास नीति पर भी मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल में जोर दिया गया है, पर इसका असर दिखना अभी बाकी है।
एक मुश्किल यह भी है कि हम पड़ोस के देशों से विभिन्न परियोजनाओं के लिए समझौते तो कर लेते हैं, लेकिन उनको अमल में लाना कभी-कभी तकनीकी वजहों से काफी मुश्किल हो जाता है। यही कारण है कि कभी तय वक्त पर धनराशि नहीं जारी हो पाती, तो कभी सामान की आपूर्ति रुक जाती है। इसके बरअक्स, चीन कहीं अधिक तेजी से अपनी परियोजनाएं पूरी करता है। जाहिर है, हर देश के साथ अलग-अलग तरीके से हमें अपना द्विपक्षीय रिश्ता आगे बढ़ाना होगा। अगर इस पर गंभीरता से काम हुआ, तो पड़ोसी देश भी हमारे साथ ‘चीन कार्ड’ नहीं खेल सकेंगे, जो अभी इसलिए अमल में लाया जाता है, ताकि हम पर दबाव बने।
हमें कई दूसरे उपाय भी करने होंगे। मसलन, प्राकृतिक आपदाओं को संभालने के लिए एक संयुक्त कार्ययोजना बनाने की पहल करना। अभी बाढ़, तूफान जैसी कुदरती आपदाओं से जितने हम पीड़ित होते हैं, उतने ही हमारे पड़ोसी देश भी होते हैं। इसीलिए हमें क्षेत्रीय स्तर पर एक ऐसा तंत्र बनाना चाहिए कि मुसीबत के समय सभी देशों को उससे मदद मिल सके। इसी तरह, जलवायु परिवर्तन की समस्या से सामूहिक तौर पर लड़ने के लिए भी हमें पड़ोसी देशों को तैयार करना चाहिए।
‘एजुकेशन हब’ बनकर भी भारत पड़ोसी देशों से मित्रता मजबूत कर सकता है। आसपास के देशों के छात्र यहां आकर अपना कौशल निखार सकते हैं। मगर इसके लिए उन्हें बेहतर शैक्षणिक माहौल दिए जाने की व्यवस्था करनी होगी। ‘मेडिकल टूरिज्म’ भी एक अन्य क्षेत्र है, जहां भारत नेतृत्व की भूमिका निभा सकता है। कोविड-19 महामारी ने मजबूत स्वास्थ्य ढांचे के महत्व पर खासा जोर दिया है। इसी तरह, पड़ोसी देशों के नौजवानों से उभरती तकनीक और प्रौद्योगिकी की जानकारी साझा करना भी हमारे हित में होगा।
यह सब करने के लिए जहां सरकार की तरफ से नीतिगत फैसले की दरकार है, वहीं नई परिपाटी शुरू करने भी जरूरत है, ताकि योजनाओं को जमीन पर उतारा जा सके। जैसे, वीजा जारी करने की प्रक्रिया को सरल बनाना। इतना ही नहीं, अमेरिका की तरह हमारे यहां भी ‘ग्रीन कार्ड’ जैसी व्यवस्था शुरू की जा सकती है, जिससे रोजगार पाने की उम्मीद रखने वाले दूसरे देशों के नौजवान भारत की तरफ आकर्षित हों। इससे न सिर्फ विदेशी कामगारों का दस्तावेजीकरण हो सकेगा, बल्कि अपने देश की आर्थिक सेहत भी सुधर सकेगी। द्विपक्षीय और क्षेत्रीय सहयोग की परस्पर लाभकारी व्यवस्था भी बननी चाहिए, ताकि पड़ोसी देशों को यह मालूम चले कि चीन की दोस्ती में वे उसके आर्थिक उपनिवेश बन जाएंगे, जबकि भारत का साथ उन्हें एक बराबरी का एहसास दिलाएगा।
चिंता की बात यह भी है कि भारत और आसपास के देशों में बमुश्किल व्यापार होता है। हम महज चार-पांच फीसदी कारोबार ही पड़ोसी देशों के साथ करते हैं। जाहिर तौर पर इसमें सुधार जरूरी है। फिर, ‘बॉर्डर ट्रेड’ यानी सीमावर्ती इलाकों में आपसी व्यापार को भी बढ़ावा देना चाहिए। इससे न सिर्फ रोजगार के नए दरवाजे खुलेंगे, बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी फायदा पहुंचेगा। म्यांमार, नेपाल, बांग्लादेश आदि देशों के साथ हम यह प्रयोग कर सकते हैं। इससे क्षेत्रीय आपूर्ति शृंखला की अवधारणा को भी बल मिलेगा, जिससे आपस में विश्वास की डोर मजबूत होगी। ऐसी कोई शृंखला इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि कोरोना की वजह से वैश्विक आपूर्ति शृंखला काफी प्रभावित हुई है। मगर हां, इसके लिए हमें अपने वीजा नियमों और सीमा शुल्क से जुड़े प्रावधानों की गंभीर समीक्षा करनी पडे़गी।
उपमहाद्वीप के तमाम देशों से रिश्ते मजबूत बनाने की जरूरत इसलिए भी है, क्योंकि कोविड-19 के कारण क्षेत्रीय भू-राजनीति पर काफी असर पड़ा है। ऐसे में, पुरानी नीतियों से हम चीन को जवाब नहीं दे सकते। परस्पर लाभ पहुंचाने वाले द्विपक्षीय रिश्ते और पड़ोसी देशों को पर्याप्त तवज्जो देने वाली पड़ोसी-प्रथम की नीति पर हमें आगे बढ़ना चाहिए। बंगाल की खाड़ी और समुद्री सुरक्षा पर भी अधिक ध्यान देना होगा, क्योंकि बंगाल की खाड़ी में चीन की गतिविधियां काफी बढ़ गई हैं। भारत सरकार बेशक इस दिशा में प्रयास कर रही है, पर अब भी काफी कुछ किया जाना है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)अरविंद गुप्ता, पूर्व डिप्टी एनएसए, डायरेक्टर, वीआईएफ
Feb 09, 2021 Rate: 4.00
