
CONTECT NO. - 8962936808
EMAIL ID - shouryapath12@gmail.com
Address - SHOURYA NIWAS, SARSWATI GYAN MANDIR SCHOOL, SUBHASH NAGAR, KASARIDIH - DURG ( CHHATTISGARH )
LEGAL ADVISOR - DEEPAK KHOBRAGADE (ADVOCATE)
Google Analytics —— Meta Pixel
खाना खजाना / शौर्यपथ /कोरोना वायरस अभी हमारे बीच मौजूद है। एक्सपर्ट्स तीसरी लहर के लिए अलर्ट कर रहे हैं। ऐसे में बाहर का खाना जितना अवॉइड करें उतना बेहतर है। लेकिन फूडी हैं तो तरह-तरह की चीजें खाने का मन करना स्वाभाविक है। खासतौर पर स्ट्रीट फूड्स काफी लोग मिस कर रहे हैं। नूडल्स के साथ या फ्राइड राइस के साथ चिली पनीर अक्सर खाए जाते हैं। आप अगर वजन कम कर रहे हैं और डिनर में कुछ हल्का खाना चाहते हैं तो प्रोटीन सबसे अच्छा ऑप्शन माना जाता है। यह प्रोटीन अगर चिली पनीर के रूप में खाया जाए तो बात ही कुछ और होगी। वैसे इस इमैजिनेशन को सच में बदलने के लिए आपको ज्यादा मशक्कत भी नहीं करनी। यहां सीख लीजिए आसान रेसिपी।
पहले तैयार करें घोल
रेस्ट्रॉन्ट स्टाइल में चिली पनीर बनाने के लिए एक बॉल में दो बड़े चम्मच मैदा और 3 बड़े चम्मच मैदा लें। इसमें आधा चम्मच अदरक का पेस्ट और आधा चम्मच लहसुन का पेस्ट मिला लें। अब इसमें चुटकीभर काली मिर्च का पाउडर, चुटकीभर कश्मीरी लाल मिर्च पाउडर डालें। नमक अपने टेस्ट के हिसाब से डालकर इसमें थोड़ा सा पानी लेकर इसका घोल बना लें। इसको अच्छी तरह फेंट लें ताकि गांठें न रहें। घोल ज्यादा पतला या बहुत ज्यादा गाढ़ा न करें।
मैरिनेट करके तलें पनीर
अब इस घोल में पनीर काटकर डालें। पनीर के टुकड़ों पर अच्छी तरह यह घोल लपेट लें। अब कढ़ाई में तेल या रिफाइंड गरम करके पनीर के टुकड़ों को तल लें। जब ये टुकड़े दोनों तरफ अच्छी तरह सिक जाएं तो इन्हें पेपर नैपकीन या किचन टॉवल पर निकाल लें।
फाइनल स्टेप और चिली पनीर तैयार
अब एक कड़ाही में 2 बड़े चम्मच तेल या रिफाइंड लें। इसमें बारीक कटा हुआ लहसुन डालें, कटी हुई हरी मिर्च, स्प्रिंग ऑनियन, क्यूब्स में कटा प्याज, शिमला मिर्च डालकर तेज आंच पर 1 मिनट तक पकाएं। अब इसमें दो चम्मच टमैटो सॉस, 1 चम्मच चिली सॉस, 1 1/2 चम्मच विनेगर, 1 1/2 चम्मच सोया सॉस डालें। अब इसमें थोड़ा सा नमक, चुटकीभर काली मिर्च और लाल मिर्च पाउडर डालकर चलाएं। अब एक चम्मच कॉर्नफ्लोर को 2 बड़े चम्मच पानी में घोलें। इस मिक्सचर को कढ़ाई में डाल दें। अब चलाते रहें। अब इसमें फ्राई किया हुआ पनीर डाल लें। कुछ देर तक चलाएं, आपका ड्राई चिली पनीर तैयार है। आपको अगर इसमें ग्रेवी चाहिए तो पनीर डालने से पहले पानी बढ़ा सकते हैं।
टिप्स ट्रिक्स / शौर्यपथ / वर्तमान जीवनशैली में, हम वसायुक्त सभी चीजों को अपनी डाइट से बाहर करते जा रहे हैं। हम मक्खन या बटर की बात करें, तो कभी पुराने जमाने में रोटी के साथ ढेर सारा बटर सुबह के नाश्ते में शामिल किया जाता था, आज हम उसे पूरी तरह से नजरअंदाज करने लगे हैं। मक्खन विटामिन-ई विटामिन-ए, कैल्शियम, फास्फोरस, सेलेनियम और फैटी एसिड का एक उत्कृष्ट स्रोत है। यह सभी पोषक तत्व त्वचा और स्वास्थ्य के लिए अच्छे माने जाते हैं।
लेकिन क्या आप जानते हैं, कि बटर खाने के भी अपने ही कुछ फायदे हैं। अगर नहीं जानते, तो जरूर पढ़िए और जानिए बटर से होने वाले यह हेल्थ और ब्यूटी बेनिफिट्स-
1 चेहरे की चमक दुगुनी करें- 2 बड़े चम्मच मक्खन के साथ अगर आप जैतून का तेल मिक्स करके इस मिश्रण को अपने चेहरे पर 15 मिनट के लिए लगाते हैं तो यह चेहरे की चमक को दुगुनी कर सकता है।
2 ऑस्टियोपोरोसिस- विटामिन्स, मिनरल्स और कैल्शियम से भरपूर बटर आपकी हड्डियों को मजबूत बनाकर ऑस्टियोपोरोसिस जैसी समस्याओं से निजात दिलाने में मदद करता है। दांतों के लिए भी यह बेहद फायदेमंद होता है।
3 बुखार- गाय के दूध का बटर और खड़ी शर्करा का सेवन करने से पुराना बुखार ठीक हो जाता है, इसके अलावा बटर के साथ शहद और सोने के वर्क को मिलाकर खाने से टीबी के मरीजों को लाभ मिलता है।
4 त्वचा में निखार- चेहरे पर रोजाना मक्खन लगाकर मालिश करने और आधे घंटे बाद गुनगुने गर्म पानी से धोने से चेहरे की त्वचा का रंग साफ होता है।
5 दिल की समस्या- एक शोध में यह बात सामने आई है कि जो लोग कुछ मात्रा में बटर को अपनी डाइट में शामिल करते हैं, उन्हें दिल की बीमारी का खतरा, अपेक्षाकृत कम होता है। इसमें विटामिन ए, डी, के और ई के अलावा लेसिथिन, आयोडीन और सेलेनियम जैसे तत्व होते हैं जो दिल की सेहत के लिए बेहतर हैं।
6 थायरॉइड- बटर में आयोडीन भरपूर मात्रा में पाया जाता है जो थायरॉइड के मरीजों के लिए फायदेमंद होता है। इसके अलावा इसमें मौजूद विटामिन ए भी थायरॉइड ग्लैंड के लिए बेहद फायदेमंद होता है।
7 तैलीय त्वचा में लाभकारी- बटर का उपयोग तैलीय त्वचा के लिए बेहद लाभदायक माना जाता है। यदि आप 1 कटोरी दूध में 1 चम्मच मक्खन अच्छी तरह मिक्स करके अपने चेहरे पर सप्ताह में 2 बार लगाते हैं तो आपकी तैलीय त्वचा से होने वाली समस्या आसानी से दूर हो सकती है।
8 प्रजनन क्षमता- प्रजनन क्षमता बढ़ाने के लिए बटर का बहुत लाभकारक माना जाता है। यह शरीर में गर्मी बढ़ाता है तथा मेल और फीमेल हार्मोन्स को बढ़ाने का कार्य करता है।
9 एंटीऑक्सीडेंट- एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर बटर कैंसर या ट्यूमर से आपकी रक्षा करने के साथ ही त्वचा को फ्री रेडिकल्स से सुरक्षित रखता है। यह त्वचा के लिए काफी फायदेमंद होता है। इसकी मसाज से त्वचा में जान आ जाती है।
10 पाइल्स- गाय के दूध का बटर और तिल को मिलाकर खाने से पाइल्स की समस्या में लाभ होता है। इसके अलावा बटर में शहद व खड़ी शक्कर मिलाकर खाने से खूनी बवासीर ठीक हो जाती है। इसमें शहद के स्थान पर नागकेसर का प्रयोग भी किया जा सकता है।
11 शिशु की मालिश- थोड़ा-सा ताजा मक्खन लेकर शिशु के शरीर पर मालिश करके आधा घंटा सुबह की धूप में लेटाने से उसे सूखा रोग नहीं होता।
12 दमा- सांस की तकलीफ होने पर भी मक्खन लाभदायक साबित होता है। मक्खन में मौजूद सैचुरेटेड फैट्स फेफड़ों की मदद करते हैं और दमा के मरीजों के लिए भी इसका सेवन फायदेमंद माना जाता है।
13 आंखों में जलन- आंखों में जलन की समस्या होने पर गाय के दूध का बटर आंखों पर लगाना बेहद फायदेमंद होता है। किसी भी कारण से आंखों में होने वाली जलन को यह समाप्त कर देता है।
14 मुंहासे करें दूर- चेहरे पर होने वाली फुंसी, मुंहासे या झाइयां हो तो वह भी बटर के मालिश से ठीक हो जाती हैं।
15 कैंसर- जी हां, बटर कोई मामूली चीज नहीं है। यह कैंसर जैसे रोग से बचाव करने में आपकी मदद करता है। दरअसल बटर में मौजूद फैटी एसिड कौंजुलेटेड लिनोलेक प्रमुख रूप से कैंसर से बचाव में मदद करता है।
16 मूड बने मस्त- बटर में पाया जाने वाला सेलेनियम आपके मूड को बेहतर करने में आपकी मदद करता है। तो जब भी आपका मूड खराब हो, थोड़ा सा बटर, उसे ठीक करने में आपकी मदद कर सकता है।
आस्था / शौर्यपथ / श्रावण माह चातुर्मास का पहला माह माना जाता है। यह माह शिवजी की भक्त का माह है। विष्णुजी के निद्रा में चले जाने के बाद शिवजी ही चार माह सृष्टि का संचालन करेंगे। हिन्दू धर्म में श्रावण माह का बहुत ज्यादा महत्व है। यदि आप शिवभक्त हैं तो आपको इस संबंध में 5 खास बातें जानना जरूरी हैं।
1. व्रत रखना क्यों जरूरी : हिन्दू धर्म में व्रत तो बहुत हैं जैसे, चतुर्थी, एकादशी, त्रयोदशी, अमावस्य, पूर्णिमा आदि। लेकिन हिन्दू धर्म में चतुर्मास को ही व्रतों का खास महीना कहा गया है। परंतु उसमें भी चातुर्मास का प्रथम माह श्रावण माह में व्रत को रखना सबसे बड़ा पुण्य है। साथ ही यही एक माह है जबकि शिवजी को असानी से प्रसन्न किया जा सकता है। पार्वतीजी ने युवावस्था में सावन महीने में निराहार रहकर कठोर व्रत किया और शिवजी को प्रसन्न कर विवाह किया जिसके बाद से ही महादेव के लिए यह माह विशेष हो गया। व्रत के नियम जानकर ही रखें व्रत।
2. सोमवार का महत्व : सोमवार शिवजी का दिन है। श्रावण माह को कालांतर में 'श्रावण सोमवार' कहने लगे, इससे यह समझा जाने लगा कि श्रावण माह में सिर्फ सोमवार को ही व्रत रखना चाहिए जबकि इस माह से व्रत रखने के दिन शुरू होते हैं, जो 4 माह तक चलते हैं, जिसे चतुर्मास कहते हैं। हालांकि आमजन सोमवार को ही व्रत रख सकते हैं। शिवपुराण के अनुसार जिस कामना से कोई इस मास के सोमवारों का व्रत करता है, उसकी वह कामना अवश्य एवं अतिशीघ्र पूरी हो जाती है। जिन्हें 16 सोमवार व्रत करने हैं, वे भी सावन के पहले सोमवार से व्रत करने की शुरुआत कर सकते हैं। इस मास में भगवान शिव की बेलपत्र से पूजा करना श्रेष्ठ एवं शुभ फलदायक है।
3. श्रावणी उपाकर्म : कुछ लोग इस माह में श्रावणी उपाकर्म भी करते हैं। वैसे यह कार्य कुंभ स्नान के दौरान भी होता है। यह कर्म किसी आश्रम, जंगल या नदी के किनारे संपूर्ण किया जाता है। मतलब यह कि घर परिवार से दूर संन्यासी जैसा जीवन जीकर यह कर्म किया जाता है।
श्रावणी उपाकर्म के 3 पक्ष हैं- प्रायश्चित संकल्प, संस्कार और स्वाध्याय। पूरे माह किसी नदी के किनारे किसी गुरु के सान्निध्य में रहकर श्रावणी उपाकर्म करना चाहिए। यह सबसे सिद्धिदायक महीना होता है इसीलिए इस दौरान व्यक्ति कठिन उपवास करते हुए जप, ध्यान या तप करता है। श्रावण माह में श्रावण शुक्ल पूर्णिमा को श्रावणी उपाकर्म प्रत्येक हिन्दू के लिए जरूर बताया गया है। इसमें दसविधि स्नान करने से आत्मशुद्धि होती है व पितरों के तर्पण से उन्हें भी तृप्ति होती है। श्रावणी पर्व वैदिक काल से शरीर, मन और इन्द्रियों की पवित्रता का पुण्य पर्व माना जाता है।
4. शिव के जलाभिषेक का फल : श्रावण मास को मासोत्तम मास कहा जाता है। श्रवण नक्षत्र तथा सोमवार से भगवान शिव शंकर का गहरा संबंध है। इसी माह में भगवान शिव और प्रकृति अनेक लीलाएं रचते हैं। कहते हैं कि जब समुद्र मंथन से निकले हलाहल विष को भगवान शंकर ने पीकर उसे कंठ में अवरुद्ध कर दिया तो उस तपन को शांत करने के लिए देवताओं ने उनका जलाभिषेक इसी माह में किया था। इसीलिए इस माह में शिवलिंग या ज्योतिर्लिंगों का दर्शन एवं जलाभिषेक करने से अश्वमेघ यज्ञ के समान फल प्राप्त करता है तथा शिवलोक को पाता है।
5. यदि संपूर्ण माह व्रत रखें तो क्या करें और क्या नहीं :
क्या करें :
1. पूर्ण श्रावण कर रहे हैं तो इस दौरान फर्श पर सोना और सूर्योदय से पहले उठना बहुत शुभ माना जाता है।
2. उठने के बाद अच्छे से स्नान करना और अधिकतर समय मौन रहना चाहिए।
3. दिन में फलाहार लेना और रात को सिर्फ पानी पीना चाहिए।
4. इस व्रत में दूध, शकर, दही, तेल, बैंगन, पत्तेदार सब्जियां, नमकीन या मसालेदार भोजन, मिठाई, सुपारी, मांस और मदिरा का सेवन नहीं किया जाता। श्रावण में पत्तेदार सब्जियां यथा पालक, साग इत्यादि का त्याग कर दिया जाता है।
5. इस दौरान दाढ़ी नहीं बनाना चाहिए, बाल और नाखून भी नहीं काटना चाहिए।
6. अग्निपुराण में कहा गया है कि व्रत करने वालों को प्रतिदिन स्नान करना चाहिए, सीमित मात्रा में भोजन करना चाहिए। इसमें होम एवं पूजा में अंतर माना गया है। विष्णु धर्मोत्तर पुराण में व्यवस्था है कि जो व्रत-उपवास करता है, उसे इष्टदेव के मंत्रों का मौन जप करना चाहिए, उनका ध्यान करना चाहिए उनकी कथाएं सुननी चाहिए और उनकी पूजा करनी चाहिए।
क्या नहीं करें :
1. अधिकतर लोग दो समय खूब फरियाली खाकर उपवास करते हैं तो कुछ लोग एक समय भोजन करते और दूसरे समय खूब फरियाली खा लेते हैं। यह तो उपवास या व्रत नहीं हुआ। यह अनुचित है।
3 . उपवास में कई लोग साबूदाने की खिचड़ी, फलाहार या राजगिरे की रोटी और भिंडी की सब्जी खूब ठूसकर खा लेते हैं। इस तरह के उपवास से कैसे लाभ मिलेगा? उपवास या व्रत के शास्त्रों में उल्लेखित नियम का पालन करेंगे तभी तो लाभ मिलेगा।
4. कुछ लोग तो अपने मन से ही नियम बना लेते हैं और फिर उपवास करते हैं। यह भी देखा गया है कुछ लोग चप्पल छोड़ देते हैं लेकिन गाली देना नहीं।
5. व्रत में यात्रा, सहवास, वार्ता, भोजन आदि त्यागकर नियमपूर्वक व्रत रखना चाहिए तो ही उसका फल मिलता है। यदि कोई व्रत नहीं भी रख रहा है और ऐसे कार्य कर रहा तो भी उसे नुकसान उठाना होगा।
धर्म संसार / शौर्यपथ / हिन्दू कैलेंडर के अनुसार फाल्गुन माह अंतिम माह होता है इसके बाद चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़ और फिर श्रावण मास। इस बार श्रावण माह का प्रारंभ अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार 25 जुलाई 2021 रविवार हो होगा और 26 जुलाई को सावन का पहला सोमवार रहेगा। 22 अगस्त रविवार रक्षा बंधन के दिन श्रावण मास समाप्त हो जाएगा और भाद्रपद माह की शुरुआत हो जाएगी। दक्षिण भारत में श्रावण मास का प्रारंभ देर से होता है। आओ जानते हैं इस बार कितने सावन सोमवार रहेंगे और कब कब रहेंगे।
1. रविवार, 25 जुलाई 2021 श्रावण मास का पहला दिन.
2. सोमवार, 26 जुलाई 2021 पहला श्रावण सोमवार.
3. सोमवार, 02 अगस्त 2021 दूसरा श्रावण सोमवार.
4. सोमवार, 09 अगस्त 2021 तीसरा श्रावण सोमवार.
5. सोमवार, 16 अगस्त 2021 चौथा श्रावण सोमवार.
6. रविवार, 22 अगस्त 2021 श्रावण मास का अंतिम दिन.
पश्चिम और दक्षिण भारत में श्रावण माह :
वहां 9 अगस्त 2021 से श्रावण मास प्रारंभ होगा और 7 सितंबर 2021 को श्रावण मास का अंतिम दिन होगा। 9 अगस्त, 19 अगस्त, 23 अगस्त, 30 अगस्त और 6 सितंबर को श्रावण के सोमवार रहेंगे।
कैसे करें सावन सोमावर की पूजा :
1. सावन सोमवार के व्रत में भगवान शिव और देवी पार्वती की पूजा की जाती है।
2. सोमवार के दिन प्रातःकाल स्नानादि से निवृत्त होकर व्रत का संकल्प लें।
3. उसके बाद भगवान शिव और माता पार्वती की मूर्ति स्थापित कर उनका जलाभिषेक करें।
4. फिर शिवलिंग पर दूध, फूल, धतूरा आदि चढ़ाएं। मंत्रोच्चार सहित शिव को सुपारी, पंच अमृत, नारियल एवं बेल की पत्तियां चढ़ाएं। माता पार्वती जी को सोलह श्रृंगार की चीजें चढ़ाएं
5. इसके बाद उनके समक्ष धूप, तिल के तेल का दीप और अगरबत्ती जलाएं।
6. इसके बाद ॐ नमः शिवाय मंत्र का जाप करें।
7. पूजा के अंत में शिव चालीसा और शिव आरती का पाठ करें।
8. पूजा समाप्त होते ही प्रसाद का वितरण करें।
9. शिव पूजा के बाद सोमवार व्रत की कथा सुननी आवश्यक है।
10. व्रत करने वाले को दिन में एक बार भोजन करना चाहिए।
11. दिन में दो बार (सुबह और सायं) भगवान शिव की प्रार्थना करें।
12. संध्याकाल में पूजा समाप्ति के बाद व्रत खोलें और सामान्य भोजन करें।
टिप्स ट्रिक्स / शौर्यपथ / मानसून में अक्सर बारिश के पानी में भीग जाने से चहरे के साथ-साथ बालों की भी कई समस्याएं पैदा हो जाती हैं। इस मौसम में बाल ज्यादा टूटने और झड़ने लगते है। ज्यादा देर तक स्कैल्प का गीला रहना बालों की अनेक समस्याओं को जन्म देता है।
आइए जानें कुछ हेयर केयर टिप्स जिन्हें आजमा कर आप इस मौसम में भी अपने बालों को हेल्दी रख सकती हैं।
1. अगर आपके बाल बारिश के पानी में अक्सर गीले हो जाते है तो आपको उन्हें शैंपू से जरूर धोना चाहिए, नहीं तो बारिश के पानी से पैदा हुई नमी फंगस का रूप ले लेगी और खुजली के साथ अन्य समस्याएं भी होंगी।
2. गीले बालों को बड़े दांत वाले कंघे से सुलझाएं, इससे बाल आसानी से सुलझ भी जाएंगे और टूटेंगे भी नहीं।
3. गीले बालों को पहले सूखने दें फिर ही बांधें। अगर बालों को पूरी तरह से सुखाए बिना बांधेंगे, तो उनमें बदबू तो आएगी ही, जुएं होने की संभावना भी बढ़ जाएगी और क्वालिटी भी खराब होगी।
4. बाल धोने के बाद कंडिशनर जरूर लगाएं, ताकि बाल बेतरतीब न रहें और आसानी से सुलझ सकें। इस मौसम में बालों में रूखापन आ जाता है और बाल अधिक टूटते हैं, जिससे बचने के लिए कंडिशनर एक बढ़िया तरीका है।
5. हफ्ते में कम से कम एक बार तेल जरूर लगाएं, ताकि बालों को पोषण मिल सके और रूखापन भी दूर हो। इससे बाल बेजान भी नहीं होंगे और उनमें चमक बनी रहेगी।
6. अपना कंघा किसी और के साथ शेयर ना करें। अगर आपके बाल बड़े हैं तो बारिश के मौसम में आप शॉर्ट हेयर रख सकतीं हैं। इससे आपको नया लुक भी मिलेगा और बालों की देखभाल भी अच्छे से हो जाएगी।
7. इन सभी के साथ आप अपने आहार पर भी ध्यान दें। खाने का असर हमारे शरीर के हर हिस्से पर पड़ता है तो बालों पर भी पड़ेगा, इसलिए अपनी डाईट नियमित रखें, बाहर का कम खाएं और फास्ट फूड को खाने से बचें। अपने भोजन में प्रोटीन युक्त खाद्य पदार्थ शामिल करें। जैसे- अंडा, गाजर, दालें, हरी सब्जियां, डेयरी प्रोडक्ट्स आदि।
ब्यूटी टिप्स / शौर्यपथ / गुड़हल का फूल दिखने में जितना सुंदर होता है इसके कई सारे लाभ भी है। गुड़हल के फूल का अलग-अलग तरह से प्रयोग किया जाता है। लेकिन क्या आपने कभी गुड़हल के फूलों की
चाय पी है। लाल रंग के दिखने वाले गुड़हल के फूल से तैयार होने वाली चाय को हर्बल टी कहते हैं। जिसके कई सारे सेहत और सौंदर्य दोनों के राज छिपे हैं। गुड़हल की चाय की सबसे
प्रमुख बात है, कैलोरी और कैफीन मुक्त है। इसमें एंटीऑक्सीडेंट तत्व मौजूद होते हैं। इसकी चाय की चुस्की से थकान दूर होने के साथ त्वचा को भी निखारती है। वैज्ञानिक तथ्यों के
एंटी एजिंग की समस्या को दूर करें - खराब लाइफस्टाइल से समय से पहले ही बूढ़े होने लगे हैं। ऐसे में गुड़हल के पत्तियों से इस समस्या से निजात पाई जा सकती है। गुड़हल कीचाय पीने से भी फायदा मिलेगा। गुड़हल में फ्री रेडिकल्स को हटाने की क्षमता होती है। साथ ही चेहरे पर दिखने वाले उम्र बढ़ने के लकीरे भी बहुत कम हो जाती है।
चेहरे पर आएगा ग्लो - गुडहल के फूल में मौजूद विटामिन सी, फाइबर, एंटीऑक्सीडेंट तत्व भी पाएं जाते हैं। अगर आप लगा नहीं सकते हैं तो सुबह इसकी चाय भी पी सकते हैं।इससे आपके चेहरे पर ग्लो आएगा।
चेहरे का रंग साफ करें- चेहरे के रंग को निखारने के लिए गुड़हल की चाय सबसे अधिक फायदेमंद है। इसकी चाय में आप मुलेठी, सौंफ,तुलसी के पत्ते, दालचीनी और इलायची मिलाकर
डाल दें। इसके बाद अच्छे से उबल जाए फिर कप में छान लें। इसका सेवन करने से चेहरे का रंग साफ होगा।
मोटापा कम करें - गुड़हल की चाय सौंदर्य निखारने के साथ मोटापा कम करने में काफी मदद करती है। रिसर्च में भी सामने आया है कि गुड़हल की चाय से बॉडी फैट, बॉडी मास, फैटकम होता है।
बालों की समस्या से निजात दिलाएं - गुड़हल में मौजूद तत्व बालों के लिए काफी फायदेमंद होता है। आप चाय का सेवन भी कर सकते हैं,और गुड़हल की पत्तियों का इस्तेमाल भी कर
सकते हैं।
सेहत /शौर्यपथ /बारिश का मौसम भले ही सुहाना लगता है, लेकिन बीमारियों के संक्रमण के लिए यही मौसम सबसे माकूल होता है। इस मौसम में सर्दी, जुखाम और बुखार सबसे ज्यादा फैलने वाले रोग हैं। आइए जानते हैं कैसे बचें इस बरसाती बुखार से-
बरसात में बीमारियों से बचने के लिए सबसे पहले इसके कारणों को जानना बेहद जरूरी है। पहले जानते हैं, इस मौसम में बीमारी फैलाने वाले कारणों को -
1 जगह-जगह पानी का भरना और उसमें मच्छरों का पनपना, जो डेंगू और मलेरिया फैलाने में सहायक होते हैं।
2 विषैले जीव जंतुओं, कीट, मच्छर व मक्खियों व्दारा भोज्य पदार्थों और पानी का संक्रमित होना।
3 हवा की गंदगी से संक्रमण फैलना।
4 पित्त का दूषित होना, क्योंकि पित्त से होने वाले रोगों में बुखार सबसे प्रधान होता है।
5 तेज धूप में घूमना और बारिश में ज्यादा भीगना।
अब जानते हैं, इनसे पैदा होने वाले बुखार के लक्षण-
1 सिर व बदन में दर्द होना,
2 पेशाब का रंग लाल होना,
3 बेचैनी महसूस होना,
4 प्यास अधिक लगना,
5 मुंह का स्वाद कड़वा होना, जी मचलाना
6 अमवात या संधिवात के कारण कई बार जोड़ों में दर्द भी हो सकता है।
बुखार होने पर रखें यह सावधानियां-
1 बुखार होने पर रोगी को हवादार कमरे में लेटना चाहिए और जितना हो सके आराम करना चाहिए।
2 बुखार में हल्का और सुपाच्य भोजन करना चाहिए।
3 शरीर से अधिक मेहनत न कराएं।
4 दूध, चाय, मौसंबी का रस ले सकते हैं, तेल-मसालेदार चीजों से दूरी बनाए रखें।
5 यह सभी लक्षण सामने आने पर तुरंत डॉक्टर को दिखाएं अथवा घरेलू, आयुर्वेदिक उपचार अवश्य करें।
6 पानी को पहले उबाल कर थोड़ा गुनगुना ही पिएं।
7 मौसम में बदलाव के समय उचित आहार-विहार का पालन करें।
धर्म संसार / शौर्यपथ / महाराष्ट्र के पंढरपुर में भगवान श्रीकृष्ण का प्रसिद्ध मंदिर है। यहां श्रीकृष्ण विट्ठल रूप रूप में विराजमान है। प्रत्येक वर्ष देवशयनी एकादशी के मौके पर पंढरपुर में लाखों लोग भगवान विट्ठल और रुक्मणि की महापूजा देखने के लिए एकत्रित होते हैं। पंढरपुर की यात्रा आषाढ़ में तथा कार्तिक शुक्ल एकादशी को होती है।
1. 6वीं सदी में संत पुंडलिक हुए जो माता-पिता के परम भक्त थे। उनके इष्टदेव श्रीकृष्ण थे। उनकी इस भक्ति से प्रसन्न होकर एक दिन श्रीकृष्ण रुकमणी के साथ प्रकट हो गए। तब प्रभु ने उन्हें स्नेह से पुकार कर कहा, 'पुंडलिक, हम तुम्हारा आतिथ्य ग्रहण करने आए हैं।' पुंडलिक ने जब उस तरफ देखा और कहा कि मेरे पिताजी शयन कर रहे हैं, इसलिए आप इस ईंट पर खड़े होकर प्रतीक्षा कीजिए और वे पुन: पैर दबाने में लीन हो गए। भगवान ने अपने भक्त की आज्ञा का पालन किया और कमर पर दोनों हाथ धरकर और पैरों को जोड़कर ईंटों पर खड़े हो गए। ईंट पर खड़े होने के कारण श्री विट्ठल के विग्रह रूप में भगवान की लोकप्रियता हो चली।
2. यही स्थान पुंडलिकपुर या अपभ्रंश रूप में पंढरपुर कहलाया, जो महाराष्ट्र का सबसे प्रसिद्ध तीर्थ है। पुंडलिक को वारकरी संप्रदाय का ऐतिहासिक संस्थापक भी माना जाता है, जो भगवान विट्ठल की पूजा करते हैं। यहां भक्तराज पुंडलिक का स्मारक बना हुआ है। इसी घटना की याद में यहां प्रतिवर्ष मेला लगता है।
पंढरपुर मंदिर और इतिहास :
1. महाराष्ट्र के पंढरपुर में स्थित यह मंदिर भगवान श्रीकृष्ण को समर्पित है। यहां श्रीकृष्ण को विठोबा कहते हैं। इसीलिए इसे विठोबा मंदिर भी कहा जाता है।
2. यह हिन्दू मंदिर विठ्ठल-रुक्मिणी मंदिर के रूप में जाना जाता है। यह भगवान विठोबा की पूजा का मुख्य केंद्र है, जिनकी पत्नी रखुमई है। यह महाराष्ट्र का सबसे लोकप्रिय मंदिर है।
3. पंढरपुर का विठोबा मंदिर पश्चिमी भारत के दक्षिणी महाराष्ट्र राज्य में भीमा नदी के तट पर शोलापुर नगर के पश्चिम में स्थित है।
4. माना जाता है कि यहां स्थित पवित्र नदी चंद्रभागा में स्नान करने से भक्तों के सभी पापों को धोने की शक्ति होती है।
5. सभी भक्तों को भगवान विठोबा की मूर्ति के पैर छूने की अनुमति है। इस मंदिर में महिलाओं और पिछड़े वर्गों के लोगों को पुजारी नियुक्त किया गया है।
6. पंढरपुर तीर्थ की स्थापना 11वीं शताब्दी में हुई थी। मुख्य मंदिर का निर्माण 12वीं शताब्दी में देवगिरि के यादव शासकों द्वारा कराया गया था। श्री विट्ठल मंदिर यहां का मुख्य मंदिर है।
7. मंदिर में प्रवेश करते समय द्वार के समीप भक्त चोखामेला की समाधि है। प्रथम सीढ़ी पर ही नामदेवजी की समाधि है। द्वार के एक ओर अखा भक्ति की मूर्ति है। निज मंदिर के घेरे में ही रुक्मणिजी, बलरामजी, सत्यभामा, जांबवती तथा श्रीराधा के मंदिर हैं।
8. पंढरपुर के जो देवी मंदिर प्रसिद्ध हैं, उनमें पद्मावती, अंबाबाई और लखुबाई सबसे प्रसिद्ध हैं।
9. चंद्रभागा के पार श्रीवल्लभाचार्य महाप्रभु की बैठक है।
10. 3 मील दूर एक गांव में जनाबाई का मंदिर है और वह चक्की है जिसे भगवान ने चलाया था।
11. कहते हैं कि विजयनगर साम्राज्य के प्रसिद्ध नरेश कृष्णदेव विठोबा की मूर्ति को अपने राज्य में ले गए थे किंतु बाद में एक बार फिर इसे एक महाराष्ट्रीय भक्त वापस इसे ले आया और इसे पुन: यहां स्थापित कर दिया।
मेला और यात्रा :
1. यहां मेला लगता है। लोग दूर दूर से यात्रा करते हुए यहां आते हैं। देवशयनी और देवोत्थान एकादशी को वारकरी संप्रदाय के लोग यहां यात्रा करने के लिए आते हैं। यात्रा को ही 'वारी देना' कहते हैं।
2. भगवान विष्णु के अवतार विठोबा और उनकी पत्नी रुक्मणि के सम्मान में इस शहर में वर्ष में 4 बार त्योहार मनाने एकत्र होते हैं।
3. इनमें सबसे ज्यादा श्रद्धालु आषाढ़ के महीने में फिर क्रमश: कार्तिक, माघ और श्रावण महीने में एकत्रित होते हैं।
4. ऐसी मान्यता है कि ये यात्राएं पिछले 800 सालों से लगातार आयोजित की जाती रही हैं।
5. भगवान विट्ठल के दर्शन के लिए देश के कोने-कोने से पताका-डिंडी लेकर इस तीर्थस्थल पर लोग पैदल चलकर पहुंचते हैं। इस यात्रा क्रम में कुछ लोग अलंडि में जमा होते हैं और पुणे तथा जजूरी होते हुए पंढरपुर पहुंचते हैं। इनको ज्ञानदेव माउली की डिंडी के नाम से दिंडी जाना जाता है।
सेहत /शौर्यपथ / गाना बजने के बाद पैर अपने आप थिरकने लगते है। फिर चाहें उम्र जो भी हो। जिन्हें डांस करना नहीं आता वो भी गाने सुनने के बाद कोशिश करते हैं। यकिनन ऐसा करना गलत बिल्कुल नहीं है बल्कि डांसिंग के कई सारे फायदे हैं, शारीरिक और मानसिक के अलावा इमोशनली भी डांस से स्वास्थ को लाभ मिलता है। तो आइए जानते हैं इसके फायदों के बारे में।
1)इन दिनों बच्चे छोटी उम्र से ही डांस करना शुरू कर देते हैं, ऐसे में शरीर को बैलेंस करने में बच्चों को कोई समस्या नहीं होती है। वहीं बढ़ती उम्र में इन्हें चलने में भी कोई परेशानी नहीं होती। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि शरीर में स्थिरता आ जाती है।
2)मानसिक एक्सरसाइज के लिए डांस सबसे अच्छा विकल्प है। ये आपकी याददाशत को बढ़ता है और बढ़ती उम्र में होने वाली दिमागी समस्या को रोकने में मदद करता है। साथ ही फोकस बढ़ाने में मदद करता है।
3)जरूरी नहीं की आप डांस तभी करें जब आप बहुत अच्छे से इसे सीख जाएं। आप गाने को सुनने के बाद जैसा भी डांस करना चाहते हैं, वैसा करें। डांस ऐसी एक्सरसाइस है जो आपका सारा टैंशन कम कर सकती है। अगर आप लो फील कर रहे हैं, या फिर टैंशन, एनजाइटी और डिप्रेस फील कर रह हैं, तो इन सभी को कम करने के लिए डांस आपकी मदद कर सकता है।
4)इन दिनो हर कोई वजन कम करना चाहता है। ऐसे में डांस करना शुरू करें क्योंकि ये आपकी कैलोरी बर्न करने में मदद करता है। हर घंटे डांस करने पर आप 300-800 कैलोरी कम कर सकते हैं। हालांकि यह आपके वजन, डांस और तीव्रता पर निर्भर करता है। वजन कम करने के लिए आप एरोबिक डांस की मदद ले सकते हैं।
5)खराब कोलेस्ट्रॉल को कम करने के लिए लिपिड को कंट्रोल करना जरूरी है। ऐसे में डांस आपकी मदद कर सकता है। कहा जाता है कि बॉलरूम डांस शारीरिक और मानसिक दोनों तरह से जोड़ता है, ऐसे में ये कोलेस्ट्रॉल के स्तर को कम करने में ये मदद करेगा।
6)डांस आपके दिल के स्वास्थ्य को बेहतर बनाने का सबसे अच्छा तरीका है क्योंकि यह आपकी दिल की गति को स्थिर रखता है और हार्ट फेल के रिस्क को कम करता है। जब आप कार्डियोवस्कुलर एक्सरसाइज करते हैं, तो आप अपनी सहनशक्ति में सुधार का अनुभव करेंगे और सांस फूलने का अहसास नहीं होगा।
7)अक्सर मांसपेशियों में खिचाव की समस्या लोगों में होती है, इससे बचने और रोकने का तरीका है शरीर का लचीलापन। शरीर के लचीले होने से जोड़ों के दर्द को कम करने में भी मदद मिलती है। डांस आपको लचीला बनाचा है।
मानसिक और शारीरिक समस्या को दूर करने के लिए खुलकर .डांस करें। इसे आपका मन खुश रहेगा।
खाना खजाना / शौर्यपथ / पेट की चर्बी और बढ़े हुए वजन को कम करने के लिए लोग क्या कुछ नहीं करते। घंटों व्यायाम और जिम में कसरत करने के बाद भी कई लोगों के हाथ सिर्फ निराशा ही लगती है। इसके पीछे उनका लाइफस्टाइलऔर खान-पान की आदतें भी जिम्मेदार हो सकती हैं। अगर आपको भी ऐसा लगता है कि पेट पर जमा चर्बी और बढ़ा हुआ वजन आपके व्यक्तित्व के विकास में बाधा बन रहा है तो डाइट में शामिल करें टमाटर का जूस। टमाटर का जूस न सिर्फ पेट की चर्बी और बढ़े हुए वजन को कम करने में मदद करता है बल्कि इसका सेवन करने से व्यक्ति को सेहत से जुड़े कई लाभ भी मिलते हैं।
टमाटर में फाइबर के अलावा पोटैशियम, विटामिन सी, लाइकोपीन, एंटीऑक्सीडेंट्स, विटामिन ए, बी, सी और के, पोटेशियम, मैग्नीशियम और फास्फोरस जैसे तत्व प्रचूर मात्रा में मौजूद होते हैं जिनका सेवन सेहत के लिए कई मायनों में फायदेमंद माना जाता है। आइए जानते हैं वजन कम करने के लिए कैसे बनाया जाता है टमाटर का जूस।
कैसे बनाएं टमाटर का जूस -
आवश्यक सामग्री-
-4 से 5 टमाटर
-आधा चम्मच कालीमिर्च पाउडर
-सेलेरी (अजमोद) के डंठल
-1 चम्मच शहद
बनाने का तरीका-
टमाटर का जूस बनाने के लिए सबसे पहले टमाटर को साफ करके ब्लेंडर में अच्छी तरह से ब्लेंड कर लें। ब्लेंड करने के बाद इसमें सेलेरी के डंठल को मिलाएं और अच्छी तरह से ब्लेंड करें। अब इस जूस को छानकर अलग रख लें। इसमें कालीमिर्च और शहद को मिलाएं। अब इसका सेवन खाली पेट करें।
टिप्स ट्रिक्स / शौर्यपथ / रात को नींद न आना आपको दिनभर परेशान कर देता है। कई बार थकान के बाद भी अच्छी वाली नींद नहीं आती है जिसके लिए लोग तरसने लगते हैं। क्योंकि अच्छी नींद किसी दवा से कम नहीं हैं। लेकिन कई बार लोगों को अच्छी नींद के लिए संघर्ष करना पड़ता है। हालांकि पेट भर कर शाम को भोजन भी किया जाता है। लेकिन यह जरूर मायने रखता है कि आप क्या खाते हैं। आइए जानते हैं अगर आप अच्छी नींद के लिए परेशान हो रहे हैं तो आज से ही इन 4 चीजों का सेवन करना छोड़ दें।
1.चॉकलेट - कई लोगों को रात में भी चॉकलेट खाने का मन करने लगता है। लेकिन चॉकलेट में मौजूद कैफीन और शुगर की मात्रा आपकी नींद उड़ा देती है। इसलिए रात को किसी भी तरह से चॉकलेट का सेवन नहीं करें।
2.लहसुन - लहसुन दिल के मरीजों के लिए बहुत फायदेमंद दवा है। लेकिन अगर आप नींद नहीं आने की बीमारी से जूझ रहे हैं तो लहसुन का सेवन नहीं करें। लहसुन में विटामिन बी 6 मौजूद होता है जो नींद नहीं आने में फायदा करता है। इसके बाद लोग इनसोमनिया का शिकार हो जाते हैं।
3.रिफाइंड कार्बोहाइड्रेट के सेवन से बनाएं दूरी - जी हां, आपके खान-पान से आपकी सेहत और लाइफस्टाइल पर बहुत असर पड़ता है। कार्बोहाइड्रेट्स भी अलग - अलग तरह के होते हैं। अगर आप कहते हैं आपने आज भोजन नहीं करते हुए सिर्फ ब्रेड खाई है लेकिन सफेद वाली। तो यह आपकी नींद में जरूर खलल पैदा करेगा। जी, इसलिए क्योंकि इसमें रिफाइंड कार्ब की मात्रा बहुत अधिक होती है। इन्हें प्रोसेस्ड बनाने के लिए शक्कर, मैदा अन्य केमिकल्स का प्रयोग किया जाता है। अक्सर लोग को खाने के बाद नींद
आने लगती है। इसकी प्रमुख वजह है कार्ब्स खाने का परिणाम। जानकारी के लिए बता दें कि कार्ब्स शरीर में जाने के बाद ब्लड शुगर लेवल बढ़ जाता है। इस वजह से शरीर में उर्जा की कमी आ जाती है और बहुत अधिक कमजोरी और थकान महसूस होने लगती है।
4. चाय - इसे भारत देश में नेशनल ड्रिंक भी कहा जाता है। यह भारतीयों की पहली पसंद है। लेकिन जब नींद नहीं आने की समस्या से ग्रसित होते हैं तो चाय बंद की जाती हैं। जी हां, चाय में मौजूद कैफीन आपकी नींद को कम करने में मदद करता है और इतना ही नहीं आपको रातभर जगाने में भी मदद करता है। इसलिए रात को सोने से पहले चाय नहीं पीना चाहिए।
योग साधना/ शौर्यपथ /अंग-संचालन को सूक्ष्म व्यायाम भी कहते हैं। इसे आसनों की शुरुआत के पूर्व किया जाता है। इससे शरीर आसन करने लायक तैयार हो जाता है। सूक्ष्म व्यायाम के अंतर्गत नेत्र, गर्दन, कंधे, हाथ-पैरों की एड़ी-पंजे, घुटने, नितंब-कुल्हों आदि सभी की बेहतर वर्जिश होती है। इसे ही तोड़-मरोड़कर एरोबिक्स नाम से कराया जाता है। क्लास में जो पीटी कराई जाती है वह भी अंग संचालन का हिस्सा मात्र है। आओ जानते हैं कि इसे किस तरीके से किया जाता है।
अंग संचालन या योगासन तीन तरीके से करते हैं- A.बैठकर B.लेटकर और C.खड़े रहकर। बैठकर किए जाने वाले की शुरुआत दंडसन से, लेटकर किए जाने वाले की शुरुआत शवासन और मकरासन से और खड़े रहकर किए जाने वाले अंग संचालन की शुरुआत ताड़ासन या नमस्कार मुद्रा से।
दंडासन में दोनों पैरों को सामने की तरफ सीधा रखा जाता है। कमर से हाथों को सटाकर और हथेलियों को भूमि पर जमा देते हैं। कमर और हाथ को सीधा रखा जाता है। फिर क्रमश: पैर के पंजे, एड़ी, घुटनें, नितंब, पेट, पीठ, हाथ के पंजे, कोहनी, छाती, कंधा, गर्दन और आंखों की एक्सरसाइज़ की जाती है। शवासन, मकरासन और सावधान पोश्चर के
बारे में सभी जानते हैं।
*पंजे एवं एड़ी की एक्सरसाइज :
स्टेप 1- दंडासन में बैठकर पैरों के अंगुठे और अंगुलियों को आगे फिर पीछे की ओर धीरे-धीरे बलपूर्वक दबाएं। एड़ियां स्थिर रखें। फिर पूरे पंजे को एड़ी सहित आगे एवं पीछे दबाएं। आगे दबाते हुए एड़ी का जमीन पर घर्षण होगा। यह अभ्यास साईटिका पेन तथा घुटनों के लिए उपयोगी है। इस अभ्यास को 8-10 बार करें।
स्टेप 2- दोनों पैरों को थोड़ी दूरी पर रखें। फिर पहले दाहिने पैर की एड़ी को स्थिर रखते हुए पंजे को दाएं से बाईं दिशा में गोलाकर घुमाएं। फिर बाएं से दाहिने घुमाएं। इस अभ्यास को 8-10 बार दोहराएं। इसी प्रकार दूसरे पैर से अभ्यास करें और फिर दोनों पैरों को मिलाकर एक साथ करें। दोनों स्टेप के दौरान हाथ की हथेलियां भूमि पर ही कमर से सटाते हुए जमाएं रखें।
घुटने एवं नितंब की एक्सरसाइज :
स्टेप 1- दाएं पैर को मोड़कर बाईं जंघा पर रखें, बाएं हाथ से दाहिने पंजे को पकड़े तथा दाएं हाथ को दाएं घुटने पर रखें। अब दाएं हाथ को दाएं घुटने के नीचे लगाते हुए घुटने को ऊपर उठाकर छाती से लगाए तथा घुटने को दबाते हुए जमीन पर टिका दें। इस तरह ऊपर और नीचे 8-10 बार करें। इसी प्रकार इस अभ्यास को विपरीत बाएं पैर को मोड़कर दाएं जंघा पर रखकर पहले के समान करें।
स्टेप 2- अंत में दोनों हाथों से पंजों को पकड़कर घुटनों को भूमि पर स्पर्श कराएं और ऊपर उठाएं। इस प्रकार कई बार इसे दौहराएं करें। नितम्ब के जोड़ को स्वस्थ करने के लिए तथा वहां बढ़ी चर्बी को कम करने के लिए यह अभ्यास किया जाता है। इससे पद्मासन करने में भी सरलता होगी।
अंगुलियों के लिए एक्सरसाइज :
स्टेप 1- दंडासन में बैठकर दोनों हाथों को सामने फैलाकर हथेलियों को भूमि की ओर रखें। फिर अंगुलियों को बलपुर्वक धीरे-धीरे मोड़ें और सीधा करें। अर्थात मुठ्ठी बंद करना ओर खोलना। इस अभ्यास को 8-10 कर सकते हैं।
स्टेप 2- इसके पश्चात अंगुठे को मोड़कर अंगुलियों से दबाते हुए मुक्के जैसी आकृति बनाएं, फिर धीरे-धीरे खोलें। इस प्रकार 10-12 बार कर सकते हैं।
स्टेप 3- अंगुठे को मोड़कर अंगुलियों से दबाते हुए दोनों हाथों की मुठ्ठियां बन्द करके सामने कंधे के समानान्तर सीधा रखें तथा मुठ्ठियों को क्लाकवाइज और एंटीक्लाकवाइज घुमाएं। कोहनियां सीधी रहनी चाहिए। इस अभ्यास को 4-6 बार कर सकते हैं।
स्टेप 4- दोनों हाथों को सामने फैलाकर हाथों के अंगुठे को बारी- बारी से सभी अंगुलियों से स्पर्श कराएं। जैसे हम अंगुलियों पर गिनति गिनते हैं उसी तरह। ऐसा 8-10 बारे करें।
स्टेप 5- अंगुलियों के पृष्ठ भाग के नाखुन आले हिस्से को अंगुठे से दबाएं। इस एक्सरसाइज़ में प्रत्येक अंगुली से शून्य की आकृति बनेगी। एक हाथ से 4 से 6 बार करें।
हृदय, कोहनी, हाथ, गर्दन और सोल्डर के लिए एक्सरसाइज :
स्टेप 1- दोनों हाथों की हथेलियों को ऊपर की ओर करते हुए हाथों को सामने फैलाएं। अब कोहनी को मोड़ते हुए अंगुलियों को मिलाते हुए दाएं कंधे पर दाएं हाथ की अंगुलियां और बाएं पर बाईं अंगुलियां स्पर्श करें। फिर पुन: हाथों को सीधा कर दें। ऐसा चार से छह बार करें।
स्टेप 2- इसी अभ्यास को हाथों को दोनों कंधों के समानांतर फैलाकर भी करें। जैसे पहली स्टेप में हाथ ऊपर की ओर थे। अब सामने रखें और फिर कंधों के समानांतर फैलाकर कोहनी को मोड़कर यह अभ्यास करें।
स्टेप 3- दोनों हाथों की हथेलियों को दोनों कंधों के समानांतर फैलाएं। अब कोहनी को मोड़ते हुए अंगुलियों को मिलाते हुए दाएं कंधे पर दाएं हाथ की अंगुलियां और बाएं पर बाईं अंगुलियां स्पर्श करें।
स्टेप 4- अब कोहनियों को क्लाकवाइज और एंटी क्लाकवाइज घुमाएं। ऐसा चार से छह बार करें। फिर दोनों कोहनियों को छाती के सामने एक-दुसरे से स्पर्श करते हुए क्लाकवाइज और एंटी क्लाकवाइज घुमाएं।
स्टेप 5- दोनों हाथों की मुठ्ठी बन्द करके छाती के पास इस प्रकार रखें कि अंगुलियों के पीछे वाले भाग आपस में लगे हुए हों।
स्टेप 6-अब मुठ्ठी बंध दोनों हाथों की अंगुलियों को दबाते हुए फिर कोहनियों को पीठ के पीछे ले जाए। इस प्रक्रिया से आपकी छाती खुलेगी। फिर धीरे धीरे पुन: बंद मुठ्ठियों को छाती के पास लाकर मिला दें। इस प्रक्रिया को मुठ्ठियां खोलकर भी कर सकते हैं।
स्टेप 7- अब दाएं हाथ से बाएं हाथ के कंधे को और बाएं हाथ से दाएं हाथ के कंधे को पकड़े और हाथों से कंधों को दबाते हुए परे हाथ को कलाइयों तक दबाएं। यह एक्सरसाइज़ भी चार से छह बार करें।
गर्दन के लिए एक्सरसाइज़ :
स्टेप 1. दंडासन में बैठकर ही गर्दन को पहले दांईं ओर घुमाकर ठोड़ी को दाएं कंधे की सीध में लाने का प्रयास करें। इसी तरह गर्दन को घुमाकर बाईं ओर ले जाकर बाएं कंधे की सीध में रखें।
स्टेप 2- इसके पश्चात गर्दन को सामने लाकर आगे की ओर झुकाते हुए ठोड़ी को छाती से लगाइए फिर धीरे-धीरे पीछे ऊपर उठाकर पीछे की ओर यथाशक्ति झुकाएं। अन्त में गर्दन को दोनों दिशाओं में गोलाकर घुमाएं।क्लाकवाइज और एंटी क्लाकवाइज।
स्टेप 3- दाएं ओर की हथेली को दाईं ओर कान के ऊपर सिर पर रखकर हाथ से सिर को दबाएं तथा
सिर से हाथ की ओर दबाव डालें। इस प्रकार हाथ से सिर को तथा सिर से हाथ को एक दूसरे के विरुद्ध दबाने से गर्दन में एक कम्पन होता है। इस प्रकार 4-5 बार दबाव डालकर बाईं ओर से इस क्रिया को करना चाहिए।
स्टेप 4- अन्त में दोनों हाथों की अंगुलियों को एक दूसरे में डालते हुए हाथों से सिर को ओर सिर से हाथों को दबाए। ऐसा करते हुए सिर तथा गर्दन सीधी रहनी चाहिए। विरुद्ध दबाव से मात्र एक कम्पन होगा जो कि गर्दन के लिए तथा वहां पर रक्त संचार को सुचारु करने के लिए आवश्यक है।
पेट, कमर और पीठ के लिए एक्सरसाइज़ :
स्टेप 1- दोनों पैरों को थोड़ा खोलकर सामने फैलाए। दोनों हाथों को कंधों के समकक्ष सामने उठाकर रखें। फिर दाहिनें
हाथ से बाएं पैर के अंगूठे को पकड़े एवं बाएं हाथ को पीछे की ओर ऊपर सीधा रखें, गर्दन को भी बाईं ओर घुमाते हुए पीछे की ओर देखने का प्रयास करें। इसी प्रकार दूसरी ओर से करें। इन दोनों अभ्यासों से कमर दर्द व पेट स्वस्थ होता है तथा कमर की बढ़ी हुई चर्बी दूर होती है, परन्तु जिनको अत्यधिक कमर दर्द है वे इस अभ्यास को न करें।
स्टेप 2- दोनों हाथों से एक दूसरे हाथ की कलाई पकड़कर ऊपर उठाते हुए सिर के पीछे ले जाएं। श्वास अन्दर भरते हुए दाएं हाथ से बाएं हाथ को दाहिनी ओर सिर के पीछे से खीचें। गर्दन व सिर स्थिर रहे। फिर श्वास छोड़ते हुए हाथों को ऊपर ले जाएं। इसी प्रकार दूसरी ओर से इस क्रिया को करें।
स्टेप 3- घुटने और हथेलियों के बल बैठ जाएं। जैसे बैल या बिल्ली खड़ी हो। अब पीठ को ऊपर खिठचें और गर्दन झुकाते हुए पेट को देखने का प्रयास करें। फिर पेट व पीठ को नीचे खिंचे तथा गर्दन को ऊपर उठाकर आसमान में देंखे। यह प्रक्रिया 8-12 बार करें।
पाचन संस्थान के लिए एक्सरसाइज़ :
स्टेप 1- सावधान की मुद्रा में खड़े हो जाएं फिर दोनों होथों की हथेलियों को एक-दूसरे में फंसाते हुए उन्हें सिर के ऊपर की ओर ले जाएं और हथेलियों को आकाश की ओर कर दें। अब एक बार स्वयं के सिर को दाएं झुकाएं फिर बाएं। ऐसा 8 से 12 बार करें।
स्टेप 2- कुछ दूरी पर पैरों को फैलाकर विश्राम की मुद्रा में खड़े हो जाएं और दोनों हाथों को सामने फैला दें। फिर शरीर को कमर से मोड़ते हुए हाथों को पहले दाएं ले जाएं इस तरह की बाएं हाथ कि हथेलियां दायां कंधा छू ले। फिर हाथों को सीधा करते हुए बाएं लें जाएं। इस प्रक्रिया को भी 8 से 12 बार करें।
स्टेप 3-सावधान मुद्रा में खड़े हो जाएं। दोनों हाथों की हथेलियों को कमर पर रखें और फिर कमर को क्लाकवाइज और एंटीक्लाकवाइज घुमाएं।
स्टेप 4- पेट के बल मकरासन की स्थिति में लेट जाएं। फिर हाथ की हथेलियों को भूमि कर दबाते हुए सर्पासन की तरह शरीर को भूमि से उठा लें जिससे बाजू पूर्ण रूप से सीधे हो जाएं। अब अपने सिर और छाती दाएं को घुमाकर पैरों को देखने का प्रयास करें। फिर बाएं घुमाकर पैरों को देंखे। इस प्रक्रिया को 6 से 8 बार करें।
स्टेप 5- पंजों के बल बैठ जाएं। दोनों हाथों की हथेलियों को घुटनों पर रख लें। फिर दाएं पैर को उठकर पगथलियों को भूमि पर टिकाएं अर्थात हनुमान स्टाइल में बैठ जाएं लेकिन हथेलियों को घुटने से अलग न करें। फिर गर्दन और छाती घुमाकर पीछे देंखे। कुछ देर इसी स्थिति में रहने के बाद यही प्रक्रिया बाएं पैर को भूमि पर रखकर करें। इसे 8 से 12 बार कर सकते हैं।
आंख, आई ब्रो, गाल और कान के लिए एक्सरसाइज़ :
स्टेप 1- गर्दन को सीधा रखकर आंखों की पुतलियों को पहले चार से छह बार ऊपर-नीचे और फिर दाएं-बाएं घुमाएं। तत्पश्चात चार से छह बार दाएं-बाएं गोलाई में घुमाएं अर्थात क्लाकवाइज और एंटी क्लाकवाइज।
स्टेप 1- आई ब्रो को भृकुटि के अर्थात दोनों आई ब्रो के मध्य स्थान से अंगूठे और तर्जनी अंगुली से पकड़कर हल्के से दबाएं।
स्टेप 2- मुंह में हवा भर लें। उस हवा को चार से छह बार दाएं-बाएं घुमाएं फिर चार-छह बार हवा भरें और निकाले। गालों का हल्के से हथेलियों से थपथपाएं। फिर थोड़ी को हाथ के पृष्ठ भाग से थपथपाएं।
स्टेप 2- दाएं हाथ की अंगुलियों से दायां और बाएं से बाया कान पहले नीचे से पकड़कर मरोड़े और फिर ऊपर से पकड़ कर मरोड़े। फिर कुछ देर के लिए कानों के दोनों छिद्र अंगुलियों से बंद कर दें।
लाभ : यह एक्सरसाइज़ पूरे हाथ, सर्वाइकल स्पोंडोलाइटिस, फ्रोजन सोल्डर, जोड़ों का दर्द, साइटिका, नेत्र रोग, तनाव, सिरदर्द, गर्दन का दर्द, कमर दर्द, पीठ दर्द, पेट के रोग, कमजोर बोन, कमजोरी, रक्त अशुद्धता, आलस्य, कब्ज आदि रोगों में लाभदायक है।
अंतत: और भी हैं अनेकों एक्सरसाइज़, लेकिन इतने से ही शरीर और मन को अत्यधिक लाभ पहुंचाया जा सकता है।
आस्था / शौर्यपथ / जिस तरह वृक्षों में पीपल, नीम और बरगद का खास महत्व है। उसी तरह हिन्दू धर्म में कमल, पारिजात, केतकी के फूलों को बहुत ज्यादा महत्व दिया जता है। आओ जानते हैं कमल के फूल के संबंध में रोचक बातें।
1. हिन्दू पुराणों के अनुसार कमल के फूल की उत्पत्ति भगवान विष्णुजी की नाभि से हुई है और कमल के फूल से ब्रह्माजी की उत्पत्ति मानी जाती है।
2. कमल के पुष्प को ब्रह्मा, लक्ष्मी तथा सरस्वतीजी ने अपना आसन बनाया है।
3. कमल का फूल नीला, गुलाबी और सफेद रंग का होता है। कुमुदनी और उत्पल (नीलकमल) यह कमल के ही प्रकार हैं। इसके पत्तों और रंगों में अंदर त रहता है।
4. सभी कमल पानी में ही उगते हैं या खिलते हैं, परंतु ब्रह्म कमल को गमले में भी उगा सकते हैं। इसके फूल वर्ष में एक बार ही खिलते हैं।
5. कमल का फूल जल से उत्पन्न होकर कीचड़ में खिलता है परंतु वह दोनों से निर्लिप्त रहकर पवित्र जीवन जीने की प्रेरणा देता है। मतलब यह कि बुराइयों के बीच भी रहकर व्यक्ति अपनी मौलिकता और पवित्रता को बरकरार रखता है।
6. कहते हैं कि कमल के फूल की ही तरह सृष्टि और इस ब्रह्मांड की रचना हुई है और यह ब्रह्मांड इसी फूल की तरह है।
7. अनेक प्रकार के यज्ञों व अनुष्ठानों में कमल के पुष्पों को निश्चित संख्या में चढ़ाने का विधान शास्त्रों में भी वर्णित है।
8. कमल के फूलों को धारण करने से शरीर शीतल रहता है, फोड़े-फुंसी आदि शांत होते हैं तथा शरीर पर विष का कुप्रभाव कम होता है।
9. कमलगट्टे की माला और सब्जी बनती है।
10. बौद्ध धर्म के ललित विस्तार ग्रंथ में कमल को अष्टमंगल माना गया है।
धर्म संसार / शौर्यपथ /आषाढ़ शुक्ल पक्ष की सप्तमी को वैवस्वत सूर्य की पूजा की जाती है। अंग्रेजी माह के अनुसार इस बार यह तिथि 16 जुलाई 2021 शुक्रवार को पड़ रही है। वैवस्वत पूजा क्या है? क्यों की जाती है? जानिए महत्व।
वैवस्वत पूजा क्या है?
12 आदित्यों में से एक भगवान सूर्य को विवस्वान भी कहा जाता है। इन्हीं विवस्वान और विश्वकर्मा की पुत्री संज्ञा के पुत्र थे वैवस्वत मनु। वैवस्वत मनु को कई जगहों पर श्राद्धदेव या सत्यव्रत भी कहा गया है। इन्हीं की पूजा की जाती है जिसे वैवस्वत पूजा कहा जाता है। वैवस्वत मनु की शासन व्यवस्था में देवों में पांच तरह के विभाजन थे: देव, दानव, यक्ष, किन्नर और गंधर्व। वैवस्वत मनु के दस पुत्र थे। इल, इक्ष्वाकु, कुशनाम, अरिष्ट, धृष्ट, नरिष्यन्त, करुष, महाबली, शर्याति और पृषध पुत्र थे। इसमें इक्ष्वाकु कुल का ही ज्यादा विस्तार हुआ। इक्ष्वाकु कुल में कई महान प्रतापी राजा, ऋषि, अरिहंत और भगवान हुए हैं।
क्यों की जाती है?
द्रविड़ देश के राजर्षि सत्यव्रत (वैवस्वत मनु) के समक्ष भगवान विष्णु ने मत्स्य रूप में प्रकट होकर कहा कि आज से सातवें दिन भूमि जल प्रलय के समुद्र में डूब जाएगी। तब तक एक नौका बनवा लो। समस्त प्राणियों के सूक्ष्म शरीर तथा सब प्रकार के बीज लेकर सप्तर्षियों के साथ उस नौका पर चढ़ जाना। प्रचंड आंधी के कारण जब नाव डगमगाने लगेगी तब मैं मत्स्य रूप में बचाऊंगा। तुम लोग नाव को मेरे सींग से बाँध देना। तब प्रलय के अंत तक मैं तुम्हारी नाव खींचता रहूंगा। उस समय भगवान मत्स्य ने नौका को हिमालय की चोटी ‘नौकाबंध’ से बांध दिया। भगवान ने प्रलय समाप्त होने पर वेद का ज्ञान वापस दिया। राजा सत्यव्रत ज्ञान-विज्ञान से युक्त हो वैवस्वत मनु कहलाए। उक्त नौका में जो बच गए थे उन्हीं से संसार में जीवन चला। इसी घटना की याद में वैवस्वत मनु की पूजा की जाती है। यह भी कहा जाता है कि वैवस्वत मनु पूर्वाषाढ़ को प्रकट हुए थे। इसीलिए इस दिन का महत्व है।
महत्व :
1. भगवान सूर्य के साथ उनके पुत्र वैवस्वत मनु की पूजा करने का महत्व है। आषाढ़ महीने की सप्तमी तिथि पर भगवान सूर्य के साथ उनके पुत्र वैवस्वत मनु की भी पूजा की जाती है।
2. सूर्य सप्तमी का व्रत और पूजा करने से व्यक्ति को आरोग्य का आशीष मिलता है, साथ ही वह सूर्य कृपा से अपने शत्रुओं पर भी विजय प्राप्त करता है।
3. ज्योतिष ग्रंथों के अनुसार अभी वैवस्वत मनवंतर चल रहा है। सूर्यदेव ने देवमाता अदिति के गर्भ से जन्म लिया था और विवस्वान एवं मार्तण्ड कहलाए। इन्हीं की संतान वैवस्वत मनु हुए जिनसे सृष्टि का विकास हुआ है। इन्हीं के नाम पर ये मन्वंतर है। शनि महाराज, यमराज, यमुना और कर्ण भी भगवान सूर्य की ही संतान हैं।
4. यह भी कहा जाता है कि वैवस्वत मनु पूर्वाषाढ़ को प्रकट हुए थे। इसीलिए इस दिन का महत्व है।
5. वैवस्वत मनु की पूजा से शनि और यम का भय भी नहीं रहता है।
Feb 09, 2021 Rate: 4.00
