September 09, 2026
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    धर्म संसार /शौर्यपथ /हर देवी या देवता किसी न किसी की सवारी करने के बाद ही गमन करते हैं, जैसे लक्ष्मीजी उल्लू पर, विष्णुजी गरुढ़ पर, माता दुर्गा शेर पर और इसी तरह सभी देवी देवताओं के पार अपनी अपनी सवारी है परंतु क्या आप जानते हैं कि हनुमानजी के पास कितने प्रकार के अस्त्र शस्त्र हैं और वे कौन से वाहन की सवारी करते हैं? नहीं जानते हैं तो आओ आज हम आपको बताते हैं।
    खड्गं त्रिशूलं खट्वाङ्गं पाशाङ्कुशसुपर्वतम् ।
    मुष्टिद्रुमगदाभिन्दिपालज्ञानेन संयुतम् ॥ ८॥
    एतान्यायुधजालानि धारयन्तं यजामहे ।
    प्रेतासनोपविष्टं तु सर्वाभरणभूषितम् ॥ ९॥
    हनुमानजी का वाहन : 'हनुमत्सहस्त्रनामस्तोत्र' के 72वें श्‍लोक में उन्हें 'वायुवाहन:' कहा गया। मतलब यह कि उनका वाहन वायु है। वे वायु पर सवार होकर अति प्रबल वेग से एक स्थान से दूसरे स्थान पर गमन करते हैं। हनुमान जी ने एक बार श्रीराम और लक्ष्‍मण को अपने कंधे पर बैठाकर उड़ान भरा था। उसके बाद एक बार हनुमान जी ने बात-बात में द्रोणाचल पर्वत को उखाड़कर लंका ले गए और उसी रात को यथास्थान रख आए थे।
    भूतों की सवारी : प्रचलित मान्यता और जनश्रुति के अनुसार यह कहा जाता है हनुमानजी भूतों की सवारी भी करते हैं।
    हनुमानजी के अस्त्र और शस्त्र : हनुमानजी के अस्त्र-शस्त्रों में पहला स्थान उनकी गदा का है। कुबेर ने गदाघात से अप्रभावित होने का वर दिया है। हनुमान जी वज्रांग हैं। यम ने उन्हें अपने दंड से अभयदान दिया है। भगवान शंकर ने हनुमानजी को शूल एवं पाशुपत, त्रिशूल आदि अस्त्रों से अभय होने का वरदान दिया था। अस्त्र-शस्त्र के कर्ता विश्‍वकर्मा ने हनुमान जी को समस्त आयुधों से अवध्‍य होने का वरदान दिया है।
    उनके संपूर्ण अंग-प्रत्यंग, रद, मुष्ठि, नख, पूंछ, गदा एवं गिरि, पादप आदि प्रभु के अमंगलों का नाश करने के लिए एक दिव्यास्त्र के समान है। 1.खड्ग, 2.त्रिशूल, 3.खट्वांग, 4.पाश, 5.पर्वत, 6.अंकुश, 7.स्तम्भ, 8.मुष्टि, 9.गदा और 10.वृक्ष हैं।
    हनुमानजी का बायां हाथ गदा से युक्त कहा गया है। 'वामहस्तगदायुक्तम्'. श्री लक्ष्‍मण और रावण के बीच युद्ध में हनुमान जी ने रावण के साथ युद्ध में गदा का प्रयोग किया था। उन्होंने गदा के प्रहार से ही रावण के रथ को खंडित किया था। स्कंदपुराण में हनुमानजी को वज्रायुध धारण करने वाला कहकर उनको नमस्कार किया गया है। उनके हाथ में वज्र सदा विराजमान रहता है। अशोक वाटिका में हनुमानजी ने राक्षसों के संहार के लिए वृक्ष की डाली का उपयोग किया था। हनुमानजी का एक अस्त्र उनकी पूंछ भी है। अपनी मुष्टिप्रहार से उन्होंने कई दुष्‍टों का संहार किया है।

    धर्म संसार /शौर्यपथ /तांडव शब्द भगवान शिव से जुड़ा हुआ है। ताण्डव का अर्थ होता है उग्र तथा औद्धत्यपूर्ण क्रिया कलाप या स्वच्छंद क्रिया कलाप। ताण्डव (अथवा ताण्डव नृत्य) शंकर भगवान द्वारा किया जाने वाला अलौकिक नृत्य है।
    1. तांडव के प्रवर्तक : शास्त्रों के अनुसार शिवजी को ही तांडव नृत्य का प्रवर्तक माना जाता है। परंतु अन्य आगम तथा काव्य ग्रंथों में दुर्गा, गणेश, भैरव, श्रीराम आदि के तांडव का भी उल्लेख मिलता है।
    2. तांडव स्त्रोत : रावण ने अपने आराध्य शिव की स्तुति में 'शिव तांडव स्तोत्र' की रचना की थी। इसके अलावा आदि शंकराचार्य रचित दुर्गा तांडव (महिषासुर मर्दिनी संकटा स्तोत्र), गणेश तांडव, भैरव तांडव एवं श्रीभागवतानंद गुरु रचित श्रीराघवेंद्रचरितम् में राम तांडव स्तोत्र भी प्राप्त होता है।
    3. तांडव नृत्य : मान्यता है कि रावण के भवन में पूजन के समाप्त होने पर शिवजी ने, महिषासुर को मारने के बाद दुर्गा माता ने, गजमुख की पराजय के बाद गणेशजी ने, ब्रह्मा के पंचम मस्तक के छेदद के बाद आदिभैरव ने तथा रावण के वध के समय प्रभु श्रीराम जी ने तांडव नृत्य किया।
    4. तांडव ताल : भारतीय संगीत शास्त्र में चौदह प्रमुख तालभेद में वीर तथा बीभत्स रस के सम्मिश्रण से बना तांडवीय ताल का उल्लेख मिलता है।
    5. तांडव वनस्पति : वनस्पति शास्त्र के अनुसार एक प्रकार की घास को भी तांडव कहा गया है।
    6. शिव का तांडव नृत्य : कहते हैं कि भगवान शिव दो स्थिति में तांडव नृत्य करते हैं। पहला जब वो क्रोधित होते हैं तब वे बिना डमरू के तांडव नृत्य करते हैं। ऐसा में जब शिवजी को क्रोध आता है तो वे तांडव नृत्य करते हैं और जब क्रोध वे ते अपना तीसरा नेत्र खोल देते हैं तो जो भी सामने होता है वह भस्म हो जाता है। परंतु दूसरा जब वे डमरू बजाते हुए तांडव करते हैं तो इसका अर्थ यह है कि वे आनंदित हैं, प्रकृति में आनंद की बारिश हो रही है। ऐसे समय में शिव परम आनंद से पूर्ण रहते हैं। नटराज, भगवान शिव का ही रूप है, जब शिव तांडव करते हैं तो उनका यह रूप नटराज कहलता है।
    7. सृष्टि को भस्म करने के लिए तांडव : कुछ का मानना है कि शिव ने तांडव नृत्य कर सृष्टि को भस्म कर दिया था तब सृष्टि की जगह बहुत काल तक यही (महाशिवरात्रि) महारात्रि छाई रही। देवी पार्वती ने इसी रात्रि को शिव की पूजा कर उनसे पुन: सृष्टि रचना की प्रार्थना की इसीलिए इसे शिव की पूजा की रात्रि कहा जाता है। फिर इसी रात्रि को भगवान शंकर ने सृष्टि उत्पत्ति की इच्छा से स्वयं को ज्योतिर्लिंग में परिवर्तित किया।
    8. ज्ञान प्राप्ति पर तांडव : यह भी कहा जाता है कि भगवन शिव को जब हिमालय पर ज्ञान प्राप्त हुआ था उस ज्ञान के आनंद में उन्होंने झूमकर नृत्य किया था, जिस नृत्य को बाद में तांडव कहा गया। शिव के शिष्य हैं- बृहस्पति, विशालाक्ष, शुक्र, सहस्राक्ष, महेन्द्र, प्राचेतस मनु, भरद्वाज इसके अलावा 8वें गौरशिरस मुनि भी थे। सर्व प्रथम इन्होंने ही शिवजी का तांडव नृत्य उस वक्त देखा था जब उन्हें (शिवजी को) ज्ञान प्राप्त हुआ था।
    9. काली तांडव : शिवजी के साथ माता काली ही उनके जैसा तांडव करने की क्षमता रखती हैं। माता पार्वती ने यही नृत्य बाणासुर की पुत्री को सिखाया था।
    10. शास्त्रीय नृत्य : कहते हैं कि भरतमुनि ने नाट्यशास्त्र का पहला अध्याय लिखने के बाद अपने शिष्यों को तांडव नृत्य का प्रशिक्षण दिया था। वर्तमान में शास्त्रीय नृत्य से संबंधित जिनती भी कला या विद्याएं या नृत्य प्रचलित हैं वह सभी तांडव नृत्य की ही देन हैं। तांडव नृत्य की एक तीव्र शैली है, वहीं इसी लास्य सौम्य शैली भी है। लास्य शैली में वर्तमान में भरतनाट्यम, कुचिपुडी, ओडिसी और कत्थक नृत्य किए जाते हैं जबकि कथकली तांडव नृत्य से प्रेरित है।

    सेहत /शौर्यपथ /लौंग की भारतीय खाने में खास जगह है। इसके उपयोग से खाने में स्वाद के साथ-साथ कुछ अहम गुण भी जुड़ जाते हैं। इसका उपयोग तेल व एंटीसेप्टिक के रूप में किया जाता है। लौंग में आपके स्वास्थ्य को दुरुस्त रखने के कई गुण होते हैं।
    लौंग में होने वाला एक खास तरह का स्वाद इसमें होने वाले एक तत्व युजेनॉल की वजह से होता है। यही तत्व इसमें होने वाली एक खास तरह की गंध को पैदा करता है। हालांकि लौंग हर मौसम में हर उम्र के व्यक्तियों के लिए लाभदायक है, पर सर्दी के मौसम में इसकी खास उपयोगिता है, क्योंकि इसकी तासीर बहुत गर्म होती है। लौंग के तेल की तासीर काफी गर्म होती है और इस कारण इसे बहुत सावधानी से इस्तेमाल करना चाहिए। जब आप अपनी त्वचा पर इसे लगाएं तो सीधे तौर पर बिना किसी चीज को साथ मिलाए न लगाएं।
    1. दांतों में होने वाले दर्द में लौंग के इस्तेमाल से निजात मिलती है और यही कारण है कि 99 प्रतिशत टूथपेस्ट में होने वाले पदार्थों की लिस्ट में लौंग खासतौर पर शामिल होती है।
    2. खांसी और बदबूदार सांसों के इलाज के लिए लौंग बहुत कारगर है। लौंग का नियमित इस्तेमाल इन समस्याओं से छुटकारा दिलाता है। आप लौंग को अपने खाने में या फिर ऐसे ही सौंफ के साथ खा सकते हैं।
    3. सामान्य तौर पर होने वाली सर्दी को लौंग से दुरुस्त किया जा सकता है। आप लौंग के तेल की 10 बूंदों को शहद के साथ मिलाकर दिन में 2 से 3 बार इस्तेमाल करके अपनी सर्दी को ठीक कर सकते हैं।
    4. लौंग में दिमागी स्ट्रेस को कम करने का भी गुण होता है। लौंग को आप तुलसी, पुदीना और इलायची के साथ इस्तेमाल करके खुशबूदार चाय बना सकते हैं और चाहें तो यही मिक्स आप शहद के साथ इस्तेमाल करके भी स्ट्रेस से छुटकारा पा सकते हैं।
    लौंग का तेल अन्य किसी भी तेल के मुकाबले सबसे ज्यादा एंटीऑक्सीडेंट गुणों से भरपूर होता है। एंटीऑक्सीडेंट स्वस्थ त्वचा और शरीर को तंदुरुस्त रखने में बहुत कारगर होते हैं। लौंग के तेल में मिनरल्स जैसे पोटेशियम, सोडियम, फॉस्फोरस, आयरन, विटामिन A और विटामिन C अत्यधिक मात्रा में होते हैं।
    लौंग स्वास्थ्यवर्धक है, वहीं इसके कुछ नुकसान भी हैं। आइए, जानते हैं इसके दुष्प्रभाव के बारे में...
    इसका अत्यधिक सेवन आंतों को नुकसान पहुंचा सकता है।
    लौंग के ज्यादा सेवन से शरीर में जलन भी हो सकती है
    शरीर में गर्मी बढ़ने पर मुंहासे संबधी समस्या भी उत्पन्न हो सकती है।
    इसके अत्यधिक सेवन से एलर्जी का भी डर रहता है।
    रक्त का पतलापन भी हो सकता है।

    सेहत /शौर्यपथ / हममे से अधिकतर लोग खाना खाने के बाद सौंफ खाना पसंद करते है। वैसे भी सौंफ माउथ फ्रेशनर का भी काम करता हैं। सौंफ के सेवन से मुंह की दुर्गंध से भी छुटकारा मिलता है, इसके अलावा भी सौंफ के कई फायदे हैं। दरअसल, सौंफ औषधीय गुणों से भरपूर होती है, खाने के बाद इसके सेवन से भोजन पचाने में आसानी होती है। ऐसे कई अन्य गुणों के लिए सौंफ जानी जाती हैं। आइए जानते हैं सौफ के पानी के फायदों के बारे में
    सौंफ का पानी पेट की कई समस्याओं से निजात दिलाता है। इससे आपको पेट से जुड़ी समस्या से राहत मिलती है। जैसे एसिडिटी और पेट में गैस की समस्या से आप परेशान हैं, तो सौंफ का पानी आपको नियमित रूप से पीना चाहिए। इससे आपको राहत मिलेगी।
    वजन घटाना चाहते है, तो सुबह खाली पेट सौंफ के पानी का सेवन करना आपके लिए बहुत फायदेमंद है। सौंफ के पानी से
    वजन घटाने में मदद मिलती है। इसे आप नियमित सुबह के समय खाली पेट पीएं। यह मेटाबॉलिज्म को बढ़ाता है, जिससे शरीर अधिक फैट को कम करता है। इसके लिए सौंफ को रातभर पानी में भिगोकर रखें फिर इसका सुबह-सुबह सेवन करें।
    यदि मासिक धर्म के दर्द से परेशान है तो सौंफ का पानी आपके बहुत काम आ सकता है। इससे मासिक धर्म के समय ऐंठन और दर्द से राहत मिलती है।
    सौंफ का पानी शरीर को डिटॉक्स करने में भी बहुत मददगार होता है। इसमें फाइबर पाया जाता है जो शरीर के विषैले पदार्थ को बाहर निकालने में मदद करता है। और शरीर को अंदर से साफ करता है।

    ज्योतिष / शौर्यपथ / पूजा साधना करते समय बहुत सी ऐसी बातें हैं जिन पर सामान्यतः हमारा ध्यान नहीं जाता है लेकिन पूजा साधना की दृष्टि से यह बातें अति महत्वपूर्ण हैं... जैसे शास्त्रों में बांस की लकड़ी जलाना मना है फिर भी लोग अगरबत्ती जलाते हैं। यह बांस की बनी होती है। अगरबत्ती जलाने से पितृदोष लगता है। शास्त्रों में पूजन विधान में कहीं भी अगरबत्ती का उल्लेख नहीं मिलता सब जगह धूप ही लिखा हुआ मिलता है। अगरबत्ती केमिकल से बनाई जाती है भला केमिकल या बांस जलने से भगवान खुश कैसे होंगे?

    1. गणेशजी को तुलसी का पत्र छोड़कर सब पत्र प्रिय हैं।
    भैरव की पूजा में तुलसी स्वीकार्य नहीं है।

    2. कुंद का पुष्प शिव को माघ महीने को छोड़कर निषेध है।

    3. बिना स्नान किये जो तुलसी पत्र जो तोड़ता है उसे देवता स्वीकार नहीं करते।

    4. रविवार को दूर्वा नहीं तोड़नी चाहिए।

    5. केतकी पुष्प शिव को नहीं चढ़ाना चाहिए।

    6. केतकी पुष्प से कार्तिक माह में विष्णु की पूजा अवश्य करें।

    7. देवताओं के सामने प्रज्जवलित दीप को बुझाना नहीं चाहिए।

    8. शालिग्राम का आवाह्न तथा विसर्जन नहीं होता।

    9. जो मूर्ति स्थापित हो उसमें आवाहन और विसर्जन नहीं होता।

    10. तुलसीपत्र को मध्यान्ह के बाद ग्रहण न करें।

    11. पूजा करते समय यदि गुरुदेव,ज्येष्ठ व्यक्ति या पूज्य व्यक्ति आ जाए तो उनको उठ कर प्रणाम कर उनकी आज्ञा से शेष कर्म को समाप्त करें।

    12. मिट्टी की मूर्ति का आवाहन और विसर्जन होता है और अंत में शास्त्रीयविधि से गंगा प्रवाह भी किया जाता है।

    13. कमल को पांच रात,बिल्वपत्र को दस रात और तुलसी को ग्यारह रात बाद शुद्ध करके पूजन के कार्य में लिया जा सकता है।

    14. पंचामृत में यदि सब वस्तु प्राप्त न हो सके तो केवल दुग्ध से स्नान कराने मात्र से पंचामृतजन्य फल जाता है।

    15. शालिग्राम पर अक्षत नहीं चढ़ता। लाल रंग मिश्रित चावल चढ़ाया जा सकता है।

    16. हाथ में धारण किये पुष्प, तांबे के पात्र में चन्दन और चर्म पात्र में गंगाजल अपवित्र हो जाते हैं।

    17. पिघला हुआ घी और पतला चन्दन नहीं चढ़ाना चाहिए।

    18. दीपक से दीपक को जलाने से प्राणी दरिद्र और रोगी होता है। दक्षिणाभिमुख दीपक को न रखें।
    देवी के बाएं और दाहिने दीपक रखें। दीपक से अगरबत्ती जलाना भी दरिद्रता का कारक होता है।

    19. द्वादशी, संक्रांति, रविवार, पक्षान्त और संध्याकाल में तुलसीपत्र न तोड़ें।

    20. प्रतिदिन की पूजा में सफलता के लिए दक्षिणा अवश्य चढ़ाएं।

    21. आसन, शयन, दान, भोजन, वस्त्र संग्रह, विवाद और विवाह के समयों पर छींक शुभ मानी गई है।


    22. जो मलिन वस्त्र पहनकर, मूषक आदि के काटे वस्त्र, केशादि बाल कर्तन युक्त और मुख दुर्गन्ध युक्त हो, जप आदि करता है उसे देवता नाश कर देते हैं।

    23. मिट्टी, गोबर को निशा में और प्रदोषकाल में गोमूत्र को ग्रहण न करें।

    24. मूर्ति स्नान में मूर्ति को अंगूठे से न रगड़ें।

    25. पीपल को नित्य नमस्कार पूर्वाह्न के पश्चात् दोपहर में ही करना चाहिए। इसके बाद न करें।

    26. जहां अपूज्यों की पूजा होती है और विद्वानों का अनादर होता है, उस स्थान पर दुर्भिक्ष, मरण और भय उत्पन्न होता है।

    27. पौष मास की शुक्ल दशमी तिथि, चैत्र की शुक्ल पंचमी और श्रावण की पूर्णिमा तिथि को लक्ष्मी प्राप्ति के लिए लक्ष्मी का पूजन करें।

    28. कृष्णपक्ष में, रिक्तिका तिथि में, श्रवणादी नक्षत्र में लक्ष्मी की पूजा न करें।

    29. अपराह्नकाल में, रात्रि में, कृष्ण पक्ष में, द्वादशी तिथि में और अष्टमी को लक्ष्मी का पूजन प्रारम्भ न करें।

    30. मंडप के नव भाग होते हैं, वे सब बराबर-बराबर के होते हैं अर्थात् मंडप सब तरफ से चतुरासन होता है, अर्थात् टेढ़ा नहीं होता। जिस कुंड की श्रृंगार द्वारा रचना नहीं होती वह यजमान का नाश करता है।

    शौर्यपथ / कई ऐसी चीजें शास्त्रों और धर्म-पुराणों में बताई हैं, जिनके उधार लेने और दान करने से भी परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है। आइए आज हम आपको बताते हैं उन चीजों के बारे में जो ना उधार लेना चाहिए और ना ही दान में देना चाहिए।
    पेन
    शास्त्रों के अनुसार, चित्रगुप्त हमारे कर्मों को यमराज के यहां लिखते हैं। चित्रगुप्त अपनी लेखनी से हमारे जीवन में आगे आने वाली परेशानियों या खुशियों का खाका तैयार कर रहे होते हैं। इसलिए जीवन में कलम को बड़ा महत्व दिया गया है। वेदों के अनुसार, अपनी कलम को किसी के साथ बांटना या फिर किसी से कलम उधार लेना तरक्की में बाधक होसकता है।
    घड़ी
    कई लोग घड़ी का आदान प्रदान भी करते हैं। लेकिन याद रहे ऐसा करना आपकी मुश्किलें बढ़ा सकता है। इसलिए कभी किसी दूसरे व्यक्ति को अपनी घड़ी नहीं पहनना चाहिए। चूंकि घड़ी को व्यक्ति के जीवन के समय से जोड़कर देखा जाता है। ऐसे में किसी और की घड़ी को अपनी कलाई पर बांधने से आपकी प्रोफेशनल लाइफ में समस्या आ सकती है। अगर आपका अच्छा समय चल रहा होगा तो वह उधार लेने वाले के पास चला जाएगा और अगर घड़ी के मालिक का बुरा वक़्त चल रहा होगा तो वह लेने वाले के पास आ जाएगा। इसलिए देन और लेन दोनों से बचें।
    कंघा
    हमेशा अपने कंघे का ही उपयोग करना चाहिए। किसी दूसरे का कंघा इस्तेमाल करना सेहत और शास्त्र दोनों के लिहाज से हितकारी नही है। ना सिर्फ कंघे बल्कि सिर से संबंधित सभी सामग्री को कभी भी दूसरे से साझा नहीं करना चाहिए। इससे आपके भाग्य पर विपरीत असर पड़ सकता है।
    अंगूठी
    अंगूठी पुरुष और महिलाएं दोनों ही पहनती हैं, अंगूठी बदलना या उधार लेना आम बात है। इसे जीवन में आने वाली विपरीत परिस्थितियों से जोड़कर देखा गया है। कभी भी किसी दूसरे की अंगूठी न पहननी चाहिए और न ही लेनी, न देनी
    चाहिए। यदि आप ऐसा करते हैं, तो आपके जीवन में न केवल मुश्किलें आएंगी बल्कि आपको आर्थिक समस्या का सामना भी करना पड़ सकता है।
    कपड़े
    किसी को भी दूसरे व्यक्ति के कपड़े नहीं लेना चाहिए। ऐसा करना ना सिर्फ शास्त्रों में मना है, बल्कि स्वास्थ्य की दृष्टि से भी यह ठीक नहीं है। शास्त्रों की मानें तो किसी दूसरे के कपड़े पहनने से आपका भाग्य आपसे नाराज हो जाता है और दुर्भाग्य आपको चारों तरफ से घेर लेता है। इसके बाद आपको कई समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है।

    धर्म संसार / शौर्यपथ / मंत्र जप एक ऐसा उपाय है, जिससे सभी समस्याएं दूर हो सकती हैं। शास्त्रों में मंत्रों को बहुत शक्तिशाली और चमत्कारी बताया गया है। सबसे ज्यादा प्रभावी मंत्रों में से एक मंत्र है गायत्री मंत्र। इसके जप से बहुत जल्दी शुभ फल प्राप्त हो सकते हैं।
    गायत्री मंत्र जप का समय :
    गायत्री मंत्र जप के लिए 3 समय बताए गए हैं, जप के समय को संध्याकाल भी कहा जाता है।
    * गायत्री मंत्र के जप का पहला समय है सुबह का। सूर्योदय से थोड़ी देर पहले मंत्र जप शुरू किया जाना चाहिए। जप सूर्योदय के बाद तक करना चाहिए।
    * मंत्र जप के लिए दूसरा समय है दोपहर का। दोपहर में भी इस मंत्र का जप किया जाता है।
    * इसके बाद तीसरा समय है शाम को सूर्यास्त से कुछ देर पहले। सूर्यास्त से पहले मंत्र जप शुरू करके सूर्यास्त के कुछ देर बाद तक जप करना चाहिए।
    यदि संध्याकाल के अतिरिक्त गायत्री मंत्र का जप करना हो तो मौन रहकर या मानसिक रूप से करना चाहिए। मंत्र जप अधिक तेज आवाज में नहीं करना चाहिए।
    पवित्र और चमत्कारी गायत्री मंत्र :
    ॐ भूर्भुव: स्व: तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि। धियो यो न: प्रचोदयात्।।
    गायत्री मंत्र का अर्थ :
    - सृष्टिकर्ता प्रकाशमान परामात्मा के तेज का हम ध्यान करते हैं, परमात्मा का वह तेज हमारी बुद्धि को सद्मार्ग की ओर चलने के लिए प्रेरित करें।
    गायत्री मंत्र जप की विधि :
    * इस मंत्र के जप करने के लिए रुद्राक्ष की माला का प्रयोग करना श्रेष्ठ होता है।
    * जप से पहले स्नान आदि कर्मों से खुद को पवित्र कर लेना चाहिए।
    * मंत्र जप की संख्या कम से कम 108 होनी चाहिए।

    * घर के मंदिर में या किसी पवित्र स्थान पर गायत्री माता का ध्यान करते हुए मंत्र का जप करना चाहिए।
    गायत्री मंत्र जप के 8 फायदे
    * उत्साह एवं सकारात्मकता बढ़ती है।
    * धर्म और सेवा कार्यों में मन लगता है।
    * पूर्वाभास होने लगता है।
    * आशीर्वाद देने की शक्ति बढ़ती है।
    * स्वप्न सिद्धि प्राप्त होती है।
    * क्रोध शांत होता है।
    * त्वचा में चमक आती है।
    * बुराइयों से मन दूर होता है।

    सेहत /शौर्यपथ / बढ़ते वजन से छुटकारा पाने के लिए अगर आप योगा, एक्सरसाइज, वॉक और जॉगिंग जैसे सभी विकल्प अपनाकर थक चुके हैं तो अब एक्यूप्रेशर की मदद लेकर देखिए। मोटापा घटाने और बढ़ते वजन को कम करने में एक्यूप्रेशर बेहद कमाल की भूमिका निभाता है। दरअसल, व्यक्ति के शरीर में कुछ खास बिंदु होते हैं जिन्हें दबाने से बड़ी आसानी से कई किलो वजन कम किया जा सकता है। आइए जानते हैं कौन से हैं वो खास बिंदु।
    नाभि के नीचे बिंदु-
    नाभि के 1 इंच नीचे एक बिंदु होता है। इस बिंदु को दो अंगुलियों से 2 मिनट के लिए दबाएं या मालिश करें। ऐसा करने से न केवल गैस दूर होती है बल्कि पाचन शक्ति बेहतर होती है।
    कोहनी के पास स्थित बिंदु-
    कोहनी के पास स्थित बिंदु को अगर दबाया जाए तो न सिर्फ शरीर का तापमान नियंत्रित होता है बल्कि यह मोटापे को कम करने में भी मदद करता है। रोजाना 1 मिनट तक नियमित रूप से इस बिंदु को दबाने से शरीर की गर्मी और जरूरत से ज्यादा पानी निकालने में भी मदद मिलती है।
    नाक और होंठ के बीच में बना बिंदु-
    नाक और होंठ के बीच में स्थित बिंदु को दबाने से ना सिर्फ तनाव दूर होता है बल्कि इससे मोटापे की समस्या भी दूर होती है। इस बिंदु को दबाने से तनाव संबंधित हॉर्मोन भी संतुलित रहते हैं।
    कान के बीच में स्थित बिंदु-
    कान के बीच में स्थित बिंदु को एक्यूप्रेशर में केंद्र बिंदु भी कहा जाता है। इस बिंदु को अपनी अंगुली की मदद से 1 या 2 मिनट तक दबाने से आप अपने बढ़ते वजन को कम कर सकते हैं। इस बिंदु पर जब दबाव पड़ता है तो व्यक्ति की भूख भी नियंत्रित होती है।

    सेहत / शौर्यपथ / लहसुन में मौजूद गुणकारी तत्व हमें कई बीमारियों से बचा सकते हैं। इसे इस्‍तेमाल करने का सबसे आसान तरीका है दाल-सब्‍जी या हरे साग में लहसुन का छौंक लगाना।
    खाने में स्वाद को बढ़ाने के लिए लहसुन का प्रयोग तो काफी समय से किया जा रहा है। लेकिन क्या आपको पता है कि लहसुन में ऐसे गुणकारी तत्व होते हैं, जो आपको कई बीमारियों से बचा सकते हैं। यूं तो हर मसाले में अपने आप में ही कई आयुर्वेदिक औषधीय खूबियां होती हैं, लेकिन लहसुन में ऐसे एंटीऑक्सीडेंट गुण होते हैं जो आपको एक नहीं बल्कि कई बीमारियों से बचा सकते हैं।
    पोषण का खजाना है लहसुन
    लहसुन कम कैलोरी और न्यूट्रिएंट्स से भरपूर एक बेहद ही अच्छा खाद्य पदार्थ है। यूनाइटेड स्टेट्स डिपार्टमेंट ऑफ एग्रीकल्चर के डाटा के अनुसार लहसुन की एक गांठ में रोज के खाने लायक लगभग 2% मैग्नीज, 2% विटामिन बी-6, 1% विटामिन सी, 1% सेलेनियम और 0.06 ग्राम फाइबर के साथ-साथ कैल्शियम, कॉपर, पोटेशियम, फॉस्फोरस, आयरन और विटामिन बी-1 जैसे सेहतमंद तत्व मौजूद होते हैं।
    कई तरीकों से किया जा सकता है लहसुन का सेवन
    आयुर्वेद में लहसुन को कच्‍चा खाने की सलाह दी गई है। पर इसका तीखा स्‍वाद और गंध आपके लिए मुश्किल हो सकता है। इसलिए दादी-नानी ने जो सबसे आसान उपाय सुझाया वह है दाल, सब्‍जी या हरे साग में लहसुन का छौंक लगाना। इससे न सिर्फ खाने का स्‍वाद बढ़ जाता है, बल्कि उसके पोषक तत्‍वों में भी बढ़ोतरी हो जाती है।
    असल में लहसुन को चाहें कच्चा खाया जाए, उबाल कर, भूनकर खाया जाए, ये हर तरह से लाजवाब होता है। खास बात यह कि खाली पेट लहसुन का सेवन भी आपके लिए लाभदायक हो सकता है।
    इसके फायदों को देखते हुए डॉक्टर भी किसी न किसी रूप में हमें लहसुन को अपनी डाइट में शामिल करने की सलाह देते हैं। चलिए हम आपको इस गुणकारी लहसुन के फायदे बताते हैं-
    अब जानिए क्‍यों जरूरी है सर्दियों के मौसम में जरूरी है सब्जियों में लहसुन का छौंक
    1. कोल्ड से दे सकता है आराम
    लहसुन हमें सर्दियों में होने वाले कोल्ड और फ्लू से आराम दिलाता है। दरअसल लहसुन में मौजूद एंटीऑक्सीडेंट्स हमारे इम्यून सिस्टम को बूस्ट करने में बहुत मदद करते हैं। एक स्टडी के मुताबिक लहसुन कोल्ड के लक्षणों को 70% तक कम कर सकता है। यहां तक कि यह हमें कई और बीमारियों से भी दूर रहने में हमारी मदद करता है।
    2. हार्ट अटैक के खतरे को करता है कम
    कोलेस्ट्रॉल लेवल और ब्लड प्रेशर के बढ़ने से हार्ट अटैक की संभावना बढ़ जाती है। नेशनल सेंटर फॉर बायोटेक्नोलॉजी इंफॉर्मेशन में प्रकाशित एक स्टडी के अनुसार लहसुन हमारे ब्लड प्रेशर को भी नियंत्रित रखता है। इसी वजह से लहसुन खाने वाले लोगों को हार्ट अटैक आने के कम चांस होते हैं।
    3. डाइजेशन को सुधारता है
    सर्दियों में डाइजेस्टिव प्रॉब्लम्स भी बढ़ जाती हैं। इसकी वजह है अधिक आहार और कम सक्रियता। पर लहसुन पाचन संबंधी समस्‍याओं से आपको राहत दिला सकता है। नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ हेल्थ में प्रकाशित एक जर्नल के मुताबिक लहसुन खाने से हमारे इंटेस्टाइन में मौजूद बैड बैक्टीरिया साफ हो जाते हैं। साथ ही इसकी एंटी-इन्फ्लेमेटरी प्रॉपर्टीज हमारे इंटेस्टाइन और पेट में इन्फ्लेमेशन को भी कम करती हैं।
    4. त्वचा के लिए भी है लाभदायक
    लहसुन के अंदर एंटीऑक्सीडेंट, एंटीफंगल और एंटीबैक्टीरियल प्रॉपर्टीज मौजूद होती हैं, जो हमारी त्वचा के लिए बेहद फायदेमंद होती हैं। यह एक्ने और एक्ने मार्क्स जैसी समस्या से भी हमें बचाता है।
    5. शरीर को रखता है गर्म
    लहसुन सर्दियों में और भी ज्यादा फायदेमंद होता है। आयुर्वेद के मुताबिक इसकी तासीर गर्म होने की वजह से यह सर्दियों में हमारे शरीर को गर्म रहने में मदद करता है। दाल और सब्जियों में लहसुन मिलाकर या फिर सुबह-सुबह एक कली कच्चे लहसुन की खाने से सर्दियों में हमारा शरीर गर्म महसूस करता है और हम सर्दी-जुकाम से भी बचे रहते हैं।

    खाना खजाना /शौर्यपथ /अक्सर उबली हुई दाल का स्वाद बढ़ाने के लिए लोग उसमें हींग और जीरे का तड़का लगाते हैं। उबली हुई दाल में लगाया गया यह साधारण सा तड़का उसका स्वाद और सुगंध कई गुना बढ़ा देता है। लेकिन आज हम आपको बताने जा रहे हैं ढाबा -स्टाइल दाल तड़का। यह तड़का न सिर्फ दाल का स्वाद बढ़ाता है बल्कि इसका तरीका भी बेहद आसान है। तो देर किस बात की, आइए जानते हैं कैसे बनाएं स्वादिष्ट दाल तड़का।
    ढाबा -स्टाइल तड़का-
    इस तरह के तड़के में जीरा, हींग, धनिया पाउडर, लाल मिर्च पाउडर के साथ प्याज, टमाटर, अदरक, लहसुन और हरी मिर्च को पहले पकाया जाता है। इसके बाद इसमें उबली हुई दाल को मिला दिया जाता है। अब दाल में ऊपर से मक्खन या घी के साथ कुछ ताजा कटा हुआ धनिया पत्तों को डालने से दाल का स्वाद बढ़ जाता है।
    सरल कलोंजी तड़का-
    सरल कलोंजी तड़का में कलोंजी, लाल मिर्च और टमाटर को सरसों के तेल में पकाकर उबली हुई दाल में डाला जाता है।

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