September 09, 2026
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    शौर्यपथ / दुनिया के सबसे बड़े आध्यात्मिक माघ मेला का “मकर संक्रांति” स्नान पर्व पर श्रद्धालु कोरोना की गाइडलाइन के बीच गुरूवार को स्नान करेंगे। आधी अधूरी तैयारियों के बीच पहला स्नान पर्व मकर संक्रांति 14 जनवरी को होगा। अभी तक कहीं घाट नहीं बने तो कहीं टेंट ही नहीं लगे। जो टेंट लगे भी उसमें सारी सुविधाएं नहीं मिली हैं। अभी कई संतों को जमीन का आवंटन भी बाकी है। प्रयाग के तीर्थ पुरोहितों को जमीन का आवंटन भी नहीं हुआ है। ऐसे में माघ मेला के दौरान श्रद्धालुओं को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।
    कोरोना संक्रमण को देखते हुए मेला क्षेत्र के अन्दर सेनेटाइजशन की व्यवस्था अभी नजर नहीं आ रही है। मेला क्षेत्र में श्रद्धालु, साधु-संत बिना मास्क लगाए ही इधर-उधर भ्रमण करते देखे जा सकते हैं। मेला क्षेत्र में सामाजिक दूरी का भी घ्यान नहीं रहा जा रहा है। हालांकि मेला प्रशासन ने कल्पवास करने आने वाले श्रद्धालुओं से साथ में कोरोना टेस्ट निगेटिव रिपोर्ट साथ लाने का निर्देश पहले ही जारी कर दिया था।
    मेला क्षेत्र का परेड ग्राउंड अभी पूरी तरह से खाली है। यहां पर दुकानें भी नहीं लगी हैं। दुकानों के लिए जमीन का आवंटन किया जाएगा। ऐसे में स्नान पर्व के दिन दुकाने सजना मुश्किल है। झूला और मीना बाजार भी अब तक नहीं लगा है। स्नान घाट के रूप में संगम नोज तो तैयार हो गया। हालांकि अन्य क्षेत्रों में जो घाट बनाए जा रहे हैं। गंगा नदी पर पांच पांटून पुल श्रद्धालुओं के आवागमन के लिए बना दिए गए,लेकिन सेक्टर चार और पांच में सड़कें पूरी तरह दुरुस्त नहीं हुई हैं।
    जिलाधिकारी भानुचंद गोस्वामी ने मेला से संबधित अधिकारियों को स्नान पर्व से पहले आधे अधूरे काम को अतिरिक्त श्रमिक लगगाकर पूरा करने का निदेर्श दिया था। मेले में सभी काम को पूरा करने के लिए पांच जनवरी तक का समय दिया गया था ,जिसे बाद में बढ़ाकर 1० जनवरी तक किसी भी हाल में करने के निदेर्श दिये थे। बावजूद इसके अभी मेले में करीब 4० फीसदी काम बाकी पड़ा है।

    धर्म संसार / शौर्यपथ / मकर संक्रांति का पर्व हर साल 14 जनवरी को मनाया जाता है। मकर संक्रांति को लेकर कई तरह की पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं। मकर संक्रांति की एक पौराणिक कथा के अनुसार, आज के दिन सूर्यदेव धनु राशि से निकल कर मकर राशि में प्रवेश करते हैं। मकर राशि का स्वामी शनि देव को माना जाता है। कहते हैं कि मकर राशि में प्रवेश कर सूर्य देव अपने पुत्र से मिलने जाते हैं।
    पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार राजा सगर ने अश्वमेघ यज्ञ का अनुष्ठान किया और अपने अश्व को विश्व-विजय के लिये छोड़ दिया। इंद्र देव ने उस अश्व को छल से कपिल मुनि के आश्रम में बांध दिया। जब कपिल मुनि के आश्रम में राजासगर के साठ हजार पुत्र युद्ध के लिये पहुंचे तो कपिल मुनि ने श्राप देकर उन सबको भस्म कर दिया। राजकुमार अंशुमान, राजा सगर के पोते ने कपिल मुनि के आश्रम में जाकर विनती की और अपने बंधुओं के उद्धार का रास्ता पूछा। तब कपिल मुनि ने बाताया कि इनके उद्धार के लिये गंगा जी को धरती पर लाना होगा।
    राजकुमार अंशुमान ने तय किया कि उनके वंश का कोई भी राजा चैन से नहीं रहेगा जब तक गंगा मां धरती पर नहीं आ जाती हैं। गंगा जी को धरती पर लाने के लिए राजकुमार अंशुमान ने कठिन तप किया और उसी में अपनी जान दे दी। भागीरथ राजा दिलीप के पुत्र और अंशुमान के पौत्र थे।
    इसके बाद राजा भागीरथ ने घोर तपस्या करके गंगा जी को प्रसन्न किया और उन्हें धरती पर लाने के लिये मना लिया। इसके बाद भागीरथ ने भगवान शिव की तपस्या की जिससे महादेव गंगा जी को अपने जटा में रख कर, वहां से धीरे-धीरे गंगा के जल को धरती पर प्रवाहित कर सकें। भगवान शिव ने भागीरथ के कठिन तपस्या प्रसन्न होकर उन्हें इच्छित वर दिया। इसके बाद गंगा जी महादेव के जटा में समाहित होकर धरती के लिये प्रवाहित हुई। भागीरथ ने गंगा जी को रास्ता दिखाते हुए कपिल मुनि के आश्रम गये, जहां पर उनके पूर्वजों की राख उद्धार के लिये प्रतीक्षा कर रही थी।
    कहते हैं कि गंगा जी के पावन जल से भागीरथ के पूर्वजों का उद्धार हुआ। उसके बाद गंगा जी सागर में मिल गया। कहा जाता है कि जिस दिन गंगा जी कपिल मुनि के आश्रम पहुंची उस दिन मकर संक्रांति का दिन था। कहते हैं कि इस कारण ही इस दिन श्रद्धालु गंगा स्नान करते हैं।

    शौर्यपथ /माना जाता है कि व्यक्ति की पहचान में उसके कपड़े और जूते में महत्वपूर्ण कारक हैं, लेकिन कोई कितने भी अच्छे कपड़े पहन ले, अगर जूते ठीक नहीं है तो व्यक्ति को महत्व नहीं दिया जाता। ज्योतिष शास्त्र में मानव जीवन की धुरी हर वस्तु पर किसी ने किसी ग्रह को संबध रखती है। काल पुरुष सिद्धांत के अनुसार व्यक्ति की कुंडली का आठवां भाव पैरों के तलवों से संबंधित है और पैरों के जूते भी आठवें भाव को महत्व देते हैं। कुछ जूते दुर्भाग्य का सूचक होते हैं। इनको पहनने से व्यक्ति के जीवन में आर्थिक और कार्यक्षेत्र से संबंधित समस्याएं उत्पन्न हो जाती हैं। ऐसे जूतों के दोष के कारण कई काम बिगड़ जाते हैं। जानिए ज्योतिष की दृष्टि से जूतों का गणित।

    -कभी भी उपहार में मिले हुए जूते नहीं पहनने चाहिए। इसे शनिदेव कार्य मे बाधाएं डालते हैं। जूते ना तो किसी से उपहार में लेने चाहिए और ना ही देने।
    -चुराए हुए जूते कभी भी ना पहने। कई बार मंदिर और कीर्तन आदि स्थानों से जूते अथवा चप्पल की चोरी जाती हैं। चोरी करने वाले ध्यान रखें कि चोरी के जूते चप्पल पहनने से वह अपने स्वास्थ्य और धन का विनाश कर रहा है।
    -उधड़े हुए अथवा फटे जूते पहनकर नौकरी ढूंढने अथवा महत्वपूर्ण कार्य के लिए न जाए, असफलता मिलेगी।
    -ऑफिस या कार्यक्षेत्र में भूरे रंग के जूते पहनकर जाने से व्यक्ति के कार्यों में अक्सर बाधाएं उत्पन्न हो सकती हैं।
    -चिकित्सा और लोहे से संबंधित व्यक्तियों को कभी भी सफेद जूते नहीं पहननी चाहिए।
    -जल से संबंधित और आयुर्वेदिक कार्यों से जुड़े लोगों को नीले रंग के जूते नहीं पहनने चाहिए।
    - कॉफी रंग के जूते बैंक कर्मचारियों और अध्ययन क्षेत्र से जुड़े हुए लोगों को नहीं पहनी चाहिए। इससे आपकी कार्यशैली में दिक्कतें बनी रहती हैं। आपके कार्य को संदेह की दृष्टि से देखा जाता है।
    -अपने जूते अथवा चप्पल की पॉलिस और चमक सदैव बनी रहनी चाहिए। यह आपके व्यक्तित्व का प्रभाव दूसरे लोगों पर छोड़ती है।
    - ज्योतिष और वास्तु में जूते-चप्पल (मृत चर्म) शनि राहु के कारक हैं। जब भी हम अपने बेडरूम में जूते रखते हैं तो पति-पत्नी के बीच का लगाव एवं सम्मान धीरे-धीरे कम होता जाता है।
    - जो व्यक्ति बाहर से आकर अपने चप्पल, जूते, मोजे इधर-उधर फेंक देते हैं, उन्हें शत्रु बहुत परेशान करते हैं। कार्य में बाधा उत्पन्न होती हैं और उनकी कार्य योजना ठीक प्रकार से पूर्ण नहीं हो पाती।
    - जूते पहनकर भोजन करने से शरीर में धीरे-धीरे नकारात्मकता आ जाती है और शरीर की पवित्रता भंग हो जाती है।
    -घर में जूतों के लिए अलग स्थान रखें। कभी भी मंदिर अथवा रसोई में जूते चप्पल पहनकर न जाएं।
    -रसोई में महिलाएं अक्सर काम करती हैं। रसोई के लिए अलग से प्लास्टिक चप्पल या कपड़े के जूते प्रयोग कर सकती हैं। ये जूते-चप्पल केवल रसोई में ही प्रयोग करें।
    - भगवान को भोग लगाते समय अथवा खाना परोसने के समय जूते निकाल कर उचित स्थान पर रखें।
    -वास्तु के अनुसार जूते-चप्पल निकालने के लिए शुभ स्थान दक्षिण, दक्षिण-पश्चिम ,उत्तर-पश्चिम अथवा पश्चिम दिशा ठीक मानी गई है। इन दिशा में उचित स्थान पर शू रैक बनाकर जूतों को उसमें ढक कर रखें। मुख्य द्वार पर या मुख्य द्वार के सामने शू रैक बनाना अच्छा नहीं होता है। जीने के कोने में बने शू रैकघर की उन्नति के लिए शुभ नहीं होते। हमें ऐसे स्थानों पर जूते-चप्पल रखने से बचना चाहिए।

    सेहत / शौर्यपथ /कान में लगातार सीटी बजने की शिकायत को हल्के में न लें जनाब। यह शरीर में विटामिन-बी12 की कमी का संकेत हो सकती है। यूएस नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन में छपे एक हालिया अध्ययन में यह चेतावनी दी गई है।
    शोधकर्ताओं के मुताबिक विटामिन-बी12 पानी में घुलनशील एक महत्वपूर्ण विटामिन है, जिसे ‘कोबालामिन’ के नाम से भी जाना जाता है। लाल रक्त कोशिकाओं के उत्पादन के अलावा डीएनए के निर्माण में इसकी अहम भूमिका होती है।
    मस्तिष्क के सुचारू रूप से काम करने के लिए भी इसकी जरूरत पड़ती है। नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ के अध्ययन में जिन 42.5 फीसदी प्रतिभागियों में ‘टिनिटस’ यानी कान में सीटी बजने या झनझनाहट की समस्या देखी गई, उनमें से सभी में विटामिन-बी12 की कमी भी नजर आई।

    शौर्यपथ / मकर संक्राति को मनाने की सभी की अपनी परम्पराएं है। किसी के लिए तिल-गुड़ के बिना यह त्योहार अधूरा है, तो कहीं दाल-चावल और तिल दान किए जाते हैं। वहीं, इस दिन खिचड़ी बनानी शुभ मानी जाती है। इसके अलावा खिचड़ी दान भी करने की परम्परा है। ऐसे में क्या आप जानते हैं कि खिचड़ी क्यों मानी जाती है शुभ और सेहत से जुड़े फायदे-
    खिचड़ी खाने का पौराणिक महत्व
    मकर संक्रांति के दिन खिचड़ी खाने से सूर्यदेव प्रसन्न होते है। इस दिन खरीफ की फसलों चावल, चना, मूंगफली, गुड़, तिल उड़द इन चीजों से बनी सामग्री से भगवान सूर्य और शनि देव की पूजा की जाती है। मकर संक्रांति के दिन चावल और उड़द की दाल से खिचड़ी बनाकर भगवान सूर्य को भोग लगाया जाता है और इसे प्रसाद के रूप में लोग एक दूसरे के घर भेजते हैं।
    -पाचन क्षमता कमजोर होने पर भी यह आहार आसानी से पच जाता है और पाचन क्रिया को दुरुस्त करता है, इसलिए बीमारी में मरीजों को इसे खिलाया जाता है, क्यों उस वक्त पाचन शक्ति कमजोर होती है।
    -दाल, चावल, सब्जियों और मसालों से तैयार की गई खिचड़ी काफी स्वादिष्ट और पोषण से भरपूर होती है, जो शरीर को ऊर्जा और पोषण देती है। इसके माध्यम से एक साथ सभी पोषक तत्व प्राप्त किए जा सकते हैं।
    -अक्सर कब्ज या अपच की स्थिति में खिचड़ी खाना फायदेमंद होता है और आरामदायक भी। इसे खाने के बाद पेट में अतिरिक्त भारीपन नहीं लगता और जल्दी पाचन भी हो जाता है।
    -घी, दही, नींबू या अचार के साथ अलग-अलग फायदे भी देती है, जैसे घी डालकर खाने से शक्ति भी मिलती है और प्राकृतिक चिकनाई भी, दही के साथ यह कई गुना फायदेमंद होती है और नींबू से विटामिन सी के साथ अन्य फायदे देती है।
    -कफ, फीवर, कमजोरी होने पर खिचड़ी खाने से शरीर को जरूरी पोषक तत्वों की प्राप्ति होती है और बॉडी जल्दी हील कर पाती है। खिचड़ी बॉडी को डिटॉक्स करने का काम भी करती है।
    -अगर किसी को लूज मोशन की समस्या हो रही है तो ऐसे में छिलकेवाली मूंग दाल की खिचड़ी खानी चाहिए। यह खिचड़ी सूखी नहीं बल्कि कुछ अधिक लिक्विड वाली बनानी चाहिए। इससे लूज मोशन और पेट दर्द में तुरंत राहत मिलती है। साथ ही यह शरीर में कमजोरी भी नहीं आने देती है।
    -आपका वजन तेजी से बढ़ रहा है या फिर पेट के आसपास चर्बी जमा हो रही है, तो दिन में एक बार खिचड़ी जरूर खाएं। इससे आपका वजन कंट्रोल रहने के साथ पेट की चर्बी भी घट जाएगी।

    सेहत /शौर्यपथ /सर्दियों में कुछ चीजों का सेवन करना किसी जड़ी-बूटी के सेवन करने से कम नहीं है। हम आपको सर्दियों में गुड़ खाने के फायदे और इससे बनी चीजें खाने के फायदे बता चुके हैं। तिल हाई ब्लड प्रेशर को कंट्रोल करने में मददगार है. कई रिसर्च में यह बात सामने आई है कि तिल में पाया जाने वाला तेल हाई ब्लड प्रेशर को कम करता है और दिल पर ज्यादा भार नहीं पड़ने देता यानी दिल की बीमारी दूर करने में भी तिल मददगार है-

     तिल में मौजूद पोषक तत्व
    तिल में सेसमीन नाम का एन्टीऑक्सिडेंट पाया जाता है जो कैंसर कोशिकाओं को बढ़ने से रोकता है। अपनी इस खूबी की वजह से ही यह लंग कैंसर, पेट के कैंसर, ल्यूकेमिया, प्रोस्टेट कैंसर, ब्रेस्ट कैंसर होने की आशंका को कम करता है। इसके अलावा भी तिल के कई फायदे हैं।

     तिल खाने के फायदे-
    -शरीर में खून की मात्रा को सही बनाए रखने में भी मददगार है तिल।
    -बाल और त्वचा को मजबूत और सेहतमंद रखने के लिए रोजाना तिल का सेवन बहुत ही लाभकारी माना जाता है।
    -तिल में मौजूद प्रोटीन पूरे शरीर को भरपूर ताकत और एनर्जी से भर देता है. इससे मेटाबोलिज्म भी अच्छी तरह काम करता है।
    -तिल में कुछ ऐसे तत्व और विटामिन पाए जाते हैं जो तनाव और डिप्रेशन को कम करने में सहायक होते हैं।
    -तिल में कई तरह के लवण जैसे कैल्शिेयम, आयरन, मैग्नीशियम, जिंक और सेलेनियम होते हैं जो हृदय की मांसपेशि‍यों को सक्रिय रूप से काम करने में मदद करते हैं।
    -तिल में डाइट्री प्रोटीन और एमिनो एसिड होता है जो बच्चों की हड्डियों के विकास को बढ़ावा देता है। इसके अलावा यह मांस-पेशियों के लिए भी बहुत फायदेमंद है।
    -तिल का तेल त्वचा के लिए बहुत ही फायदेमंद होता है। इसकी मदद से त्वचा को जरूरी पोषण मिलता है और इसमें नमी बरकरार रहती है।

     कितनी मात्रा में खाना चाहिए तिल
    तिल को ज्यादा नहीं खाना चाहिए क्योंकि यह गर्म होते हैं इसलिए आपको तिल का सेवन करने में सावधानी रखनी चाहिए। आपको रोजाना 50-70 ग्राम तक तिल का सेवन नहीं करना चाहिए। खासतौर पर महिलाओं और छोटे बच्चों को इससे भी कम मात्रा में तिल का सेवन करना चाहिए।

    व्रत त्यौहार /शौर्यपथ / नाचने-गाने और खुशियां बांटने का त्योहार है लोहड़ी. यह त्योहार केवल हरियाणा, हिमाचल, दिल्ली व जम्मू -कश्मीरर तक ही सीमित नहीं रह गया है, बल्कि देश के कई और राज्यों में भी इसे मनाया जाता है वहीं, पंजाब में इस त्योकहार को लेकर अलग ही उत्सारह देखने को मिलता है। पंजाब में इस पर्व को नई फसलों से जोड़कर भी देखा जाता है। इस त्योयहार के समय गेहूं व सरसों की फसल अंतिम चरण में होती है। इस बार लोहड़ी 13 जनवरी को मनाई जाएगी। ऐसे में अगर आप अपने दोस्तों को लोहड़ी के बधाई संदेश भेजना चाहते हैं, तो नीचे लिखे मैसेज को भेज सकते हैं-
    दस्तक दी, किसी ने कहा सपने लाया हूँ,
    खुश रहो आप हमेशा, इतनी दुआ लाया हूँ
    नाम है मेरा संदेश,
    आपको हैप्पी लोहड़ी विश करने आया हूँ।
    मूंगफली दी खुशबू ते गुड़ दी मिठास,
    मक्की दी रोटी ते सरसों दा साग,
    दिल दी खुंशी ते आपनों दा प्यार,
    मुबारक होवे तुहानूं लोहड़ी दा ये त्योहार
    फिर आ गई भांगड़े दी वारी,
    लोहड़ी मनौन दी करो तियारी,
    आग दे कोल सारे आओ,
    सुंदरिए मुंदरिए जोर नाल गाओ।
    इससे पहले कि लोहड़ी की शाम हो जाए,
    मेरा संदेश औरों की तरह आम हो जाए,
    और सभी मोबाइल नेटवर्क जाम हो जाएं,
    आपको लोहड़ी की शुभकामनाएं।
    मीठे गुड़ में मिल गया तिल,
    उड़ी पतंग और खिल गया दिल,
    आपके जीवन में हर दिन आए शुख-शांति।
    wish you a very Happy Lohri
    गन्ने दे रस तों चीनी दी बोरी,
    फेर बनी उसतों मीठी-मीठी रेवड़ी,
    रल मिल सारे खाइये तिल दे नाल,
    ते मनाइये अस्सी खुशियां भरी लोहड़ी
    पंजाबी भंगड़ा ते मक्खन-मलाई,
    पंजाबी तड़का ते दाल-फ्राई,
    तुहानू लोहड़ी दी लख-लख बधाई।

    खाना खजाना /शौर्यपथ /सूर्य देव के मकर राशि में प्रवेश करने की घटना सूर्य की मकर संक्रांति कहलाती है। इस साल मकर संक्रांति का त्योहार 14 जनवरी ​दिन गुरुवार को मनाया जाएगा। मकर संक्रांति के दिन उड़द दाल खिचड़ी जरूर बनाई जाती है। उड़द दाल की खिचड़ी न सिर्फ खाने में स्वादिष्ट होती है बल्कि सेहत से भी भरपूर होती है। आइए जानते हैं कैसे बनाई जाती है यह टेस्टी खिचड़ी।

    उड़द दाल की खिचड़ी बनाने के लिए आवश्यक सामग्री-
    -चावल - 200 ग्राम
    -उड़द की छिलके वाली दाल - 150 ग्राम
    -घी - 2 बड़े चम्मच
    -नमक - स्वादानुसार
    -हरा धनिया - 1 बड़ा चम्मच
    -हींग - 1 चुटकी
    -जीरा - 1 छोटा चम्मच
    -हरी मिर्च - 2 (बारीक कटी हुई)
    -अदरक - 1 इंच टुकड़ा (बारीक कटा हुआ)
    -हल्दी पाउडर - 1/2 छोटा चम्मच
    -हरी मटर के दाने - 1 छोटा कटोरी
    उड़द दाल की खिचड़ी बनाने का तरीका-
    उड़द दाल की खिचड़ी बनाने के लिए सबसे पहले चावल को अच्‍छी तरह धोकर थोड़ी देर भिगोकर रख दें। इसके बाद कुकर में घी गर्म करके उसमें हींग और जीरा डालें। जब जीरा अच्छी तरह से भुन जाए तो उसमें हरी मिर्च, अदरक, हल्दी पाउडर और मटर के दाने डाल कर 2 मिनट तक भूनें। इसके बाद इसमें चावल डालकर 2-3 मिनट तक करछी से चलाकर खिचड़ी को भूनें।
    जब चावल मसालों के साथ अच्छी तरह से भुन जाए तो इसमें दाल और चावल की मात्रा का चार गुना पानी डालकर कुकर बंद कर दें। अब एक सीटी आने के बाद 5 मिनट तक धीमी आंच पर खिचड़ी को पकने दें। इसके बाद गैस बंद करके कुकर का प्रेशर खत्‍म होने पर ही कुकर का ढक्कन खोलें। आपकी मकर संक्रांति की टेस्टी खिचड़ी सर्व करने के लिए तैयार है।

    लाइफस्टाइल /शौर्यपथ/ आंखों के किनारे काले धब्बे (डार्क सर्कल) भला किसे अच्छे लगते हैं। कोई इनसे निजात पाने के लिए महंगे कॉस्मेटिक उत्पादों का सहारा लेता है तो कोई आलू के छिल्के रगड़ने जैसे घरेलू उपाय आजमाता है। हालांकि, ब्राजील में महिलाएं ‘डार्क सर्कल’ छिपाने के लिए सारी हदें पार कर दे रही हैं। वे आंखों के आसपास त्वचा की रंगत वाला टैटू गुदवा रही हैं, ताकि किसी को काले घेरों की भनक न लग पाए।

    ‘डार्क सर्कल’ पर पर्दा डालने वाली टैटू तकनीक ब्राजील के मशहूर टैटू कलाकार रोदोल्फो तोरिज के दिमाग की उपज है। वह टैटू गन की मदद से आंखों के किनारे ग्राहक की त्वचा से हूबहू मेल खाते रंग वाली खास स्याही का छिड़काव करते हैं। इससे ‘डार्क सर्कल’ तो ढक ही जाते हैं, साथ ही दाग-धब्बे और झुर्रियों के निशान भी सामने वाले को नजर नहीं आते।

    रोदोल्फो के मुताबिक टैटू में इस्तेमाल स्याही त्वचा की बाहरी परत के नीचे जम जाती है। यह बाहरी परत और काले घेरों का सबब बनने वाले रसायनों के बीच एक दीवार की भूमिका निभाती है। इससे इन रसायनों का असर त्वचा पर नहीं उभर पाता और ‘डार्क सर्कल’ दूर रहते हैं।

    रोदोल्फो ने दावा किया कि टैटू में इस्तेमाल स्याही पूरी तरह से सुरक्षित है। इससे लैस टैटू गुदवाने के लिए ग्राहक का महज एक बार पार्लर आना काफी है। हालांकि, उसे कुछ दिनों तक मेकअप से दूरी बनाए रखनी पड़ सकती है।

    ‘स्ट्रेच मार्क’ ढंकने वाली तकनीक भी पेश की
    -रोदोल्फो इससे पहले ‘स्ट्रेच मार्क’ ढंकने वाली तकनीक ईजाद कर सुर्खियां बंटोर चुके हैं। दरअसल, पुरुषों को चर्बी के घटने-बढ़ने और महिलाओं को शिशु को जन्म देने के बाद अक्सर ‘स्ट्रेच मार्क’ उभरने की शिकायत सताती है। रोदोल्फो ‘एयरगन’ की मदद से ‘स्ट्रेच मार्क’ की धारियों को ग्राहक की त्वचा की रंगत वाली स्याही से भर देते हैं। इससे ‘स्ट्रेच मार्क’ त्वचा के रंग से इस कदर घुल जाते हैं कि उनकी भनक तक नहीं लगती।

    सोशल मीडिया पर छाने तो डिजिटल मेकअप का सहारा
    -कोरोनाकाल में लोग न सिर्फ अपनों की झलक पाने, बल्कि ऑफिस की मीटिंग निपटाने के लिए भी वीडियो कॉल का सहारा ले रहे हैं। हालांकि, घर में लोगों का हर वक्त सजे-धजे रहने का मन नहीं करता। काम की व्यस्ता बढ़ने के कारण उनके पास मेकअप के लिए समय भी नहीं होता। ऐसे में एक अमेरिकी कंपनी ने ‘वर्चुअल मेकअप’ ऐप पेश किया है, जो चेहरे पर जंचने वाला मेकअप धारण कर वीडियो कॉल पर खुद को आकर्षक रूप में दर्शाने में मदद करेगा।

    -ब्राजील के मशहूर टैटू आर्टिस्ट रोदोल्फो तोरिज ने यह नई तकनीक ईजाद की है।

    जानें क्या है खास-
    - इस तकनीक में रोदोल्फो टैटू गन से त्वचा की रंगत वाली खास स्याही का छिड़काव करते हैं ।
    -आंखों के नीचे के काले घेरे ढक जाते हैं, झुर्रियां और दाग-धब्बे भी छिप जाते हैं।

    क्यों पड़ते हैं काले घेरे-
    -‘डार्क सर्कल’ सबसे आम समस्याओं में से एक है, ढलती उम्र, नींद की कमी, थकान और लगातार कई घंटों तक स्क्रीन का इस्तेमाल इसकी मुख्य वजह माना जाता है।
    हालांकि, कई मामलों में यह विटामिन ए, सी, के, ई और आयरन सहित विभिन्न पोषक तत्वों की कमी की तरफ भी इशारा करता है, सिगरेट-शराब की लत भी जिम्मेदार है।

    धर्म संसार /शौर्यपथ / साल 2021 में मकर संक्रांति 14 जनवरी को मनाई जा रही है। इस दिन पर्व का का पुण्य काल 8 घंटे का रहेगा।
    यह सुबह 8 बजकर 30 मिनट से लेकर शाम 5 बजकर 46 मिनट तक होगा। शास्त्रों के अनुसार इस दौरान स्नान-दान से कई गुना फल प्राप्त होता है। मकर संक्रांति पर मकर राशि में कई महत्वपूर्ण ग्रह एक साथ गोचर करेंगे। इस दिन सूर्य, शनि, गुरु, बुध और चंद्रमा मकर राशि में रहेंगे। जो एक शुभ योग का निर्माण करते हैं। इसीलिए इस दिन किया गया दान और स्नान जीवन में बहुत ही पुण्य फल प्रदान करता है और सुख समृद्धि लाता है।
    इस वर्ष मकर संक्रांति पर सूर्य, शनि, गुरु, बुध और चंद्रमा मकर राशि में होंगे। इस स्थिति को मकर संक्रांति के लिए बेहद शुभ फलदायी माना गया है।
    इस दिन सूर्यदेव के साथ इन सब ग्रहों का पूजन करें। सूर्यदेव के साथ नवग्रहों का विधि-विधान से पूजा करने पर व्यक्ति को मनचाहा वरदान प्राप्त होता है।
    मकर संक्रांति के दिन अगर दान किया जाए तो इसका महत्व बेहद विशेष होता है। इस दिन व्यक्ति को अपने सामर्थ्यनुसार दान देना चाहिए। साथ ही पवित्र नदियों में स्नान करना चाहिए। इस दिन खिचड़ी का दान देना विशेष फलदायी माना जाता है। साथ ही गुड़-तिल, रेवड़ी, गजक आदि का प्रसाद के रूप में बांटा जाता है।
    जब तक सूर्य पूर्व से दक्षिण की ओर चलता है, इस दौरान सूर्य की किरणों को अशुभ माना गया है, लेकिन जब सूर्य पूर्व से उत्तर की ओर गमन करने लगता है, तब उसकी किरणें शुभता, सेहत और शांति को बढ़ाती हैं। जो आध्यात्मिक क्रियाओं से जुड़े हैं उन्हें शांति और सिद्धि प्राप्त होती है। अगर सरल शब्दों में कहा जाए तो पूर्व के कड़वे अनुभवों को भुलकर मनुष्य आगे की ओर बढ़ता है।
    स्वयं भगवान कृष्ण ने गीता में कहा है कि, उत्तरायण के 6 माह के शुभ काल में, जब सूर्य देव उत्तरायण होते हैं, तब पृथ्वी प्रकाशमय होती है, अत: इस प्रकाश में शरीर का त्याग करने से मनुष्य का पुनर्जन्म नहीं होता है और वह ब्रह्मा को प्राप्त होता है। महाभारत काल के दौरान भीष्म पितामह जिन्हें इच्छामृत्यु का वरदान प्राप्त था। उन्होंने भी मकर संक्रांति के दिन शरीर का त्याग किया था।
    इस बार कब है मकर संक्रांति? जानिए महत्व, मान्यता, मुहूर्त और मंत्र
    हर साल जनवरी की 14 या 15 तारीख को मकर संक्रांति का त्योहार मनाया जाता है। इस साल यह त्योहार 14 जनवरी को मनाया जाएगा। हिंदू धर्म में मकर संक्रांति का त्योहार विशेष महत्व रखता है। इस दिन श्रद्धालु भक्ति-भाव से भगवान सूर्य की उपासना करते हैं। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार मकर संक्रांति वाले दिन भगवान सूर्य धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करते हैं, अन्य राशि प्रवेश से यह प्रवेश अत्यंत शुभ और मंगलकारी माना गया है।
    मकर संक्रांति के दिन भगवान सूर्य के साथ-साथ भगवान गणेश, माता लक्ष्मी और भगवान शिव की पूजा करने से विशेष फल की प्राप्ति होती है और मनुष्य का सोया नसीब जाग जाता है। इस दिन गुड़ और तिल का दान किया जाता है, साथ ही खिचड़ी का दान करने से अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है। मकर संक्रांति के दिन स्नान का भी विशेष महत्व है। इस दिन प्रात:काल उठकर पवित्र नदी में स्नान करने से पुण्य मिलता है।
    मकर संक्रांति व्रत महत्व: हिंदू पुराणों में वर्णित कथाओं के अनुसार मकर संक्रांति के दिन भगवान सूर्य अपने पुत्र भगवान शनि के पास जाते हैं। उस समय भगवान शनि मकर राशि का प्रतिनिधित्व कर रहे होते हैं। शनि, मकर राशि के देवता हैं इसलिए इस दिन को मकर संक्रांति के रूप में मनाया जाता है। इस विशेष दिन पर जब कोई पिता अपने पुत्र से मिलने जाता है, तो उनकी सारी समस्याएं दूर हो जाती हैं।
    मकर संक्रांति का महाभारत में भी वर्णन किया गया है, जो भीष्म पितामह के जीवन से जुड़ी हुई है। भीष्म पितामह को इच्छा मृत्यु का वरदान प्राप्त था।
    युद्ध में जब वह बाण की शैय्या पर लेटे हुए थे, तब वे अपने प्राण त्यागने के लिए सूर्य के उत्तरायण होने का इंतजार कर रहे थे, क्योंकि उनका मानना था कि उत्तरायण में प्राण त्यागने से उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होगी।
    मकर संक्रांति तिथि और शुभ मुहूर्त: इस साल 14 जनवरी को मकर संक्रांति का त्योहार मनाया जाएगा।
    इस साल पुण्य काल के लिए शुभ मुहूर्त सुबह 8.30 बजे से 12.30 बजे तक है, जिसकी अवधि 4 घंटे 26 मिनट है वहीं, महापुण्य काल का समय सुबह 8.03 से 8.27 तक है, यानी यह अवधि केवल 24 मिनट की है।
    मकर राशि में 5 ग्रहों का संयोग
    मकर संक्रांति पर मकर राशि में कई महत्वपूर्ण ग्रह एक साथ गोचर करेंगे। इस दिन सूर्य, शनि, गुरु, बुध और चंद्रमा मकर राशि में रहेंगे। जोकि एक शुभ योग का निर्माण करते हैं। इसीलिए इस दिन किया गया दान और स्नान जीवन में बहुत ही पुण्य फल प्रदान करता है और सुख समृद्धि लाता है।
    मकर संक्रांति सूर्य मंत्र : ॐ ह्रीम ह्रींम ह्रौमं स: सूर्य्याय नमः
    मकर संक्रांति के दिन इस विशेष सूर्य मंत्र का जाप किया जाना चाहिए।
    वर्ष 2021 में मकर संक्रांति किस वाहन पर आ रही है, जानिए पुण्यकाल का समय
    मकर संक्रांति के भिन्न-भिन्न रूप, जानिए रोचक 6 बातें
    हिन्दू महीने के अनुसार पौष शुक्ल पक्ष में मकर संक्रांति पर्व मनाया जाता है। इस दिन सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है और तभी से सूर्य उत्तरायण हो जाता है। उत्तरायन अर्थात उस समय से धरती का उत्तरी गोलार्द्ध सूर्य की ओर मुड़ जाता है, तो उत्तर ही से सूर्य निकलने लगता है। इसे सोम्यायन भी कहते हैं। 6 माह सूर्य उत्तरायन रहता है और 6 माह दक्षिणायन। अत: यह पर्व 'उत्तरायन' के नाम से भी जाना जाता है। मकर संक्रांति से लेकर कर्क संक्रांति के बीच के 6 मास के समयांतराल को उत्तरायन कहते हैं। यह त्योहार संपूर्ण भारत ही नहीं बल्कि अन्य देशों में भी विभिन्न रूप में मनाया जाता है।
    इस दिन से वसंत ऋतु की भी शुरुआत होती है और यह पर्व संपूर्ण अखंड भारत में फसलों के आगमन की खुशी के रूप में मनाया जाता है। खरीफ की फसलें कट चुकी होती हैं और खेतों में रबी की फसलें लहलहा रही होती हैं। खेत में सरसों के फूल मनमोहक लगते हैं। मकर संक्रांति के इस पर्व को भारत के अलग-अलग राज्यों में वहां के स्थानीय तरीकों से मनाया जाता है।
    1. पोंगल : दक्षिण भारत में मकर संक्रांति का त्योहार पोंगल के रूप में मनाया जाता है। यह त्योहार गोवर्धन पूजा, दिवाली और मकर संक्रांति का मिला-जुला रूप है। पोंगल विशेष रूप से किसानों का पर्व है। यह उत्सव लगभग 4 दिन तक चलता है। लेकिन मुख्य पर्व पौष मास की प्रतिपदा को मनाया जाता है। पोंगल अर्थात खिचड़ी का त्योहार। पोंगल के पहले अमावस्या को लोग बुरी रीतियों का त्यागकर अच्छी चीजों को ग्रहण करने की प्रतिज्ञा करते हैं। यह कार्य 'पोही' कहलाता है तथा जिसका अर्थ है- 'जाने वाली।' पोंगल का तमिल में अर्थ उफान या विप्लव होता है। पोही के अगले दिन अर्थात प्रतिपदा को दिवाली की तरह पोंगल की धूम मच जाती है।
    2.लोहड़ी : पंजाब और हरियाणा एवं इनके प्रभाव क्षेत्र में इसे लोहड़ी कहते हैं। लोहड़ी बसंत के आगमन के साथ 13 जनवरी, पौष महीने की आखरी रात को मनाया जाता है। इसके अगले दिन माघ महीने की सक्रांति को माघी के रूप में मनाया जाता है। वैसाखी त्योहार की तरह लोहड़ी का सबंध भी पंजाब के गांव, फसल और मौसम से है। लोहड़ी की संध्या को लोग लकड़ी जलाकर अग्नि के चारों ओर चक्कर काटते हुए नाचते-गाते हैं और आग में रेवड़ी, मूंगफली, खील, मक्की के दानों की आहुति देते हैं। अग्नि की परिक्रमा करते और आग के चारों ओर बैठकर लोग आग सेंकते हैं। इस दौरान रेवड़ी, खील, गज्जक, मक्का खाने का आनंद लेते हैं।
    3. बीहू : बिहू असम में फसल कटाई का प्रमुख त्योहार है। यह फसल पकने की खुशी में मनाया जाता है। इसी त्योहार को पूर्वोत्तर क्षेत्र में भिन्न भिन्न नाम से मनाते हैं। एक वर्ष में यह त्योहार तीन बार मनाते हैं। पहला सर्दियों के मौसम में पौष संक्रांति के दिन, दूसरा विषुव संक्राति के दिन और तीसरा कार्तिक माह में मनाया जाता है। पौष माह या संक्राति को भोगाली बिहू, विषुव संक्रांति को रोंगाली बिहू और कार्तिक माह में कोंगाली बिहू मनाया जाता है।
    4. चहार-शंबे सूरी : ईरान में भी नववर्ष का त्योहार इसी तरह मनाते हैं। यह त्योहार भी लोहड़ी से ही प्रेरित है जिसमें आग जलाकर मेवे अर्पित किए जाते हैं। मसलन, पंजाब, हरियाणा और दिल्ली में मनाई जाने वाली लोहड़ी और ईरान का चहार-शंबे सूरी बिल्कुल एक जैसे त्योहार हैं। इसे ईरानी पारसियों या प्राचीन ईरान का उत्सव मानते हैं। यह त्योहार नौरोज या नवरोज के एक दिन पहले मनाया जाता है।
    नौरोज़ या नवरोज़, ईरानी नववर्ष का नाम है, जिससे पारसी धर्म के लोग मनाते हैं, परंतु ईरान के शियाओं भी इस त्योहार को इसलिए मनाते हैं क्योंकि यह उनकी प्राचीन संस्कृति का प्रमुख त्योहार है। यह मूलत: प्रकृति प्रेम का उत्सव है। प्राचीन परंपराओं व संस्कारों के साथ नौरोज का उत्सव न केवल ईरान ही में ही नहीं बल्कि कुछ पड़ोसी देशों में भी मनाया जाता है। पश्चिम एशिया, मध्य एशिया, काकेशस, काला सागर बेसिन और बाल्कन में इसे 3,000 से भी अधिक वर्षों से मनाया जाता है। यह ईरानी कैलेंडर के पहले महीने (फारवर्दिन) का पहला दिन भी है।
    5. पतंग महोत्सव : गुजरात सहित कई राज्यों में यह पर्व 'पतंग महोत्सव' के नाम से भी जाना जाता है। पतंग उड़ाने के पीछे मुख्य कारण है कुछ घंटे सूर्य के प्रकाश में बिताना। यह समय सर्दी का होता है और इस मौसम में सुबह का सूर्य प्रकाश शरीर के लिए स्वास्थवर्द्धक और त्वचा व हड्डियों के लिए अत्यंत लाभदायक होता है। अत: उत्सव के साथ ही सेहत का भी लाभ मिलता है।
    6. संक्रांति उत्सव : कर्नाटक, केरल तथा आंध्र प्रदेश में इसे केवल संक्रांति ही कहते हैं। इस दिन पवित्र नदी में स्नान करने का, तिल-गुड़ खाने का तथा सूर्य को अर्घ्य देने का महत्व है। यह दिन दान और आराधना के लिए महत्वपूर्ण है। मकर संक्रांति से सभी तरह के रोग और शोक मिटने लगते हैं। माहौल की शुष्कता कम होने लगती है। इस दिन उड़द, चावल, तिल, चिवड़ा, गौ, स्वर्ण, ऊनी वस्त्र, कम्बल आदि दान करने का अपना महत्त्व है। महाराष्ट्र में भी इसे संक्रांति कहते हैं। इस दिन महाराष्ट्र में महिलाएं आपस में तिल, गुड़, रोली और हल्दी बांटती हैं।
    अन्य : इसके अलावा गुजरात और उत्तराखंड में इसे उत्तरायण उत्सव कहते हैं। हरियाणा, हिमाचल और पंजाब में इसका नाम माघी भी है। उत्तर प्रदेश और बिहार में इसे खिचड़ी उसत्व कहते हैं।
    भारतीय उममहाद्वीप के अन्य देशों में जैसे बांग्लादेश में पौष संक्रान्ति, नेपाल में माघे संक्रान्ति या खिचड़ी संक्रान्ति, थाईलैण्ड में सोंगकरन, लाओस में पि मा लाओ, म्यांमार में थिंयान, कम्बोडिया में
    मोहा संगक्रान और श्री लंका में पोंगल एवं उझवर तिरुनल कहते हैं।
    इस बार मकर संक्रांति आ रही है श्रवण नक्षत्र में, जानिए कैसा होगा भविष्यफल
    पृथ्वी साढ़े 23 डिग्री अक्ष पर झुकी हुई सूर्य की परिक्रमा करती है तब वर्ष में 4 स्थितियां ऐसी होती हैं, जब सूर्य की सीधी किरणें 21 मार्च और 23 सितंबर को विषुवत रेखा, 21 जून को कर्क रेखा और 22 दिसंबर को मकर रेखा पर पड़ती है। वास्तव में चन्द्रमा के पथ को 27 नक्षत्रों में बांटा गया है जबकि सूर्य के पथ को 12 राशियों में बांटा गया है। भारतीय ज्योतिष में इन 4 स्थितियों को 12 संक्रांतियों में बांटा गया है जिसमें से 4 संक्रांतियां महत्वपूर्ण होती हैं- मेष, तुला, कर्क और मकर संक्रांति। जानिए किस नक्षत्र में आने वाली संक्राति कैसी होती है। दरअसल ये मकर संक्रांति के प्रकार है।
    नक्षत्र युक्त संक्रांति :
    1. 27 या 28 नक्षत्र को सात भागों में विभाजित हैं-
    2. ध्रुव (या स्थिर)- उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाढ़ा, उत्तराभाद्रपदा, रोहिणी।
    3. मृदु- अनुराधा, चित्रा, रेवती, मृगशीर्ष।
    4. क्षिप्र (या लघु)- हस्त, अश्विनी, पुष्य, अभिजित, उग्र- पूर्वाफाल्गुनी, पूर्वाषाढ़ा, पूर्वाभाद्रपदा, भरणी, मघा।
    5. चर- पुनर्वसु, श्रवण, धनिष्ठा, स्वाति, शतभिषक।
    6. क्रूर (या तीक्ष्ण)- मूल, ज्येष्ठा, आर्द्रा, आश्लेषा।
    7. मिश्रित (या मृदुतीक्ष्ण या साधारण)- कृत्तिका, विशाखा।
    उक्त नक्षत्रों से पता चलता है कि इस बार की संक्रांति कैसी रहेगी। इस बार संक्रांति का नक्षत्र श्रवण है अर्थात इसकी प्रकृति चर है। चर नक्षत्र शुभ फलदायी होता है। अर्थात इस बार का संक्रांति वर्ष सभी जनों के लिए शुभफल देने वाली सिद्ध होगी। मतलब यह कि सभी का भविष्य शुभ और सफल फलदायी होगा।

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