September 09, 2026
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    धर्म संसार /शौर्यपथ /वसंत (बसंत) पंचमी का त्योहार माघ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी को मनाया जाता है। इस दिन मां सरस्वती की पूजा का विधान है। इस बार वसंत (बसंत) पंचमी का त्योहार 16 फरवरी 2021 को है।
    वाणी, लेखनी, प्रेम, सौभाग्य, विद्या, कला, सृजन, संगीत और समस्त ऐश्वर्य को प्रदान करने वाली देवी मां सरस्वती से शुभ आशीष प्राप्त करने का दिन है वसंत (बसंत) पंचमी। परिणय सूत्र में बंधने के लिए भी यह दिन श्रेष्ठ है।
    सरलतम विधि
    प्रात: काल सभी दैनिक कार्यों से निवृत्त होने के उपरांत मां भगवती सरस्वती की आराधना का प्रण या कहें कि संकल्प लेना चाहिए।
    स्नान के बाद भगवान गणेश जी का ध्यान करना चाहिए।
    स्कंद पुराण के अनुसार सफेद पुष्प, चन्दन, श्वेत वस्त्रादि से देवी सरस्वती जी की पूजा करना चाहिए।
    सरस्वती जी का पूजन करते समय सबसे पहले उनका स्नान कराना चाहिए इसके पश्चात माता को सिन्दूर व अन्य श्रृंगार की सामग्री चढ़ाएं।
    इसके बाद फूल माला चढ़ाएं।
    संगीत के क्षेत्र में हैं तो वाद्य यंत्रों की पूजन करें और अध्ययन से नाता है तो समस्त विद्या सामग्री कलम, किताब, नोटबुक आदि का पूजन करें।
    संभव हो सके तो मोर का पंख मां सरस्वती को चढ़ाएं।
    आंगन में रंगोली सजाएं।
    आम्र मंजरी भी देवी को अर्पित करें।
    वासंती खीर या केशरिया भात का भोग लगाएं।
    स्वयं भी केशरिया, पीले, वासंती या श्वेत परिधान पहनें।
    फूलों से मां सरस्वती पूजन स्थल का श्रृंगार करें।
    मां शारदा की आरती, सरस्वती मंत्र आदि से आराधना करें।
    पीले चावल से ॐ लिखें और उसका भी पूजन करें।
    देवी सरस्वती का मंत्र : श्रीं ह्रीं सरस्वत्यै स्वाहा
    सरल प्रार्थना :
    शारदा माता ईश्वरी, मैं नित सुमरि तोहे, हाथ जोड़ अरजी करूं विद्या वर दे मोहे
    मिठाई से भोग लगाकर सरस्वती कवच का पाठ करें. मां सरस्वती जी के पूजा के वक्त इस मंत्र का जाप करने से असीम पुण्य मिलता है...
    मां सरस्‍वती का श्‍लोक
    मां सरस्वती की आराधना करते वक्‍त इस श्‍लोक का उच्‍चारण करना चाहिए:-
    ॐ श्री सरस्वती शुक्लवर्णां सस्मितां सुमनोहराम्।।
    कोटिचंद्रप्रभामुष्टपुष्टश्रीयुक्तविग्रहाम्।
    वह्निशुद्धां शुकाधानां वीणापुस्तकमधारिणीम्।।
    रत्नसारेन्द्रनिर्माणनवभूषणभूषिताम्।
    सुपूजितां सुरगणैब्रह्मविष्णुशिवादिभि:।। वन्दे भक्तया वन्दिता च...
    वसंत पंचमी 16 फरवरी को, जानिए 12 राशियों के सरस्वती मंत्र
    वसंत-पंचमी यानी मां सरस्वती के जन्मदिन पर देवी को प्रसन्न करने के लिए राशि अनुसार वंदना करें। राशि के अनुसार मंत्र जपने से मां शारदा सुख, संपत्ति, विद्या, बुद्धि, यश, कीर्ति, पराक्रम, प्रतिभा और विलक्षण वाणी का आशीष प्रदान करती है। प्रस्तुत है आपकी राशि के अनुसार सरस्वती मंत्र-
    मेष- ॐ वाग्देवी वागीश्वरी नम:
    वृषभ- ॐ कौमुदी ज्ञानदायनी नम:
    मिथुन- ॐ मां भुवनेश्वरी सरस्वत्यै नम:
    कर्क- ॐ मां चन्द्रिका दैव्यै नम:
    सिंह- ॐ मां कमलहास विकासिनी नम:
    कन्या- ॐ मां प्रणवनाद विकासिनी नम:
    तुला- ॐ मां हंससुवाहिनी नम:
    वृश्चिक- ॐ शारदै दैव्यै चंद्रकांति नम:
    धनु- ॐ जगती वीणावादिनी नम:
    मकर- ॐ बुद्धिदात्री सुधामूर्ति नम:
    कुंभ- ॐ ज्ञानप्रकाशिनी ब्रह्मचारिणी नम:
    मीन- ॐ वरदायिनी मां भारती नम:

    धर्म संसार /शौर्यपथ / 31 जनवरी और 1 फरवरी को संकट चौथ का शुभ व्रत है। इस दिन विशेष रूप से 7 धान को तिल के साथ मिलाकर सवा किलो का लड्डू बनाया जाता है और उसे बलि की तरह काटा जाता है...कुछ जगहों पर थाली में तिल और गुड का कोई पशु बनाकर काटा जाता है...
    इसके पीछे मान्यता है कि संकट चतुर्थी की कथा में जिस प्रकार ब्राहमणी का बालक बलि देने के बाद भी श्री गणेश जीकी अनुकम्पा से सुरक्षित बचा रहा वैसे ही हमारी संतान भी हर तरह के संकट से बची रहे...और उस कथा की स्मृति में बलि की परम्परा भी बनी रहे...
    इसदिन तिल के दान से 7 शुभ फल मिलते हैं...
    मान-सम्मान में वृद्धि होती है।
    धन का आगमन होता है।
    विकट समस्याओं का समाधान प्राप्त होता है।
    सुख शांति का वातावरण होता है।
    यश एवं बल की शक्ति प्राप्त होती है।
    संकट में रक्षा होती है।
    प्रगति के अवसर मिलते हैं।
    संकष्टी चतुर्थी के दिन कैसे करें पूजन, पढ़ें आसान विधि एवं मुहूर्त
    संकष्टी चतुर्थी, सकट चौथ, संकट चौथ, वक्रतुंडी चतुर्थी, माही और तिलकुटा चौथ के नाम से जाने जाने वाली इस चतुर्थी पर श्री गणेश का पूजन किया जाता है। आइए पढ़ें पूजन विधि-
    गणेश चतुर्थी की पूजन विधि :-
    * श्री चतुर्थी के दिन सुबह जल्दी उठकर प्रतिदिन के कर्मों से निवृ होकर स्नान करें।
    * फिर एक पटिए पर लाल कपड़ा बिछाकर गणपति की स्‍थापना के बाद इस तरह पूजन करें-
    * सबसे पहले घी का दीपक जलाएं। इसके बाद पूजा का संकल्‍प लें।

    * फिर गणेश जी का ध्‍यान करने के बाद उनका आह्वान करें।

    * इसके बाद गणेश को स्‍नान कराएं। सबसे पहले जल से, फिर पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद और चीनी का मिश्रण) और पुन: शुद्ध जल से स्‍नान कराएं।
    * गणेश के मंत्र व चालीसा और स्तोत्र आदि का वाचन करें।
    * अब गणेश जी को वस्‍त्र चढ़ाएं। अगर वस्‍त्र नहीं हैं तो आप उन्‍हें एक नाड़ा भी अर्पित कर सकते हैं।
    * इसके बाद गणपति की प्रतिमा पर सिंदूर, चंदन, फूल और फूलों की माला अर्पित करें।
    * अब बप्‍पा को मनमोहक सुगंध वाली धूप दिखाएं।
    * अब एक दूसरा दीपक जलाकर गणपति की प्रतिमा को दिखाकर हाथ धो लें।
    * हाथ पोंछने के लिए नए कपड़े का इस्‍तेमाल करें।
    * अब नैवेद्य चढ़ाएं। नैवेद्य में मोदक, मिठाई, गुड़ और फल शामिल करें।
    * इसके बाद गणपति को नारियल और दक्षिण प्रदान करें।
    * सकंष्टी/ सकट चतुर्थी की कथा श्रवण करें अथवा पढ़ें।
    * अब अपने परिवार के साथ गणपति की आरती करें। गणेश जी की आरती कपूर के साथ घी में डूबी हुई एक या तीन या इससे अधिक बत्तियां बनाकर की जाती है।
    * इसके बाद हाथों में फूल लेकर गणपति के चरणों में पुष्‍पांजलि अर्पित करें।
    * अब गणपति की परिक्रमा करें। ध्‍यान रहे कि गणपति की परिक्रमा एक बार ही की जाती है।
    * इसके बाद गणपति से किसी भी तरह की भूल-चूक के लिए माफी मांगें।
    * पूजा के अंत में साष्टांग प्रणाम करें।
    * रात को चंद्रमा की पूजा और दर्शन करने के बाद व्रत खोलना चाहिए। {इस चतुर्थी पर चंद्रोदय रात्रि 08 बजकर 27 मिनट पर होगा।}
    भविष्य पुराण के अनुसार संकष्टी चतुर्थी की पूजा और व्रत करने से हर तरह के कष्ट दूर हो जाते हैं। गणेश पुराण के अनुसार इस व्रत के प्रभाव से सौभाग्य, समृद्धि और संतान सुख मिलता है। शाम को चंद्रमा निकलने से पहले गणपति जी की एक बार और पूजा करें और संकष्टी व्रत कथा का फिर से पाठ करें। अब व्रत का पारण करें।
    संकष्टी चतुर्थी पर चंद्रोदय का समय और पूजन का मुहूर्त :-
    चतुर्थी तिथि 31 जनवरी 2021 को रात्रि 08.24 मिनट से आरंभ होगी और इस तिथि का समापन 1 फरवरी 2021 को शाम 06.24 मिनट पर होगा।
    इस दिन चंद्रोदय का समय रात्रि 08.27 मिनट है।
    आज इस मंत्र के जाप से प्रसन्न होंगे श्री गणेश, चढ़ाएं यह प्रसाद
    प्रतिमाह कृष्ण पक्ष में श्री गणेश संकष्टी चतुर्थी व्रत किया जाता है। इस दिन भगवान श्री गणेश को अपनी राशिनुसार प्रसाद चढ़ाने से समस्त कष्ट दूर होकर जीवन अपार खुशियों से भर जाता है। आइए जानें संकष्‍टी चतुर्थी के दिन कौन-सा मंत्र जपें और क्या चढ़ाएं प्रसाद...
    मेष : ॐ वक्रतुण्डाय हुं।
    प्रसाद : छुआरा और गु़ड़ के लड्डू।
    वृष- ॐ ह्रीं ग्रीं ह्रीं।
    प्रसाद : मिश्री, शक्कर, नारियल से बने लड्डू।
    मिथुन-ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं ग्लौं गं गणपतेय वर वरद् सर्वजनं मे वशमानाय स्वाहा।
    प्रसाद : मूंग के लड्डू, हरे फल।
    कर्क- ॐ वक्रतुण्डाय हुं॥
    प्रसाद : मोदक के लड्डू, मक्खन, खीर।
    सिंह-ॐ श्रीं गं सौभाग्य गणपतेय वरवरदं सर्वजनं में वशमानयं स्वाहा।
    प्रसाद : गुड़ से बने मोदक के लड्डू व लाल फल।
    कन्या- ॐ गं गणपतयै नमः या ॐ श्रीं श्रियैः नमः॥
    प्रसाद : हरे फल, मूंग की दाल के लड्डू व किशमिश।
    तुला- ॐ ह्रीं, ग्रीं, ह्रीं गजाननाय नम:।
    प्रसाद : मिश्री, लड्डू और केला।
    वृश्चिक- ॐ वक्रतुण्डाय हुं॥
    प्रसाद : छुआरा और गु़ड़ के लड्डू।
    धनु- हुं गं ग्लौं हरिद्रागणपतयै वरवरद दुष्ट जनहृदयं स्तम्भय स्तम्भय स्वाहा॥
    प्रसाद : मोदक व केला।
    मकर- ॐ लंबोदराय नमः
    प्रसाद : मोदक के लड्डू, किशमिश, लड्डू।
    कुंभ- ॐ सर्वेश्वराय नमः
    प्रसाद : गुड़ लड्डू व मौसमी फल।
    मीन- ॐ सिद्धि विनायकाय नमः
    प्रसाद : बेसन के लड्डू, केला, बादाम।
    उपरोक्त मंत्र जाप के द्वारा और श्री गणेश को अपनी राशिनुसार भोग लगाने से आप जीवन में संपन्नता पा सकते हैं।

    खाना खजाना /शौर्यपथ /बेसन का हलवा ऐसी रेसिपी है जो न सिर्फ स्वाद में लाजवाब होती है बल्कि सेहत के लिए लिहाज से भी यह काफी गुणकारी होता है। वहीं इसे बनाना भी बेहद आसान है।आइए, जानते हैं इसकी रेसिपी-
    सामग्री :
    बेसन - 1 छोटा बाउल घी - 1/2 छोटा बाउल चीनी - 1 छोटा बाउल पानी - 21/2 छोटा बाउल इलायची - 2-3 कटे हुए काजू - 1 टी स्पून किशमिश गार्निशिंग के लिए
    विधि : सबसे पहले एक पैन में बेसन को हल्का भूरा होने तक भूनें। अब इसमें घी और चीनी मिलाकर अच्छे से हिलाएं। अब पानी डालकर अच्छे से मिक्स करें।
    उबाली आने दे, एक बार यह मिक्सचर गाढ़ होने लगे तो लगातार हिलाते रहें।
    पैन को गैस से उतार कर ठंडा होने दें।
    इसी बीच इलायची को कूट लें।
    अब इसे हलवे पर बुरके।
    काजू और किशमिश से गार्निश करें।

    सेहत /शौर्यपथ /ऐसे कई फूड है जिन्हें एक पूरी रात भिगोकर रखने के बाद, अगले दिन खाना अपेक्षाकृत अधिक फायदेमंद होता है। क्योंकि अंकुरित होने के बाद उनकी नुट्रिशन वैल्यू बढ़ जाती है, साथ ही ये आसानी से पच जाते है जो सेहत के लिए अच्छा है। हम आपको बता रहे हैं ऐसी ही 8 चीजों के बारे में जिन्हें रातभर भिगोकर खाना आपकी इम्यूनिटी को मजबूत करने में सहायक होगा -
    1 मेथीदाना -इनमें फाइबर्स भरपूर मात्रा में होते हैं जो कब्ज को दूर कर आंतों को साफ रखने में मदद करते हैं। डायबिटीज के रोगियों के लिए भी मेथीदाने फायदेमंद हैं। साथ ही इनका सेवन महिलाओं में पीरियड्स के दौरान होने वाले दर्द को भी कम करता हैं।
    2 खसखस -ये फोलेट, थियामिन और पैंटोथेनिक एसिड का अच्छा सोर्स होता हैं। इसमें मौजूद विटामिन बी मेटाबॉलिज्म को बढ़ाता है जिससे वजन को नियंत्रित करने में मदद मिलती है।
    3 अलसी -अलसी या फ्लैक्स सीड्स ओमेगा-3 फैटी एसिड का एकमात्र शाकाहारी सोर्स माना जाता हैं। अलसी का सेवन बैड कोलेस्ट्रॉल को घटाकर हमारे दिल को भी हेल्दी रखता हैं।
    4 मुनक्का -इसमें मैग्नीशियम, पोटेशियम और आयरन काफी मात्रा में होते हैं। मुनक्के का नियमित सेवन कैंसर कोशिकाओं में बढ़ोतरी को रोकता है। इससे हमारी स्किन भी हेल्दी और चमकदार रहती है। एनीमिया और किडनी स्टोन के मरीजों के लिए भी मुनक्का फायदेमंद है।
    5 खड़े मूंग -इनमें प्रोटीन, फाइबर और विटामिन बी भरपूर मात्रा में होता है। इनका नियमित सेवन कब्ज दूर करने में बहुत फायदेमंद होता है। इसमें पोटेशियम और मैग्नेशियम भी भरपूर मात्रा में होने की वजह से डॉक्टरस हाई बीपी के मरीजों को इसे रेगुलर खाने की सलाह देते है।
    6 काले चने -इनमें फाइबर्स और प्रोटीन की पर्याप्त मात्रा होती हैं जो कब्ज दूर करने में सहायक होते है।
    7 बादाम -इसमें मैग्नीशियम होता है जो हाई बीपी के रोगियों के लिए फायदेमंद होता है। कई अध्ययनों में पाया गया है कि नियमित रूप से भीगी हुई बादाम खाने से खराब कोलेस्ट्रॉल का लेवल कम हो जाता है।
    8 किशमिश -किशमिश में आयरन और एंटीऑक्सीडेंट्स भरपूर मात्रा में होते हैं। भीगी हुई किशमिश को नियमित रूप से खाने से स्किन हेल्दी और चमकदार बनती है। साथ ही शरीर में आयरन की कमी भी दूर होती है।

    धर्म संसार /शौर्यपथ / कलिकाल में हनुमानजी की भक्ति ही कही गई है। हनुमानजी की निरंतर भक्ति करने से भूत पिशाच, शनि और ग्रह बाधा, रोग और शोक, कोर्ट-कचहरी-जेल बंधन से मुक्ति, मारण-सम्मोहन-उच्चाटन, घटना-दुर्घटना से बचना, मंगल दोष, कर्ज से मुक्ति, बेरोजगार और तनाव या चिंता से मुक्ति मिल जाती है। विशेष दिन और विशेष समय पर हनुमानजी की पूजा, साधना या आराधना करने से वे तुरंत ही प्रसन्न होते हैं।
    1. शनिवार को हनुमानजी का सुंदरकांड का पाठ करना चाहिए। शनिवार को सुंदरकांड या हनुमान चालीसा पाठ करने से शनि भगवान आपको लाभ देने लगेंगे। शनिवार को हनुमान मंदिर में जाकर हनुमानजी को आटे के दीपक लगाएं।

    2. मंगलवार को हनुमान पूजा, आराधान या हनुमान चालीसा पढ़ने से सभी तरह के संकट दूर होकर मंगल दोष भी मिट जाता है। किसी भी मांगलिक कार्य कि सिद्ध के लिए या कर्ज से मुक्ति के लिए मंगलवार को उनकी आराधना करना चाहिए।

    3. मार्गशीर्ष मास के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि के दिन व्रत करने से और इसी दिन हनुमान-पाठ, जप, अनुष्ठान आदि प्रारंभ करने से त्वरित फल प्राप्त होता है।


    4. हनुमान जयंती के दिन विशेष आराधना करना चाहिए। पहली चैत्र शुक्‍ल पूर्णिमा को और दूसरी कार्तिक कृष्‍ण चतुर्दशी को हनुमान जयंती मनाई जाती है। दोनों ही दिन सर्वश्रेष्ठ है। पहली चैत्र माह की तिथि को विजय अभिनन्दन महोत्सव के रूप में जबकि दूसरी तिथि को जन्मदिवस के रूप में मनाया जाता है। हली तिथि के अनुसार इस दिन हनुमानजी सूर्य को फल समझ कर खाने के लिए दौड़े थे, उसी दिन राहु भी सूर्य को अपना ग्रास बनाने के लिए आया हुआ था लेकिन हनुमानजी को देखकर सूर्यदेव ने उन्हें दूसरा राहु समझ लिया। इस दिन चैत्र माह की पूर्णिमा थी, जबकि दूसरी तिथि के अनुसार कार्तिक कृष्‍ण चतुर्दशी को उनका जन्म हुआ हुआ था। अत: इस दिन हनुमान पूजा करने से सभी तरह का संकट टल जाता है और निर्भिकता का जन्म होता है।
    5. उपरोक्त के अलावा हनुमानजी की पूजा पूर्णिमा और अमावस्या को भी विशेष रूप से की जाती है। इस दिन की गई पूजा हर तरह के भय, चंद्रदोष, देवदोष, मानसिक अशांति, भूत-पिशाच और सभी तरह की घटना-दुर्घटना से बचाती है।

    आस्था /शौर्यपथ / प्राचीनकाल से ही जप करना भारतीय पूजा-उपासना पद्धति का एक अभिन्न अंग रहा है। जप के लिए माला की जरूरत होती है, जो रुद्राक्ष, तुलसी, वैजयंती, स्फटिक, मोतियों या नगों से बनी हो सकती है। इनमें से रुद्राक्ष की माला को जप के लिए सर्वश्रेष्ठ माना गया है, क्योंकि इसमें कीटाणुनाशक शक्ति के अलावा विद्युतीय और चुंबकीय शक्ति भी पाई जाती है।
    अंगिरा स्मृति में माला का महत्त्व इस प्रकार बताया गया है-
    विना दमैश्चयकृत्यं सच्चदानं विनोदकम्।
    असंख्यता तु यजप्तं तत्सर्व निष्फल भवेत्।।
    अर्थात बिना कुश के अनुष्ठान, बिना माला के संख्याहीन जप निष्फल होता है। माला में 108 ही दाने क्यों होते हैं, उस विषय में योगचूड़ामणि उपनिषद में कहा गया है-
    पद्शतानि दिवारात्रि सहस्त्राण्येकं विंशति।
    एतत् संख्यान्तिंत मंत्र जीवो जपति सर्वदा।।
    हमारी सांसों की संख्या के आधार पर 108 दानों की माला स्वीकृत की गई है। 24 घंटों में एक व्यक्ति 21,600 बार सांस लेता है। चूंकि 12 घंटे दिनचर्या में निकल जाते हैं, तो शेष 12 घंटे देव-आराधना के लिए बचते हैं अर्थात 10,800 सांसों का उपयोग अपने ईष्टदेव को स्मरण करने में व्यतीत करना चाहिए, लेकिन इतना समय देना हर किसी के लिए संभव नहीं होता इसलिए इस संख्या में से अंतिम 2 शून्य हटाकर शेष 108 सांस में ही प्रभु-स्मरण की मान्यता प्रदान की गई।
    दूसरी मान्यता भारतीय ऋषियों की कुल 27 नक्षत्रों की खोज पर आधारित है। चूंकि प्रत्येक नक्षत्र के 4 चरण होते हैं अत: इनके गुणफल की संख्या 108 आती है, जो परम पवित्र मानी जाती है। इसमें श्री लगाकर ‘श्री 108’ हिन्दू धर्म में धर्माचार्यों, जगद्गुरुओं के नाम के आगे लगाना अति सम्मान प्रदान करने का सूचक माना जाता है।
    माला के 108 दानों से यह पता चल जाता है कि जप कितनी संख्या में हुआ। दूसरे माला के ऊपरी भाग में एक बड़ा दाना होता है जिसे 'सुमेरु' कहते हैं। इसका विशेष महत्व माना जाता है। चूंकि माला की गिनती सुमेरु से शुरू कर माला समाप्ति पर इसे उलटकर फिर शुरू से 108 का चक्र प्रारंभ किया जाने का विधान बनाया गया है इसलिए सुमेरु को लांघा नहीं जाता।
    एक बार माला जब पूर्ण हो जाती है तो अपने ईष्टदेव का स्मरण करते हुए सुमेरु को मस्तक से स्पर्श किया जाता है। ऐसा माना जाता है कि ब्रह्मांड में सुमेरु की स्थिति सर्वोच्च होती है।
    माला में दानों की संख्या के महत्व पर शिवपुराण में कहा गया है-
    अष्टोत्तरशतं माला तत्र स्यावृत्तमोत्तमम्।
    शतसंख्योत्तमा माला पञ्चाशद् मध्यमा।।
    अर्थात 108 दानों की माला सर्वश्रेष्ठ, 100-100 की श्रेष्ठ तथा 50 दानों की मध्यम होती है।
    शिवपुराण में ही इसके पूर्व श्लोक 28 में माला जप करने के संबंध में बताया गया है कि अंगूठे से जप करें तो मोक्ष, तर्जनी से शत्रुनाश, मध्यमा से धन प्राप्ति और अनामिका से शांति मिलती है।
    तीसरी मान्यता ज्योतिष शास्त्र के अनुसार समस्त ब्रह्मांड को 12 भागों में बांटने पर आधारित है। इन 12 भागों को ‘राशि’ की संख्या दी गई है। हमारे शास्त्रों में प्रमुख रूप से 9 ग्रह (नवग्रह) माने जाते हैं। इस तरह 12 राशियों और 9 ग्रहों का गुणनफल 108 आता है। यह संख्या संपूर्ण विश्व का प्रतिनिधित्व करने वाली सिद्ध हुई है।
    चौथी मान्यता सूर्य पर आधारित है। 1 वर्ष में सूर्य 21,600 (2 लाख 12 हजार) कलाएं बदलता है। चूंकि सूर्य हर 6 महीने में उत्तरायण और दक्षिणायन रहता है, तो इस प्रकार 6 महीने में सूर्य की कुल कलाएं 1,08,000 (1 लाख 8 हजार) होती हैं। अंतिम 3 शून्य हटाने पर 108 अंकों की संख्या मिलती है इसलिए माला जप में 108 दाने सूर्य की 1-1 कलाओं के प्रतीक हैं।

    धर्म संसार / शौर्यपथ / जिसे लगाता है कि उसको शनि या अन्य किसी ग्रह की बाधा है, साढ़े साती, अढ़ाय्या या राहु की महादशा चल रहा है तो घबराने की जरूरत नहीं। जिन पर हनुमानजी की कृपा होती है, उसका शनि और यमराज भी बाल बांका नहीं कर सकते। आप प्रति मंगलवार हनुमान मंदिर जाएं और शराब व मांस के सेवन से दूर रहें। इसके अलावा शनिवार को सुंदरकांड या हनुमान चालीसा पाठ करने से शनि भगवान आपको लाभ देने लगेंगे। शनिवार को हनुमान मंदिर में जाकर हनुमानजी को आटे के दीपक लगाएं। अब जाने की क्या कारण है कि हनुमान भक्त और हनुमानजी की ओर शनिदेव देखते भी नहीं है।
    1. एक बार रामजप में बाधा डालने के बारण शनिदेव को हनुमानजी ने अपनी पूंछ में लपेट लिया था और अपना रामकार्य करने लग गए थे। इस दौरान शनिदेव को कई चोटे आई। बाद में जब हनुमानजी को याद आया तो उन्होंने शनिदेव को मुक्त किया। तब शनिदेव को अपनी भूल का अहसास हुआ और उन्होंने कहा कि आज के बाद में रामकार्य और आपके भक्तों भक्तों के कार्य में कोई बाधा नहीं डालूंगा।
    2. एक बार हनुनामजनी ने शनिदेव को रावण की कैद से मुक्त कराया था तब शनि भगवान ने वचन दिया था कि मैं आपके किसी भी भक्त पर अपनी कृपा बनाए रखूंगा।

    3. पराशर संहिता में हनुमानजी की शादी का उल्लेख है। माना जाता है कि हनुमानजी का सांकेतिक विवाह सूर्य की पुत्री सुवर्चला से हुआ था। आंध्रप्रदेश के खम्मम में एक प्राचीन हनुमान मंदिर है जहां हनुमान जी के साथ उनकी पत्नी की भी मूर्ति विराजमान है। शास्त्रों में शनि महाराज को सूर्य का पुत्र बताया गया है। इस नाते हनुमान जी की पत्नी सुवर्चला शनि महाराज की बहन हुई। और सबके संकट दूर करने वाले हनुमान जी भाग्य के देवता शनि महाराज के बहनोई हुए।
    चंद्रमा को हनुमानजी ने शनि से बचाया था तो वे चंद्रशेखर कहलाए थे।

    खाना खजाना /शौर्यपथ /आपको अगर नई-नई टेस्टी रेसिपी हर रोज ट्राई करनेे तो करने का शौक है, तो आप फ्राइड राइस ट्राई कर सकते हैं। आज हम आपको फ्राइड राइस बनाने का ऐसा तरीका बता रहे हैं, जिससे आपकी रेसिपी रेस्टोरेंट जैसी ही बनेगी।
    सामग्री−
    एक कप चावल
    दो कटी हुई हरी मिर्च
    पांच लहसुन की कटी हुई कलियां
    बारीक कटा हरा प्याज
    बारीक कटा गाजर
    स्वादानुसार नमक,
    काली मिर्च
    रेड चिली सॉस
    ग्रीन चिली सॉस
    सोया सॉस

    विधि− वेज फ्राइड राइस बनाने के लिए आप पके हुए चावलों का इस्तेमाल करें। अगर आपके पास कच्चे चावल हैं तो एक कप चावल को करीबन 20 मिनट के लिए पानी में भिगोएं। इसके बाद आप उसका पानी निथार लें। अब एक भगोने में करीबन 5−6 गिलास पानी डालें और एक चम्मच नमक डालें। साथ ही इसमें आधा चम्मच नींबू का रस भी डालें। जब पानी हल्का उबलने लगे तो इसमें चावल डालें और एक बार चला दें। अब आप चावलों को पकने के लिए छोड़ दें। जब चावल अच्छी तरह पककर तैयार हो जाए तो आप इसका अतिरिक्त पानी निकाल लें और चावलों को एक बड़ी प्लेट में फैला दें ताकि यह खिला−खिला रहे।
    अब एक कड़ाही को गर्म करने के लिए गैस पर रखें। अब इसमें तेल डालें। इसके बाद आप इसमें कटी हुई हरी मिर्च, लहसुन, प्याज, गाजर डालकर अच्छी तरह चलाएं। तीन−चार मिनट बाद आप इसमें नमक, काली मिर्च, रेड चिली सॉस, ग्रीन चिली सॉस व जरा सी सोया सॉस डालें। अब इसे अच्छी तरह मिक्स करें।
    अब बारी आती है इसमें चावल मिक्स करने की। आप इस मिश्रण में चावल डालें और अच्छी तरह मिलाएं। बस आपके फ्राइड राइस तैयार है।
    आप इसे प्लेट में निकालें और स्प्रिंग अनियन की मदद से गार्निश करें। आप इसे चाहे तो ऐसे ही खाएं या फिर इसे किसी चाइनीज ग्रेवी के साथ मिक्स करके खाएं।
    इस रेसिपी में स्प्रिंग अनियन व गाजर का प्रयोग किया है। आप चाहें तो इसमें अपनी पसंद की कुछ और सब्जियां भी इस्तेमाल कर सकते हैं।

    सेहत /शौर्यपथ /विशेषज्ञ मानते हैं कि हेल्दी लाइफस्टाइल और सही डाइट को फॉलो करने से गंभीर बीमारियों की चपेट में आने का खतरा कम हो जाता है। हेल्दी ईटिंग से कई रोगों को टाला जा सकता है, यहां तक कि कैंसर से बचाव भी किया जा सकता है।
    आइए जानते हैं ऐसे 10 तरह के फूड के बारे में जो आपके कैंसर के खतरे को कई प्रतिशत तक कम कर सकते हैं।
    सेब: एंटी-ऑक्सीडेंट्स के बेहतरीन स्रोत होते हैं सेब। वहीं, इसमें पाए जाने वाले अन्य तत्व जैसे कि फाइबर्स ब्रेस्ट कैंसर के खतरे को कम करने में फायदेमंद माने गए हैं।
    पीनट ऑयल: मूंगफली के तेल में भरपूर मात्रा में एंटी-ऑक्सीडेंट्स पाए जाते हैं जो कई तरह के कैंसर के खतरे को कम करते हैं।
    अनार: स्वास्थ्य विशेषज्ञ मानते हैं कि कुछ कैंसर ओइस्ट्रोजेन के कारण होने हो जाते हैं। बता दें कि 2015 के एक अध्ययन के अनुसार इस मौसमी फल में मौजूद तत्व इस तरह के कैंसर का खतरा कम करते हैं। इसके साथ ही, अनार प्रोस्टेट कैंसर व हार्ट डिजीज से भी बचाता है।
    गाजर: गाजर में एंटी-ऑक्सीडेंट्स भरपूर मात्रा में मौजूद होते हैं जो कैंसर सेल्स को बढ़ने से रोकते हैं। हेल्थ एक्सपर्ट्स के अनुसार गाजर में पॉलीएसिटिलीन तत्व मौजूद होते हैं, ये कैंसर सेल्स को खत्म कर ट्यूमर के ग्रोथ को रोकने में प्रभावी माने गए हैं। साथ ही, इस मौसमी सब्जी में मौजूद केरेटिनॉइड एसिड महिलाओं में होने वाले स्तन कैंसर सेल्स के शुरुआती बदलाव को रोकने में असरदार होता है। डॉक्टर्स मानते हैं कि गाजर का जूस बनाकर पीने से लोगों में कैंसर का खतरा कम होता है।
    ब्रोकली: इस क्रुसिफेरस सब्जी में खास गुण पाए जाते हैं जो ट्यूमर के ग्रोथ को रोकने में सक्षम हैं। ब्रोकली में फोलेट और विटामिन के जैसे विटामिन्स-मिनरल्स पाए जाते हैं। साथ ही, फाइटोन्यूट्रिएंट्स भी मौजूद होते हैं। ये सभी मिलकर कैंसर का खतरा कम करते हैं। खासकर इसके प्रभाव से स्तन कैंसर का खतरा कम होता है।
    इनसे भी होगा बेहद फायदा: ताजे या फ्रोज़ेन बेरीज़ जिनमें जामुन, स्ट्रॉबेरीज़ व सभी प्रकार की बेरीज़ को खाना फायदेमंद हैं। डार्क चॉकलेट जिनमें तकरीबन 70 फीसदी कोकोआ मौजूद हो। हर तरह की सब्जियां, सभी प्रकार के सूखे मेवे। ओमेगा 3 फैटी एसिड्स से भरपूर खाद्य पदार्थों को खाने से भी लाभ होगा। हल्दी, ऑलिव ऑयल, दाल, अंगूर, मूंगफली और ग्रीन टी भी लाभदायक है।

    शौर्यपथ / भारत में प्राचीनकाल से ही टैक्स की व्यवस्था रही है और उस टैक्स को सैन्य क्षमता बढ़ाने और जनता के हित में खर्च करने का प्रावधान भी रहा है। फूटी कौड़ी से कौड़ी, कौड़ी से दमड़ी, दमड़ी से धेला, धेला से पाई, पाई से पैसा, पैसा से आना, आना से रुपया तो बाद में बना उससे पहले प्राचीन भारत में स्वर्ण, रजत, ताम्र और मिश्रित मुद्राएं प्रचलित थी जिसे 'पण' कहा जाता था। इन पणों को संभालने के लिए राजकोष होता था। राजकोष का एक प्राधना कोषाध्यक्ष होता था। आओ जानते हैं प्राचीन भारत का वित्त विभाग।
    1.कुबेरे देवता देवताओं के कोषाध्यक्ष थे। सैन्य और राज्य खर्च वे ही संचालित करते थे। इसी तरह अनुसरों के कोषाध्यक्ष भी थे। वैदिक काल में सभा, समिति और प्रशासन व्यवस्था के ये तीन अंग थे। सभा अर्थात धर्मसंघ की धर्मसभा, शिक्षासंघ की विद्या सभा और राज्यों की राज्यसभा। समिति अर्थात जन साधरण जनों की संस्था है। प्रशासन अर्थात न्याय, सैन्य, वित्त आदि ये प्रशासनिक, पदाधिकारियों, के विभागों के काम। इसमें से प्रशान में एक व्यक्ति होता था जो टैक्स के एवज में मिली वस्तु या सिक्के का हिसाब किताब रखता था। इसमें प्रधान कोषाध्यक्ष के अधिन कई वित्त विभाग या खंजांची होते थे। यह व्यवस्था रामायण और महाभारत काल तक चली। उस काल में जो भी व्यक्ति इस व्यवस्था को देखता था उसे 'पणि' कहा जाता था।
    सिंधु सभ्यता में मुद्राओं के पाए जाने से यह पता चलता है कि वहां पर वस्तु विनिमय के अलाव मुद्रा का लेन-देन भी था। उस काल में भी वित्ति विभाग होता था जो राज्य से टैक्स वसुरलता और बाहरी लोगों से भी चुंगी नाका वसुलता था। यह सारी मुद्राएं या वस्तुएं राजकीय खाजने में जमा होती थी। सिंधु घाटी का समाज मूलतः व्यापार आधारित समाज था और नदियों में नौकाओं तथा समुद्र में जहाजों के जरिये इनका व्यापार चलता था। इसलिए उस काल में मुद्रा का बहुत महत्व था। स्वर्ण, ताम्र, रजत और लौह मुद्राओं के अलावा कहते हैं कि कौड़ियों का भी प्रचलन था।
    प्राचीन शास्त्र मनुस्मृति, शुक्रनीति, बृहस्पति संहिता और महाभारत में भी बजट का उल्लेख मिलता है। मनुस्मृति के अनुसार करों का संबंध प्रजा की आय और व्यय से होना चाहिए। इसमें ये भी कहा गया था कि राजा को हद से ज्यादा कर लगाने से बचना चाहिए। करों की वसूली की ऐसी व्यवस्था करनी चाहिए कि प्रजा अदायगी करते समय मुश्किल महसूस न करें। महाभारत के शांतिपर्व के 58 और 59वें अध्याय में भी इस बारे में जानकारी दी गई है।
    2.इसके बाद कौटिल्य ने अपने अर्थशास्त्र में बजट व्यवस्था का जिक्र किया है। इस अर्थशास्त्र में मौर्य वंश के वक्त की राजकीय व्यवस्था के बारे में जानाकारी मिलती है। उस काल में रखरखाव, आगामी तैयारी, हिसाब-किताब का लेखा-जोखा वर्तमान बजट की तरह पेश किया जाता था। उस वक्त जिन कार्यों पर काम चल रहा है उसे ‘कर्णिय’ और जो काम हो चुके ‘सिद्धम’ कहा जाता था।
    3. हस्तीनापुर : हस्तिनापुर महाभारत काल के कौरवों की वैभवशाली राजधानी हुआ करती थी। वर्तमान में उत्तर प्रदेश के शहर मेरठ से 22 मील उत्तर-पूर्व में गंगा की प्राचीनधारा के किनारे प्राचीन हस्तिनापुर के अवशेष मिलते हैं। यहां आज भी भूमि में दफन है पांडवों का किला, महल, मंदिर और अन्य अवशेष।
    पुरातत्वों के उत्खनन से ज्ञात होता है कि हस्तिनापुर की प्राचीन बस्ती लगभग 1000 ईसा पूर्व से पहले की थी और यह कई सदियों तक स्थित रही। दूसरी बस्ती लगभग 90 ईसा पूर्व में बसाई गई थी, जो 300 ईसा पूर्व तक रही। तीसरी बस्ती 200 ई.पू. से लगभग 200 ईस्वी तक विद्धमान थी और अंतिम बस्ती 11वीं से 14वीं शती तक विद्यमान रही। अब यहां कहीं कहीं बस्ती के अवशेष हैं और प्राचीन हस्तिनापुर के अवशेष भी बिखरे पड़े हैं। वहां भूमि में दफन पांडवों का विशालकाय एक किला भी है जो देखरेख के अभाव में नष्ट होता जा रहा है। इस किले के अंदर ही महल, मंदिर और अन्य इमारते हैं।
    4. आदिचनाल्लूर : यह स्थल भारत के तमिलनाडु के थूथुकुडी जिले में स्थित है। यहां प्राचीन काल के कई पुरातात्विक अवशेष मिले हैं, जो कई महत्वपूर्ण पुरातात्विक खोजों का स्थल रहा है। प्रारंभिक पांडियन साम्राज्य की राजधानी कोरकाई, आदिचनल्लूर से लगभग 15 किमी दूर स्थित है। आदिचनल्लूर साइट से 2004 में खोदे गए नमूनों की कार्बन डेटिंग से पता चला है कि वे 905 ईसा पूर्व और 696 ईसा पूर्व के बीच के थे। 2005 में, मानव कंकालों वाले लगभग 169 मिट्टी के कलश का पता लगाया गया था, जो कि कम से कम 3,800 साल पहले के थे। 2018 में हुई शोध के अनुसार कंकाल के अवशेषों पर 2500 ईसा पूर्व से 2200 ईसा पूर्व के तक के हैं।
    5. शिवसागर : यह स्थल असम में गुवाहाटी से लगभग 360 किलोमीटर उत्तर पूर्व में स्थित है। यह शहर देहिंग वर्षावन से घिरा हुआ है, जहां दीहिंग (ब्रह्मपुत्र) और लोहित नदियां मिलती हैं। शहर का नाम शहर के मध्य में स्थित बड़ी झील शिवसागर से मिलता है। झील अहोम राजा शिव सिंहा द्वारा बनाई गई थी। 13 वीं शताब्दी में युन्नान क्षेत्र से चीन के ताई बोलने वाले अहोम लोग इस इलाके में आए 18 वीं शताब्दी में शिवसागर अहोम साम्राज्य की राजधानी था। उस समय यह रंगपुर कहलाता था। उस काल के कई मंदिर मौजूद है। इस शहर को मंदिरों की नगरी भी कहा जाता है।

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