September 09, 2026
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    धर्म संसार / शौर्यपथ / भोजन भगवान द्वारा दिया गया प्रसाद है। अन्न को ईश्वर के समान माना जाता है। अग्नि द्वारा पकाए गए अन्न पर सबसे पहला अधिकार अग्नि का ही होता है। कभी भी अन्न का अनादर न होने पाए इसका सदैव ध्यान रखें। कहा जाता है कि अन्न के एक दाने भर से भी किसी को जीवनदान दिया जा सकता है। वास्तु में अन्न को लेकर कुछ आसान से उपाय बताए गए हैं, जिनका अपने जीवन में हमें अवश्य पालन करना चाहिए।
    भोजन ग्रहण करने से पहले भगवान को भोग अवश्य लगाएं। अन्न देवता, अन्नपूर्णा माता को धन्यवाद दें। बिना स्नान किए रसोईघर में भोजन नहीं बनाना चाहिए और भोजन बनाते समय परिवार के स्वस्थ रहने का विचार करना चाहिए। हाथ, पैर और मुंह धोने के पश्चात ही भोजन ग्रहण करें। गीले पैरों के साथ भोजन करने से स्वास्थ्य अच्छा रहता है। कभी भी टूटे या गंदे बर्तन में भोजन न करें। थाली को हाथ में उठाकर भी भोजन न करें। जमीन पर बैठकर भोजन ग्रहण करना सबसे उत्तम माना जाता है। बिस्तर पर बैठकर भोजन कभी न करें। स्वादिष्ट न होने पर भी भोजन का कभी तिरस्कार न करें। रसोईघर को हमेशा स्वच्छ रखें। रात में सोने से पहले रसोईघर को स्वच्छ कर लें। रसोईघर में कभी भी अनुपयोगी चीजें न रखें। भंडार गृह में डिब्बे या कनस्तर खाली न रहने दें। भोजन में से गाय, कुत्ते, चींटी और पक्षियों को प्रतिदिन भोजन खिलाएं। गाय को प्रतिदिन रोटी खिलाने से आर्थिक संकट दूर होते हैं। भोजन ग्रहण करते समय न तो किसी से बात करें और न ही कोई अन्य कार्य करें। घर के मुख्य द्वार के सामने रसोईघर न बनवाएं। घर में आए मेहमानों को दक्षिण या पश्चिम दिशा में बैठाकर भोजन कराएं। रसोईघर में पीने का पानी उत्तर-पूर्व दिशा में रखना चाहिए। रसोईघर में पानी और आग को कभी भी पास नहीं रखना चाहिए। डस्टबिन को रसोईघर से बाहर रखें। रसोईघर की दीवारों का रंग पीला, नारंगी या गेरूआं रखें। रसोईघर में पूजा का स्थान न बनाएं। रसोइघर में टूटे फूटे बर्तन या झाडू ना रखें। किचन में प्लाटिक के बर्तन या डिब्बे नहीं रखना चाहिए। रसोईघर में अन्नपूर्णा माता का चित्र लगाएंगे तो घर में बरकत बनी रहेगी। भोजन करने के बाद थाली में कभी हाथ न धोएं। कभी जूठन न छोड़ें। रसोईघर में नल से पानी का टपकना आर्थिक क्षति का संकेत है।

    सेहत /शौर्यपथ /सर्दियों के मौसम में हल्दी की गांठ का उपयोग सबसे अधिक लाभदायक है और यह समय हल्दी से होने वाले फायदों को कई गुना बढ़ा देता है क्योंकि कच्ची हल्दी में हल्दी पाउडर की तुलना में ज्यादा गुण होते हैं। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि कच्ची हल्दी के इस्तेमाल के दौरान निकलने वाला रंग हल्दी पाउडर की तुलना में काफी ज्यादा गाढ़ा और पक्का होता है।
    कच्ची हल्दी, अदरक की तरह दिखाई देती है। इसे ज्यूस में डालकर, दूध में उबालकर, चावल के व्यंजनों में डालकर, अचार के तौर पर, चटनी बनाकर और सूप में मिलाकर उपयोग किया जा सकता है। आइए जानते हैं हल्दी के 10 गुण -
    1. कच्ची हल्दी में कैंसर से लड़ने के गुण होते हैं। यह खासतौर पर पुरुषों में होने वाले प्रोस्टेट कैंसर के कैंसर सेल्स को बढ़ने से रोकने के साथ साथ उन्हें खत्म भी कर देती है। यह हानिकारक रेडिएशन के संपर्क में आने से होने वाले ट्यूमर से भी बचाव करती है।
    2. हल्दी में सूजन को रोकने का खास गुण होता है। इसका उपयोग गठिया रोगियों को अत्यधिक लाभ पहुंचाता है। यह शरीर के प्राकृतिक सेल्स को खत्म करने वाले फ्री रेडिकल्स को खत्म करती है और गठिया रोग में होने वाले जोडों के दर्द में लाभ पहुंचाती है।
    3. कच्ची हल्दी में इंसुलिन के स्तर को संतुलित करने का गुण होता है। इस प्रकार यह मधुमेह रोगियों के लिए बहुत लाभदायक होती है। इंसुलिन के अलावा यह ग्लूकोज को नियंत्रित करती है जिससे मधुमेह के दौरान दी जाने वाली उपचार का असर बढ़ जाता है। परंतु अगर आप जो दवाइयां ले रहे हैं बहुत बढ़े हुए स्तर (हाई डोज) की हैं तो हल्दी के उपयोग से पहले चिकित्सकीय सलाह अत्यंत आवश्यक है।
    4. शोध से साबित हो चका है कि हल्दी में लिपोपॉलीसेच्चाराइड नाम का तत्व होता है इससे शरीर में इम्यून सिस्टम मजबूत होता है। हल्दी इस तरह से शरीर में बैक्टेरिया की समस्या से बचाव करती है। यह बुखार होने से रोकती है। इसमें शरीर को फंगल इंफेक्शन से बचाने के गुण होते है।
    5. हल्दी के लगातार इस्तेमाल से कोलेस्ट्रोल सेरम का स्तर शरीर में कम बना रहता है। कोलेस्ट्रोल सेरम को नियंत्रित रखकर हल्दी शरीर को ह्रदय रोगों से सुरक्षित रखती है।
    6. कच्ची हल्दी में एंटीबैक्टीरियल और एंटी सेप्टिक गुण होते हैं। इसमें इंफेक्शन से लडने के गुण भी पाए जाते हैं। इसमें सोराइसिस जैसे त्वचा संबंधि रोगों से बचाव के गुण होते हैं।
    7. हल्दी का उपयोग त्वचा को चमकदार और स्वस्थ रखने में बहुत कारगर है। इसके एंटीसेप्टीक गुण के कारण भारतीय संस्कृति में विवाह के पूर्व पूरे शरीर पर हल्दी का उबटन लगाया जाता है।
    8. कच्ची हल्दी से बनी चाय अत्यधिक लाभकारी पेय है। इससे इम्यून सिस्टम मजबूत होता है।
    9. हल्दी में वजन कम करने का गुण पाया जाता है। इसका नियमित उपयोग से वजन कम होने की गति बढ़ जाती है।
    10. शोध से साबित होता है कि हल्दी लीवर को भी स्वस्थ रखती है। हल्दी के उपयोग से लीवर सुचारू रुप से काम करता रहता है।

    हल्दी विस्मयकारी गुणों से भरपूर है परंतु कुछ लोगों पर इसके विपरीत प्रभाव पड़ सकते हैं। जिन लोगों को हल्दी से एलर्जी है उन्हें पेट में दर्द या डायरिया जैसे लक्षण सामने आ सकते हैं। गर्भवती महिलाओं को कच्ची हल्दी के उपयोग से पहले चिकित्सकीय सलाह ले लेनी चाहिए। इससे खून का थक्का जमना भी प्रभावित हो सकता है जिससे रक्त का बहाव बढ़ जाता है अत: अगर किसी की सर्जरी होने वाली हो तो उन्हें कच्ची हल्दी का सेवन नहीं करना चाहिए।

    सेहत /शौर्यपथ /सर्दियों के मौसम में सेहत का ख्याल रखना बहुत जरूरी होता है। ताकि बीमारियों से दूर रहा जा सकें। वहीं ये जिम्मेदारी तब और बढ़ जाती है जब आप गर्भवती होती है। जी हां यदि आप गर्भवती है, तो आपको सर्दियों के मौसम में अपना विशेष ख्याल रखने की जरूरत है, क्योंकि ऐसे में सिर्फ आप अकेली नहीं है आपके साथ एक नन्ही सी जान जुड़ी है, जिसका आपको बहुत अच्छे से और समझदारी के साथ ख्याल रखना है। सर्दियों में सही आहार और कुछ महत्वपूर्ण बातों का ख्याल रखने की जरूरत होती है। तो आइए जानते हैं सर्दियों के मौसम में आपको किन बातों का ख्याल रखना चाहिए....
    सर्दियों के मौसम में खुद को एक्टिव रखने के लिए गर्भवती महिलाओं को योग करना चाहिए लेकिन ख्याल रखें कि आप किसी एक्सपर्ट की सलाह के अनुसार ही योग को अपनी दिनचर्या में शामिल करें।

    गर्भवती महिलाओं को ठंड से बचाव की जरूरत होती है। इसलिए गर्म कपड़े पहनें। ताकि आप ठंड से बचकर रह सकें। क्योंकि गर्भ में पल रहे बच्चें पर बाहर के मौसम का भी प्रभाव पड़ता है, इसलिए आपको अपनी पूरी अच्छी तरह से देखभाल करनी है। साथ ही पांव में मोजे पहनकर रखें। घर में भी चप्पल पहनकर ही घूमें।

    सेहत के लिए पौष्टिक आहार लेना बहुत जरूरी है। सर्दी में रोग-प्रतिरोधक क्षमता मजबूत रहें इसलिए अपनी डाइट का ख्याल रखें।

    सर्दियों में गर्भवती महिलाओं की स्किन काफी ड्राई हो जाती है इससे निजात पाने के लिए कोई अच्छा मॉइश्चराइजर लगाएं। इसके अलावा आप बेबी ऑयल का भी इस्तेमाल कर सकते है।
    नहाने के बाद अपने पूरे बॉडी पर बेबी ऑयल से हल्के हाथों से मसाज करके गर्म कपड़े पहन लें।
    सर्दियों के मौसम में अगर आपको जुकाम सर्दी, बुखार ऐसी कोई भी समस्या होती है, तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें। अपने हिसाब से किसी भी चीज का सेवन न करें। डॉक्टर के परामर्श के बाद ही किसी चीज का सेवन करें।

    धर्म संसार /शौर्यपथ /भारतीय पारंपरिक धार्मिक व्यवस्था में देवी-देवता मानवीय स्वरूप में स्वीकार्य हैं। चूंकि सगुण की उपासना करते हैं, इसलिए सगुण की हम मानवीय रूप में ही आराधना करते हैं। उनका जन्म होता है, विवाह होता है। परिवार होता है, निवास, वाहन, बच्चे, पसंद के फूल, फल.... मौसम, महीना... सब कुछ ठीक वैसे ही जैसे इंसान के हुआ करते हैं।
    उसी के अनुरूप देवी-देवताओं के वाहन, मास, ऋतु, पसंदीदा फल, फूल, पूजा-पद्धति... मिष्ठान्ना-नेवैद्य इन सबका का भी एक नियम है। जैसे केतकी के फूल पार्वती को चढ़ते हैं, किंतु शिव को नहीं। काला चना दुर्गा को नैवेद्य में भोग लगाया जाता है, लेकिन किसी अन्य देवता को नहीं। आइए जानें कि किस देवता को भोग में क्या प्रिय है
    विष्णु का नेवैद्य
    भगवान विष्णुजी को खीर या सूजी के हलवे का नेवैद्य बहुत पसंद है। खीर कई प्रकार से बनाई जाती है। खीर में किशमिश, बारीक कतरे हुए बादाम, बहुत थाड़ी-सी नारियल की कतरन, काजू, पिस्ता, चारौली, थोड़े से पिसे हुए मखाने, सुगंध के लिए एक इलायची, कुछ केसर और अंत में तुलसी जरूर डालें।
    उसे उत्तम प्रकार से बनाएं और फिर विष्णुजी को भोग लगाने के बाद वितरित करें। मान्यता है कि प्रति रविवार और गुरुवार को विष्णु-लक्ष्मी मंदिर में जाकर विष्णुजी को उक्त उत्तम प्रकार का भोग लगाने से दोनों प्रसन्ना होते हैं।
    शिव का भोग
    शिव को भांग और पंचामृत का नेवैद्य पसंद है। भोले को दूध, दही, शहद, शकर, घी, जलधारा से स्नान कराकर भांग-धतूरा, गंध, चंदन, फूल, रोली, वस्त्र अर्पित किए जाते हैं। शिवजी को रेवड़ी, चिरौंजी और मिश्री भी अर्पित की जाती है। श्रावण मास में शिवजी का उपवास रखकर उनको गुड़, चना और चिरौंजी के अलावा दूध अर्पित करने से सभी तरह की मनोकामना पूर्ण होती है।
    हनुमान को लगाएं भोग
    हनुमानजी को हलुआ, पंच मेवा, गुड़ से बने लड्डू या रोठ, डंठल वाला पान और केसर- भात बहुत पसंद हैं। इसके अलावा हनुमानजी को कुछ लोग इमरती भी अर्पित करते हैं। कोई व्यक्ति 5 मंगलवार कर हनुमानजी को चोला चढ़ाकर यह नैवेद्य लगाता है, तो उसके हर तरह के संकटों का अविलंब समाधान होता है।
    मां लक्ष्मी को भोग
    लक्ष्मीजी को धन की देवी माना गया है। कहते हैं कि अर्थ बिना सब व्यर्थ है। लक्ष्मीजी को प्रसन्ना करने के लिए उनके प्रिय भोग को लक्ष्मी मंदिर में जाकर अर्पित करना चाहिए। लक्ष्मीजी को सफेद और पीले रंग के मिष्ठान्ना, केसर-भात बहुत पसंद हैं।
    कम से कम 11 शुक्रवार को जो कोई भी व्यक्ति एक लाल फूल अर्पित कर लक्ष्मीजी के मंदिर में उन्हें यह भोग लगाता है तो उसके घर में हर तरह की शांति और समृद्धि रहती है। किसी भी प्रकार से धन की कमी नहीं रहती।
    दुर्गा माता को भोग
    माता दुर्गा को शक्ति की देवी माना गया है। दुर्गाजी को खीर, मालपुए, हलुआ, केले, नारियल और मिष्ठान्न बहुत पसंद हैं। नवरात्रि के मौके पर उन्हें प्रतिदिन इसका भोग लगाने से हर तरह की मनोकामना पूर्ण होती है, खासकर माताजी को सभी तरह का हलुआ बहुत पसंद है, नवरात्रि में काला चना उनके नेवैद्य का महत्वपूर्ण हिस्सा होता है। बुधवार और शुक्रवार के दिन दुर्गा मां को विशेषकर नेवैद्य अर्पित किया जाता है। माताजी के प्रसन्ना होने पर वह सभी तरह के संकट दूर होते हैं।
    सरस्वती माता भोग
    माता सरस्वती को ज्ञान की देवी माना गया है। ज्ञान कई तरह का होता है। स्मृतिदोष है तो ज्ञान किसी काम का नहीं। ज्ञान को व्यक्त करने की क्षमता नहीं है, तब भी ज्ञान किसी काम का नहीं। ज्ञान और योग्यता के बगैर जीवन में उन्नति संभव नहीं। अत: माता सरस्वती के प्रति श्रद्धा होना जरूरी है। माता सरस्वती को दूध, पंचामृत, दही, मक्खन, सफेद तिल के लड्डू तथा धान का लावा पसंद है।
    गणेश भोग
    गणेशजी को मोदक या लड्डू का नैवेद्य अच्छा लगता है। मोदक भी कई तरह के बनते हैं। महाराष्ट्र में खासतौर पर गणेश पूजा के अवसर पर घर-घर में तरह-तरह के मोदक बनाए जाते हैं। मोदक के अलावा गणेशजी को मोतीचूर के लड्डू भी पसंद हैं। शुद्ध घी से बने बेसन के लड्डू भी पसंद हैं। नारियल, तिल और सूजी के लड्डू भी उनको अर्पित किए जाते हैं।
    भगवान श्री राम भोग
    भगवान श्रीरामजी को केसर भात, खीर, धनिए का भोग आदि पसंद हैं। इसके अलावा उनको कलाकंद, बर्फी, गुलाब जामुन का भोग भी प्रिय है।
    श्रीकृष्ण भोग
    भगवान श्रीकृष्ण को माखन और मिश्री का नैवेद्य बहुत पसंद है। इसके अलावा खीर, हलुआ और मावा-मिश्री के लड्डू पसंद हैं।

    शौर्यपथ / आज हम आपको चांदी की 4 ऐसी वस्तुओं के बारे में बताएंगे जो घर की सुख और शांति को हमेशा बरकरार रखती है। घर में अमन-चमन हो जाता है। आइए जानते हैं...
    1. घर में चांदी का गिलास जरूर रखना चाहिए और इसी से पानी भी पीना चाहिए। चांदी के गिलास से पानी पीने से और इसे घर में रखने से राहु और केतु का प्रकोप कभी नहीं आता।
    2. वास्तु शास्त्र के अनुसार घर में चांदी के हाथी रखने से व्यापार में काफी लाभ होता है और व्यापार कभी घाटे में नहीं जाता।
    3. चांदी की चैन या अंगूठी पहनने से विवाह में हो रहा विलंब दूर हो जाता है।
    4. चांदी का चौकोर टुकड़ा जेब में रखने से नौकरी में आ रही समस्या हल हो जाती है और जल्द से जल्द नौकरी मिल जाती है।

    धर्म संसार /शौर्यपथ /प्रयागे माघ पर्यन्त त्रिवेणी संगमे शुभे।
    निवासः पुण्यशीलानां कल्पवासो हि कश्यते॥- (पद्‌मपुराण)
    कुंभ में सभी लोग नहीं जा पाते हैं, लेकिन जाने का सोचते जरूर हैं। यह समय दान, जप, ध्यान और संयम का समय रहता है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि कुंभ में जाए बगैर ही कैसे पुण्य लाभ कमाया जा सकता है?
    कुंभ में इस वक्त कल्पवास चल रहा है। कुंभ में जहां स्नान करने का महत्व है वहीं कल्पवास में नियम-धरम का पालन करने का महत्व है। दूसरी ओर कुंभ में प्रवचन सुन कर, दान करके और पितरों के लिए तर्पण करके भी लोग पुण्य लाभ कमाते हैं। आप चाहें तो ये सब कुछ करके भी पुण्य लाभ कमा सकते हैं-
    1.प्रतिदिन हल्दी मिले बेसन से स्नान करने के पश्चात्य सुबह-शाम संध्यावंदन करते समय भगवान विष्णु का ध्यान करें और निम्न मंत्र-क्रिया से स्वयं को पवित्र करें।

    संध्यावंदन का मंत्र :
    ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थांगतोऽपि वा।
    यः स्मरेत पुण्डरीकांक्ष से बाह्याभ्यंतरः शुचि।
    इस मंत्र से आचमन करें-
    ॐ केशवायनमः ॐ माधवाय नमः ॐ नाराणाय नमः का जाप करें।
    हाथ में नारियल, पुष्प व द्रव्य लेकर यह मंत्र पढ़ें। इसके बाद आचमन करते हुए गणेश, गंगा, यमुना, सरस्वती, त्रिवेणी, माधव, वेणीमाधव और अक्षयवट की स्तुति करें।
    2.जब तक कुंभ चल रहा हैं तब तक प्रतिदिन एक वक्त का सादा भोजन करें और मौन रहें।
    2.आप किसी योग्य व्यक्ति को दान दे सकते हैं। दान में अन्यदान, वस्त्रदान, तुलादान, फलदान, तिल या तेलदान कर सकते हैं।
    3.गाय, कुत्ते, पक्षी, कव्वा, चींटी और मछली को भोजन खिलाएं। गाय को खिलाने से घर की पीड़ा दूर होगी। कुत्ते को खिलाने से दुश्मन आपसे दूर रहेंगे। कव्वे को खिलाने से आपके पितृ प्रसंन्न रहेंगे। पक्षी को खिलाने से व्यापार-नौकरी में लाभ होगा। चींटी को खिलाने से कर्ज समाप्त होगा और मछली को खिलाने से समृद्धि बढ़ेंगी।
    4.आप संकल्प लें- किसी किसी भी तरह के व्यवसन का सेवन नहीं करूंगा, क्रोध और द्वेष वश कोई कार्य नहीं करूंगा, बुरी संगत और कुवचनों का त्याग करूंगा और सदा माता-पिता व गुरु की सेवा करूंगा।

    शौर्यपथ / आधुनिक विज्ञान के अनुसार अमीबा से लेकर मानव तक की यात्रा में लगभग 1 करोड़ 04 लाख योनियां मानी गई हैं। ब्रिटिश वैज्ञानिक राबर्ट एम.मे. के अनुसार दुनिया में 87 लाख प्रजातियां हैं। उनका अनुमान है कि कीट-पतंगे, पशु-पक्षी, पौधा-पादप, जलचर-थलचर सब मिलाकर जीव की 87 लाख प्रजातियां हैं। हिन्दू मान्यता अनुसार 84 लाख योनियों में भटकने के बाद मानव शरीर मिलता है। परंतु क्या यह सही है या कल्पित है?
    'सृष्टि के आदिकाल में न सत् था न असत्, न वायु थी न आकाश, न मृत्यु थी न अमरता, न रात थी न दिन, उस समय केवल वही था जो वायुरहित स्थिति में भी अपनी शक्ति से साँस ले रहा था। उसके अतिरिक्त कुछ भी नहीं था।'- ऋग्वेद
    वैदिक ज्ञान के अनुसार यह जगत, आत्मा वा ब्रह्म का ही दूसरा रूप है। इसका विकासक्रम आत्मा से प्रारंभ होकर ही आत्मा पर ही समाप्त होता है। मतलब आत्मा पहले सुप्त होकर पूर्व जागृत की ओर कदम बढ़ाती है। आत्मा जब खुद को आत्मस्वरूप में जान लेती है तब वह ब्रह्म में लीन हो जाती है।
    वैदिक ज्ञान के अनुसार यह संपूर्ण ब्रह्मांड पंच कोषों और पंच तत्वों वाला है।
    ब्रह्म की जगह हम समझने के लिए अत्मा को रख देते हैं। आप पांच तत्वों को तो जानते ही हैं- आकाश, वायु, अग्नि, जल और ग्रह (धरती या सूर्य)। सब सोचते हैं कि सबसे पहले ग्रहों की रचना हुई फिर उसमें जल, अग्नि और वायु की, लेकिन यह सच नहीं है।
    ग्रह या कहें की जड़ जगत की रचना सबसे अंतिम रचना है। तब सबसे पहले क्या उत्पन्न हुआ? जैसे आप सबसे पहले हैं फिर आपका शरीर सबसे अंत में। आपके और शरीर के बीच जो है आप उसे जानें। अग्नि जल, प्राण और मन। प्राण तो वायु है और मन तो आकाश है। शरीर तो जड़ जगत का हिस्सा है। अर्थात धरती का। जो भी दिखाई दे रहा है वह सब जड़ जगत है।
    नीचे गिरने का अर्थ है जड़ हो जाना और ऊपर उठने का अर्थ है ब्रह्माकाश हो जाना। अब इन पांच तत्वों से बड़कर भी कुछ है क्योंकि सृष्टि रचना में उन्हीं का सबसे बड़ा योगदान रहा है।
    पंच कोष : जड़, प्राण, मन, बुद्धि और आनंद/ अवस्था: जाग्रत, स्वप्न, सु‍षुप्ति और तुरीय।
    'एक आत्मा है जो अन्नरसमय है (जड़), एक अन्य आंतर आत्मा है, प्राणमय (वायु) जो कि उसे पूर्ण करता है- एक अन्य आंतर आत्मा है, मनोमय (मन)- एक अन्य आंतर आत्मा है, विज्ञानमय (सत्यज्ञानमय)- एक अन्य आंतर आत्मा है, आनंदमय (ब्रह्माकाश)। '-तैत्तिरीयोपनिषद
    भावार्थ : जड़ में प्राण; प्राण में मन; मन में विज्ञान और विज्ञान में आनंद। यह चेतना या आत्मा के रहने के पांच स्तर हैं। आत्मा इनमें एक साथ रहती है। यह अलग बात है कि किसे किस स्तर का अनुभव होता है। ऐसा कह सकते हैं कि यह पांच स्तर आत्मा का आवरण है। कोई भी आत्मा अपने कर्म प्रयास से इन पांचों स्तरों में से किसी भी एक स्तर का अनुभव कर उसी के प्रति आसक्त रहती है। सर्वोच्च स्तर आनंदमय है और निम्न स्तर जड़।
    अंतत: जड़ या अन्नरसमय कोष दृष्टिगोचर होता है। प्राण और मन का अनुभव होता है किंतु जाग्रत मनुष्य को ही विज्ञानमय कोष समझ में आता है। जो विज्ञानमय कोष को समझ लेता है वही उसके स्तर को भी समझता है।
    अभ्यास और जाग्रति द्वारा ही उच्च स्तर में गति होती है। अकर्मण्यता से नीचे के स्तर में चेतना गिरती जाती है। इस प्रकृति में ही उक्त पंच कोषों में आत्मा विचरण करती है किंतु जो आत्मा इन पाँचों कोष से मुक्त हो जाती है ऐसी मुक्तात्मा को ही ब्रह्मलीन कहा जाता है। यही मोक्ष की अवस्था है।
    इस तरह वेदों में जीवात्मा के पांच शरीर बताए गए हैं- जड़, प्राण, मन, विज्ञान और आनंद। इस पांच शरीर या कोष के अलग-अलग ग्रंथों में अलग-अलग नाम हैं जिसे वेद ब्रह्म कहते हैं उस ईश्वर की अनुभूति सिर्फ वही आत्मा कर सकती है जो आनंदमय शरीर में स्थित है। देवता, दानव, पितर और मानव इस हेतु सक्षम नहीं।
    आज जो मनुष्य रूप में कोई आत्मा है वह अरबों वर्ष पूर्व...जड़ होने से पहले अंधकार में सुप्तावस्था में मौजूद थी। जड़ से ही क्रमश: आगे बढ़ते हुए वह पत्थर, पौधे, जीव और अन्य प्राणियों में खुद को अभिव्यक्त करते हुए मनुष्य रूप में प्रकट हुई। अरबों वर्ष का सफर तब मिट्टी में मिल जाता है जब कोई मनुष्य पाप कर्मों से अपनी चेतना का स्तर गिराकर नीचे की योनियों में जन्म ले लेता है।

    खाना खजाना /शौर्यपथ / नाश्ते में पोहा खाना बेहद फायदेमंद है लेकिन अगर आप पोहे की कोई चटपटी रेसिपी ट्राई करना चाहते हैं, तो पोहा कटलेट ट्राई कर सकते हैं। आइए, जानते हैं रेसिपी-
    सामग्री
    पोहा- 2 कप
    उबले आलू- 3
    कद्दूकस किया पनीर- 1/4 कप
    कद्दूकस किया गाजर- 1/4 कप
    गरम मसाला पाउडर- 1/2 चम्मच
    काली मिर्च पाउडर- 1/2 चम्मच
    चाट मसाला पाउडर- 1 चम्मच
    लाल मिर्च पाउडर- 1/2 चम्मच
    बारीक कटा अदरक- 1 टुकड़ा
    बारीक कटी मिर्च- 2
    नीबू का रस- 1 चम्मच
    मैदा- 2 चम्मच
    धनिया पत्ती- 4 चम्मच
    ब्रेड क्रम्ब्स- 1/2 कप
    तेल-आवश्यकतानुसार
    नमक- स्वादानुसार
    विधि
    पोहा को पानी से कुछ सेकेंड के लिए धो लें और 10 मिनट के लिए सूखने छोड़ दें। उबले आलू का छिलका छीलकर उसे अच्छी तरह से मैश कर लें। एक बरतन में मैश्ड आलू, गाजर, पनीर, नमक, काली मिर्च पाउडर, गरम मसाला पाउडर, चाट मसाला पाउडर, लाल मिर्च पाउडर, अदरक, धनिया पत्ती, हरी मिर्च और नीबू का रस डालें। मिश्रण को अच्छी तरह से मिलाएं। अब इस मिश्रण से कटलेट तैयार कर लें। एक बाउल में मैदा डालें और उसमें पानी मिलाकर पतला पेस्ट तैयार कर लें। इस पेस्ट में थोड़ा-सा नमक और काली मिर्च पाउडर भी डालें। हर कटलेट को पहले मैदा वाले इस पेस्ट में डुबोएं और उसके बाद ब्रेड क्रम्ब्स पर रोल करें। पैन गर्म करें और उसमें हल्का-सा तेल डालकर कटलेट को दोनों ओर से सुनहरा होने तक फ्राई करें। इसे धनिया-पुदीने की चटनी के साथ सर्व करें।

    सेहत /शौर्यपथ / अखरोट का नाम सबसे पसंदीदा ड्राई फ्रूट्स में लिया जाता है। सेहत से जुड़े फायदों के साथ स्किन केयर के लिए भी अखरोट बेहद फायदेमंद है। आप अगर चेहरे पर नेचुरल ग्लो पाने के लिए महंगे प्रॉडक्ट्स का इस्तेमाल करते हैं, तो आप इन्हें छोड़कर अखरोट को स्किन केयर रूटीन में शामिल कर सकते हैं।आइए, जानते हैं अखरोट के फायदे-
    फेसपैक बनाकर करें इस्तेमाल
    एक चम्मच अखरोट का पाउडर, एक चम्मच ओलिव ऑयल, दो चम्मच गुलाब जल व आधा चम्मच शहद मिलाकर पेस्ट बना लें।
    इस पैक को अपने चेहरे पर 15 मिनट के लिए लगाकर छोड़ दें।
    फिर सूखने पर पानी से मुंह धो लें।
    बेहतर परिणाम के लिए आप यह फेसपैक सप्ताह में दो से तीन बार लगा सकते हैं।
    डार्क सर्कल के लिए
    अखरोट का तेल आपकी आंखों के नीचे आई सूजन को दूर करता है और डार्क सर्कल कम करने में मदद करता है।
    आप थोड़ा-सा अखरोट का तेल लें। तेल को गुनगुना करके इसे आंखों के नीचे काले घेरे वाले भाग पर लगाकर सो जाएं। फिर सुबह सामान्य तरीके से चेहरा धो लें। आप इस प्रक्रिया को रोज रात को तब तक दोहराएं, जब तक असर दिखना न शुरू हो जाए।
    आंखों ने नीचे की सिलवटों को दूर करें
    आप नींबू का रस, शहद, ओटमील और अखरोट का पाउडर एक साथ मिलाकर पेस्ट बना लें।
    इस पेस्ट को आंखों के नीचे लगाएं और 15-20 मिनट के लिए छोड़ दें।
    फिर पानी से धो लें।
    इस प्रक्रिया को आप सप्ताह में तीन से चार बार दोहरा सकते हैं।

    शौर्यपथ /मंचूरियन और चिली पौटेटो जैसी कई डिशेज बनाने में कॉर्न स्टार्च (कॉर्न फ्लोर) का इस्तेमाल किया जाता है।वहीं, इसका इस्तेमाल ग्रेवी को गाढ़ा करने के साथ पकौड़े को क्रिस्पी बनाने के लिए भी किया जाता है। कई लोगों को कॉर्न स्टाच और मक्के के आटे में कंफ्यूजन होती है, कॉर्न फ्लोर नाम होने की वजह से वे इसे मक्के का आटा समझ लेते हैं।ऐसे में इन दोनों में अंतर समझन बहुत जरूरी है।आज हम आपको बता रहे हैं कि आप कैसे आसान तरीके से कॉर्न फ्लोर को घर पर बना सकते हैं।आइए, जानते हैं इसका तरीका-
    मक्के का आटा और कॉर्न स्टार्च में अंतर :
    कुछ लोग मक्के के आटे को ही कॉर्न फ्लोर समझ लेते हैं।मक्के का आटा कॉर्नमील फ्लोर होता है जबकि कॉर्न फ्लोर मक्की का स्टार्च होता है, इसलिए इसे कॉर्न स्टार्च भी कहते हैं। कॉर्न फ्लोर बनाने के लिए पहले मक्के के दाने से उसका छिलका हटाया जाता है और फिर उसे पाउडर की तरह पीसकर तैयार किया जाता है जबकि मक्की का आटा मक्के के दानों को सुखाकर पीसकर तैयार हो जाता है। यह पीले या सफेद रंग का होता है।यह दरदरा या बारीक रूप में मिलता है जबकि कार्न फ्लोर सफेद या हल्के पीले रंग के पाउडर फार्म में मिलता है।
    कॉर्न स्टार्च कैसे बनाएं :
    सबसे पहले मक्के को थोड़ा पानी में डाल दें और उसे 5-6 घंटे के लिए छोड़ दें।
    फिर उसे छान लें और उसमे थोड़ा सा पानी डालकर अच्छे से पीस लें.
    फिर उसे किसी बर्तन में छान लें और उसे 10 मिनट के छोड़ दें।
    उसके कचड़े को किसी और बर्तन में निकाल लें.
    10 मिनट बाद उसे किसी पतले कपड़े से फिर छान लें.
    फिर उस पानी को 15-20 मिनट के लिए छोड़ दें।
    इसमें से कचरे को निकाल कर अलग रख दें।
    फिर धीरे-धीरे करके पानी को गिरा दें।
    फिर किसी सूखे कपड़े या टिश्यू पेपर से बचे हुए पानी को निकाल दें.
    फिर इसे किसी प्लेट में निकाल लें और उसे सूखने के लिए डाल दें।
    सूखने के बाद इसे मिक्सी जार में पीस लें।
    हमारा कॉर्न फ्लॉर बनकर तैयार है।
    इस कॉर्न फ्लोर को आप किसी शीशे के डिब्बे में रखकर तीन महीने तक इस्तेमाल कर सकते है।

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