July 24, 2026
Hindi Hindi

Login to your account

Username *
Password *
Remember Me

    सेहत /शौर्यपथ /ठंड के मौसम में आप जितना पौष्टिक आहार का सेवन करेगे उतने ही आप सेहतमंद और तंदरुस्त रहेंगे। आमतौर पर घरों में गेहूं की रोटियां ही खाई जाती है, लेकिन बाजरे की रोटी आपके सेहत के लिए बेहद फायदेमंद मानी जाती हैं। जी हां गेहूं, मक्का और ज्वार की ही तरह बाजरा काफी फायदेमंद होता है। इसमें कई पोष्टिक गुण पाएं जाते है जो आपके स्वास्थ के लिए लाभकारी होते है, खासकर ठंड में बाजरा खाना स्वास्थ्य के लिहाज से बहुत लाभदायक है। यह न केवन आपके पाचन क्रिया को सही रखता है इसके साथ ही बाजरा आपको कई बीमारियों से दूर भी रखता है, तो आइए जानते हैं। ठंड में बाजरा खाने से होने वाले फायदों के बारे में.....
    1 सर्दी के दिनों में बाजरा का सेवन शरीर में अंदरूनी गर्माहट बनाए रखने के लिए बेहद फायदेमंद होता है। यही कारण है कि ज्यातर लोग ठंड के मौसम में बााजरे
    की रोटी या अन्य व्यंजन खाना पसंद करते हैं।
    2 बाजरा कैल्शियम से भरपूर होता है, और आप किसी भी कैल्शियम विकल्प की जगह इसका सेवन कर सकते हैं। इन दिनों में होने वाली जोड़ों की समस्या व ऑस्ट‍ियोपोरासिस में यह बेहद लाभकारी है।
    3 चूंकि सर्दी में भूख अधिक लगती है और आप इन दिनों में कई तरह के व्यंजन बनाकर ज्यादा खाते भी हैं, तो वजन बढ़ना लाजमी है। लेकिन बाजरा का प्रयोग वजन कम करने में आपकी मदद करता है।
    4 इसमें भरपूर मात्रा में डायट्री फाइबर होते हैं जो पाचन में लाभकारी होते हैं और कोलेस्ट्रॉल का स्तर कम कर मोटापा घटाने में मददगार साबित होते हैं।
    5 बाजरा में ट्रायप्टोफेन अमीनो एसिड पाया जाता है, जो भूख को कम करता है। इसका सेवन सुबह के नाश्ते में करने से लंबे समय तक आपको भूख नहीं लगती और पेट भरा रहता है।

    शौर्यपथ / भारत में सैंकड़ों सरोवर हैं जिनमें से तो कुछ लुप्त हो गए हैं। 'सरोवर' का अर्थ तालाब, कुंड या ताल नहीं होता। सरोवर को आप झील कह सकते हैं। श्री नगर, जम्मू, नैनीताल, जयपुर, उदयपुर और भोपाल आदि जगहो पर आपने झीलें देखी होगी। यह बहुत ही शानदार होती है। इन सैंकड़ों झीलों में से कुछ का धार्मिक महत्व भी है जैसे मानसरोवर (तिब्बत), पुष्कर सरोवार (राजस्थान), पंपा सरोवार (कर्नाटक), नारायण सरोवर (कर्नाटक), बिंदु सरोवार (गुजरात), लोणार सरोवर (महाराष्‍ट्र), कपिल सरोवर (राजस्थान), कुसुम सरोवर (उत्तर प्रदेश), नल सरोवर (गुजरात), कृष्ण सरोवर, राम सरोवर, शुद्ध सरोवर आदि अनेक सरोवर हैं जिनका पुराणों में उल्लेख मिलता है। आओ जानते है अमृत सरोवर के बारे में।
    अमृत सरोवर (कर्नाटक) :
    अमृत सरोवार अर्थात अमरत्व प्रदान करने वाला सरोवर। अमृत सरोवर नाम से कई सरोवार है जैसे राजस्थान के मारवाड़ में और पंजाब के अमृतसर में। दोनों ही सरोवर बहुत ही महत्व के हैं। परंतु हम बात कर रहे हैं कर्नाटक के अमृत सरोवार की।
    1. कर्नाटक के नंदी हिल्स पर स्थित पर्यटकों को नंदी हिल्‍स की सैर के दौरान अमृत सरोवर की यात्रा की सलाह दी जाती है जिसका विकास बारहमासी झरने से हुआ है। इसी कारण इसे 'अमृत का तालाब' या 'अमृत की झील' भी कहा जाता है।
    2. अमृत सरोवर एक खूबसूरत जलस्रोत है, जो इस इलाके का सबसे सुंदर स्‍थल है।
    3. अमृत सरोवर सालभर पानी से भरा रहता है। यह स्‍थान रात के दौरान पानी से भरा और चांद की रोशनी में बेहद सुंदर दिखता है।
    4. योगी नंदीदेश्‍वर मंदिर, चबूतरा और श्री उर्ग नरसिम्‍हा मंदिर यहां के कुछ प्रमुख आकर्षणों में से एक है, जो अमृत सरोवर के पास स्थित हैं।
    5. पर्यटक, बेंगलुरु के रास्‍ते से अमृत सरोवर तक आसानी से पहुंच सकते हैं, जो 58 किमी की दूरी पर स्थित है।

    धर्म संसार /शौर्यपथ /देवी, अप्सरा, यक्षिणी, डाकिनी, शाकिनी और पिशाचिनी आदि में सबसे सात्विक और धर्म का मार्ग है 'देवी' की पूजा, साधना, आराधना और प्रार्थना करना। देवी को छोड़कर अन्य किसी की पूजा या प्रार्थना मान्य नहीं। हिन्दू धर्म में कई देवियां हैं उन्हीं में से एक है मनसा देवी। माता मनसा देवी कौन है? क्या वह शिव की पुत्री हैं या कि वो ऋषि कश्यप की पुत्री हैं। क्या है उनकी कहानी और कहां है उनका खास स्थान जानिए वह सभी कुछ जो आप जानता चाहते हैं।
    1. शिव पुत्री मनसा : कहते हैं कि भगवान शिव की तीन पुत्रियां हैं- अशोक सुंदरी, ज्‍योति या मां ज्‍वालामुखी और देवी वासुकी या मनसा। इनमें से शिव जी की तीसरी पुत्री यानी वासुकी को देवी पार्वती की सौतेली बेटी माना जाता है। मान्‍यता है कि कार्तिकेय की तरह ही पार्वती ने वासुकी को जन्‍म नहीं दिया था।
    2. कद्रू पुत्री मनसा : कहते हैं कि मनसा देवी का जन्म तब हुआ था, जब शिव जी का वीर्य कद्रु, जिन्हें सांपों की मां कहा जाता है, की प्रतिमा को छू गया था। इसलिए उनको शिव की पुत्री कहा जाता है।
    3. कश्यप की पुत्री : कहते हैं कि मनसा देवी भगवान शिव की मानस पुत्री है इसीलिए उन्हें मनसा कहते हैं। परंतु कई पुरातन धार्मिक ग्रंथों में इनका जन्म कश्यप के मस्तक से हुआ हैं इसीलिए मनसा कहा जाता है। कश्यप ऋषि की पत्नी है कद्रू। शिव की पुत्री होने का जिक्र स्पष्ट नहीं है इसलिए यह मान्य नहीं है। हां शिव से उन्होंने शिक्षा दीक्षा अवश्य ग्रहण की है।
    4. वासुकी की बहन : कद्रू और कश्यप के पुत्र वासुकी की बहन होने के कारण मनसा देवी को वासुकी भी कहा जाता है। वासुकी शिवजी के गले ने नाग हैं।
    5. सर्पों की देवी : मनसा देवी सर्प और कमल पर विराजित दिखाया जाता है। कहते हैं कि 7 नाग उनके रक्षण में सदैव विद्यमान हैं। उनकी गोद में उनका पुत्र आस्तिक विराजमान है। आस्तिक ने ही वासुकी को सर्प यज्ञ से बचाया था। बंगाल की लोककथाओं के अनुसार, सर्पदंश का इलाज मनसा देवी के पास होता है।
    6. हरिद्वार में है मनसा देवी का जागृत स्थान : हरिद्वार शहर में शक्ति त्रिकोण है। इसके एक कोने पर नीलपर्वत पर स्थित भगवती देवी चंडी का प्रसिद्ध स्थान है। दूसरे पर दक्षेश्वर स्थान वाली पार्वती। कहते हैं कि यहीं पर सती योग अग्नि में भस्म हुई थीं और तीसरे पर बिल्वपर्वतवासिनी मनसादेवी विराजमान हैं। यह भी कहा जाता है कि यहां पर माता सती का मन गिरा था इसलिए यह स्थान मनसा नाम से प्रसिद्ध हुआ।
    7. मनसा देवी के पति : अधिकतर जगहों पर मनसा देवी के पति का नाम ऋषि जरत्कारु बताया गया है और उनके पुत्र का नाम आस्तिक (आस्तीक) है जिसने अपनी माता की कृपा से सर्पों को जनमेयज के यज्ञ से बचाया था।
    8. मनसा देवी ने किया कठोर तप : कहते हैं कि मनसा माता ने भगवान शंकर की कठोर तपस्या करके वेदों का ज्ञान और श्रीकृष्ण मंत्र प्राप्त किया था, जो कल्पतरु मंत्र कहलाता है। इसके बाद उन्होंने राजस्थान के पुष्कर में पुन: तप किया और श्रीकृष्‍ण के दर्शन प्राप्त किए थे। भगवान श्रीकृष्‍ण ने उन्हें वरदान दिया था कि तीनों लोक में तुम्हारी पूजा होगी।
    9 . मनसा देवी की पूजा : मनसा देवी की पूजा बंगाल में गंगा दशहरा के दिन होती है जबकि कहीं-कहीं कृष्णपक्ष पंचमी को भी देवी की पूजी जाती हैं। मान्यता अनुसार पंचमी के दिन घर के आंगन में नागफनी की शाखा पर मनसा देवी की पूजा करने से विष का भय नहीं रह जाता। मनसा देवी की पूजा के बाद ही नाग पूजा होती है। आमतौर पर उनकी पूजा बिना किसी प्रतिमा या तस्‍वीर के होती है। इसकी जगह पर पेड़ की कोई डाल, मिट्टी का घड़ा या फिर मिट्टी का सांप बनाकर पूजा जाता है। चिकन पॉक्‍स या सांप काटने से बचाने के लिए उनकी पूजा होती है। बंगाल के कई मंदिरों में उनका विधिवत पूजन किया जाता है।
    10. मनसा देवी का स्वरूप : मनसा देवी को सर्प और कमल पर विराजित दिखाया जाता है। कुछ जगहों पर हंस पर विराजमान बताया गया है। कहते हैं कि 7 नाग उनके रक्षण में सदैव विद्यमान हैं। उनकी गोद में उनका पुत्र आस्तिक विराजमान है। बताया जाता है मनसा का एक नाम वासुकी भी है और पिता, सौतेली मां और पति द्वारा उपेक्ष‍ित होने की वजह से उनका स्‍वभाव काफी गुस्‍से वाला माना जाता है।

    जरत्कारुर्जगद्गौरी मनसा सिद्धयोगिनी। वैष्णवी नागभगिनी शैवी नागेश्वरी तथा ।।
    जरत्कारुप्रियाऽऽस्तीकमाता विषहरीति च। महाज्ञानयुता चैव सा देवी विश्वपूजिता ।।
    द्वादशैतानि नामानि पूजाकाले तु यः पठेत्। तस्य नागभयं नास्ति तस्य वंशोद्भवस्य च ।।-( ब्रह्म वैवर्त पुराण- प्रकृतिखण्ड अध्याय 44-46। श्लोक 15-17)

    अर्थात : ये भगवती कश्यप जी की मानसी कन्या हैं तथा मन से उद्दीप्त होती हैं, इसलिये ‘मनसा देवी’ के नाम से विख्यात हैं। आत्मा में रमण करने वाली इन सिद्धयोगिनी वैष्णव देवी ने तीन युगों तक परब्रह्म भगवान श्रीकृष्ण की तपस्या की है। गोपीपति परम प्रभु उन परमेश्वर ने इनके वस्त्र और शरीर को जीर्ण देखकर इनका ‘जरत्कारु’ नाम रख दिया। साथ ही, उन कृपानिधि ने कृपापूर्वक इनकी सभी अभिलाषाएँ पूर्ण कर दीं, इनकी पूजा का प्रचार किया और स्वयं भी इनकी पूजा की। स्वर्ग में, ब्रह्मलोक में, भूमण्डल में और पाताल में– सर्वत्र इनकी पूजा प्रचलित हुई। सम्पूर्ण जगत में ये अत्यधिक गौरवर्णा, सुन्दरी और मनोहारिणी हैं; अतएव ये साध्वी देवी ‘जगद्गौरी’ के नाम से विख्यात होकर सम्मान प्राप्त करती हैं। भगवान शिव से शिक्षा प्राप्त करने के कारण ये देवी ‘शैवी’ कहलाती हैं। भगवान विष्णु की ये अनन्य उपासिका हैं। अतएव लोग इन्हें ‘वैष्णवी’ कहते हैं। राजा जनमेजय के यज्ञ में इन्हीं के सत्प्रयत्न से नागों के प्राणों की रक्षा हुई थी, अतः इनका नाम ‘नागेश्वरी’ और ‘नागभगिनी’ पड़ गया। विष का संहार करने में परम समर्थ होने से इनका एक नाम ‘विषहरी’ है। इन्हें भगवान शंकर से योगसिद्धि प्राप्त हुई थी। अतः ये ‘सिद्धयोगिनी’ कहलाने लगीं। इन्होंने शंकर से महान गोपनीय ज्ञान एवं मृत संजीवनी नामक उत्तम विद्या प्राप्त की है, इस कारण विद्वान पुरुष इन्हें ‘महाज्ञानयुता’ कहते हैं। ये परम तपस्विनी देवी मुनिवर आस्तीक की माता हैं। अतः ये देवी जगत में सुप्रतिष्ठित होकर ‘आस्तीकमाता’ नाम से विख्यात हुई हैं। जगत्पूज्य योगी महात्मा मुनिवर जरत्कारु की प्यारी पत्नी होने के कारण ये ‘जरत्कारुप्रिया’ नाम से विख्यात हुईं।

    राजनांदगांव / शौर्यपथ / कोविड -19 के कारण शालेय विद्यार्थियों के अध्ययन-अध्यापन में बाधा के कारण शासकीय हाई, हायर सेकेण्डरी स्कूल की परीक्षा में आने वाली कठिनाइयों की दूर करने की दृष्टि से जिले में 2020-21 शिक्षा कार्ययोजना का निर्माण किया गया है। इस कार्ययोजना में 9वीं से 12वीं तक के विद्यार्थियों के लिए साप्ताहिक प्रश्न प्रदाय कर तीन दिवस के भीतर सभी विद्यार्थियों से उत्तर प्राप्त किया जाएगा। उत्तर-पुस्तिका प्राप्त होते ही उसका मूल्यांकन कर अगले तीन दिवस में त्रुटि सुधार कर संबंधित विद्यार्थी को वापस किया जाएगा। इसके लिए प्रत्येक विकासखण्ड को इकाई / विषय का विभाजन का प्रश्न-पत्र तैयार करने निर्देश दिया गया है। विकासखण्ड में तैयार प्रश्न-पत्र को जिला स्तर से व्हाट्स-अप के माध्यम से सभी प्राचार्यों को प्रेषित किया जाएगा और प्राचार्यों के माध्यम से बच्चों को उपलब्ध कराया जाएगा।
    प्रश्न-पत्र विद्यार्थियों को पहुंचाने एवं उसको हल में होने वाली कठिनाइयों को दूर करने के लिए विकासखण्ड में पदस्थ प्राथमिक से लेकर हाईए हायर सेकेण्डरी स्कूल के सभी शिक्षकों का सहयोग लिया जाएगा। जिसमें स्नातक सभी शिक्षक को सम्मिलित किये जाने हेतु विकासखण्ड शिक्षा अधिकारी को निर्देशित किया गया है।
    शिक्षा कार्ययोजना विद्यार्थियों की परीक्षा में सफलता को ध्यान रखकर बनाया गया है। जिसमें
    जिला शिक्षा अधिकारी श्री एचआर सोम, सहायक जिला परियोजना अधिकारी रामाशिमि में एसके पाण्डेय के निर्देशन में जिला नोडल अधिकारी डॉ. राजू महोबे, जिला सहयोगी प्राचार्य शासकीय उच्चतर माध्यमिक शाला सिंगाभेडी आरबी सिंग, प्राचार्य शासकीय उच्चतर माध्यमिक शाला विचारपुर श्री पीआर साहू, शासकीय उच्चतर माध्यमिक शाला देवरसुर बघेल एवं एसके जौहरी तथा समस्त विकासखण्ड शिक्षा अधिकारी तथा शिक्षा नोडल प्राचार्य को जिम्मेदारी सौंपी गई है।

    आलेख / शौर्यपथ / नवागांव सेनीटेशन पार्क मल्टीएक्टीविटी सेंटर के रूप में स्थापित है। यहां शहर की सफाई करने वाली स्वच्छता दीदी आत्मनिर्भर बन रही हैं और विभिन्न तरह के कार्यों से जुड़कर उनकी आर्थिक स्थिति मजबूत बनी है। शहर की सफाई में स्वच्छता दीदीयों का विशेष योगदान है। नवागांव सेनीटेशन पार्क शहर की सफाई के लिए एक महत्वपूर्ण केन्द्र है। जहां महत्वपूर्ण कार्य प्रणाली के जरिए व्यवस्थित तरीके से कार्य किया जा रहा है।
    नगर निगम आयुक्त श्री चंद्रकांत कौशिक ने बताया कि वार्ड क्रमांक 1 नवागांव में स्थित सेनिटेशन पार्क कुल 10.50 एकड क्षेत्रफल में विस्तृत है, जहां मणीकंचन केन्द्र (गार्बेज क्लिनिक) में डोर टू डोर प्राप्त कचरे का पृथकीकरण का कार्य किया जाता है और गीला तथा सूखा कचरा अलग किया जाता है। बेलन केन्द्र में शहर से निकलने वाले पालीथीन का बेलिंग कर उसका बण्डल बनाया जाता है। पशुपालन केन्द्र में स्वच्छता दीदीयों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए एनिमल फार्मिग का कार्य किया जा रहा है। भस्मीकरण संयंत्र (इन्सीनेटर युनिट) हजार्डयस वेस्ट का डिस्पोजल वैज्ञानिक विधि से किया जा रहा है। यह एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया है जिसमें स्वास्थ्य के लिए घातक कचरे को वैज्ञानिक विधि से नष्ट किया जाता है। कम्पोस्ट प्रोसेसिंग सेंटर में डोर टू डोर से प्राप्त गीले एवं सूखे कचरे का खाद बनाने का कार्य किया जा रहा है। निर्माण एवं विध्वंश अपशिष्ट प्रसंस्करण एवं संग्रहण केन्द्र में सी.एन.डी वेस्ट से पेपर ब्लॉक, ड्रेन कवर एवं ब्रिक्स बनाया जा रहा है। वहीं गौठान में स्वच्छता दीदी द्वारा गोबर से खाद निर्माण किया जा रहा है।
    उल्लेखनीय है कि नवागांव सेनीटेशन पार्क में फलदार एवं छायादार वृक्षों का रोपण किया गया है। ताकि आने वाले समय में पर्यावरण अच्छा रहे। साग-सब्जी उत्पादन भी यहां आर्गेनिक कृषि द्वारा की जा रही है। मलगाद युक्त संयंत्र प्रणाली (एल.एस.टी.पी प्लांट) में शहर से निकलने वाले सेप्टिक टेंक के पानी को उपचारित कर सोना-खातु निर्माण एवं सिंचाई कार्य किया जा रहा है। ठोस अपशिष्ट प्रबंधन के कार्य में स्वास्थ्य विभाग, स्वच्छता दीदी एवं निकाय के वार्डों की टीम लगी रहती है। वर्तमान में निकाय के 51 वार्डो में सड़क नाली एवं व्यावसायिक क्षेत्रों मेें सफाई हेतु कुल 566 कर्मचारी कार्यरत है। शहर के समस्त 51 वार्डो में सूखे एवं गीले कचरों को डोर टू डोर कलेक्शन किया जा रहा है और इसे निकट स्थित सेंटर में लाकर सिग्रेगेशन किया जाता है। वर्तमान में कुल 19 एसएलआरएम सेंटर एवं 1 कम्पोस्ट शेड कार्यरत है। डोर टू डोर कलेक्शन एवं एसएलआरएम सेंटर का प्रबंधन एवं सम्पूर्ण कार्य राष्ट्रीय शहरी आजीविका मिशन द्वारा बनायी गयी स्वसहायता समूह की 365 स्वच्छता दीदियों एवं 71 सफाई मित्रों द्वारा किया जा रहा है।

    आलेख / शौर्यपथ / नवागांव सेनीटेशन पार्क मल्टीएक्टीविटी सेंटर के रूप में स्थापित है। यहां शहर की सफाई करने वाली स्वच्छता दीदी आत्मनिर्भर बन रही हैं और विभिन्न तरह के कार्यों से जुड़कर उनकी आर्थिक स्थिति मजबूत बनी है। शहर की सफाई में स्वच्छता दीदीयों का विशेष योगदान है। नवागांव सेनीटेशन पार्क शहर की सफाई के लिए एक महत्वपूर्ण केन्द्र है। जहां महत्वपूर्ण कार्य प्रणाली के जरिए व्यवस्थित तरीके से कार्य किया जा रहा है।
    नगर निगम आयुक्त श्री चंद्रकांत कौशिक ने बताया कि वार्ड क्रमांक 1 नवागांव में स्थित सेनिटेशन पार्क कुल 10.50 एकड क्षेत्रफल में विस्तृत है, जहां मणीकंचन केन्द्र (गार्बेज क्लिनिक) में डोर टू डोर प्राप्त कचरे का पृथकीकरण का कार्य किया जाता है और गीला तथा सूखा कचरा अलग किया जाता है। बेलन केन्द्र में शहर से निकलने वाले पालीथीन का बेलिंग कर उसका बण्डल बनाया जाता है। पशुपालन केन्द्र में स्वच्छता दीदीयों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए एनिमल फार्मिग का कार्य किया जा रहा है। भस्मीकरण संयंत्र (इन्सीनेटर युनिट) हजार्डयस वेस्ट का डिस्पोजल वैज्ञानिक विधि से किया जा रहा है। यह एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया है जिसमें स्वास्थ्य के लिए घातक कचरे को वैज्ञानिक विधि से नष्ट किया जाता है। कम्पोस्ट प्रोसेसिंग सेंटर में डोर टू डोर से प्राप्त गीले एवं सूखे कचरे का खाद बनाने का कार्य किया जा रहा है। निर्माण एवं विध्वंश अपशिष्ट प्रसंस्करण एवं संग्रहण केन्द्र में सी.एन.डी वेस्ट से पेपर ब्लॉक, ड्रेन कवर एवं ब्रिक्स बनाया जा रहा है। वहीं गौठान में स्वच्छता दीदी द्वारा गोबर से खाद निर्माण किया जा रहा है।
    उल्लेखनीय है कि नवागांव सेनीटेशन पार्क में फलदार एवं छायादार वृक्षों का रोपण किया गया है। ताकि आने वाले समय में पर्यावरण अच्छा रहे। साग-सब्जी उत्पादन भी यहां आर्गेनिक कृषि द्वारा की जा रही है। मलगाद युक्त संयंत्र प्रणाली (एल.एस.टी.पी प्लांट) में शहर से निकलने वाले सेप्टिक टेंक के पानी को उपचारित कर सोना-खातु निर्माण एवं सिंचाई कार्य किया जा रहा है। ठोस अपशिष्ट प्रबंधन के कार्य में स्वास्थ्य विभाग, स्वच्छता दीदी एवं निकाय के वार्डों की टीम लगी रहती है। वर्तमान में निकाय के 51 वार्डो में सड़क नाली एवं व्यावसायिक क्षेत्रों मेें सफाई हेतु कुल 566 कर्मचारी कार्यरत है। शहर के समस्त 51 वार्डो में सूखे एवं गीले कचरों को डोर टू डोर कलेक्शन किया जा रहा है और इसे निकट स्थित सेंटर में लाकर सिग्रेगेशन किया जाता है। वर्तमान में कुल 19 एसएलआरएम सेंटर एवं 1 कम्पोस्ट शेड कार्यरत है। डोर टू डोर कलेक्शन एवं एसएलआरएम सेंटर का प्रबंधन एवं सम्पूर्ण कार्य राष्ट्रीय शहरी आजीविका मिशन द्वारा बनायी गयी स्वसहायता समूह की 365 स्वच्छता दीदियों एवं 71 सफाई मित्रों द्वारा किया जा रहा है।

    विशेष लेख / शौर्यपथ / छत्तीसगढ़ राज्य का भौगोलिक क्षेत्रफल 1,35,191 वर्ग किलोमीटर है जो देश के क्षेत्रफल का 4.1 प्रतिशत है। राज्य का वन क्षेत्र लगभग 59,772 किलोमीटर है जो राज्य के भौगोलिक क्षेत्र का 44.21 प्रतिशत है। ऑक्सीजन का एकमात्र स्रोत वृक्ष है। इसलिए वृक्ष पर ही हमारा जीवन आश्रित है। यदि वृक्ष ही नहीं रहेंगे तो किसी भी जीव जंतु का अस्तित्व नहीं रहेगा। नगरीय प्रशासन मंत्री डॉ शिवकुमार डहरिया ने कुछ दिन पहले ही प्रदेश के सभी 166 नगरीय निकायों के अंतर्गत होने वाले दाह संस्कार में गौ-काष्ठ के उपयोग को प्राथमिकता से करने का निर्देश जारी किया है। संयोगवश नगरीय प्रशासन मंत्री का निर्देश ठीक ऐसे समय पर आया है जब भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) द्वारा वायु प्रदूषण के चलते उतरी एवं मध्य भारतीय राज्यों में भारी आर्थिक क्षति होने की रिर्पोट जारी की जा रही थी। आईसीएमआर ने उत्तर प्रदेश और बिहार में वायु प्रदूषण की स्थिति खराब होने का जिक्र किया है। लासेंट प्लेनेटरी हेल्थ में प्रकाशित रिपोर्ट इंडिया स्टेट लेबल डिजीज बर्डन इनीसिएटिव के मुताबिक वायु प्रदूषण के कारण देश के कुल सकल घरेलू उत्पाद के 1.4 फीसदी के बराबर की क्षति हो रही है। यह बहुत चिंता का विषय है। वायु प्रदूषण को लेकर ठोस रणनीति के साथ हम सबकों आगे आना होगा। छत्तीसगढ़ की सरकार ने समय रहते वायु प्रदूषण की रोकथाम के लिए जो कदम उठाया है, वह प्रशंसनीय है। नगरीय प्रशासन द्वारा गौ काष्ठ के इस्तेमाल को नगरीय क्षेत्रों में बढ़ावा देने से एक ओर जहां वायु प्रदूषण में कमी आएगी वहीं एक दाह संस्कार के पीछे 20-20 साल के दो पेड़ कटने से बच जाएंगे। इस पहल से साल भर में लाखों पेड़ों की बलि नहीं चढ़ेगी और हमारी अर्थव्यवस्था पर भी गहरा प्रभाव नहीं पड़ेगा।

    वैसे प्रदूषण को लेकर अक्सर चर्चाएं होती है। निःसंदेह छत्तीसगढ में वायु प्रदूषण की स्थिति अन्य कई राज्यों की तुलना में बेहतर तो है लेकिन शहर सहित कुछ जिलों में स्थिति पूरी तरह से ठीक नहीं है। औद्योगिक जिला सहित शहरी इलाकों में शुद्ध वायु की कमी है। इसके लिए जरूरी है कि हम अधिक से अधिक पौधे लगाए और पेड़ों को कटने से बचाएं। छत्तीसगढ़ की सरकार ने गौ- काष्ठ के इस्तेमाल को लेकर जो आदेश जारी किया है, वह आने वाले समय में पर्यावरण संरक्षण और वृक्षों की अंधाधुंध कटाई पर रोक लगाने की दिशा में मील का पत्थर साबित होगा। यह मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल और उनके सरकार के सदस्यों की सोच थी कि नरवा, गरवा, घुरवा बाड़ी का मॉडल तैयार किया गया। इस दिशा में कदम आगे बढ़ाते हुए सरकार ने अपनी संकल्पना को साकार भी करके दिखाया। नगरीय निकाय क्षेत्रों में होने वाले दाह संस्कार और ठण्ड के दिनों में जलाए जाने वाले अलाव में लकड़ी की जगह गोबर से बने गौ-काष्ठ और कण्डे के उपयोग को जरूरी किया जाना सरकार के दूरदर्शी सोच का हिस्सा है।
    प्रदेश के लगभग सभी जिलों में इस समय गोठान संचालित किए जा रहे हैं। 6 हजार 4 सौ से अधिक गोठाने हैं। जिसमें से 166 नगरीय निकाय क्षेत्रों में 322 गोठान संचालित है। इन गोठानों में जैविक खाद के अलावा गोबर के अनेक उत्पाद बनाए जा रहे हैं। गोठानों में गौ-काष्ठ और कण्डे भी बनाए जा रहे हैं। कुल 141 स्थानों में गोबर से गौ काष्ठ बनाने मशीनें भी स्वीकृत की जा चुकी है और 104 स्थानों में यह मशीन काम भी करने लगी है। निकायों के अंतर्गत गोठानों के माध्यम से गोबर का उपयोग गौ काष्ठ बनाने में किया जा रहा है। अभी तक लगभग 2800 क्विंटल गौ काष्ठ विक्रय के लिए तैयार कर लिया गया है। सूखे गोबर से निर्मित गौ-काष्ठ एक प्रकार से गोबर की बनी लकड़ी है। इसका आकार एक से दो फीट तक लकड़ीनुमा रखा जा रहा है। गौ-काष्ठ एक प्रकार से कण्डे का वैल्यू संस्करण है। गोठानों के गोबर का बहुउपयोग होने से जहां वैकल्पिक इंर्धन का नया स्रोत विकसित हो रहा है, वहीं छत्तीसगढ़ के गांव और शहरों में रोजगार के नए अवसर भी खुलने लगे हैं। स्व-सहायता समूह की महिलाएं आत्मनिर्भर की राह में कदम बढ़ा रही है। हाल ही में सरगुजा जिले के अंबिकापुर में प्रदेश का पहला गोधन एम्पोरियम भी खुला है, जहां गोबर के उत्पादों की श्रृखंला है। प्रदेश के अन्य जिलों में भी गौ काष्ठ और गोबर के उत्पादों की मांग बढ़ती जा रही है। दीपावली में गोबर के दीये, गमले, सजावटी सामान की मांग रहती है।
    प्रदेश के गोठानों में तैयार गौ-काष्ठ और कण्डे एक वैकल्पिक और जैविक ईंधन का बड़ा जरिया बन सकता है। इसके जलने से प्रदूषण भी नहीं फैलता और इसका उत्पादन भी आसान है। नगरीय निकाय क्षेत्रो में अलाव और दाह संस्कार में लकड़ी के स्थान पर गौ काष्ठ के उपयोग को बढ़ावा देने से वैकल्पिक ईंधन के उत्पादन में गति आएगी। प्रदेश के नगरीय निकायों में ठण्ड के दिनों में लगभग 400 अलाव चौक-चौराहों पर जलाए जाते हैं। दाह संस्कार भी होते हैं। रायपुर जैसे शहर में 12 से 30 दाह संस्कार होते हैं। एक दाह संस्कार में अनुमानित 500 से 700 किलो लकड़ी का उपयोग होता है। अलाव और दाह संस्कार में लकड़ी को जलाए जाने से भारी मात्रा में कार्बन का उर्त्सन होता है, जो कि पर्यावरण के लिए अनुकूल नहीं है। यदि हम गौ काष्ठ का उपयोग लकड़ी के स्थान पर करे तो महज 300 किलों में ही दाह संस्कार किया जा सकता है। इससे प्रदूषण भी नहीं फैलता और गोबर की लकड़ी जलने से आसपास के वातावरण भी शुद्ध होते हैं। जानकारों का कहना है कि यदि हम अंतिम संस्कार में लकड़ी की जगह गौ काष्ठ का उपयोग करे तो हमारा खर्च भी कम हो जाएगा और हम 20-20 साल के दो पेड़ों को कटने से भी बचा सकते हैं। गौ सेवा की दिशा में कार्य कर रही एक पहल सेवा समिति के उपाध्यक्ष श्री रितेश अग्रवाल का कहना है कि दाह संस्कार को इको फ्रेण्डली बनाया जाना अति आवश्यक है। गौ-काष्ठ से दाह संस्कार बहुत आसान और पर्यावरण के लिए उपयोगी है। लोगों को अपनी धारणाएं बदलनी होगी ताकि हम शुद्ध हवा में सांस ले सके। अब तक अनेक दाह संस्कार में गौ काष्ठ का उपयोग कर चुके तिश अग्रवाल ने बताया कि गोबर की लकड़ी के साथ देशी घी मिलाकर जलाने से शुद्ध आक्सीजन का उत्सर्जन होता है और इससे निकलने वाले कम्पाउण्ड बारिश में सहायक होते हैं।
    गोबर में रेडिएशन अवशोषण का गुण भी होता है। इससे निर्मित उत्पाद आसानी से प्रकृति में मिल जाती है। स्वाभाविक है कि गोठानों के संचालन से प्रदेश में गौ संरक्षण को बढ़ावा मिलेगा और गोबर उत्पादों के साथ रोजगार के नये विकल्प भी बनेंगे। सरकार द्वारा गोबर को दो रुपए प्रति किलों की दर से खरीदे जाने के बाद पशुपालकों की आमदनी भी बढ़ी है। इससे आर्थिक सशक्तीकरण को भी बल मिला है। गौ काष्ठ को प्रोत्साहन दिए जाने से एक साथ अनेक फायदे होंगे। इसके निर्माण में लगे लोग इसे बेच कर आमदनी प्राप्त करेंगे और ग्रीन तथा क्लीन छत्तीसगढ़ का कान्सेप्ट भी सफल होगा। सरकार के इस प्रयास से हमें ऑक्सीजन, औषधि देने वाले, मृदा संरक्षण करने वाले, पक्षियों के बैठने की व्यवस्था, कीडे़-मकोड़े, मधुमक्खी के छत्ते से वातावरण को अनुकूलन बनाने वाले वृक्षों के साथ पशु-पक्षियों को भी संरक्षण मिलेगा। वैकल्पिक ईंधन के रूप में उपयोग बढ़ने से इसका व्यावसायिक उपयोग भी बढ़ेगा, जो हमारी अर्थव्यवस्था को सशक्त बनाने के साथ पर्यावरण अंसतुलन के खतरे को कम करने में मील का पत्थर साबित होगा।

    सेहत /शौर्यपथ / पपीते के कई सेहत लाभ आपने जरूर सुने होंगे। यह आपको स्वस्थ रखने से लेकर आपकी खूबसूरती को निखारने तक का काम करता है। इसे ऑलराउंडर फ्रूट कहना गलत नहीं होगा। पपीता काफी फायदेमंद होता है। पाचन संबंधी परेशानी हो या कब्ज की समस्या, पपीता इन सभी समस्याओं से राहत दिलाने के काम आता है। लेकिन इसके अत्यधिक सेवन से कुछ दुष्प्रभाव भी होते हैं।
    आइए इस लेख में जानते हैं पपीते से होने वाले लाभ और नुकसान के बारे में।
    पपीते से होने वाले लाभ
    पपीते से निकलने वाला रस अपने वजन से 100 गुना प्रोटीन बहुत जल्द पचा देता है जिससे अमाशय तथा आंत संबंधी विकारों में बहुत लाभ मिलता है। कब्ज व कफ के रोग में यह लाभकारी है। गरिष्ठ पदार्थ को आसानी से पचाता है।
    पपीते के नियमित उपयोग से शरीर में इन विटामिनों की कमी नहीं रहती। इसमें पेप्सिन नामक तत्व पाया जाता है, जो बहुत ही पाचक होता है। यह पेप्सिन प्राप्त करने का एकमात्र साधन है।
    पपीते का रस प्रोटीन को आसानी से पचा देता है इसलिए पपीता पेट एवं आंत संबंधी विकारों में बहुत ही लाभदायक है। पपीते में पाया जाने वाला विटामिन 'ए' त्वचा एवं नेत्रों के लिए बहुत आवश्यक होता है। इस विटामिन से त्वचा स्वस्थ, स्वच्छ और चमकदार रहती है।
    पपीते में कैल्शियम भी अच्छी मात्रा में होता है, जो रक्त एवं तंतुओं के निर्माण एवं हृदय, नाड़ियों तथा पेशियों की क्रिया ठीक रहने में सहायक होता है। बच्चों की वृद्धि और रोगों से बचाव की क्षमता बढ़ाने में भी विटामिन 'ए' की आवश्यकता रहती है।
    पपीते से होने वाले नुकसान
    गर्भवती महिलाओं को पपीता खाने से बचने की सलाह दी जाती है, क्योंकि पपीते के बीज और जड़ भ्रूण को नुकसान पहुंचा सकते हैं इसलिए गर्भवती महिलाओं को पपीते का सेवन नहीं करना चाहिए। इससे होने वाले बच्चे को नुकसान पहुंच सकता है।
    पपीते के सेवन से कब्ज संबंधी समस्या से राहत मिलती है लेकिन इसका अधिक सेवन भी आपके पेट के लिए नुकसानदाक साबित हो सकता है।
    अत्यधिक मात्रा में पपीते का सेवन करने से अस्थमा और जोर-जोर से सांस लेना, सांस लेने में परेशानी जैसी विभिन्न श्वसन संबंधी समस्या हो सकती है।
    पपीते के अत्यधिक सेवन से एलर्जी भी हो सकती है। खुजली, चकत्ते पड़ना जैसी समस्याएं भी इसके ज्यादा सेवन से हो सकती हैं।

    सेहत /शौर्यपथ / नींबू सेहत और सौंदर्य दोनों के लिए काफी लाभकारी माना जाता है, इसके नियमित सेवन से जहां आप अपने बढ़ते वजन को कंट्रोल कर सकते है वहीं
    इसे चेहरे पर लगाने से आप दाग-धब्बों से भी छुटकारा पा सकते है। तो आइए जानते हैं ऐसे ही 10 गजब के फायदों के बारे में.....
    1नींबू आपका मोटापा कम करने में बेहद कारगर साबित होता है। गरम पानी में नींबू और शहद जहां मोटापा कम करेगा वहीं आपको भरपूर एनर्जी भी देगा। इतना ही नहीं, यह आपके शरीर के आंतरिक अंगों की सफाई में बहुत उपयोगी साबित होता है।
    2नींबू के रस के साथ सेंधा नमक मिलाकर पीने से आपको किडनी स्टोन से छुटकारा मिल सकता है। वहीं नींबू का छिलका पीसकर माथे पर लेप लगाने से मइग्रेन के दर्द में राहत मिलती है।
    3नींबू के बीजों को पीसकर सिर पर लगाने से गंजापन दूर होता है और नए बाल उगने लगते हैं। इसके अलावा किसी प्रकार का घाव हो जाने पर नींबू के रस को बादाम के तेल के साथ मिलाकर लगाना बहुत फायदेमंद होता है।
    4चंदन और नींबू के रस के लेप को चेहरे पर लगाने से मुहांसे दूर होते हैं, और आपका चेहरा साफ, बेदाग और चमकदार हो जाता है। नींबू के रस को बेसन के साथ चेहरे पर लगाने से रंग निखरता है।
    5नींबू का रस ब्लडप्रशर को कंट्रोल में रखने में मदद करता है। गरम पानी में नींबू निचो़ड़कर पीने से गले की खराबी दूर होती है। साथ ही अगर किसी जहरीले जीव-जन्तु ने काट लिया हो, तो वहां नींबू का रस लगाने से जहर का असर नहीं होता।
    6पेट में गैस बनना या अपचा होने जैसी समस्याओं में भी नींबू पानी पीना बेहद कारगर होता है। इसके साथ काले नमक का प्रयोग करना काफी लाभ देता है।
    7दांतों का पीलापन हटाने के लिए नींबू को काटकर नमक के साथ दांतों पर रगड़ना बहुत असरकारक होता है। इससे दांतों का पीलापन कम होता है और दांत चमकने लगते हैं।
    8दाद या खुजली होने पर, नींबू के रस में नौसादर को पीसकर लगाने से यह समस्या समाप्त हो सकती है। यह त्वचा संबंधी रोगों की विकृतियों को खत्म करने में सहायक होता है।
    9मसूढ़ों में परेशानी होने पर भी नींबू आपकी मदद कर सकता है। मसूढ़ों से खून रिसने पर नींबू का रस लगाने से आराम मिलता है और मसूढ़े ठीक होते हैं।
    10नाखूनों पर नींबू रगड़ने से वे साफ, मजबूत और चमकदार बनते हैं। अगर आपको कोहनी या हाथों का कालापन कम करना है, तो आप नींबू रगड़कर इसे कम कर सकते हैं।

    सेहत /शौर्यपथ /खाने में स्वाद और महक के लिए हींग का प्रयोग विशेष तौर पर किया जाता है और पेट के लिए भी इसे काफी फायदेमंद माना जाता है। वैसे सेहत के लिए हींग के एक नहीं बल्कि कई फायदे हैं। यकीन नहीं होता तो, जानिए यह 5 खास फायदे -
    1) कब्ज की शिकायत होने पर हींग का प्रयोग लाभ देगा। रात को सोने से पहले हींग के चूर्ण को पानी में मिलाकर पिएं और सुबह देखें असर। सुबह पेट पूरी तरह से साफ हो जाएगा।
    2)अगर भूख नहीं लगती या भूख लगना कम हो गया है, तो भोजन करने से पहले हींग को घी में भूनकर अदरक और मक्खन के साथ लेने से फायदा होगा और भूख खुलकर लगेगी।
    3) त्वचा में कांच, कांटा या कोई नुकीली चीज चुभ जाए और निकालने में परेशानी आ रही हो, तो उस स्थान पर हींग का पानी या लेप लगाएं। चुभी हुई चीज अपने आप ही बाहर निकल आएगी।
    4) अगर कान में दर्द हो रहा हो, तो तिल के तेल में हींग को गर्म करके, उस तेल की एक-दो बूंद कान में डालने से कान का दर्द पूरी तरह से ठीक हो जाएगा।
    5) दांतों में कैविटी होने पर भी हींग आपके लिए काम की चीज साबित हो सकता है। अगर दांतों में कीड़े हैं, तो रात को दांतों में हींग लगाकर या दबार सो जाएं। कीड़े अपने आप निकल आएंगे।

    हमारा शौर्य

    हमारे बारे मे

    whatsapp-image-2020-06-03-at-11.08.16-pm.jpeg
     
    CHIEF EDITOR -  SHARAD PANSARI
    CONTECT NO.  -  8962936808
    EMAIL ID         -  shouryapath12@gmail.com
    Address           -  SHOURYA NIWAS, SARSWATI GYAN MANDIR SCHOOL, SUBHASH NAGAR, KASARIDIH - DURG ( CHHATTISGARH )
    LEGAL ADVISOR - DEEPAK KHOBRAGADE (ADVOCATE)
    © 2015 Shouryapath. All Rights Reserved. Designed By Global Vision