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शौर्यपथ / कोरोना वायरस महामारी और कड़कड़ाती ठंंड के बीच इम्युनिटी पावर को मजबूत बनाना सबसे जरूरी है। ऐसे में आप रोग प्रतिरोधक क्षमता मजबूत करने के लिए कोई खास प्रयास करने की जरुरत नहीं बल्कि आपको बस डाइट में कुछ चीजों को जोड़ते हुए इसकी मात्रा बढ़ानी होगी। जैसे, चाय का इस्तेमाल थकान उतारने या नींद भगाने के लिए सबसे ज्यादा किया जाता है लेकिन क्या आप जानते हैं कि चाय आपकी रोग प्रतिरोधक क्षमता को भी बूस्ट करता है। ऐसी कई चीजें हैं जिनका इस्तेमाल हम रोजाना करते हैं। आइए, जानते हैं इनके बारे में-
विटामिन-सी युक्त फल
शरीर में रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए आपको एंटी ऑक्सीडेंट युक्त फलों और सब्जियों का सेवन करना चाहिए। इसके लिए आपको संतरा, किवी,चेरी, अमरुद, लीची, नीबू को अपनी डाइट में शामिल करना चाहिए। विटामिन सी शरीर में सफेद रक्त कोशिकाओं को बढ़ाने में मदद करता है।
हल्दी
भारतीय परिवेश में हल्दी ऐसा मसाला है, जो ज्यादातर घरों में इस्तेमाल होता है। ऐसे में हल्दी का फायदा बढ़ाने के लिए आपको हल्दी वाली चाय का सेवन भी शुरु कर देना चाहिए। साथ ही रात को सोते वक्त हल्दी वाला दूध पीने से आपकी रोग प्रतिरोधक क्षमता पर सकारात्मक असर होगा।
दही
रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए दही भी काफी असरदायक है। खाने के साथ रोजाना दही का इस्तेमाल आपको कई बीमारियों से बचाता है। आप दही को ज्यादा सेहतभरा और जायकेदार बनाना चाहते हैं, तो इससे फल मिला सकते हैं।
चाय
सर्दियों में चाय पीना बहुत फायदेमंद है, इससे आपकी हल्की-फुल्की थकान गायब होने के साथ गले में खराश, जुकाम जैसी कई छोटी-मोटी बीमारियां भी दूर होती हैं।
दालचीनी
दालचीनी सिर्फ एक मसाला ही नहीं बल्कि कई रोगों पर वार भी करता है। खाने में दालचीनी के इस्तेमाल से आपके शरीर में रोगों से लड़ने की क्षमता बढ़ जाती है।
सेहत /शौर्यपथ /ठंड के मौसम में सर्दी जुकाम ये एक आम समस्या बन जाती है। जिसके लिए हम तरह-तरह के उपाय करते हैं, लेकिन क्या आप भाप से होने वाले फायदों के बारे में जानते हैं? दरसअल भाप आपको सेहत और सौंदर्य दोनों ही फायदे पहुंचाती है। अगर आप अपनी त्वचा में चमक लाना चाहते हैं, तो भाप आपकी इस चाहत को पूरा कर सकती है। वहीं सर्दी के मौसम में जुकाम से परेशान है, तो स्टीम लेने से आपको राहत मिलेगी तो आइए जानते हैं ऐसे ही बेहतरीन फायदों के बारे में.....
1 सर्दी-जुकाम और कफ होने की स्थिति में भाप लेना रामबाण उपाय है। भाप लेने से न केवल आपकी सर्दी ठीक होगी बल्कि गले में जमा हुआ कफ भी आसानी से निकल सकेगा और आपको किसी तरह की परेशानी नहीं होगी।
2 त्वचा की गंदगी को हटाकर अंदर तक त्वचा की सफाई करने और त्वचा को प्राकृतिक चमक प्रदान करने के लिए भाप लेना एक बेहतरीन तरीका है। बगैर किसी मेकअप प्रोडक्ट का इस्तेमाल किए यह तरीका आपकी स्किन को ग्लोइंग बना सकता है।
3 अस्थमा जैसी स्वास्थ्य समस्याओं में भी भाप लेना काफी फायदेमंद साबित होता है। डॉक्टर्स ऐसी परिस्थति में भाप लेने की सलाह देते हैं, ताकि मरीज को राहत की सांस मिल सके।
4 चेहरे की मृत त्वचा को हटाने एवं झुर्रियों को कम करने के लिए भी भाप लेना एक बढ़िया उपाय है। यह आपकी त्वचा को ताजगी देता है, जिससे आप तरोताजा नजर आते हैं। त्वचा की नमी भी बरकरार रहती है।
5 अगर चेहरे पर मुंहासे हैं, तो बिना देर किए चेहरे को भाप दीजिए। इससे रोमछिद्रों में जमी गंदगी और सीबम आसानी से निकल पाएगा और आपकी त्वचा साफ हो पाएगी।
सेहत /शौर्यपथ /ठंड के मौसम में आप जितना पौष्टिक आहार का सेवन करेगे उतने ही आप सेहतमंद और तंदरुस्त रहेंगे। आमतौर पर घरों में गेहूं की रोटियां ही खाई जाती है, लेकिन बाजरे की रोटी आपके सेहत के लिए बेहद फायदेमंद मानी जाती हैं। जी हां गेहूं, मक्का और ज्वार की ही तरह बाजरा काफी फायदेमंद होता है। इसमें कई पोष्टिक गुण पाएं जाते है जो आपके स्वास्थ के लिए लाभकारी होते है, खासकर ठंड में बाजरा खाना स्वास्थ्य के लिहाज से बहुत लाभदायक है। यह न केवन आपके पाचन क्रिया को सही रखता है इसके साथ ही बाजरा आपको कई बीमारियों से दूर भी रखता है, तो आइए जानते हैं। ठंड में बाजरा खाने से होने वाले फायदों के बारे में.....
1 सर्दी के दिनों में बाजरा का सेवन शरीर में अंदरूनी गर्माहट बनाए रखने के लिए बेहद फायदेमंद होता है। यही कारण है कि ज्यातर लोग ठंड के मौसम में बााजरे
की रोटी या अन्य व्यंजन खाना पसंद करते हैं।
2 बाजरा कैल्शियम से भरपूर होता है, और आप किसी भी कैल्शियम विकल्प की जगह इसका सेवन कर सकते हैं। इन दिनों में होने वाली जोड़ों की समस्या व ऑस्टियोपोरासिस में यह बेहद लाभकारी है।
3 चूंकि सर्दी में भूख अधिक लगती है और आप इन दिनों में कई तरह के व्यंजन बनाकर ज्यादा खाते भी हैं, तो वजन बढ़ना लाजमी है। लेकिन बाजरा का प्रयोग वजन कम करने में आपकी मदद करता है।
4 इसमें भरपूर मात्रा में डायट्री फाइबर होते हैं जो पाचन में लाभकारी होते हैं और कोलेस्ट्रॉल का स्तर कम कर मोटापा घटाने में मददगार साबित होते हैं।
5 बाजरा में ट्रायप्टोफेन अमीनो एसिड पाया जाता है, जो भूख को कम करता है। इसका सेवन सुबह के नाश्ते में करने से लंबे समय तक आपको भूख नहीं लगती और पेट भरा रहता है।
शौर्यपथ / भारत में सैंकड़ों सरोवर हैं जिनमें से तो कुछ लुप्त हो गए हैं। 'सरोवर' का अर्थ तालाब, कुंड या ताल नहीं होता। सरोवर को आप झील कह सकते हैं। श्री नगर, जम्मू, नैनीताल, जयपुर, उदयपुर और भोपाल आदि जगहो पर आपने झीलें देखी होगी। यह बहुत ही शानदार होती है। इन सैंकड़ों झीलों में से कुछ का धार्मिक महत्व भी है जैसे मानसरोवर (तिब्बत), पुष्कर सरोवार (राजस्थान), पंपा सरोवार (कर्नाटक), नारायण सरोवर (कर्नाटक), बिंदु सरोवार (गुजरात), लोणार सरोवर (महाराष्ट्र), कपिल सरोवर (राजस्थान), कुसुम सरोवर (उत्तर प्रदेश), नल सरोवर (गुजरात), कृष्ण सरोवर, राम सरोवर, शुद्ध सरोवर आदि अनेक सरोवर हैं जिनका पुराणों में उल्लेख मिलता है। आओ जानते है अमृत सरोवर के बारे में।
अमृत सरोवर (कर्नाटक) :
अमृत सरोवार अर्थात अमरत्व प्रदान करने वाला सरोवर। अमृत सरोवर नाम से कई सरोवार है जैसे राजस्थान के मारवाड़ में और पंजाब के अमृतसर में। दोनों ही सरोवर बहुत ही महत्व के हैं। परंतु हम बात कर रहे हैं कर्नाटक के अमृत सरोवार की।
1. कर्नाटक के नंदी हिल्स पर स्थित पर्यटकों को नंदी हिल्स की सैर के दौरान अमृत सरोवर की यात्रा की सलाह दी जाती है जिसका विकास बारहमासी झरने से हुआ है। इसी कारण इसे 'अमृत का तालाब' या 'अमृत की झील' भी कहा जाता है।
2. अमृत सरोवर एक खूबसूरत जलस्रोत है, जो इस इलाके का सबसे सुंदर स्थल है।
3. अमृत सरोवर सालभर पानी से भरा रहता है। यह स्थान रात के दौरान पानी से भरा और चांद की रोशनी में बेहद सुंदर दिखता है।
4. योगी नंदीदेश्वर मंदिर, चबूतरा और श्री उर्ग नरसिम्हा मंदिर यहां के कुछ प्रमुख आकर्षणों में से एक है, जो अमृत सरोवर के पास स्थित हैं।
5. पर्यटक, बेंगलुरु के रास्ते से अमृत सरोवर तक आसानी से पहुंच सकते हैं, जो 58 किमी की दूरी पर स्थित है।
धर्म संसार /शौर्यपथ /देवी, अप्सरा, यक्षिणी, डाकिनी, शाकिनी और पिशाचिनी आदि में सबसे सात्विक और धर्म का मार्ग है 'देवी' की पूजा, साधना, आराधना और प्रार्थना करना। देवी को छोड़कर अन्य किसी की पूजा या प्रार्थना मान्य नहीं। हिन्दू धर्म में कई देवियां हैं उन्हीं में से एक है मनसा देवी। माता मनसा देवी कौन है? क्या वह शिव की पुत्री हैं या कि वो ऋषि कश्यप की पुत्री हैं। क्या है उनकी कहानी और कहां है उनका खास स्थान जानिए वह सभी कुछ जो आप जानता चाहते हैं।
1. शिव पुत्री मनसा : कहते हैं कि भगवान शिव की तीन पुत्रियां हैं- अशोक सुंदरी, ज्योति या मां ज्वालामुखी और देवी वासुकी या मनसा। इनमें से शिव जी की तीसरी पुत्री यानी वासुकी को देवी पार्वती की सौतेली बेटी माना जाता है। मान्यता है कि कार्तिकेय की तरह ही पार्वती ने वासुकी को जन्म नहीं दिया था।
2. कद्रू पुत्री मनसा : कहते हैं कि मनसा देवी का जन्म तब हुआ था, जब शिव जी का वीर्य कद्रु, जिन्हें सांपों की मां कहा जाता है, की प्रतिमा को छू गया था। इसलिए उनको शिव की पुत्री कहा जाता है।
3. कश्यप की पुत्री : कहते हैं कि मनसा देवी भगवान शिव की मानस पुत्री है इसीलिए उन्हें मनसा कहते हैं। परंतु कई पुरातन धार्मिक ग्रंथों में इनका जन्म कश्यप के मस्तक से हुआ हैं इसीलिए मनसा कहा जाता है। कश्यप ऋषि की पत्नी है कद्रू। शिव की पुत्री होने का जिक्र स्पष्ट नहीं है इसलिए यह मान्य नहीं है। हां शिव से उन्होंने शिक्षा दीक्षा अवश्य ग्रहण की है।
4. वासुकी की बहन : कद्रू और कश्यप के पुत्र वासुकी की बहन होने के कारण मनसा देवी को वासुकी भी कहा जाता है। वासुकी शिवजी के गले ने नाग हैं।
5. सर्पों की देवी : मनसा देवी सर्प और कमल पर विराजित दिखाया जाता है। कहते हैं कि 7 नाग उनके रक्षण में सदैव विद्यमान हैं। उनकी गोद में उनका पुत्र आस्तिक विराजमान है। आस्तिक ने ही वासुकी को सर्प यज्ञ से बचाया था। बंगाल की लोककथाओं के अनुसार, सर्पदंश का इलाज मनसा देवी के पास होता है।
6. हरिद्वार में है मनसा देवी का जागृत स्थान : हरिद्वार शहर में शक्ति त्रिकोण है। इसके एक कोने पर नीलपर्वत पर स्थित भगवती देवी चंडी का प्रसिद्ध स्थान है। दूसरे पर दक्षेश्वर स्थान वाली पार्वती। कहते हैं कि यहीं पर सती योग अग्नि में भस्म हुई थीं और तीसरे पर बिल्वपर्वतवासिनी मनसादेवी विराजमान हैं। यह भी कहा जाता है कि यहां पर माता सती का मन गिरा था इसलिए यह स्थान मनसा नाम से प्रसिद्ध हुआ।
7. मनसा देवी के पति : अधिकतर जगहों पर मनसा देवी के पति का नाम ऋषि जरत्कारु बताया गया है और उनके पुत्र का नाम आस्तिक (आस्तीक) है जिसने अपनी माता की कृपा से सर्पों को जनमेयज के यज्ञ से बचाया था।
8. मनसा देवी ने किया कठोर तप : कहते हैं कि मनसा माता ने भगवान शंकर की कठोर तपस्या करके वेदों का ज्ञान और श्रीकृष्ण मंत्र प्राप्त किया था, जो कल्पतरु मंत्र कहलाता है। इसके बाद उन्होंने राजस्थान के पुष्कर में पुन: तप किया और श्रीकृष्ण के दर्शन प्राप्त किए थे। भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें वरदान दिया था कि तीनों लोक में तुम्हारी पूजा होगी।
9 . मनसा देवी की पूजा : मनसा देवी की पूजा बंगाल में गंगा दशहरा के दिन होती है जबकि कहीं-कहीं कृष्णपक्ष पंचमी को भी देवी की पूजी जाती हैं। मान्यता अनुसार पंचमी के दिन घर के आंगन में नागफनी की शाखा पर मनसा देवी की पूजा करने से विष का भय नहीं रह जाता। मनसा देवी की पूजा के बाद ही नाग पूजा होती है। आमतौर पर उनकी पूजा बिना किसी प्रतिमा या तस्वीर के होती है। इसकी जगह पर पेड़ की कोई डाल, मिट्टी का घड़ा या फिर मिट्टी का सांप बनाकर पूजा जाता है। चिकन पॉक्स या सांप काटने से बचाने के लिए उनकी पूजा होती है। बंगाल के कई मंदिरों में उनका विधिवत पूजन किया जाता है।
10. मनसा देवी का स्वरूप : मनसा देवी को सर्प और कमल पर विराजित दिखाया जाता है। कुछ जगहों पर हंस पर विराजमान बताया गया है। कहते हैं कि 7 नाग उनके रक्षण में सदैव विद्यमान हैं। उनकी गोद में उनका पुत्र आस्तिक विराजमान है। बताया जाता है मनसा का एक नाम वासुकी भी है और पिता, सौतेली मां और पति द्वारा उपेक्षित होने की वजह से उनका स्वभाव काफी गुस्से वाला माना जाता है।
जरत्कारुर्जगद्गौरी मनसा सिद्धयोगिनी। वैष्णवी नागभगिनी शैवी नागेश्वरी तथा ।।
जरत्कारुप्रियाऽऽस्तीकमाता विषहरीति च। महाज्ञानयुता चैव सा देवी विश्वपूजिता ।।
द्वादशैतानि नामानि पूजाकाले तु यः पठेत्। तस्य नागभयं नास्ति तस्य वंशोद्भवस्य च ।।-( ब्रह्म वैवर्त पुराण- प्रकृतिखण्ड अध्याय 44-46। श्लोक 15-17)
अर्थात : ये भगवती कश्यप जी की मानसी कन्या हैं तथा मन से उद्दीप्त होती हैं, इसलिये ‘मनसा देवी’ के नाम से विख्यात हैं। आत्मा में रमण करने वाली इन सिद्धयोगिनी वैष्णव देवी ने तीन युगों तक परब्रह्म भगवान श्रीकृष्ण की तपस्या की है। गोपीपति परम प्रभु उन परमेश्वर ने इनके वस्त्र और शरीर को जीर्ण देखकर इनका ‘जरत्कारु’ नाम रख दिया। साथ ही, उन कृपानिधि ने कृपापूर्वक इनकी सभी अभिलाषाएँ पूर्ण कर दीं, इनकी पूजा का प्रचार किया और स्वयं भी इनकी पूजा की। स्वर्ग में, ब्रह्मलोक में, भूमण्डल में और पाताल में– सर्वत्र इनकी पूजा प्रचलित हुई। सम्पूर्ण जगत में ये अत्यधिक गौरवर्णा, सुन्दरी और मनोहारिणी हैं; अतएव ये साध्वी देवी ‘जगद्गौरी’ के नाम से विख्यात होकर सम्मान प्राप्त करती हैं। भगवान शिव से शिक्षा प्राप्त करने के कारण ये देवी ‘शैवी’ कहलाती हैं। भगवान विष्णु की ये अनन्य उपासिका हैं। अतएव लोग इन्हें ‘वैष्णवी’ कहते हैं। राजा जनमेजय के यज्ञ में इन्हीं के सत्प्रयत्न से नागों के प्राणों की रक्षा हुई थी, अतः इनका नाम ‘नागेश्वरी’ और ‘नागभगिनी’ पड़ गया। विष का संहार करने में परम समर्थ होने से इनका एक नाम ‘विषहरी’ है। इन्हें भगवान शंकर से योगसिद्धि प्राप्त हुई थी। अतः ये ‘सिद्धयोगिनी’ कहलाने लगीं। इन्होंने शंकर से महान गोपनीय ज्ञान एवं मृत संजीवनी नामक उत्तम विद्या प्राप्त की है, इस कारण विद्वान पुरुष इन्हें ‘महाज्ञानयुता’ कहते हैं। ये परम तपस्विनी देवी मुनिवर आस्तीक की माता हैं। अतः ये देवी जगत में सुप्रतिष्ठित होकर ‘आस्तीकमाता’ नाम से विख्यात हुई हैं। जगत्पूज्य योगी महात्मा मुनिवर जरत्कारु की प्यारी पत्नी होने के कारण ये ‘जरत्कारुप्रिया’ नाम से विख्यात हुईं।
राजनांदगांव / शौर्यपथ / कोविड -19 के कारण शालेय विद्यार्थियों के अध्ययन-अध्यापन में बाधा के कारण शासकीय हाई, हायर सेकेण्डरी स्कूल की परीक्षा में आने वाली कठिनाइयों की दूर करने की दृष्टि से जिले में 2020-21 शिक्षा कार्ययोजना का निर्माण किया गया है। इस कार्ययोजना में 9वीं से 12वीं तक के विद्यार्थियों के लिए साप्ताहिक प्रश्न प्रदाय कर तीन दिवस के भीतर सभी विद्यार्थियों से उत्तर प्राप्त किया जाएगा। उत्तर-पुस्तिका प्राप्त होते ही उसका मूल्यांकन कर अगले तीन दिवस में त्रुटि सुधार कर संबंधित विद्यार्थी को वापस किया जाएगा। इसके लिए प्रत्येक विकासखण्ड को इकाई / विषय का विभाजन का प्रश्न-पत्र तैयार करने निर्देश दिया गया है। विकासखण्ड में तैयार प्रश्न-पत्र को जिला स्तर से व्हाट्स-अप के माध्यम से सभी प्राचार्यों को प्रेषित किया जाएगा और प्राचार्यों के माध्यम से बच्चों को उपलब्ध कराया जाएगा।
प्रश्न-पत्र विद्यार्थियों को पहुंचाने एवं उसको हल में होने वाली कठिनाइयों को दूर करने के लिए विकासखण्ड में पदस्थ प्राथमिक से लेकर हाईए हायर सेकेण्डरी स्कूल के सभी शिक्षकों का सहयोग लिया जाएगा। जिसमें स्नातक सभी शिक्षक को सम्मिलित किये जाने हेतु विकासखण्ड शिक्षा अधिकारी को निर्देशित किया गया है।
शिक्षा कार्ययोजना विद्यार्थियों की परीक्षा में सफलता को ध्यान रखकर बनाया गया है। जिसमें
जिला शिक्षा अधिकारी श्री एचआर सोम, सहायक जिला परियोजना अधिकारी रामाशिमि में एसके पाण्डेय के निर्देशन में जिला नोडल अधिकारी डॉ. राजू महोबे, जिला सहयोगी प्राचार्य शासकीय उच्चतर माध्यमिक शाला सिंगाभेडी आरबी सिंग, प्राचार्य शासकीय उच्चतर माध्यमिक शाला विचारपुर श्री पीआर साहू, शासकीय उच्चतर माध्यमिक शाला देवरसुर बघेल एवं एसके जौहरी तथा समस्त विकासखण्ड शिक्षा अधिकारी तथा शिक्षा नोडल प्राचार्य को जिम्मेदारी सौंपी गई है।
आलेख / शौर्यपथ / नवागांव सेनीटेशन पार्क मल्टीएक्टीविटी सेंटर के रूप में स्थापित है। यहां शहर की सफाई करने वाली स्वच्छता दीदी आत्मनिर्भर बन रही हैं और विभिन्न तरह के कार्यों से जुड़कर उनकी आर्थिक स्थिति मजबूत बनी है। शहर की सफाई में स्वच्छता दीदीयों का विशेष योगदान है। नवागांव सेनीटेशन पार्क शहर की सफाई के लिए एक महत्वपूर्ण केन्द्र है। जहां महत्वपूर्ण कार्य प्रणाली के जरिए व्यवस्थित तरीके से कार्य किया जा रहा है।
नगर निगम आयुक्त श्री चंद्रकांत कौशिक ने बताया कि वार्ड क्रमांक 1 नवागांव में स्थित सेनिटेशन पार्क कुल 10.50 एकड क्षेत्रफल में विस्तृत है, जहां मणीकंचन केन्द्र (गार्बेज क्लिनिक) में डोर टू डोर प्राप्त कचरे का पृथकीकरण का कार्य किया जाता है और गीला तथा सूखा कचरा अलग किया जाता है। बेलन केन्द्र में शहर से निकलने वाले पालीथीन का बेलिंग कर उसका बण्डल बनाया जाता है। पशुपालन केन्द्र में स्वच्छता दीदीयों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए एनिमल फार्मिग का कार्य किया जा रहा है। भस्मीकरण संयंत्र (इन्सीनेटर युनिट) हजार्डयस वेस्ट का डिस्पोजल वैज्ञानिक विधि से किया जा रहा है। यह एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया है जिसमें स्वास्थ्य के लिए घातक कचरे को वैज्ञानिक विधि से नष्ट किया जाता है। कम्पोस्ट प्रोसेसिंग सेंटर में डोर टू डोर से प्राप्त गीले एवं सूखे कचरे का खाद बनाने का कार्य किया जा रहा है। निर्माण एवं विध्वंश अपशिष्ट प्रसंस्करण एवं संग्रहण केन्द्र में सी.एन.डी वेस्ट से पेपर ब्लॉक, ड्रेन कवर एवं ब्रिक्स बनाया जा रहा है। वहीं गौठान में स्वच्छता दीदी द्वारा गोबर से खाद निर्माण किया जा रहा है।
उल्लेखनीय है कि नवागांव सेनीटेशन पार्क में फलदार एवं छायादार वृक्षों का रोपण किया गया है। ताकि आने वाले समय में पर्यावरण अच्छा रहे। साग-सब्जी उत्पादन भी यहां आर्गेनिक कृषि द्वारा की जा रही है। मलगाद युक्त संयंत्र प्रणाली (एल.एस.टी.पी प्लांट) में शहर से निकलने वाले सेप्टिक टेंक के पानी को उपचारित कर सोना-खातु निर्माण एवं सिंचाई कार्य किया जा रहा है। ठोस अपशिष्ट प्रबंधन के कार्य में स्वास्थ्य विभाग, स्वच्छता दीदी एवं निकाय के वार्डों की टीम लगी रहती है। वर्तमान में निकाय के 51 वार्डो में सड़क नाली एवं व्यावसायिक क्षेत्रों मेें सफाई हेतु कुल 566 कर्मचारी कार्यरत है। शहर के समस्त 51 वार्डो में सूखे एवं गीले कचरों को डोर टू डोर कलेक्शन किया जा रहा है और इसे निकट स्थित सेंटर में लाकर सिग्रेगेशन किया जाता है। वर्तमान में कुल 19 एसएलआरएम सेंटर एवं 1 कम्पोस्ट शेड कार्यरत है। डोर टू डोर कलेक्शन एवं एसएलआरएम सेंटर का प्रबंधन एवं सम्पूर्ण कार्य राष्ट्रीय शहरी आजीविका मिशन द्वारा बनायी गयी स्वसहायता समूह की 365 स्वच्छता दीदियों एवं 71 सफाई मित्रों द्वारा किया जा रहा है।
आलेख / शौर्यपथ / नवागांव सेनीटेशन पार्क मल्टीएक्टीविटी सेंटर के रूप में स्थापित है। यहां शहर की सफाई करने वाली स्वच्छता दीदी आत्मनिर्भर बन रही हैं और विभिन्न तरह के कार्यों से जुड़कर उनकी आर्थिक स्थिति मजबूत बनी है। शहर की सफाई में स्वच्छता दीदीयों का विशेष योगदान है। नवागांव सेनीटेशन पार्क शहर की सफाई के लिए एक महत्वपूर्ण केन्द्र है। जहां महत्वपूर्ण कार्य प्रणाली के जरिए व्यवस्थित तरीके से कार्य किया जा रहा है।
नगर निगम आयुक्त श्री चंद्रकांत कौशिक ने बताया कि वार्ड क्रमांक 1 नवागांव में स्थित सेनिटेशन पार्क कुल 10.50 एकड क्षेत्रफल में विस्तृत है, जहां मणीकंचन केन्द्र (गार्बेज क्लिनिक) में डोर टू डोर प्राप्त कचरे का पृथकीकरण का कार्य किया जाता है और गीला तथा सूखा कचरा अलग किया जाता है। बेलन केन्द्र में शहर से निकलने वाले पालीथीन का बेलिंग कर उसका बण्डल बनाया जाता है। पशुपालन केन्द्र में स्वच्छता दीदीयों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए एनिमल फार्मिग का कार्य किया जा रहा है। भस्मीकरण संयंत्र (इन्सीनेटर युनिट) हजार्डयस वेस्ट का डिस्पोजल वैज्ञानिक विधि से किया जा रहा है। यह एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया है जिसमें स्वास्थ्य के लिए घातक कचरे को वैज्ञानिक विधि से नष्ट किया जाता है। कम्पोस्ट प्रोसेसिंग सेंटर में डोर टू डोर से प्राप्त गीले एवं सूखे कचरे का खाद बनाने का कार्य किया जा रहा है। निर्माण एवं विध्वंश अपशिष्ट प्रसंस्करण एवं संग्रहण केन्द्र में सी.एन.डी वेस्ट से पेपर ब्लॉक, ड्रेन कवर एवं ब्रिक्स बनाया जा रहा है। वहीं गौठान में स्वच्छता दीदी द्वारा गोबर से खाद निर्माण किया जा रहा है।
उल्लेखनीय है कि नवागांव सेनीटेशन पार्क में फलदार एवं छायादार वृक्षों का रोपण किया गया है। ताकि आने वाले समय में पर्यावरण अच्छा रहे। साग-सब्जी उत्पादन भी यहां आर्गेनिक कृषि द्वारा की जा रही है। मलगाद युक्त संयंत्र प्रणाली (एल.एस.टी.पी प्लांट) में शहर से निकलने वाले सेप्टिक टेंक के पानी को उपचारित कर सोना-खातु निर्माण एवं सिंचाई कार्य किया जा रहा है। ठोस अपशिष्ट प्रबंधन के कार्य में स्वास्थ्य विभाग, स्वच्छता दीदी एवं निकाय के वार्डों की टीम लगी रहती है। वर्तमान में निकाय के 51 वार्डो में सड़क नाली एवं व्यावसायिक क्षेत्रों मेें सफाई हेतु कुल 566 कर्मचारी कार्यरत है। शहर के समस्त 51 वार्डो में सूखे एवं गीले कचरों को डोर टू डोर कलेक्शन किया जा रहा है और इसे निकट स्थित सेंटर में लाकर सिग्रेगेशन किया जाता है। वर्तमान में कुल 19 एसएलआरएम सेंटर एवं 1 कम्पोस्ट शेड कार्यरत है। डोर टू डोर कलेक्शन एवं एसएलआरएम सेंटर का प्रबंधन एवं सम्पूर्ण कार्य राष्ट्रीय शहरी आजीविका मिशन द्वारा बनायी गयी स्वसहायता समूह की 365 स्वच्छता दीदियों एवं 71 सफाई मित्रों द्वारा किया जा रहा है।
विशेष लेख / शौर्यपथ / छत्तीसगढ़ राज्य का भौगोलिक क्षेत्रफल 1,35,191 वर्ग किलोमीटर है जो देश के क्षेत्रफल का 4.1 प्रतिशत है। राज्य का वन क्षेत्र लगभग 59,772 किलोमीटर है जो राज्य के भौगोलिक क्षेत्र का 44.21 प्रतिशत है। ऑक्सीजन का एकमात्र स्रोत वृक्ष है। इसलिए वृक्ष पर ही हमारा जीवन आश्रित है। यदि वृक्ष ही नहीं रहेंगे तो किसी भी जीव जंतु का अस्तित्व नहीं रहेगा। नगरीय प्रशासन मंत्री डॉ शिवकुमार डहरिया ने कुछ दिन पहले ही प्रदेश के सभी 166 नगरीय निकायों के अंतर्गत होने वाले दाह संस्कार में गौ-काष्ठ के उपयोग को प्राथमिकता से करने का निर्देश जारी किया है। संयोगवश नगरीय प्रशासन मंत्री का निर्देश ठीक ऐसे समय पर आया है जब भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) द्वारा वायु प्रदूषण के चलते उतरी एवं मध्य भारतीय राज्यों में भारी आर्थिक क्षति होने की रिर्पोट जारी की जा रही थी। आईसीएमआर ने उत्तर प्रदेश और बिहार में वायु प्रदूषण की स्थिति खराब होने का जिक्र किया है। लासेंट प्लेनेटरी हेल्थ में प्रकाशित रिपोर्ट इंडिया स्टेट लेबल डिजीज बर्डन इनीसिएटिव के मुताबिक वायु प्रदूषण के कारण देश के कुल सकल घरेलू उत्पाद के 1.4 फीसदी के बराबर की क्षति हो रही है। यह बहुत चिंता का विषय है। वायु प्रदूषण को लेकर ठोस रणनीति के साथ हम सबकों आगे आना होगा। छत्तीसगढ़ की सरकार ने समय रहते वायु प्रदूषण की रोकथाम के लिए जो कदम उठाया है, वह प्रशंसनीय है। नगरीय प्रशासन द्वारा गौ काष्ठ के इस्तेमाल को नगरीय क्षेत्रों में बढ़ावा देने से एक ओर जहां वायु प्रदूषण में कमी आएगी वहीं एक दाह संस्कार के पीछे 20-20 साल के दो पेड़ कटने से बच जाएंगे। इस पहल से साल भर में लाखों पेड़ों की बलि नहीं चढ़ेगी और हमारी अर्थव्यवस्था पर भी गहरा प्रभाव नहीं पड़ेगा।
वैसे प्रदूषण को लेकर अक्सर चर्चाएं होती है। निःसंदेह छत्तीसगढ में वायु प्रदूषण की स्थिति अन्य कई राज्यों की तुलना में बेहतर तो है लेकिन शहर सहित कुछ जिलों में स्थिति पूरी तरह से ठीक नहीं है। औद्योगिक जिला सहित शहरी इलाकों में शुद्ध वायु की कमी है। इसके लिए जरूरी है कि हम अधिक से अधिक पौधे लगाए और पेड़ों को कटने से बचाएं। छत्तीसगढ़ की सरकार ने गौ- काष्ठ के इस्तेमाल को लेकर जो आदेश जारी किया है, वह आने वाले समय में पर्यावरण संरक्षण और वृक्षों की अंधाधुंध कटाई पर रोक लगाने की दिशा में मील का पत्थर साबित होगा। यह मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल और उनके सरकार के सदस्यों की सोच थी कि नरवा, गरवा, घुरवा बाड़ी का मॉडल तैयार किया गया। इस दिशा में कदम आगे बढ़ाते हुए सरकार ने अपनी संकल्पना को साकार भी करके दिखाया। नगरीय निकाय क्षेत्रों में होने वाले दाह संस्कार और ठण्ड के दिनों में जलाए जाने वाले अलाव में लकड़ी की जगह गोबर से बने गौ-काष्ठ और कण्डे के उपयोग को जरूरी किया जाना सरकार के दूरदर्शी सोच का हिस्सा है।
प्रदेश के लगभग सभी जिलों में इस समय गोठान संचालित किए जा रहे हैं। 6 हजार 4 सौ से अधिक गोठाने हैं। जिसमें से 166 नगरीय निकाय क्षेत्रों में 322 गोठान संचालित है। इन गोठानों में जैविक खाद के अलावा गोबर के अनेक उत्पाद बनाए जा रहे हैं। गोठानों में गौ-काष्ठ और कण्डे भी बनाए जा रहे हैं। कुल 141 स्थानों में गोबर से गौ काष्ठ बनाने मशीनें भी स्वीकृत की जा चुकी है और 104 स्थानों में यह मशीन काम भी करने लगी है। निकायों के अंतर्गत गोठानों के माध्यम से गोबर का उपयोग गौ काष्ठ बनाने में किया जा रहा है। अभी तक लगभग 2800 क्विंटल गौ काष्ठ विक्रय के लिए तैयार कर लिया गया है। सूखे गोबर से निर्मित गौ-काष्ठ एक प्रकार से गोबर की बनी लकड़ी है। इसका आकार एक से दो फीट तक लकड़ीनुमा रखा जा रहा है। गौ-काष्ठ एक प्रकार से कण्डे का वैल्यू संस्करण है। गोठानों के गोबर का बहुउपयोग होने से जहां वैकल्पिक इंर्धन का नया स्रोत विकसित हो रहा है, वहीं छत्तीसगढ़ के गांव और शहरों में रोजगार के नए अवसर भी खुलने लगे हैं। स्व-सहायता समूह की महिलाएं आत्मनिर्भर की राह में कदम बढ़ा रही है। हाल ही में सरगुजा जिले के अंबिकापुर में प्रदेश का पहला गोधन एम्पोरियम भी खुला है, जहां गोबर के उत्पादों की श्रृखंला है। प्रदेश के अन्य जिलों में भी गौ काष्ठ और गोबर के उत्पादों की मांग बढ़ती जा रही है। दीपावली में गोबर के दीये, गमले, सजावटी सामान की मांग रहती है।
प्रदेश के गोठानों में तैयार गौ-काष्ठ और कण्डे एक वैकल्पिक और जैविक ईंधन का बड़ा जरिया बन सकता है। इसके जलने से प्रदूषण भी नहीं फैलता और इसका उत्पादन भी आसान है। नगरीय निकाय क्षेत्रो में अलाव और दाह संस्कार में लकड़ी के स्थान पर गौ काष्ठ के उपयोग को बढ़ावा देने से वैकल्पिक ईंधन के उत्पादन में गति आएगी। प्रदेश के नगरीय निकायों में ठण्ड के दिनों में लगभग 400 अलाव चौक-चौराहों पर जलाए जाते हैं। दाह संस्कार भी होते हैं। रायपुर जैसे शहर में 12 से 30 दाह संस्कार होते हैं। एक दाह संस्कार में अनुमानित 500 से 700 किलो लकड़ी का उपयोग होता है। अलाव और दाह संस्कार में लकड़ी को जलाए जाने से भारी मात्रा में कार्बन का उर्त्सन होता है, जो कि पर्यावरण के लिए अनुकूल नहीं है। यदि हम गौ काष्ठ का उपयोग लकड़ी के स्थान पर करे तो महज 300 किलों में ही दाह संस्कार किया जा सकता है। इससे प्रदूषण भी नहीं फैलता और गोबर की लकड़ी जलने से आसपास के वातावरण भी शुद्ध होते हैं। जानकारों का कहना है कि यदि हम अंतिम संस्कार में लकड़ी की जगह गौ काष्ठ का उपयोग करे तो हमारा खर्च भी कम हो जाएगा और हम 20-20 साल के दो पेड़ों को कटने से भी बचा सकते हैं। गौ सेवा की दिशा में कार्य कर रही एक पहल सेवा समिति के उपाध्यक्ष श्री रितेश अग्रवाल का कहना है कि दाह संस्कार को इको फ्रेण्डली बनाया जाना अति आवश्यक है। गौ-काष्ठ से दाह संस्कार बहुत आसान और पर्यावरण के लिए उपयोगी है। लोगों को अपनी धारणाएं बदलनी होगी ताकि हम शुद्ध हवा में सांस ले सके। अब तक अनेक दाह संस्कार में गौ काष्ठ का उपयोग कर चुके तिश अग्रवाल ने बताया कि गोबर की लकड़ी के साथ देशी घी मिलाकर जलाने से शुद्ध आक्सीजन का उत्सर्जन होता है और इससे निकलने वाले कम्पाउण्ड बारिश में सहायक होते हैं।
गोबर में रेडिएशन अवशोषण का गुण भी होता है। इससे निर्मित उत्पाद आसानी से प्रकृति में मिल जाती है। स्वाभाविक है कि गोठानों के संचालन से प्रदेश में गौ संरक्षण को बढ़ावा मिलेगा और गोबर उत्पादों के साथ रोजगार के नये विकल्प भी बनेंगे। सरकार द्वारा गोबर को दो रुपए प्रति किलों की दर से खरीदे जाने के बाद पशुपालकों की आमदनी भी बढ़ी है। इससे आर्थिक सशक्तीकरण को भी बल मिला है। गौ काष्ठ को प्रोत्साहन दिए जाने से एक साथ अनेक फायदे होंगे। इसके निर्माण में लगे लोग इसे बेच कर आमदनी प्राप्त करेंगे और ग्रीन तथा क्लीन छत्तीसगढ़ का कान्सेप्ट भी सफल होगा। सरकार के इस प्रयास से हमें ऑक्सीजन, औषधि देने वाले, मृदा संरक्षण करने वाले, पक्षियों के बैठने की व्यवस्था, कीडे़-मकोड़े, मधुमक्खी के छत्ते से वातावरण को अनुकूलन बनाने वाले वृक्षों के साथ पशु-पक्षियों को भी संरक्षण मिलेगा। वैकल्पिक ईंधन के रूप में उपयोग बढ़ने से इसका व्यावसायिक उपयोग भी बढ़ेगा, जो हमारी अर्थव्यवस्था को सशक्त बनाने के साथ पर्यावरण अंसतुलन के खतरे को कम करने में मील का पत्थर साबित होगा।
सेहत /शौर्यपथ / पपीते के कई सेहत लाभ आपने जरूर सुने होंगे। यह आपको स्वस्थ रखने से लेकर आपकी खूबसूरती को निखारने तक का काम करता है। इसे ऑलराउंडर फ्रूट कहना गलत नहीं होगा। पपीता काफी फायदेमंद होता है। पाचन संबंधी परेशानी हो या कब्ज की समस्या, पपीता इन सभी समस्याओं से राहत दिलाने के काम आता है। लेकिन इसके अत्यधिक सेवन से कुछ दुष्प्रभाव भी होते हैं।
आइए इस लेख में जानते हैं पपीते से होने वाले लाभ और नुकसान के बारे में।
पपीते से होने वाले लाभ
पपीते से निकलने वाला रस अपने वजन से 100 गुना प्रोटीन बहुत जल्द पचा देता है जिससे अमाशय तथा आंत संबंधी विकारों में बहुत लाभ मिलता है। कब्ज व कफ के रोग में यह लाभकारी है। गरिष्ठ पदार्थ को आसानी से पचाता है।
पपीते के नियमित उपयोग से शरीर में इन विटामिनों की कमी नहीं रहती। इसमें पेप्सिन नामक तत्व पाया जाता है, जो बहुत ही पाचक होता है। यह पेप्सिन प्राप्त करने का एकमात्र साधन है।
पपीते का रस प्रोटीन को आसानी से पचा देता है इसलिए पपीता पेट एवं आंत संबंधी विकारों में बहुत ही लाभदायक है। पपीते में पाया जाने वाला विटामिन 'ए' त्वचा एवं नेत्रों के लिए बहुत आवश्यक होता है। इस विटामिन से त्वचा स्वस्थ, स्वच्छ और चमकदार रहती है।
पपीते में कैल्शियम भी अच्छी मात्रा में होता है, जो रक्त एवं तंतुओं के निर्माण एवं हृदय, नाड़ियों तथा पेशियों की क्रिया ठीक रहने में सहायक होता है। बच्चों की वृद्धि और रोगों से बचाव की क्षमता बढ़ाने में भी विटामिन 'ए' की आवश्यकता रहती है।
पपीते से होने वाले नुकसान
गर्भवती महिलाओं को पपीता खाने से बचने की सलाह दी जाती है, क्योंकि पपीते के बीज और जड़ भ्रूण को नुकसान पहुंचा सकते हैं इसलिए गर्भवती महिलाओं को पपीते का सेवन नहीं करना चाहिए। इससे होने वाले बच्चे को नुकसान पहुंच सकता है।
पपीते के सेवन से कब्ज संबंधी समस्या से राहत मिलती है लेकिन इसका अधिक सेवन भी आपके पेट के लिए नुकसानदाक साबित हो सकता है।
अत्यधिक मात्रा में पपीते का सेवन करने से अस्थमा और जोर-जोर से सांस लेना, सांस लेने में परेशानी जैसी विभिन्न श्वसन संबंधी समस्या हो सकती है।
पपीते के अत्यधिक सेवन से एलर्जी भी हो सकती है। खुजली, चकत्ते पड़ना जैसी समस्याएं भी इसके ज्यादा सेवन से हो सकती हैं।
सेहत /शौर्यपथ / नींबू सेहत और सौंदर्य दोनों के लिए काफी लाभकारी माना जाता है, इसके नियमित सेवन से जहां आप अपने बढ़ते वजन को कंट्रोल कर सकते है वहीं
इसे चेहरे पर लगाने से आप दाग-धब्बों से भी छुटकारा पा सकते है। तो आइए जानते हैं ऐसे ही 10 गजब के फायदों के बारे में.....
1नींबू आपका मोटापा कम करने में बेहद कारगर साबित होता है। गरम पानी में नींबू और शहद जहां मोटापा कम करेगा वहीं आपको भरपूर एनर्जी भी देगा। इतना ही नहीं, यह आपके शरीर के आंतरिक अंगों की सफाई में बहुत उपयोगी साबित होता है।
2नींबू के रस के साथ सेंधा नमक मिलाकर पीने से आपको किडनी स्टोन से छुटकारा मिल सकता है। वहीं नींबू का छिलका पीसकर माथे पर लेप लगाने से मइग्रेन के दर्द में राहत मिलती है।
3नींबू के बीजों को पीसकर सिर पर लगाने से गंजापन दूर होता है और नए बाल उगने लगते हैं। इसके अलावा किसी प्रकार का घाव हो जाने पर नींबू के रस को बादाम के तेल के साथ मिलाकर लगाना बहुत फायदेमंद होता है।
4चंदन और नींबू के रस के लेप को चेहरे पर लगाने से मुहांसे दूर होते हैं, और आपका चेहरा साफ, बेदाग और चमकदार हो जाता है। नींबू के रस को बेसन के साथ चेहरे पर लगाने से रंग निखरता है।
5नींबू का रस ब्लडप्रशर को कंट्रोल में रखने में मदद करता है। गरम पानी में नींबू निचो़ड़कर पीने से गले की खराबी दूर होती है। साथ ही अगर किसी जहरीले जीव-जन्तु ने काट लिया हो, तो वहां नींबू का रस लगाने से जहर का असर नहीं होता।
6पेट में गैस बनना या अपचा होने जैसी समस्याओं में भी नींबू पानी पीना बेहद कारगर होता है। इसके साथ काले नमक का प्रयोग करना काफी लाभ देता है।
7दांतों का पीलापन हटाने के लिए नींबू को काटकर नमक के साथ दांतों पर रगड़ना बहुत असरकारक होता है। इससे दांतों का पीलापन कम होता है और दांत चमकने लगते हैं।
8दाद या खुजली होने पर, नींबू के रस में नौसादर को पीसकर लगाने से यह समस्या समाप्त हो सकती है। यह त्वचा संबंधी रोगों की विकृतियों को खत्म करने में सहायक होता है।
9मसूढ़ों में परेशानी होने पर भी नींबू आपकी मदद कर सकता है। मसूढ़ों से खून रिसने पर नींबू का रस लगाने से आराम मिलता है और मसूढ़े ठीक होते हैं।
10नाखूनों पर नींबू रगड़ने से वे साफ, मजबूत और चमकदार बनते हैं। अगर आपको कोहनी या हाथों का कालापन कम करना है, तो आप नींबू रगड़कर इसे कम कर सकते हैं।
सेहत /शौर्यपथ /खाने में स्वाद और महक के लिए हींग का प्रयोग विशेष तौर पर किया जाता है और पेट के लिए भी इसे काफी फायदेमंद माना जाता है। वैसे सेहत के लिए हींग के एक नहीं बल्कि कई फायदे हैं। यकीन नहीं होता तो, जानिए यह 5 खास फायदे -
1) कब्ज की शिकायत होने पर हींग का प्रयोग लाभ देगा। रात को सोने से पहले हींग के चूर्ण को पानी में मिलाकर पिएं और सुबह देखें असर। सुबह पेट पूरी तरह से साफ हो जाएगा।
2)अगर भूख नहीं लगती या भूख लगना कम हो गया है, तो भोजन करने से पहले हींग को घी में भूनकर अदरक और मक्खन के साथ लेने से फायदा होगा और भूख खुलकर लगेगी।
3) त्वचा में कांच, कांटा या कोई नुकीली चीज चुभ जाए और निकालने में परेशानी आ रही हो, तो उस स्थान पर हींग का पानी या लेप लगाएं। चुभी हुई चीज अपने आप ही बाहर निकल आएगी।
4) अगर कान में दर्द हो रहा हो, तो तिल के तेल में हींग को गर्म करके, उस तेल की एक-दो बूंद कान में डालने से कान का दर्द पूरी तरह से ठीक हो जाएगा।
5) दांतों में कैविटी होने पर भी हींग आपके लिए काम की चीज साबित हो सकता है। अगर दांतों में कीड़े हैं, तो रात को दांतों में हींग लगाकर या दबार सो जाएं। कीड़े अपने आप निकल आएंगे।
टिप्स /शौर्यपथ / वर्तमानकाल में अधिकतर लोगों की सोच नकारात्मक हो चली है। इसके पीछे कई राजनीतिक, सामाजिक और रहन-सहन में परिवर्तन के कारण भी हो सकते हैं। यह भी हो सकता है कि कोई व्यक्ति बचपन से ही गलत लोगों के साथ रहा हो या बाद में उसकी संगति गलत लोगों की हो गई हो। कई बार फिल्में, वेब सीरीज या साहित्य की किताबें भी हमारी सोच को दूषित कर देते हैं। इस तरह सोचो तो सोच के नकारात्मक होने के कई कारण हो सकते हैं। आओ जानते हैं कि क्या है इसका मनोवैज्ञानिक कारण।
इनर और आउटर : वैज्ञानिक कहते हैं मानव मस्तिष्क में 24 घंटे में लगभग हजारों विचार आते हैं। उनमें से ज्यादातर नकारात्मक होते हैं। नकारात्मक विचार इसलिए अधिक होते हैं कि जब हम कोई नकारात्मक घटना देखते हैं जिसमें भय, राग, द्वैष, सेक्स आदि हो तो वह घटना या विचार हमारे चित्त की इनर मेमोरी में सीधा चला जाता है जबकि कई अच्छी बातें हमारे चित्त की आउटर मेमोरी में ही घुम-फिरकर दम तोड़ देती है।
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दो तरह की मेमोरी होती है- इनर और आउटर। इनर मेमोरी में वह डाटा सेव हो जाता है, जिसका आपके मस्तिष्क पर गहरा प्रभाव पड़ा है और फिर वह डाटा कभी नहीं मिटता। रात को सोते समय इनर मेमोरी सक्रिय रहती है और सुबह-सुबह उठते वक्त भी इनर मेमोरी जागी हुई होती है। अपनी इनर मेमोरी अर्थात चित्त से व्यर्थ और नकारात्मक डाटा को हटाओ और सेहत, सफलता, खुशी और शांति की ओर एक-एक कदम बढ़ाओ।
आपको याद होगा कि आपको अपने बचपन की सिर्फ वही बातें याद होंगी जिसमें आपकी जमकर मार पड़ी होगी या कोई दु:खद घटना घटी होगी। हो सकता है कि आपने किसी चीज के लिए अपने मम्मी पापा से बहुत ज्यादा जीद की होगी तभी वह मिली होगी तो ऐसी बातें भी याद रह जाती है। दरअसल, हमारा मन दुख:भरी बातें ग्रहण करने में देर नहीं करता परंतु सुखभरी बातों में से अधिकतर तो हम भूल ही जाते हैं।
घटनाएं प्रभावित करती हैं : इसीलिए दुनिया में युद्ध की बातें सभी करते हैं और इतिहास भी भरापड़ा है युद्ध की गाथाओं से। परंतु यह बहुत ही कम लोग जानते हैं या बताया जाता है कि इतिहास में युद्ध, प्रेम के अलावा भी बहुत कुछ होता है। कोई व्यक्ति किस तरह सुखी हो गया या कैसे सकारात्मक हो गया यह कम ही पढ़ने को मिलता है।
वैज्ञानिक कहते हैं कि हमारा मन दिन और रात के विशेष समय में अन्य समय की अपेक्षा अधिक ग्रहण करने की क्षमता रखता है। इसके अलावा हमारा मन उस समय भी ज्यादा सक्रिय होता है जबकि कोई विपत्त आई हुई हो या कोई बहुत बड़ी खुशी की बात हो। जैसे जब लॉकडाऊन लगा था तो संपूर्ण देश की चेतना जागृत हो गई थी कि अब क्या होगा। कोरोनाकाल संकट का काल है तो इसकी याददाश्त तो सभी को बहुत समय तक रहेगी ही। इसी तरह जब दो देशों के बीच युद्ध हो जाते हैं तब भी सभी की चेतना जागृत हो जाती है। अर्थात यह की हमारे मन को हमारे जीवन में आई बड़ी घटनाएं प्रभावित करती है।
कैसे बन जाता है व्यक्ति दुखी और रोगी : जो भी विचार निरंतर आ रहा है वह धारणा का रूप धर लेता है। अर्थात वह हमारी इनर मेमोरी में चला जाता है। आपके आसपास बुरे घटनाक्रम घटे हैं और आप उसको बार-बार याद करते हैं तो वह याद धारणा बनकर चित्त में स्थाई रूप ले लेगी। बुरे विचार या घटनाक्रम को बार-बार याद न करें।
विचार ही वस्तु बन जाते हैं। इसका सीधा-सा मतलब यह है कि हम जैसा सोचते हैं वैसे ही भविष्य का निर्माण करते हैं। यदि आपको अपनी सेहत को लेकर भय है, सफलता को लेकर संदेह है और आप विश्वास खो चुके हैं तो समझ जाएं की चित्त रोगी हो गया है। किसी व्यक्ति के जीवन में बुरे घटनाक्रम बार-बार सामने आ जाते हैं तो इसका सीधा सा कारण है वह अपने अतीत के बारे में हद से ज्यादा विचार कर रहा है। बहुत से लोग डरे रहते हैं इस बात से कि कहीं मुझे भी वह रोग न हो जाए या कहीं मेरे साथ भी ऐसा न हो जाए....आदि। सोचे सिर्फ वर्तमान को सुधारने के बारे में।
कैसे होगा यह संभव : योग के तीन अंग ईश्वर प्राणिधान, स्वाध्याय और धारणा से होगा यह संभव। जैसा कि हमने उपर लिखा की इनर और आउटर मेमोरी होती है। इनर मेमोरी रात को सोते वक्त और सुबह उठते वक्त सक्रिय रही है उस वक्त वह दिनभर के घटनाक्रम, विचार आदि से महत्वपूर्ण डाडा को सेव करती है। इसीलिए सभी धर्म ने उस वक्त को ईश्वर प्रार्थना के लिऋ नियुक्त किया है ताकि तुम वह सोचकर सो जाए और वही सोचकर उठो जो शुभ है। इसीलिए योग में 'ईश्वर प्राणिधान' का महत्व है।
संधिकाल अर्थात जब सूर्य उदय होने वाला होता है और जब सूर्य अस्त हो जाता है तो उक्त दो वक्त को संधिकाल कहते हैं- ऐसी दिन और रात में मिलाकर कुल आठ संधिकाल होते हैं। उस वक्त हिंदू धर्म और योग में प्रार्थना या संध्यावंन का महत्व बताया गया है। फिर भी प्रात: और शाम की संधि सभी के लिए महत्वपूर्ण है जबकि हमारी इनर मेमोरी सक्रिय रहती है। ऐसे वक्त जबकि पक्षी अपने घर को लौट रहे होते हैं...संध्यावंदन करते हुए अच्छे विचारों पर सोचना चाहिए। जैसे की मैं सेहतमंद बना रहना चाहता हूं।
ईश्वर प्राणिधान : सिर्फ एक ही ईश्वर है जिसे ब्रह्म या परमेश्वर कहा गया है। इसके अलावा और कोई दूसरा ईश्वर नहीं है। ईश्वर निराकार है यही अद्वैत सत्य है। ईश्वर प्राणिधान का अर्थ है, ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण। ईश्वर के प्रति पूर्ण विश्वास। न देवी, न देवता, न पीर और न ही गुरु घंटाल।
एक ही ईश्वर के प्रति अडिग रहने वाले के मन में दृढ़ता आती है। यह दृढ़ता ही उसकी जीत का कारण है। चाहे सुख हो या घोर दुःख, उसके प्रति अपनी आस्था को डिगाएँ नहीं। इससे आपके भीतर पाँचों इंद्रियों में एकजुटता आएगी और लक्ष्य को भेदने की ताकत बढ़ेगी। वे लोग जो अपनी आस्था बदलते रहते हैं, भीतर से कमजोर होते जाते हैं।
विश्वास रखें सिर्फ 'ईश्वर' में, इससे बिखरी हुई सोच को एक नई दिशा मिलेगी। और जब आपकी सोच सिर्फ एक ही दिशा में बहने लगेगी तो वह धारणा का रूप धर लेगी और फिर आप सोचे अपने बारे में सिर्फ अच्छा और सिर्फ अच्छा। ईश्वर आपकी मनोकामना अवश्य पूरी करेगा।
स्वाध्याय : स्वाध्याय का अर्थ है स्वयं का अध्ययन करना। अच्छे विचारों का अध्ययन करना और इस अध्ययन का अभ्यास करना। आप स्वयं के ज्ञान, कर्म और व्यवहार की समीक्षा करते हुए पढ़ें, वह सब कुछ जिससे आपके जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता हो साथ ही आपको इससे खुशी भी मिलती हो। तो बेहतर किताबों को अपना मित्र बनाएं। जीवन को नई दिशा देने की शुरुआत आप छोटे-छोटे संकल्प से कर सकते हैं। संकल्प लें कि आज से मैं बदल दूँगा वह सब कुछ जिसे बदलने के लिए मैं न जाने कब से सोच रहा हूँ। अच्छा सोचना और महसूस करना स्वाध्याय की पहली शर्त है।
धारणा से पाएं मनचाही सेहत, खुशी और सफलता : जो विचार धीरे-धीरे जाने-अनजाने दृढ़ होने लगते हैं वह धारणा का रूप धर लेते हैं। यह भी कि श्वास-प्रश्वास के मंद व शांत होने पर, इंद्रियों के विषयों से हटने पर, मन अपने आप स्थिर होकर शरीर के अंतर्गत किसी स्थान विशेष में स्थिर हो जाता है तो ऊर्जा का बहाव भी एक ही दिशा में होता है। ऐसे चित्त की शक्ति बढ़ जाती है, फिर वह जो भी सोचता है वह घटित होने लगता है। जो लोग दृढ़ निश्चयी होते हैं, अनजाने में ही उनकी भी धारणा पुष्ट होने लगती है।
धर्म संसार /शौर्यपथ / प्राचीन भारत में रामायण काल को सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि इस काल में मानव अपने वर्तमान स्वरूप में विकसित होने के साथ ही उस काल की कई प्रजातियां लुप्त भी हो रही थी। रामायण काल को भारत का सबसे महत्वपूर्ण काल माना जाता है। आओ जानते हैं इस काल के संबंध में 10 अनसुनी या अनजान बातें।
1. रामायण काल में थे सिंधु घाटी के नगर : पुरातत्व वैज्ञानिकों ने सिंधु घाटी की पॉटरी की नई सिरे से पड़ताल की और ऑप्टिकली स्टिम्यलैटड लूमनेसन्स तकनीक का इस्तेमाल करके इसकी उम्र का पता लगाया तो यह 6,000 वर्ष पुराने निकले हैं। इसके अलावा अन्य कई तरह की शोध से यह पता चला कि यह सभ्यता 8,000 वर्ष पुरानी है। इसका मतलब यह कि यह सभ्यता तब विद्यमान थी जबकि भगवान श्रीराम (5114 ईसा पूर्व) का काल था और श्रीकृष्ण के काल (3228 ईसा पूर्व) में इसका पतन होना शुरू हो गया था। वैज्ञानिकों की इस टीम के अनुसार सिंधु घाटी सभ्यता का विस्तार हरियाणा के भिर्राना और राखीगढ़ी में भी था। आईआईटी खड़गपुर और भारतीय पुरातत्व विभाग के वैज्ञानिकों ने सिंधु घाटी सभ्यता की प्राचीनता को लेकर नए तथ्य सामने रखे हैं। वैज्ञानिकों के मुताबिक यह सभ्यता 5500 साल नहीं बल्कि 8000 साल पुरानी थी। इस लिहाज से यह सभ्यता मिस्र और मेसोपोटामिया की सभ्यता से भी पहले की है। मिस्र की सभ्यता 7,000 ईसा पूर्व से 3,000 ईसा पूर्व तक रहने के प्रमाण मिलते हैं, जबकि मोसोपोटामिया की सभ्यता 6500 ईसा पूर्व से 3100 ईसा पूर्व तक अस्तित्व में थी। शोधकर्ता ने इसके अलावा हड़प्पा सभ्यता से 1,0000 वर्ष पूर्व की सभ्यता के प्रमाण भी खोज निकाले हैं। सिंधु घाटी में ऐसी कम से कम आठ प्रमुख जगहें हैं जहां संपूर्ण नगर खोज लिए गए हैं। जिनके नाम हड़प्पा, मोहनजोदेड़ों, चनहुदड़ो, लुथल, कालीबंगा, सुरकोटदा, रंगपुर और रोपड़ है।
2. विचित्र किस्म की प्रजातियां : भगवान राम का काल ऐसा काल था जबकि धरती पर विचित्र किस्म के लोग और प्रजातियां रहती थीं, लेकिन प्राकृतिक आपदा या अन्य कारणों से ये प्रजातियां अब लुप्त हो गई। जैसे, वानर, गरूड़, रीछ आदि। माना जाता है कि रामायण काल में सभी पशु, पक्षी और मानव की काया विशालकाय होती थी। मनुष्य की ऊंचाई 21 फिट के लगभग थी।
3. रामायण काल के अविष्कार : रामायण काल में कई वैज्ञानिक थे। नल, नील, मय दानव, विश्वकर्मा, अग्निवेश, सुबाहू, ऋषि अगत्स्य, वशिष्ठ, विश्वामित्र आदि कई वैज्ञानिक थे। रामायण काल में भी आज के युग जैसे अविष्कार हुए थे। रामायण काल में नाव, समुद्र जलपोत, विमान, शतरंज, रथ, धनुष-बाण और कई तरह के अस्त्र शस्त्रों के नाम तो आपने सुने ही होंगे। लेकिन उस काल में मोबाइल और लड़ाकू विमानों को नष्ट करने का यंत्र भी होता था।
रामायण काल में विभीषण के पास 'दूर नियंत्रण यंत्र' था जिसे 'मधुमक्खी' कहा और जो मोबाइल की तरह उपयोग होता था। विभीषण के पास दर्णन यंत्र भी था। लंका के 10,000 सैनिकों के पास 'त्रिशूल' नाम के यंत्र थे, जो दूर-दूर तक संदेश का आदान-प्रदान करते थे। इसके अलावा दर्पण यंत्र भी था, जो अंधकार में प्रकाश का आभास प्रकट करता था।
लड़ाकू विमानों को नष्ट करने के लिए रावण के पास भस्मलोचन जैसा वैज्ञानिक था जिसने एक विशाल 'दर्पण यंत्र' का निर्माण किया था। इससे प्रकाश पुंज वायुयान पर छोड़ने से यान आकाश में ही नष्ट हो जाते थे। लंका से निष्कासित किए जाते वक्त विभीषण भी अपने साथ कुछ दर्पण यंत्र ले आया था। इन्हीं 'दर्पण यंत्रों' में सुधार कर अग्निवेश ने इन यंत्रों को चौखटों पर कसा और इन यंत्रों से लंका के यानों की ओर प्रकाश पुंज फेंका जिससे लंका की यान शक्ति नष्ट होती चली गई। एक अन्य प्रकार का भी दर्पण यंत्र था जिसे ग्रंथों में 'त्रिकाल दृष्टा' कहा गया है, लेकिन यह यंत्र त्रिकालदृष्टा नहीं बल्कि दूरदर्शन जैसा कोई यंत्र था। लंका में यांत्रिक सेतु, यांत्रिक कपाट और ऐसे चबूतरे भी थे, जो बटन दबाने से ऊपर-नीचे होते थे। ये चबूतरे संभवत: लिफ्ट थे।
4. भवन निर्माण कार्य : रामायण काल में भवन, पूल और अन्य निर्माण कार्यों का भी जिक्र मिलता है। इससे पता चलता है कि उस काल में भव्य रूप से निर्माण कार्य किए जाते थे और उस काल की वास्तु एवं स्थापत्य कला आज के काल से कई गुना आगे थी। उस युग में विश्वामित्र और मयासुर नामक दो प्रमुख वास्तु और ज्योतिष शास्त्री थे। दोनों ने ही कई बड़े बड़े नगर, महल और भवनों का निर्माण किया था। गीता प्रेस गोरखपुर से छपी पुस्तक 'श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण-कथा-सुख-सागर' में वर्णन है कि राम ने सेतु के नामकरण के अवसर पर उसका नाम 'नल सेतु' रखा। इसका यह कारण था कि लंका तक पहुंचने के लिए निर्मित पुल का निर्माण विश्वकर्मा के पुत्र नल द्वारा बताई गई तकनीक से संपन्न हुआ था। महाभारत में भी राम के नल सेतु का जिक्र आया है।
5. रावण की लंका : हिन्दू पौराणिक इतिहास अनुसार श्रीलंका को शिव ने बसाया था। शिव की आज्ञा से विश्वकर्मा ने यहां सोने का एक महल पार्वती जी के लिए बनवाया था। ऋषि विश्रवा ने शिव के भोलेपन का लाभ उठाकर उनसे लंकापुरी दान में मांग ली। तब पार्वती ने श्राप दिया कि महादेव का ही अंश एक दिन उस महल को जलाकर कोयला कर देगा और उसके साथ ही तुम्हारे कुल का विनाश आरंभ हो जाएगा। विश्रवा से वह लंकापुरी अपने पुत्र कुबेर को मिली लेकिन रावण ने कुबेर को निकाल कर लंका को हड़प लिया। शाप के कारण शिव के अवतार हनुमान जी ने लंका जलाई और विश्रवा के पुत्र रावण, कुंभकर्ण के कुल का विनाश हुआ। श्रीराम की शरण में होने से विभीषण बच गए।
वाल्मीकि रामायण में लंका को समुद्र के पार द्वीप के मध्य में स्थित बताया गया है अर्थात आज की श्रीलंका के मध्य में रावण की लंका स्थित थी। श्रीलंका के संस्कृत एवं पाली साहित्य का प्राचीनकाल से ही भारत से घनिष्ठ संबंध था। भारतीय महाकाव्यों की परंपरा पर आधारित 'जानकी हरण' के रचनाकार कुमार दास के संबंध में कहा जाता है कि वे महाकवि कालिदास के अनन्य मित्र थे। कुमार दास (512-21ई.) लंका के राजा थे। इसे पहले 700 ईसापूर्व श्रीलंका में 'मलेराज की कथा' की कथा सिंहली भाषा में जन-जन में प्रचलित रही, जो राम के जीवन से जुड़ी है।
6.शिव पद : श्रीलंका में एक पर्वत है जिसे श्रीपद चोटी भी कहा जाता है। अंग्रेजों के शासनकाल के दौरान इसका नाम उन्होंने एडम पीक रख दिया था। हालांकि इस एडम पीक का पुराना नाम रतन द्वीप पहाड़ है। इस पहाड़ पर एक मंदिर बना है। हिन्दू मान्यता के अनुसार यहां देवों के देव महादेव शंकर के पैरों के निशान हैं इसीलिए इस स्थान को सिवानोलीपदम (शिव का प्रकाश) भी कहा जाता है। यह पदचिन्ह 5 फिट 7 इंच लंबे और 2 फिट 6 इंच चौड़ें हैं। यहां 2,224 मीटर की ऊंचाई पर स्थित इस 'श्रीपद' के दर्शन के लिए लाखों भक्त और सैलानी आते हैं। ईसाइयों ने इसके महत्व को समझते हुए यह प्रचारित कर दिया कि ये संत थॉमस के पैरों के चिह्न हैं। बौद्ध संप्रदाय के लोगों के अनुसार ये पद चिह्न गौतम बुद्ध के हैं। मुस्लिम संप्रदाय के लोगों के अनुसार पद चिह्न हजरत आदम के हैं। कुछ लोग तो रामसेतु को भी आदम पुल कहने लगे हैं। इस पहाड़ के बारे में कहा जाता है कि यह पहाड़ ही वह पहाड़ है, जो द्रोणागिरि का एक टुकड़ा था और जिसे उठाकर हनुमानजी ले गए थे। श्रीलंका के दक्षिणी तट गाले में एक बहुत रोमांचित करने वाले इस पहाड़ को श्रीलंकाई लोग रहुमाशाला कांडा कहते हैं।
7.रावण की गुफा : ऐसा माना जाता है कि रैगला के जंगलों के बीच एक विशालकाय पहाड़ी पर रावण की गुफा है, जहां उसने घोर तपस्या की थी। उसी गुफा में आज भी रावण का शव सुरक्षित रखा हुआ है। रैगला के इलाके में रावण की यह गुफा 8 हजार फुट की ऊंचाई पर स्थित है। जहां 17 फुट लंबे ताबूत में रखा है रावण का शव। इस ताबूत के चारों तरफ लगा है एक खास लेप जिसके कारण यह ताबूत हजारों सालों से जस का तस रखा हुआ है। श्रीलंका में नुआरा एलिया पहाड़ियों के आसपास स्थित रावण फॉल, रावण गुफाएं, अशोक वाटिका, खंडहर हो चुके विभीषण के महल आदि की पुरातात्विक जांच से इनके रामायण काल के होने की पुष्टि होती है। रामसेतु के बारे में तो सभी लोग जानते ही हैं।
8.राम सेतु : राम सेतु को असल में नल सेतु कहा जाता है। भारत के दक्षिण में धनुषकोटि तथा श्रीलंका के उत्तर पश्चिम में पम्बन के मध्य समुद्र में 48 किमी चौड़ी पट्टी के रूप में उभरे एक भू-भाग को जब पहली बार नासा ने अपने उपग्रह से देखा तो इसे नाम दिया एडम सेतु। इस घटना के बाद श्रीलंका के मुस्लिमों ने इसे आदम पुल कहना प्रारंभ कर दिया। भगवान राम ने जहां धनुष मारा था उस स्थान को 'धनुषकोटि' कहते हैं। राम ने अपनी सेना के साथ लंका पर चढ़ाई करने के लिए उक्त स्थान से समुद्र में एक ब्रिज बनाया था इसका उल्लेख 'वाल्मिकी रामायण' में मिलता है।
वाल्मीक रामायण में वर्णन मिलता है कि पुल लगभग पांच दिनों में बन गया जिसकी लम्बाई सौ योजन और चौड़ाई दस योजन थी। रामायण में इस पुल को ‘नल सेतु’ की संज्ञा दी गई है। नल के निरीक्षण में वानरों ने बहुत प्रयत्न पूर्वक इस सेतु का निर्माण किया था।- (वाल्मीक रामायण-6/22/76)। वाल्मीक रामायण में कई प्रमाण हैं कि सेतु बनाने में उच्च तकनीक प्रयोग किया गया था। कुछ वानर बड़े-बड़े पर्वतों को यन्त्रों के द्वारा समुद्रतट पर ले आए ते। कुछ वानर सौ योजन लम्बा सूत पकड़े हुए थे, अर्थात पुल का निर्माण सूत से सीध में हो रहा था।- (वाल्मीक रामायण- 6/22/62)
9. रामायण काल के जनपद : महाभारत के काल में 16 महाजनपद होते थे। जैन पुराणों अनुसार 18 महाजनपद होते थे। राम के काल 5114 ईसा पूर्व में 9 प्रमुख महाजनपद थे जिसके अंतर्गत उपजनपद होते थे। ये 9 इस प्रकार हैं- 1.मगध, 2.अंग (बिहार), 3.अवन्ति (उज्जैन), 4.अनूप (नर्मदा तट पर महिष्मती), 5.सूरसेन (मथुरा), 6.धनीप (राजस्थान), 7.पांडय (तमिल), 8. विन्ध्य (मध्यप्रदेश) और 9.मलय (मलावार)। उक्त महाजनपदों के अंतर्गत ही कैकयी, कौशल, अवध, मिथिला आदि जनपद होते थे। इन्हीं महाजनपदों में खासकर अवध, कैकयी, कौशल, प्रयाग, चित्रकूट, जनकपुर (मिथिला), दण्डकारण्य, महाकान्तर, तालीमन्नार, किष्किन्धा, रामेश्वरम, लंका, कंपिल, नैमिषारण्य, गया, अवंतिका, शूरसेन (मथुरा), कम्बोज, कुशावती, दशार्ण (विदिशा), निषाद, काशी, पंचवटी, मलय आदि कई क्षेत्र प्रसिद्ध थे।
10. रामायण काल का भूगोल : सूर्यसिद्धांत और वाल्मिकी रामायण में रामायण काल के दौरा का भूगोल बताया गया है। इसमें आज की लंका से कई गुना बड़ी थी रामायण काल की लंका जिसमें लंका के पास के द्वीप भी शामिल थे। इसी तरह उस दौर में हिमालय के लगभग सभी देश और राज्य भी उक्त महाजनपदों के अंतर्गत ही आते थे।
संदर्भ ग्रंथ सूची:-
1.वाल्मीकि रामायण।
2.रामकथा उत्पत्ति और विकास: डॉ. फादर कामिल बुल्के।
3.लंकेश्वर (उपन्यास): मदनमोहन शर्मा ‘शाही'।
4.हिन्दी प्रबंध काव्य में रावण: डॉ. सुरेशचंद्र निर्मल।
5.रावण-इतिहास: अशोक कुमार आर्य।
6. प्रमाण तो मिलते हैं: डॉ. ओमकारनाथ श्रीवास्तव (लेख) 27 मई 1973।
7.महर्षि भारद्वाज तपस्वी के भेष में एयरोनॉटिकल साइंटिस्ट (लेख) विचार मीमांसा 31. अक्टूबर 2007।
8. विजार्ड आर्ट।
9.चैरियट्स गॉड्स: ऐरिक फॉन डानिकेन।
10.क्या सचमुच देवता धरती पर उतरे थे डॉ. खड्ग सिंह वल्दिया (लेख) धर्मयुग 27 मई 1973।
Feb 09, 2021 Rate: 4.00
