July 25, 2026
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    धर्म संसार /शौर्यपथ / पूर्णिमा तिथि का हिंदू धर्म में विशेष महत्व होता है। पूर्णिमा के दिन चंद्रमा पूर्ण होता है। सूर्य और चंद्रमा समसप्तक अवस्था में होते हैं। कहा जाता है कि पूर्णिमा तिथि के स्वामी चंद्रमा होते हैं। इस दिन हर तरह की मानसिक समस्याओं से मुक्ति मिल जाती है। पूर्णिमा तिथि के दिन दान, स्नान और ध्यान का विशेष महत्व होता है। इस साल मार्गशीर्ष पूर्णिमा 30 दिसंबर को है। यह साल की आखिरी पूर्णिमा है।
    मार्गशीर्ष पूर्णिमा तिथि और शुभ मुहूर्त-
    पूर्णिमा तिथि प्रारंभ- 29 दिसंबर को शाम 7 बजकर 55 मिनट से शुरू होगी और 30 दिसंबर को रात 8 बजकर 59 मिनट पर समाप्त होगी।
    जानिए पूर्णिमा की खास बातें-
    चंद्रमा अपनी सबसे मजबूत स्थिति में होगा।
    पूर्णिमा को स्नान और दान करने से चंद्र दोष दूर होता है।
    पूर्णिमा के दिन विधि-विधान से पूजा और व्रत करने से घर में खुशहाली आती है।
    अमृत और अमरता का कारक चंद्रमा बलवान होता है।
    आर्थिक स्थिति मजबूत होती जाती है।
    मार्गशीर्ष पूर्णिमा के दिन कैसे करें स्नान और ध्यान-
    स्नान के बाद संकल्प लें।
    जल में तुलसी के पत्ते डालें।
    जल को सिर पर लगाकर प्रणाम करें।
    इसके बाद सूर्य देव को अर्घ्य दें।
    अब सूर्य देव के मंत्रों का जाप करें।
    मंत्र जाप के बाद सफेद वस्तुओं और जल का दान करें।
    रात को चंद्रमा को अर्घ्य जरूर दें।

    धर्म संसार / शौर्यपथ / भगवान दत्तात्रेय को भगवान विष्णु का अवतार माना जाता है। कुछ मान्यताओं के अनुसार, इन्हें भगवान शिव का स्वरूप माना गया है। कहा जाता है कि मार्गशीर्ष मास की पूर्णिमा के दिन दत्तात्रेय जयंती पर पूजा करने पर विष्णु और शिव की कृपा मिलती है। इस बार यह तिथि 29 दिसंबर को पड़ रही है। कहते हैं कि दत्तात्रेय में ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों दव की शक्तियां समाहित हैं। इसके साथ ही इनकी गणना भगवान विष्णु के 24 अवतारों में छठे स्थान पर की जाती है।
    भगवान दत्तात्रेय की पूजा विधि-
    मान्यता है कि भगवान दत्तात्रेय की विधि-विधान से पूजा करने से मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। इसके अलावा भगवान विष्णु और शिवजी की कृपा से सभी बिगड़े काम बन जाते हैं। मान्यताओं के अनुसार दत्तात्रेय जी ने 24 गुरुओं से शिक्षा प्राप्त की थी और इन्हीं के नाम पर ही दत्त समुदाय का उदय हुआ। दक्षिण भारत में इनका प्रसिद्ध मंदिर भी है।
    1. भगवान दत्तात्रेय की पूजा के लिए घर के मंदिर या फिर किसी पवित्र स्थान पर इनकी प्रतिमा स्थापित करें।
    2. अब उन्हें पीले फूल और पीली चीजें अर्पित करें।
    3. इसके बाद इनके मन्त्रों का जाप करें।
    4. मंत्र इस प्रकार हैं ‘;ॐ द्रां दत्तात्रेयाय स्वाहा’ दूसरा मंत्र ‘ॐ महानाथाय नमः’।
    5. मंत्रों के जाप के बाद भगवान से कामना की पूर्ति की प्रार्थना करें।
    6. इस दिन एक वेला तक उपवास या व्रत रखना चाहिए।
    भगवान दत्तात्रेय के जन्म की कथा-
    पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार तीन देवियों को अपने सतीत्व यानी पतिव्रता धर्म पर अभिमान हो गया। तब भगवान विष्णु ने लीला रची। तब नारद जी ने तीनों लोकों का भ्रमण करते हुए देवी सरस्वती, लक्ष्मी और पार्वती जी के समक्ष अनसूया के पतिव्रता धर्म की प्रशंसा कर दी। इस पर तीनों देवियों ने अपने पतियों से अनसूया के पतिधर्म की परीक्षा लेने का हठ किया।
    तब त्रिदेव ब्राह्मण के वेश में महर्षि अत्रि के आश्रम पहुंचे, तब महर्षि अत्रि घर पर नहीं थे। तीन ब्राह्मणों को देखकर अनसूया उनके पास गईं। वे उन ब्राह्मणों का आदरसत्कार करने के लिए आगे बढ़ी तब उन ब्राह्मणों ने कहा कि जब तक वे उनको अपनी गोद में बैठाकर भोजन नहीं कराएंगी, तब तक वे उनकी आतिथ्य स्वीकार नहीं करेंगे। उनके इस शर्त से अनसूया चिंतित हो गईं। फिर उन्होंने अपने तपोबल से उन ब्राह्मणों की सत्यता जान गईं। भगवान विष्णु और अपने पति अत्रि को स्मरण करने के बाद उन्होंने कहा कि यदि उनका पतिव्रता धर्म सत्य है तो से तीनों ब्राह्मण 6 माह के शिशु बन जाएं। अनसूया ने अपने तपोबल से त्रिदेवों को शिशु बना दिया। शिशु बनते ही तीनों रोने लगे।
    तब अनसूया ने उनको अपनी गोद में लेकर दुग्धपान कराया और उन तीनों को पालने में रख दिया। उधर तीनों देवियां अपने पतियों के वापस न आने से चिंतित हो गईं। तब नारद जी ने उनको सारा घटनाक्रम बताया। इसके पश्चात तीनों देवियों को अपने किए पर बहुत ही पश्चाताप हुआ। उन तीनों देवियों ने अनसूया से क्षमा मांगी और अपने पतियों को मूल स्वरूप में लाने का निवेदन किया।

    लोगों को अब हाट बाजार और अपने रोजी के लिए आने-जाने में हुई सुविधा

    रायपुर / शौर्यपथ / छत्तीसगढ़ शासन द्वारा अनुसूचित जनजाति और वनांचलों क्षेत्रों में आवागमन की सुविधा पहुंचाने पर विशेष जोर दिया जा रहा है। जनजाति इलाकों में मूलभूत अधोसंरचना के विकास के लिए लगातार कार्य जारी है। बस्तर जिले के बस्तर विकासखंड के पाथरी गोंदियापाल के ग्रामीणों ने कपारी नाला में पुलिया और एप्रोच रोड़ बनाने की मांग प्रशासन के समक्ष रखी। ग्रामीणों ने बताया कि उन्हें कपारी नाला में पुलिया नहीं होने के कारण 10 किलोमीटर का लम्बा रास्ता तय कर दैनिक उपयोग की सामानों का खरीदी-बिक्री हाट बाजार से कर पाते थे साथ ही नाले में पुलिया नहीं होने के कारण दुर्घटना की आशंका हमेशा बनी रहती थी। अब वनांचलों में सड़कों, पुल-पुलियों के बन जाने से लोगों को हाट बाजार और रोजी-रोजगार के कार्यों के लिए आने-जाने की सुविधा हो गई है।
    प्रशासन द्वारा छत्तीसगढ़ ग्रामीण सड़क विकास अभिकरण, भिरलिंगा को बस्तर ब्लाक के पाथरी गांेदियापाल, बांसपानी चेराकुर मार्ग में कपारी नाला में 18 मीटर स्पान पुलियॉ एवं 1.40 किमी. सड़क निर्माण करने का निर्देश विभागीय अधिकारियों को दिया गया था। छत्तीसगढ़ ग्रामीण सड़क विकास अभिकरण द्वारा विशेष केन्द्रीय सहायता मद की एक करोड़ 20 लाख रूपए की राषि से उक्त पुलिया और एप्रोच रोड़ का निर्माण कराया गया है। वर्तमान में पाथरी गांेदियापाल, बांसपानी चेराकुर मार्ग में कपारी नाला में पुलियॉ एवं सड़क निर्माण कार्य कराये जाने से ग्राम वासियों को अस्पताल, स्कूल, हाट-बाजार, ऑगनबाड़ी, उचित मूल्य की दुकान इत्यादि से संबंधित मूलभूत सुविधॉए उपलब्ध हो रही है। पुल एवं सड़क का निर्माण होने से ग्रामीणों को 10 किलोमीटर की जगह 1.50 किमी. दुरी तय करके अपने दैनिक उपयोग हेतु हाट-बाजार, खाद्य सामग्री आसानी से कम समय में उपलब्ध हो जाती है एवं आवागन की सुविधा भी सुलभ हो गई है ।

    जिले के 6,356 पशुपालकों को 3 करोड़ 5 लाख 65 हजार 319 का मिला लाभ

    जांजगीर-चांपा / शौर्यपथ / गोधन न्याय योजना से ग्रामीणों, पशुपालकों को होने वाली अतिरिक्त आमदनी के चलते पशुओं के संरक्षण और संवर्धन का एक अच्छा वातावरण तैयार होने लगा है। छत्तीसगढ़ सरकार की सुराजी गांव योजना नरवा, गरूवा, घुरवा, बाड़ी से गोधन न्याय योजना को जोड़ देने से यह योजना ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए एक मजबूत कड़ी बन गई है। इस योजना से जांजगीर-चांपा जिले के 6,356 पशुपालकों को दूध के अलावा अब गोबर से भी नगदी आमदनी मिलने लगी है। जिले के 15 नगरीय निकायों और 9 विकासखण्डों के ग्रामीण क्षेत्रों के 243 गौठानों में गोबर खरीदी की जा रही है। गोबर विक्रेताओं से 20 जुलाई से 15 दिसंबर तक एक लाख 52 हजार 826.6 क्विंटल गोबर की खरीदी कर 3 करोड़ 5 लाख 65 हजार 319.16 रूपये का भुगमान किया जा चुका है।
    जिले के 15 नगरीय निकायों के 490 पशुपालकों ने गोबर विक्रय के लिए संबंधित गौठानों मे पंजीयन करवाया है। नगरीय निकाय के गोबर विक्रेताओं से 22 हजार 774.76 क्विंटल गोबर की खरीदी की गई है। जिसका भुगतान 45 लाख 54 हजार 953.16 रूपये का ऑनलाइन भुगतान बैंक खाते में किया गया है। इसी प्रकार 09 जनपद पंचायतों में गोबर खरीदी के लिए 236 गौठानों का पंजीयन किया गया है। जिसमें से 228 गौठानों में गोबर की खरीदी प्रारंभ हो गई है। गौठानों में 20 जुलाई से 15 दिसंबर तक एक लाख 30 हजार 051.83 क्विंटल गोबर की खरीदी की गई है। जिसका भुगतान 2 करोड़ 60 लाख 10 हजार 366 रूपये का ऑनलाइन भुगतान बैंक खाते में किया जा चुका है। अकलतरा जनपद के 37 गौठानो में 20 जुलाई से 15 दिसंबर तक 18169.31 क्विंटल गोबर की खरीदी की गई है। इसी प्रकार बम्हनीडीह के 25 गौठानों में 13772.58 क्विंटल, बलौदा जनपद के 17 गौठानों में 15624.9 क्विंटल, डभरा के 20 गौठानों में 16688.55 क्विंटल, जैजैपुर के 25 गौठानों में 10,723.51 क्विंटल, मालखरौदा जनपद के 26 गौठानो में 4,475.12 क्विंटल, नवागढ़ जनपद के 27 गौठानो में 29,896.85 क्विंटल, पामगढ़ जनपद के 23 गौठानो में 11,656.5 क्विंटल और सक्ती जनपद के 28 गौठानो में 9,044.48 क्विंटल गोबर की खरीदी की गई है।

    शायरी /शौर्यपथ /मिर्जा गालिब या मिर्जा असदुल्लाह बेग खान का जन्म 27 दिसंबर 1797 को आगरा उत्तर प्रदेश में हुआ था। कहा जाता है कि गालिब ने सिर्फ 11 साल की उम्र में शायरी लिखने की शुरुआत कर दी थी। मिर्जा मुगल साम्राज्य के अंतिम वर्षों में उर्दू और फारसी के शायर के तौर पर मशहूर हुए। आज उनका जन्मदिन है. आइए, पढ़ते हैं उनकी कुछ चुनिंदा शायरी-
    वो आए घर में हमारे, खुदा की क़ुदरत हैं!
    कभी हम उमको, कभी अपने घर को देखते हैं
    हुई मुद्दत कि 'ग़ालिब' मर गया पर याद आता है,
    वो हर इक बात पर कहना कि यूँ होता तो क्या होता !
    हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पर दम निकले
    बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले
    हम थे मरने को खड़े पास न आया न सही
    आख़िर उस शोख़ के तरकश में कोई तीर भी था
    ये न थी हमारी क़िस्मत कि विसाल-ए-यार होता
    अगर और जीते रहते यही इंतिज़ार होता
    इशरत-ए-क़तरा है दरिया में फ़ना हो जाना
    दर्द का हद से गुज़रना है दवा हो जाना
    न था कुछ तो ख़ुदा था कुछ न होता तो ख़ुदा होता
    डुबोया मुझ को होने ने न होता मैं तो क्या होता

    सेहत /शौर्यपथ /कई लोगों की आदत होती है कि वो खाने के साथ कई चीजें भी अपनी थाली में शामिल कर लेते हैं लेकिन ऐसा करने से पहले आपको जान लेना चाहिए कि आयुर्वेद के अनुसार किन चीजों को साथ खाने की मनाही की गई है। आइए, जानते हैं किन चीजों को एक साथ नहीं खाना चाहिए-
    दूध के साथ ये चीजें खाना हानिकारक
    उड़द की दाल, पनीर, अंडा, मीट
    उड़द की दाल खाने के बाद दूध नहीं पीना चाहिए। हरी सब्जिियां और मूली खाने के बाद भी दूध नहीं पीना चाहिए। अंडा, मीट, और पनीर खाने के बाद दूध पीने से बचना चाहिए। इनको एक साथ खाने से डाइजेशन में दिक्कअत आ सकती है।
    दही के साथ न खाएं ये चीजें
    खट्टे फल
    दही के साथ खासतौर पर खट्टे फल नहीं खाने खहिए। दरअसल, दही और फलों में अलग-अलग एंजाइम होते हैं। इस कारण वे पच नहीं पाते, इसलिए दोनों को साथ लेने की सलाह नहीं दी जाती।
    मछली
    दही की तासीर ठंडी है। उसे किसी भी गर्म चीज के साथ नहीं लेना चाहिए। मछली की तासीर काफी गर्म होती है, इसलिए उसे दही के साथ नहीं खाना चाहिए।
    शहद के साथ क्या न खाएं
    शहद को कभी गर्म करके नहीं खाना चाहिए। चढ़ते हुए बुखार में भी शहद का सेवन नहीं करना चाहिए। इससे शरीर में पित्त बढ़ता है। शहद और मक्ख न एक साथ नहीं खाना चाहिए। घी और शहद कभी साथ में नहीं खाना चाहिए। यहां तक कि पानी में मिलाकर भी शहद और घी का सेवन नुकसानदेह हो सकता है।
    इन चीजों को भी एक साथ खाने से करें परहेज
    - ठंडे पानी के साथ घी, तेल, खरबूज, अमरूद, खीरा, जामुन और मूंगफली नहीं खानी चाहिए।
    - खीर के साथ सत्तू, शराब, खटाई और कठहल नहीं खाना चाहिए।
    - चावल के साथ सिरका नहीं खाना चाहिए।

    सेहत /शौर्यपथ /सर्दियों का मौसम हमारे स्वास्थ्य के लिए बेहद फायदेमंद होता है। सर्दियों के मौसम में हमारे चारों तरफ पोषक तत्वों की भरमार होती है। इन दिनों तरह-तरह के फल और सब्जियां बाजार में मौजूद रहते हैं, जो हमारी सेहत के लिहाज से बेहद फायदेमंद हैं। यह न सिर्फ हमें फिट बनाए रखने में मदद करती हैं, बल्कि हमारे शरीर को कई स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के जोखिम से भी बचाती हैं। हम बना रहे हैं आपके लिए ऐसे 5 फूड्स की लिस्‍ट, जिन्‍हें आपको इस साल और अगले साल भी अपने आहार में शामिल करना है।
    1. हरी पत्तेदार सब्जियां
    हरी पत्तेदार सब्जियों का सेवन आपकी सेहत के लिए बेहद गुणकारी होता है। ताजा हरी पत्तेदार सब्जियों का सेवन करने के लिए सर्दियों का समय सबसे अच्छा है। इनका सर्दियों में कई तरह से सेवन किया जा सकता है। हरी पत्तेदार सब्जियों में विटामिन, मिनरल और वे सभी पोषक तत्व मौजूद होते हैं जिनकी आपके शरीर को आवश्यकता होती है।
    यह न सिर्फ आपका वजन प्रबंधन करने में मददगार हैं, बल्कि यह हमारे इम्‍यून सिस्टम को भी मजबूत बनाती हैं। जिससे आपको कई स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों सुरक्षित रखने में मदद मिलती है।
    2. मौसमी फल
    सर्दियों में शरीर के तापमान की तुलना में, बाहर का तापमान कम हो जाता है। जिससे हमारी इम्युनिटी कमजोर होने लगती है। जिसके चलते हम सर्दियों में सर्दी-खांसी जैसी समस्याओं की चपेट में आसानी से आ जाते हैं। सर्दियों में मौजूद फल और सब्जियां हमारी इम्युनिटी को बूस्ट करने में मदद करते हैं।
    ऐसे में मीठा नींबू, संतरा, सेब, स्ट्रॉबेरी, अमरूद, अनार, पपीता का इन दिनों सेवन करना आपके स्वास्थ्य को बेहतर बनाए रखने में मदद करेगा।
    3. गुड़ और मूंगफली की चिक्की
    चिक्की क्रंची मूंगफली और गुड़ का एक सेहतमंद संयोजन है। इस स्वादिष्ट स्नैक को खाने के लिए सर्दियों का समय सबसे अच्छा है। मूंगफली का शरीर पर गर्म प्रभाव पड़ता है और जब यह गुड़ के साथ मिलता है, तो आपके शरीर को तुरंत ऊर्जा प्रदान करती है। यह आपकी भूख को भी लंबे समय तक शांत रखती है। जिससे वजन प्रबंधन में भी आपको मदद मिलती है।
    4. नट्स और ड्राय फ्रूट्स
    सर्दियों में नट्स और ड्राय फ्रूट्स का सेवन करना बेहद फायदेमंद होता है। क्योंकि काजू, बादाम, किशमिश, मुनक्के, पिस्ता, छुआरे, अखरोट में भरपूर मात्रा में पोषक तत्व मौजूद होते हैं। सर्दियों में नियमित रूप से इनका सेवन करने से आपको इसके स्वास्थ्य संबंधी अनेक लाभ मिलते हैं। नट्स में फाइटोस्टेरॉल, यौगिक होते हैं जो रक्त में कोलेस्ट्रॉल को कम करने में मदद करते हैं।
    साथ ही यह पोटेशियम, फोलेट, विटामिन ई और मैग्नीशियम सहित प्रोटीन, फाइबर, विटामिन और खनिजों से भरपूर होते हैं। अखरोट विटामिन ई, ओमेगा -3 फैटी एसिड, और एंटीऑक्सिडेंट जैसे फ्लेवोनोइड्स से भरपूर होते हैं। जो अल्‍जाइमर को दूर करने और समग्र मस्तिष्क स्वास्थ्य में सुधार करने में मदद करते हैं। यह आपको कई स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से राहत पाने में भी मददगार है।
    5. ग्रीन टी
    सर्दियों में ग्रीन टी न सिर्फ आपको रोगों से बचाती है, बल्कि यह आपके शरीर को गर्म बनाए रखने में भी मदद करती है। ग्रीन टी पीने से आप अपने शरीर की बीमारियों से लड़ने की क्षमता को बेहतर बना सकते हैं। क्योंकि इसमें मुख्य रूप से एंटी-ऑक्सीडेंट गुण मौजूद होते हैं, जो हमारे सिस्टम को मुक्त कणों से लड़ने में मदद करता है। इसमें थोड़ी मात्रा में कैफीन भी होता है, जो आपको ठंड के मौसम में होने वाली सुस्ती को मात देने में मदद कर सकता है।

    शौर्यपथ / पशु, पक्षी, पितर, दानव और देवताओं की जीवन चर्या के नियम होते हैं, लेकिन मानव अनियमित जीवन शैली के चलते धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष से अलग हो चला है। रोग और शोक की गिरफ्तर में आकर समय पूर्व ही वह दुनिया को अलविदा कह जाता है या वह दुनिया को खराब करने का जिम्मेदार है।
    सनातन धर्म ने हर एक हरकत को नियम में बांधा है और यह नियम ऐसे हैं जिससे आप किसी भी प्रकार का बंधन महसूस नहीं करेंगे, बल्कि यह नियम आपको सफल और निरोगी ही बनाएँगे।
    ।।कराग्रे वस्ते लक्ष्मी, कर मध्ये सरस्वती।
    कर पृष्ठे स्थितो ब्रह्मा, प्रभाते कर दर्शनम्‌॥
    प्रात:काल जब निद्रा से जागते हैं तो सर्व प्रथम बिस्तर पर ही हाथों की दोनों हथेलियों को खोलकर उन्हें आपस में जोड़कर उनकी रेखाओं को देखते हुए उक्त का मंत्र एक बार मन ही मन उच्चारण करते हैं और फिर हथेलियों को चेहरे पर फेरते हैं।
    पश्चात इसके भूमि को मन ही मन नमन करते हुए पहले दायां पैर उठाकर उसे आगे रखते हैं और फिर शौच आदि से निवृत्त होकर पांच मिनट का ध्यान या संध्यावंदन करते हैं।
    संध्यावंदन :
    शास्त्र कहते हैं कि संध्यावंदन पश्चात ही किसी कार्य को किया जाता है। संध्या वंदन को संध्योपासना भी कहते हैं। संधि काल में ही संध्या वंदन की जाती है। वैसे मुख्यत: संधि 5 वक्त की होती है, लेकिन प्रात: काल और संध्‍या काल- उक्त दो वक्त की संधि प्रमुख है। अर्थात सूर्य उदय और अस्त के वक्त। इस समय मंदिर या एकांत में शौच, आचमन, प्राणायामादि कर गायत्री छंद से निराकार ईश्वर की प्रार्थना की जाती है।
    घर से बाहर जाते वक्त :
    घर (गृह) से बाहर जाने से पहले माता पिता के पैर छुए जाते हैं फिर पहले दायां पैर बाहर निकालकर सफल यात्रा और सफल मनोकामना की मन ही मन ईश्वर के समक्ष इच्छा व्यक्त की जाती है।
    किसी से मिलते वक्त :
    कुछ लोग राम-राम, गुड मॉर्निंग, जय श्रीकृष्ण, जय गुरु, हरि ओम, साँई राम या अन्य तरह से अभिवादन करते हैं। लेकिन संस्कृत शब्द नमस्कार को मिलते वक्त किया जाता है और नमस्ते को जाते वक्त। फिर भी कुछ लोग इसका उल्टा भी करते हैं।
    कुछ विद्वानों का मानना है कि नमस्कार सूर्य उदय के पश्चात्य और नमस्ते सूर्यास्त के पश्चात किया जाता है। कश्मीर से कन्याकुमारी तक हिंदुओं ने अभिवादन के अपने-अपने तरीके इजाद कर लिए हैं जो सही है या गलत हम नहीं जानते।
    कोरोना काल के बाद अब सब नमस्ते का महत्व समझने लगे हैं...

    धर्म संसार / शौर्यपथ / मां बगलामुखी की उपासना हर कोई बताता है लेकिन आराधना और उपासना से जो चमत्कारी लाभ मिलते हैं वह कोई नहीं जानता। बगलामुखी उपासना के लिए सवा लाख जाप का विधान है।
    बगलामुखी साधना के दौरान हवन में दूधमिश्रित तिल व चावल डालने पर धन, संपत्ति और ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है।
    संतान सुख की प्राप्ति के लिए अशोक और कनेर के पत्तों द्वारा हवन करना चाहिए।
    सभी रोगों से छुटकारा पाने के लिए कुम्हार के चाक की मिट्टी, एक हाथ लंबाई की अरंड की लकड़ी, शहद या चीनी में भुना हुआ चावल से हवन करना चाहिए। इससे लंबे समय से बने रोग से सदा के लिए मुक्ति मिलती है।
    गुग्गुल और तिल से हवन करने पर जेल के बंधन या शत्रु के नकारात्मक प्रभाव से मुक्ति मिलती है।
    शहद मिला तिल या सरसों से हवन करने से अभीष्ट व्यक्ति वशीभूत हो जाता है। वशीकरण का यह उपाय बहुत ही अचूक परिणाम देता है।
    हरिताल, नमक और हल्दी से हवन करने से शत्रुओं को निष्प्रभावित किया जाता है।
    36 अक्षरों वाले इस मां बगलामुखी मंत्र में है गजब की ताकत, साधना में रखें ये सावधानियां, पढ़ें विधि
    सतयुग में एक समय भीषण तूफान उठा। इसके परिणामों से चिंतित हो भगवान विष्णु ने तप करने की ठानी। उन्होंने सौराष्ट्र प्रदेश में हरिद्रा नामक सरोवर के किनारे कठोर तप किया। इसी तप के फलस्वरूप सरोवर में से भगवती बगलामुखी का अवतरण हुआ। हरिद्रा यानी हल्दी होता है। अत: मां बगलामुखी के वस्त्र एवं पूजन सामग्री सभी पीले रंग के होते हैं। बगलामुखी मंत्र के जप के लिए भी हल्दी की माला का प्रयोग होता है।
    प्राचीन तंत्र ग्रंथों में दस महाविद्याओं का उल्लेख मिलता है। 1. काली 2. तारा 3. षोड़षी 4. भुवनेश्वरी 5. छिन्नमस्ता 6. त्रिपुर भैरवी 7. धूमावती 8. बगलामुखी 9. मातंगी 10. कमला। मां भगवती श्री बगलामुखी का महत्व समस्त देवियों में सबसे विशिष्ट है।
    साधनाकाल की सावधानियां :-
    - ब्रह्मचर्य का पालन करें।
    - पीले वस्त्र धारण करें।
    - एक समय भोजन करें।
    - बाल नहीं कटवाए।
    - मंत्र के जप रात्रि के 10 से प्रात: 4 बजे के बीच करें।
    - दीपक की बाती को हल्दी या पीले रंग में लपेट कर सुखा लें।
    - साधना में छत्तीस अक्षर वाला मंत्र श्रेष्ठ फलदायी होता है।
    - साधना अकेले में, मंदिर में, हिमालय पर या किसी सिद्ध पुरुष के साथ बैठकर की जानी चाहिए।
    मंत्र-सिद्ध करने की विधि :-
    - साधना में जरूरी श्री बगलामुखी का पूजन यंत्र चने की दाल से बनाया जाता है।
    - अगर सक्षम हो तो ताम्रपत्र या चांदी के पत्र पर इसे अंकित करवाए।
    - बगलामुखी यंत्र एवं इसकी संपूर्ण साधना यहां देना संभव नहीं है। किंतु आवश्‍यक मंत्र को संक्षिप्त में दिया जा रहा है ताकि जब साधक मंत्र संपन्न करें तब उसे सुविधा रहे।
    मां बगलामुखी का प्रभावशाली मंत्र
    विनियोग -
    अस्य : श्री ब्रह्मास्त्र-विद्या बगलामुख्या नारद ऋषये नम: शिरसि।
    त्रिष्टुप् छन्दसे नमो मुखे। श्री बगलामुखी दैवतायै नमो ह्रदये।
    ह्रीं बीजाय नमो गुह्ये। स्वाहा शक्तये नम: पाद्यो:।
    ॐ नम: सर्वांगं श्री बगलामुखी देवता प्रसाद सिद्धयर्थ न्यासे विनियोग:।
    आवाहन
    ॐ ऐं ह्रीं श्रीं बगलामुखी सर्वदृष्टानां मुखं स्तम्भिनि सकल मनोहारिणी अम्बिके इहागच्छ सन्निधि कुरू सर्वार्थ साधय साधय स्वाहा।
    ध्यान
    सौवर्णामनसंस्थितां त्रिनयनां पीतांशुकोल्लसिनीम्
    हेमावांगरूचि शशांक मुकुटां सच्चम्पकस्रग्युताम्
    हस्तैर्मुद़गर पाशवज्ररसना सम्बि भ्रति भूषणै
    व्याप्तांगी बगलामुखी त्रिजगतां सस्तम्भिनौ चिन्तयेत्।
    मंत्र
    - ह्रीं बगलामुखी सर्वदुष्टानां वाचं मुखं पदं स्तंभय जिह्ववां कीलय बुद्धि विनाशय ह्रीं ॐ स्वाहा।
    इन 36 अक्षरों वाले मंत्र में अद्‍भुत प्रभाव है। इसको 1 लाख जाप द्वारा सिद्ध किया जाता है। जप की संपूर्णता के पश्चात् दशांश यज्ञ एवं दशांश तर्पण भी आवश्यक है। अधिक सिद्धि हेतु 5 लाख जप भी किए जा सकते हैं।
    मां बगलामुखी यंत्र मुकदमों में सफलता तथा सभी प्रकार की उन्नति के लिए सर्वश्रेष्ठ माना गया है। कहते हैं इस यंत्र में इतनी क्षमता है कि यह भयंकर तूफान से भी टक्कर लेने में समर्थ है।

    शिक्षा /शौर्यपथ / धन मिलना, बढ़ना और बचना बहुत जरूरी है। कई लोगों को यह शिकायत रहती है कि पैसे इस हाथ आता है और उस हाथ चला भी जाता है। कुछ को शिकायत रहती है कि पैसा आता ही नहीं तो बढ़ेगा कैसे। सांसारिक जीवन में अर्थ बिना सब व्यर्थ है। इसीलिए हम जानते हैं वे चार तरीके जिनसे धन सुरक्षित भी रहेगा।
    हिन्दू धर्मग्रंथ महाभारत की विदुर नीति में लक्ष्मी का अधिकारी बनने के लिए विचार और कर्म से जुड़े 4 अहम सूत्र बताए गए हैं। जानिए, ये चार तरीके जिनको अपनाकर ज्ञानी हो या अल्प ज्ञानी दोनों ही धनवान बन सकते हैं।
    श्लोक:-
    श्रीर्मङ्गलात् प्रभवति प्रागल्भात् सम्प्रवर्धते।
    दाक्ष्यात्तु कुरुते मूलं संयमात् प्रतितिष्ठत्ति।।
    इस श्लोक का अर्थ विस्तार:-
    1.पहला तरीका
    अच्छे या मंगल कर्म से स्थाई रूप से लक्ष्मी आती है। इसका मतलब यह कि परिश्रम और ईमानदारी से किए गए कार्यों से धन की प्राति होती है।
    2.दूसरा तरीका
    प्रगल्भता अर्थात धन का सही प्रबंधन और निवेश एवं बचत से वह लगातार बढ़ता है। यदि हम धन को उचित आय बढ़ने वाले सही कार्यों में लगाएंगे तो निश्चित ही लाभ मिलेगा।
    3.तीसरा तरीका
    चातुर्य या चतुराई अर्थात अगर धन का सोच-समझकर उपयोग किया जाए और आय-व्यय का विशेष रूप से ध्यान रखा जाए तो धन की बचत भी होगी और वह बढ़ता भी रहेगा। इससे धन का संतुलन बना रहेगा।
    4.चौथा तरीका
    चौथा और अंतिम सूत्र संयम अर्थात मानसिक, शारीरिक और वैचारिक संयम रखने से धन की रक्षा होती है। इसका मतलब यह कि सुख पाने और शौक पूरा करने की चाहत में धन का दुरुपयोग न करें। धन को घर और परिवार की आवश्यक जरूरतों पर ही खर्च करें।
    तो यह था विदुर नीति अनुसार धन को प्राप्त करने, बढ़ाने और बचाने के चार तरीके। दरअसल, हमें धन को बचाने से ज्यादा उसे बढ़ाने की दिशा में ज्यादा सोचना चाहिए। आप यहां यह भी जान लें कि धन उस परिवार में ही टिकता हैं जहां प्रसन्नता, प्रेम, भाईचारा और स्वच्छता विद्यमान है। यह भी जरूरी है कि घर होना चाहिए वास्तु अनुसार।

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