September 08, 2026
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    सेहत / शौर्यपथ / मौसम बदलने के साथ ही मच्छरों का आतंक भी शुरू हो जाता है। ऐसे में मच्छर भगाने के लिए कितने ही उपाय क्यों न कर लें लेकिन मच्छर काट ही लेते हैं। नींद खराब करने वाले मच्छर कभी-कभी इतने खतरनाक होते हैं कि उनके काटने से एलर्जी तक हो जाती है। खासतौर पर मच्छरों के काटने से कई बार लाल रंग के चकत्ते पड़ जाते हैं। चेहरे पर ये लाल रंग के निशान और भी बेकार लगते हैं। कभी-कभी इन चकत्तों से छुटकारा पाने में 6-7 दिनों से ज्यादा का वक्त लग जाता है। ऐसे में अगर आपके चेहरे पर मच्छरों के काटने के बाद अगर लाल रंग के निशान पड़ जाएं, तो आप कुछ घरेलू उपायों का इस्तेमाल करके इनसे छुटकारा पा सकते हैं।
    सेब का सिरका
    सेब का सिरका स्किन और हेयर के लिए इस्तेमाल किया जाता है। साथ ही वजन घटाने के लिए भी सेब का सिरका पानी में मिलाकर पिया जाता है। आपके चेहरे पर अगर मच्छर काटने से निशान पड़ जाएं, तो आप तीन चम्मच पानी में आधा चम्मच सेब का सिरका मिलाकर लगा लें। निशान गायब हो जाएंगे।
    नींबू का छिलका
    अगर मच्छर के काटने से चकत्ते बन गए हैं तो उस जगह पर नींबू का छिलका लगाएं। इससे आपके चकत्ते के निशान गायब हो जाएंगे। खुजली भी नहीं होगी।
    प्याज का टुकड़ा
    मच्छर के काटने से बनने वाले चकत्ते के निशान पर प्याज का टुकड़ा लगाएं। इससे निशान दूर हो जाएंगे और खुजली भी खत्म हो जाएंगी।
    बेकिंग सोडा
    बेकिंग सोडे में पानी मिलाकर पहले से ही घोल बना लें। जब भी मच्छर काटें तो काटे वाले स्थान पर लगा लें। इससे चकत्ते के निशान दूर हो जाएंगे और खुजली भी कम हो जाएंगी।
    एलोवेरा जेल
    आपकी स्किन पर मच्छर काटने की परेशानी को दूर करेगा। साथ ही स्किन पर ठंडकता भी प्रदान करेगा। अगर मच्छर काटने के स्थान से खून निकल रहा है, तो यह उसे भी ठीक कर देगा और स्किन पर जलन और खुजली की परेशानी को दूर करेगा।

    सेहत / शौर्यपथ / कोरोना महामारी ने दुनियाभर में लोगों की नींद और चैन छीन लिया है। संक्रमण की वजह से शुरुआत में लगे लॉकडाउन के चलते लोगों की जीवनशैली में अनचाहे बदलाव आए। एक नए शोध के मुताबिक लॉकडाउन के दौरान लोगों के खान-पान में आए बदलाव के चलते मोटापे से जूझ रहे लोगों को सबसे ज्यादा परेशानियों का सामना करना पड़ा। इसके चलते नींद भी बुरी तरह प्रभावित हुई।
    अमेरिकी शोधकर्ताओं द्वारा किए गए एक अध्ययन से यह खुलासा हुआ है। जर्नल ओबेसिटी में प्रकाशित इस अध्ययन ने महामारी के व्यापक प्रतिबंधों के तहत लोगों के स्वास्थ्य व्यवहारों में होने वाले अनजाने परिवर्तनों का मूल्यांकन किया। अमेरिका में लुइसियाना स्टेट यूनिवर्सिटी (एलएसयू) के शोधकर्ताओं ने यह अध्ययन किया। उनके अनुसार लॉकडाउन के दौरान लोगों का वजन काफी बढ़ा। परिणामस्वरूप स्वास्थ्य संबंधी तमाम समस्याएं पैदा हो गईं।
    लुइसियाना स्टेट यूनिवर्सिटी से अध्ययन की सह-लेखक लीन रेडमैन ने कहा, लॉकडाउन के दौरान लोगों ने पौष्टिक भोजन का सेवन ज्यादा किया और घर पर रहकर खाने-पीने पर पूरा ध्यान दिया,वहीं, दूसरी तरफ शारीरिक गतिविधियां बहुत कम हो गईं। व्यायाम नहीं किया। घर से काम करने के चलते नींद का पैटर्न बदल गया। रात को देरी से सोने की वजह से नींद में खलल आई और नींद पूरी नहीं हुई। काम के घंटों में बढ़ोतरी और स्क्रीन पर बिताए गए समय ने नींद की खलल में बहुत बड़ी भूमिका अदा की। नींद की आदतें बदलने की वजह से लोगों में चिंता का स्तर काफी बढ़ गया।
    मानसिक सेहत पर असर पड़ा
    रेडमैन ने कहा, अध्ययन में पाया गया कि मोटापे से ग्रस्त लोगों ने अपनी डाइट में सबसे ज्यादा सुधार किया लेकिन इस बीच उन उनकी मानसिक सेहत पर विपरीत असर पड़ा। वजन बढ़ने का अनुभव करने के साथ-साथ उनका मानसिक स्वास्थ्य बिगड़ गया। मोटापे से ग्रसित एक तिहाई लोगों ने यह स्वीकार किया कि लॉकडाउन के दौरान उनकी यह बीमारी पहले से ज्यादा बढ़ गई। अध्ययन से पता चलता है कि मोटापे जैसी बीमारी सिर्फ शारीरिक सेहत पर नहीं, बल्कि मन की सेहत पर भी असर डालती है।
    अप्रैल माह में हुए इस अध्ययन में 7,754 लोगों ने हिस्सा लिया। प्रतिभागियों में से अधिकांश ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, ब्रिटेन और अमेरिकर के निवासी थे। इनके अलावा इसमें 50 से अधिक अन्य देशों ने भी भाग लिया।

    शौर्यपथ /कोरोना महामारी के शुरुआती दौर में गर्भवती महिलाओं के बीच काफी डर था। महामारी के बढ़ते प्रकोप के चलते होने वाले बच्चों को क्या परेशानियां हो सकती है, इस बारे में कुछ भी कहना मुश्किल था लेकिन धीरे-धीरे कई प्रेगनेंसी और डिलीवरी जुड़ी गलतफहमियों को दूर हो गईं। यह बात सच है कि कोरोना महामारी के दौरान जन्म लेने वाले बच्चों की देखभाल में कुछ सावधानियों की जरुरत है लेकिन डर की बजाय कुछ बातों को ध्यान रखकर बच्चे को कोरोना से बचाना आसान है। अर्बन डिक्श नरी डॉट कॉम के अनुसार, साल 2020 में दस्त क देने वाली इस महामारी के दौरान बच्चों के जन्म की दर में इजाफा हुआ है और इस दौर में पैदा हुए जेनरेशन को कोरोनियल कहा गया है। कोरोनियल जेनरेशन के अधिकतर बच्चे दिसंबर 2020 के बाद और साल 2021 में वसंत ऋतु आने तक पैदा होंगे।
    कई हेल्थ एक्सपर्ट का मानना है कि कोरोना काल में जन्म लेने वाले बच्चों के साथ कुछ फायदे भी जुड़े हुए हैं।
    -इस समय कई लोग घर से ही काम कर रहे हैं कि इसलिए वर्किंग मदर्स डिलीवरी के बाद जल्दक ही काम जॉइन करने का ऑप्शन है और उन्हें ऑफिस से ज्यादा लंबी छुट्टी लेने की जरूरत नहीं है, जिससे बच्चे की देखभाल करने में आसानी होगी और बच्चा 24 घंटे मां के नजरों के सामन रहेगा।

    -कोरोना काल में कई पुरुष भी घर पर काम कर रहे हैं, तो प्रेगनेंसी के दौरान और डिलीवरी के बाद भी पार्टनर का साथ मिलेगा, जो पहले ऑफिस जाने पर मिलना मुश्किल होता था। इससे बच्चे को माता और पिता दोनों का साथ मिल पाएगा, जिससे उसका ध्यान रखना आसान होगा।
    -इस समय घर पर मेहमान भी कम आ रहे हैं, इसलिए आप घर पर शांति से आराम और देखभाल मिलेगी और अपने बच्चे को बार-बार किसी की गोद में देने की भी जरूरत नहीं है।

    लाइफस्टाइल / शौर्यपथ / सोशल मीडिया भारत की खूबसूरती को दिखाने वाले कई वीडियो वायरल होते रहते हैं। लॉकडाउन के दौरान प्रदूषण में भारी कमी देखने को मिली थी, जिसके बाद पहाड़ी इलाकों से सटे कई शहरों से पहाड़ दिख रहे थे। वहीं, सड़कों पर कई जंगली जानवरों की चहल-कदमी के वीडियो भी सामने आए थे। हाल ही में एक और वीडियो ने यूजर्स का दिल जीत लिया है। दरअसल, सोशल मीडिया पर केदारनाथ के अनुपम सौंदर्य का वीडियो वायरल हुआ है। जिसमें केदारनाथ मंदिर के पीछे साफतौर पर हिमालय पर्वत का सुंदर नजारा दिख रहा है।
    बादलों से घिरे पर्वत की खूबसूरती देखकर सोशल मीडिया यूजर्स इसे महादेव की कृपा बता रहे हैं। हिमालय के इस अलौकिक सौंदर्य को देखकर ट्विटर पर यूजर्स हर हर महादेव के साथ इस वीडियो को रिट्वीट कर रहे हैं। इस वीडियो को देखने से पता चलता है कि इसे किसी ने मोबाइल से रिकॉर्ड किया है। ट्विटर पर अब तक लाखों यूजर्स इसे देख चुके हैं। केदारनाथ के इस वीडियो को इंडियन फॉरेस्ट सर्विस ऑफिसर परवीन कासवान ने भी अपने ट्विटर अकाउंट पर शेयर किया है। केदारनाथ के इस अनुपम सौंदर्य वाले वीडियो को देखकर किसी का मन भी खुश हो जाएगा।
    फिलहाल यह वीडियो कब और किसने बनाया इसके बारे में साफतौर तक नहीं कहा जा सकता और ‘लाइव हिन्दुस्तान’ इस वीडियो की प्रामाणिकता की पुष्टि भी नहीं करता।

    शौर्यपथ / व्रत में खाए जाने वाली चीजों में साबूदाना सबसे ज्यादा खाया जाता है व्रत के बिना भी कुछ लोग इसे अपनी दिनचर्या में शामिल करते हैं लेकिन क्या आप जानते हैं कि भारत में खाए जाने वाले यह आहार आखिर कैसे बनता है? आइए, जानते हैं इससे जुड़े फायदे-
    इस पेड़ के तने से बनता है साबूदाना
    साबूदाना किसी अनाज से नहीं बनता है, बल्कि यह सागो पाम नामक पेड़ के तने के गूदे से बनता है। सागो, ताड़ की तरह का एक पेड़ होता है। ये मूलरूप से पूर्वी अफ्रीका का पौधा है। इस पेड़ का तना मोटा हो जाता है और इसके बीच के हिस्से को पीसकर पाउडर बनाया जाता है। इसके बाद इस पाउडर को छानकर गर्म किया जाता है जिससे दाने बन सके। साबूदाना के निर्माण के लिए एक ही कच्चा माल है ‘टैपिओका रूट’ जिसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ‘कसावा’ के रूप में जाना जाता है। कसावा स्टार्च को टैपिओका कहा जाता है।
    ऐसे बनता है साबूदाना
    भारत में साबूदाना टैपिओका स्टार्च से बनाया जाता है। Tapioca स्टार्च को बनाने के लिए कसावा नामक कंद का इस्तेमाल किया जाता है जो बहुत हद तक शकरकंद जैसा होता है। इस गूदे को बड़े-बड़े बर्तनों में निकालकर आठ-दस दिन के लिए रखा जाता है और रोजाना इसमें पानी डाला जाता है। इस प्रक्रिया को 4-6 महीने तक बार-बार दोहराया जाता है। उसके बाद बनने वाले गूदे को निकालकर मशीनों में डाल दिया जाता है और इस तरह साबूदाना प्राप्त होता है, जिसे सुखाकर ग्लूकोज और स्टार्च से बने पाउडर की पॉलिश की जाती है और इस तरह सफेद मोतियों से दिखने वाले साबूदाने बाजार में आने के लिए तैयार हो जाते हैं।
    इन गुणों से भरा है साबूदाना
    इसमें कार्बोहाइड्रेट काफी मात्रा में पाया जाता है और कैल्शियम और विटामिन-सी की कुछ मात्रा भी मौजूद होती है। इसी कारण व्रत में इससे बनी चीजें खाने का चलन बढ़ता गया है। इससे खिचड़ी, हलवा, चाट आदि व्रत वाली रेसिपीज बनाई जाती है।

    धर्म संसार / शौर्यपथ / मां दुर्गा का नौ दिनों का पावन पर्व कन्या पूजन के साथ ही समाप्त होता है। कुछ लोग अष्टमी को तो कुछ लोग अपने नवमी को अपनी परंपराओं के अनुसार कन्या पूजन करते हैं। ऐसे में मां कन्या पूजन को शुभ मुहूर्त में सही विधि विधान से किया जाना चाहिए। इस बार अष्टमी और नवमी तिथि को लेकर सभी कंफ्यूज हैं ,तो हम आपको बता दें कि शुक्रवार को सप्तमी का व्रत है, जो लोग अष्टमी को कन्या पूजन करते हैं, वे लोग सप्तमी शुक्रवार को व्रत रखेंगे और शनिवार को अष्टमी का कन्या पूजन करेंगे। इसके अलावा जो लोग नवमी को कन्या पूजन करते हैं, वे लोग शनिवार को अष्टमी का व्रत रखेंगे और रविवार को कन्या पूजन करेंगे।
    कन्या पूजन विधि
    इस बार किसी भी नवरात्रि व्रत का क्षय नहीं हुआ है। नवरात्रि के नौ दिनों के व्रत हैं। इस बार दशहरा और नवमी एक ही दिन हैं। कन्या पूजन के लिए नौ कन्याओं का पूजन किया जाता है। इनके लिए हलवा पूड़ी और चने प्रसाद के रूप में बनाए जाे हैं। इसके साथ ही कन्याओं को नारियल, फल और दक्षिणा और कहीं, कहीं चूड़िया और बिंदी भी दी जाती है। कन्याओं को सबसे पहले एक साथ बैठाकर उनके पैर एक थाली में धोए जाते हैं। इसके बाद उन्हें कलावा बांधकर तिलक लगाया जाता है, फिर भरपेट भोजन कराया जाता है।

          शौर्यपथ /ग्रीन-टी न सिर्फ दिल, बल्कि दिमाग की सेहत के लिए भी फायदेमंद है। नॉर्थवेस्टर्न यूनिवर्सिटी के हालिया शोध की मानें तो इसमें मौजूद कैफीन 'एडिनोसिनÓ का उत्पादन बाधित करती है। 'एडिनोसिनÓ एक अहम न्यूरोट्रांसमिटर है, जो यह निर्धारित करता है कि व्यक्ति कब सुस्त या तरोताजा महसूस करेगा। इसकी अधिकता से तंत्रिका तंत्र की कोशिकाओं को नुकसान पहुंचने और अल्जाइमर पनपने के संकेत मिले हैं।
    शोध दल में शामिल डॉ. मेलिंडा रिंग के मुताबिक ग्रीन-टी में 'एल-थियानिनÓ नाम का एक यौगिक भी भरपूर मात्रा में पाया जाता है। स्ट्रेस हार्मोन 'कॉर्टिसोलÓ का स्तर घटाने और फील गुड हार्मोन 'सेरोटोनिनÓ का स्त्राव बढ़ाने में इसे खासा असरदार पाया गया है। यह भी देखा गया है कि कैफीन और 'एल-थियानिनÓ मिलकर याददाश्त, तर्क शक्ति व एकाग्रता में इजाफा कर सकते हैं। चूंकि, ग्रीन-टी में कॉफी के मुकाबले कैफीन का स्तर काफी कम होता है, इसलिए इसका सेवन उसके साइडइफेक्ट को भी दूर रखता है।
    रक्तचाप घटाने में कारगर
    रिंग ने ग्रीन-टी को रक्तचाप घटाने में भी बेहद असरदार करार दिया। उन्होंने 2016 में प्रकाशित एक अमेरिकी अध्ययन का हवाला दिया, जिसमें हफ्ते में कम से कम छह कप ग्रीन-टी पीने वालों के हाइपरटेंशन का शिकार होने का खतरा 33 फीसदी कम मिला था।
    कोलेस्ट्रॉल काबू में रहेगा
    शोधकर्ताओं ने बताया कि ग्रीन-टी में 'कैटेचिनÓ नाम का एंटीऑक्सीडेंट भी प्रचुर मात्रा में पाया जाता है। यह खाने में मौजूद कोलेस्ट्रॉल को सोखने की शरीर की क्षमता घटाता है। यही वजह है कि जो लोग दिन में दो कप ग्रीन-टी पीते हैं, उनमें हार्ट अटैक का खतरा आधा हो जाता है।
    हड्डियां-मांसपेशियां मजबूत होंगी
    -ग्रीन-टी हड्डियों और मांसपेशियों की मजबूती के लिए भी अहम है। इसमें मौजूद फ्लैवेनॉयड जहां हड्डियों-मांसपेशियों में क्षरण की शिकायत दूर रखते हैं, वहीं फाइटोएस्ट्रोजन ऊतकों को नुकसान नहीं पहुंचने देते। मांसपेशियों का विकास सुनिश्चित करने में भी उनकी अहम भूमिका है।

    सेहत / शौर्यपथ / कोरोना काल में कई महीने से घर के अंदर रहने के कारण बच्चों को नजर कमजोर हो रही है। उनको दूर की चीजें देखने में दिक्कत महसूस हो रही है। नेत्र रोग विशेषज्ञों के मुताबिक, कोरोना काल में बच्चे घरों में मोबाइल-कम्प्यूटर स्क्रीन पर घंटों काम कर रहे हैं। इससे उन्हें निकट दृष्टि रोग (मायोपिया) हो सकता है, जिसमें दूर की चीजें धुंधली दिखाई देती हैं। दिल्ली के राम मनोहर लोहिया अस्पताल के नेत्र रोग विशेषज्ञ डॉ. राहुल शर्मा के मुताबिक कोरोना के बढ़ते मामलों के बीच फिलहाल घर से ही पढ़ाई हो रही है। कई घंटों तक चलने वाली ऑनलाइन क्लास के दौरान बरती गईं छोटी-छोटी लापरवाही आंखों में खुजली, लालिमा, रुखापन और सिरदर्द को बढ़ा रही हैं। लम्बे समय तक ऐसी स्थिति रही तो इससे मायोपिया हो सकता है। बच्चों में मोबाइल व टीवी के बढ़ते इस्तेमाल, आउटडोर खेलों से दूरी व लगातार पढ़ते रहने से यह बीमारी तेजी से फैल रही है। बच्चों को एक घंटे से ज्यादा मोबाइल या टीवी न इस्तेमाल करने दें।
    धुंधलापन और रूखापन की समस्या
    स्क्रीन पर आंखों की पलकें नहीं झपकती हैं। जिसकी वजह से बच्चों की आंख में चुभन, दर्द, जलन और सूखने की दिक्कतें आ रही हैं। काफी देर बाद स्क्रीन से आंख हटाने पर दूर की चीजें धुंधली दिखने के साथ आंखों में तनाव और थकान लगती है। सिरदर्द, ज्यादा पलक झपकाना, आंख रगडऩा और बच्चों में थकान महसूस करना, देखने में परेशानी के संकेत हो सकते हैं। अगर मायोपिया का इलाज नहीं किया जाता है तो यह भविष्य में मायोपिक मैक्युलर डीजनरेशन, रेटिनल डिटैचमेंट, कैटेरेक्ट्स और ग्लुकोमा जैसी गंभीर बीमारियों की प्रवृत्ति का कारण बन सकती है। पढ़ाई के बीच एक घंटे के अंतराल पर आंखों को आराम देना चाहिए। रोजाना खिड़की से दूर की चीजें दिखाएं।
    दिल्ली और आसपास के 13.1 फीसदी बच्चे मायोपिया के शिकार
    एम्स में कुछ साल पहले हुए अध्ययन के मुताबिक, दिल्ली और इसके आसपास के शहरों में करीब 13.1 फीसदी बच्चे मायोपिया से पीडि़त हैं। ऐसे में डॉक्टरों का कहना है कि कोरोना काल में अभिभावकों को बच्चों पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है।
    ऐसे करें बचाव
    20/20/20 नियम का पालन करें
    गंगाराम अस्पताल के नेत्र रोग विशेषज्ञ डॉक्टर ग्रोवर अभिभावकों को 20/20/20 रूल को फॉलो करने की सलाह देते हैं। इसके तहत हर 20 मिनट में बच्चों को 20 फीट की दूरी पर कम से कम 20 सेकंड के लिए कुछ देखना चाहिए। इससे आपकी आंखों को आराम मिलता है और वे अपने नेचुरल पोज में आ जाती हैं।
    मोबाइल की जगह कंप्यूटर या लैपटॉप इस्तेमाल करें। स्क्रीन की तेज रोशनी से बचाव करने वाले एंटीग्लेयर चश्मे का इस्तेमाल करें। योग को जीवन शैली का हिस्सा बनाएं। बच्चों को ऑनलाइन पढ़ाई के वक्त खुले कमरे या प्राकृतिक रोशनी में बैठाना चाहिए। क्योंकि मोबाइल या लैपटॉप की स्क्रीन की लाइट आंखों पर पड़ती है, जो नुकसानदायक है।
    ये व्यायाम भी करें
    हाथ योग
    अपने दोनों हाथों को तब तक रगड़ें, जब तक की वो गर्म न हो जाएं। अब अपने हाथों को अपनी आंखों पर रख लें। इससे आंखों के आस-पास की नसों को आराम मिलेगा और ब्लड सर्कुलेशन बढ़ेगा।
    आंखों की पुतलियों को क्लॉकवाइस और एंटी-क्लॉकवाइस घुमाएं। ऐसा अपनी आंखें बंद कर के करें। इसे दिन में दो बार करें। हालांकि, इसे आप दिन में दो से अधिक बार भी कर सकते हैं।
    क्या है मायोपिया या निकट दृष्टि रोग
    मायोपिया या निकट दृष्टि रोग में आंख की पुतली (आई बॉल) का आकार बढऩे से प्रतिबिंब रेटिना पर बनने के बजाय थोड़ा आगे बनता है। इससे दूर की वस्तुएं धुंधली और अस्पष्ट दिखाई देती हैं, लेकिन पास की वस्तुएं देखने में कोई परेशानी नहीं होती है।
    कोरोना काल में बच्चों और वयस्कों को घर पर घंटों ऑनलाइन काम करना पड़ रहा है। इससे उनकी आंखों की रोशनी प्रभावित हो रही है। अस्पतालों में आंखों में जलन, ड्राइनेस और धुंधलापन के काफी मामले आ रहे हैं। लोग एहतियात रखेंगे तो वे इन परेशानियों को नियंत्रित कर सकते हैं।

    सेहत / शौर्यपथ /शरीर की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में सहायक औषधियों की रानी कही जाने वाली तुलसी की मांग वैश्विक महामारी कोरोना काल में बढ़ गयी है। आयुष अस्पताल एवं रिसर्च सेन्टर के आयुवेर्दाचार्य नरेन्द्र नाथ का कहना है कि तुलसी कई बीमारियों का रक्षा कवच है। यह हमारे इम्यून सिस्टम को मजबूत रखने में अहम् भूमिका का निर्वहन करती है।
    इसकी पत्तियों में विटमिन सी, कैल्शियम, जिंक और आयरन के साथ ही सिट्रिक टारटरिक एवं मैलिक एसिड भी प्राप्त होता है। इनमें एंटी इंफ्लेमेटरी और एंटीबैक्टीरियल गुण पाए जाते हैं, जो हमारे स्वास्थ्य के लिए लाभ दायक होते हैं। आयुवेर्दिक कंपनियां दवाइयां बनाने में इसका इस्तेमाल करती हैं।
    उन्होने बताया कि आयुवेर्द में तुलसी को रोग नाशक जुडी-बूटी माना जाता है। इसे सौ बीमारियों की 'एक दवाÓ कहें तो कोई आश्चर्य नहीं होगा। यह सदीर्-जुकाम और गले में खरास से राहत दिलाने के लिए इसकी पत्तियों और कालीमिर्च का काढ़ा रामबाण साबित होता है। वहीं कोरोना वायरस से बचाव के दौरान लोगों के काढ़ा तैयार कर उपयोग में लाने से रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में काफी सहायक हुई है।
    आयुवेर्दाचार्य नरेन्द्र नाथ ने बताया कि आयुवेर्द मे इसे रोग नाशक जड़ी-बूटियों की रानी कहा गया है।Óतुलसी पंचाग (जूस) वैज्ञानिक दृष्टकोण से 90 फीसदी क्षारीय (एल्काइन) होता है। यह प्रतिरोधक क्षमता के लिए श्वेत रक्त कणिकाओं (डब्ल्यूबीसी) का निमार्ण करते हैं जिसे ही हम इम्यून या प्रतिरोधकता कहते हैं। उन्होने बताया कि जब शरीर अधिक लवणीय हो जाती है तब डब्ल्यूबीसी का निमार्ण होना कम हो हो जाता है जिसे समस्त बीमारियों की जननी कहते हैं।
    उन्होने बताया कि इसमें इसेंसियल ऑयल, वोलेटाइल ऑयल पाया जाता है जो एंटीवैक्टीरीअल, एंटीवायरल, एंटीफंगल और एंटीसेप्टिक गुण पाया जाता है जो शरीर के समस्त धातुओं के विषैलापन को दूर करता है और शरीर के मेटाबोलिज्म को बढ़ाता है। तुलसी की चाय का सेवन किया जाए तो इससे कैंसर होने की संभावना काफी कम हो जाती है क्योंकि तुलसी कैंसर को जन्म देने वाली अनियंत्रित कोशिकाओं को बढ़कर विभाजित होने से रोकता है और कैंसर से शरीर की रक्षा करता है।
    तुलसी का प्रयोग आयुवेर्द, यूनानी, होम्योपैथी एवं एलोपैथी दवाओं में होता है। इसकी जड़, तना, पत्तियों समेत सभी भाग उपयोगी हैं। तुलसी में विटामिन व खनिज प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। यह सभी रोगों में लाभप्रद मानी जाती है। वह रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के साथ कफ, वात दोष, पाचन शक्ति बढ़ाने बुखार, पेटदर्द, बैक्टीरियल संक्रमण खत्म करने में काम आती है। श्वांस लेने में हो रही परेशानी को राहत दिलाने में सहायक होती है।
    आयुवेर्दाचार्य का कहना है कि जिन लोगों का इम्यूनिटी सिस्टम कमजोर होता है उन्हें कोरोना का खतरा ज्यादा होता हैण। ऐसे में इम्यूनिटी सिस्टम मजबत रहना आवश्यक है। इम्यूनिटी को मजबूत करने के लिए वैसे तो कई तरीके हैं लेकिन इसे नेचुरल तरीके से बढ़ाया जा सकता है। नेचुरल तरीके से इम्यूनिटी बढ़ाने के लिए काढ़ा सबसे अच्छा ऑप्शन है। तुलसी और काली मिर्च का काढ़े से इम्युनिटी मजबूत होगी और शरीर कोरोना से लडऩे में बेहतर रूप से सक्षम हो पाएगा।
    नरेन्द्र नाथ ने बताया कि श्वास संबंधित रोग, बुखार, जुकाम को ठीक करती है। किडनियों को स्वस्थ रखती है। इसकी पत्तियों में चमकीला वाष्पशील तेल पाया जाता है जो कीड़ों एवं वैक्टीरिया के खिलाफ काफी कारगर साबित होता है। तुलसी को संजीवनी बूटी की संज्ञा भी दी गयी है। इम्यून सिस्टम को मजबूत रखने में यह महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
    उन्होने बताया कि यह स्ट्रेस और डिप्रेसन को भी दूर भागने में सहायक होता है। पारंपरिक तुलसी का उपयोग कंजक्टीवाइटिस (आंख आना) की समस्या से राहत पहुंचाता है। किसी भी प्रकार के श्वसन संबंधी रोग के दौरान इसका उपयोग गुणकारी है।
    नैनी क्षेत्र के फूलमंडी में तुलसी विक्रेता रोशन ने बताया कि कोरोना काल में लोगों का विश्वास आयुवेर्द के प्रति बढ़ा है। शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता मजबूत करने वाली औषधियों में तुलसी की मांग बहुत तेजी से बढ़ी है। कोरोना से पहले तुलसी की पत्तियों की कीमत 50 रुपये प्रति किलो थी, जो कि अब 100 किलो से अधिक तक पहुंच गई है। फुटकर बाजार में तो यह और भी महंगी बिक रही है। इम्यूनिटी बढ़ाने में कारगर गिलोय और अश्वगंधा के मूल्यों में भी मांग के कारण उछाल आया है।

    रायपुर / शौर्यपथ / राज्य शासन द्वारा कॉलेजों में प्रवेश की तिथि को 22 अक्टूबर से बढ़ा कर 29 अक्टूबर कर दिया गया है। छत्तीसगढ़ के विभिन्न विश्वविद्यालयों के कुलपति की अनुमति से महाविद्यालयों के प्राचार्यों द्वारा छात्र-छात्राओं को प्रवेश दिया जाएगा। राज्य शासन द्वारा कोविड-19 महामारी से उत्पन्न स्थिति के कारण छात्र हित में यह निर्णय लिया गया है। कॉलेजों में प्रवेश की तिथि 29 अक्टूबर तक बढ़ाने के संबंध में उच्च शिक्षा विभाग द्वारा मंत्रालय महानदी भवन से आदेश जारी किया गया है।
    गौरतलब है कि उच्च शिक्षा विभाग के सचिव धनंजय देवांगन ने 9 अक्टूबर को मंत्रालय में वीडियो कॉन्फं्रेसिंग के जरिए सभी विश्वविद्यालयों के कुलपतियों और विद्यालयों के प्राचार्यो से कॉलेजों में प्रवेश, ऑनलाइन क्लास, परीक्षा परिणाम और पाठ्यक्रमों के संबंध में चर्चा की। इस दौरान विभिन्न विश्वविद्यालयों के कुलपतियों ने कॉलेजों में शत प्रतिशत सीटों में प्रवेश हो सके इसके लिए प्रवेश के लिए निर्धारित तिथि 22 अक्टूबर से बढ़ाकर 30 अक्टूबर तक करने के भी सुझाव दिए थे।

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