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सेहत / शौर्यपथ /क्या आप जानते हैं, छुहारा और खजूर एक ही पेड़ से उत्पन्न होते हैं। दोनों की तासीर गर्म होती है और दोनों शरीर को मजबूत बनाने में विशेष भूमिका निभाते हैं। गर्म तासीर होने के कारण ही सर्दियों में तो इसकी उपयोगिता और बढ़ जाती है। आइए, जानें छुहारे के अनूठे फायदे।
1. मासिक धर्म : सर्दी के दिनों में कई महिलाओं को मासिक धर्म से जुड़ी समसयाएं भी होती हैं, इसके लिए छुहारे फायदेमंद है। छुहारे खाने से मासिक धर्म खुलकर आता है और कमर दर्द में भी लाभ होता है।
2. बिस्तर पर पेशाब : छुहारे खाने से पेशाब का रोग दूर होता है। बुढ़ापे में पेशाब बार-बार आता हो तो दिन में दो छुहारे खाने से लाभ होगा। छुहारे वाला दूध भी लाभकारी है। यदि बच्चा बिस्तर पर पेशाब करता हो तो उसे भी रात को छुहारे वाला दूध पिलाएं। यह शक्ति पहुंचाते हैं।
3. रक्तचाप : कम रक्तचाप वाले रोगी 3-4 खजूर गर्म पानी में धोकर गुठली निकाल दें। इन्हें गाय के गर्म दूध के साथ उबाल लें। उबले हुए दूध को सुबह-शाम पीएं। कुछ ही दिनों में कम रक्तचाप से छुटकारा मिल जाएगा।
4 . दांतों का गलना : छुहारे खाकर गर्म दूध पीने से कैल्शियम की कमी से होने वाले रोग, जैसे दांतों की कमजोरी, हड्डियों का गलना इत्यादि रूक जाते हैं।
5. कब्ज : सुबह-शाम तीन छुहारे खाकर बाद में गर्म पानी पीने से कब्ज दूर होती है। खजूर का अचार भोजन के साथ खाया जाए तो अजीर्ण रोग नहीं होता तथा मुंह का स्वाद भी ठीक रहता है। खजूर का अचार बनाने की विधि थोड़ी कठिन है, इसलिए बना-बनाया अचार ही ले लेना चाहिए।
6. मधुमेह : मधुमेह रोगी जिनके लिए मिठाई, चीनी इत्यादि वर्जित है, सीमित मात्रा में खजूर का हलवा इस्तेमाल कर सकते हैं। खजूर में वह अवगुण नहीं है, जो गन्ने वाली चीनी में पाए जाते हैं।
7. पुराने घाव : पुराने घावों के लिए खजूर की गुठली को जलाकर भस्म बना लें। घावों पर इस भस्म को लगाने से घाव भर जाते हैं।
8. आंखों के रोग : खजूर की गुठली का सुरमा आंखों में डालने से आंखों के रोग दूर होते हैं।
9. खांसी : छुहारे को घी में भूनकर दिन में 2-3 बार सेवन करने से खांसी, छींक, जुकाम और बलगम में राहत मिलती है।
10. जुएं : खजूर की गुठली को पानी में घिसकर सिर पर लगाने से सिर की जुएं मर जाती हैं।
खाना खजाना / शौर्यपथ / 1 कप मैदा, 1 कप दूध, 1 कप शक्कर, 1 चम्मच नींबू का रस, 1 चम्मच सौंफ, घी अथवा रिफाइंड तेल (मोयन और तलने के लिए)
विधि :
पहले एक बर्तन में शक्कर, नींबू का रस और तीन-चौथाई कप पानी डालकर चाशनी बना लें। अब मैदे में 1 चम्मच तेल का मोयन डालें। इसके बाद दूध और सौंफ मिलाकर घोल तैयार करें।
एक कड़ाही में तेल या घी गर्म करें और घोल से एक-एक कड़छी डालकर उसे करारे फ्राई करें और चाशनी में डुबोकर अलग एक बर्तन में रखें। तैयार मालपुए पर कतरे हुए पिस्ता-बादाम बुरकें और पेश करें और भोग लगाएं।
लौकी-खोया का लजीज हलवा, पढ़ें आसान विधि
> > सामग्री :
1 किलो कद्दूकस की हुई लौकी, 50 ग्राम ताजा मावा (खोया), 2 बड़े चम्मच घी, 150 ग्राम शकर, पाव चम्मच इलायची पावडर और 2-3 केसर के लच्छे।
विधि :
सबसे पहले एक कड़ाही में घी डालकर किसी हुई लौकी को हल्का भूनकर अलग रख लें। अब कड़ाही में थोड़ा-सा पानी डालें, फिर चीनी डालें। जब शकर पूरी तरह घुल जाए, तब इसमें भूनी हुई लौकी डालकर चलाएं।
जब शकर का पानी पूरी तरह खत्म हो जाए और चाशनी जैसा गाढ़ा दिखाई देने लगे, तब इसमें मावा डालकर हिलाएं। फिर इलायची पावडर डालें और अच्छी तरह चलाकर 2-3 मिनट तक चलाएं। अब केसर को हाथ से मसलकर ऊपर से बुरकाएं।
लीजिए आपके लिए तैयार है लौकी और खोया का जायकेदार हलवा। व्रत के दिनों में लाभदायी ये हलवा सेहत की दृष्टि से बहुत फायदेमंद है।
झटपट बनाएं फलाहारी नमकीन क्रिस्पी पूरी, पढ़ें 5 स्टेप्स
सामग्री :
2 कटोरी राजगिरे का आटा, 1/2 कटोरी सिंघाड़े का आटा, 1/2 कटोरी मूंगफली दाने, 1 चम्मच सौंफ दरदरी पिसी हुई, 4-5 हरी मिर्च का पेस्ट, 1 चम्मच लाल मिर्च, नमक (सेंधा) स्वादानुसार, हर धनिया बारीक कटा, तेल या घी तलने के लिए।
विधि :
Steps 1. राजगिरे व सिंघाड़े का आटा छानकर हल्का गुलाबी होने तक सेंक लें।
Steps 2. दाने को सेंक कर बारीक पिस लें।
Steps 3. एक थाली में दोनों आटे लेकर उपरोक्त सारी सामग्री डालकर अच्छी तरह मिक्स करके आटा गूंध लें और थोड़ी देर ढंक कर रखें।
Steps 4. अब आटे की छोटी-छोटी लोइयों की पूड़ियां बना कर मूंगफली तेल या शुद्ध घी में कुरकुरी तल लें।
Steps 5. तैयार गरमा-गरम फलाहारी नमकीन क्रिस्पी पूरी हरी चटनी या दही के रायते के साथ परोसें।
धर्म संसार / शौर्यपथ /चंद्रहासोज्ज्वलकरा शार्दूलवरवाहना।
कात्यायनी शुभं दद्याद्देवी दानवघातिनी॥
नवरात्रि में छठे दिन मां कात्यायनी की पूजा की जाती है। इनकी उपासना और आराधना से भक्तों को बड़ी आसानी से अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष चारों फलों की प्राप्ति होती है। उसके रोग, शोक, संताप और भय नष्ट हो जाते हैं। जन्मों के समस्त पाप भी नष्ट हो जाते हैं।
इस देवी को नवरात्रि में छठे दिन पूजा जाता है। कात्य गोत्र में विश्वप्रसिद्ध महर्षि कात्यायन ने भगवती पराम्बा की उपासना की। कठिन तपस्या की। उनकी इच्छा थी कि उन्हें पुत्री प्राप्त हो। मां भगवती ने उनके घर पुत्री के रूप में जन्म लिया।
इसलिए यह देवी कात्यायनी कहलाईं। इनका गुण शोधकार्य है। इसीलिए इस वैज्ञानिक युग में कात्यायनी का महत्व सर्वाधिक हो जाता है। इनकी कृपा से ही सारे कार्य पूरे जो जाते हैं। ये वैद्यनाथ नामक स्थान पर प्रकट होकर पूजी गईं। मां कात्यायनी अमोघ फलदायिनी हैं।
भगवान कृष्ण को पति रूप में पाने के लिए ब्रज की गोपियों ने इन्हीं की पूजा की थी। यह पूजा कालिंदी यमुना के तट पर की गई थी। इसीलिए ये ब्रजमंडल की अधिष्ठात्री देवी के रूप में प्रतिष्ठित हैं। इनका स्वरूप अत्यंत भव्य और दिव्य है। ये स्वर्ण के समान चमकीली हैं और भास्वर हैं।
इनकी चार भुजाएं हैं। दाईं तरफ का ऊपर वाला हाथ अभयमुद्रा में है तथा नीचे वाला हाथ वर मुद्रा में। मां के बाईं तरफ के ऊपर वाले हाथ में तलवार है व नीचे वाले हाथ में कमल का फूल सुशोभित है। इनका वाहन भी सिंह है। इनकी उपासना और आराधना से भक्तों को बड़ी आसानी से अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष चारों फलों की प्राप्ति होती है।
भक्तों के रोग, शोक, संताप और भय नष्ट हो जाते हैं। जन्मों के समस्त पाप भी नष्ट हो जाते हैं। इसलिए कहा जाता है कि इस देवी की उपासना करने से परम पद की प्राप्ति होती है।
रायपुर / शौर्यपथ / मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने कहा है कि विश्वविद्यालयों का कार्य केवल डिग्री देना नहीं, समाज और राज्य की समस्याओं का प्रभावी और वैज्ञानिक हल खोजना भी है। मुख्यमंत्री आज यहां अपने निवास कार्यालय में राज्य योजना आयोग और राज्य के 14 विश्वविद्यालयों एवं 4 उच्च शैक्षणिक संस्थानों ट्रिपल आईटी, आईआईएम, एम्स और आईआईटी कुल 18 शैक्षणिक संस्थानों के मध्य शोध एवं अनुसंधान के लिए आयोजित वर्चुअल ऑनलाइन एमओयू हस्ताक्षर कार्यक्रम को सम्बोधित कर रहे थे।
कार्यक्रम में राज्य के समावेशी विकास में इन उच्च शैक्षणिक संस्थानों की भागीदारी सुनिश्चित करने और उनके ज्ञान और कौशल से स्थानीय और कृषि, उद्योग सहित विभिन्न क्षेत्रों की समस्याओं के प्रभावी और वैज्ञानिक समाधान, अनुसंधान, अध्ययन और नवाचार को प्रोत्साहित करने के लिए तीन वर्षों के लिए एमओयू किया गया। इसके साथ ही छत्तीसगढ़ देश का पहला राज्य बन गया है, जहां राज्य के विकास में उच्च शैक्षणिक संस्थानों की सक्रिय भागीदारी होगी।
कृषि मंत्री रविन्द्र चौबे, योजना और संस्कृति मंत्री अमरजीत भगत, राज्य योजना आयोग के उपाध्यक्ष अजय सिंह, मुख्यमंत्री के सलाहकार प्रदीप शर्मा, राजेश तिवारी और रूचिर गर्ग भी इस कार्यक्रम में उपस्थित थे। एमओयू में राज्य योजना आयोग के अधिकारी और संबंधित शैक्षणिक संस्थानों के अधिकारियों ने हस्ताक्षर किए। इस कार्यक्रम में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए राज्य योजना के सदस्य डॉ. के. सुब्रमणियम, सदस्य सचिव अनुप कुमार श्रीवास्तव, प्रदेश के 14 विश्वविद्यालयों के कुलपति, रजिस्ट्रार, विद्यार्थी और 4 उच्च शैक्षणिक संस्थानों के निदेशक जुड़े।
मुख्यमंत्री ने कार्यक्रम को सम्बोधित करते हुए कहा कि राज्य योजना आयोग और इन संस्थानों के मध्य एमओयू के माध्यम से प्रदेश की विशिष्ट समस्याओं और दिक्कतों की पहचान कर उन पर अनुसंधान, अध्ययन, नवाचार द्वारा समाधान ढूंढे जा सकेंगे और इन संस्थानों में उपलब्ध ज्ञान कौशल का उपयोग राज्य की जनता कर सकेगी। इन संस्थानों की उपलब्धियों का लाभ आम आदमी को मिलेगा। उन्होंने कहा कि राज्य में कृषि, रोजगार, ग्रामीण विकास, कुटीर उद्योगों से लेकर बड़े उद्योगों तक की समस्याओं और सामाजिक समस्याओं के वैज्ञानिक ढ़ंग से सरल समाधान हो, इसमें उच्च शैक्षणिक संस्थानों की फैकल्टी, प्रतिभावान विद्यार्थियों के ज्ञान और कौशल का लाभ मिले, इस उद्देश्य से यह एमओयू आज किया गया है। इससे विशेषज्ञों और विद्यार्थियों को प्रदेश की जमीनी समस्याओं से रू-ब-रू होने का मौका मिल सकेगा। आने वाले समय में इसका लाभ प्रदेश, प्रदेशवासियों और देश को मिलेगा।
मुख्यमंत्री ने कहा कि इस एमओयू के तहत राज्य योजना आयोग के समन्वय के साथ उच्च शैक्षणिक संस्थानों में बनने वाले Óशोध और अनुसंधान प्रकोष्ठÓ में लघु वनोपजों के वेल्यू एडिशन, कृषि उत्पादों, उद्यानिकी, फसलों में वेल्यू एडिशन, कृषि और उद्यानिकी फसलों पर आधारित उद्योगों को खोलने के संबंध में भी अध्ययन और अनुसंधान किया जाएगा। राज्य में कुटीर उद्योगों के विकास और राज्य में उत्पादित इस्पात और एल्युमिनियम पर आधारित वेल्यू एडिशन के सहायक उद्योग जैसे सायकल बनाने के उद्योग और आटोमोबाइल उद्योगों के विकास में भी मदद मिलेगी।
मुख्यमंत्री ने कहा कि प्रदेश में उद्योगों के लिए बिजली, कच्चा माल और कुशल मानव संसाधन उपलब्ध है। उच्च शैक्षणिक संस्थानों की मदद से प्रदेश में वेल्यू एडिशन के उद्योगों की स्थापना के लिए उद्योगपतियों को छत्तीसगढ़ लाने में और लोगों को हुनरमंद बनाने में भी मदद मिलेगी। मुख्यमंत्री ने इस अवसर पर इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय में इस कार्यक्रम में शोध और अनुसंधान के लिए स्थापित कोऑडिनेशन यूनिट का शुभारंभ किया।
शौर्यपथ / कोरोना संक्रमण की जद में फंसी लाखों जिंदगियां भले ही मौत के कुएं से निकलकर बाहर आ गई हों, लेकिन इसका शरीर की हड्डियों पर गहरा प्रभाव पड़ा है। यह हम नहीं, बल्कि अलीगढ़ में संक्रमित मरीजों के स्वस्थ होने के बाद डॉक्टर्स की रिपोर्ट कह रही है। बढ़ती उम्र के साथ कमजोर हड्डियों पर कोरोना संक्रमण की दोहरी मार पड़ने लगी है। कोरोना संक्रमित हो चुके मरीजों में हड्डियों में दर्द की समस्या सबसे ज्यादा आ रही है।
दुनियाभर में आज विश्व ऑस्टियोपोरोसिस दिवस मनाया जाता है। यह हड्डी का एक ऐसा रोग है जिसमें हड्डियां कमजोर हो जाती हैं। जिसके बाद ज्वाइंट्स में दर्द और कमजोरी शिकायत रहने लगती है। डॉक्टर्स के मुताबिक कोरोना संक्रमण का हड्डियों पर गहरा प्रभाव पड़ने वाला है। इस बीमारी से बुजुर्ग और महिलाएं सबसे ज्यादा ग्रसित होती हैं।
मगर कोरोना संक्रमण की वजह से इनपर दोहरी मार पड़ने लगी है। जो मरीज पहले इस बीमारी से काफी हद तक ठीक हो चुके थे वह दोबारा इससे ग्रसित होने लगे हैं। डॉक्टर्स ने बताया कि किसी भी कोरान मरीज को 15 से लेकर 21 दिन तक आइसोलेशन में रखा जाता है। जहां उसे पर्याप्त मात्रा में विटामिन डी नहीं मिल पाती है। विटामिन डी ही एक ऐसा श्रोत है जिससे हड्डियों को मजबूती मिलती है।
क्या कहते हैं कोरोना मरीज :
इस संबंध में 20 कोरोना संक्रमित रह चुके मरीजों से बात की गई, जिसमें से 12 लोगों ने हडि्डयों के दर्द की शिकायत की। जिसमें कोरोना संक्रमित रह चुके अपर मंडला आयुक्त शमीम अहमद ने बताया कि कोरोना तो ठीक हो गया पर जिंदगी भर का दर्द दे गया है। संक्रमण के बाद से हड्डियों में सबसे ज्यादा दर्द रहने लगा है। रीढ़, घुटने और गर्दन की हडि्डयों हमेशा दर्द रहता है। वहीं 62 वर्षीय सुरेंद्र कुमार ने बताया कि हडि्डयों में दर्द की शिकायत पहले से थी, लेकिन कोरोना संक्रमित होने के बाद यह समस्या ज्यादा बढ़ गई है।
क्या है ऑस्टियोपोरोसिस बीमारी :
यह एक गंभीर बीमारी है फिर भी लोगों में इसके बारे में पता नहीं है। यह समस्या महिलाओं में ज्यादा देखी जाती है, लेकिन पुरुष भी इससे अछूते नहीं है। यह हड्डियों को कमजोर और नाजुक बनाती है। जरा सी चोट लगने पर हड्डियां टूट सकती हैं। कभी-कभी झुकने, खांसने या छींकने से भी फ्रैक्चर हो सकता है। ऐसे कई कारण हैं जो इस रोग के खतरे को बढ़ा सकते हैं।
ऑस्टियोपोरोसिस की समस्या को कोरोना संक्रमण और विकराल कर सकता है। खासकर बुजुर्ग लोगों का कोरोना संक्रमित होना। संक्रमण की वजह से उनपर ऑस्टियोपोरोसिस की समस्या और बढ़ जाएगी। जो मरीज पहले ठीक हो चुके हैं उन्हें ऑस्टियोपोरोसिस फिर अपने जद में ले सकता है।
कोरोना संक्रमित होने की वहज से मरीजों को 21 दिन तक अस्पताल या आइसोलेशन में रहना पड़ता है। जहां उन्हें पर्याप्त मात्र में विटामिन डी नहीं मिल पाता। जो की हडि्डयों के लिए बहुत खरनाक है। जरूरी है कि आइसोलेशन के समय भी विटामिन की पर्याप्त मात्रा उन्हें दी जाए।
फिजियोथेरेपी के लिए महामारी से संक्रमित मरीजों की संख्या बढ़ती ही जा रही। लगातार बढ़ रही संख्या से एक अनुमान लगाया जा सकता है कि संक्रमण ने हमारी हडि्डयों को प्रभावित किया है। मरीज ठीक होने के बाद एक्सरसाइज और खानपान में सुधार करें तो कुछ हद तक समस्या कम हो सकती है।
ऑस्टियोपोरोसिस के कारण :
आधुनिक जीवनशैली, निष्क्रिय रहने की आदत, शराब और तंबाकू का सेवन, धूम्रपान, अधिक कैलोरी और जंक फूड का सेवन जैसी शहरी खान-पान की आदतें, भोजन में मिलावट और कम उम्र में मधुमेह रोग।
ऑस्टियोपोरोसिस के लक्षण :
कमर में दर्द की शिकायत, शरीर में लगातार थकावट, काम की इच्छा न करना, हाथ और पांव में दर्द रहना, हल्की चोट पर हड्डियों का टूटना।
सेहत / शौर्यपथ / दुघर्टनाओं और गलत जीवनशैली के कारण देश में गर्दन एवं रीढ़ की हड्डी(स्पाइनल कॉर्ड) के क्षतिग्रस्त होने की समस्याएं बढ़ रही हैं। देश में करीब 15 लाख लोगों को गर्दन अथवा स्पाइनल कॉर्ड में चोट लगने के कारण विकलांगता का जीवन व्यतीत करना पड़ रहा है। अनुमानों के अनुसार देश में हर साल स्पाइनल कॉर्ड के चोटिल होने के 2० हजार से अधिक मामले आते हैं।
ऊंचाई से गिरने, खेल-कूद और मार-पीट जैसे कई कारणों से गर्दन क्षतिग्रस्त हो सकती है और कई बार इसकी वजह से मौत भी हो सकती है। इसके अलावा गलत तरीके से व्यायाम करने और सोने-उठने-बैठने के गलत तौर-तरीकों से भी गर्दन दर्द की समस्या हो सकती है।
नयी दिल्ली के फोर्टिस एस्काट्र्स हार्ट रिसर्च इंस्टीच्यूट के ब्रेन एवं स्पाइन सर्जरी विभाग के निदेशक डा. राहुल गुप्ता के अनुसार गर्दन हमारे शरीर का महत्वपूर्ण हिस्सा है। गर्दन की गतिशीलता की मदद से ही हम आगे-पीछे देखते हैं, कम्प्यूटर आदि पर काम करते हैं या किसी से बात करते हैं। गर्दन में हमारे शरीर का बहुत ही नाजुक अंग है, जिसे स्पाइनल कॉर्ड कहा जाता है, जो कई कारणों से चोटिल हो सकता है।
अगर गर्दन में चोट बहुत हल्की हो तो आराम करने या फीजियोथिरेपी से राहत मिल जाती है लेकिन कई लोगों के लिए गर्दन में चोट विकलांगता का भी कारण बन जाता है। ऐसे में जरूरी है कि गर्दन में चोट या गर्दन की किसी भी समस्या की अनदेखी नहीं करें। अगर आराम करने या दवाइयों के सेवन से भी गर्दन दर्द बढ़ता जाए या गर्दन दर्द बांहों और पैरों तक फैल जाए अथवा सिर दर्द, कमजोरी, हाथों और पैरों में सुन्नपन और झुनझुनी आए तो तुरंत न्यूरो एवं स्पाइन विशेषज्ञ से जांच और इलाज कराएं।
डा. राहुल गुप्ता बताते हैं कि कई बार जब गर्दन की हड्डी में ज्यादा कैल्शियम जमा हो जाता है जिससे हड्डी का क्षेत्र कम हो जाता है और स्पाइनल कार्ड के लिए जगह नहीं होती है। ऐसे में हल्की चोट लगने से भी स्पाइनल कार्ड क्षतिग्रस्त हो सकता है। इसके अलावा वहां पर खून की नस- वटेर्व्रल आर्टरी होती है और उसमें भी अगर चोट लगे तो गर्दन में दर्द हो सकता है।
सवार्इकल कॉर्ड में चोट लगने से गर्दन में दर्द की समस्या बहुत ही आम है और इससे काफी लोग ग्रस्त रहते हैं। लेकिन अगर क्वाड्रिप्लेजिया पैरालाइसिस होने पर मरीज को ताउम्र विकलांग जीवन व्यतीत करना पड़ सकता है। उसे बिस्तर पर ही रहने को मजबूर होना पड़ सकता है, उसे बेड सोर यानी बिस्तर पर लंबे समय तक सोने से होने वाले घाव सकते हैं और सांस लेने में तकलीफ हो सकती है और वह रोजमरार् के कामकाज एवं दिनचयार् के लिए अपने परिजनों पर ही पूरी तरह से निर्भर हो जाता है।
स्पाइनल कॉर्ड में चोट लगने से उसके नीचे का हिस्सा सुन्न हो सकता है, मल-मूत्र त्यागने में दिक्कत हो सकती है और कई बार सांस लेने में भी तकलीफ हो सकती है। इसलिए गर्दन एवं सवार्इकल स्पाइन की सुरक्षा करना बहुत जरूरी है और इसमें चोट लगने या कोई दिक्कत होने पर उसकी अनदेखी नहीं करें। गर्दन को हमें हर तरह की चोट से बचा कर रखना जरूरी है और चोट लगने पर तत्काल इलाज करना जरूरी है।
डा. गुप्ता के अनुसार अगर गर्दन में चोट लगी है और हाथ-पैर तक दर्द या सुन्नपन चला गया है तो तत्काल न्यूरो एवं स्पाइन सर्जन से परामर्श करना चाहिए। स्पाइन विशेषज्ञ एक्स रे, सीटी स्कैन या एमआरआई कराने की सलाह देते हैं ताकि चोट की सही स्थिति का पता चल सके। एमआरआई से बोन, साफ्ट टिश्यू एवं स्पाइनल कार्ड सबके बारे में विस्तार से पता चलता है। सीटी स्कैन से बोन के बारे में विस्तार से पता चलता है जबकि एक्स रे हड्डी के बारे में आरंभिक जानकारी मिल जाती है जिसके आधार पर आगे की जांच कराने की सलाह दी जाती है।
ऊंचाई से गिरने पर कई बार मौके पर ही मौत हो जाती है। ऐसे मामलों में ज्यादातर सवार्इकल स्पाइन में इंज्युरी ही होती है। दुर्घटना के शिकार या उंचाई से गिरने वाले घायल व्यक्ति का तत्काल आपरेशन होना जरूरी है जिसमें उनके गर्दन की हड्डी को सीधा किया जाता है प्लेट लगाकर उसे एलाइमेंट में रखा जाता है।
कुछ चिकित्सक स्टेम सेल थिरेपी का उपयोग करते हैं। कुछ प्रयोगों में इसे सफल भी पाया गया लेकिन अभी तक इसे किसी मान्यताप्राप्त चिकित्सा संस्थान या संगठन से मान्यता नहीं मिली है। जो भी लोग इस तरह का उपचार कर रहे हैं वे एक प्रयोग की तरह इसे कर रहे हैं और हो सकता है कि कुछ लोगों को उससे फायदा हुआ हो लेकिन इससे आम तौर पर नुकसान नहीं होता है।
खाना खजाना / शौर्यपथ / आलू का चीला खाने में जितना टेस्टी होता है, बनने में उतना ही आसान भी है। इस चीले को बनाने में बेहद कम समय लगता है। व्रत के दौरान अगर आपको जोर से भूख लग जाए तो झटपट बना लें ये चटपटा चीला। तो देर किस बात की आइए जान लेते हैं क्या है इस चीले को बनाने की झटपट टेस्टी रेसिपी।
आलू का चीला बनाने के लिए सामग्री-
-2-3 कच्चे आलू कद्दूकस किए हुए
-2 हरी मिर्च
-बारीक कटा हुआ हरा धनिया
-¼ छोटा चम्मच काली मिर्च पाउडर
-1 बड़ा चम्मच देसी घी
-सेंधा नमक स्वादानुसार
आलू का चीला बनाने का तरीका-
आलू का चीला बनाने के लिए सबसे पहले एक बाउल में कद्दूकस किया हुआ आलू, हरी मिर्च, धनिया पत्ती, काली मिर्च पाउडर और नमक डालकर अच्छी तरह मिला लें। अब तवे को गर्म करके उसमें 1 चम्मच देसी घी डालें। इसके बाद गर्म तवे में आलू का मिश्रण डालकर चम्मच की मदद से तवे पर ½ सेमी मोटाई के साथ मिश्रण को गोल आकार में फैलाएं। वरना चीला टूट सकता है। अब चीले को दोनों तरफ से गोल्डन ब्राउन होने तक पकाएं। आपका आलू का चीला बनकर तैयार है। इस फलाहारी चीले को व्रत की चटनी या दही के साथ सर्व कर सकते हैं।
धर्म संसार / शौर्यपथ /नवरात्र के चौथे दिन मां कूष्मांडा की पूजा-आराधना की जाती है। इनकी उपासना से सिद्धियों में निधियों को प्राप्त कर समस्त रोग-शोक दूर होकर आयु-यश में वृद्धि होती है। देवी कूष्मांडा को अष्टभुजा देवी भी कहा जाता है। बुद्धि और कौशल का विकास करने वाली मां कूष्मांडा की पूजा नवरात्र के चौथे दिन की जाती है। मां कूष्माडा की आठ भुजाएं हैं। भक्तों में मान्यता है कि मां कूष्मांडा आयु और यश भी बढ़ाती हैं। मां कूष्मांडा देवी की आराधना से रोग-शोक समाप्त हो जाते हैं।
कूष्मांडा का अर्थ है कुम्हड़ा। मां को बलियों में कुम्हड़े की बलि सबसे ज्यादा प्रिय है। इसलिए इन्हें कूष्मांडा देवी कहा जाता है।
ऐसा है मां का स्वरूप : कूष्मांडा देवी की आठ भुजाएं हैं, जिनमें कमंडल, धनुष-बाण, कमल पुष्प, शंख, चक्र, गदा और सभी सिद्धियों को देने वाली जपमाला है। मां के पास इनके अलावा हाथ में अमृत कलश भी हैर्। ंसह की सवारी करने वाली मां की भक्ति करने से आयु, यश और आरोग्य की वृद्धि होती है।
ऐसे करें पूजा : कूष्मांडा देवी योग और ध्यान की देवी भी हैं। देवी का यह स्वरूप अन्नपूर्णा का भी है। उदराग्नि को शांत करने वाली देवी का मानसिक जाप करें। देवी कवच को पांच बार पढ़ना चाहिए। माता कुष्मांडा के दिव्य रूप को मालपुए का भोग लगाकर दुर्गा मंदिर में ब्राह्मणों को इसका प्रसाद देना चाहिए। इससे भक्तों की बुद्धि और कौशल का विकास होता है।
धर्म संसार / शौर्यपथ / राहु छाया ग्रह होने से इसको किसी भी राशि का स्वामित्व नहीं मिला है। यद्यपि इसे कन्या राशि का स्वामी मानते हैं। यह आर्द्रा, स्वाति और शतभिषा नक्षत्र का स्वामी है। राहु की उच्च राशि वृषभ मानी गई है और नीच राशि वृश्चिक। छाया ग्रह होने कारण राहु जिस ग्रह की राशि में होते हैं उसी के अनुसार फल देते हैं। राहु के पूर्ण दृष्टि 5, 7 एवं नौवें स्थान पर पड़ती है। यह तमोगुणी एवं अंधकार प्रिय ग्रह है। इसको पापी ग्रह की संज्ञा मिली है। राहु की स्वराशि कन्या मानी गई है। इस के मित्र ग्रह शनि और केतु हैं। सूर्य, चंद्रमा और बुध, राहु के शत्रु हैं। मंगल इसका सम ग्रह हैं। राहु का रंग धुएं की तरह होता है। यह पृथकतावादी ग्रह है। राहु कूटनीति, राजनीति, झूठ कपट, षड्यंत्र कारक ग्रह है। वायु विकार देने वाला, उत्प्रेरक (उकसाने वाला) और हवाई यात्रा कारक ग्रह है।
लोग राहु का नाम सुनकर बहुत ही अशुभ मानते हैं। लेकिन शनि की तरह यदि आपके कर्म अच्छे हैं और कर्म भाव में शनि या राहु का शुभ प्रभाव है तो आप राजनीति में अच्छा कर सकते हैं। राहु कालसर्प दोष का कारक है। जब राहु और केतु के बीच में सभी ग्रह एक और हो जाते हैं तब वह कालसर्प दोष बनता है। राहु सर्प का मुख माना गया है और केतु सर्प का पुच्छ माना गया है। यदि राहु केतु के साथ में कोई ग्रह हो या एक ग्रह बाहर हो और वह राहु-केतु से अंशों में अधिक हो तो कालसर्प दोष कट जाता है। राहु के साथ मंगल होने से अंगारक दोष बनता है। यह दोष व्यक्ति के अंदर अहं एवं क्रोध का निर्माण करता है। यह ग्रह चोट आदि भी देता है।
यदि कुंडली में पंचम या षष्ठ भाव में व्यक्ति को पेट रोग देता है। द्वितीय अथवा द्वादश भाव में राहु या शनि हो मंगल हो तो उस व्यक्ति को नेत्र पीड़ा हो सकती है। छठे भाव में राहु, केतु, शनि, मंगल के प्रभाव के पैरों में चोट आदि का भय रहता है। राहु की महादशा 18 साल होती है। यदि कुंडली में राहु अशुभ होता है तो व्यक्ति को बुरे कर्म करने को उकसाता है। सबसे पहले व्यक्ति की दिनचर्या को खराब करता है। घूमने-फिरने का शौक पैदा करता है। वाणी दोष उत्पन्न करता है और विवेकहीनता उसके अंदर आ जाती है। अच्छे-बुरे का ज्ञान नहीं रह पाता। उसको घूमना, फिरना, मांस-मदिर का शौक पड़ जाता है। यदि राहु की महादशा में आप उपरोक्त अवस्था से पीड़ित हो रहे हैं तो समझो कि आप के साथ राहु बहुत बुरा करने वाला है। अपयश, धोखा,आर्थिक हानि, मानसिक विकार एवं तलाक हो सकता है।
कुंडली में राहु अच्छी अवस्था में हो तो वह अपने महादशा में रंक से राजा बना देता है। राजनीति में राहु अपना उच्चतम स्थान रखता है और किसी साधारण व्यक्ति को भी राजा बना सकता है। यदि आपकी कुंडली में राहु अशुभ है या महादशा में अशुभ प्रभाव दे रहा है तो आप कुत्ते को दूध रोटी खिलाएं। कोढियों को भोजन दान करें। मछलियां को आटे की गोलियां खिलाएं। राहु के तांत्रिक मंत्र का जाप कराएं और अपनी दिनचर्या बदले। राहु की अशुभ प्रभाव को कम करने के लिए रांगे की गोली सफेद धागे में बुधवार को गले में धारण करें। रांगा और गोमेद राहु के नकारात्मक प्रभाव को कम करते हैं। रांगा जो बर्तनों में टांका लगाने का काम आता है बहुत ही महत्वपूर्ण है। यदि किसी को राहु अत्यंत पीड़ित कर रहा हो या किसी बालक को नजर अधिक लगती हो, अज्ञात भय रहता हो तो रांगे की गोली सफेद धागे में धारण करें।
रायपुर / शौर्यपथ / पढऩा-लिखना अभियान यह अभियान बुनियादी साक्षरता पर केंद्रित होगा। प्रत्येक जिले में राज्य साक्षरता मिशन की तर्ज पर जिला साक्षरता मिशन का गठन किया जाएगा। इस अभियान के अंतर्गत पांच वर्ष में प्रदेश के एक तिहाई असाक्षरों को साक्षर किए जाने का लक्ष्य है। इस अभियान में आकांक्षी जिलों तथा राष्ट्रीय व राज्य की साक्षरता दर से कम औसत वाले जिलों को प्राथमिकता दी जाएगी। पढऩा-लिखना अभियान की वार्षिक कार्य योजना के निर्माण हेतु आज नया रायपुर स्थित मंत्रालय से राज्य स्तरीय वीडियो कॉन्फ्रेंस का आयोजन किया गया। एससीईआरटी और राज्य साक्षरता मिशन प्राधिकरण के संचालक श्री डी. राहुल वेंकट द्वारा प्रदेश के सभी जिलों के जिला शिक्षा अधिकारियों, डाइट के प्राचार्य तथा जिला परियोजना अधिकारी साक्षरता मिशन की बैठक में इस वर्ष ढाई लाख लोगों को साक्षर बनाए जाने के लक्ष्य पर चर्चा हुई।
राज्य साक्षरता मिशन के सहायक संचालक प्रशांत कुमार पाण्डेय ने पॉवर पॉइंट प्रेजेन्टेशन के माध्यम से बताया कि जिले के प्रभारी मंत्री अथवा जिला पंचायत के अध्यक्ष की अध्यक्षता में सामान्य सभा और कलेक्टर की अध्यक्षता में कार्यकारिणी समिति गठित की जाएगी। सदस्य सचिव की जिम्मेदारी जिला शिक्षा अधिकारी की होगी। इस अभियान की विशेषता यह है कि यह पूर्ण रूप से स्वयंसेवी आधारित होगा अर्थात पढ़ाने वाले स्वयं सभी शिक्षकों को किसी भी प्रकार का पारिश्रमिक प्रदान नहीं किया जाएगा। इस अभियान में जिलों को स्वायत्तता प्रदान की गई है। इसमें नवाचारी गतिविधियों को प्रोत्साहित किया जाएगा। प्रत्येक जिले के डाइट में अकादमी और तकनीकी संसाधन समर्थन हेतु एक अलग प्रकोष्ठ डीसीएल गठित किया जाएगा, जिसे जिला साक्षरता केंद्र कहा जाएगा।
पढऩा-लिखना अभियान स्कूल और कॉलेज के विद्यार्थियों, एनसीसी, एनएसएस, नेहरू युवा केंद्र और स्वयंसेवी संस्थाओं की सहभागिता से संचालित किया जाएगा। जिले अपनी कार्ययोजना राज्य को और राज्य अपनी कार्ययोजना केंद्रीय प्रोजेक्ट को स्वीकृति के लिए बोर्ड को प्रस्तुत की जाएगी। एनआईसी द्वारा पोर्टल का निर्माण किया गया है, जिसमें ऑनलाइन कार्य योजना अपलोड की जाएगी। भारत सरकार द्वारा आज इस विषय का प्रशिक्षण भी आयोजित किया गया। असाअक्षरों का अनुदेशकों का चिन्हांकन करने के पश्चात विधिवत प्रशिक्षण प्रदान किया जाएगा। इसका वर्ष में चार बार मूल्यांकन एनआईओएस द्वारा किया जाएगा। पढऩा-लिखना अभियान शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्र में संचालित किया जाएगा। महिलाओं अनुसूचित जाति, जनजाति और अल्पसंख्यक वर्ग को इसमें प्राथमिकता प्रदान की जाएगी। साथ ही सामग्री- ई-बुक्स, वीडियो व्याख्यान, मोबाइल एप जैसे आईटी टूल का भी उपयोग किया जाएगा।
राज्य साक्षरता मिशन प्राधिकरण के संचालक डी. राहुल वेंकट द्वारा छत्तीसगढ़ के सभी जिला अधिकारियों से जिलावारे तैयारी की समीक्षा की और उन्हें निर्देश दिए कि दो दिनों के भीतर जिला साक्षरता मिशन और डाइट में जिला साक्षरता केंद्र की स्थापना कर ली जाए। कोविड-19 को दृष्टिगत रखते हुए इस वर्ष लक्ष्य संख्या निर्धारित की जाए।
वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग में राज्य साक्षरता मिशन प्राधिकरण के सहायक संचालक दिनेश कुमार टाक, जिला शिक्षा अधिकारी, डाइट के प्राचार्य तथा जिला परियोजना अधिकारी सहित अन्य अधिकारी शामिल हुए।
लाइफस्टाइल / शौर्यपथ / दुनियाभर में होने वाले मनोरंजन और संगीत के आयोजनों पर भी कोरोना का कहर टूटा है। ऐसे में कोरोना महामारी से लड़ते हुए इन आयोजनों को दोबारा खड़ा करने के लिए कई तरह के प्रयोग किये जा रहे हैं। कहीं सोशल डिस्टेंसिंग में तहत लोगों को दूर-दूर बैठाकर कॉन्सर्ट कराने के तरीके का उपयोग हो रहा है तो कहीं सेंसरों की मदद से लोगों के हाथ सैनिटाइज करने और उनमें दूरी बरकरार रखने के प्रयोगों पर काम किया जा रहा है। ऐसा ही एक प्रयोग ओकलाहोमा में हाल ही में किया गया। यहां एक संगीत बैंड ने प्रयोग के तहत प्लास्टिक के बुलबुले में खुद को बंद कर मंच पर प्रस्तुति दी। इतना ही नहीं बल्कि दर्शकों को भी प्लास्टिक बबल में डाला गया।
वीडियो फुटेज में दिखा अनोखा नजारा-
द फ्लेमिंग लिप्स नामक संगीत बैंड ने अपने प्रशंसकों के लिए एक कार्यक्रम का आयोजन किया। ओकलाहोमा शहर के इस समूह के सदस्यों ने खुद को अलग-अलग प्लास्टिक बबल में डाला। गायक और वादक सभी बुलबुलों के अंदर नजर आ रहे थे। कार्यक्रम के वीडियो फुटेज में 100 पिचके हुए प्लास्टिक के बुलबुले देखे गए।
इस कार्यक्रम कोरोनावायरस के कारण भविष्य में होने वाले कॉन्सर्ट का एक परीक्षण था। इसके साथ ही एक कार्यक्रम के दौरान एक म्यूजिक वीडियो भी बनाया गया ताकि भविष्य के कॉन्सर्ट की रूपरेखा के बारे में लोगों को बताया जा सके। कार्यक्रम के दौरान इस कॉन्सर्ट में 100 दर्शक भी प्लास्टिक बुलबुले के अंदर संगीत का लुत्फ उठाते नजर आएं।
अब और इंतजार नहीं कर सकते-
ओकलाहोमा के संगीत बैंड ने इस कार्यक्रम के दौरान अपने आने वाले नए एल्बम अमेरिकन हेड एट द क्राइटेरियन के दो गानों पर प्रस्तुति दी। इस कॉन्सर्ट हॉल में 3500 हजार लोगों के खड़े होने की व्यवस्था है, लेकिन प्रयोग के दौरान सिर्फ 100 लोगों को ही वहां आने की अनुमति दी गई। बैंड के सदस्य फ्रंटमैन वाइने कोएने ने इंस्टाग्राम पर कार्यक्रम का एक क्लिप साझा किया और साथ ही कई तस्वीरें भी पोस्ट की। उन्होंने कहा, मुझे लगता है किसी ने भी मार्च में नहीं सोचा होगा कि ये इतना लंबा चलेगा।
अब आठ महीने होने जा रहे हैं। मुझे लगता है कि सभी ने सोचा होगा कि अब यह बीमारी ठीक हो जाएगा, इस महीने नियंत्रण में आ जाएगी। लेकिन अब और इंतजार नहीं किया जा सकता। बबल के इस विकल्प पर पहली बार मई में प्रयोग किया गया था। स्टीफन कोलबर्ट ने अपने शो पर इसका प्रयोग किया था।
2004 से बबल का प्रयोग कर रहे कोएने-
कोएने 2004 से ही अपने कार्यक्रमों के दौरान प्लास्टिक बबल का इस्तेमाल कर रहे हैं। उन्होंने कहा, मुझे यह काफी पसंद है। इसके अंदर खड़े होकर आप कितने भी उत्साहित होकर चीख सकते है और इससे कोई दूसरा संक्रमित भी नहीं होगा। यह के बैरियर की तरह काम करता है जो आपको भी सुरक्षित रखता है और दूसरों को भी। यह एक सफल प्रयोग हैं और भविष्य में इसका इस्तेमाल किया जाना चाहिए।
नहीं होती घुटन-
बैंड के अन्य सदस्य डेजी स्मिथ ने कहा, यह प्लास्टिक बबल इतना बड़ा है कि इसके अंदर घुटन महसूस नहीं होती। इसके अंदर सांस लेने में कोई दिक्कत भी नहीं होती। अगस्त में पहली बार 2500 संगीत प्रेमियों के लिए सैम फेंडर के कॉन्सर्ट का आयोजन किया गया था। यहां दर्शकों के लिए छोटे-छोटे बाड़े बनाए गए थे ताकि सोशल डिस्टेंसिंग के नियमों का पालन किया जा सके। वहीं न्यूकैसल गोसफोर्थ पार्क में नॉर्थ शील्ड बैंड ने प्रस्तुति दी जिसमें छह-छह फीट की दूरी पर 500 ऊंचे प्लेटफॉर्म बनाए गए थे जिसमें एक साथ सिर्फ पांच लोग ही खड़े हो सकते हैं।
शौर्यपथ / क्या आपका लाडला दिनभर टीवी या मोबाइल की स्क्रीन से चिपका रहता है? अगर हां तो संभल जाइए। एक अमेरिकी अध्ययन में स्क्रीन के जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल को न सिर्फ बच्चों की आंखों और मानसिक स्वास्थ्य, बल्कि सीखने-समझने, चीजें याद रखने व रिश्ते निभाने की क्षमता के लिहाज से भी घातक करार दिया गया है। अभिभावकों से कहा गया है कि वे बच्चों को दिनभर में दो घंटे से ज्यादा स्क्रीन के प्रयोग की छूट न दें।
कैलिफोर्निया स्थित मेमोरियल केयर ऑरेंज कोस्ट मेडिकल सेंटर के शोधकर्ताओं की मानें तो दिनभर में तीन घंटे से अधिक समय तक स्क्रीन का इस्तेमाल करने वाले बच्चे देरी से बोलना सीखते हैं। उन्हें पढ़ने-लिखने और भाषा समझने में भी दिक्कत पेश आती है। वहीं, जो किशोर रोज पांच से सात घंटे स्क्रीन के सामने डटे रहते हैं, उनमें उदासी, बेचैनी, जीवन से नाउम्मीदी और आक्रामकता की शिकायत पनपने का खतरा दोगुना होता है।
मोटापे का खतरा
मुख्य शोधकर्ता डॉ. जीना पोजनर ने स्क्रीन की लत को बच्चों में मोटापे की बढ़ती समस्या के लिए जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने मेयो क्लीनिक के उस अध्ययन का हवाला दिया, जिसमें स्क्रीन का इस्तेमाल हर दो घंटे बढ़ने पर मोटापे की आशंका में 23 फीसदी इजाफा होने की बात सामने आई थी। यह भी पाया गया था कि स्क्रीन के इस्तेमाल में 50 फीसदी कटौती करने वाले बच्चे 25 प्रतिशत कम कैलोरी खाते हैं।
अनिद्रा की शिकायत
पोजनर ने बताया कि स्क्रीन से निकलने वाली नीली रोशनी स्लीप हार्मोन ‘मेलाटोनिन’ का उत्पादन बाधित करती है। इससे बच्चों को नींद के आगोश में समाने में तो दिक्कत पेश आती ही है, साथ ही सुबह उठने पर वे तरोताजा भी महसूस नहीं करते। अधूरी नींद का उनकी याददाश्त और तार्किक क्षमता पर भी बुरा असर पड़ता है। पोजनर ने सोने से दो घंटे पहले ही बच्चों के लिए स्क्रीन का इस्तेमाल प्रतिबंधित करने की सलाह दी।
सिर से लेकर कमर तक में दर्द
2018 में प्रकाशित एक ब्रिटिश अध्ययन का जिक्र करते हुए पोजनर ने कहा कि घंटों स्क्रीन के सामने डटे रहने वाले बच्चों में सिर, पीठ, कमर और कंधे में दर्द की समस्या भी ज्यादा सामने आती है। इसकी वजह सिर झुकाने से उसका भार बढ़ना और रीढ़ की हड्डी पर अतिरिक्त दबाव पड़ना है।
चिंताजनक
-आठ से 12 साल तक के बच्चे रोजाना 04 से छह घंटे औसतन स्क्रीन से चिपके रहते हैं
-09 घंटे औसतन किशोर उम्र के लोग मोबाइल, टीवी या कंप्यूटर की स्क्रीन पर गुजारते हैं
किसके लिए कितना इस्तेमाल सही
डेढ़ साल तक के बच्चे
-परिजनों से दो से पांच मिनट की वीडियो कॉल तक ही सीमित होना चाहिए स्क्रीन का इस्तेमाल। मां-बाप को खेलने-कूदने और पढ़ने-लिखने के लिए प्रेरित करना चाहिए।
18 से 24 महीने
-माता-पिता की देखरेख में दिनभर में एक से डेढ़ घंटे ही स्क्रीन के प्रयोग की इजाजत होनी चाहिए। बच्चों को सिर्फ शिक्षण सामग्री तक पहुंच सुनिश्चित करना अनिवार्य।
दो से पांच साल
-नाच-गाने से जुड़े वीडियो और गेम खेलने की अनुमति दी जा सकती है। पर हफ्ते के शुरुआती पांच दिन अधिकतम एक घंटे और सप्ताहांत तीन घंटे से ज्यादा स्क्रीन न थमाएं।
पांच साल से ऊपर
-बड़े बच्चों के लिए स्क्रीन टाइम निर्धारित करना मुश्किल। पर टीवी-मोबाइल-कंप्यूटर के इस्तेमाल से शारीरिक सक्रियता और सीखने-समझने, रिश्ते निभाने की कला प्रभावित होने लगे तो यह घातक है।
शौर्यपथ / अमेरिका के सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रीवेंशन के अनुसार आज के समय में एंटीबायोटिक के खिलाफ प्रतिरोध विकसित कर लेने वाले बैक्टीरिया चुनौती बनते जा रहे हैं। अमेरिका में हर लगभग 28 लाख लोग एंटीबायोटिक प्रतिरोधी संक्रमण की जद में आ जाते हैं और इनमें से तकरीबन 35,000 लोगों की मौत हो जाती है। अब अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ पेन्सिलवेनिया के पेरलमैन स्कूल ऑफ मेडिसिन के शोधकर्ताओं ने एक ततैया (वाष्प) के जहर से एक नया एंटीबायोटिक अणु तैयार किया है।
अमेरिकी वैज्ञानिकों ने इसके जहर से ऐसे एंटीमाइक्रोबियल अणु विकसित किए हैं जो उन बैक्टीरिया को खत्म करेंगे जिन पर दवाओं का असर नहीं हो रहा। अणु तैयार करने वाली अमेरिका की पेन्सिलवेनिया यूनिवर्सिटी का कहना है इससे तैयार होने वाली दवा से टीबी और सेप्सिस के खतरनाक बैक्टीरिया का इलाज किया जाएगा।
बैक्टीरिया पर बेअसर हो रही दवा का विकल्प-
नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेस जर्नल में पब्लिश रिसर्च के मुताबिक, वैज्ञानिकों ने एशियन, कोरियन और वेस्पुला ततैया के जहर से प्रोटीन का छोटा से हिस्सा निकालकर उसमें बदलाव किया। बदलाव के कारण दवा के अणु में उन बैक्टीरिया को खत्म करने की क्षमता बढ़ी है जिन पर दवाएं बेअसर साबित हो रही हैं। इन बीमारियों का कारण बनने वाले बैक्टीरिया पर मौजूद एंटीबायोटिक दवाएं काम नहीं कर रही हैं।
चूहे पर किया गया अध्ययन-
चूहे पर किए गए अध्ययन में सामने आया कि जिन बैक्टीरिया पर दवा का असर नहीं हो रहा है उन पर इसका असर हुआ। वैज्ञानिकों का कहना है, वर्तमान में ऐसे नए एंटीबायोटिक्स की जरूरत है जो दवा से नष्ट न होने वाले बैक्टीरिया को खत्म कर सकें क्योंकि ऐसे संक्रमण के मामले बढ़ रहे हैं। हमें लगता है जहर से निकले अणु नए तरह के एंटीबायोटिक का काम करेंगे।
ऐसे तैयार हुई दवा-
रिसर्च के मुताबिक, ततैया के जहर से मास्टोपरन-एल पेप्टाइड को अलग किया गया है। यह इनसानों के लिए काफी जहरीला होता है और रक्तचाप के स्तर को बढ़ाता है जिससे इनसानों की हालत नाजुक हो जाती है। इसके इस असर को कम करके इसमें इतना बदलाव किया गया कि यह बैक्टीरिया के लिए जहर का काम करे। इंसानों के लिए यह कितना सुरक्षित है, इस पर क्लीनिकल ट्रायल होना बाकी है।
इन बैक्टीरिया पर हुआ प्रयोग-
वैज्ञानिकों ने दवा का ट्रायल चूहे में मौजूद ई-कोली और स्टेफायलोकोकस ऑरेयस बैक्टीरिया पर किया। नई दवा की टेस्टिंग के दौरान 80 फीसदी चूहे जिंदा रहे। लेकिन जिन चूहों को इस दवा की मात्रा अधिक दी गई उनमें दुष्प्रभाव दिखे। शोध में दावा किया गया है कि यह दवा जेंटामायसिन और इमिपेनेम का विकल्प साबित हो सकता है क्योंकि दवा प्रतिरोधी बैक्टीरिया के मामले बढ़ रहे हैं। शोधकर्ताओं को उम्मीद है कि वो इस तरह के जहर से और एंटीबायोटिक अणु बना सकेंगे और इससे नई तरह की असरदार दवाएं बनाई जा सकेंगी।
शौर्यपथ / कोरोनावायरस महामारी के दौरान लॉकडाउन में घर में बैठे-बैठे लोगों के स्क्रीन देखने के समय में इजाफा हो गया है। एक और जहां बच्चे ऑनलाइन पढ़ाई के कारण ज्यादा देर तक स्क्रीन देख रहे हैं वहीं दूसरी ओर कामकाजी लोग भी काफी देर तक काम करने के दौरान स्क्रीन देखते रहते हैं।
अब एक नए शोध में पता चला है कि रात को सोने से पहले नीली रोशनी को काटने वाले चश्मे का प्रयोग करने से नींद भी अच्छी आती है और अगले दिन कामकाज की उत्पादकता में भी बढ़ोतरी होती है।
इंडियाना यूनिवर्सिटी के केली स्कूल ऑफ बिजनेस के प्रोफेसर क्रिस्टियानों एल गुआराना ने कहा, हमने पाया कि नीली रोशनी को काटने या फिल्टर करने वाले चश्मे नींद को बेहतर करने में एक प्रभावी हस्तक्षेप साबित हुए हैं। इसके अलावा कार्यक्षमता को बढ़ाने, प्रदर्शन को बेहतर करने, संस्थागत व्यवहार को बेहतर करने और खराब कार्य व्यवहार को कम करने में भी ये ब्लू लाइट चश्मे प्रभावी साबित हुए हैं।
नीली रोशनी को फिल्टर करने वाले चश्मे आंखों के सामने एक शारीरिक अंधेरा पैदा कर देते हैं जिससे नींद की गुणवत्ता और अवधि दोनों में ही बढ़ोतरी होती है।
इन उपकरणों से निकलती है नीली रोशनी
ज्यादातर इस्तेमाल में आने वाले उपकरण जैसे कंप्यूटर स्क्रीन, स्मार्टफोन, टैबलेट और टीवी से नीली रोशनी निकलती है। पूर्व शोधों के अनुसार इस नीली रोशनी से नींद में खलल पड़ती है। घर से काम करने के दौरान लोगों की इन उपकरणों पर निर्भरता बढ़ गई है। शोधकर्ता गुआराना ने कहा, सामान्य तौर पर नीली रोशनी को रोकने वाले चश्मे से देर रात जागने वाले लोगों को ज्यादा फायदा होता है।
हालांकि नीली रोशनी से बचने से सभी को फायदा होता है। रात को काम करने वाले कर्मचारियों को इन चश्मों से ज्यादा फायदा होता है क्योंकि उनकी आंतरिक जैविक घड़ी और बाहरी नियंत्रित कार्य के समय में काफी गड़बड़ होती है। हमारे शोध से पता चलता है कि ब्लू लाइट चश्मे कर्मचारियों के स्वास्थ्य और कार्यक्षमता दोनों ही बढ़ाते हैं।
कर्मचारी और नियोक्ता दोनों को होगा फायदा
यूनिवर्सिटी ऑफ वाशिंगटन के प्रोफेसर बारनेस ने कहा, इस शोध से पता चलता है कि ये नीली रोशनी को रोकने वाले चश्मे के इस्तेमाल के सस्ते तरीके से कर्मचारी और नियोक्ता दोनों को ही फायदा होगा।
शोधकर्ताओं ने 63 कंपनी मैनेजरों और 67 कॉल सेंटर अधिकारियों से डाटा लिया। कुछ कर्मचारियों को ब्लू लाइट चश्मे दिए गए और कुछ को नहीं दिए गए। उन्होंने पाया कि कभी-कभी कर्मचारियों को अहले सुबह भी काम करना पड़ता है। इससे उनकी जैविक घड़ी में गड़बड़ी आ जाती है।
नियोक्ताओं को नीली रोशनी के संपर्क में आने की मात्रा को लेकर सोचना चाहिए और कर्मचारियों की जैविक घड़ी को बेहतर बनाने की कोशिश करनी चाहिए।
Feb 09, 2021 Rate: 4.00
