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June 01, 2026
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सेहत / शौर्यपथ / दुघर्टनाओं और गलत जीवनशैली के कारण देश में गर्दन एवं रीढ़ की हड्डी(स्पाइनल कॉर्ड) के क्षतिग्रस्त होने की समस्याएं बढ़ रही हैं। देश में करीब 15 लाख लोगों को गर्दन अथवा स्पाइनल कॉर्ड में चोट लगने के कारण विकलांगता का जीवन व्यतीत करना पड़ रहा है। अनुमानों के अनुसार देश में हर साल स्पाइनल कॉर्ड के चोटिल होने के 2० हजार से अधिक मामले आते हैं।
ऊंचाई से गिरने, खेल-कूद और मार-पीट जैसे कई कारणों से गर्दन क्षतिग्रस्त हो सकती है और कई बार इसकी वजह से मौत भी हो सकती है। इसके अलावा गलत तरीके से व्यायाम करने और सोने-उठने-बैठने के गलत तौर-तरीकों से भी गर्दन दर्द की समस्या हो सकती है।
नयी दिल्ली के फोर्टिस एस्काट्र्स हार्ट रिसर्च इंस्टीच्यूट के ब्रेन एवं स्पाइन सर्जरी विभाग के निदेशक डा. राहुल गुप्ता के अनुसार गर्दन हमारे शरीर का महत्वपूर्ण हिस्सा है। गर्दन की गतिशीलता की मदद से ही हम आगे-पीछे देखते हैं, कम्प्यूटर आदि पर काम करते हैं या किसी से बात करते हैं। गर्दन में हमारे शरीर का बहुत ही नाजुक अंग है, जिसे स्पाइनल कॉर्ड कहा जाता है, जो कई कारणों से चोटिल हो सकता है।
अगर गर्दन में चोट बहुत हल्की हो तो आराम करने या फीजियोथिरेपी से राहत मिल जाती है लेकिन कई लोगों के लिए गर्दन में चोट विकलांगता का भी कारण बन जाता है। ऐसे में जरूरी है कि गर्दन में चोट या गर्दन की किसी भी समस्या की अनदेखी नहीं करें। अगर आराम करने या दवाइयों के सेवन से भी गर्दन दर्द बढ़ता जाए या गर्दन दर्द बांहों और पैरों तक फैल जाए अथवा सिर दर्द, कमजोरी, हाथों और पैरों में सुन्नपन और झुनझुनी आए तो तुरंत न्यूरो एवं स्पाइन विशेषज्ञ से जांच और इलाज कराएं।
डा. राहुल गुप्ता बताते हैं कि कई बार जब गर्दन की हड्डी में ज्यादा कैल्शियम जमा हो जाता है जिससे हड्डी का क्षेत्र कम हो जाता है और स्पाइनल कार्ड के लिए जगह नहीं होती है। ऐसे में हल्की चोट लगने से भी स्पाइनल कार्ड क्षतिग्रस्त हो सकता है। इसके अलावा वहां पर खून की नस- वटेर्व्रल आर्टरी होती है और उसमें भी अगर चोट लगे तो गर्दन में दर्द हो सकता है।
सवार्इकल कॉर्ड में चोट लगने से गर्दन में दर्द की समस्या बहुत ही आम है और इससे काफी लोग ग्रस्त रहते हैं। लेकिन अगर क्वाड्रिप्लेजिया पैरालाइसिस होने पर मरीज को ताउम्र विकलांग जीवन व्यतीत करना पड़ सकता है। उसे बिस्तर पर ही रहने को मजबूर होना पड़ सकता है, उसे बेड सोर यानी बिस्तर पर लंबे समय तक सोने से होने वाले घाव सकते हैं और सांस लेने में तकलीफ हो सकती है और वह रोजमरार् के कामकाज एवं दिनचयार् के लिए अपने परिजनों पर ही पूरी तरह से निर्भर हो जाता है।
स्पाइनल कॉर्ड में चोट लगने से उसके नीचे का हिस्सा सुन्न हो सकता है, मल-मूत्र त्यागने में दिक्कत हो सकती है और कई बार सांस लेने में भी तकलीफ हो सकती है। इसलिए गर्दन एवं सवार्इकल स्पाइन की सुरक्षा करना बहुत जरूरी है और इसमें चोट लगने या कोई दिक्कत होने पर उसकी अनदेखी नहीं करें। गर्दन को हमें हर तरह की चोट से बचा कर रखना जरूरी है और चोट लगने पर तत्काल इलाज करना जरूरी है।
डा. गुप्ता के अनुसार अगर गर्दन में चोट लगी है और हाथ-पैर तक दर्द या सुन्नपन चला गया है तो तत्काल न्यूरो एवं स्पाइन सर्जन से परामर्श करना चाहिए। स्पाइन विशेषज्ञ एक्स रे, सीटी स्कैन या एमआरआई कराने की सलाह देते हैं ताकि चोट की सही स्थिति का पता चल सके। एमआरआई से बोन, साफ्ट टिश्यू एवं स्पाइनल कार्ड सबके बारे में विस्तार से पता चलता है। सीटी स्कैन से बोन के बारे में विस्तार से पता चलता है जबकि एक्स रे हड्डी के बारे में आरंभिक जानकारी मिल जाती है जिसके आधार पर आगे की जांच कराने की सलाह दी जाती है।
ऊंचाई से गिरने पर कई बार मौके पर ही मौत हो जाती है। ऐसे मामलों में ज्यादातर सवार्इकल स्पाइन में इंज्युरी ही होती है। दुर्घटना के शिकार या उंचाई से गिरने वाले घायल व्यक्ति का तत्काल आपरेशन होना जरूरी है जिसमें उनके गर्दन की हड्डी को सीधा किया जाता है प्लेट लगाकर उसे एलाइमेंट में रखा जाता है।
कुछ चिकित्सक स्टेम सेल थिरेपी का उपयोग करते हैं। कुछ प्रयोगों में इसे सफल भी पाया गया लेकिन अभी तक इसे किसी मान्यताप्राप्त चिकित्सा संस्थान या संगठन से मान्यता नहीं मिली है। जो भी लोग इस तरह का उपचार कर रहे हैं वे एक प्रयोग की तरह इसे कर रहे हैं और हो सकता है कि कुछ लोगों को उससे फायदा हुआ हो लेकिन इससे आम तौर पर नुकसान नहीं होता है।

खाना खजाना / शौर्यपथ / आलू का चीला खाने में जितना टेस्टी होता है, बनने में उतना ही आसान भी है। इस चीले को बनाने में बेहद कम समय लगता है। व्रत के दौरान अगर आपको जोर से भूख लग जाए तो झटपट बना लें ये चटपटा चीला। तो देर किस बात की आइए जान लेते हैं क्या है इस चीले को बनाने की झटपट टेस्टी रेसिपी।

आलू का चीला बनाने के लिए सामग्री-
-2-3 कच्चे आलू कद्दूकस किए हुए
-2 हरी मिर्च
-बारीक कटा हुआ हरा धनिया
-¼ छोटा चम्मच काली मिर्च पाउडर
-1 बड़ा चम्मच देसी घी
-सेंधा नमक स्वादानुसार
आलू का चीला बनाने का तरीका-
आलू का चीला बनाने के लिए सबसे पहले एक बाउल में कद्दूकस किया हुआ आलू, हरी मिर्च, धनिया पत्ती, काली मिर्च पाउडर और नमक डालकर अच्छी तरह मिला लें। अब तवे को गर्म करके उसमें 1 चम्मच देसी घी डालें। इसके बाद गर्म तवे में आलू का मिश्रण डालकर चम्मच की मदद से तवे पर ½ सेमी मोटाई के साथ मिश्रण को गोल आकार में फैलाएं। वरना चीला टूट सकता है। अब चीले को दोनों तरफ से गोल्डन ब्राउन होने तक पकाएं। आपका आलू का चीला बनकर तैयार है। इस फलाहारी चीले को व्रत की चटनी या दही के साथ सर्व कर सकते हैं।

धर्म संसार / शौर्यपथ /नवरात्र के चौथे दिन मां कूष्मांडा की पूजा-आराधना की जाती है। इनकी उपासना से सिद्धियों में निधियों को प्राप्त कर समस्त रोग-शोक दूर होकर आयु-यश में वृद्धि होती है। देवी कूष्मांडा को अष्टभुजा देवी भी कहा जाता है। बुद्धि और कौशल का विकास करने वाली मां कूष्मांडा की पूजा नवरात्र के चौथे दिन की जाती है। मां कूष्माडा की आठ भुजाएं हैं। भक्तों में मान्यता है कि मां कूष्मांडा आयु और यश भी बढ़ाती हैं। मां कूष्मांडा देवी की आराधना से रोग-शोक समाप्त हो जाते हैं।
कूष्मांडा का अर्थ है कुम्हड़ा। मां को बलियों में कुम्हड़े की बलि सबसे ज्यादा प्रिय है। इसलिए इन्हें कूष्मांडा देवी कहा जाता है।
ऐसा है मां का स्वरूप : कूष्मांडा देवी की आठ भुजाएं हैं, जिनमें कमंडल, धनुष-बाण, कमल पुष्प, शंख, चक्र, गदा और सभी सिद्धियों को देने वाली जपमाला है। मां के पास इनके अलावा हाथ में अमृत कलश भी हैर्। ंसह की सवारी करने वाली मां की भक्ति करने से आयु, यश और आरोग्य की वृद्धि होती है।
ऐसे करें पूजा : कूष्मांडा देवी योग और ध्यान की देवी भी हैं। देवी का यह स्वरूप अन्नपूर्णा का भी है। उदराग्नि को शांत करने वाली देवी का मानसिक जाप करें। देवी कवच को पांच बार पढ़ना चाहिए। माता कुष्मांडा के दिव्य रूप को मालपुए का भोग लगाकर दुर्गा मंदिर में ब्राह्मणों को इसका प्रसाद देना चाहिए। इससे भक्तों की बुद्धि और कौशल का विकास होता है।

धर्म संसार / शौर्यपथ / राहु छाया ग्रह होने से इसको किसी भी राशि का स्वामित्व नहीं मिला है। यद्यपि इसे कन्या राशि का स्वामी मानते हैं। यह आर्द्रा, स्वाति और शतभिषा नक्षत्र का स्वामी है। राहु की उच्च राशि वृषभ मानी गई है और नीच राशि वृश्चिक। छाया ग्रह होने कारण राहु जिस ग्रह की राशि में होते हैं उसी के अनुसार फल देते हैं। राहु के पूर्ण दृष्टि 5, 7 एवं नौवें स्थान पर पड़ती है। यह तमोगुणी एवं अंधकार प्रिय ग्रह है। इसको पापी ग्रह की संज्ञा मिली है। राहु की स्वराशि कन्या मानी गई है। इस के मित्र ग्रह शनि और केतु हैं। सूर्य, चंद्रमा और बुध, राहु के शत्रु हैं। मंगल इसका सम ग्रह हैं। राहु का रंग धुएं की तरह होता है। यह पृथकतावादी ग्रह है। राहु कूटनीति, राजनीति, झूठ कपट, षड्यंत्र कारक ग्रह है। वायु विकार देने वाला, उत्प्रेरक (उकसाने वाला) और हवाई यात्रा कारक ग्रह है।
लोग राहु का नाम सुनकर बहुत ही अशुभ मानते हैं। लेकिन शनि की तरह यदि आपके कर्म अच्छे हैं और कर्म भाव में शनि या राहु का शुभ प्रभाव है तो आप राजनीति में अच्छा कर सकते हैं। राहु कालसर्प दोष का कारक है। जब राहु और केतु के बीच में सभी ग्रह एक और हो जाते हैं तब वह कालसर्प दोष बनता है। राहु सर्प का मुख माना गया है और केतु सर्प का पुच्छ माना गया है। यदि राहु केतु के साथ में कोई ग्रह हो या एक ग्रह बाहर हो और वह राहु-केतु से अंशों में अधिक हो तो कालसर्प दोष कट जाता है। राहु के साथ मंगल होने से अंगारक दोष बनता है। यह दोष व्यक्ति के अंदर अहं एवं क्रोध का निर्माण करता है। यह ग्रह चोट आदि भी देता है।
यदि कुंडली में पंचम या षष्ठ भाव में व्यक्ति को पेट रोग देता है। द्वितीय अथवा द्वादश भाव में राहु या शनि हो मंगल हो तो उस व्यक्ति को नेत्र पीड़ा हो सकती है। छठे भाव में राहु, केतु, शनि, मंगल के प्रभाव के पैरों में चोट आदि का भय रहता है। राहु की महादशा 18 साल होती है। यदि कुंडली में राहु अशुभ होता है तो व्यक्ति को बुरे कर्म करने को उकसाता है। सबसे पहले व्यक्ति की दिनचर्या को खराब करता है। घूमने-फिरने का शौक पैदा करता है। वाणी दोष उत्पन्न करता है और विवेकहीनता उसके अंदर आ जाती है।‌ अच्छे-बुरे का ज्ञान नहीं रह पाता। उसको घूमना, फिरना, मांस-मदिर का शौक पड़ जाता है। यदि राहु की महादशा में आप उपरोक्त अवस्था से पीड़ित हो रहे हैं तो समझो कि आप के साथ राहु बहुत बुरा करने वाला है। अपयश, धोखा,आर्थिक हानि, मानसिक विकार एवं तलाक हो सकता है।
कुंडली में राहु अच्छी अवस्था में हो तो वह अपने महादशा में रंक से राजा बना देता है। राजनीति में राहु अपना उच्चतम स्थान रखता है और किसी साधारण व्यक्ति को भी राजा बना सकता है। यदि आपकी कुंडली में राहु अशुभ है या महादशा में अशुभ प्रभाव दे रहा है तो आप कुत्ते को दूध रोटी खिलाएं। कोढियों को भोजन दान करें। मछलियां को आटे की गोलियां खिलाएं। राहु के तांत्रिक मंत्र का जाप कराएं और अपनी दिनचर्या बदले। राहु की अशुभ प्रभाव को कम करने के लिए रांगे की गोली सफेद धागे में बुधवार को गले में धारण करें। रांगा और गोमेद राहु के नकारात्मक प्रभाव को कम करते हैं। रांगा जो बर्तनों में टांका लगाने का काम आता है बहुत ही महत्वपूर्ण है। यदि किसी को राहु अत्यंत पीड़ित कर रहा हो या किसी बालक को नजर अधिक लगती हो, अज्ञात भय रहता हो तो रांगे की गोली सफेद धागे में धारण करें।

रायपुर / शौर्यपथ / पढऩा-लिखना अभियान यह अभियान बुनियादी साक्षरता पर केंद्रित होगा। प्रत्येक जिले में राज्य साक्षरता मिशन की तर्ज पर जिला साक्षरता मिशन का गठन किया जाएगा। इस अभियान के अंतर्गत पांच वर्ष में प्रदेश के एक तिहाई असाक्षरों को साक्षर किए जाने का लक्ष्य है। इस अभियान में आकांक्षी जिलों तथा राष्ट्रीय व राज्य की साक्षरता दर से कम औसत वाले जिलों को प्राथमिकता दी जाएगी। पढऩा-लिखना अभियान की वार्षिक कार्य योजना के निर्माण हेतु आज नया रायपुर स्थित मंत्रालय से राज्य स्तरीय वीडियो कॉन्फ्रेंस का आयोजन किया गया। एससीईआरटी और राज्य साक्षरता मिशन प्राधिकरण के संचालक श्री डी. राहुल वेंकट द्वारा प्रदेश के सभी जिलों के जिला शिक्षा अधिकारियों, डाइट के प्राचार्य तथा जिला परियोजना अधिकारी साक्षरता मिशन की बैठक में इस वर्ष ढाई लाख लोगों को साक्षर बनाए जाने के लक्ष्य पर चर्चा हुई।
राज्य साक्षरता मिशन के सहायक संचालक प्रशांत कुमार पाण्डेय ने पॉवर पॉइंट प्रेजेन्टेशन के माध्यम से बताया कि जिले के प्रभारी मंत्री अथवा जिला पंचायत के अध्यक्ष की अध्यक्षता में सामान्य सभा और कलेक्टर की अध्यक्षता में कार्यकारिणी समिति गठित की जाएगी। सदस्य सचिव की जिम्मेदारी जिला शिक्षा अधिकारी की होगी। इस अभियान की विशेषता यह है कि यह पूर्ण रूप से स्वयंसेवी आधारित होगा अर्थात पढ़ाने वाले स्वयं सभी शिक्षकों को किसी भी प्रकार का पारिश्रमिक प्रदान नहीं किया जाएगा। इस अभियान में जिलों को स्वायत्तता प्रदान की गई है। इसमें नवाचारी गतिविधियों को प्रोत्साहित किया जाएगा। प्रत्येक जिले के डाइट में अकादमी और तकनीकी संसाधन समर्थन हेतु एक अलग प्रकोष्ठ डीसीएल गठित किया जाएगा, जिसे जिला साक्षरता केंद्र कहा जाएगा।
पढऩा-लिखना अभियान स्कूल और कॉलेज के विद्यार्थियों, एनसीसी, एनएसएस, नेहरू युवा केंद्र और स्वयंसेवी संस्थाओं की सहभागिता से संचालित किया जाएगा। जिले अपनी कार्ययोजना राज्य को और राज्य अपनी कार्ययोजना केंद्रीय प्रोजेक्ट को स्वीकृति के लिए बोर्ड को प्रस्तुत की जाएगी। एनआईसी द्वारा पोर्टल का निर्माण किया गया है, जिसमें ऑनलाइन कार्य योजना अपलोड की जाएगी। भारत सरकार द्वारा आज इस विषय का प्रशिक्षण भी आयोजित किया गया। असाअक्षरों का अनुदेशकों का चिन्हांकन करने के पश्चात विधिवत प्रशिक्षण प्रदान किया जाएगा। इसका वर्ष में चार बार मूल्यांकन एनआईओएस द्वारा किया जाएगा। पढऩा-लिखना अभियान शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्र में संचालित किया जाएगा। महिलाओं अनुसूचित जाति, जनजाति और अल्पसंख्यक वर्ग को इसमें प्राथमिकता प्रदान की जाएगी। साथ ही सामग्री- ई-बुक्स, वीडियो व्याख्यान, मोबाइल एप जैसे आईटी टूल का भी उपयोग किया जाएगा।
राज्य साक्षरता मिशन प्राधिकरण के संचालक डी. राहुल वेंकट द्वारा छत्तीसगढ़ के सभी जिला अधिकारियों से जिलावारे तैयारी की समीक्षा की और उन्हें निर्देश दिए कि दो दिनों के भीतर जिला साक्षरता मिशन और डाइट में जिला साक्षरता केंद्र की स्थापना कर ली जाए। कोविड-19 को दृष्टिगत रखते हुए इस वर्ष लक्ष्य संख्या निर्धारित की जाए।
वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग में राज्य साक्षरता मिशन प्राधिकरण के सहायक संचालक दिनेश कुमार टाक, जिला शिक्षा अधिकारी, डाइट के प्राचार्य तथा जिला परियोजना अधिकारी सहित अन्य अधिकारी शामिल हुए।

लाइफस्टाइल / शौर्यपथ / दुनियाभर में होने वाले मनोरंजन और संगीत के आयोजनों पर भी कोरोना का कहर टूटा है। ऐसे में कोरोना महामारी से लड़ते हुए इन आयोजनों को दोबारा खड़ा करने के लिए कई तरह के प्रयोग किये जा रहे हैं। कहीं सोशल डिस्टेंसिंग में तहत लोगों को दूर-दूर बैठाकर कॉन्सर्ट कराने के तरीके का उपयोग हो रहा है तो कहीं सेंसरों की मदद से लोगों के हाथ सैनिटाइज करने और उनमें दूरी बरकरार रखने के प्रयोगों पर काम किया जा रहा है। ऐसा ही एक प्रयोग ओकलाहोमा में हाल ही में किया गया। यहां एक संगीत बैंड ने प्रयोग के तहत प्लास्टिक के बुलबुले में खुद को बंद कर मंच पर प्रस्तुति दी। इतना ही नहीं बल्कि दर्शकों को भी प्लास्टिक बबल में डाला गया।
वीडियो फुटेज में दिखा अनोखा नजारा-
द फ्लेमिंग लिप्स नामक संगीत बैंड ने अपने प्रशंसकों के लिए एक कार्यक्रम का आयोजन किया। ओकलाहोमा शहर के इस समूह के सदस्यों ने खुद को अलग-अलग प्लास्टिक बबल में डाला। गायक और वादक सभी बुलबुलों के अंदर नजर आ रहे थे। कार्यक्रम के वीडियो फुटेज में 100 पिचके हुए प्लास्टिक के बुलबुले देखे गए।
इस कार्यक्रम कोरोनावायरस के कारण भविष्य में होने वाले कॉन्सर्ट का एक परीक्षण था। इसके साथ ही एक कार्यक्रम के दौरान एक म्यूजिक वीडियो भी बनाया गया ताकि भविष्य के कॉन्सर्ट की रूपरेखा के बारे में लोगों को बताया जा सके। कार्यक्रम के दौरान इस कॉन्सर्ट में 100 दर्शक भी प्लास्टिक बुलबुले के अंदर संगीत का लुत्फ उठाते नजर आएं।
अब और इंतजार नहीं कर सकते-
ओकलाहोमा के संगीत बैंड ने इस कार्यक्रम के दौरान अपने आने वाले नए एल्बम अमेरिकन हेड एट द क्राइटेरियन के दो गानों पर प्रस्तुति दी। इस कॉन्सर्ट हॉल में 3500 हजार लोगों के खड़े होने की व्यवस्था है, लेकिन प्रयोग के दौरान सिर्फ 100 लोगों को ही वहां आने की अनुमति दी गई। बैंड के सदस्य फ्रंटमैन वाइने कोएने ने इंस्टाग्राम पर कार्यक्रम का एक क्लिप साझा किया और साथ ही कई तस्वीरें भी पोस्ट की। उन्होंने कहा, मुझे लगता है किसी ने भी मार्च में नहीं सोचा होगा कि ये इतना लंबा चलेगा।
अब आठ महीने होने जा रहे हैं। मुझे लगता है कि सभी ने सोचा होगा कि अब यह बीमारी ठीक हो जाएगा, इस महीने नियंत्रण में आ जाएगी। लेकिन अब और इंतजार नहीं किया जा सकता। बबल के इस विकल्प पर पहली बार मई में प्रयोग किया गया था। स्टीफन कोलबर्ट ने अपने शो पर इसका प्रयोग किया था।
2004 से बबल का प्रयोग कर रहे कोएने-
कोएने 2004 से ही अपने कार्यक्रमों के दौरान प्लास्टिक बबल का इस्तेमाल कर रहे हैं। उन्होंने कहा, मुझे यह काफी पसंद है। इसके अंदर खड़े होकर आप कितने भी उत्साहित होकर चीख सकते है और इससे कोई दूसरा संक्रमित भी नहीं होगा। यह के बैरियर की तरह काम करता है जो आपको भी सुरक्षित रखता है और दूसरों को भी। यह एक सफल प्रयोग हैं और भविष्य में इसका इस्तेमाल किया जाना चाहिए।
नहीं होती घुटन-
बैंड के अन्य सदस्य डेजी स्मिथ ने कहा, यह प्लास्टिक बबल इतना बड़ा है कि इसके अंदर घुटन महसूस नहीं होती। इसके अंदर सांस लेने में कोई दिक्कत भी नहीं होती। अगस्त में पहली बार 2500 संगीत प्रेमियों के लिए सैम फेंडर के कॉन्सर्ट का आयोजन किया गया था। यहां दर्शकों के लिए छोटे-छोटे बाड़े बनाए गए थे ताकि सोशल डिस्टेंसिंग के नियमों का पालन किया जा सके। वहीं न्यूकैसल गोसफोर्थ पार्क में नॉर्थ शील्ड बैंड ने प्रस्तुति दी जिसमें छह-छह फीट की दूरी पर 500 ऊंचे प्लेटफॉर्म बनाए गए थे जिसमें एक साथ सिर्फ पांच लोग ही खड़े हो सकते हैं।

 शौर्यपथ / क्या आपका लाडला दिनभर टीवी या मोबाइल की स्क्रीन से चिपका रहता है? अगर हां तो संभल जाइए। एक अमेरिकी अध्ययन में स्क्रीन के जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल को न सिर्फ बच्चों की आंखों और मानसिक स्वास्थ्य, बल्कि सीखने-समझने, चीजें याद रखने व रिश्ते निभाने की क्षमता के लिहाज से भी घातक करार दिया गया है। अभिभावकों से कहा गया है कि वे बच्चों को दिनभर में दो घंटे से ज्यादा स्क्रीन के प्रयोग की छूट न दें।
कैलिफोर्निया स्थित मेमोरियल केयर ऑरेंज कोस्ट मेडिकल सेंटर के शोधकर्ताओं की मानें तो दिनभर में तीन घंटे से अधिक समय तक स्क्रीन का इस्तेमाल करने वाले बच्चे देरी से बोलना सीखते हैं। उन्हें पढ़ने-लिखने और भाषा समझने में भी दिक्कत पेश आती है। वहीं, जो किशोर रोज पांच से सात घंटे स्क्रीन के सामने डटे रहते हैं, उनमें उदासी, बेचैनी, जीवन से नाउम्मीदी और आक्रामकता की शिकायत पनपने का खतरा दोगुना होता है।
मोटापे का खतरा
मुख्य शोधकर्ता डॉ. जीना पोजनर ने स्क्रीन की लत को बच्चों में मोटापे की बढ़ती समस्या के लिए जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने मेयो क्लीनिक के उस अध्ययन का हवाला दिया, जिसमें स्क्रीन का इस्तेमाल हर दो घंटे बढ़ने पर मोटापे की आशंका में 23 फीसदी इजाफा होने की बात सामने आई थी। यह भी पाया गया था कि स्क्रीन के इस्तेमाल में 50 फीसदी कटौती करने वाले बच्चे 25 प्रतिशत कम कैलोरी खाते हैं।
अनिद्रा की शिकायत
पोजनर ने बताया कि स्क्रीन से निकलने वाली नीली रोशनी स्लीप हार्मोन ‘मेलाटोनिन’ का उत्पादन बाधित करती है। इससे बच्चों को नींद के आगोश में समाने में तो दिक्कत पेश आती ही है, साथ ही सुबह उठने पर वे तरोताजा भी महसूस नहीं करते। अधूरी नींद का उनकी याददाश्त और तार्किक क्षमता पर भी बुरा असर पड़ता है। पोजनर ने सोने से दो घंटे पहले ही बच्चों के लिए स्क्रीन का इस्तेमाल प्रतिबंधित करने की सलाह दी।
सिर से लेकर कमर तक में दर्द
2018 में प्रकाशित एक ब्रिटिश अध्ययन का जिक्र करते हुए पोजनर ने कहा कि घंटों स्क्रीन के सामने डटे रहने वाले बच्चों में सिर, पीठ, कमर और कंधे में दर्द की समस्या भी ज्यादा सामने आती है। इसकी वजह सिर झुकाने से उसका भार बढ़ना और रीढ़ की हड्डी पर अतिरिक्त दबाव पड़ना है।
चिंताजनक
-आठ से 12 साल तक के बच्चे रोजाना 04 से छह घंटे औसतन स्क्रीन से चिपके रहते हैं
-09 घंटे औसतन किशोर उम्र के लोग मोबाइल, टीवी या कंप्यूटर की स्क्रीन पर गुजारते हैं
किसके लिए कितना इस्तेमाल सही
डेढ़ साल तक के बच्चे
-परिजनों से दो से पांच मिनट की वीडियो कॉल तक ही सीमित होना चाहिए स्क्रीन का इस्तेमाल। मां-बाप को खेलने-कूदने और पढ़ने-लिखने के लिए प्रेरित करना चाहिए।
18 से 24 महीने
-माता-पिता की देखरेख में दिनभर में एक से डेढ़ घंटे ही स्क्रीन के प्रयोग की इजाजत होनी चाहिए। बच्चों को सिर्फ शिक्षण सामग्री तक पहुंच सुनिश्चित करना अनिवार्य।
दो से पांच साल
-नाच-गाने से जुड़े वीडियो और गेम खेलने की अनुमति दी जा सकती है। पर हफ्ते के शुरुआती पांच दिन अधिकतम एक घंटे और सप्ताहांत तीन घंटे से ज्यादा स्क्रीन न थमाएं।
पांच साल से ऊपर
-बड़े बच्चों के लिए स्क्रीन टाइम निर्धारित करना मुश्किल। पर टीवी-मोबाइल-कंप्यूटर के इस्तेमाल से शारीरिक सक्रियता और सीखने-समझने, रिश्ते निभाने की कला प्रभावित होने लगे तो यह घातक है।

 शौर्यपथ / अमेरिका के सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रीवेंशन के अनुसार आज के समय में एंटीबायोटिक के खिलाफ प्रतिरोध विकसित कर लेने वाले बैक्टीरिया चुनौती बनते जा रहे हैं। अमेरिका में हर लगभग 28 लाख लोग एंटीबायोटिक प्रतिरोधी संक्रमण की जद में आ जाते हैं और इनमें से तकरीबन 35,000 लोगों की मौत हो जाती है। अब अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ पेन्सिलवेनिया के पेरलमैन स्कूल ऑफ मेडिसिन के शोधकर्ताओं ने एक ततैया (वाष्प) के जहर से एक नया एंटीबायोटिक अणु तैयार किया है।
अमेरिकी वैज्ञानिकों ने इसके जहर से ऐसे एंटीमाइक्रोबियल अणु विकसित किए हैं जो उन बैक्टीरिया को खत्म करेंगे जिन पर दवाओं का असर नहीं हो रहा। अणु तैयार करने वाली अमेरिका की पेन्सिलवेनिया यूनिवर्सिटी का कहना है इससे तैयार होने वाली दवा से टीबी और सेप्सिस के खतरनाक बैक्टीरिया का इलाज किया जाएगा।
बैक्टीरिया पर बेअसर हो रही दवा का विकल्प-
नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेस जर्नल में पब्लिश रिसर्च के मुताबिक, वैज्ञानिकों ने एशियन, कोरियन और वेस्पुला ततैया के जहर से प्रोटीन का छोटा से हिस्सा निकालकर उसमें बदलाव किया। बदलाव के कारण दवा के अणु में उन बैक्टीरिया को खत्म करने की क्षमता बढ़ी है जिन पर दवाएं बेअसर साबित हो रही हैं। इन बीमारियों का कारण बनने वाले बैक्टीरिया पर मौजूद एंटीबायोटिक दवाएं काम नहीं कर रही हैं।
चूहे पर किया गया अध्ययन-
चूहे पर किए गए अध्ययन में सामने आया कि जिन बैक्टीरिया पर दवा का असर नहीं हो रहा है उन पर इसका असर हुआ। वैज्ञानिकों का कहना है, वर्तमान में ऐसे नए एंटीबायोटिक्स की जरूरत है जो दवा से नष्ट न होने वाले बैक्टीरिया को खत्म कर सकें क्योंकि ऐसे संक्रमण के मामले बढ़ रहे हैं। हमें लगता है जहर से निकले अणु नए तरह के एंटीबायोटिक का काम करेंगे।
ऐसे तैयार हुई दवा-
रिसर्च के मुताबिक, ततैया के जहर से मास्टोपरन-एल पेप्टाइड को अलग किया गया है। यह इनसानों के लिए काफी जहरीला होता है और रक्तचाप के स्तर को बढ़ाता है जिससे इनसानों की हालत नाजुक हो जाती है। इसके इस असर को कम करके इसमें इतना बदलाव किया गया कि यह बैक्टीरिया के लिए जहर का काम करे। इंसानों के लिए यह कितना सुरक्षित है, इस पर क्लीनिकल ट्रायल होना बाकी है।
इन बैक्टीरिया पर हुआ प्रयोग-
वैज्ञानिकों ने दवा का ट्रायल चूहे में मौजूद ई-कोली और स्टेफायलोकोकस ऑरेयस बैक्टीरिया पर किया। नई दवा की टेस्टिंग के दौरान 80 फीसदी चूहे जिंदा रहे। लेकिन जिन चूहों को इस दवा की मात्रा अधिक दी गई उनमें दुष्प्रभाव दिखे। शोध में दावा किया गया है कि यह दवा जेंटामायसिन और इमिपेनेम का विकल्प साबित हो सकता है क्योंकि दवा प्रतिरोधी बैक्टीरिया के मामले बढ़ रहे हैं। शोधकर्ताओं को उम्मीद है कि वो इस तरह के जहर से और एंटीबायोटिक अणु बना सकेंगे और इससे नई तरह की असरदार दवाएं बनाई जा सकेंगी।

 शौर्यपथ / कोरोनावायरस महामारी के दौरान लॉकडाउन में घर में बैठे-बैठे लोगों के स्क्रीन देखने के समय में इजाफा हो गया है। एक और जहां बच्चे ऑनलाइन पढ़ाई के कारण ज्यादा देर तक स्क्रीन देख रहे हैं वहीं दूसरी ओर कामकाजी लोग भी काफी देर तक काम करने के दौरान स्क्रीन देखते रहते हैं।
अब एक नए शोध में पता चला है कि रात को सोने से पहले नीली रोशनी को काटने वाले चश्मे का प्रयोग करने से नींद भी अच्छी आती है और अगले दिन कामकाज की उत्पादकता में भी बढ़ोतरी होती है।
इंडियाना यूनिवर्सिटी के केली स्कूल ऑफ बिजनेस के प्रोफेसर क्रिस्टियानों एल गुआराना ने कहा, हमने पाया कि नीली रोशनी को काटने या फिल्टर करने वाले चश्मे नींद को बेहतर करने में एक प्रभावी हस्तक्षेप साबित हुए हैं। इसके अलावा कार्यक्षमता को बढ़ाने, प्रदर्शन को बेहतर करने, संस्थागत व्यवहार को बेहतर करने और खराब कार्य व्यवहार को कम करने में भी ये ब्लू लाइट चश्मे प्रभावी साबित हुए हैं।
नीली रोशनी को फिल्टर करने वाले चश्मे आंखों के सामने एक शारीरिक अंधेरा पैदा कर देते हैं जिससे नींद की गुणवत्ता और अवधि दोनों में ही बढ़ोतरी होती है।
इन उपकरणों से निकलती है नीली रोशनी
ज्यादातर इस्तेमाल में आने वाले उपकरण जैसे कंप्यूटर स्क्रीन, स्मार्टफोन, टैबलेट और टीवी से नीली रोशनी निकलती है। पूर्व शोधों के अनुसार इस नीली रोशनी से नींद में खलल पड़ती है। घर से काम करने के दौरान लोगों की इन उपकरणों पर निर्भरता बढ़ गई है। शोधकर्ता गुआराना ने कहा, सामान्य तौर पर नीली रोशनी को रोकने वाले चश्मे से देर रात जागने वाले लोगों को ज्यादा फायदा होता है।
हालांकि नीली रोशनी से बचने से सभी को फायदा होता है। रात को काम करने वाले कर्मचारियों को इन चश्मों से ज्यादा फायदा होता है क्योंकि उनकी आंतरिक जैविक घड़ी और बाहरी नियंत्रित कार्य के समय में काफी गड़बड़ होती है। हमारे शोध से पता चलता है कि ब्लू लाइट चश्मे कर्मचारियों के स्वास्थ्य और कार्यक्षमता दोनों ही बढ़ाते हैं।
कर्मचारी और नियोक्ता दोनों को होगा फायदा
यूनिवर्सिटी ऑफ वाशिंगटन के प्रोफेसर बारनेस ने कहा, इस शोध से पता चलता है कि ये नीली रोशनी को रोकने वाले चश्मे के इस्तेमाल के सस्ते तरीके से कर्मचारी और नियोक्ता दोनों को ही फायदा होगा।
शोधकर्ताओं ने 63 कंपनी मैनेजरों और 67 कॉल सेंटर अधिकारियों से डाटा लिया। कुछ कर्मचारियों को ब्लू लाइट चश्मे दिए गए और कुछ को नहीं दिए गए। उन्होंने पाया कि कभी-कभी कर्मचारियों को अहले सुबह भी काम करना पड़ता है। इससे उनकी जैविक घड़ी में गड़बड़ी आ जाती है।
नियोक्ताओं को नीली रोशनी के संपर्क में आने की मात्रा को लेकर सोचना चाहिए और कर्मचारियों की जैविक घड़ी को बेहतर बनाने की कोशिश करनी चाहिए।

लाइफस्टाइल / शौर्यपथ / जियोवानी कैरिली और जियैमपिएरो नोबिली इटली के सुदूर नॉर्तोशे कस्बे के दो मात्र बाशिंदे हैं। बावजूद इसके वे कोरोना संक्रमण की रोकथाम के लिए जरूरी सभी एहतियाती उपायों का सख्ती से पालन कर रहे हैं। एक-दूसरे से मिलते समय दोनों न सिर्फ मास्क पहनना सुनिश्चित करते हैं, बल्कि आपस में छह फीट का फासला बनाए रखना भी नहीं भूलते।
नॉर्तोशे पर्यटकों के बीच लोकप्रिय पेरुगिया प्रांत की नरीना घाटी का बेहद खूबसूरत कस्बा है। हालांकि, समुद्र तल से 900 मीटर की ऊंचाई के चलते यहां पहुंचना उतना आसान नहीं। बावजूद इसके 82 वर्षीय कैरिली और 74 साल के नोबिली खुद को सार्स-कोव-2 वायरस के प्रकोप से सुरक्षित नहीं महसूस करते।
बकौल कैरिली, ‘कोविड-19 का नाम सुनते ही मेरी रूह कांप उठती है। मैं अगर संक्रमित हो गया तो कौन मेरा ख्याल रखेगा। मेरी उम्र हो चली है, फिर भी मैं जिंदा रहना चाहता हूं, अपनी भेड़ों, कुत्ते, सेब के बगानों, मधुमक्खी के छत्तों, वाइनयार्ड और मशरूम के खेतों के लिए।’
कैरिली कहते हैं, ‘नॉर्तोशे में न तो कोई होटल-रेस्तरां या बार है, न ही अस्पताल,क्लीनिक, दवा की दुकान या मिनी बाजार। हर छोटे-बड़े सामान की खरीदारी के लिए हमें शहर जाना पड़ता है। वहां अगर हम किसी संक्रमित के संपर्क में आ गए हों तो नहीं चाहते कि दूसरा भी वायरस का शिकार हो। मास्क लगाने और सामाजिक दूरी पर अमल करने की एक बड़ी वजह यह भी है।’
नियमों का पालन करना जरूरी
-इटली में सार्वजनिक स्थलों पर मास्क पहनना और एक मीटर की सामाजिक दूरी का पालन करना अनिवार्य है। नियमों की अनदेखी करने पर 470 से 1170 डॉलर (करीब 32900 से 81900 रुपये) का जुर्माना लगाने का प्रावधान किया गया है। नोबिली के मुताबिक वह और कैरिनी सिर्फ स्वास्थ्य कारणों से मास्क नहीं पहनते या फिर सोशल डिस्टेंसिंग पर अमल नहीं करते। दोनों का मानना है कि नियम-कायदे सबके लिए समान होते हैं। इन्हें तोड़ना अपने उसूलों का अपमान करने जैसा है।
आखिरी सांस तक नॉर्तोशे में रहेंगे
-कैरिली की पैदाइश नॉर्तोशे की ही है, पर पढ़ाई और नौकरी के सिलसिले में उनका ज्यादातर वक्त राजधानी रोम में गुजरा। रिटायरमेंट के बाद की जिंदगी बिताने के लिए वह पुश्तैनी गांव लौट गए। उनके साले के बहनोई नोबिली ने भी नॉर्तोशे में जा बसने का मन बना लिया। कैरिली कहते हैं, नोबिली के अलावा उनकी पांच भेड़ें और एक कुत्ता ही नॉर्तोशे में रहते हैं। बावजूद इसके दोनों को कभी अकेलापन महसूस नहीं होता। बाजार से लंबी दूरी और साधन का अभाव भी उन्हें शहर में बसने के लिए नहीं उकसाता।

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