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सेहत /शौर्यपथ /सर्दियों में शहद का सेवन किसी एनर्जी बूस्टर से कम नहीं है। शहद के स्वाद की तरह इसके गुण भी बहुत मीठे हैं। वजन कम करने के साथ शहद आपके शरीर को डिटॉक्स करता है लेकिन आपको शहद के सेवन से जुड़ी कुछ सावधानियों को भी ध्यान रखना चाहिए, जिससे कि शहद आपको फायदा पहुंचाने की जगह नुकसान न पहुंचा दे।
शहद के पोषक तत्व
शहद जरूरी पोषक तत्वों, खनिजों और विटामिन का भंडार है। शहद (honey in hindi) में मुख्य रुप में फ्रक्टोज पाया जाता है। इसके अलावा इसमें कार्बोहाइड्रेट, राइबोफ्लेविन, नायसिन, विटामिन बी-6, विटामिन सी और एमिनो एसिड भी पाए जाते हैं। एक चम्मच (21 ग्राम) शहद में लगभग 64 कैलोरी और 17 ग्राम शुगर (फ्रक्टोज, ग्लूकोज, सुक्रोज एवं माल्टोज) होता है। शहद में फैट, फाइबर और प्रोटीन बिल्कुल भी नहीं होता है।
शहद के फायदे
शहद के औषधीय गुणों की बात करें तो यह अनगिनत बीमारियों के इलाज में उपयोगी मानी जाती है। यही कारण है कि प्राचीन काल से ही शहद को औषधि माना गया है। आज के समय में मुख्य रुप से लोग त्वचा में निखार लाने, पाचन ठीक रखने, इम्युनिटी पावर बढ़ाने, वजन कम करने आदि के लिए शहद का उपयोग करते हैं।
इन बातों का रखें ध्यान
-शहद में गर्मी होती है। इसे गर्म खाने के साथ खाने से बचना चाहिए, नहीं तो दस्तु की संभावना होती है।
-चाय या कॉफी के साथ शहद के सेवन से शरीर का तापमान बढ़ा देता है। इससे घबराहट बढ़ने की संभावना होती है।
-शहद के साथ मूली खाने से बचना चाहिए, इससे शरीर में टॉक्सिन्स बनने लगते हैं।
-मीट और मछली के साथ शहद खाने से शरीर में टॉक्सिन पैदा होता है। इससे शरीर पर बुरा असर पड़ता है।
-घी व शहद की समान अनुपात में मिलाकर सेवन न करें। यह विषाक्त हो सकता है।
शौर्यपथ / वास्तु शास्त्र एवं पौराणिक मान्यताओं के अनुसार पक्षियों के जोड़े, नारियल, एकाक्षी नारियल और श्रीफल सुख-समृद्धि बहुत ही उपयोगी माने गए हैं। इन वस्तुओं का प्रयोग मानव की समृद्धि और शांति के लिए किया जा सकता है। ज्योतिषाचार्य पं.शिवकुमाार शर्मा से जानिए इनका जीवन में समृद्धि के लिए कैसे और किस तरह से इनका प्रयोग किया जा सकता है।
पक्षियों का जोड़ा: पक्षियों का जोड़ा प्राचीन काल से ही भारतीय संस्कृति का अभिन्न अंग रहा है। पक्षियों के जोड़े का इतिहास हमें महर्षि वाल्मीकि के युग से प्राप्त होता है जब वे तमसा नदी में स्नान कर रहे थे, तब एक क्रोंच पक्षी का जोड़ा जलविहार कर रहा था। सुंदर पक्षियों का जोड़ा वास्तु के अनुसार भी बहुत शुभ होता है। हंस, तोता, मोर, चकवा-चकवी शुभ पक्षियों के जोड़े की तस्वीर या मूर्ति घर में लगाने से घर के सदस्यों में परस्पर प्रेम का भाव जागृत होता है। नव दंपत्ति के कक्ष में या बेडरूम में ऐसे पक्षियों का जोड़ा रखना शुभ माना गया है। लेकिन यह भी ध्यान रहे कि चित्र में पक्षियों का जोड़ा उस कक्ष में पानी के अंदर दिखाई ना पड़े। पक्षियों का जोड़ा हमेशा उत्तर अथवा पूर्व दीवार पर रखें ताकि सोते समय और जागते समय सामने दिखाई पड़े। इससे पति-पत्नी के बीच में संबंध मधुर होते हैं। घर के ड्राइंग रूम में भी इन पक्षियों के जोड़े रखे जा सकते हैं। ड्राइंग रूम में इन जोड़ों को रखने से हमारे सामाजिक संबंध बहुत अच्छे और मधुर हो जाते हैं। विवाह योग्य कन्या के कक्ष में भी ऐसे जोड़े रखने से शीघ्र ही उनका विवाह संबंध तय हो जाता है।
नारियल: धार्मिक मान्यताओं के अनुसार नारियल कई रूपों में मिलता है। पहला है साधारण नारियल। यह नारियल ऊपर से जटा से युक्त कठोर परत वाला नारियल पूर्णता का प्रतीक है। इसे हम ब्रह्मांड की परिकल्पना भी कर सकते हैं। नारियल प्रत्येक शुभ कार्य में उपयोग किया जाता है। महालक्ष्मी के स्वागत के लिए द्वार पर कलश भरकर आम्रपल्लव डालकर उसके ऊपर नारियल सजाते हैं। ऐसा माना जाता है कि लक्ष्मी जी को पूर्ण कलश बहुत प्रिय है और वे उस घर में निवास के लिए तत्पर रहती हैं। इसीलिए सभी हिंदू परिवारों में शुभ अवसर पर सज्जा के समय नारियल युक्त कलश का चित्र और नारियल का चित्र बनाकर सकारात्मक उर्जा का निर्माण किया जा सकता है।
एकाक्षी लघु नारियल: सामान्य रूप से जब हम नारियल के जटाओं को हटाते हैं उसकी कठोर परत पर तीन काले बिंदु दिखाई देते हैं। जिसमें दो बिंदु आंखों के रूप में और एक बिंदु मुंह के रूप में माना गया है। कभी-कभी हजारों में कोई एक नारियल ऐसा निकलता है जिसमें केवल दो बिंदु होते हैं। इसे एक आंख और एक मुंह माना जाता है। ऐसे नारियल को एकाक्षी नारियल बोलते हैं। यद्यपि यह बहुत दुर्लभ होता है यदि आपको कहीं मिल जाए, इसकी घर में स्थापना करें। दैनिक पूजा करें और मां लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए किसी विशेष मंत्र के द्वारा इस को अभिमंत्रित करें। तंत्र में यह नारियल बहुत ही उपयोगी माना गया है। इससे घर में धन-धान्य प्रेम और इच्छापूर्ति तक की संभावनाएं होती हैं।
श्रीफल: श्रीफल एक कंचे के आकार का नारियल की तरह एक फल होता है। इसे अति लघु नारियल या श्रीफल कहते हैं। श्री फल लक्ष्मी जी अर्थात लक्ष्मी जी को प्रसन्न करने का फल माना गया है। दीपावली के पर्व पर 5 या 11 श्रीफल लेकर दीपावली पूजन के समय चौकी पर रखें और लक्ष्मी जी के मंत्रों से ही उन पर अक्षत, पुष्प, नैवेद्य आदि से पूजन करें। अगले दिन अपनी तिजोरी या मंदिर में स्थापित कर दें। घर का उत्तर पूरब कोना यदि दूषित हो या कटा हुआ हो तो 11 श्रीफल 11 पीली कौड़ियां पीले वस्त्र में बांध कर टांगे या किसी पात्र में रख दें। श्रीफल को अपनी जेब या व्यापार स्थान में या तिजोरी में रखने से भी लक्ष्मी जी कृपा बनी रहती है।
सेहत /शौर्यपथ / वैसे तो किशमिश का सेवन हमारे शरीर के लिए बहुत फायदेमंद है लेकिन इसका सेवन अगर ठंड में किया जाए तो ये ज्यादा लाभदायक होती है. ठंड के मौसम में किशमिश का सेवन करने से कब्ज, एनीमिया, दुबलापन और शारीरिक कमजोरी जैसी गंभीर समस्याओं से छुटकारा मिल सकता है. किशमिश का सेवन करने से आपका वजन भी संतुलित रहता है. साथ ही आंख, दांत और हड्डियां भी मजबूत बनी रहती हैं. आइए हम आपको बताते हैं कि किशमिश का किस तरह से सेवन करने से आप ठंड के दिनों में स्वस्थ रह सकते हैं.
बॉडी को करता है डिटॉक्सीफाई
किशमिश के सेवन से उसके अंदर मौजूद फाइबर हमारी आंतों से विषाक्त पदार्थों को बाहर निकालने में मदद करता है जिससे हमारा पाचन तंत्र सही रहता है. किशमिश के सेवन से हमारे शरीर को भरपूर मात्रा में ऊर्जा मिलती है क्योंकि इसमें ग्लुकोज और फ्रुक्टोज पाया जाता है जो हमारे शरीर को ताकतवर बनाता है.
किशमिश में कई ऐसे पोषक तत्व मौजूद होते हैं जो आपकी त्वचा को स्वस्थ और सुंदर बनाए रखने में आपकी मदद करता है. किशमिश त्वचा में मौजूद कोशिकाओं की रक्षा करता है जिससे आपकी त्वचा चमकदार और सुंदर दिखाई देने लगती है.
कैसे करें सेवन
किशमिश के सेवन से पूरा शरीर स्वस्थ रहता है. ऐसे में जरूरी है कि आप किशमिश का सेवन रोजाना करें. प्रतिदिन दूध में 12 से 14 किशमिश को अच्छे से उबाल लें और रोज रात को सोने से पहले इसका सेवन करें, जिससे आप काफी स्वस्थ रहेंगे.
बुखार में होता है लाभकारी
प्रोनोलिक फाइटोन्यूट्रीएंट्स जो कि अपने जीवाणुनाशक, एंटीबायोटिक और एंटीऑक्सीडेंस गुणों के लिए जाना जाता है. यह तत्व किशमिश में काफी अधिक मात्रा में पाया जाता है जो बुखार में काफी लाभकारी होती है.
सेहत /शौर्यपथ / अक्सर छोटे बच्चों को कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ता है. कभी उन्हें सर्दी-जुखाम हो जाता है, तो कभी पेट दर्द की समस्या. इसके अलावा भी कुछ अन्य समस्याएं हैं जो बच्चों को परेशान करती हैं. डायपर रैशेज की समस्या भी इनमें से एक है. दरअसल, लंबे समय तक डायपर पहने रहने की वजह से भी कई बार बच्चों को यह समस्या हो जाती है. यह समस्या डायपर में देर तक गीलापन रहने, इसे देर तक न बदला जाना आदि वजह से हो भी हो सकती है. इसमें उनकी स्किन पर हल्के दाने और रैश उभर आते हैं. साथ ही बच्चों को स्किन पर रेडनेस (Skin Redness), जलन और दर्द (Pain) की समस्या हो सकती है. ऐसे में बच्चे की नाजुक स्किन की ज्यादा देखभाल करनी चाहिए. आप कुछ उपाय अपना कर बच्चों को इस समस्या से बचा सकते हैं.
हर समय न पहनाएं डायपर
डायपर इस्तेमाल करने के कई फायदे होते हैं. मगर इसके ज्यादा इस्तेमाल से बचना चाहिए. इसलिए बच्चे को कुछ समय डायपर के बिना ही रखें. इससे बच्चों की स्किन सूखने लगेगी और उन्हें आराम मिलेगा. अगर बच्चा रैशेज की समस्या से गुजर रहा है, तो इस दौरान बच्चे को सूती आरामदेह कपड़े पहनाएं. इससे दाने जल्दी सूखेंगे.
बच्चे के रैशेज जल्दी ठीक हों और उसे जल्दी आराम मिले इसके लिए रैशेज वाली स्किन पर एंटी रैश क्रीम लगाई जा सकती है. या फिर नारियल का तेल भी उस स्थान पर लगा सकते हैं. नारियल तेल में एंटीबैक्टीरियल और एंटीफंगल गुण होते हैं. इसे लगाने से रैश ठीक होने लगेंगे.
ऑलिव ऑयल है गुणकारी
ऑलिव ऑयल भी बच्चों को होने वाले डायपर रैशेज में लाभ पहुंचाता है. इसमें मौजूद एंटी इन्फ्लेमेटरी और एंटी माइक्रोबियल गुण रैशेज को ठीक करने में मदद करते हैं. बच्चे को डायपर रैशेज वाली स्किन पर अपने हाथों से ऑलिव ऑयल लेकर हल्के हाथों से लगा दें. इससे स्किन मुलायम बनी रहेगी और इंफेक्शन भी दूर होने लगेगा.
एलोवेरा जेल देगी आराम
एलोवेरा को स्किन संबंधी समस्याओं में रामबाण माना जाता है. बच्चों को होने वाले डायपर रैशेज में भी यह फायदेमंद होता है. इसके लिए एलोवेरा जेल बच्चे की रैशेज वाली जगह पर हल्के हाथों से मलें. उसे आराम मिलेगा.
खाना खजाना / शौर्यपथ / आपने प्याज, आलू, बैंगन और पनीर आदि के पकौड़े तो खाए होंगे मगर कटहल के पकौड़ों के स्वाद से शायद ही वाकिफ हों. इनका जायका बेहद अच्छा होता है. इन्हें शाम की चाय के साथ या फिर जब कुछ अलग खाने की इच्छा हो तब बनाया जा सकता है. अब तक आपने जितनी तरह के भी पकौड़े खाए होंगे, कटहल के पकौड़ों का मजा भी कभी नहीं भूलेंगे आप. इन्हें बनाना भी बेहद आसान है और यह झटपट तैयार हो जाते हैं. तो आइए जानते हैं कटहल के पकौड़े की रेसिपी...
कटहल के पकौड़े बनाने की सामग्री
कच्चा कटहल- 500 ग्राम
नमक- 1.5 छोटी चम्मच
हींग- ½ चुटकी
बेसन- 1 कप
चावल का आटा- ½ कप
हरी मिर्च- 2 बारीक कटी हुई
लाल मिर्च पाउडर- 1.5 छोटी चम्मच
धनिया पाउडर- 1.5 छोटी चम्मच
अमचूर पाउडर- ½ छोटी चम्मच
गरम मसाला- ½ छोटी चम्मच
अजवाइन- ½
तेल- तलने के लिए
कटहल के पकौड़े बनाने की विधि
सबसे पहले कटहल को छोटे छोटे पीस में काट लें और बीज के पीछे का भाग निकाल लें. अब कूकर में ½ कप पानी, ¾ चम्मच नमक और 1 चुटकी हींग डालकर कटा हुआ कटहल डालकर ढक्कन बंद कर आंच पर रख दें और एक सीटी आने दें. थोड़ी देर बाद कूकर का ढक्कन खोलकर इसे निकाल लीजिए और बचा हुआ पानी फेंक दीजिए. अब एक गहरे तले वाले पैन में कच्ची घानी तेल डालकर हल्की आंच पर गर्म करें. एक गहरे बर्तन में बेसन, चावल का आटा, स्वादानुसार नमक और अंदाज से थोड़ा सा पानी डालकर एक घोल बना लें. इस घोल में लाल मिर्च पाउडर, हरी मिर्च, धनिया पाउडर, अमचूर, गरम मसाला और अजवाइन डालकर अच्छे से मिला लीजिए और इसमें 1 स्पून तेल भी डालकर मिलाएं. अब इस घोल में उबले हुए कटहल के टुकड़े डालकर मिला लें और हल्दी डालकर मिलाएं. लीजिए तैयार है क्रिस्पी पकौड़ा बनाने के लिए आपका घोल.
कड़ाही में तेल डालकर अच्छे से गर्म कर लें इसके बाद पकौड़े के घोल को थोड़ा थोड़ा कर इस तेल में टपकाएं. मद्धम आंच पर पकौड़ों को गोल्डन ब्राउन होने तक तल लें. अब इन पकौड़ों को एक कागज़ लगी प्लेट पर निकाल लें ताकि अतिरिक्त तेल सोख लें. इसी तरह सारे पकौड़ों को तल लीजिए. अब इन पकौड़ों को एक सर्विंग प्लेट में निकालकर टोमेटो केचप या धनिये और टमाटर की खट्टी चटनी के साथ सर्व करें. इनका स्वाद लाजवाब कर देगा.
भिलाई / शौर्यपथ / सेल चेयरमैन अनिल कुमार चौधरी ऑनलाइन आयोजित सेल कार्मिकों के बड़े समूह से चर्चा की। सेल चेयरमैन श्री चौधरी डिजिटल माध्यम से आयोजित इस इन्टरैक्शन कार्यक्रम में सेल के पांच एकीकृत इस्पात संयंत्रों के 2000 से अधिक कर्मचारियों से क्रमवार जुड़े। भिलाई इस्पात संयंत्र के 500 से अधिक कर्मचारियों ने इस बड़े समूह इन्टरैक्शन (एलजीआई) में भाग लिया, जो वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से आयोजित किया गया था। इस चर्चा के माध्यम से कर्मचारियों के प्रोडक्शन से जुड़ाव को बढ़ाने के प्रयासों पर ध्यान केन्द्रित किया गया था, जिससे वर्तमान में बढ़ते स्टील बाजार का लाभ उठाए जा सके तथा उत्पन्न चुनौतियों पर विजय पाया जा सके। श्री अनिल कुमार चौधरी ने कहा कि सेल को बाजार में हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए सभी प्रयासों पर जोर देना होगा। वर्तमान परिस्थितियांँ बेहद अनुकूल हैं, विशेष रूप से सेल जैसे इस्पात निर्माताओं के लिए यह एक अतिरिक्त लाभ है जो अपने ग्राहकों को बहुत सारे उत्पादों का विकल्प पेश कर रहे हैं।
उन्होंने कहा कि इन सभी अनुकूल परिस्थितियों का लाभ उठाने के लिए सेल के सभी संयंत्रों और इकाइयों के कर्मचारियों को कमर कसनी होगी। जहाँ बेहतर प्रदर्शन और लाभप्रदता में सुधार से संगठन को अच्छी छवि बनती है, वहीं कर्मचारियों को भी इसका लाभ मिलेगा। भिलाई इस्पात संयंत्र की कंपनी के समग्र प्रदर्शन में महत्वपूर्ण भूमिका है, सेल अध्यक्ष, श्री चौधरी ने आगे कहा कि बीएसपी में बड़ी क्षमताएँ हैं, जिसका प्रदर्शन वह समय-समय पर करता रहा है। हाल ही में लॉकडाउन अवधि के दौरान भी उन्होंने इसे प्रदर्शित किया है। हम सभी ने वर्तमान वित्तवर्ष की पहली छमाही में इसका अनुभव किया है। ऐसे में कंपनी को स्टील उद्योग के लिए आज बनी इन सकारात्मक और अनुकूल परिस्थितियों में भिलाई बिरादरी से बेहद उम्मीदें हैं। भिलाई इस्पात संयंत्र के लिए प्राथमिकताओं तथा इसे प्राप्त करने की रणनीति का जिक्र करते हुए श्री चौधरी ने कहा कि संयंत्र हाल ही में कई मॉडेक्स सुविधाओं से सुसज्जित हुआ है और बीएसपी को इससे अधिकतम लाभ प्राप्त करना है।
इस भारी निवेश की उपयोगिता को सिद्ध करते हुए बीएसपी बिरादरी को लाँंग रेल के उत्पादन को बढ़ाने हेतु अपनी कमर कसनी होगी। साथ ही इसके अन्य मूल्य वर्धित उत्पादों जैसे वायर रॉड्स और टीएमटी बार्स की बाजार में अच्छी माँग है। जिसका नेट सेल्स रियालाइजेशन (एनएसआर) बेहतर होने से क पनी की लाभार्जन क्षमता बढ़ेगी। सेल चेयरमैन ने जोर देते हुए कहा कि प्लेटों के लिए भी पर्याप्त मांँग है जिसे संयंत्र, उत्पादन करने में सक्षम है। सेल, चेयरमैन ने कहा कि जबकि रेलवे ने अस्थायी रूप से छोटी रेलों की खरीद बंद कर दी है, लेकिन भारतीय रेलवे से लंबी रेल्स के आदेशों में कोई कमी नहीं है। श्री चौधरी ने जोर देते हुए कहा कि स्टील मेल्टिंग शॉप्स के लिए भी जरूरी है कि वे अपने निष्पादन गति को प्रभावी बनाए रखें
खाना खजाना /शौर्यपथ / सर्दियों का मौसम हो और खाने में गाजर का हलवा मिल जाए तो मौसम और स्वाद दोनों का मजा दोगुना हो जाता है। लेकिन गाजर का हलवा बनाते समय अक्सर लोग शिकायत करते हैं कि इसे बनाने में काफी ज्यादा समय लगता है। अगर आपकी भी कुछ इसी तरह की शिकायत है तो आपकी परेशानी दूर करते हुए आपको बताते है हलवाइयों जैसी एक ऐसी ही मजेदार गाजर का हलवा बनाने की रेसिपी जो बेहद कम समय में ही तैयार हो जाती है। तो देर किस बात की आइए जानते हैं कैसे बनाया है ये टेस्टी गाजर का हलवा।
सामग्री :
250 ग्राम मावा
2 कप दूध
5 केसर
1 किलोग्राम कद्दूकस किया गाजर
2 टेबलस्पून घी
25 ग्राम काजू
20 ग्राम किशमिश
विधि :
गाजर का हलवा एक परफेक्ट डेजर्ट रेसिपी है,जिसे आप कुछ मिनटों में आसानी से उपलब्ध सामग्रियों की मदद से बना सकते हैं। इसे बनाने के लिए सबसे पहले एक छोटे बाउल में एक टेबलस्पून दूध और केसर डालकर अलग रख दें।
अब धीमी आंच पर एक कढ़ाही में दूध और गाजर अच्छी तरह से मिलाकर डाल दें और उबालें। अगर आप अपनी रेसिपी को क्रंची बनाना चाहते हैं तो नट्स को सूखा भूनकर रेसिपी में डाल दें।
इसके बाद जब दूध में उबाल आ जाए तब इसमें केसर डालकर दूध के सूखने तक फिर से उबालें।
जब दूध सूख जाए इसमें मावा डालकर चलाएं,जिससे कि मावा भी हलवे में आसानी से मिल जाए। अब इसमें घी डालकर और 10 मिनट के लिए पकाएं। आखिर में काजू और किशमिश से सजाकर हलवे को गर्मागर्म सर्व करें।
सेहत /शौर्यपथ/संडे हो या मंडे रोज खाएं अंडे, ये बात आपने कई बार सेहत से जुड़ी नसीहत देते लोगों के मुंह से सुनी होगी। पर क्या आप जानते हैं अंडे न सिर्फ आपकी सेहत बनाए रखने का काम करते हैं बल्कि इनकी मदद से आप अपना बढ़ा हुआ वजन भी कंट्रोल कर सकते हैं। आइए जानते हैं कैसे।
द अमेरिकन जर्नल ऑफ क्लिनिकल न्यूट्रीशन के अनुसार वजन कम करने में शरीर में मौजूद प्रोटीन की अहम भूमिका होती है। प्रोटीन का सेवन करने से व्यक्ति को देर तक भूख महसूस नहीं होती और वो अपने भीतर ऊर्जा का स्तर भी बढ़ा हुआ महसूस करता है। अंडे की मदद से भी व्यक्ति अपना वजन कम कर सकता है बस उसका सेवन करते समय कुछ गलतियों को करने से बचने की सलाह दी जाती है। आइए जानते हैं क्या हैं वो सलाह।
अंडे के पीले भाग को न खाना -
अक्सर देखा जाता है कि लोग अंडे के पीले भाग को यह सोचकर नहीं खाते कि ऐसा करने से उनका वजन बढ़ जाएगा, जो कि गलत है। यूएसडीओ के अनुसार, अंडे के पीले हिस्से में पाया जाने वाला प्रोटीन कुल एक अंडे का आधा प्रोटीन होता है। ऐसे में अगर वजन कम करने वाले लोग एक पूरे अंडे का सेवन करते हैं तो उन्हें वजन कम करने में भी मदद मिलती है।
अंडे के लिए एक समय तय करना-
अंडा सेहतमंद बने रहने के लिए एक अच्छा विकल्प हो सकता है। जो लोग अंडे का सेवन एक तय समय पर ही करते हैं तो वो गलती करते हैं। उदाहरण के लिए, कई लोग अंडे का सेवन सिर्फ ब्रेकफास्ट में करते हैं उसके बाद वो दिनभर इसका सेवन करने से बचते हैं। जबकि आप अंडे का सेवन दिन के किसी भी समय कर सकते हैं।
अनहेल्दी फैट-
अंडा बनाते समय इस बात का ध्यान जरूर रखें कि उसे किसी अनहेल्दी फैट के साथ न बनाया गया हो वरना ऐसा अंडा खाने से आप हृदय रोग, स्ट्रोक और मधुमेह जैसे गंभीर रोगों के शिकार भी हो सकते हैं। अंडा बनाते समय जैतून, एवोकैडो और कैनोला जैसे तेल का चुनाव किया जा सकता है।
अधिक सेवन-
हार्वर्ड हेल्थ पब्लिशिंग के अनुसार, डायबिटीज से पीड़ित लोगों को हफ्ते में 3 से ज्याद अंडों का सेवन नहीं करना चाहिए। वजन कम करने वाले लोगों को भी अंडों का अधिक सेवन नहीं करना चाहिए। इसके लिए आप औसतन तरीके से अंडों का सेवन करें जो आपको स्वस्थ रखे।
सेहत / शौर्यपथ / सर्दियों के मौसम में कई प्रकार की स्वास्थ्य समस्याओं को दूर करने के लिए हेल्दी फूड्स का सेवन करना चाहिए. इन स्वास्थ्य समस्याओं में सर्दी-खांसी, वजन बढ़ना, गले में खराश होना और अधिक ठंड की वजह से कोल्ड स्ट्रोक का खतरा होना शामिल है. आप भले ही अपने शरीर को कपड़ों से पूरी तरह ढक कर रखें लेकिन फिर भी सर्दी का असर किसी न किसी रूप में शरीर पर जरूर होता है. इसलिए लोग अपनी डाइट में कई तरह के फूड्स को शामिल करते हैं, जो शरीर को गर्म रख सकें. ऐसी ही खाद्य सामग्रियों में से एक है रागी . आइए जानते हैं रागी के हेल्थ बेनिफिट्स के बारे में.
कैल्शियम से भरपूर
सर्दियों में इस्तेमाल में लाया जाने वाला रागी का आटा किसी भी अन्य अनाज की तुलना में कैल्शियम से भरपूर होता है. एक रिसर्च के अनुसार 100 ग्राम रागी में 344 मिलीग्राम कैल्शियम होता है. कैल्शियम हड्डियों और दांतों के लिए बहुत जरूरी होता है. साथ ही हड्डियों से संबंधित कई बीमारियों जैसे ऑस्टियोपोरोसिस की रोकथाम के लिए भी यह जरूरी है. कैल्शियम से भरपूर होने की वजह से रागी का सेवन गर्भवती महिलाओं और बच्चों के लिए बहुत ही अच्छा होता है. सर्दियों में आप
अपने डाइट में रागी से बने फूड्स को जरूर शामिल करें.
रागी फाइबर से भरपूर होता है और ये ग्लाइसेमिक इंडेक्स फूड क्रेविंग को कम करता है. यह पाचन गति को बनाए रखता है जिस कारण रागी ब्लड शुगर को नियंत्रित रखने में मदद करता है. डायबिटीज के रोगियों को सर्दियों के मौसम में रागी के आटे से बनी रोटियां खाने की सलाह दी जाती है. एक स्टडी के अनुसार अपनी डाइट में रागी को सुबह या दोपहर के खाने में जरूर शामिल करें.
एंटी एजिंग की तरह करे काम
रागी स्किन को लम्बे समय तक यंग बनाए रखने के लिए अद्भुत तरीके से काम करता है. इसमें मौजूद मेथिओनिन और लाइसिन जैसे जरूरी अमीनो एसिड तत्व स्किन के ऊतकों को झुर्रियों और एजिंग के लक्षणों से बचाते हैं. इसके अलावा रागी शरीर में विटामिन डी की कमी को भी पूरा करता है.
एनीमिया से बचाए
रागी प्राकृतिक आयरन का एक अच्छा स्रोत है. यह एनीमिया के रोगियों के लिए और कम हीमोग्लोबिन स्तर वाले लोगों के लिए भी एक वरदान की तरह काम करता है. आप रागी का इस्तेमाल शरीर में आयरन की पूर्ति के लिए कर सकते हैं. इसका इस्तेमाल आटे के रूप में, अंकुरित करके या फिर कोई अन्य डिश के रूप में किया जा सकता है.
सेहत / शौर्यपथ / आज के समय में देशभर में ऐलोपैथी और होम्योपैथी के साथ-साथ आयुर्वेद का तो अभ्यास और इस्तेमाल बड़े पैमाने पर किया जा रहा है, लेकिन चिकित्सा के क्षेत्र में सिद्ध पद्धति का अभ्यास सिर्फ दक्षिण भारत के तमिलनाडु और केरल राज्य तक ही सीमित है. एक बार फिर सिद्ध चिकित्सा के बारे में लोग जानना चाह रहे हैं क्योंकि तमिलनाडु की सरकार नए कोरोना वायरस कोविड-19 के खिलाफ सिद्ध चिकित्सा को बढ़ावा दे रही है. राज्य सरकार का कहना है कि सिद्ध चिकित्सा की मदद से कोविड-19 के मरीजों में 100 फीसदी रिकवरी रेट देखने को मिल रहा है और सरकार ने सिद्ध चिकित्सा के तहत 'कबासुरा कुडीनीरÓ नाम का एक मिश्रण भी तैयार किया है जिसका इस्तेमाल इम्यूनिटी बूस्टर के तौर पर किया जा रहा है.
हमारी मॉर्डन लाइफस्टाइल से जुड़ी बीमारियां जैसे- तनाव, अनिद्रा, मोटापा और ब्लड प्रेशर के इलाज में सिद्ध चिकित्सा का ज्यादा इस्तेमाल होता है. इसके अलावा त्वचा से जुड़ी बीमारी सोरायसिस, यौन संचारित रोग, यूरिनरी ट्रैक्ट इंफेक्शन (यूटीआई), गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल इंफेक्शन, लिवर से जुड़ी बीमारियां, एनीमिया, डायरिया या फिर आर्थराइटिस और एलर्जी- ये कुछ ऐसी बीमारियां हैं जिनका सिद्ध के जरिए इलाज किया जाता है. आयुर्वेद की ही तरह सिद्ध में भी 3 दोष माने गए हैं- वात, पित्त और कफ.
सिद्ध चिकित्सा का अभ्यास मौजूदा समय में केंद्रीय आयुष मंत्रालय के अंतर्गत आता है और हर साल 4 जनवरी को सिद्ध दिवस के रूप में मनाया जाता है.
1. सिद्ध चिकित्सा का इतिहास और सिद्धांत
ऋषि अगस्त्य जिन्हें तमिल भाषा और सिद्ध चिकित्सा दोनों का जनक माना जाता है, उन्होंने सिद्ध चिकित्सा, औषधी और सर्जरी से जुड़ी कई किताबें लिखीं जिनका इस्तेमाल आज भी कई सिद्ध चिकित्सक करते हैं. सिद्ध चिकित्सकों को सिद्धर कहा जाता है. वैसे तो सिद्ध चिकित्सा का मूलभूत सिद्धांत बहुत हद तक आयुर्वेद से मिलता जुलता है लेकिन विस्तार से अध्ययन करने पर दोनों में अंतर दिखता है. सिद्ध की परंपराएं और विशिष्टता तमिलनाडु की द्रविड़ सभ्यता से जुड़ी हैं. सिद्ध और आयुर्वेद में सबसे बड़ा अंतर ये है कि सिद्ध औषधी को बनाने में जड़ी-बूटियों के अलावा धातु और खनिज पदार्थों जैसे- सल्फर, अभ्रक, पारा आदि का इस्तेमाल किया जाता है.
2. शरीर को 7 अंग मानकर होता है इलाज
सिद्ध के मुताबिक, इंसान के शरीर के 7 अलग-अलग तत्व अलग-अलग मिश्रण से बनते हैं :
सरम यानी प्लाज्मा जो इंसान के शरीर की उत्पत्ति और विकास के लिए जिम्मेदार है
चेन्नीर यानी खून जो शरीर के अलग-अलग हिस्सों तक पहुंच कर शरीर को पोषण देता है
ऊन यानी मांसपेशियां जो इंसान के शरीर को आकार देने का काम करती हैं
कोलजुप्पू यानी टीशू जो हड्डियों के जोड़ को चिकना रखते हैं, उन्हें टूटने-फूटने से बचाते हैं
एन्बू यानी हड्डियां जो इंसान के शरीर को सरंचना और मुद्रा देती हैं
मूलई यानी नसें जो शरीर को जोड़कर रखती हैं
सुकिला यानी सीमन जो प्रजनन के लिए जिम्मेदार है
3. 8 तरह से डायग्नोज होती है बीमारी
मरीज की नब्ज देखते हैं
त्वचा को छूते हैं
जीभ देखते हैं
चेहरे का रंग-रूप
बोलने का तरीका
आंखें देखते हैं
यूरिन
स्टूल
इन 8 तरीके के परीक्षणों के जरिए बीमारी को डायग्नोज किया जाता है और इसमें भी नब्ज की जांच को सबसे ज्यादा अहमियत दी जाती है.
4. सिद्ध दवाइयों को 3 कैटिगरी में बांटा जाता है:
थावरम : जड़ी बूटियों (हर्बल) से बनी दवा
थाथू : इनऑर्गैनिक पदार्थों से बनी दवा
जंगामम : जानवरों के उत्पादों से बनी दवा
5. सिद्ध में इलाज
सिद्ध के तहत किए जाने वाले इलाज को 3 अलग-अलग कैटिगरी में बांटा जा सकता है:
देव मारुथुवम या दैवीय पद्धति जिसमें धातु और खनिज से प्राप्त की गई दवा के इस्तेमाल पर फोकस किया जाता है
मानिदा मारुथुवम या तर्कसंगत पद्धति जिसमें जड़ी बूटियों से तैयार की गई दवाइयों का इस्तेमाल होता है
असुर मारुथुवम या सर्जिकल पद्धति जिसमें चीरा लगाया जाता है और ऑपरेशन होता है
सिद्ध चिकित्सा के तहत किए जाने वाले इलाज में अलग-अलग दवाइयों के साथ ही योग और प्राणायाम भी शामिल है ताकि व्यक्ति को पूरी तरह से स्वस्थ बनाकर उसे दीर्घकालीन जीवन दिया जा सके.
लाइफस्टाइल / शौर्यपथ / कई बार जा चाहते हुए भी हमारा झगड़ा अपने पार्टनर के साथ हो जाता है और बाद में दोनों तरफ से माफ़ी मांगने के तरीके सोचे जाते हैं. कई बार माफ़ी मांगने के लिए उचित शब्दों का चयन करना भी मुश्किल लगने लगता है. सही समय पर और सही शब्दों के साथ माफी मांगने पर रिश्ते में आई खटास जल्दी खत्म हो जाती है. अगर आपका पार्टनर भी झगड़े के बाद आपसे रूठा बैठा है और आप उसे मनाने के तरीक सोच रहे हैं तो आपके लिए यहां कुछ ख़ास टिप्स हैं...
पार्टनर को वैल्यू दें:
मनमुटाव के बाद आप अपने पार्टनर को पूछें कि इस तनावपूर्ण माहौल को ठीक करने के लिए मुझे क्या करना चाहिए. इससे आपके पार्टनर को समझ आएगा कि आपने उसे वैल्यू दी है. इससे तनाव कम करने में मदद तो मिलेगी ही, साथ ही दिल भी हल्का हो जाएगा. एक-दूसरे को वैल्यू का अहसास कराना जरूरी है.
झगड़े के बारे में अगले दिन बात करें:
झगड़े और बाद-विवाद के बाद माहौल गर्म हो जाता है, ऐसे में दोनों पार्टनर मुद्दे को स्पष्ट करने की कोशिश उसी समय नहीं करें. इससे और ज्यादा तनाव का माहौल हो सकता है. जो भी घटित हुआ, इसके बारे में चर्चा अगले दिन के लिए छोड़ दें. तब तक माहौल शांत हो जाता है और बात करना आसान होता है.
भावनाओं को समझें:
झगड़े के बाद पार्टनर के इमोशन को समझने की कोशिश करें. झगड़ा खत्म करने के लिए आप कह सकते हैं कि मैं आपकी भावनाओं की कद्र करता हूं या करती हूं. इससे यह भी पता चलेगा कि आपने अपनी तरफ से तनावपूर्ण स्थिति को ठीक करने का प्रयास किया है.
सॉरी कहें
किसी भी झगड़े का अंत करने के लिए यह शब्द बेस्ट माना जा सकता है. अपनी गलती मानते हुए कहें कि सॉरी मुझसे गलती हुई, मेरा इरादा आपका दिल दुखाना नहीं था. दिल से मांगी गई माफ़ी से किसी भी इंसान का गुस्सा शांत किया जा सकता है. ईमानदारी से ऐसा करने से आपका पार्टनर खुश हो सकता है.
वादा करें:
जो गलती आपने की है, उस पर काम करने का वादा आप अपने पार्टनर से कर सकते हैं. उन्हें यह कहें कि मैंने जो गलती की गई, वह फिर से रिपीट नहीं होगी. मैं अपनी गलतियों को सुधारने का पूरा प्रयास करूंगा या करूंगी. इससे एक-दूसरे का मनमुटाव जल्दी ही खत्म करने में मदद मिलेगी. गलती सुधारने का वादा करके उस पर काम करना अहम है.
सेहत / शौर्यपथ / डायबिटीज एक ऐसी बीमारी है जिससे हर वर्ग के लोग ग्रसित हैं। इसका अभी तक भी कोई इलाज नहीं है। यह एक ऐसी बीमारी है जिसके हो जाने के बाद लोगों को अपने खान पान का काफी ध्यान रखना पड़ता है। इस दौरान छोटी-छोटी चीजों का ख्याल रखना पड़ता है। केवल खानपान और अपने रहन-सहन से ही केवल इसे कंट्रोल किया जा सकता है। तो चलिए हम आपको कुछ ऐसे फलों में बारे में बताते हैं जिनसे आप अपना सुगर लेवल कंट्रोल में रख सकेंगे।
1. हरी पत्तेदार सब्जी
पालक, मेथी व अन्य जैसी सब्जियों में विटामिन और खनिज पाए जाते हैं। किसी भी बीमारी में डॉक्टर द्वारा हरी पत्तेदार सब्जियां खाने की सलाह दी जाती है। इनमें कैलोरी कम पाई जाती है। इसमें कार्बोहाइड्रेट्स भी कम मात्रा में होते हैं जिससे आपका ब्लड शुगर लेवल बढ़ता नहीं है। इसके अंदर पोषक तत्व और एंटीऑक्सीडेंट होने के कारण ये दिल और आंखों को लाभ पहुंचाते हैं।
2. हल्दी
हल्दी हमारी रसोईघर में आसानी से मिल जाती है। यह एक ऐसा मसाला है जो हमें काफी फायदा देती है। इसमें कर्क्युमिन होने के कारण यह हमें हृदय रोगों से बचाती है इसके साथ ही शुगर लेवल को कम करने में मदद करती है।
3. लहसुन
लहसुन एक ऐसी चीज है जो हमारे स्वास्थ्य को काफी लाभ पहुंचाता है। अगर किसी को ब्लड शुगर या कोलेस्ट्रॉल कम करना है तो उसमें यह काफी लाभदायक साबित होता है। डायबिटीज से ग्रसित लोगों को लहसुन को अपनी डाइट में जरूर शामिल करना चाहिए।
4. टमाटर
टमाटर का जूस डायबिटीज वालों के लिए फायदेमंद होता है। आप सुबह खाली पेट टमाटर के जूस में नमक और काली मिर्च डालकर पी सकते हैं। इससे आपका डायबिटीज लेवल कंट्रोल होने में मदद होगी।
5. अखरोट
अखरोट में विटामिन-ई होता है, यह आपको टाइप-2 डायबिटीज से बचाए रखता है। यह हृदय रोगों के लिए भी काफी कारगर साबित होता है। इसके साथ ही यह न सिर्फ आपके सुगर को कंट्रोल में रखता है बल्कि आपके कॉलेस्ट्रॉल लेवल को भी कम रखता है।
खाना खजाना / शौर्यपथ /सर्दी के मौसम में नाश्ते में गर्मागर्म गोभी के परांठों की डिमांड ज्यादातर हर घर में की जाती है। नाश्ते में थाली में परोसा गया गोभी का परांठा मौसम और स्वाद दोनों का मजा दोगुना कर देता है। तो देर किस बात की आप भी इस मौसम का लुत्फ उठाएं पंजाबी रसोई से निकली इस गोभी के परांठे की रेसिपी के साथ।
गोभी का परांठा बनाने के लिए सामग्री-
-2 कप गेहूं का आटा
-1/2 कप घी
भरावन के लिए सामग्री-
-2 कप कद्दूकस की हुई गोभी
-2 टेबल स्पून हरा धनिया कटा हुआ
-1 टी स्पून अदरक कटा हुआ
-1 टी स्पून हरी मिर्च बारीक कटी हुई
-1 टेबल स्पून नमक
-1 टेबल स्पून नींबू का रस
गोभी का परांठा बनाने का तरीका-
गोभी का परांठा बनाने के लिए सबसे पहले गेहूं के आटे को पानी में गूंथकर उसकी छोटी-छोटी लोई बनाकर हल्का बेल लें। किनारों को कप की शेप में हल्का मोड़कर बीच में गोभी का मिश्रण रखें। अब इसे चारों ओर से बंद करके बेल लें। हल्का सूखा आटा लगाएं, जिससे ये बेलते समय लोई न फटे। तवे को गैस पर रखकर गर्म कर लें। जब तवा अच्छी तरह गर्म हो जाए, तो आंच को हल्का कर दें। अब बेला हुआ परांठा तवे पर डाल दें। जब परांठा किनारे से हल्का फूलने लगें, तो उसके ऊपर घी लगाएं। जब ये एक तरफ से सिक जाए, तो इसे पलटकर दूसरी तरफ से भी सेकें। परांठे को आंच से उतारकर सर्व करें।
धर्म संसार /शौर्यपथ / हिन्दू धर्म ग्रंथों में ॐ या ओम को ही एक मात्र मंत्र माना गया है। प्रत्येक मंत्रों के आगे इस मंत्र का प्रयोग होता है। तंत्र योग में एकाक्षर मंत्रों का भी विशेष महत्व है। देवनागरी लिपि के प्रत्येक शब्द में अनुस्वार लगाकर उन्हें मंत्र का स्वरूप दिया गया है। उदाहरण के तौर पर कं, खं, गं, घं आदि। इसी तरह श्रीं, क्लीं, ह्रीं, हूं, फट् आदि भी एकाक्षरी मंत्रों में गिने जाते हैं। नम या नमो से शुरू होने वाले मंत्र नहीं बल्कि नमस्कार होते हैं। आओ जानते हैं इस धवनि का रहस्य।
1. तपस्वी और ध्यानियों ने जब ध्यान की गहरी अवस्था में सुना की कोई एक ऐसी ध्वनि है जो लगातार सुनाई देती रहती है शरीर के भीतर भी और बाहर भी। हर कहीं, वही ध्वनि निरंतर जारी है और उसे सुनते रहने से मन और आत्मा शांती महसूस करती है तो उन्होंने उस ध्वनि को नाम दिया ओम।
2. प्रिय या अप्रिय शब्दों की ध्वनि से श्रोता और वक्ता दोनों हर्ष, विषाद, क्रोध, घृणा, भय तथा कामेच्छा के आवेगों को महसूस करते हैं। अप्रिय शब्दों से निकलने वाली ध्वनि से मस्तिष्क में उत्पन्न काम, क्रोध, मोह, भय लोभ आदि की भावना से दिल की धड़कन तेज हो जाती है जिससे रक्त में 'टॉक्सिक' पदार्थ पैदा होने लगते हैं। इसी तरह प्रिय और मंगलमय शब्दों की ध्वनि मस्तिष्क, हृदय और रक्त पर अमृत की तरह आल्हादकारी रसायन की वर्षा करती है।
3. कहते हैं कि यह एक ऐसी ध्वनि का प्रतीक है जो किसी के सहयोग से उत्पन्न नहीं हो रही है बल्कि अनाहत ध्वनि है जो संपूर्ण ब्रह्मांड सहित मनुष्य के भीतर निरंतर जारी है। अनाहत अर्थात किसी भी प्रकार की टकराहट या दो चीजों या हाथों के संयोग के उत्पन्न ध्वनि नहीं। इसे अनहद भी कहते हैं।
4. ॐ शब्द तीन ध्वनियों से बना हुआ है- अ, उ, म इन तीनों ध्वनियों का अर्थ उपनिषद में भी आता है। भू: लोक, भूव: लोक और स्वर्ग लोक का प्रतीक है। ॐ को ओम कहा जाता है। उसमें भी बोलते वक्त 'ओ' पर ज्यादा जोर होता है। इस मंत्र का प्रारंभ है अंत नहीं। यह ब्रह्मांड की अनाहत ध्वनि है।
5. साधारण मनुष्य उस ध्वनि को सुन नहीं सकता, लेकिन जो भी ओम का उच्चारण करता रहता है उसके आसपास सकारात्मक ऊर्जा का विकास होने लगता है। फिर भी उस ध्वनि को सुनने के लिए तो पूर्णत: मौन और ध्यान में होना जरूरी है। जो भी उस ध्वनि को सुनने लगता है वह परमात्मा से सीधा जुड़ने लगता है। परमात्मा से जुड़ने का साधारण तरीका है ॐ का उच्चारण करते रहना।
6. शिव पुराण मानता है कि नाद और बिंदु के मिलन से ब्रह्मांड की उत्पत्ति हुई। नाद अर्थात ध्वनि और बिंदु अर्थात शुद्ध प्रकाश। यह ध्वनि आज भी सतत जारी है। संपूर्ण ब्रह्मांड और कुछ नहीं सिर्फ कंपन, ध्वनि और प्रकाश की उपस्थिति ही है।
7. ओम की ध्वनि में यह शक्ति है कि यह इस ब्रहमांड के किसी भी गृह को फोड़ने या इस संपूर्ण ब्रह्मांड को नष्ट करने की क्षमता रखता है। यह ध्वनि सूक्ष्म से भी सूक्ष्म और विराट से भी विराट होने की क्षमता रखती है।
8. सभी ज्योतिर्लिंगों के पास स्वत: ही ओम का उच्चारण होता रहता है। यदि आप कैलाश पर्वत या मानसरोवर झील के क्षेत्र में जाएंगे, तो आपको निरंतर एक आवाज सुनाई देगी, जैसे कि कहीं आसपास में एरोप्लेन उड़ रहा हो। लेकिन ध्यान से सुनने पर यह आवाज 'डमरू' या 'ॐ' की ध्वनि जैसी होती है। वैज्ञानिक कहते हैं कि हो सकता है कि यह आवाज बर्फ के पिघलने की हो। यह भी हो सकता है कि प्रकाश और ध्वनि के बीच इस तरह का समागम होता है कि यहां से 'ॐ' की आवाजें सुनाई देती हैं।
9. इसके उच्चारण से शरीर और मन को एकाग्र करने में मदद मिलेगी। दिल की धड़कन और रक्तसंचार व्यवस्थित होगा। इससे मानसिक बीमारियां दूर होती हैं। काम करने की शक्ति बढ़ जाती है। सभी मंत्रों का उच्चारण जीभ, होंठ, तालू, दाँत, कंठ और फेफड़ों से निकलने वाली वायु के सम्मिलित प्रभाव से संभव होता है। इससे निकलने वाली ध्वनि शरीर के सभी चक्रों और हारमोन स्राव करने वाली ग्रंथियों से टकराती है। इन ग्रंथिंयों के स्राव को नियंत्रित करके बीमारियों को दूर भगाया जा सकता है। इसका उच्चारण करने वाला और इसे सुनने वाला दोनों ही लाभांवित होते हैं।
10. ॐ के उच्चारण का अभ्यास करते-करते एक समय ऐसा आता है जबकि उच्चारण करने की आवश्यकता नहीं होती आप सिर्फ आंखों और कानों को बंद करके भीतर उसे सुनें और वह ध्वनि सुनाई देने लगेगी। भीतर प्रारंभ में वह बहुत ही सूक्ष्म सुनाई देगी फिर बढ़ती जाएगी। साधु-संत कहते हैं कि यह ध्वनि प्रारंभ में झींगुर की आवाज जैसी सुनाई देगी। फिर धीरे-धीरे जैसे बीन बज रही हो, फिर धीरे-धीरे ढोल जैसी थाप सुनाई देने लग जाएगी, फिर यह ध्वनि शंख जैसी हो जाएगी और अंत में यह शुद्ध ब्रह्मांडीय ध्वनि हो जाएगी।
Feb 09, 2021 Rate: 4.00
