July 24, 2026
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    सेहत / शौर्यपथ / आज के समय में देशभर में ऐलोपैथी और होम्योपैथी के साथ-साथ आयुर्वेद का तो अभ्यास और इस्तेमाल बड़े पैमाने पर किया जा रहा है, लेकिन चिकित्सा के क्षेत्र में सिद्ध पद्धति का अभ्यास सिर्फ दक्षिण भारत के तमिलनाडु और केरल राज्य तक ही सीमित है. एक बार फिर सिद्ध चिकित्सा के बारे में लोग जानना चाह रहे हैं क्योंकि तमिलनाडु की सरकार नए कोरोना वायरस कोविड-19 के खिलाफ सिद्ध चिकित्सा को बढ़ावा दे रही है. राज्य सरकार का कहना है कि सिद्ध चिकित्सा की मदद से कोविड-19 के मरीजों में 100 फीसदी रिकवरी रेट देखने को मिल रहा है और सरकार ने सिद्ध चिकित्सा के तहत 'कबासुरा कुडीनीरÓ नाम का एक मिश्रण भी तैयार किया है जिसका इस्तेमाल इम्यूनिटी बूस्टर के तौर पर किया जा रहा है.
    हमारी मॉर्डन लाइफस्टाइल से जुड़ी बीमारियां जैसे- तनाव, अनिद्रा, मोटापा और ब्लड प्रेशर के इलाज में सिद्ध चिकित्सा का ज्यादा इस्तेमाल होता है. इसके अलावा त्वचा से जुड़ी बीमारी सोरायसिस, यौन संचारित रोग, यूरिनरी ट्रैक्ट इंफेक्शन (यूटीआई), गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल इंफेक्शन, लिवर से जुड़ी बीमारियां, एनीमिया, डायरिया या फिर आर्थराइटिस और एलर्जी- ये कुछ ऐसी बीमारियां हैं जिनका सिद्ध के जरिए इलाज किया जाता है. आयुर्वेद की ही तरह सिद्ध में भी 3 दोष माने गए हैं- वात, पित्त और कफ.
    सिद्ध चिकित्सा का अभ्यास मौजूदा समय में केंद्रीय आयुष मंत्रालय के अंतर्गत आता है और हर साल 4 जनवरी को सिद्ध दिवस के रूप में मनाया जाता है.
    1. सिद्ध चिकित्सा का इतिहास और सिद्धांत
    ऋषि अगस्त्य जिन्हें तमिल भाषा और सिद्ध चिकित्सा दोनों का जनक माना जाता है, उन्होंने सिद्ध चिकित्सा, औषधी और सर्जरी से जुड़ी कई किताबें लिखीं जिनका इस्तेमाल आज भी कई सिद्ध चिकित्सक करते हैं. सिद्ध चिकित्सकों को सिद्धर कहा जाता है. वैसे तो सिद्ध चिकित्सा का मूलभूत सिद्धांत बहुत हद तक आयुर्वेद से मिलता जुलता है लेकिन विस्तार से अध्ययन करने पर दोनों में अंतर दिखता है. सिद्ध की परंपराएं और विशिष्टता तमिलनाडु की द्रविड़ सभ्यता से जुड़ी हैं. सिद्ध और आयुर्वेद में सबसे बड़ा अंतर ये है कि सिद्ध औषधी को बनाने में जड़ी-बूटियों के अलावा धातु और खनिज पदार्थों जैसे- सल्फर, अभ्रक, पारा आदि का इस्तेमाल किया जाता है.
    2. शरीर को 7 अंग मानकर होता है इलाज
    सिद्ध के मुताबिक, इंसान के शरीर के 7 अलग-अलग तत्व अलग-अलग मिश्रण से बनते हैं :
    सरम यानी प्लाज्मा जो इंसान के शरीर की उत्पत्ति और विकास के लिए जिम्मेदार है
    चेन्नीर यानी खून जो शरीर के अलग-अलग हिस्सों तक पहुंच कर शरीर को पोषण देता है
    ऊन यानी मांसपेशियां जो इंसान के शरीर को आकार देने का काम करती हैं
    कोलजुप्पू यानी टीशू जो हड्डियों के जोड़ को चिकना रखते हैं, उन्हें टूटने-फूटने से बचाते हैं
    एन्बू यानी हड्डियां जो इंसान के शरीर को सरंचना और मुद्रा देती हैं
    मूलई यानी नसें जो शरीर को जोड़कर रखती हैं
    सुकिला यानी सीमन जो प्रजनन के लिए जिम्मेदार है
    3. 8 तरह से डायग्नोज होती है बीमारी
    मरीज की नब्ज देखते हैं
    त्वचा को छूते हैं
    जीभ देखते हैं
    चेहरे का रंग-रूप
    बोलने का तरीका
    आंखें देखते हैं
    यूरिन
    स्टूल
    इन 8 तरीके के परीक्षणों के जरिए बीमारी को डायग्नोज किया जाता है और इसमें भी नब्ज की जांच को सबसे ज्यादा अहमियत दी जाती है.
    4. सिद्ध दवाइयों को 3 कैटिगरी में बांटा जाता है:
    थावरम : जड़ी बूटियों (हर्बल) से बनी दवा
    थाथू : इनऑर्गैनिक पदार्थों से बनी दवा
    जंगामम : जानवरों के उत्पादों से बनी दवा
    5. सिद्ध में इलाज
    सिद्ध के तहत किए जाने वाले इलाज को 3 अलग-अलग कैटिगरी में बांटा जा सकता है:
    देव मारुथुवम या दैवीय पद्धति जिसमें धातु और खनिज से प्राप्त की गई दवा के इस्तेमाल पर फोकस किया जाता है
    मानिदा मारुथुवम या तर्कसंगत पद्धति जिसमें जड़ी बूटियों से तैयार की गई दवाइयों का इस्तेमाल होता है
    असुर मारुथुवम या सर्जिकल पद्धति जिसमें चीरा लगाया जाता है और ऑपरेशन होता है
    सिद्ध चिकित्सा के तहत किए जाने वाले इलाज में अलग-अलग दवाइयों के साथ ही योग और प्राणायाम भी शामिल है ताकि व्यक्ति को पूरी तरह से स्वस्थ बनाकर उसे दीर्घकालीन जीवन दिया जा सके.

    लाइफस्टाइल / शौर्यपथ / कई बार जा चाहते हुए भी हमारा झगड़ा अपने पार्टनर के साथ हो जाता है और बाद में दोनों तरफ से माफ़ी मांगने के तरीके सोचे जाते हैं. कई बार माफ़ी मांगने के लिए उचित शब्दों का चयन करना भी मुश्किल लगने लगता है. सही समय पर और सही शब्दों के साथ माफी मांगने पर रिश्ते में आई खटास जल्दी खत्म हो जाती है. अगर आपका पार्टनर भी झगड़े के बाद आपसे रूठा बैठा है और आप उसे मनाने के तरीक सोच रहे हैं तो आपके लिए यहां कुछ ख़ास टिप्स हैं...
    पार्टनर को वैल्यू दें:
    मनमुटाव के बाद आप अपने पार्टनर को पूछें कि इस तनावपूर्ण माहौल को ठीक करने के लिए मुझे क्या करना चाहिए. इससे आपके पार्टनर को समझ आएगा कि आपने उसे वैल्यू दी है. इससे तनाव कम करने में मदद तो मिलेगी ही, साथ ही दिल भी हल्का हो जाएगा. एक-दूसरे को वैल्यू का अहसास कराना जरूरी है.

    झगड़े के बारे में अगले दिन बात करें:
    झगड़े और बाद-विवाद के बाद माहौल गर्म हो जाता है, ऐसे में दोनों पार्टनर मुद्दे को स्पष्ट करने की कोशिश उसी समय नहीं करें. इससे और ज्यादा तनाव का माहौल हो सकता है. जो भी घटित हुआ, इसके बारे में चर्चा अगले दिन के लिए छोड़ दें. तब तक माहौल शांत हो जाता है और बात करना आसान होता है.

     

    भावनाओं को समझें:
    झगड़े के बाद पार्टनर के इमोशन को समझने की कोशिश करें. झगड़ा खत्म करने के लिए आप कह सकते हैं कि मैं आपकी भावनाओं की कद्र करता हूं या करती हूं. इससे यह भी पता चलेगा कि आपने अपनी तरफ से तनावपूर्ण स्थिति को ठीक करने का प्रयास किया है.

    सॉरी कहें
    किसी भी झगड़े का अंत करने के लिए यह शब्द बेस्ट माना जा सकता है. अपनी गलती मानते हुए कहें कि सॉरी मुझसे गलती हुई, मेरा इरादा आपका दिल दुखाना नहीं था. दिल से मांगी गई माफ़ी से किसी भी इंसान का गुस्सा शांत किया जा सकता है. ईमानदारी से ऐसा करने से आपका पार्टनर खुश हो सकता है.

    वादा करें:
    जो गलती आपने की है, उस पर काम करने का वादा आप अपने पार्टनर से कर सकते हैं. उन्हें यह कहें कि मैंने जो गलती की गई, वह फिर से रिपीट नहीं होगी. मैं अपनी गलतियों को सुधारने का पूरा प्रयास करूंगा या करूंगी. इससे एक-दूसरे का मनमुटाव जल्दी ही खत्म करने में मदद मिलेगी. गलती सुधारने का वादा करके उस पर काम करना अहम है.

    सेहत / शौर्यपथ / डायबिटीज एक ऐसी बीमारी है जिससे हर वर्ग के लोग ग्रसित हैं। इसका अभी तक भी कोई इलाज नहीं है। यह एक ऐसी बीमारी है जिसके हो जाने के बाद लोगों को अपने खान पान का काफी ध्यान रखना पड़ता है। इस दौरान छोटी-छोटी चीजों का ख्याल रखना पड़ता है। केवल खानपान और अपने रहन-सहन से ही केवल इसे कंट्रोल किया जा सकता है। तो चलिए हम आपको कुछ ऐसे फलों में बारे में बताते हैं जिनसे आप अपना सुगर लेवल कंट्रोल में रख सकेंगे।
    1. हरी पत्तेदार सब्जी
    पालक, मेथी व अन्य जैसी सब्जियों में विटामिन और खनिज पाए जाते हैं। किसी भी बीमारी में डॉक्टर द्वारा हरी पत्तेदार सब्जियां खाने की सलाह दी जाती है। इनमें कैलोरी कम पाई जाती है। इसमें कार्बोहाइड्रेट्स भी कम मात्रा में होते हैं जिससे आपका ब्लड शुगर लेवल बढ़ता नहीं है। इसके अंदर पोषक तत्व और एंटीऑक्सीडेंट होने के कारण ये दिल और आंखों को लाभ पहुंचाते हैं।
    2. हल्दी
    हल्दी हमारी रसोईघर में आसानी से मिल जाती है। यह एक ऐसा मसाला है जो हमें काफी फायदा देती है। इसमें कर्क्युमिन होने के कारण यह हमें हृदय रोगों से बचाती है इसके साथ ही शुगर लेवल को कम करने में मदद करती है।
    3. लहसुन
    लहसुन एक ऐसी चीज है जो हमारे स्वास्थ्य को काफी लाभ पहुंचाता है। अगर किसी को ब्लड शुगर या कोलेस्ट्रॉल कम करना है तो उसमें यह काफी लाभदायक साबित होता है। डायबिटीज से ग्रसित लोगों को लहसुन को अपनी डाइट में जरूर शामिल करना चाहिए।
    4. टमाटर
    टमाटर का जूस डायबिटीज वालों के लिए फायदेमंद होता है। आप सुबह खाली पेट टमाटर के जूस में नमक और काली मिर्च डालकर पी सकते हैं। इससे आपका डायबिटीज लेवल कंट्रोल होने में मदद होगी।
    5. अखरोट
    अखरोट में विटामिन-ई होता है, यह आपको टाइप-2 डायबिटीज से बचाए रखता है। यह हृदय रोगों के लिए भी काफी कारगर साबित होता है। इसके साथ ही यह न सिर्फ आपके सुगर को कंट्रोल में रखता है बल्कि आपके कॉलेस्ट्रॉल लेवल को भी कम रखता है।

    खाना खजाना / शौर्यपथ /सर्दी के मौसम में नाश्ते में गर्मागर्म गोभी के परांठों की डिमांड ज्यादातर हर घर में की जाती है। नाश्ते में थाली में परोसा गया गोभी का परांठा मौसम और स्वाद दोनों का मजा दोगुना कर देता है। तो देर किस बात की आप भी इस मौसम का लुत्फ उठाएं पंजाबी रसोई से निकली इस गोभी के परांठे की रेसिपी के साथ।
    गोभी का परांठा बनाने के लिए सामग्री-
    -2 कप गेहूं का आटा
    -1/2 कप घी
    भरावन के लिए सामग्री-
    -2 कप कद्दूकस की हुई गोभी
    -2 टेबल स्पून हरा धनिया कटा हुआ
    -1 टी स्पून अदरक कटा हुआ
    -1 टी स्पून हरी मिर्च बारीक कटी हुई
    -1 टेबल स्पून नमक
    -1 टेबल स्पून नींबू का रस
    गोभी का परांठा बनाने का तरीका-
    गोभी का परांठा बनाने के लिए सबसे पहले गेहूं के आटे को पानी में गूंथकर उसकी छोटी-छोटी लोई बनाकर हल्का बेल लें। किनारों को कप की शेप में हल्का मोड़कर बीच में गोभी का मिश्रण रखें। अब इसे चारों ओर से बंद करके बेल लें। हल्का सूखा आटा लगाएं, जिससे ये बेलते समय लोई न फटे। तवे को गैस पर रखकर गर्म कर लें। जब तवा अच्छी तरह गर्म हो जाए, तो आंच को हल्का कर दें। अब बेला हुआ परांठा तवे पर डाल दें। जब परांठा किनारे से हल्का फूलने लगें, तो उसके ऊपर घी लगाएं। जब ये एक तरफ से सिक जाए, तो इसे पलटकर दूसरी तरफ से भी सेकें। परांठे को आंच से उतारकर सर्व करें।

    धर्म संसार /शौर्यपथ / हिन्दू धर्म ग्रंथों में ॐ या ओम को ही एक मात्र मंत्र माना गया है। प्रत्येक मंत्रों के आगे इस मंत्र का प्रयोग होता है। तंत्र योग में एकाक्षर मंत्रों का भी विशेष महत्व है। देवनागरी लिपि के प्रत्येक शब्द में अनुस्वार लगाकर उन्हें मंत्र का स्वरूप दिया गया है। उदाहरण के तौर पर कं, खं, गं, घं आदि। इसी तरह श्रीं, क्लीं, ह्रीं, हूं, फट् आदि भी एकाक्षरी मंत्रों में गिने जाते हैं। नम या नमो से शुरू होने वाले मंत्र नहीं बल्कि नमस्कार होते हैं। आओ जानते हैं इस धवनि का रहस्य।
    1. तपस्वी और ध्यानियों ने जब ध्यान की गहरी अवस्था में सुना की कोई एक ऐसी ध्वनि है जो लगातार सुनाई देती रहती है शरीर के भीतर भी और बाहर भी। हर कहीं, वही ध्वनि निरंतर जारी है और उसे सुनते रहने से मन और आत्मा शांती महसूस करती है तो उन्होंने उस ध्वनि को नाम दिया ओम।

    2. प्रिय या अप्रिय शब्दों की ध्वनि से श्रोता और वक्ता दोनों हर्ष, विषाद, क्रोध, घृणा, भय तथा कामेच्छा के आवेगों को महसूस करते हैं। अप्रिय शब्दों से निकलने वाली ध्वनि से मस्तिष्क में उत्पन्न काम, क्रोध, मोह, भय लोभ आदि की भावना से दिल की धड़कन तेज हो जाती है जिससे रक्त में 'टॉक्सिक' पदार्थ पैदा होने लगते हैं। इसी तरह प्रिय और मंगलमय शब्दों की ध्वनि मस्तिष्क, हृदय और रक्त पर अमृत की तरह आल्हादकारी रसायन की वर्षा करती है।
    3. कहते हैं कि यह एक ऐसी ध्वनि का प्रतीक है जो किसी के सहयोग से उत्पन्न नहीं हो रही है बल्कि अनाहत ध्वनि है जो संपूर्ण ब्रह्मांड सहित मनुष्‍य के भीतर निरंतर जारी है। अनाहत अर्थात किसी भी प्रकार की टकराहट या दो चीजों या हाथों के संयोग के उत्पन्न ध्वनि नहीं। इसे अनहद भी कहते हैं।

    4. ॐ शब्द तीन ध्वनियों से बना हुआ है- अ, उ, म इन तीनों ध्वनियों का अर्थ उपनिषद में भी आता है। भू: लोक, भूव: लोक और स्वर्ग लोक का प्रतीक है। ॐ को ओम कहा जाता है। उसमें भी बोलते वक्त 'ओ' पर ज्यादा जोर होता है। इस मंत्र का प्रारंभ है अंत नहीं। यह ब्रह्मांड की अनाहत ध्वनि है।

    5. साधारण मनुष्य उस ध्वनि को सुन नहीं सकता, लेकिन जो भी ओम का उच्चारण करता रहता है उसके आसपास सकारात्मक ऊर्जा का विकास होने लगता है। फिर भी उस ध्वनि को सुनने के लिए तो पूर्णत: मौन और ध्यान में होना जरूरी है। जो भी उस ध्वनि को सुनने लगता है वह परमात्मा से सीधा जुड़ने लगता है। परमात्मा से जुड़ने का साधारण तरीका है ॐ का उच्चारण करते रहना।

    6. शिव पुराण मानता है कि नाद और बिंदु के मिलन से ब्रह्मांड की उत्पत्ति हुई। नाद अर्थात ध्वनि और बिंदु अर्थात शुद्ध प्रकाश। यह ध्वनि आज भी सतत जारी है। संपूर्ण ब्रह्मांड और कुछ नहीं सिर्फ कंपन, ध्वनि और प्रकाश की उपस्थिति ही है।
    7. ओम की ध्वनि में यह शक्ति है कि यह इस ब्रहमांड के किसी भी गृह को फोड़ने या इस संपूर्ण ब्रह्मांड को नष्ट करने की क्षमता रखता है। यह ध्वनि सूक्ष्म से भी सूक्ष्म और विराट से भी विराट होने की क्षमता रखती है।

    8. सभी ज्योतिर्लिंगों के पास स्वत: ही ओम का उच्चारण होता रहता है। यदि आप कैलाश पर्वत या मानसरोवर झील के क्षेत्र में जाएंगे, तो आपको निरंतर एक आवाज सुनाई देगी, जैसे कि कहीं आसपास में एरोप्लेन उड़ रहा हो। लेकिन ध्यान से सुनने पर यह आवाज 'डमरू' या 'ॐ' की ध्वनि जैसी होती है। वैज्ञानिक कहते हैं कि हो सकता है कि यह आवाज बर्फ के पिघलने की हो। यह भी हो सकता है कि प्रकाश और ध्वनि के बीच इस तरह का समागम होता है कि यहां से 'ॐ' की आवाजें सुनाई देती हैं।
    9. इसके उच्चारण से शरीर और मन को एकाग्र करने में मदद मिलेगी। दिल की धड़कन और रक्तसंचार व्यवस्थित होगा। इससे मानसिक बीमारियां दूर होती हैं। काम करने की शक्ति बढ़ जाती है। सभी मंत्रों का उच्चारण जीभ, होंठ, तालू, दाँत, कंठ और फेफड़ों से निकलने वाली वायु के सम्मिलित प्रभाव से संभव होता है। इससे निकलने वाली ध्वनि शरीर के सभी चक्रों और हारमोन स्राव करने वाली ग्रंथियों से टकराती है। इन ग्रंथिंयों के स्राव को नियंत्रित करके बीमारियों को दूर भगाया जा सकता है। इसका उच्चारण करने वाला और इसे सुनने वाला दोनों ही लाभांवित होते हैं।
    10. ॐ के उच्चारण का अभ्यास करते-करते एक समय ऐसा आता है जबकि उच्चारण करने की आवश्यकता नहीं होती आप सिर्फ आंखों और कानों को बंद करके भीतर उसे सुनें और वह ध्वनि सुनाई देने लगेगी। भीतर प्रारंभ में वह बहुत ही सूक्ष्म सुनाई देगी फिर बढ़ती जाएगी। साधु-संत कहते हैं कि यह ध्वनि प्रारंभ में झींगुर की आवाज जैसी सुनाई देगी। फिर धीरे-धीरे जैसे बीन बज रही हो, फिर धीरे-धीरे ढोल जैसी थाप सुनाई देने लग जाएगी, फिर यह ध्वनि शंख जैसी हो जाएगी और अंत में यह शुद्ध ब्रह्मांडीय ध्वनि हो जाएगी।

    शौर्यपथ / आयुर्वेद मानव जाति के लिए ज्ञात सबसे आरंभिक चिकित्‍सा शाखा है। प्राकृतिक चिकित्सा इसका एक अंग मात्र है। आयुर्वेद का जन्म भारत में हुआ। इसके सूत्र हमें ऋग्वेद और अथर्ववेद में मिलते हैं। आयुर्वेद के जनक और आयुर्वेद के मूल सिद्धांत को जानिए।
    आयुर्वेद के जनक : आयुर्वेद के जनक : 1.अश्विनीकुमार 2.धन्वंतरि, 3.चरक, 4.च्यवन, 5.सुश्रुत। इसके अलावा ऋषि अत्रि, भारद्वाज, दिवोदास (काशिराज), नकुल, सहदेव, अर्कि, जनक, बुध, जावाल, जाजलि, पैल, करथ, अगस्त्य, अथर्व, अत्रि तथा उनके छः शिष्य अग्निवेश, भेड़, जातूकर्ण, पराशर, सीरपाणि, हारीत और बागभट्ट भी आयुर्वेद के जानकार थे। इसमें से बागभट्ट ने आयुर्वेद को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया।
    धन्वंतरि, चरक, च्यवन, सुश्रुत और बागभट्ट को आयुर्वेद को व्यवस्थित रूप देने का श्रेय जाता है। अथर्ववेद में आयुर्वेद के कई सूत्र मिल जाएंगे। धन्वंतरि, चरक, च्यवन और सुश्रुत ने विश्व को पेड़-पौधों और वनस्पतियों पर आधारित एक चिकित्साशास्त्र दिया। भारत में सुश्रुत को पहला शल्य चिकित्सक माना जाता है। आज से करीब 2,600 साल पहले सुश्रुत युद्ध या प्राकृतिक विपदाओं में जिनके अंग-भंग हो जाते थे या नाक खराब हो जाती थी, तो उन्हें ठीक करने का काम करते थे। सुश्रुत ने 1,000 ईसापूर्व अपने समय के स्वास्थ्य वैज्ञानिकों के साथ प्रसव, मोतियाबिंद, कृत्रिम अंग लगाना, हड्डी जोड़ना, पथरी का इलाज और प्लास्टिक सर्जरी जैसी कई तरह की जटिल शल्य चिकित्सा के सिद्धांत प्रतिपादित किए थे।
    आयुर्वेद के आचार्य महर्षि चरक की गणना भारतीय औषधि विज्ञान के मूल प्रवर्तकों में होती है। ऋषि चरक ने 300-200 ईसापूर्व आयुर्वेद का महत्वपूर्ण ग्रंथ 'चरक संहिता' लिखा था। उन्हें त्वचा चिकित्सक भी माना जाता है। आचार्य चरक ने शरीरशास्त्र, गर्भशास्त्र, रक्ताभिसरणशास्त्र, औषधिशास्त्र इत्यादि विषय में गंभीर शोध किया तथा मधुमेह, क्षयरोग, हृदय विकार आदि रोगों के निदान एवं औषधोपचार विषयक अमूल्य ज्ञान को बताया।
    चरक एवं सुश्रुत ने अथर्ववेद से ज्ञान प्राप्त करके 3 खंडों में आयुर्वेद पर प्रबंध लिखे। उन्होंने दुनिया के सभी रोगों के निदान का उपाय और उससे बचाव का तरीका बताया, साथ ही उन्होंने अपने ग्रंथ में इस तरह की जीवनशैली का वर्णन किया जिसमें कि कोई रोग और शोक न हो। आठवीं शताब्दी में चरक संहिता का अरबी भाषा में अनुवाद हुआ और यह शास्त्र पश्चिमी देशों तक पहुंचा। चरक और च्यवन ऋषि के ज्ञान पर आधारित ही यूनानी चिकित्सा का विकास हुआ।
    इसी तरह पांचवीं सदी में बागभट्ट नामक महान आयुर्वेदाचार्य हुए। उनका प्रसिद्ध ग्रंथ 'अष्टांग हृद्या संहिता' और अष्टांगसंग्रह है। अष्टांगसंग्रह के अनुसार इनका जन्म सिंधु देश में हुआ। इनके पितामह का नाम भी वाग्भट था। इनके पिता का नाम सिद्धगुप्त था। ये अवलोकितेश्वर गुरु के शिष्य थे।
    आयुर्वेद का आविष्‍कार भी ऋषि-मुनियों ने अपने मोक्ष मार्ग में आने वाली बाधाओं को दूर करने के लिए ही किया था लेकिन बाद में इसने एक चिकित्सा पद्धति का रूप ले लिया।
    आयुर्वेद के मूल सिद्धांत
    1. आयुर्वेद प्रकृति के अनुसार जीवन जीने की सलाह देता है।
    2. सेहतमंद बने रहकर मोक्ष प्राप्त करना ही भारतीय ऋषियों का उद्देश्य रहा है।
    3. आयुर्वेद कहता है कि 'पहला सुख निरोगी काया'।
    4. आयुर्वेद मानता है कि हमारी अधिकतर बीमारियों का जन्म स्थान हमारा दिमाग है। इच्छाएं, भाव, द्वेष, क्रोध, लालच, काम आदि नकारात्मक प्रवृत्तियों से कई तरह के रोग उत्पन्न होते हैं।
    5. आयुर्वेद के अनुसार भोजन को यदि उत्तम भावना और प्रसन्नता से पकाकर और उसी भावना से खाया जाए तो वह अमृत के समान गुणों का हो जाता है।
    6.आयुर्वेद के अनुसार भोजन के लगभग 1 घंटे बाद पानी पीने से खाए गए भोजन का लाभ मिलता है और व्यक्ति निरोगी भी रहता है।
    7. त्रिदोष: आयुर्वेद के अनुसार मनुष्य के शारीर में तीन जैविक-तत्व होते हैं जिन्हें त्रिदोष कहा जाता है। शारीर के भीतर इन तीन तत्वों का उतार-चढ़ाव लगा रहता है। इनका संतुलन गड़बड़ाने या कम ज्यादा होने से रोग उत्पन्न होते हैं। यह तीन दोष हैं- वात (वायु तत्व) पित्त (अग्नि तत्व) और कफ। वात के 5 उपभाग है 1- प्राण वात, 2- समान वात, 3- उदान वात, 4- अपान वात और 5- व्‍यान वात। पित्त के भी 5 उपभाग है 1- साधक पित्‍त, 2- भ्राजक पित्‍त, 3- रंजक पित्‍त, 4- लोचक पित्‍त और 5- पाचक पित्‍त। इसी तरह से कफ के भी 5 उपभाग है- 1- क्‍लेदन कफ, 2- अवलम्‍बन कफ, 3- श्‍लेष्‍मन कफ, 4- रसन कफ और 5- स्‍नेहन कफ।
    आयुर्वेद के आठ अंग
    1. काया चिकित्सा : इसमें शरीर को औषधि प्रदान की जाती है।
    2. काउमारा भर्त्य : इसमें बच्चों की चिकित्सा की जाती है।
    3. सल्यतंत्र : इसमें सर्जरी की जाती है।
    4. सलाक्यतंत्र : कान, नाक, आंख और मुंह के रोगों के लिए चिकित्सा।
    5. भूतविद्या : मानसिक विकारों के लिए चिकित्सा।
    6. अगदतंत्र : विष या जहर आदि के लिए चिकित्सा।
    7. रसायनतंत्र : विटामिन और पोषक तत्वों से संबंधी चिकित्सा।
    8. वाजीकरणतत्र : यौन सुख से जुड़ी समस्या संबंधी चिकित्सा।
    आयुर्वेद के पंचकर्म:- इसके मुख्‍य प्रकार बताएं जा रहे हैं परंतु इसके उप प्रकार भी है। यह पंचकर्म क्रियाएं योग का भी अंग है।
    1. वमन क्रिया : इसमें उल्टी कराकर शरीर की सफाई की जाती है। शरीर में जमे हुए कफ को निकालकर अहारनाल और पेट को साफ किया जाता है।
    2. विरेचन क्रिया : इसमें शरीर की आंतों को साफ किया जाता है। आधुनिक दौर में एनिमा लगाकर यह कार्य किया जाता है परंतु आयुर्वेद में प्राकृतिक तरीके से यह कार्य किया जाता है।
    3. निरूहवस्थी क्रिया : इसे निरूह बस्ति भी कहते हैं। आमाशय की शुद्धि के लिए औषधियों के क्वाथ, दूध और तेल का प्रयोग किया जाता है, उसे निरूह बस्ति कहते हैं।
    4. नास्या : सिर, आंख, नाक, कान और गले के रोगों में जो चिकित्सा नाक द्वारा की जाती है उसे नस्य या शिरोविरेचन कहते हैं।
    5. अनुवासनावस्ती : गुदामार्ग में औषधि डालने की प्रक्रिया बस्ति कर्म कहलाती है और जिस बस्ति कर्म में केवल घी, तैल या अन्य चिकनाई युक्त द्रव्यों का अधिक मात्रा में प्रयोग किया जाता है उसे अनुवासन या 'स्नेहन बस्ति कहा जाता है।

    धर्म संसार / शौर्यपथ / चांद का धरती के जल से संबंध है। जब पूर्णिमा आती है तो समुद्र में ज्वार-भाटा उत्पन्न होता है, क्योंकि चंद्रमा समुद्र के जल को ऊपर की ओर खींचता है। मानव के शरीर में भी लगभग 85 प्रतिशत जल रहता है। पूर्णिमा के दिन इस जल की गति और गुण बदल जाते हैं। कहते हैं कि चंद्र की घटती और बढ़ती गति का मन पर बहुत अधिक प्रभाव पड़ता है इसीलिए प्रमुख रूप से 5 बातों का विशेष ध्यान रखना चाहिए।
    चंद्र कलाएं : अमृत, मनदा, पुष्प, पुष्टि, तुष्टि, ध्रुति, शाशनी, चंद्रिका, कांति, ज्योत्सना, श्री, प्रीति, अंगदा, पूर्ण और पूर्णामृत। इसी को प्रतिपदा, दूज, एकादशी, पूर्णिमा आदि भी कहा जाता है। प्रत्येक कला आपके जीवन पर भिन्न प्रकार का प्रभाव डालती है।
    1. पूर्णिमा की रात मन ज्यादा बेचैन रहता है और नींद कम ही आती है।
    2. कमजोर दिमाग वाले लोगों के मन में आत्महत्या या हत्या करने के विचार बढ़ जाते हैं।
    3. इस दिन किसी भी प्रकार की तामसिक वस्तुओं का सेवन नहीं करना चाहिए। इस दिन शराब आदि नशे से भी दूर रहना चाहिए। इसके शरीर पर ही नहीं, आपके भविष्य पर भी दुष्परिणाम हो सकते हैं।
    4. वैज्ञानिकों के अनुसार इस दिन चन्द्रमा का प्रभाव काफी तेज होता है इन कारणों से शरीर के अंदर रक्‍त में न्यूरॉन सेल्स क्रियाशील हो जाते हैं और ऐसी स्थिति में इंसान ज्यादा उत्तेजित या भावुक रहता है। एक बार नहीं, प्रत्येक पूर्णिमा को ऐसा होता रहता है तो व्यक्ति का भविष्य भी उसी अनुसार बनता और बिगड़ता रहता है।
    5. जिन्हें मंदाग्नि रोग होता है या जिनके पेट में चय-उपचय की क्रिया शिथिल होती है, तब अक्सर सुनने में आता है कि ऐसे व्यक्‍ति भोजन करने के बाद नशा जैसा महसूस करते हैं और नशे में न्यूरॉन सेल्स शिथिल हो जाते हैं जिससे दिमाग का नियंत्रण शरीर पर कम, भावनाओं पर ज्यादा केंद्रित हो जाता है। ऐसे व्यक्‍तियों पर चन्द्रमा का प्रभाव गलत दिशा लेने लगता है। इस कारण पूर्णिमा व्रत का पालन रखने की सलाह दी जाती है।
    उपाय :
    1. अमावस्या या पूर्णिमा के दिन नित्य कर्मों से निवृत्त होकर पवित्र हो जाएं फिर एक मिट्टी का दीपक हनुमानजी के मंदिर में जलाएं और हनुमान चालीसा का पाठ करें।
    2. इस दिन तुलसी के पत्ते या बिल्वपत्र नहीं तोडऩा चाहिए।
    3. पूर्णिमा की रात में चांद की रोशनी स्वास्थ्य के लिए बहुत लाभदायक होती है। पूर्णिमा की रात में कुछ देर चांदनी में बैठने से मन को शांति मिलती है।
    4. कुछ देर चांद को देखने से आंखों को ठंडक मिलती है और साथ ही रोशनी भी बढ़ती है।
    5. इस दिन धन्यान करने का बहुत ही ज्यादा लाभ मिलता है।

    दुर्ग / शौर्यपथ / शिक्षा का अधिकार कानून के अंतर्गत प्रदेश के 6400 प्रायवेट स्कूलों में लगभग 2.85 लाख अध्ययनरत् है और इस वर्ष 2020-21 में भी अब तक लगभग 30 हजार बच्चों को प्रायवेट स्कूलों में प्रवेश दिया गया है। ऐसे प्रवेशित बच्चों के ऊपर किये जा रहे व्यय की प्रतिपूर्ति राज्य के द्वारा की जा रही है, लेकिन लगभग 250 करो? प्रतिपूर्ति राशि बकाया है, जो विगत दो वर्षो से प्रायवेट स्कूलों को प्राप्त नहीं हुआ है, जिसको लेकर प्रायवेट स्कूलों के द्वारा लगातार मांग किया जा रहा है।
    छत्तीसगढ पैरेंट्स एसोसियेशन के प्रदेश अध्यक्ष क्रिष्टोफर पॉल ने मुख्यमंत्री और स्कूल शिक्षा प्रमुख सचिव को पत्र लिखकर प्रायवेट स्कूलों की बकाया प्रतिपूर्ति राशि अविलंब जारी करने और राशि भी बढाने की मांग किया गया है।
    पॉल का कहना है कि प्रतिवर्ष विधानसभा मे प्रश्न भी पूछे जाते है कि आरटीई की राशि कितना आंबटन हुआ और कितना बकाया है, कितने बच्चो को प्रायवेट स्कूलों को प्रवेश दिया गया है, लेकिन यह प्रश्न नहीं पूछा जाता है कि कितने आरटीई के प्रवेशित बच्चों ने प्रायवेट स्कूलों को छोड़ दिया और शालात्यागी बच्चे किन कारणों से प्रायवेट स्कूल छोड रहे है। प्रदेश में अब तक लगभग 15 हजार आरटीई के अंतर्गत प्रवेशित बच्चों ने प्रायवेट स्कूल छोड दिया है, इसकी जानकारी लगातार एसोसियेशन के द्वारा स्कूल शिक्षा विभाग को भी दिया जा रहा है, लेकिन इस पर विभाग ने कभी गंभीरता से जांच तक नहीं कराया, जो चिंता का विषय है, क्योंकि समय पर राशि जारी नहीं होने से प्रवेशित बच्चों को स्वयं अपने लिए कॉपी-किताब, जूते-मोजे और ड्रेस खरीदने पढते है, जिसके लिए प्रत्येक पालक को लगभग 10 हजार व्यय करना पड़ता है, जो एक गरीब पालक के लिए समस्या बन जाता है, जिससे तंग आकर पालक अपने बच्चों को प्रायवेट स्कूलों से निकाल कर सरकारी स्कूलों में डालने के लिए मजबूर हो रहे है। राज्य कि यह जिम्मेदारी है, वे गरीब तबके के बच्चों को प्रायवेट स्कूलों में प्रवेश दिलाये और शिक्षा पूर्ण होने तक उनकी निगरानी करें, मगर ऐसा नहीं हो रहा है, क्योंकि पहले प्रवेश देने में आना-कानी किया जाता है और प्रवेश देने के पश्चात् उनका कोई सुध लेने वाला नहीं होता है। शिक्षा का अधिकार कानून को कागजों में नहीं क्लास रूम में कड़ाई से पालन कराने की जरूरत है।

    खाना खजाना /शौर्यपथ /सरसों का साग और मक्की की रोटी बनाने के लिए सामग्री-
    साग के जरूरी चीजें-
    -750 ग्राम सरसों का साग
    -250 ग्राम पालक का साग
    -250 ग्राम बथुए का साग
    -2 कप पानी
    -एक चुटकी नमक
    -1 1/2 कप मक्की का आटा
    -4 हरी मिर्च
    -25 ग्राम अदरक
    -6 लहसुन की कली
    -2 प्याज
    -घी
    -1/2 टी स्पून लाल मिर्च पाउडर
    -1/2 टी स्पून गरम मसाला
    -1/2 टी स्पून धनिया पाउडर
    सरसों का साग बनाने का तरीका-
    सरसों का साग बनाने के लिए सबसे पहले प्रेशर कुकर में तीनों साग को डालकर उसके साथ नमक और पानी डालकर धीमी आंच पर 1 1/2 घंटे तक पकाएं। अब
    साग का पानी निचोड़कर उसका पानी एक तरफ रख दें। साग को कुकर में अच्छे से मैश कर लें। अब इसमें मक्की का आटा डालकर साग में मिला लें। इसके बाद कुकर में साग के पानी के साथ नॉर्मल ताजा पानी डालकर कर इसे धीमी आंच पर पकाएं। साग में हरी मिर्च और अदरक डालकर साग को गाढ़ा होने तक पकाएं।
    साग का तड़का-
    साग के लिए तड़का तैयार करने के लिए प्याज, अदरक, लहसुन, लाल मिर्च, गरम मसाला, धनिया डालकर भून लें। ध्यान रखें प्याज को गोल्डन ब्राउन होने तक भूने। अब तड़के को साग में डालकर मिक्स कर लें। अब गार्निशिंग के लिए जूनियन कटी अदरक का इस्तेमाल करते हुए गर्मा-गर्म साग मक्की की रोटी के साथ सर्व करें।
    मक्की की रोटी-
    -1/2 किलो मक्की का आटा
    -आटा गूंथने के लिए पानी
    -तलने के लिए घी
    मक्की की रोटी बनाने का तरीका-
    मक्की की रोटी बनाने के लिए सबसे पहले मक्की का आटा लकर उसे आटे की ही तरह गूंथ लें। अब तवा गर्म करके उस पर थोड़ा सा घी डालें ताकि रोटी तवे पर चिपके नहीं। अब चकले पर गोल आकार की मक्की की रोटी तैयार करके आराम से तवे पर डालें। रोटी पर घी लगाकर गोल्डन ब्राउन होने तक सेकें। मक्के की रोटी को सरसों का साग, गुड़ और सफेद मक्खन के साथ सर्व करें।

    सेहत /शौर्यपथ /सिर दर्द, बदन दर्द जैसी परेशानियों से निजात पाने के लिए अगर आप भी बिना डॉक्टर को दिखाए कोई भी पेन किलर ले लेते हैं तो सतर्क हो जाएं। ऐसा करना आपकी सेहत पर भारी पड़ सकता है। क्या आप जानते हैं डॉक्टर की सलाह के बिना किसी भी दवाई का सेवन करने की आदत गंभीर रोगों को जन्म दे सकती है। आइए जानते हैं किस दवा का सेवन करने से शरीर को होता है क्या नुकसान।
    क्यों पड़ती है पेन किलर की जरूरत-
    -जोड़ों के दर्द से राहत पाने के लिए
    -किसी दुर्घटना में लगी चोट के दर्द को कम करने के लिए
    -जलने या कटनी की अवस्था में
    डॉक्टर से बिना सलाह लिए पेन किलर खाने से होते हैं ये साइड इफेक्ट-
    पेन किलर दवाओं में एडिक्टिव तत्व पाए जाते हैं। लंबे समय तक इन दवाओं का सेवन करने पर शरीर को इनकी आदत हो जाती है। इसके अलावा यह दवाएं लीवर और किडनी की सेहत को भी काफी नकसान पहुंचाती हैं। इनका सेवन करने से ब्रेन हेमरेज और खून पतला होने का खतरा बढ़ जाता है। पेन किलर लेने वाले व्यक्ति में गैस की समस्या, पेट में तेजी से दर्द, लूज मोशन, जी मिचलाना आदि लक्षण साइड इफेक्ट के रूप में नजर आने शुरू हो जाते हैं।
    कफ सिरप -
    -गले में दर्द या खराश
    -छाती में जकड़न
    -खांसी के साथ कफ या सूखी खांसी
    कफ सिरप के साइड इफेक्ट-
    कफ सिरप के साइड इफेक्ट होने पर व्यक्ति में सुस्ती, याददाश्त में कमी, घबराहट, हाई ब्लड प्रेशर, दिल की धड़कन का अनियमित होना, नोजिया आदि जैसे लक्षण देखाई देने लगते हैं।
    सलाह-
    अगर आपको मामूली खांसी है तो आप गुनगुने पानी में नमक डालकर गरारे कर सकते हैं। इसके अलावा अदरक और तुलसी से बने काढ़े का सेवन भी राहत देने का काम करता है।
    लैक्जेटिव मेडिसिन-
    लैक्जेटिव मेडिसिन की जरूरत कब्ज की समस्या को दूर करने के लिए पड़ती है। इसके अलावा सर्जरी या डिलीवरी से पहले भी पेट साफ करने के लिए डॉक्टर इन दवाइयों का सेवन करने की सलाह देते हैं।
    लैक्जेटिव मेडिसिन के साइड इफेक्ट-
    लंबे समय तक इन दवाओं का सेवन करने पर व्यक्ति को पेट में दर्द, लूज मोशन, किडनी में स्टोन, डिहाइड्रेशन, हार्ट मसल्स का कमजोर पड़ना आदि जैसे लक्षण देखने को मिलते हैं।
    सलाह-
    लैक्जेटिव मेडिसिन के साइड इफेक्ट नजर आने पर डॉक्टर रोगी को खूब पानी पीने की सलाह देते हैं। ऐसे मरीज अपनी डाइट में अमरूद पपीता जैसे फाइबर युक्त फलों और हरी सब्जियों को शामिल कर सकते हैं। इसके अलावा रोगी ब्रेकफास्ट में स्प्राउट, दलिया, उपमा आदि जैसी चीजें शामिल कर सकता है।
    एंटीबायोटिक्स-
    व्यक्ति को एंटीबायोटिक्स खाने की सलाह तब दी जाती है जब उसे बुखार या किसी तरह की एलर्जी की कोई शिकायत हो। इस तरह की दवाएं बैक्टीरिया और फंगस को नष्ट करने में मदद करती हैं।
    एंटीबायोटिक्स के साइड इफेक्ट-
    बिना पूछे एंटीबायोटिक्स का सेवन करने पर त्वचा में एलर्जी, लूज मोशन जैसी समस्याएं व्यक्ति को परेशान कर सकती हैं। लंबे समय तक इन दवाओं का सेवन करने पर व्यक्ति की रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होने के साथ अच्छे बैक्टेरिया भी खत्म होने शुरू हो जाते हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि इन दवाइयों से वायरस और बैक्टीरिया अपना रेंजिस्टेंस बढ़ा लेते हैं, जिससे उन पर किसी भी तरह की दवा का असर नहीं होता।

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