September 09, 2026
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    धर्म संसार / शौर्यपथ / रामचरित मानस के उत्तरकांड में श्रीराम के अयोध्या आगमन पर भव्य स्वागत का उल्लेख मिलता है। कहते हैं कि कार्तिक अमावस्या को भगवान श्रीराम अपना चौदह वर्ष का वनवास पूरा करके अयोध्या लौटे थे। जब प्रभु श्रीराम अयोध्या लौटे तो सभी शहरवासी उनके आगमन के लिए उमड़ पड़े। भगवान श्रीराम अपना 14 वर्ष का वनवास पूरा करने के बाद पुन: लौट आए थे। आओ जानते हैं कि वे दीपावली के दिन ही पहुंचे थे या कि और किसी दिन?
    1. श्रीराम के अयोध्या लौटने की तिथि पर इतिहासकारों में मतभेद हैं, लेकिन परंपरा के अनुसार कार्तिक अमावस्या अर्थात दीपावली को भगवान श्रीराम अपना चौदह वर्ष का वनवास पूरा करके अयोध्या लौटे थे।

    2. रावण का वध करने के बाद लंका से अयोध्या लौटते समय राम, लक्ष्मण, सीता एवं हनुमानजी पुष्पक विमान से अयोध्या के पास नंदीग्राम नामक स्थान पर उतरे थे, जहां पर राम की खड़ाऊं रखकर राजा भरत अपना राजपाट चलाते थे। कहते हैं कि नंदीग्राम में एक दिन रुकने के बाद वे दूसरे दिन अयोध्या पहुंचे थे।
    3. यह भी उल्लेख मिलता है कि रावण वध यदि दशमी के दिन हुआ था तो उसके दूसरे दिन सीता को अग्नि परीक्षा से गुजरने के बाद अर्थात उन्हें अग्निदेव से वापस मांगने के बाद श्रीराम अयोध्या लौटे थे। मतलब यह कि वे एकादशी के दिन अयोध्‍या की ओर चले थे और रास्ते में वह निषादराज गुह केवट के यहां रुके भी थे।

    4. वाल्मीकि रामायण में उल्लेख मिलता है कि श्रीराम का नंदीग्राम में भव्य स्वागत किया गया था। उस दौरान अयोध्या के सभी आठों मंत्री और राजा दशरथ की तीनों रानियां हाथियों पर सवार होकर नंदीग्रम पहुंचे। उनके साथ अयोध्या के सभी नागरिक भी नंदीग्रम पहुंचे।

    5. वाल्मीकि रामायण के युद्धकाण्ड सर्ग 127 के अनुसार सभी नागरिकों, मंत्रियों और रानियों ने देखा की श्रीराम पुष्पक विमान से धरती पर उतरे। सभी ने विमान पर विराजमान श्रीराम के दर्शन किए और वे उन्हें लेकर अयोध्या गए।

    6.श्रीराम का जन्म इंडियन गर्वनमेंट के साइंस मिनिस्ट्री से मान्यता प्राप्त 'इंस्टीट्यूट ऑफ साइंटिफिक रिसर्च ऑन वेदाज' (आईसर्व) के शोधानुसार श्रीराम का जन्म इस शोधानुसार 5114 ईसा पूर्व हुआ था। आईसर्व डायरेक्टर सरोज बाला के शोध अनुसार श्रीराम ने रावण का वध 4 दिसंबर 5076 ईसा पूर्व किया था। फिर वे अलग अलग जगहों पर रुकते हुए 29वें दिन 2 जनवरी 5075 ईसा पूर्व वापस अयोध्या लौटे थे। अयोध्या लौटने के खुशी में अयोध्यावासियों ने दीपावली मनाई थी। रुकने के दिनों को छोड़कर इस सफर में उन्हें करीब 24 दिन लगे। इस दौरान वे 8 से 9 जगहों पर रुके। यह निष्कर्ष वाल्मीकि रामायण में लिखे उस दौर के ग्रहों, नक्षत्रों, तारामंडलों की स्‍थिति के आधार पर नासा के वेद स्पेशल 'प्लेटिनम गोल्ड' सॉफ्टवेयर से निकाला गया।
    7.श्रीरामजी की खड़ाऊ ले जाते समय भरतजी ने कहा था कि
    चर्तुर्दशे ही संपूर्ण वर्षेदद्व निरघुतम।
    नद्रक्ष्यामि यदि त्वां तु प्रवेक्ष्यामि हुताशन।।

    अर्थात: हे रघुकुल श्रेष्ठ। जिस दिन चौदह वर्ष पूरे होंगे उस दिन यदि आपको अयोध्या में नहीं देखूंगा तो अग्नि में प्रवेश कर जाऊंगा। भरत के मुख से ऐसे प्रतिज्ञापूर्ण शब्द सुनकर रामजी ने भरत को आश्वस्त करते हुए कहा था- तथेति प्रतिज्ञाय- अर्थात ऐसा ही होगा।
    8. इसी प्राकार महर्षि वशिष्ठजी ने महाराजा दशरथ से राम के राज्याभिषेक के संदर्भ में कहा था-

    चैत्र:श्रीमानय मास:पुण्य पुष्पितकानन:।
    यौव राज्याय रामस्य सर्व मेवोयकल्प्यताम्।।

    अर्थात: जिसमें वन पुष्पित हो गए। ऐसी शोभा कांति से युक्त यह पवित्र चैत्र मास है। रामजी का राज्याभिषेक पुष्प नक्षत्र चैत्र शुक्ल पक्ष में करने का विचार निश्चित किया गया है। षष्ठी तिथि को पुष्य नक्षत्र था। रामजी लंका विजय के पश्चात अपने 14 वर्ष पूर्ण करके पंचमी तिथि को भारद्वाज ऋषि के आश्रम में उपस्थित हुए। वहां एक दिन ठहरे और अगले दिन उन्होंने अयोध्या के लिए प्रस्थान किया उससे पहले उन्होंने अपने भाई भरत से पंचमी के दिन हनुमानजी के द्वारा कहलवाया-
    अविघ्न पुष्यो गेन श्वों राम दृष्टिमर्हसि।
    अर्थात: हे भरत! कल पुष्य नक्षत्र में आप राम को यहां देखेंगे। इस प्रकार राम चैत्र के माह में षष्ठी के दिन ही ठीक समय पर अयोध्या में पुन: लौटकर आए।

    9. वाल्मीकि रामायण के अनुसार सीताजी का हरण बसंत ऋतु में हुआ था। अपहरण के पश्चात रावण ने उन्हें बारह मास का समय देते हुए कहा कि हे सीते! यदि इस अवधि के भीतर तुमने मुझे स्वीकार नहीं किया तो मेरे याचक तुम्हारे टुकड़े-टुकड़े कर डालेंगे।
    10. यह बाद हनुमानजी ने जब श्रीराम से कही तो उन्होंने भली प्रकार चिंतन करके सुग्रीव को आदेश दिया कि

    उत्तरा फाल्गुनी हयघ श्वस्तु हस्तेन योक्ष्यते।
    अभिप्रयास सुग्रिव सर्वानीक समावृता:।।

    अर्थात आज उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र है। कल हस्त नक्षत्र से इसका योग होगा। हे सुग्रीव इस समय पर सेना लेकर लंका पर चढ़ाई कर दो। इस प्रकार फाल्गुन मास में श्री लंका पर चढ़ाई का आदेश श्री राम ने दिया। यह जानकर रावण ने भी अपने मंत्री से सलाह लेकर कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को युद्धारंभ करके अमावस्या के दिन सेना से युक्त होकर विजय के लिए निकला और चैत्र मास की अमावस्या को रावण मारा गया। तब रावण की अंत्येष्टि क्रिया तथा विभीषण के राजतिलक के पश्चात रामचंद्र यथाशीघ्र अयोध्या के लिए निकल पड़े। तब यह सिद्ध होता है कि रामजी चैत्र के माह में ही अयोध्या लौटे थे। इसी खुशी में लोगों ने अपने अपने घरों में दीप जलाकर उनका स्वागत किया।

    दुर्ग / शौर्यपथ / मुख्यमंत्री भूपेश बघेल पाटन क्षेत्र में जनसंपर्क अभियान के दौरान उन महिलाओं से मिले जिनके द्वारा गोबर से बनाए दीयों, वंदनवार, शुभ-लाभ,वॉल हैंगिंग इत्यादि ने न केवल प्रदेश में बल्कि देश के बाहर भी छत्तीसगढ़ को पहचान दिलाई है।
    महिलाओं ने मुख्यमंत्री जी को शुध्द गोबर से बने वंदनवार और दीये भेंट भी किए।महिलाओं द्वारा दी गई भेंट को मुख्यमंत्री जी ने बड़े स्नेह से स्वीकार किया और उनके साथ तस्वीर भी खिंचवाई।संस्था की संचालिका श्रीमती निधि चन्द्राकर ने जब मुख्यमंत्री जी को बताया कि उन्होंने देश के बाहर भी दीये और वंदनवार भेजे हैं तो वे बहुत खुश हुए। उनकी मेहनत की सराहना की और आशीर्वाद दिया ऐसे ही अच्छा काम करते रहिए।महिलाओं की हुनरमंदी देखकर मुख्यमंत्री जी ने उनका उत्साहवर्धन भी किया।उन्होंने कहा कि महिलाएं हर क्षेत्र में अच्छा काम कर रही हैं आपने गोधन से बने उत्पादों को देश के बाहर पहचान दिलाई जो काबिले तारीफ है।
    संस्था की सभी महिलाएं श्रीमती कल्पना वर्मा, श्रीमती शशि ,श्रीमती मनीषा और श्रीमती पिंकी मुख्यमंत्री से मिलकर काफी उत्साहित नजर आईं।इन महिलाओं ने बताया उन सबको बहुत अच्छा लगा जब उन सबको प्रदेश के मुख्यमंत्री का इतना स्नेह और आशीर्वाद मिला।अब वे दुगने उत्साह से काम करेंगी।

    दुर्ग / शौर्यपथ / ग्रामीण विकास को बढ़ावा देने के लिए गौठान का सशक्तिकरण आवश्यक है। गौठान के बनने से यहां जानवरों के रखने की व्यवस्था हो गई। गोधन न्याय योजना के माध्यम से पशुधन को लोग ज्यादा सहेजने लगे हैं। इससे फसल सुरक्षा भी हो रही है। कुछ किसानों ने बताया कि उन्होंने काफी समय पहले ओन्हारी फसल ली थी। इस बार उन्होंने फिर से यह फसल लगाई है। यह बताता है कि मवेशियों से फसल सुरक्षा बेहद आवश्यक थी।
    गौठान और गोधन न्याय योजना से इसका रास्ता खुला। यह खेती और पशुपालन की बेहतरी के लिए शानदार योजना है। साथ ही जैविक खेती की ओर भी इससे राह प्रशस्त होती है। उन्होंने कहा कि पिछली बार किसानों ने गौठान के लिए मुक्त हस्त से पैरादान किया था। गोमाता के संवर्धन के लिए ये सबसे उत्तम कार्य है। इस बार भी खेतों में फसल अवशेष जलाएं नहीं अपितु पैरादान करें।
    मुख्यमंत्री ने इस अवसर पर कहा कि गौठान ग्रामीण आजीविका केंद्र के रूप में स्थापित होंगे। अभी स्वसहायता समूह की महिलाओं ने दीपावली को देखते हुए उत्पाद तैयार किये हैं। इनकी अच्छी बिक्री हो रही है। इन्हें स्थानीय जरूरत के मुताबिक चीजें तैयार करने के लिए कहा जा रहा है। अपने हुनर, गुणवत्ता और मेहनत से ये अपने उत्पादों की बाजार में जगह बना लेंगे।
    मुख्यमंत्री ने कहा कि धान उत्पादन करने वाले किसानों को एथेनॉल का प्लांट लगने से विशेष मदद मिलेगी। इसके लिए केंद्र से अनुमति मांगी गई थी, प्लांट आरम्भ होने से धान उगाने वाले किसानों की समृद्धि और बढ़ेगी।
    मुख्यमंत्री ने कहा कि ग्रामीण विकास सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता है। किसानों को खेती किसानी में किसी तरह की दिक्कत न आये, इसके लिए राजीव गांधी किसान न्याय योजना की किश्त ऐसे समय में दी गई जब किसानों को खेती के लिए सबसे ज्यादा राशि की जरूरत होती है।

    त्यौहार स्पेसल / शौर्यपथ / धनतेरस के दिन मां लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए पूजा के प्रसाद में कई तरह के भोग तैयार किए जाते हैं। ऐसे ही एक भोग का नाम है खोए की बर्फी । मावा या खोए की बर्फी देश भर में खूब पसंद की जाती है। इस मिठाई को व्रत और त्योहार के मौके पर खास तौर से तैयार किया जाता है। खोए की बर्फी न सिर्फ खाने में बेहद स्वादिष्ट होती है, साथ ही बनने में भी बेहद आसान होती है। तो आइए जानते हैं कैसे बनाई जाती है यह स्वादिष्ट खोए की बर्फी।

    खोए की बर्फी बनाने के लिए सामग्री-
    -1 कप खोया
    -1/4 कप घी
    -1/2 कप चीनी पाउडर
    -¼ टी स्पून इलायची पाउडर

    -खोए की बर्फी बनाने की वि​धि-
    खोए की बर्फी बनाने के लिए सबसे पहले एक भारी पैन में घी गर्म करके उसमें खोया डालकर भून लें। ध्यान रहे खोए के मिक्सचर को लगातार चलाते रहे। जब यह मिक्सचर बीच में इकट्ठा होने लगे, तो इसमें चीनी डालकर हल्की आंच पर अच्छी तरह भूनें ताकि चीनी पूरी तरह मिश्रण में घुल जाए।जब मिक्सचर बीच में एक बॉल की तरह बन जाए, तो इसे एक घी लगी प्लेट में निकालकर ठंडा होने के लिए छोड़ दें। ठंडा होने पर इसे अपनी पसंद की शेप में काटकर सर्व करें।

    शौर्यपथ / घंटों कसरत, दौड़ या डाइट कंट्रोल करने के बावजूद भी अगर आप अपना वजन कम नहीं कर पा रहे हैं तो टेंशन छोड़ अपनी डाइट में शामिल करें ये खास चाय। जी हां इस चाय का नाम है करी पत्ते की चाय। सुबह करी पत्ते का सेवन करने से शरीर के विषाक्त पदार्थों को बाहर निकालने और शरीर में मेटाबॉलिज्म लेवल को बढ़ाने में मदद मिल सकती है। तो आइए जानते हैं कैसे बनाई जाती है ये सेहतमंद चाय।
    करी पत्ता टी बनाने के लिए लगने वाली सामग्री-
    -8-10 करी पत्ते
    -आधा इंच अदरक
    -2-3 कप पानी
    -नींबू और शहद
    करी पत्ता टी बनाने का आसान तरीका-
    करी पत्ता की चाय बनाने के लिए सबसे पहले करी पत्तों और अदरक को साफ करके 15-20 मिनट के लिए मीडियम आंच पर पानी में उबालने के बाद गैस बंद करके ढक्कन बंद करके 10 मिनट के लिए और पकने दें। अब एक कप में चाय को छानकर इसमें नींबू का रस या शहद मिलाएं। आपकी करी पत्ते की चाय बनकर तैयार हैं।

    सेहत / शौर्यपथ / देश-दुनिया में लाखों-करोड़ों लोग स्वस्थ रहने की चाह में रोजाना विटामिन और मिनरल की गोलियां खाते हैं। हालांकि, हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के नेतृत्व में हुए एक अंतरराष्ट्रीय अध्ययन की मानें तो विटामिन और मिनरल की रंग-बिरंगी गोलियां शारीरिक या मानसिक स्वास्थ्य में सुधार लाने में कुछ खास असरदार नहीं साबित होतीं। लोगों का यह सोचना कि गोली खाने से वे शारीरिक और मानसिक स्तर पर मजबूत हो रहे हैं, महज ख्याली पुलाव पकाने जैसा है।
    डॉ. कैरी रक्सटन के नेतृत्व में हुए इस अध्ययन में 21600 वयस्क शामिल हुए। इनमें से पांच हजार प्रतिभागियों ने नियमित रूप से विटामिन और मिनरल की गोलियां खाने की बात स्वीकारी। वहीं, 16660 ने बताया कि अच्छी सेहत की चाह में वे ऐसी किसी दवा का सेवन नहीं करते। सेहत से जुड़े एक साक्षात्कार में गोलियां खाने वाले प्रतिभागियों ने उन लोगों के मुकाबले 30 फीसदी ज्यादा स्वस्थ महसूस करने की बात कही, जो इनसे दूर रहते हैं।
    हालांकि, जब रक्सटन और उनके साथियों ने जीवनशैली व चिकित्सकीय इतिहास के आधार पर सभी प्रतिभागियों के शारीरिक, मानसिक और जैविक स्वास्थ्य पर गोलियों के असर का विश्लेषण किया तो इन्हें खाने तथा न खाने वालों में कोई अंतर नहीं दिखा।
    रक्सटन के मुताबिक विटामिन या मिनरल की गोलियां आमतौर पर ऐसे लोग ही खाते हैं, जो अपनी सेहत को लेकर ज्यादा सजग हैं। ऐसे में उनके बीमारियों को दूर रखने के लिए स्वस्थ जीवनशैली अपनाने की गुंजाइश भी अधिक रहती है।
    रक्सटन ने कहा, स्वस्थ जीवनशैली का असर शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर दिखना लाजिमी है। लिहाजा विटामिन या मिनरल की गोलियों को सेहत के प्रति जागरूक लोगों के बेहतर स्थिति में होने का श्रेय देना मुनासिब नहीं रहेगा।

    उन्होंने यह भी बताया कि विटामिन या मिनरल की गोलियां खाने वाले लोग उनके फायदों को लेकर आश्वस्त होते हैं। इससे मानसिक स्तर पर उनमें सुरक्षा का भाव पनपता है, जिसका सकारात्मक असर शरीर पर भी दिखता है।
    खुलासा
    -शोधकर्ताओं ने 21600 वयस्कों के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य का जायजा लिया।
    -5000 प्रतिभागी रोज विटामिन-मिनरल की गोलियां खाते थे, 16660 ऐसा नहीं करते थे।
    -30% ज्यादा स्वस्थ मिले गोलियों का सेवन करने वाले, स्वस्थ जीवनशैली अपनाना थी वजह
    बड़ा बाजार-
    -40% से अधिक वैश्विक आबादी रोजाना विटामिन या मिनरल की गोलियां खाती है
    -मल्टीविटामिन सहित अन्य सप्लीमेंट का बाजार 3.8% सालाना की दर से बढ़ रहा है
    -इस मौजूदा वार्षिक कमाई 1952.34 करोड़ डॉलर (लगभग 146425.20 करोड़ रुपये) है
    कमी होने पर ही करें सेवन-
    -रक्सटन के मुताबिक विटामिन और मिनरल की गोलियां उन लोगों के लिए बनी हैं, जो खानपान या अन्य प्राकृतिक स्रोतों के जरिये इन अहम पोषक तत्वों की जरूरत पूरी करने में असमर्थ हैं। इन दवाओं को बीमारियों की रोकथाम या बचाव की गारंटी समझकर बेवजह नहीं खाना चाहिए।

    रायपुर / शौर्यपथ / परिवार नियोजन के अस्थाई साधन के तौर पर छाया साप्ताहिक गर्भनिरोधक गोलियां महिलाओं की पहली पसंद बन रही है । जागरूकता बढ़ने से शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में भी इनका इस्तेमाल शुरू हो गया है।लॉकडाउन के बाद से जिले में इसका प्रसार-प्रचार जोरों पर है। छाया गर्भनिरोधक गोलियों के प्रसार-प्रचार में मितानिन की भी भूमिका महत्वपूर्ण हैं।
    मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ.मीरा बघेल के अनुसार परिवार को नियोजित रखने में छाया गर्भनिरोधक गोलियां काफी कारगर हैं। वर्ष 2019-20 में जहॉ 3,845 गोलियां इस्तेमाल हुई थी वहीं 1अप्रैल 2020 से 31 अगस्त 2020 तक 3,975 छाया गर्भनिरोधक गोलियों का इस्तेमाल किया जा चुका है । छाया का वितरण स्वास्थ्य केंद्रों के अलावा मितानिन के द्वारा भी गृह भ्रमण के दौरान किया जा रहा है ।
    ज़िले में महिलाओं की रुचि परिवार नियोजन के प्रति बढ़ रही है।पिछले साल की अपेक्षा इस साल छाया का उपयोग करने वाली महिलाओं की संख्या में इजाफा हुआ है। लोग इनके प्रति जागरूक हो रहे हैं। और इसका प्रयोग भी बढ़ रहा है।
    बीरगॉव की मितानिन सविता साहू बताती हैं,“मैं पिछले 4 माह से छाया टेबलेट का इस्तेमाल कर रही हूँ और मेरे दो बच्चे हैं, मैं और बच्चे नहीं चाहती हूँ इसलिए मैं टेबलेट का नियमित इस्तेमाल कर रही हूं । इसके इस्तेमाल से गर्भधारण नहीं होता है और अनचाहे गर्भ की चिंता से भी छुटकारा मिलता है।“
    वहीं हितग्राही मधु साहू कहती है,“मैं एक गृहणी हूँ,मेरी 1 वर्ष की एक बच्ची है और मैं अभी दोबारा मां बनना नहीं चाहती हूँ। मैं अपने बच्चों में 5 वर्ष का अंतर रखना चाहती हूँ ताकि मैं अपने पहले बच्चे का देखरेख अच्छे से कर सकूं । इसलिए मैं छाया गोली का प्रयोग कर रहीं हूँ इसकी जानकारीमुझे मितानिन दीदी के द्वारा मिली है | उन्होंने बच्चों में अंतर रखने के लिए छाया गोली का इस्तेमाल करने की सलाह दी थी और कहा था कि इसको खाने से तुम अनचाहे गर्भ को रोक सकती हो और जब बच्चा चाहिये तब इस गोली का उपयोग बंद कर देना।“
    छाया गर्भ निरोधक गोली प्राप्त करने की सुविधा जिला अस्पताल, सभी प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों, सभी सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों और उप स्वास्थ्य केन्द्रों पर उपलब्ध है।अनेक मितानिन स्वयं परिवार नियोजन के लिए छाया अपनाकर उदाहरण प्रस्तुत कर रही है। साथ ही अन्य महिलाओं को भी प्रेरित कर रहीं हैं।
    छाया का नहीं है कोई साइड इफेक्ट
    स्टीरॉयड न होने की वजह से छाया नान हार्मोनल गर्भनिरोधक गोली है, जिसका कोई साइड इफेक्ट नहीं होता। मासिक चक्र के दीर्घकरण के अलावा छाया का कोई दुष्प्रभाव नहीं पाया गया है। हार्मोनल गोलियों की तुलना में छाया के सेवन से मोटापा, मतली होना, उल्टी या चक्कर आना, रक्तस्त्राव और मुहांसे जैसे कोई दुष्प्रभाव नहीं होते। इस कारण यह अधिक सुरक्षित है।
    ऐसे करें छाया का सेवन
    छाया का सेवन आरंभ करने के लिए मासिक धर्म शुरू होने वाले दिन पहली गोली लेनी होती है। इसके बाद चौथे दिन दूसरी गोली। उदाहरण के तौर पर यदि किसी का मासिक धर्म रविवार को शुरू हुआ तो पहली गोली रविवार को व दूसरी चौथे दिन यानि बुधवार को लेनी होगी। इसके बाद तीन माह तक हर सप्ताह रविवार और बुधवार को यह गोली लेनी है।तीन महीने बाद हफ्ते में एक गोली सिर्फ रविवार को लेना है जब तक बच्चा नहीं चाहिये।
    ज़िले के सभी स्वास्थ्य केन्द्रों पर है उपलब्ध
    छाया टेबलेट जिला मातृएवं शिशु अस्पताल के अलावा सभी सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र, प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र सभी उप स्वास्थ्य केन्द्रों पर मिलती है। स्वास्थ्य विभाग से प्राप्त आंकड़ों के अनुसार जिले में 11सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र, 35प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र,163उप स्वास्थ्य केंद्र स्वास्थ्य केन्द्रों है ।

    सेहत / शौर्यपथ क्या आप जानते हैं कि हर सेहतमंद चीज, हर मौसम में फायदेमंद नहीं होती? लेकिन ये बात बिल्कुल सही है। इसलिए हम आपको बता रहे हैं ऐसी 5 चीजों के बारे में, जिनका ठंड में इस्तेमाल आपके लिए फायदेमंद की जगह नुकसानदायक हो सकता है।
    1 दही -
    दही वैसे तो बेहद फायदेमंद होता है, लेकिन ठंड के दिनों में कच्चे दही का इस्तेमाल आपके लिए ठीक
    नहीं है। इसकी तासीर ठंडी है, इस मौसम में यह आपको सर्दी, जुकाम खांसी या पाचन संबंधी समस्या दे सकता है। आप इसे खाना ही चाहते हैं, तो फ्राय करके या छाछ के रूप में कर सकते हैं।
    2 दूध - भले ही आपको यकीन न हो, लेकिन ठंड में दूध का इस्तेमाल नुकसानदायक हो सकता है। यह कफ पैदा करता है, जो कफ या ठंडी तासीर वालों के लिए नुकसानदायक है। आप चाहें तो इसे गर्म करके, हल्दी, शहद, गुड़ या अंजीर के साथ इसे ले सकते हैं।
    3 पुदीना - इस मौसम में भी पुदीने को स्वाद से खाते हैं तो थोड़ा संभल जाएं, क्योंकि इसकी तासीर ठंडी होती है और इस मौसम में यह सर्दी जुकाम का कारण बन सकता है।
    4 फल - फलों में इस मौसम में आपको चयन करना होगा कि कौन से फल ठंडी तासीर के हैं और कौन से नहीं। इस मौसम में केला, संतरा जैसे फल कफ और कोल्ड का कारण बन सकते हैं।
    5 ठंडा पानी - नॉर्मल पानी की जगह ठंडा पानी पीने की आदत है, तो इन दिनों में ऐसा न करें। इससे आपका गला खराब हो सकता है और यह सर्दी जुकाम का कारण बन सकता है।

    श्रध्दा /शौर्यपथ / दीपावली के दिन माता लक्ष्मी को यदि ये भोग लगाएंगे तो उनकी कृपा सदा आप पर बनी रहेगी। लेकिन ध्यान रहे कि माता लक्ष्मी की पूजा अर्चना सदा भगवान विष्णुजी के साथ ही करना चाहिए। लक्ष्मीजी को धन की देवी माना गया है। कहते हैं कि अर्थ बिना सब व्यर्थ है। लक्ष्मीजी को प्रसन्न करने के लिए उनके प्रिय भोग को लक्ष्मी मंदिर में जाकर अर्पित करना चाहिए या दीपावली के दिन पूजा के दौरान इन्हें अर्पित करें।
    लक्ष्मी भोग
    1. केसर भात : पीले रंग के केसर भात भी माता को अर्पित करके उन्हें प्रसन्न किया जाता है।
    2. पीले रंग के मिष्ठान : माता लक्ष्मी को पीले और सफेद रंग के मिष्ठान अर्पित किए जाते हैं।
    3. खीर : माता लक्ष्मी को चावल की खीर में किशमिश, चारोली, मखाने और काजू मिलाकर अर्पित करें।
    4. हलुआ : शुद्ध घी का हलुआ माता को प्रिय है।
    5. ईख (गन्ना) : दीपावली के दिन गन्ना को इसलिए अर्पित किया जाता क्योंकि उनके सफेद हाथी को यह प्रिय है।
    6. सिघाड़ा : सिंघाड़ा माता लक्ष्मी को बहुत ही पसंद है। इसकी उत्पत्ति भी जल से होती है।
    7. मखाना : जिस तरह माता लक्ष्मी की उत्पत्ति समुद्र से हुई उसी तरह मखाने की उत्पत्ति भी जल से हुई है। मखाना कमल के पौधे से मिलता है।
    8. बताशे : पताशा या बताश भी माता लक्ष्मी को बहुत प्रिय है। रात्रि की पूजा में इसे अर्पित किया जाता है।
    9. नारियल : नारियल को श्रीफल भी कहते हैं। इसमें सबसे शुद्ध जल भरा रहता है। श्रीफल होने के कारण माता यह बहुत पसंद है।
    10. पान : माता लक्ष्मी की पूजा में मीठा पान का बहुत महत्व है। यह प्रसन्नता और समृद्धि का प्रतीक है।
    11. अनार : मां लक्ष्‍मी को फलों में अनार बेहद प्रिय है। दीपावली की पूजन के दौरान अनार जरूर अर्पित करें।
    इसके अलावा पूजन के दौरान 16 प्रकार की गुजिया, पपड़ियां, अनर्सा, लड्डू चढ़ाएं जाते हैं। आह्वान में पुलहरा चढ़ाया जाता है। इसके बाद चावल, बादाम, पिस्ता, छुआरा, हल्दी, सुपारी, गेंहूं, नारियल अर्पित करते हैं। केवड़े के फूल और आम्रबेल का भोग अर्पित करते हैं। जो कोई भी व्यक्ति एक लाल फूल अर्पित कर लक्ष्मीजी के मंदिर में उन्हें यह भोग लगाता है तो उसके घर में हर तरह की शांति और समृद्धि रहती है। किसी भी प्रकार से धन की कमी नहीं रहती।

    धर्म संसार / शौर्यपथ /देवी लक्ष्मी को धन और समृद्धि प्रदान करने वाली देवी माना जाता है। मान्यता है कि माता लक्ष्मी के मंदिर में जाकर पूजन-अर्चन करने से आर्थिक संकट समाप्त हो जाता है। खासकर शुक्रवार को यहां जाना चाहिए। महालक्ष्मी और लक्ष्मी के कई प्राचीन और प्रसिद्ध मंदिर है। उनमें से ही जानते हैं 10 की जानकारी।
    1. पद्मावती का मंदिर : तिरुपति के पास तिरुचुरा नामक एक छोटा-सा गांव है। इस गांव में देवी पद्मावती का सुंदर मंदिर है। यह मंदिर 'अलमेलमंगापुरम' के नाम से भी जाना जाता है। लोक मान्यता है कि तिरुपति बालाजी के मंदिर में मांगी मुराद तभी पूरी होती है, जब श्रद्धालु बालाजी के साथ-साथ देवी पद्मावती का आशीर्वाद भी ले लें।
    2. दक्षिण भारत का स्वर्ण मंदिर : भारतीय राज्य तमिलनाडु के जिले वेल्लू में स्थित थिरुमलई कोड गांव श्रीपुरम में स्थित महालक्ष्मी मंदिर को 'दक्षिण भारत का स्वर्ण मंदिर' कहा जाता है। 100 एकड़ में फैला यह मंदिर चेन्नई से 145 किलोमीटर दूर पलार नदी के किनारे स्थित है।
    3. पद्मनाभस्वामी मंदिर : पद्मनाभस्वामी मंदिर केरल के तिरुअनंतपुरम् में मौजूद भगवान विष्णु का प्रसिद्ध मंदिर है, लेकिन यहां से अपार मात्रा में 'लक्ष्मी' की प्राप्ति हुई थी। यह मंदिर अपने सोने के खजाने के लिए विश्वभर में प्रसिद्ध है। भगवान विष्णु को समर्पित पद्मनाम मंदिर को त्रावणकोर के राजाओं ने बनाया था। इसका जिक्र 9वीं शताब्दी के ग्रंथों में भी आता है, लेकिन मंदिर के मौजूदा स्वरूप को 18वीं शताब्दी में बनवाया गया था।
    4. मुंबई का महालक्ष्मी मंदिर : समुद्र के किनारे बी. देसाई मार्ग पर स्थित यह मंदिर अत्यंत सुंदर, आकर्षक और लाखों लोगों की आस्था का प्रमुख केंद्र है। ज्ञात इतिहास के अनुसार इस महालक्ष्मी मंदिर की स्थापना अंग्रेजों के काल में हुई। उस समय देवी लक्ष्मी एक ठेकेदार रामजी शिवाजी के स्वप्न में प्रकट हुईं और उन्हें समुद्र तल से देवियों की 3 प्रतिमाएं निकालकर मंदिर में स्थापित करने का आदेश दिया। मंदिर के गर्भगृह में महालक्ष्मी, महाकाली एवं महासरस्वती तीनों देवियों की प्रतिमाएं एकसाथ विद्यमान हैं।
    5. कोल्हापुर का महालक्ष्मी मंदिर : कोल्हापुर महाराष्ट्र का एक जिला है। कहा जाता है कि यहां स्थित महालक्ष्मी मंदिर का निर्माण चालुक्य शासक कर्णदेव ने 7वीं शताब्दी में करवाया था। इसके बाद शिलहार यादव ने 9वीं शताब्दी में इसका पुनर्निर्माण करवाया था।
    मंदिर के मुख्य गर्भगृह में देवी महालक्ष्मी की लगभग 40 किलो की प्रतिमा स्थापित है जिसकी लंबाई लगभग 4 फीट की है। कहा जाता है कि यहां की लक्ष्मी प्रतिमा लगभग 7,000 साल पुरानी है।
    6. लक्ष्मीनारायण मंदिर : दिल्ली के प्रमुख मंदिरों में से एक लक्ष्मीनारायण मंदिर को मूल रूप में 1622 में वीरसिंह देव ने बनवाया था, उसके बाद पृथ्वीसिंह ने 1793 में इसका जीर्णोद्धार कराया। इसके बाद सन् 1938 में भारत के बड़े औद्योगिक परिवार बिड़ला समूह ने इसका विस्तार और पुनरुद्धार कराया जिसके बाद इसे बिड़ला मंदिर भी कहा जाता है।
    7. इंदौर का महालक्ष्मी मंदिर : इंदौर शहर के हृदयस्थल राजवाड़ा की शान कहे जाने वाले श्री महालक्ष्मी मंदिर के संबंध में कहा जाता है कि इस मंदिर का निर्माण 1832 में मल्हारराव (द्वितीय) ने कराया था। 1933 में यह 3 तलों वाला मंदिर था, जो आग के कारण तहस-नहस हो गया था। 1942 में मंदिर का पुनः जीर्णोद्धार कराया गया था। वर्तमान में मुंबई के महालक्ष्मी मंदिर की तर्ज पर इस मंदिर का जीर्णोद्धार करके इसे भव्य रूप दिया गया है।
    8. चौरासी मंदिर : यह मंदिर हिमाचल प्रदेश के चंबा से 65 किलोमीटर दूर भरमौर जिला नगर में स्थित है। यहां महालक्ष्मी के साथ गणेशजी और नरसिंह भगवान की मूर्ति भी स्थित है। प्राकृतिक वादियों में बसा यह मंदिर ऐतिहासिक और धार्मिक दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है।
    9. चंबा का लक्ष्मीनारायण का मंदिर : हिमाचल के चंबा में स्थित यह मंदिर पारंपरिक वास्तुकारी और मूर्तिकला का उत्कृष्‍ट उदाहरण है। चंबा के 6 प्रमुख मंदिरों में यह मंदिर सबसे विशाल और प्राचीन है। भगवान विष्णु को समर्पित यह मंदिर राजा साहिल वर्मन ने 10वीं शताब्दी में बनवाया था। यह मंदिर शिखर शैली में निर्मित है।
    10. अष्टलक्ष्मी मंदिर : चेन्नई के इलियट समुद्र तट के पास स्थित यह मंदिर लगभग 65 फीट लम्बा और 45 फीट चौड़ा है। मंदिर में देवी लक्ष्मी के आठ स्वरूप 4 मंजिल में बने 8 अलग-अलग कमरों में स्थापित है। इस मंदिर में देवी लक्ष्मी अपने पति और भगवान विष्णु के साथ मंदिर की दूसरी मंजिल में विराजित है।

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