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May 31, 2026
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रायपुर / शौर्यपथ /   मुख्यमंत्री  भूपेश बघेल ने राज्य शासन के अधिकारी-कर्मचारियों को बड़ी राहत दी है। कोरोना संकट के कारण राज्य शासन के अधिकारी एवं कर्मचारियों की वार्षिक वेतनवृद्धि विलंबित की गई थी, जिसे बहाल करने के निर्देश मुख्यमंत्री ने दिए हैं। मुख्यमंत्री ने कहा है कि राज्य शासन के अधिकारियों-कर्मचारियों को जिन्हें एक जुलाई को वेतनवृद्धि मिलती हैै। उन्हें वेतनवृद्धि एक जुलाई को ही मिलेगी, परन्तु जुलाई से दिसम्बर माह तक की वेतनवृद्धि की एरियर्स राशि का भुगतान आगामी जनवरी माह में एकमुश्त किया जाएगा। इसी प्रकार जिन अधिकारी-कर्मचारियों की वेतनवृद्धि एक जनवरी को लगती है, उनको एक जनवरी को ही वेतनवृद्धि मिलेगी और उनकी एरियर्स राशि का भुगतान छह माह बाद आगामी जुलाई माह में किया जाएगा। 
    गौरतलब है कि कोरोना संकट काल में राज्य की वित्तीय व्यवस्था को देखते हुए वित्त विभाग द्वारा अधिकारी-कर्मचारियों की वार्षिक वेतनवृद्धि को आगामी आदेश तक विलंबित किया गया था। मुख्यमंत्री  से आज यहां उनके निवास कार्यालय में छत्तीसगढ़ कर्मचारी-अधिकारी फेडरेशन के प्रतिनिधि मंडल ने प्रांतीय संयोजक कमल वर्मा के नेतृत्व में सौजन्य मुलाकात की और उनसे अधिकारी-कर्मचारियों को निर्धारित तिथि पर वेतनवृद्धि देने का आग्रह किया। मुख्यमंत्री ने कर्मचारी संगठनों की इस मांग पर सहानुभूतिपूर्वक विचार करते हुए वेतनवृद्धि निर्धारित तिथि पर ही देने और इसकी एरियर्स राशि का भुगतान छह माह बाद करने पर अपनी सहमति प्रदान की है। इस अवसर पर वित्त विभाग के अपर मुख्य सचिव अमिताभ जैन उपस्थित थे। 

सेहत / शौर्यपथ / आप अपनी त्वचा को खूबसूरत बनाए रखने के लिए क्या कुछ नहीं करते, कभी पार्लर तो कभी महंगी ब्यूटी क्रीम, हर नुस्खा आजमाकर देखते हैं जो आपका त्वचा की चमक और रौनक को बनाए रखने का आपसे वादा करता है। लेकिन क्या आप जानते हैं आपकी मेहनत को आपका दोस्त बनकर जाने-अनजाने कौन खराब कर रहा है। आखिर कौन है वो जो चोरी-छिपे आपके चेहरे की रंगत को चुरा ले जा रहा है। जी हां और वो है आपका फेवरेट स्मार्टफोन। आइए जानते हैं कैसे आपका स्मार्टफोन आपकी त्वचा को नुकसान पहुंचा रहा है और करने से स्मार्टफोन के साइड इफेक्ट्स से बचा जा सकता है।

स्मार्टफोन के साइड इफेक्ट्स-
-रात भर जागकर फोन पर बात करने से गर्दन में होने वाली स्टिफनेस मोबाइल फोन के कारण ही होती है।इतना ही नहीं स्मार्टफोन एडिक्शन भी आपके स्वास्‍थ्‍य के लिए हानिकारक हो सकती है।
-जब आप किसी से लंबी बातचीत करते हैं तो आपके गाल पर जो हीट महसूस होती है, वह हीट आपकी स्किन को भी काफी नुकसान पहुंचाती है।
-एक अध्ययन के अनुसार, मोबाइल की नीली रोशनी आपकी स्किन को उतना ही नुकसान पहुंचाती है, जितना सूरज की यूवी किरणें।
-नीली रोशनी से निकलने वाले रेडिएशन एक्सपोजर के कारण आपकी स्किन पर हाइपर पिगमेंटेशन और काले धब्बे भी हो सकते हैं। जिससे स्किन जगह-जगह से पैची नजर आने लगती है।
-डर्मोटोलॉजिस्ट का यह भी मानना है कि फोन पर लगातार मैसेज पढ़ने से आपके माथे पर प्रीमेच्योर लाइन्स और आंख की कोरों पर क्रो फीट यानी झुर्रियां होने लगती हैं।
-मोबाइल फोन के कारण आपके चेहरे पर मुंहासे हो सकते हैं क्योंकि ये कई तरह के रोगाणुओं का ठिकाना होता है।

स्मार्टफोन के साइड इफेक्ट्स से कैसे बचें-
-त्वचा पर स्मार्टफोन के साइड इफेक्ट्स से बचने के लिए कम से कम उपयोग करें।
-कोशिश करें कि ज्यादातर समय फोन पर बात करने के लिए हैंड-फ्री डिवाइस का उपयोग करें। ऐसा करने से त्वचा फोन के सीधे संपर्क में नहीं आती है।
-अपने फोन को रोजाना साफ करें। इससे त्व‍चा को उन हानिकारक रोगाणुओं से बचाया जा सकता है,जो मोबाइल स्क्रीन पर पनपने लगते हैं।

अपनाएं ये घरेलू नुस्खें-
-आंखों के चारों ओर बादाम के तेल से हल्के हाथ से 15 मिनट मालिश करें। इसके बाद कॉटन बॉल को हल्का सा गीला करके उससे आंखों के नीचे पोंछें।
-खीरे के रस के साथ आलू के रस को बराबर मात्रा में मिलाकर अपनी आंखों के नीचे रोजाना 20 मिनट के लिए लगाएं। ऐसा करने से आंखों के नीचे होने वाले काले घेरे कम होते हैं।
-काले धब्बे और डल स्किन को ठीक करने के लिए बादाम को दही और एक चुटकी हल्दी के साथ पीसकर उसका पेस्ट तैयार कर लें। इस पेस्ट को अपने चेहरे और अपनी आंखों के काले धब्बों पर लगाएं। सूखने के बाद इसे साधारण पानी से धो लें।

 

  खाना खजाना / शौर्यप्थ / बात जब तीखे-मसालेदार खाने की हो रही हो तो जेहन में सबसे पहला नाम पंजाबी डिश का ही आता है। जी हां चटपटा खाना खाने के शौकीन लोग अक्सर पंजाबी भोजन काफी पसंद करते हैं, फिर चाहे वो छोले भटूरे हो दाल मखनी। दाल मखनी पंजाब की पसन्दीदा दाल है। मसालेदार ग्रेवी में मक्खनी राजमा जब जुबान पर घुलती है तो आत्मा तृप्त हो जाती है।

पंजाब में दाल मखनी मां दी दाल के नाम से लोकप्रिय है। खाने में स्वादिष्ट होने के साथ इसमें प्रोटीन और फाइबर मौजूद प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। अगर आप भी अपनी पसंदीदा दाल मखनी खाने के लिए रेस्तरां जाते रहे हैं तो अब आपको ऐसा करने की जरूरत नहीं है क्योंकि रेस्तरां स्टाइल दाल मखनी को आप बड़ी आसानी से घर पर भी ट्राई कर सकते हैं। जानें कैसे।

सामग्री-
-राजमा 2 चम्मच (रात भर भिगोकर रखें)
-नमक चुटकी भर
-लाल मिर्च पाउडर 1 चम्मच
-अदरक 2 इंच
-मक्खन 4 चम्मच
-सूरजमुखी का तेल 1 चम्मच
-प्याज 1 बड़ा (बारीक कटा हुआ)
-हरी मिर्च 2
-टमाटर प्यूरी आधा कप
-गर्म मसाला पाउडर 1 चम्मच
-फ्रेश क्रीम आधा कप
-उड़द दाल आधा कप (रात भर भिगोकर रखें)
-अदरक पेस्ट आधा चम्मच
-लहसुन पेस्ट आधा चम्मच

दाल मखनी बनाने की वि​धि-
साबुत उड़द दाल और राजमा को रातभर 3 से 4 कप पानी में भिगोकर रखें।सुबह में दाल से पानी निकालकर इसे 4 कप पानी, नमक और आधा अदरक लहसुन का पेस्ट डालकर करीब 15 मिनट के लिए प्रेशर कुक कर लें।जब स्टीम निकल जाए तो कुकर का ढक्कन खोलकर राजमा को धीमी आंच पर पकाएं जब तक वह नर्म न हो जाए।अब दाल और राजमा के मिक्सचर में क्रीम डालें और थोड़ा सा क्रीम सजाने के लिए रख लें।

अब एक पैन में मक्खन गर्म करें और उसमें बचा हुआ अदरक लहसुन का पेस्ट और प्याज डालें औऱ सुनहरा होने तक फ्राई करें।इसमें हरी मिर्च, टमाटर प्यूरी डालकर लगातर चलाते हुए पकाएं।लाल मिर्च पाउडर डालकर अच्छी तरह से मिलाएं जब तक तेल ऊपर न आ जाए।

अगर दाल बहुत ज्यादा गाढ़ी लग रही हो तो इसमें थोड़ा पानी डाल दें।अब गर्म मसाला पाउडर और नमक डालें और धीमी आंच पर दाल को पकने दें।दाल मखनी तैयार है। ऊपर से थोड़ा सा क्रीम और मक्खन डालकर सजाएं और गर्मा गर्म सर्व करें।

 

खाना खजाना / शौर्यपथ / दाल बाटी राजस्थान का एक तीखा और चटपटा पारंपरिक व्यंजन है। जिसे राजस्थान में खास मौके पर घरों में बनाया जाता है। तीखी दाल के साथ खस्ता बाटी स्वाद में बेहद लाजवाब लगती है। दाल बाटी को गेंहू के आटे और घी के साथ तैयार किया जाता है। राजस्थानी बाटी को बनाना बेहद आसान है। अगर आप भी शाम के नाश्ते में कुछ चटपटा तीखा बनाने की सोच रही हैं तो ये रेसिपी आपके लिए बिल्कुल परफेक्ट है। आइए जानते हैं इस रेसिपी को बनाने का क्या है आसान और पारंपरिक तरीका।

सामग्री-
गेंहू का आटा 2 कप
घी आधा कप
अजवाइन 1 चम्मच
बेकिंग पाउडर 4 चुटकी
नमक 2 चुटकी

वि​धि-
इस राजस्थानी पारंपरिक डिश को बनाने के लिए सबसे पहले एक बर्तन में गेंहू का आटा लें। अब इस आटे में बेकिंग पाउडर,चुटकी भर नमक ,6 चम्मच घी और ब्रेड क्रम्स डालकर सभी चीजें अच्छे से मिला लें। अब आटे में अजवाइन और आधा कप पानी डालकर थोड़ा कड़ा आटा गूंद लें।अब आटे की छोटी-छोटी लोईयां बनाकर उसे बेकिंग ट्रे पर रखें।

200 डिग्री सेल्सियस पर प्री-हीटेड अवन में बाटी वाली ट्रे को रख दें और करीब 12 से 15 मिनट के लिए बेक करें। बाटी का रंग सुनहरा भूरा हो जाना चाहिए।इसके बाद बाटी को फिर से 15 से 30 मिनट के लिए कम टेंपरेचर पर बेक करें ताकि वह पूरी तरह से पककर क्रिस्पी भी हो जाए।जब बाटी पूरी तरह से पक जाए तो उसे अवन से निकालकर घी में 30 से 40 मिनट के लिए डाल दें। अब बाटी को घी से निकालकर दाल और चूरमा के साथ सर्व करें।

 

धर्म संसार / शौर्यपथ / भगवान जगन्नाथ और उनके दिव्य भाई-बहन के रथों के लौटने का उत्सव (बहुड़ा यात्रा) कड़ी सुरक्षा एवं कर्फ्यू के बीच श्रद्धालुओं के बिना बुधवार को शुरू हुआ। उल्लेखनीय है कि कोविड-19 महामारी के मद्देनजर यह समुद्र तटीय तीर्थ नगरी बंद है।

भगवान जगन्नाथ, उनके बड़े भाई भगवान बलभद्र और उनकी बहन देवी सुभद्रा के रथों के 12 वीं सदी के मंदिर लौटने की यात्रा शुरू होने के चलते प्रशासन ने लोगों से घरों पर ही रहने और टीवी पर इस धार्मिक रस्म को देखने की अपील की है। विश्व प्रसिद्ध रथ यात्रा 23 जून को शुरू हुई थी। इस बार यह श्रद्धालुओं की उपस्थिति के बिना ही आयोजित की जा रही है, क्योंकि उच्चतम न्यायालय ने 22 जून को सिर्फ पुरी में इसकी अनुमति तो दे दी थी लेकिन साथ में यह शर्त भी लगा दी कि इसमें सीमित संख्या में सेवादार शामिल होंगे और कोई भीड़ नहीं लगनी चाहिए। तीनों देवी-देवता अपनी वार्षिक नौ दिनों की यात्रा श्री गुंडीचा मंदिर में संपन्न करेंगे, जो उनका जन्म स्थान है। वे अब बहुड़ा यात्रा के दौरान लकड़ी से बने रथों पर अभी श्री मंदिर या श्री जगन्नाथ मंदिर लौट रहे हैं।

   शौर्यपथ / काशी के दशाश्वमेध घाट पर होने वाली दैनिक गंगा आरती की भव्यता और यहां होने वाली भीड़ दुनिया में चर्चित है। अनलॉक टू में गंगा आरती पूरी दुनिया में लाइव दिखने जा रही है। आयोजक संस्था-https://www.gangasevanidhi.org/ की वेबसाइट से इसे ऑनलाइन किया जाएगा। प्रसारण का ऑनलाइन ट्रायल मंगलवार को हुआ।

संस्था के अध्यक्ष सुशांत मिश्र ने कहा कि गत 18 मार्च से सात की जगह सिर्फ एक ब्राह्मण से गंगा पूजन और आरती की परंपरा का निर्वाह हो रहा है। आने वाले दिनों में दैनिक गंगा आरती में आस्था रखने वालों को घाट पर मौजूद होने की अनुभूति कराने के लिए आरती का प्रसारण छह अलग-अलग कोणों से एक साथ होगा। लाइव के लिए संस्था की वेवसाइट में कुछ बदलाव हो रहे हैं। संस्था की साइट के लिंक से लोग फेसबुक, इंस्टाग्राम पर भी लाइव आरती देख सकेंगे।

गंगोत्री सेवा समिति भी तैयारी में
माता शीतला मंदिर के सानिध्य में दशाश्वमेध घाट पर गंगोत्री सेवा समिति की ओर से होने वाली दैनिक गंगा आरती को भी लाइव करने की तैयारी है। संस्था के संस्थापक अध्यक्ष पं. किशोरी रमण दुबे (बाबू महाराज) ने बताया कि आरती के डिजिटल संस्करण की तैयारी की जा रही है।

काशी में दैनिक गंगा आरती
काशी में दैनिक गंगा आरती का क्रम बहुत पुराना है। गंगा महासभा की ओर से काशी में 1970 तक दैनिक गंगा आरती कराई जाती रही। बीच में यह क्रम बाधित हो गया। 13 नवंबर-1997 को बाबू महाराज और मुन्नन मिश्रा ने मिलकर पुन: भव्य तरीके से गंगा आरती की शुरुआत गंगोत्री सेवा समिति के बैनर तले की। कुछ समय बाद मुन्नन महाराज ने घाट के दूसरे हिस्से में गंगा सेवा निधि की ओर से आरती शुरू कराई।

 

नजरिया / शौर्यपथ / बिजली गिरने या वज्रपात की परिस्थिति सामान्यत: दक्षिण-पश्चिमी मानसून के पहले दौर और उत्तराद्र्ध में बहुतायत में बनती है, किंतु पूरे मानसून के दौरान वज्रपात की आशंका बन सकती है। पश्चिमी विक्षोभ की विशेष परिस्थितियों में यह घटना ठंड के मौसम (नवंबर से मार्च) में भी कुछ जगहों में हो सकती है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, पश्चिमी और मध्य भारत में वज्रपात का प्रकोप अधिक है। पूरे देश में 12 ऐसे राज्यों की पहचान की गई है, जहां वज्रपात की घटनाएं सबसे अधिक होती हैं। इनमें मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, झारखंड, छत्तीसगढ़ और ओडिशा प्रमुख हैं।
अभी मानसून की शुरुआत ही हुई कि बिहार और उत्तर प्रदेश में वज्रपात का कहर टूट पड़ा। दोनों प्रदेशों में ऐसी घटनाओं की निगरानी के लिए ‘भारत मौसम विज्ञान विभाग’ ने उन्नत किस्म के यंत्र इन प्रदेशों की राजधानियों में लगा रखे हैं और करीब ढाई से तीन घंटे पूर्व यह ऐसी घटनाओं की जानकारी संबंधित राज्य सरकारों को उपलब्ध कराता है। इस सबके बावजूद इस प्रकार की घटनाओं का होना दुखद है और दर्शाता है कि वज्रपात से होने वाली क्षति से बचने के प्रबंधन में कहीं न कहीं कमी हो रही है। वास्तव में, इस क्षेत्र में ज्यादा काम हुआ ही नहीं है। वज्रपात से खतरा सामान्यत: खुले में, पानी से भरे खेतों में काम करने वाले किसानों, मजदूरों, लंबे पेड़ों के नीचे शरण लिए लोगों को ज्यादा होता है। अत: अगर आपको वज्रपात करने वाले बादलों की सही समय पर जानकारी मिल जाए और आस-पास के किसी पक्के घर में चले जाएं, तो आप सुरक्षित रह सकते हैं।
वज्रपात कर सकने वाले बदलों का आधार काफी गहरे काले रंग का होता है। बादलों की ऊपरी सतह समतल होती है। ऐसे बादलों के अंदर से रुक-रुककर बिजली के चमकने से एक लंबी लकीर जैसी बनती रहती है तथा गर्जना की आवाज आती रहती है। बिजली की चमक और आवाज के बीच के अंतराल को मापकर बादल की दूरी ज्ञात की जा सकती है। जैसे, अगर अंतराल 18 सेकंड है, तो बादल की दूरी (18/3=6) छह किलोमीटर है, अगर अंतराल 30 सेकंड है, तो बादल की दूरी (30/3=10) दस किलोमीटर होगी। अत: प्रत्येक तीन सेकंड के अंतराल की दूरी करीब एक किलोमीटर होगी। वज्रपात के समय पैदा चमक की लंबाई औसतन छह मील के करीब होती है। ऐसे बादल करीब 10 किलोमीटर की दूरी तक प्रभाव डाल सकते हैं। अगर इस प्रकार का बादल पास है और आप घर से बाहर खुली जगह पर हैं, तो आस-पास के घर में जाकर खुद को सुरक्षित कर सकते हैं, क्योंकि वज्रपात से बचने हेतु सबसे सुरक्षित स्थान घर ही होता है।
मौसम विभाग ने लखनऊ और पटना में जो रडार लगा रखे हैं, वे करीब 200-300 किलोमीटर की दूरी से ही वज्रपात वाले बादलों को चिन्हित कर सूचना दे सकतन इलाकों में ज्यादा वज्रपात होते हैं, उनमें विशेष चेतावनी और विशेष टावर निर्माण जैसे उपाय किए जा सकते हैं। तात्कालिक जरूरत को देखते हुए लोगों को अलर्ट करने हेतु सभी ग्राम पंचायतों में लोकल हूटर का प्रबंध किया जा सकता है। लोगों की जान बचाने के लिए अगर पूरे जिले में एक-दो घंटे काम बंद रहता है, तो कोई हर्ज नहीं है।
मानसून सीजन के शुरू होते ही भारी वर्षा की वजह से वज्रपात की समस्या के अलावा बाढ़ की समस्या भी बढ़ जाती है। अभी मानसून के शुरू होते ही पूर्वोत्तर राज्यों, खासकर असम और पूर्वी बिहार जलभराव या बाढ़ की समस्या से जूझने लगे हैं, जिससे करीब 10 लाख लोगों के प्रभावित होने तथा करीब 15 लोगों के मारे जाने की खबर है। यह समस्या आने वाले दिनों दिनों में निश्चित तौर पर बढ़ेगी।
अत्यधिक वर्षा की समस्या वायु प्रदूषण, पेड़ों को काटे जाने, भूमि के उपयोग में परिवर्तन की वजह से हो रहे जलवायु परिवर्तन से जुड़ी हुई है। ऐसी घटनाएं पिछले दशकों में काफी बढ़ी हैं। मौसम विभाग एक से पांच दिन पहले ही भविष्यवाणी करने की क्षमता रखता है। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग का तंत्र पूरे देश में फैला है। यह लोगों की भी जिम्मेदारी है कि आपदा के समय चेतावनियों पर विशेष ध्यान दें। सतर्क रहने के साथ ही बचाव के तमाम जरूरी इंतजामों पर भी ध्यान देना चाहिए।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)अतींद्र कुमार शुक्ला, मौसम विज्ञानी

 

 

सम्पादकीय लेख / शौर्यपथ / लद्दाख सीमा पर भारत और चीन के बीच जो समस्या खड़ी हुई है, उसके फौरी निदान की कोशिशें जारी हैं, मगर इससे इतर भी कई मोर्चे हैं, जिन पर दोनों देशों के बीच तल्खियां बढ़ सकती हैं। डिजिटल क्षेत्र में 59 चीनी एप को प्रतिबंधित करके नई दिल्ली ने बीजिंग को यह साफ कर दिया है कि अब वह उससे बहुत सदाशयता की उम्मीद न रखे। इस बीच एक खबर यह आ रही है कि चीनी कंपनियां तीसरी पार्टी के जरिए भारतीय बाजार में अपना निवेश और उत्पादों का प्रवाह बढ़ाने में जुटी हैं। और इसके लिए वे सिंगापुर व हांगकांग जैसे देशों के व्यापारिक-मार्ग का इस्तेमाल कर रही हैं। जाहिर है, इन देशों के साथ हमारा मुक्त व्यापार समझौता है और इसके अलावा भी अनेक द्विपक्षीय करार हैं। यदि ऐसा है, तो यह न सिर्फ अवैध कारोबार है, बल्कि यह हमारे घरेलू उद्योगों के हितों को नुकसान पहुंचाने वाली धूर्तता है।
फेडरेशन ऑफ इंंडियन एक्सपोर्ट ऑर्गेनाइजेशन्स के आंकडे़ भी इस बात के साफ संकेत दे रहे हैं। इसके मुताबिक, पिछले साल चीन के साथ अपने व्यापार घाटे को भारत ने जितना पाटा था, लगभग उतना ही हांगकांग के साथ उसका व्यापार घाटा बढ़ गया। यानी भारत का सारा लाभ शून्य हो गया। सिंगापुर के मामले में भी आंकडे़ ऐसे ही इशारे कर रहे हैं। उम्मीद है, वाणिज्य मंत्रालय नई पृष्ठभूमि में इसका संज्ञान लेगा और सरकार समुचित कार्रवाई करेगी। यह कोई ढकी-छिपी बात नहीं है कि पिछले कई वर्षों से दुनिया के बड़े बाजारों पर कब्जा करने के लिए चीन हर मुमकिन कोशिश कर रहा है। एशिया और अफ्रीका के छोटे-छोटे देशों को बड़े कर्ज देकर या तरह-तरह की परियोजनाओं में निवेश के जरिए वह पहले ही अपना आर्थिक उपनिवेश बना चुका है, पर बडे़ बाजारों में उसकी दाल नहीं गल रही। अमेरिका ने ‘टैरिफ-वॉर’ छेड़कर उसे काफी हद तक झुकने को बाध्य भी किया है। ऐसे में, भारतीय बाजार में यदि चीन चोर दरवाजे से घुसने में कामयाब हुआ, तो हमारे घरेलू उद्योग-धंधों को वह काफी आघात पहुंचा सकता है। खासकर लघु एवं मध्यम श्रेणी के उद्योगों के लिए उसके उत्पादों का सामना करना असंभव हो जाएगा। बडे़ पैमाने पर रोजगार पैदा करने की चुनौती झेल रहा देश इस स्थिति से निपटने के लिए तैयार नहीं है।
अंतरराष्ट्रीय राजनय के अपने तकाजे होते हैं। हम कई बार मित्र देश के साथ भी कुछ मसलों पर इत्तफाक नहीं रखते और अपनी अलग राह चुनते हैं। चीन पड़ोसी है, मित्र देश नहीं। वह हमारे लिए लगातार चुनौतियां खड़ी कर रहा है। न सिर्फ वैश्विक मंचों पर, बल्कि प्रकारांतर से करीबी पड़ोसियों के मामले में भी। अब हमारे आर्थिक हितों को चोर दरवाजे से नुकसान पहुंचाने की बातें आ रही हैं। इसलिए वक्त आ गया है कि उससे जुड़े तमाम मोर्चों पर पैनी निगाह रखने और त्वरित फैसले में समर्थ एक मुकम्मल विंग का गठन किया जाए। भौगोलिक सीमाओं के अलावा डिजिटल दुनिया व अन्य आर्थिक क्षेत्रों में भी बेकाबू हो रही चीनी महत्वाकांक्षाओं को लगाम लगाने का यही सबसे मुफीद वक्त है। चीन के साथ अपने व्यापार घाटे को कम करने की कवायदों को गति देने के अलावा हमें उन छिद्रों को भी बंद करने की जरूरत है, जिधर से हमारे हितों को हानि पहुंच रही है। बीजिंग को समझना ही होगा कि भारत अब उसके किसी छल का शिकार नहीं बन सकता।

 

मेलबॉक्स / शौर्यपथ / आज की युवा पीढ़ी काफी ऊर्जावान है। वह न केवल सपने देखती है, बल्कि उनको पूरा करने का हौसला भी रखती है। मगर दुख की बात यह है कि वह बहुत जल्दी विफलताओं के आगे घुटने टेक देती है और अपना जीवन खत्म कर लेती है। नौजवानों को समझना चाहिए कि विफलता तो सफलता की पहली सीढ़ी है। जीवन रहेगा, तो उन्नति के अवसर भी मिलेंगे। जिस प्रकार चलते-चलते थकने पर हम विश्राम कर लेते हैं और फिर नई ऊर्जा के साथ चलना आरंभ करते हैं, उसी प्रकार असफलता भी इंसान के जीवन का विश्राम है, अंत नहीं। आज के महानायक ने भी लगातार अपनी ग्यारह फिल्मों की असफल वैतरणी को पार किया है। बस, हमें खुद पर विश्वास रखकर सब्र और धैर्य के साथ बुरे वक्त के गुजरने का इंतजार करना चाहिए। सामने आई मुश्किलों का हंसकर स्वागत करना ही जीवन है।
विभा गुप्ता, बेंगलुरु

रोकना होगा विस्तार
वैश्विक स्तर पर आज चीन जिस गति से विस्तार कर रहा है, उससे दुनिया परेशान है। भारत, ऑस्ट्रेलिया, वियतनाम, जापान, अमेरिका जैसे देश अब गंभीरता से उसकी नीतियों के विरुद्ध एकजुट हो रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय व्यापार में चीन ने जो दबदबा हासिल कर लिया है, वह अन्य देशों की संप्रभुता और निजता के लिए खतरा बनकर उभरा है। आज कई देशों के बाजार पर चीन का कब्जा है। चिंता की बात यह भी है कि कई देशों की अर्थव्यवस्था पूरी तरह से चीन पर निर्भर हो गई है। ऐसे में, चीन की चुनौतियों का मिलकर मुकाबला करना होगा। समय रहते अगर उसकी चाल पर लगाम नहीं लगाई गई, तो दुनिया गहरे संकट में फंस सकती है।
रोहित गुप्ता, मयूर विहार, दिल्ली

घरेलू कामगारों का दर्द
बेशक हम अनलॉक-2 में अब प्रवेश कर चुके हैं। रोज कमाने-खाने वाले लोगों की जिंदगी पटरी पर आने लगी है। ज्यादातर मजदूर अपने कामों पर लौट चुके हैं। मगर अब भी कुछ वर्ग ऐसे हैं, जिनकी मुसीबतें कम नहीं हुई हैं। जैसे, घरों में काम करने वाले कामगार। इन्हें अब भी लोग बुलाने से हिचक रहे हैं। लोगों में अब भी उनको लेकर डर पसरा हुआ है। इसलिए घरेलू कामगार काफी तंगी से जूझ रहे हैं। जहां वे पहले औसतन चार-पांच घरों में काम करके गुजारा कर लिया करते थे, आज उन्हें दोनों वक्त का खाना भी बमुश्किल नसीब हो पा रहा है। लोगों को सतर्कता और सावधानी बरतते हुए इन लोगों को भी काम पर बुला लेना चाहिए। कोरोना से बचना आवश्यक है, पर कोई जान-बूझकर यह बीमारी नहीं फैलाता।
अंकिता प्रकाश, रुड़की

अपनी-अपनी राजनीति
प्रधानमंत्री के संबोधन से अपेक्षा थी कि वह कोरोना के कारण आए संकट और सीमा पर बढ़ते तनाव से निपटने में सरकार के प्रयासों की जानकारियां साझा करेंगे, परंतु उनका पूरा भाषण पीएम गरीब कल्याण योजना नवंबर तक बढ़ाने और जन-धन खातों में नकदी जमा कराने तक सीमित रहा। दूसरी ओर, राहुल गांधी कह रहे हैं कि सरकार के पास धन की कोई कमी नहीं है, गरीबों को कमाने की जरूरत नहीं होगी, यदि उनके खाते में प्रतिमाह 7.5 हजार रुपये जमा कराए जाएं। मगर जहां-जहां कांग्रेस सत्ता में है, वहां भी राहुल ऐसी योजना शायद ही लागू करा पाए हैं। हालांकि इसमें यह सवाल शेष रह गया कि शेष 30 करोड़ राशनकार्ड विहीन लोगों और ईमानदार करदाताओं ने आखिर कौन सा गुनाह किया है कि उन्हें इस तरह के लाभों से वंचित कर दिया गया है? यदि सरकारों के पास पैसे हैं, तो आधारभूत ढांचे के निर्माण, राष्ट्र के सशक्तीकरण, विकास-कार्य आदि तेज गति से चलाए जाने चाहिए। क्या यह वक्त नीतियों को बदलने का नहीं है?
राधेश्याम ताम्बटकर, इंदौर, मध्य प्रदेश

 

ओपिनियन / शौर्यपथ / पूर्वी लद्दाख में भारत और चीन के सैनिकों में हुए ताजा संघर्ष और पहले के तनावों में अंतर यह है कि इस बार पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए), यानी चीन की फौज पूरी तैयारी के साथ आई है। पीएलए की कई डिवीजन नजदीकी इलाकों में तैनात हैं, साथ ही भारत-चीन सीमा क्षेत्रों में भी एक-दूसरे के करीब बड़ी संख्या में फौजी डटे हुए हैं। भारतीय सेना ने भी इलाके में और वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) के आसपास समान तैयारी कर रखी है। जिस तरह से यहां सैनिकों का भारी जमावड़ा किया गया है और असलहा व तोप मंगवाए जाने की खबरें हैं, उसे देखकर स्पष्ट है कि पीएलए ने पूरी तैयारी और योजना के साथ इस खूनी संघर्ष को अंजाम दिया है। इसका मकसद चीनी सैनिकों का उस सीमा-रेखा की तरफ बढ़कर जमीन हथियाना है, जिसे वे वास्तविक नियंत्रण रेखा कहते हैं।
ऐसा करके चीन दरअसल, भारत के साथ किसी भी तरह की द्विपक्षीय बातचीत के बिना वास्तविक नियंत्रण रेखा का एकतरफा निर्धारण का प्रयास कर रहा है। इससे वह अपनी सीमा तय कर सकेगा और उस पर नियंत्रण की तरफ अपने कदम बढ़ाएगा। मगर भारतीय सेना ने चीनी सैनिकों को रोक दिया है और भारतीय क्षेत्र की अखंडता बनाए रखने के लिए मुस्तैद हो गई है। नतीजतन, इस संघर्ष से पीएलए को जो तमगा हासिल हुआ, वह यह कि सीमावर्ती क्षेत्रों में शांति व स्थिरता बनाए रखने के लिए पिछले 25 वर्षों में मजबूत किए गए तमाम सिद्धांतों, मानदंडों व मानक-प्रक्रियाओं का उसने उल्लंघन कर दिया। उसने यह साबित कर दिया है कि खुद उसकी सरकार द्वारा हस्ताक्षरित समझौतों के प्रति उसका क्या नजरिया है?
कूटनीतिक रूप से भारत और बाकी दुनिया को चीन यह संकेत दे रहा है कि वह एशिया की सबसे बड़ी शक्ति है और अपनी मनमर्जी से कुछ भी कर सकता है, फिर चाहे वह दक्षिण चीन सागर में हो या भारत-चीन सीमा पर। वह चाहता है कि भारत यह समझे और स्वीकार करे कि चीन की समग्र राष्ट्रीय ताकत उससे कहीं अधिक है और नई दिल्ली को एशिया में उसकी सर्वोच्चता मान लेनी चाहिए, लिहाजा उसे पीछे हट जाना चाहिए। उसके मुताबिक, भारत को यह भी समझ लेना चाहिए कि 21वीं सदी एशिया की नहीं, बल्कि चीन की है।
मगर पूर्वी लद्दाख में भारतीय सैनिकों द्वारा की गई जवाबी कार्रवाई से चीन को यह संदेश साफ-साफ मिल गया है कि भारत उसके आधिपत्य को स्वीकार नहीं करता और उसकी उकसाने वाली कार्रवाइयों को बर्दाश्त नहीं करेगा। नई दिल्ली अपनी स्थिति से कतई समझौता नहीं करेगी। हमारे देश के बहादुर सैनिकों ने 15 जून की रात गलवान घाटी में ठीक यही किया। यहां पर हमें यह भी याद रखना चाहिए कि बाकी दुनिया साफ-साफ देख रही है। यहां पर चीन ने चुनौती दी है, जिसको भारत ने स्वीकार किया है।
फौज भेजने का सीधा संकेत है कि हम चीन का मुकाबला करने और भारत सहित अन्य राष्ट्रों पर धौंस जमाने के उसके आक्रामक तरीकों का विरोध करने के लिए तैयार हैं। भारत और चीन का रिश्ता अब पहले की तरह आगे नहीं बढ़ सकता। पुरानी लकीर अब व्यवहार में नहीं लाई जा सकती है। क्यों? अगर भारत सरकार को ऐसा ही करना होता, तो वह अपनी सैन्य कार्रवाई का खंडन कर रही होती। इसीलिए भारत को नीतिगत फैसलों के माध्यम से अपने सैन्य संदेश को मजबूत करने और दोहराने की जरूरत है, जो आगे चलकर इस राष्ट्रीय सहमति को स्पष्ट करेगा कि हमें चीन का बड़े भाई जैसा रवैया पसंद नहीं है। इसी वजह से भारत को ऐसे संकेत देने होंगे कि यदि सीमा पर शांति नहीं होती है, तो चीन के साथ सामरिक के अलावा अन्य रिश्ते भी नकारात्मक रूप से प्रभावित होंगे। इस संदेश को स्पष्ट तौर पर दिखाने के लिए हमें अपनी चीन-नीति का फिर से मूल्यांकन करना होगा।
इसी दिशा में हमारा पहला कदम था 59 चीनी एप पर पाबंदी। भारत ने तो सिर्फ शुरुआत की है। देश में 5-जी तकनीक के परीक्षण और उसे लागू करने की प्रक्रिया से चीन की कंपनियों को राष्ट्रीय सुरक्षा के आधार पर प्रतिबंधित करना नई दिल्ली की इस सोच को और मजबूत करेगा।
चीन की कार्रवाइयों का एक जवाब यह भी हो सकता है कि भारत अपने रिश्ते अमेरिका, जापान, फ्रांस, दक्षिण कोरिया और संभवत: इंडोनेशिया जैसे लोकतंत्रों के साथ मजबूत बनाए। भारत को ताइवान के साथ भी अब अपने संबंधों को विस्तार देना चाहिए। दिल्ली अपनी चीन-नीति संयत होकर तैयार करे। बिना सोचे-समझे प्रतिक्रिया जाहिर करने की कतई जरूरत नहीं है। अपने तमाम विकल्पों पर व्यापक विचार-विमर्श के बाद ही हमें आगे बढ़ना चाहिए। मगर हां, इसकी समय-सीमा तय होनी चाहिए। नई नीति इसी साल लागू हो जानी चाहिए।
विशेषकर आर्थिक क्षेत्र में भारत की नई चीन-नीति खुद को कुछ दर्द दिए बिना तैयार नहीं की जा सकती है। हालांकि, जब हमने यह तय कर लिया है कि चीन को सख्त संदेश देने की जरूरत है, तो हमें कष्ट सहने के लिए भी तैयार रहना होगा। भारतीय सैनिकों ने ऐसा ही सीमाओं पर किया है, और अब आम भारतीयों के लिए यह दिखाने का वक्त आ गया है कि वे भी ऐसा करने के लिए तैयार हैं। यह कष्ट कई रूपों में मिल सकता है- कुछ उत्पादों की उपभोक्ता कीमतें बढ़ सकती हैं, कुछ कंपनियों के मुनाफे घट सकते हैं, तो कुछ कारोबारियों के राजस्व में कमी आ सकती है। अगर हम खुद के मजबूत व एकजुट होने का संदेश देना चाहते हैं, जिसे चीन ने समझने में गलती की है, तो हमें इस तरह के दर्द सहने ही होंगे। भारत को अपना यह चरित्र पूरी मजबूती से चीन के सामने रखना ही होगा कि हम लकीर के फकीर नहीं हैं।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)गौतम बम्बावाले, चीन में नियुक्त रहे भारतीय राजदूत

 

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