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May 31, 2026
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लाइफस्टाइल /शौर्यपथ / कड़ी मेहनत के बावजूद भी अगर सफलता का रास्ता आपको कोसों दूर लग रहा हैं, जिसकी वजह से आपके भीतर छिपा आत्मविश्वास कम होने लगा है तो घबराइए मत बस जीवन में कामयाबी हासिल करने के लिए अपनाएं ये 5 सक्सेस मंत्र।

असफल होने से न डरें-
कई बार जीवन में मिलने वाली असफलता व्यक्ति का मनोबल तोड़कर रख देती है। ऐसे में सफलता हासिल करने के लिए जरूरी है सबसे पहले अपने मन से खुद के असफल होने का डर निकाल दीजिए। असफलता का डर ही व्यक्ति को कड़ी मेहनत के बावजूद सफलता के शिखर पर नहीं पहुंचने देता है।

लोगों से बढ़ाएं संपर्क-
जीवन में वही व्यक्ति सफल होता है जो मेहनत के साथ-साथ लोगों के साथ अपने संपर्क भी मधुर बनाए रखता है। ऐसा करने से उसे विभिन्न बातों के बारे में जानकारी सहज रूप से प्राप्त हो जाती है जो उसे उसके लक्ष्य तक पहुंचने में उसकी मदद करती है।

प्रतिस्पर्धा के लिए हमेशा रहें तैयार-
सफल होने के लिए व्यक्ति को हमेशा प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार रहना चाहिए। इसके अलावा हमेशा अपने कॉम्पिटिटर से भी नई-नई चीजें सीखने की कोशिश करनी चाहिए। वह किस तरह सफल हो रहे हैं, इस बात से इंस्प्रेशन लें ताकि भविष्य में जरूरत पड़ने पर आप भी उसी युक्ति से जीवन में सफलता हासिल कर सकें।

जीवन में बनाएं अपने खुद के नियम-
पर्सनल लाइफ हो या प्रोफेशनल, हर व्यक्ति को जीवन में अपना लक्ष्य हासिल करने के लिए कुछ उसूल जरूर बनाने चाहिए। ऐसा करने से व्यक्ति अनुशासन से बंधा रहता है जो उसे सफलता की सीढ़ी चढ़ने में मदद करता है।

निरन्तर करें प्रयास-
हर महान व्यक्ति ने जीवन में सफलता हासिल करने के लिए कठिन परिश्रम का ही सहारा लिया है। सफल होने के लिए व्यक्ति को अपने पहले प्रयास में की गई गलती को खोजना चाहिए। उस गलती को सुधारने की कोशिश करें। धीरे-धीरे सफलता के रास्ते की बाधा बनने वाली आपकी सारी कमियां दूर हो जाएंगी।

 

धर्म संसार / शौर्यपथ / हमारे देश में देवी को प्रसन्न करने के लिए अनेक व्रत और त्योहार मनाए जाते हैं। नवरात्र भी इनमें से एक है, लेकिन ज्यातादर लोग सिर्फ दो नवरात्र (चैत्र व शारदीय नवरात्र) के बारे में ही जानते हैं। बहुत कम लोग ही यह जानते हैं कि एक वर्ष में चार नवरात्र आते हैं। चैत्र और आश्विन मास के नवरात्र सामान्य रहते हैं, जबिक माघ और आषाढ़ मास के नवरात्र गुप्त रहते हैं। गुप्त नवरात्र में विशेष रूप से तंत्र-मंत्र से संबंधित उपासना की जाती है।

आषाढ़ मास के गुप्त नवरात्र 22 से 29 जून तक रहेंगे। पंडित राजकुमार शास्त्री के अनुसार इन दिनों दस महाविद्याओं की आराधना की जाती है। ये दस महाविद्याएं हैं- काली, तारा देवी, त्रिपुर-सुंदरी, भुवनेश्वरी, छिन्नमस्ता, त्रिपुरी भैरवी, मां धूमावती, मां बगलामुखी, मातंगी व कमला देवी। महाविद्याओं की पूजा पूरे विधि-विधान के साथ ही की जानी चाहिए, अन्यथा पूजा का विपरीत असर भी हो सकता है। इसीलिए किसी योग्य ब्राह्मण के मार्गदर्शन में ही गुप्त नवरात्र की पूजा करनी चाहिए।

गुप्त नवरात्र का महत्व
आपको जानकर आश्चर्य होगा कि गुप्त नवरात्र का महत्व प्रकट नवरात्र से अधिक होता है। ये नवरात्र साधकों के लिए खास होते हैं। इन समय साधक को सिद्धिया मिलती हैं। इन नवरात्रों में दस महाविद्याओं की साधना करके साधक मनोवांछित फल पा सकते हैं।

गुप्त नवरात्र में संहारकर्ता देवी-देवताओं के गणों एवं गणिकाओं अर्थात भूत-प्रेत, पिशाच, बैताल, डाकिनी, शाकिनी, खण्डगी, शूलनी, शववाहनी, शवरूढ़ा आदि की साधना की जाती है। ऐसी साधनाएं शाक्त मतानुसार शीघ्र ही सफल होती हैं। दक्षिणी साधना, योगिनी साधना, भैरवी साधना के साथ पंच मकार (मद्य, मछली, मुद्रा, मैथुन, मांस) की साधना भी इसी नवरात्र में की जाती है।

गुप्त नवरात्र में दुर्गा सप्तशती का पाठ
नवरात्र के दौरान श्री दुर्गा सप्तशती के पाठ को अत्‍यधिक महत्‍वपूर्ण माना गया है। इस दुर्गा सप्‍तशती को ही शतचण्डि, नवचण्डि अथवा चण्डि पाठ भी कहते हैं और रामायण के दौरान लंका पर चढ़ाई करने से पहले भगवान श्रीराम ने इसी चंडी पाठ का आयोजन किया था, जो कि शारदीय नवरात्र के रूप में आश्विन मास की शुक्‍ल पक्ष की प्रतिपदा से नवमी तिथि तक रहती है।

इसीलिए नवरात्र के दौरान नव दुर्गा के नौ रूपों का ध्‍यान, उपासना व आराधना की जाती है तथा नवरात्र के प्रत्‍येक दिन मां दुर्गा के एक-एक शक्ति रूप का पूजन किया जाता है। ब्रह्मदेव ने कहा कि जो मनुष्‍य दुर्गा सप्तशती का पाठ करेगा उसे सुख मिलेगा।

तांत्रिक क्रिया के लिए उपयुक्त समय
आम नवरात्र में सात्विक और तांत्रिक दोनों तरह की पूजा होती है लेकिन गुप्त नवरात्र में अधिकतर तांत्रिक पूजा होती है। तांत्रिक सिद्धियां पाने के लिए यह एक अच्छा अवसर है। इसके लिए किसी सूनसान जगह पर जाकर दस महाविद्याओं की साधना करें। नवरात्र तक माता के मंत्र का 108 बार जाप भी करें। यही नहीं सिद्धिकुंजिकास्तोत्र का 18 बार पाठ करें।. ब्रम्ह मुहूर्त में श्रीरामरक्षास्तोत्र का पाठ आपको दैहिक, दैविक और भौतिक तापों से मुक्त करता है।

इन बातों का रखें ध्यान:

सर्वप्रथम एक स्वच्छ स्थान चुनकर देवी की स्थापना करें। स्थान ऐसा हो, जहां किसी का आना जाना न हो।
स्वयं के साथ घर-परिवार में भी तामसिक भोजन का उपयोग न करें। किसी भी स्त्री को देवी के रूप में ही देखें।
अच्छे परिणाम के लिए गुप्त नवरात्र में साधना की गोपनीयता अनिवार्य है। जो साधना कर रहा हो और जो (ब्राह्मण) साधना करा रहा हो को ही यह बात हो तो अतिउत्तम है।
साधना के समय पूजा सामग्री का विशेष तौर पर ध्यान रखें, कुछ भी कम या छूटे नहीं।
गुप्त नवरात्र तांत्रिक साधनाएं करने के लिए जाना जाता है। इस साधना से देवी प्रसन्न होती हैं तथा मनचाहा वर देती हैं।

  रायपुर / शौर्यपथ / छत्तीसगढ़ शासन द्वारा शिक्षण सत्र 2020-21 में प्रयास आवासीय विद्यालय में कक्षा 9वीं में और एकलव्य आदर्श आवासीय विद्यालयों में कक्षा 6वीं में प्रवेश के लिए चयन परीक्षा की तिथियों में संशोधन किया गया है। संशोधित कार्यक्रम के अनुसार प्रयास आवासीय विद्यालयों के कक्षा 9वीं में प्रवेश के लिए परीक्षा 14 जुलाई को सुबह 10.30 से 1.00 बजे तक आयोजित की जाएगी। इसी प्रकार एकलव्य आदर्श आवासीय विद्यालयों में कक्षा 6वीं में प्रवेश हेतु चयन परीक्षा संशोधित तिथि के अनुसार 16 जुलाई को प्रातः 10.30 से 12.30 बजे तक आयोजित होगी। 
    राज्य शासन के आदिम जाति तथा अनुसूचित जनजाति विकास विभाग द्वारा इस संबंध में सभी जिलों के सहायक आयुक्तों को प्रवेश हेतु चयन परीक्षा के संशोधित कार्यक्रम के अनुसार व्यवस्था सुनिश्चित करते हुए व्यापक प्रचार-प्रसार करने के निर्देश दिए है। उल्लेखनीय है कि प्रयास आवसीय विद्यालयों में प्रवेश के लिए पूर्व में चयन परीक्षा 24 जून को और एकलव्य आदर्श आवासीय विद्यालयों में प्रवेश हेतु चयन परीक्षा 26 जून को होनी थी। इन परीक्षाओं की तिथियों में संशोधन किया गया है। अब संशोधित कार्यक्रम के अनुसार प्रयास आवासीय विद्यालय में प्रवेश हेतु चयन परीक्षा 14 जुलाई को और एकलव्य आदर्श आवासीय विद्यालय में प्रवेश हेतु चयन परीक्षा 16 जुलाई को निर्धारित की गई है।  

   रायपुर / शौर्यपथ /  खाद्य एवं संस्कृति मंत्री  अमरजीत भगत ने आज सीतापुर विकासखंड के ग्राम पंचायत धरमपुर में वन विभाग के उच्च तकनीक रोपणी का शिलान्यास किया। वन विभाग द्वारा धरमपुर में करीब 5 हेक्टेयर क्षेत्र में कैम्पा योजना के तहत उन्नत तकनीक रोपणी विकसित किया जाएगा। पौधों की रोपणी उन्नत तकनीक से होगी जिससे पौधे स्वस्थ एवं उन्नत होंगे। इस मौक पर मंत्री भगत ने कहा कि जीवन के लिए पेड़ और जंगलों का होना बहुत जरुरी है। पेड़ से हमें जीवन दायनी ऑक्सीजन मिलती है। ऑक्सीजन की कमी न हो इसके लिए अब शहरों में ऑक्सीजोन बनाकर पेड़ों को सहेजने का काम किया जा रहा है। गांव में अभी ऐसी स्थिति नही आई है। लेकिन जंगलों को नही बचाएंगे तो यहां भी स्थित बिगड़ सकती है इसलिये जंगलों को बचाएं और अधिक से अधिक पेड़ लगाएं।
    मंत्री ने मैनपाट जनपद पंचायत परिसर में वृक्षारोपण किया। उन्होंने 5 नवीन ग्राम पंचायतों में नवीन भवन का शिलान्यास एवं 64 लोगों को स्वेच्छानुदान राशि का चेक वितरित किया। इसी प्रकार बतौली विकासखंड में 2 नवीन ग्राम पंचायतों में पंचायत भवन निर्माण के लिए भूमिपूजन किया तथा 67 हितग्राहियों को स्वेच्छानुदान राशि का चेक वितरित किया। साथ ही सीतापुर जनपद के 132 लोगों को स्वेच्छानुदान का चेक प्रदान किया। इस मौके पर मैनपाट जनपद पंचायत अध्यक्ष श्रीमती उर्मिला खेस, मुख्य वन संरक्षक श्री एबी मिंज, डी एफओ,एस डीएम सहित अन्य अधिकारी एवं नागरिक उपस्थित थे।
 

नजरिया /शौर्यपथ /भारत सात बार संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) का अस्थाई सदस्य रह चुका है। अब उसके सामने अपने आठवें कार्यकाल को खास बनाने की चुनौती है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में अस्थाई सदस्य के रूप में 2012 में अपना सातवां कार्यकाल पूरा करने के तत्काल बाद भारत ने सुरक्षा परिषद में स्थाई सदस्यता के लिए अपना अभियान शुरू कर दिया था। इस दिशा में सार्वजनिक रूप से साल 2013 में पहला ठोस कदम उठाया गया था, जब अफगानिस्तान ने भारत के पक्ष में सुरक्षा परिषद में अस्थाई सदस्यता के लिए अपना दावा करने की योजना से कदम पीछे खींच लिए थे। तब संयुक्त राष्ट्र में एशिया प्रशांत समूह के अन्य 54 सदस्य देशों में से कोई देश भारत को चुनौती देने के लिए आगे नहीं आया था। वह पाकिस्तान भी नहीं, जिसने सुरक्षा परिषद में भारत के चुनाव का स्वागत करने से इनकार कर दिया था।
इस बार 2019 में भी एशिया-प्रशांत देशों के समूह ने सर्वसम्मति से भारत को अपने उम्मीदवार के रूप में समर्थन दिया, जिसके परिणामस्वरूप पिछले सप्ताह भारत को 192 वोटों में से 184 के साथ जोरदार जीत हासिल हुई। अस्थाई सदस्यता की राह में किसी देश ने भारत का विरोध नहीं किया। यह एक ऐसी मुश्किल जीत है, जो कई सुखद संयोगों से मिली है। 1 जनवरी, 2021 से शुरू होने वाला भारत का दो साल का कार्यकाल अपने अंतिम वर्ष में देश की स्वतंत्रता की 75वीं वर्षगांठ और पहली बार दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं के जी-20 शिखर सम्मेलन की मेजबानी के साथ सामने आएगा। अब सवाल उठता है, सुरक्षा परिषद में स्थाई सदस्यता के लिए प्रचार के साथ इस पूरे कार्य या पैकेज को कैसे अंजाम दिया जाए? क्या भारत इस बार फिर स्थाई सदस्यता के लिए जोर लगाने को ठीक से तैयार है?
बेशक, भारत ने 2011 से शुरू हुए अपने सातवें कार्यकाल का उपयोग न केवल स्थाई सदस्यता के अपने दावे को चमकाने के लिए, बल्कि इसे मुमकिन बनाने के लिए भी किया था। कुछ भारतीय विशेषज्ञों ने इसे स्थाई सदस्यता के लिए पूर्वाभ्यास भी कहा था। तब भारत ने कोशिश की, हालांकि उसकी कोशिशों का कोई तात्कालिक नतीजा नहीं निकला था, पर भारत इस मामले या मांग को आगे बढ़ाने में जरूर कामयाब हुआ था। सरकारों के बीच वार्ता, जिसे इंटर गवर्नमेंट निगोशिएशन (आईजीएन) भी कहते हैं, आगे बढ़ी थी और साल 2015 में पाठ (या लिखत-पढ़त) आधारित वार्ताओं तक पहुंच गई थी।
भारत ने 1 जनवरी से अपना आठवां कार्यकाल शुरू करने की योजना बनाई है। इसी इरादे से एक नए व्यापक विचार के तहत बहुपक्षीय तंत्र बनाने को प्राथमिकताओं में शामिल किया गया है। यह अपनी स्थाई सदस्यता के लिए पूरे पैकेज के तहत फिर कोशिश करने का एक और तरीका है। साथ ही, अन्य प्राथमिकताएं भी हैं, जैसे आतंकवाद के लिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की अनुमोदन व्यवस्था का गैर-राजनीतिकरण करना, लेकिन कुल मिलाकर, भारत के लिए सुरक्षा परिषद में सुधार का मुद्दा उचित ही शीर्ष पर है। ठीक इसी समय भारत अपनी अस्थाई सदस्यता का उपयोग इस तरह करे, ताकि पता चले कि इसकी क्या सार्थकता है और क्या नहीं है। सुरक्षा परिषद में किसी फैसले पर ‘हां’ या ‘नहीं’ वोट करना एक अनुपस्थित वोट के आत्म-औचित्य की तुलना में कहीं अधिक दम और चरित्र रखता है।
सुरक्षा परिषद के किसी भी स्थाई सदस्य के साथ गुट न बनाना एक खूबी हो सकती है। स्थाई सदस्यों अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, रूस और चीन के साथ गुट नहीं बनाते हुए दशकों तक गुटनिरपेक्षता से बंधे रहना उस वक्त भारत के लिए ठीक रहा था। अब भारत सहज आधार पर अपना एक स्टैंड ले और इसके साथ ही किसी स्थाई सदस्य देश के साथ मुखर-पक्षधरता को आजमाए, तो इसके बड़े रणनीतिक फायदे मुमकिन हैं।
235 ई, 43वीं स्ट्रीट, न्यूयॉर्क सिटी, इसी इमारत में साल 1993 से भारत का स्थाई आयोग मौजूद है। मैनहट्टन के पड़ोस में यह इमारत सिर्फ इसलिए नहीं खड़ी है, क्योंकि यह सबसे ऊंची है, बल्कि यह दिवंगत आर्किटेक्ट चाल्र्स कोरिया की साहसिक और मुखर वास्तु-कला के अपने चरित्र के कारण भी शोभायमान है। यह समय है, जब हम संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में वैसे ही भाव-स्वभाव के साथ पेश आएं। यशवंत राज, अमेरिका में हिन्दुस्तान टाइम्स संवाददाता

 

दुर्ग / शौर्यपथ / नवदृष्टि फाउंडेशन के आव्हान पर दुर्ग जिला चिकित्सालय ब्लड बैंक में 31 लोगों स्वैच्छिक रक्तदान कर फादर्स डे को यादगार बनाया गया। 51 वर्षीय शत्रुंजय तिवारी मास्टर डोनर रहे, जीवन ताम्रकार, रवि लक्खा, अमित कुमार पण्डे, सुधीर पंडित, खोमेश्वर साहू, गजपाल साहू, डी राज सहित अन्य लोगों ने इस अवसर पर रक्तदान किया।
नवदृष्टि फाउंडेशन के राज आढ़तिया इस दौरान ब्लड बैंक में मौजूद रहे। उन्होंने रक्तदान करने वालों को प्रोत्साहित किया। उन्होंने बताया कि सूर्य ग्रहण होने के कारण बहुत से लोग रक्तदान करने नहीं पहुंचे लेकिन 31 लोगों ने रक्तदान कर उदाहरण पेश किया है, जो प्रशंसनीय है। दुर्ग ब्लड बैंक के को ऑर्डिनेटर त्रिपेश शर्मा ब्लड बैंक की ओर से जिज्ञासा, आशा साहू, नेमा चंद्राकर, महेंद्र चंद्राकर, मधुसूदन, कीर्तन ने रक्तदान प्रक्रिया में सहयोग किया।

सम्पादकीय लेख / शौर्यपथ / चीन के साथ सीमा पर विगत 45 वर्षों से जिस उदारता को भारत निभाता चला आ रहा था, उसमें अब बदलाव जितना स्वाभाविक है, उतना ही स्वागतयोग्य भी। सीमा पर जरूरत पड़ने पर हथियार प्रयोग को जो मंजूरी मिली है, वह चीन की ही साजिशों का नतीजा है। आम तौर पर वह परोक्ष रूप से हमें घेरता आ रहा था, लेकिन अब जब उसने प्रत्यक्ष रूप से भारतीय उदारता की भारी कीमत वसूल ली है, तब भारत के रक्षा मंत्री के नेतृत्व में जरूरत पड़ने पर सेना को हथियार प्रयोग की छूट कतई गलत नहीं है। अब जब सीमा पर जरूरत पड़ी, तो बंदूकों का इस्तेमाल करने के लिए सेना को दिल्ली से पूछने की जरूरत नहीं पड़ेगी। सेना के कमांडर ही तत्काल फैसला ले सकेंगे। सबसे बड़ी बात कि यह फैसला तीनों सेनाओं के प्रमुखों की भागीदारी में हुआ है। सेना में ही नहीं, बल्कि देश में भी यह भावना रही है कि सेना के हाथ न बांधे जाएं, क्योंकि इससे दुश्मनों का मनोबल बढ़ता है।
हम अपने पड़ोसियों को ऐसे आश्वस्त क्यों करते रहे हैं कि हम उनका अहित नहीं करेंगे? यह नीति अच्छे दिनों के लिए तो ठीक है, जब सीमा विस्तार का इरादा किसी के मन में नहीं हो, लेकिन जब चीन खुलेआम भारतीय जमीन पर दावे करता है, तब ऐसे किसी समझौते या उदार व्यवहार को ताक पर रख देना ही बेहतर है। भारत ने चीन की किसी भूमि पर दावा नहीं किया है। चीन के सीमा विस्तार के खिलाफ भारत में उठने वाली आवाजों को खामोश ही रखा गया है। हम पड़ोसी धर्म निभाते रहे हैं, लेकिन चीन क्या कर रहा है, यह दुनिया को भी पता चलना चाहिए। हमारी सरकार को भी अपनी माटी की रक्षा के लिए साहस का परिचय देना चाहिए। भारत ने अपनी सैन्य-नीति में जो ताजा बदलाव किए हैं, वह कायम रहने चाहिए। जब चीन हमें निश्चिंत नहीं देखना चाहता, तब हम उसे क्यों बैठे-बिठाए आश्वस्त रखें?
घाटी-दर-घाटी लाठी-डंडों से धकियाते हुए सीमा में बदलाव का मौका उसे अब नहीं देना चाहिए। भारत के पास जो अपना प्रामाणिक कागजी नक्शा है, उसे जमीनी नक्शे से पुख्ता तौर पर मिला लेना चाहिए और देश को भी बताना चाहिए कि हमारी माटी कहां तक है। कम से कम यह तो बताया ही जा सकता है कि वास्तविक नियंत्रण रेखा कहां है? वास्तविक नियंत्रण रेखा का आदर करने के लिए चीन को विवश करना चाहिए और साथ ही, हमेशा के लिए सीमा विवाद को सुलझाने की पहल शुरू हो जानी चाहिए। ध्यान रहे, रूस ने जब कड़ाई का परिचय दिया, तभी चीन ने उसके साथ अपने सीमा विवाद को सुलझाया। चीन-रूस के बीच 4,209 किलोमीटर लंबी सीमा का जब समाधान निकल सकता है, तो चीन-भारत की 3,500 किलोमीटर लंबी सीमा का निपटारा कैसे नहीं हो सकता? सीमा विवाद का निपटारा हमेशा के लिए इसलिए भी जरूरी है, ताकि छोटे-छोटे घाव या विवाद की गुंजाइश न रहे। चीन अगर भारत के साथ तार्किक सीमा समाधान नहीं चाहता है, तो यह भी भारत-चीन के लोगों के साथ ही दुनिया को भी पता होना चाहिए। किसी की मंशा बुरी है, तो उसे उजागर करने में ही भारत की भलाई है। और एक बार जब मंशा स्पष्ट हो जाए, तो भारत को चीन के प्रति अपनी सामरिक नीति ही नहीं, बल्कि अपनी समग्र नीति का निर्धारण करना चाहिए।

 

मेलबॉक्स / शौर्यपथ /लद्दाख में चीन और भारत के सैनिकों के बीच आपसी टकराव के बाद देश में चीन के बने उत्पादों के बहिष्कार का अभियान चल पड़ा है। मगर इसे अमल में लाना आसान नहीं होगा, क्योंकि भारतीय सामान में भी चीन के कल-पुर्जे लगे होते हैं। आंकड़ों की मानें, तो पिछले साल अप्रैल से इस साल फरवरी तक देश में 7.5 अरब डॉलर के पीसीबी और मोबाइल फोन के पुर्जों का आयात हुआ, जिसमें 45 फीसदी पुर्जे चीन से ही मंगाए गए हैं। भले ही सरकार द्वारा आयात पर निर्भरता खत्म करने का आह्वान किया गया था, लेकिन सच्चाई यही है कि हम इलेक्ट्रॉनिक्स, मोबाइल उपकरण, दवाई, दूरसंचार उपकरण, उर्वरक, खिलौने, वाहन, सोलर उपकरण आदि क्षेत्रों में काफी हद तक चीन पर निर्भर हैं। जाहिर है, सिर्फ चीनी वस्तुओं के बहिष्कार की बात कह देने से काम नहीं चलेगा। चीनी उत्पादों को हटाकर भारतीय उत्पादों को जगह देने के लिए हमें देश में फैक्टरियां लगानी होंगी और संयंत्रों की उत्पादन-क्षमता बढ़ानी होगी। इससे हालांकि, वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि होगी, मगर चीन पर हमारी निर्भरता भी खत्म होगी। इससे देश में रोजगार के अवसर बढ़ेंगे।
बलराम साहू, बिलासपुर, छत्तीसगढ़

मानसून में सावधानी
भारत में मानसून दस्तक दे चुका है। यह तब आया है, जब कोरोना महामारी लगातार अपने पांव पसार रही है। चूंकि बारिश अपने साथ कई बीमारियों को भी लेकर आती है, इसलिए इस बार हमें विशेष सावधानी बरतनी होगी। कोरोना के कारण अस्पतालों पर पहले ही काफी बोझ है। ऐसे में, अपने और स्वजनों की सेहत का पूरा ख्याल रखना आवश्यक है। जीवन में स्वास्थ्य ही सबसे बड़ा धन है, इसलिए सतर्क रहकर खुद को और अपने परिवार को बीमारियों से बचाना हमारा कर्तव्य होना चाहिए। इसके लिए हमें तमाम जरूरी उपाय करने चाहिए।
सुमित ओझा, बलिया

जिम्मेदार बनें
देश में हर दिन कोरोना के रिकॉर्ड मरीज सामने आ रहे हैं। कई तरह की पाबंदियों के बाद भी देश में मरीजों की संख्या कम होने का नाम नहीं ले रही। जब लॉकडाउन लगाया गया था, तब यही माना गया था कि लोग जवाबदेह बनेंगे और नियमों का कड़ाई से पालन करेंगे। मगर एक तरफ लॉकडाउन की समय-सीमा बढ़ती रही, तो दूसरी तरफ देश में संक्रमित मरीजों की संख्या में इजाफा होता रहा। रही-सही कसर अनलॉक-1 ने पूरी कर दी, जब कमोबेश सब कुछ खोल दिया गया। लोगों के आने-जाने में कोई पाबंदी न रहने की वजह से यात्राएं बढ़ गईं और संक्रमण का भी दूरदराज तक प्रसार हो गया। साफ है, अब हमें और सावधान व जिम्मेदार बनना होगा। अगर हम खुद को कोरोना-संक्रमण से बचाना चाहते हैं, तो हमें हर सरकारी और डॉक्टरी निर्देशों का सख्ती से पालन करना चाहिए।
रजत यादव, सुजानपुर, कानपुर

बेरोजगारी की काट
हमारे देश में बेरोजगारी पहले भी एक बड़ी समस्या रही है, लेकिन कोरोना ने इसे और गंभीर बना दिया है। सरकार की ओर से घोषित राहत-पैकेज से उम्मीद जगी है, लेकिन ईमानदारी के साथ इसका वितरण तो हो? अगर इस पैकेज का सही इस्तेमाल होता है, तो काफी उद्योग-धंधों का जन्म होगा, जिससे बेरोजगारी काफी हद तक दूर हो सकती है। आवश्यकता इस बात की भी है कि सरकारी मशीनरी में सब काम सिंगल विंडो द्वारा ऑनलाइन माध्यम से हो, ताकि काफी काम सुगमता से हो सकें। इसी के साथ, सरकार की मंशा के परिप्रेक्ष्य में लोकल यानी स्थानीय वस्तु और कार्य पर अधिक ध्यान दिया जाना चाहिए। यह मौजूदा वक्त की सबसे बड़ी मांग है। इससे पलायन को भी रोका जा सकता है। बेरोजगारी-दर को यदि कम करना है, तो स्थानीयता को आगे बढ़ना ही होगा।
तनुज कुमार, मेरठ

 

ओपिनियान / शौर्यपथ / तमिलनाडु के बारे में अक्सर कहा जाता है कि यह अच्छी तरह से शासित राज्य रहा है। इस सूबे को यह उपलब्धि इसलिए हासिल हुई है, क्योंकि बीते वर्षों में इसने तमाम मुश्किलों का बखूबी सामना किया है। फिर चाहे वह संकट प्राकृतिक हो या सामाजिक विकास, सार्वजनिक स्वास्थ्य, शिक्षा अथवा अर्थव्यवस्था से जुड़ा कोई मसला- तमिलनाडु बड़ी आबादी वाले राज्यों में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करता रहा है। मगर मौजूदा सूबाई सरकार जिस तरह से कोरोना वायरस महामारी से मुकाबिल है, उससे ये तमाम उपलब्धियां तार-तार हो रही हैं। वायरस संक्रमण के मामले में यह देश का तीसरा सबसे बड़ा सूबा बन गया है। यहां मृत्यु-दर भी धीरे-धीरे बढ़ रही है और चेन्नई के अस्पतालों में मरीजों के लिए बेड कम पड़ने लगे हैं।
मुख्यमंत्री के पलानीसामी की मन:स्थिति इसी से जाहिर होती है कि पिछले हफ्ते पूछे गए एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा था, ‘सिर्फ ईश्वर को पता है कि तमिलनाडु में कोविड-19 का अंत कब होगा’। शुरुआती गलतियों के बाद राज्य ने अपनी नीतियां फिर से बनाई हैं, लेकिन लगता है कि नुकसान हो चुका है। सवाल यह है कि पहले बेहतरीन काम करने वाले इसके प्रशासनिक तंत्र के साथ आखिर हुआ क्या?
उल्लेखनीय है कि यह राज्य 2004 की सुनामी से जल्द ही उबरने में कामयाब हो गया था, जबकि उस आपदा में इसका बड़ा हिस्सा तबाह हो गया था। 2015 की बाढ़ के समय भी इसने मिला-जुला प्रदर्शन किया था, क्योंकि तब भौतिक संपदा की हानि बेशक हुई, मगर अधिकतर लोगों की जान बचा ली गई थी। कई बड़े चक्रवातों का इसने बखूबी सामना किया है। पिछले वर्ष पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के जन्मदिन के मौके पर केंद्र ने जब ‘गुड गवर्नेंस इंडेक्स’ जारी किया था, तो उसमें भी यह सूबा शीर्ष पर था। कृषि और इससे जुड़े क्षेत्रों, वाणिज्य व उद्योग, मानव संसाधन विकास, सार्वजनिक स्वास्थ्य, आर्थिक सुशासन, सामाजिक कल्याण व विकास, न्यायिक व सार्वजनिक सुरक्षा, पर्यावरण व जन-हितकारी शासन जैसे क्षेत्रों में मूल्यांकन के बाद यह सूची जारी की गई थी। पलानीसामी के लिए यह रैंकिंग नया जीवन लेकर आई, जो स्थानीय निकाय चुनावों में पार्टी के खराब प्रदर्शन के कारण मुश्किल में थे। इसी के बाद उनकी कुरसी पर नजर टिकाए नंबर दो नेता पन्नीरसेल्वन को किनारे करके वह अन्नाद्रमुक के सर्वेसर्वा बन गए।
मगर कोविड-19 के विरुद्ध तमिलनाडु की रणनीति इस बात को साबित करती है कि केंद्र प्रायोजित रैंकिंग क्षेत्रीय सरकार के प्रदर्शन का सही मापक नहीं हो सकती। अतीत में यह राज्य तीन स्तंभों के आधार पर कामयाब माना गया था- कुशल नौकरशाही, सामाजिक रूप से संवेदनशील राजनीतिक नेतृत्व और सजग जनता। अभी इन तीनों ही स्तंभों में दरार दिख रही है।
सबसे पहले बात नौकरशाही की। यहां के नौकरशाह अपने कुशल कामकाज के लिए जाने जाते हैं। इसी दक्षता के कारण तमिलनाडु अपनी सामाजिक योजनाओं को जनता तक पहुंचाता रहा है। बेहतर प्रशासन की वजह से राज्य में कानून-व्यवस्था भी अच्छी रही है। जाहिर है, यह राजनीतिक नेतृत्व है, जो फिसलता दिख रहा है। शीर्ष पर कोई मजबूत नेता न होने के कारण कमजोरी साफ-साफ दिख रही है। नतीजतन, नेतृत्व को पूजने वाली जनता भी अब बेचैन होने लगी है।
कोविड-19 के खिलाफ जो रणनीति बनाई गई, उसमें कई गलतियां रहीं। शुरुआत में जब तबलीगी जमात के संक्रमित प्रवासियों के बारे में पता चला, तो संक्रमण थामने के कदम जरूर उठाए गए, लेकिन उनकी धार्मिक पहचान भी बताई जाती रही। हालांकि, जल्द ही राज्य ने अपनी गलती दुरुस्त कर ली और साप्रदायिक उन्माद से बचने के लिए संक्रमितों का नाम लेना बंद कर दिया। इसी तरह, लॉकडाउन और संपर्कों को खोजने की रणनीति ने भी कुछ हद तक काम किया, पर कोयांबदु थोक मार्केट कोरोना का नया हॉटस्पॉट बन गया। यहां से खुदरा व्यापारी अपने-अपने जिलों में संक्रमण ले गए।
शुरुआत में राज्य के स्वास्थ्य मंत्री सी विजय भास्कर कोविड-19 के खिलाफ लड़ाई का चेहरा बने। कुछ मौकों पर उन्हें मुख्यमंत्री के साथ देखा गया। पर तबलीगी जमात की वजह से संक्रमण में आया उछाल जैसे ही थमा, मुख्यमंत्री ने अति आत्मविश्वास में यह घोषणा कर दी कि महामारी सिमटने लगी है। हालात विपरीत होते ही उन्हें अपने शब्द वापस लेने पड़े। इसके समाधान के लिए उन्होंने मीडिया को जानकारी देने की जिम्मेदारी विजय भास्कर से वापस लेते हुए राज्य के स्वास्थ्य सचिव को दे दी। तब यही अनुमान लगाया गया कि मुख्यमंत्री को यह कदम इसलिए उठाना पड़ा, क्योंकि उनके अन्य कैबिनेट सहयोगी विजय भास्कर के रोजाना मीडिया में आने से असहज हो रहे थे।
बहरहाल, स्वास्थ्य सचिव भी नाकाम साबित हुईं, क्योंकि संक्रमण फैलता रहा। आरोप उछला कि उन्हें चेन्नई नगर आयुक्त का साथ नहीं मिला, जो इसलिए महत्वपूर्ण था, क्योंकि यह इलाका हॉट स्पॉट घोषित था। चेन्नई में संक्रमण बढ़ने के बाद मुख्यमंत्री 2004 की सुनामी में बेहतर काम करने वाले आईएएस अधिकारी जे राधाकृष्णन को लेकर आए। मगर मुख्यमंत्री इसके बाद भी नहीं रुके। जल्द ही उन्होंने अपने पांच कैबिनेट मंत्रियों को शहर के विभिन्न हिस्सों का प्रभारी बनाया, फिर भी हालात नहीं संभले। मुख्यमंत्री को यह समझने में थोड़ा वक्त लगा कि बहुत सारे रसोइए शोरबे को खराब कर रहे हैं। पलानीसामी ने आत्मघाती गोल 19 जून को किया, जब उन्होंने 12 दिनों के सख्त लॉकडाउन की घोषणा कर दी, जबकि देश अनलॉक-1 की ओर बढ़ चला था।
नौकरशाही पर मुख्यमंत्री की कमजोर पकड़ के कारण जिलाधिकारियों ने चेन्नई से आने वाले प्रवासियों को रोकने के लिए अलग-अलग नियम लागू किए। हालांकि, खुद को निष्पक्ष बताने के लिए यहां का प्रशासन दूसरे राज्यों की तुलना में अधिक टेस्ट भी करने लगा है। शनिवार को यहां 35 हजार टेस्ट किए गए, जो पश्चिम बंगाल में पूरे महीने की जांच के बराबर है। जांच का दायरा बढ़ते ही संक्रमितों की संख्या में भी उछाल आने लगा है।
अभी भी सब कुछ खत्म नहीं हुआ है। बेशक जांच ज्यादा होने लगी है, पर संक्रमण-दर पिछले कुछ दिनों से या तो स्थिर है या कम हो रही है। राधाकृष्णन को मोर्चे पर लगाने के बाद जरूर समन्वित प्रयास होते दिख रहे हैं, मगर तमिलनाडु अब भी खतरे से उबरा नहीं है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)एस श्रीनिवासन, वरिष्ठ पत्रकार

 

दुर्ग / शौर्यपथ / भाजपा राष्ट्रीय महासचिव व राज्यसभा सांसद सुश्री सरोज पाण्डेय के जन्म दिवस पर आज जिला भाजयुमो पदाधिकारियों व कार्यकर्ताओं ने कोरोना वैश्विक महामारी से बचाव के लिए श्रमिकों आटो चालकों व फुटफाथ में भीख मांगने वालों लोगो को मास्क सेनेट्राईज बांटकर वृद्धा आश्रम में वृद्ध महिलाओं से केक कटवाकर जन्म दिन मनाया इससे पूर्व जल परिसर स्थित निवास पहुंचकर जिला भाजयुमो अध्यक्ष दिनेश देवांगन के नेतृत्व में कार्यकर्ताओं ने सादगी के साथ सुश्री सरोज पांडेय को फूल माला व बुके देकर जन्म दिन पर बधाई व शुभकामनाएं दिया।
वैश्विक महामारी कोरोना संकट के चलते भाजपा की राष्ट्रीय महासचिव एवं राज्यसभा सांसद ने अपना जन्म दिवस सादगी पूर्ण ढंग से मनाने का निर्णय लेकर समर्थकों से अपील किया था कि इस संकट के चलते जिन लोगों के पास आय के स्रोत कम हो चुके हैं उनकी मदद करें तथा वे भूखे ना सोए इसकी भी चिंता सतत करते हुए उन्हें इस वायरस से सुरक्षित करने के सामग्री उपलब्ध कराए इसी भावना को ध्यान में रखते हुए भारतीय जनता युवा मोर्चा पदाधिकारियों द्वारा आज उनके जन्मदिन पर उनसे मुलाकात कर उन्हें बधाई एवं शुभकामनाएं देने के पश्चात दुर्ग रेलवे स्टेशन जाकर पार्सल ऑफिस में हमाली करने वाले हमाल भाईयों,कुली भाईयों, सफाई कर्मचारियों को, स्टेशन में ऑटो चलाने वाले ऑटो चालकों को तथा फुटपाथ में रहने वाले लोगों को सैनिटाइजर एवं मास्क का वितरण पूरी तरह सोशल डिस्टेंस का पालन करते हुए किया गया तत्पश्चात वृद्धा आश्रम में जाकर वृद्धों के बीच सुश्री सरोज पाण्डेय जी के नाम से केक काटकर उन्हें मुंह मीठा कराया गया।
इस दौरान भाजयुमो प्रदेश उपाध्यक्ष डॉक्टर देव नारायण तांडी, जिला महामंत्री नितेश साहू उपाध्यक्ष राहुल पंडित मंत्री राहुल दीवान शुभम ताम्रकार प्रचार मंत्री राजा महोबिया,गौरव शर्मा, उत्तम साहू ,अनुपम मिश्रा,कुलदीप सिंह,पार्षद मनीष साहू,अजय वैद्य मंडल अध्यक्ष अजय चंद्राकर तेखन सिन्हा ,नीलेश अग्रवाल ,अरुणी राहुल पाटिल,बंटी चौहान अजय वेद,चंद्रकांत साहू ,दीपक सिन्हा, विनीत ताम्रकार,संतोष कोसरे, टोमन साहू सनी राजपूत ,अभिषेक टंडन,पीयूष टंडन सहित बड़ी संख्या में भाजयुमो के कार्यकर्ता उपस्थित थे।

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