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March 10, 2026
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धर्म संसार / शौर्यपथ / प्रभु यीशु के जन्म की ख़ुशी में मनाया जाने वाला क्रिसमस का त्योहार पूरी दुनिया में मनाया जाता है। यह त्योहार कई मायनों में बेहद खास है। क्रिसमस को बड़ा दिन, सेंट स्टीफेंस डे या फीस्ट ऑफ़ सेंट स्टीफेंस भी कहा जाता है। प्रभु यीशु ने दुनिया को प्यार और इंसानियत की शिक्षा दी। उन्होंने लोगों को प्रेम और भाईचारे के साथ रहने का संदेश दिया। प्रभु यीशु को ईश्वर का इकलौता प्यारा पुत्र माना जाता है। इस त्योहार से कई रोचक तथ्य जुड़े हैं। आइए जानते हैं इनके बारे में।
क्रिसमस ऐसा त्योहार है जिसे हर धर्म के लोग उत्साह से मनाते हैं। यह एकमात्र ऐसा त्योहार है जिस दिन लगभग पूरे विश्व में अवकाश रहता है। 25 दिसंबर को मनाया जाने वाला यह त्योहार आर्मीनियाई अपोस्टोलिक चर्च में 6 जनवरी को मनाया जाता है। कई देशों में क्रिसमस का अगला दिन 26 दिसंबर बॉक्सिंग डे के रूप मे मनाया जाता है। क्रिसमस पर सांता क्लॉज़ को लेकर मान्यता है कि चौथी शताब्दी में संत निकोलस जो तुर्की के मीरा नामक शहर के बिशप थे, वही सांता थे। वह गरीबों की हमेशा मदद करते थे उनको उपहार देते थे। क्रिसमस के तीन पारंपरिक रंग हैं हरा, लाल और सुनहरा। हरा रंग जीवन का प्रतीक है, जबकि लाल रंग ईसा मसीह के रक्त और सुनहरा रंग रोशनी का प्रतीक है। क्रिसमस की रात को जादुई रात कहा जाता है। माना जाता है कि इस रात सच्चे दिल वाले लोग जानवरों की बोली को समझ सकते हैं। क्रिसमस पर घर के आंगन में क्रिसमस ट्री लगाया जाता है। क्रिसमस ट्री को दक्षिण पूर्व दिशा में लगाना शुभ माना जाता है। फेंगशुई के मुताबिक ऐसा करने से घर में सुख समृद्धि आती है। पोलैंड में मकड़ी के जालों से क्रिसमस ट्री को सजाने की परंपरा है। मान्यता है कि मकड़ी ने सबसे पहले जीसस के लिए कंबल बुना था।

 

रायपुर ।
छत्तीसगढ़ लघु वेतन शासकीय चतुर्थ वर्ग कर्मचारी संघ, रायपुर के प्रदेश अध्यक्ष पद हेतु नामांकन कार्यक्रम शनिवार को दोपहर 1 बजे कर्मचारी भवन, रायपुर में शांतिपूर्ण एवं संगठनात्मक उत्साह के साथ सम्पन्न हुआ।

प्रदेश अध्यक्ष पद के लिए परशुराम धनेंद्र ठाकुर (पदनाम – भृत्य, विकासखंड शिक्षा विभाग, डौंडी) ने विधिवत रूप से अपना नामांकन पत्र प्रस्तुत किया। उनके नामांकन के प्रस्तावक कौशल कुमार अग्रवाल (पत्रवाहक, जल संसाधन विभाग) एवं समर्थक शेर सिंह भुवार्थ (चौकीदार, आदिम जाति विभाग, कुसुमलता) रहे।

नामांकन कार्यक्रम में संघ के कई वरिष्ठ पदाधिकारी एवं सदस्यगण गरिमामयी उपस्थिति में शामिल हुए। प्रमुख रूप से उदय शंकर छविराम यादव (संभागीय अध्यक्ष, रायपुर), देवनाथ यादव, सुरेश ढीढी (अध्यक्ष, इंद्रावती भवन), संगठन सचिव लोकेश वर्मा, डीडी सिंह, नरेंद्र साहू, देवेंद्र साहू, ईश्वर साहू, मोतीलाल खिलाड़ी (जिला अध्यक्ष, दुर्ग), शंभू गुप्ता (जिला अध्यक्ष, बलरामपुर) एवं राजू रवि (जिला मीडिया प्रभारी, बलरामपुर) विशेष रूप से उपस्थित रहे।

निर्वाचन प्रक्रिया का संचालन निर्वाचन अधिकारी घनश्याम शर्मा एवं सहायक निर्वाचन अधिकारी विनोद यादव द्वारा किया गया, जिन्होंने नामांकन पत्र प्रदान कर नियमानुसार प्रक्रिया पूर्ण कराई। पूरा कार्यक्रम अनुशासित, शांतिपूर्ण एवं संगठनात्मक एकता के वातावरण में सम्पन्न हुआ।

उक्त जानकारी लघु वेतन शासकीय चतुर्थ वर्ग कर्मचारी संघ, जिला दुर्ग के अध्यक्ष मोती राम खिलाड़ी द्वारा दी गई।

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रायपुर । शौर्यपथ। जनसंपर्क विभाग में निरंतर 36 वर्षों तक उल्लेखनीय सेवाएं देने के बाद अपर संचालक श्री जवाहर लाल दरियो के सेवानिवृत्त होने के अवसर पर आज नवा रायपुर स्थित संवाद ऑडिटोरियम में एक गरिमामय विदाई समारोह का आयोजन किया गया। समारोह में आयुक्त जनसंपर्क डॉ. रवि मित्तल सहित विभाग के अधिकारी-कर्मचारी उपस्थित रहे और श्री दरियो को भावभीनी विदाई दी।

इस अवसर पर आयुक्त जनसंपर्क डॉ. रवि मित्तल ने श्री दरियो की कार्यनिष्ठा, कर्तव्यपरायणता और विभाग के प्रति उनके समर्पण की सराहना की। उन्होंने शॉल, श्रीफल एवं स्मृति चिन्ह भेंट कर श्री दरियो के स्वस्थ, सुदीर्घ एवं उज्ज्वल भविष्य की कामना की।

अपर संचालक श्री उमेश मिश्रा ने श्री दरियो के साथ कार्यकाल के अनुभव साझा करते हुए बताया कि अविभाजित मध्यप्रदेश के इंदौर से स्थानांतरण के पश्चात उन्होंने ही कार्यभार ग्रहण किया था। वहीं अपर संचालक श्री संजीव तिवारी ने श्री दरियो की सरलता, सहज व्यवहार और दायित्वों के प्रति उनके समर्पण की प्रशंसा की।

कार्यक्रम का संचालन करते हुए अपर संचालक श्री आलोक देव ने श्री दरियो के सेवा जीवन पर प्रकाश डाला। इस अवसर पर श्री दरियो ने विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों से प्राप्त मार्गदर्शन एवं सहकर्मियों के सहयोग के लिए आभार व्यक्त करते हुए कहा कि सभी के सहयोग से ही वे अपने दायित्वों का सफलतापूर्वक निर्वहन कर सके।

दुर्ग। दुर्ग शहर जिला कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष धीरज बाकलीवाल ने संगठन को सशक्त करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए ऊर्जावान नेत्री निकिता मिलिंद को दुर्ग शहर कांग्रेस की कार्यकारिणी में महामंत्री की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी है।

इस नियुक्ति को संगठन में नई ऊर्जा और महिला नेतृत्व को सशक्त करने के रूप में देखा जा रहा है। निकिता मिलिंद की सक्रियता, संगठनात्मक अनुभव और जमीनी पकड़ को देखते हुए पार्टी नेतृत्व ने उन पर विश्वास जताया है।

अपनी नियुक्ति पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए नवनियुक्त महामंत्री निकिता मिलिंद ने कहा कि वे वरिष्ठ नेतृत्व की हृदय से आभारी हैं, जिन्होंने उन्हें संगठन की सेवा का अवसर प्रदान किया। उन्होंने विशेष रूप से दुर्ग शहर कांग्रेस अध्यक्ष धीरज बाकलीवाल का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि उनके विश्वास पर खरा उतरना उनकी प्राथमिकता रहेगी।

निकिता मिलिंद ने आगे कहा कि महामंत्री का यह पद उनके लिए सम्मान के साथ-साथ बड़ी जिम्मेदारी भी है। वे पूर्ण निष्ठा, ईमानदारी और समर्पण के साथ संगठन को मजबूत करने तथा कांग्रेस की विचारधारा को जन-जन तक पहुँचाने के लिए सतत कार्य करेंगी।

दीपक वैष्णव की ख़ास रिपोर्ट कोंडागांव। पंचायतों में वित्तीय अनियमितताओं पर जिला प्रशासन ने कड़ा रुख अपनाते हुए बड़ी कार्रवाई की है। कोंडागांव विकासखंड के ग्राम पंचायत सम्बलपुर में पदस्थ…

दुर्ग। शौर्यपथ 

जिला कांग्रेस कमेटी दुर्ग में ऊर्जावान, जमीनी और संघर्षशील युवा नेता राहुल शर्मा को पुनः जिला महामंत्री बनाए जाने के बाद कांग्रेस कार्यकर्ताओं, युवाओं, वरिष्ठ नेताओं और आमजन में हर्ष और उत्साह की लहर है। उनकी नियुक्ति को संगठन में ऊर्जा, अनुभव और निरंतरता का प्रतीक माना जा रहा है।

राहुल शर्मा का राजनीतिक सफर 2005 में नगर शाला अध्यक्ष के रूप में शुरू हुआ। इसके बाद

2006 में एनएसयूआई दुर्ग विधानसभा के उपाध्यक्ष,

2008–09 में मध्य ब्लॉक कांग्रेस कमेटी के महामंत्री,

2010–2012 तथा 2012–2018 तक श्री आर.एन. वर्मा के नेतृत्व में सचिव एवं महामंत्री,

2018 में गया पटेल की अध्यक्षता वाली समिति में महामंत्री के रूप में उन्होंने संगठन को मजबूती दी।

अब 2026 में उन्हें एक बार फिर जिला महामंत्री का दायित्व सौंपा गया है, जो उनके संगठनात्मक कौशल और नेतृत्व पर विश्वास को दर्शाता है।

राहुल शर्मा का नाम केवल पदों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि वे आंदोलनों और जनसंघर्षों में भी अग्रिम पंक्ति में रहे हैं। 2012 में नगर निगम दुर्ग के खिलाफ जनसमस्याओं को लेकर हुए आंदोलन में उनके विरुद्ध प्रकरण दर्ज हुआ, जिसमें वे विवेक मिश्रा, इलियास चौहान, अय्यूब खान, प्रकाश गीते और रज्जन खान के साथ 6 दिन जेल भी गए। इसे उनके संघर्षशील और निडर राजनीतिक जीवन का अहम अध्याय माना जाता है।

अपनी नियुक्ति पर राहुल शर्मा ने छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल, पूर्व विधायक अरुण वोरा, प्रदेश कांग्रेस कमेटी के महामंत्री राजेंद्र साहू, तथा शहर कांग्रेस कमेटी दुर्ग के अध्यक्ष धीरज बाकलीवाल के प्रति आभार व्यक्त करते हुए उन्हें धन्यवाद दिया।

उनकी नियुक्ति पर बधाई देने वालों में युवा साथियों और कांग्रेस कार्यकर्ताओं की लंबी सूची शामिल है, जिनमें प्रमुख रूप से सुरेश गुप्ता, पिंकी गुप्ता, आशुतोष सिंह, विवेक मिश्रा, नासिर खोखर, विकास पुरोहित, सुरेश देवांगन, प्रकाश शर्मा, गुरदीप भाटिया, विकास राठी, सरोज यादव, प्रवीण चन्द्राकर, छोटे लाला यादव, राकेश सिन्हा, मनीष सोनवानी, लक्ष्मण शर्मा, विक्रांत शर्मा, राजू यादव, योगेश शर्मा, अनूप सिन्हा, विक्की यादव, प्रवीण सिंह, आशीष मेश्राम, सूर्यमणि मिश्रा, बाला पीढ़ियार, सौरभ पांडे, रिंकू शुक्ला, मोनू शर्मा, अजित शुक्ला सहित अनेक कार्यकर्ता शामिल हैं।

कुल मिलाकर, राहुल शर्मा की पुनर्नियुक्ति को दुर्ग कांग्रेस संगठन के लिए मजबूती, युवा नेतृत्व और संघर्ष की नई ऊर्जा के रूप में देखा जा रहा है।

दुर्ग कांग्रेस में नेतृत्व संकट, संगठन सवालों के घेरे में 

दुर्ग। शौर्यपथ राजनीति 

दुर्गनगर निगम के पूर्व महापौर के रूप में धीरज बाकलीवाल की पहचान एक शालीन, सौम्य और मिलनसार जनप्रतिनिधि की रही है। आम जनता के बीच उनका व्यवहारिक व्यक्तित्व स्वीकार्य रहा, लेकिन सक्रिय संगठनात्मक राजनीति में कदम रखते ही उनकी भूमिका पर अब गंभीर प्रश्न उठने लगे हैं। शहर कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद जिस ऊर्जा, आक्रामकता और जमीनी सक्रियता की अपेक्षा कार्यकर्ताओं को थी, वह अब तक दिखाई नहीं दे सकी है।

अध्यक्ष नियुक्ति के साथ ही सोशल मीडिया पर वायरल हुए एक मीम—जिसमें पैसे देकर अध्यक्ष बनने का तंज कसा गया—को शुरुआत में लोगों ने हल्के-फुल्के व्यंग्य के तौर पर लिया। लेकिन बीते कुछ महीनों की संगठनात्मक कार्यप्रणाली ने उस मज़ाक को अब एक राजनीतिक बहस में बदल दिया है। कार्यकर्ताओं के बीच यह चर्चा आम हो चुकी है कि क्या दुर्ग कांग्रेस वास्तव में मजबूत हो रही है या सिर्फ चेहरों का बदलाव हुआ है?

वरिष्ठ नेताओं से दूरी, कमजोर पकड़ का संकेत

धीरज बाकलीवाल के अध्यक्षीय कार्यकाल में सबसे बड़ा सवाल उनकी वरिष्ठ कांग्रेस नेताओं से बढ़ती दूरी को लेकर खड़ा हो रहा है। दीपक दुबे, आर.एन. वर्मा, अरुण वोरा जैसे अनुभवी नेताओं का मंच से धीरे-धीरे गायब होना केवल संयोग नहीं माना जा रहा। इसके विपरीत, जनसमर्थन खो चुके और सीमित प्रभाव वाले चेहरों के साथ नज़दीकियां संगठन की दिशा पर सवाल खड़े करती हैं।

यह तुलना स्वाभाविक रूप से भाजपा संगठन से की जा रही है, जहां आज भी चंद्रिका चंद्राकर, उषा टावरी, रमशिला साहू, लाभचंद बाफना जैसे वरिष्ठ नेताओं को सम्मान, मंच और संगठनात्मक स्थान प्राप्त है। भाजपा में वरिष्ठ-कनिष्ठ संतुलन को संगठनात्मक मजबूती की रीढ़ माना जाता है, जबकि दुर्ग कांग्रेस में यही संतुलन टूटता नजर आ रहा है।

कार्यकारिणी बनी, लेकिन नाराज़गी भी

जिला व शहर कार्यकारिणी की घोषणा के बाद असंतोष खुलकर सामने आने लगा है। अनुभवी और संघर्षशील नेताओं को दरकिनार कर अपेक्षाकृत नए और अनुभवहीन लोगों को बड़ी जिम्मेदारियां देना अब चर्चा का विषय बन चुका है। यह नाराज़गी केवल बंद कमरों तक सीमित नहीं रही—कई कार्यकर्ता सोशल मीडिया के माध्यम से प्रदेश नेतृत्व तक अपनी पीड़ा पहुंचाने लगे हैं।

हाल ही में कांग्रेस कार्यालय से जारी एक तस्वीर, जिसमें अध्यक्ष सभी पदाधिकारियों से मुलाकात करते दिखाई देने थे, उल्टा असर डाल गई। तस्वीर में चंद लोगों की मौजूदगी ने यह सवाल खड़ा कर दिया कि क्या संगठन के भीतर ही संवाद टूट रहा है?

भूपेश बघेल की पसंद पर भी सवाल

धीरज बाकलीवाल का चयन छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री और राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बना चुके भूपेश बघेल की पसंद के रूप में हुआ। ऐसे में अब जब संगठनात्मक निष्क्रियता और असंतोष की खबरें सामने आ रही हैं, तो आलोचना की आंच भूपेश बघेल तक भी पहुंचने लगी है। हालांकि यह स्पष्ट है कि चयन के बाद संगठन को मजबूत करने की जिम्मेदारी शहर अध्यक्ष की होती है।

नेता प्रतिपक्ष की निष्क्रियता ने बढ़ाई मुश्किलें

दुर्ग नगर निगम में नेता प्रतिपक्ष के रूप में संजय कोहले की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। बदहाल निगम व्यवस्था, जनसमस्याएं और प्रशासनिक विफलताओं के बावजूद विपक्ष की आवाज़ कमजोर रही है। इसे भी धीरज बाकलीवाल के निर्णयों और नेतृत्व क्षमता से जोड़कर देखा जा रहा है।

अस्तित्व की लड़ाई या नई शुरुआत?

आज दुर्ग कांग्रेस एक निर्णायक मोड़ पर खड़ी है। सवाल साफ है—

क्या धीरज बाकलीवाल मजबूत इच्छाशक्ति, स्पष्ट निर्णय और समावेशी नेतृत्व के साथ मैदान में उतरेंगे?

या फिर कांग्रेस दुर्ग में केवल दस्तावेजों और पुरानी स्मृतियों तक सिमट कर रह जाएगी?

आने वाले चुनाव सिर्फ सत्ता की नहीं, बल्कि कांग्रेस के संगठनात्मक अस्तित्व की परीक्षा होंगे। अब देखना यह है कि अध्यक्ष पद की कुर्सी धीरज बाकलीवाल के लिए अवसर बनती है या उनकी राजनीतिक उलटी गिनती की शुरुआत।

मुख्यमंत्री साय के ‘सुशासन’ पर भारी पड़ता मुरम माफिया का खुला खेल! दुर्ग (ग्रामीण)। दुर्ग जिले के ग्रामीण अंचलों में अवैध मुरम मिट्टी उत्खनन और परिवहन अब छुपा हुआ नहीं,…

दुर्ग। शौर्यपथ। 

शहर को सुंदर, स्वच्छ और अतिक्रमण-मुक्त बनाने को लेकर दुर्ग नगर निगम और शहरी सरकार की मुखिया महापौर श्रीमती अलका बाघमार द्वारा जारी की जा रही प्रेस विज्ञप्तियाँ देखने-पढ़ने में जितनी प्रशंसनीय लगती हैं, जमीनी हकीकत उससे बिल्कुल उलट नजर आ रही है। नगर निगम के अतिक्रमण विभाग द्वारा की जा रही कार्रवाई ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या दुर्ग में कानून सभी के लिए समान है या फिर यह अमीर-गरीब देखकर लागू किया जा रहा है?

शहरी सरकार के निर्देश पर हाल ही में गरीब पसरा व्यापारियों और फुटपाथ पर रोजी-रोटी कमाने वालों पर कड़ी कार्रवाई की गई। उनका सामान जब्त कर लिया गया, वर्षों से चला आ रहा छोटा-सा व्यवसाय छीन लिया गया। दो वक्त की रोटी कमाने वाले इन लोगों को “अतिक्रमण-मुक्त शहर” के नाम पर बेरोजगार कर दिया गया।

परंतु इसी शहर के इंदिरा मार्केट स्थित गणेश मंदिर के सामने एक बिल्कुल अलग तस्वीर देखने को मिलती है। यहां सड़क की जमीन पर बड़े पैमाने पर ‘राम रसोई’ का संचालन खुलेआम किया जा रहा है। जनहित का नाम लिया जा रहा है, लेकिन वास्तविकता यह है कि यहां एक होटलनुमा व्यावसायिक संचालन हो रहा है, जहां बाकायदा ₹20 प्रति थाली की तय कीमत रखी गई है।

जनहित के कार्यों पर किसी को आपत्ति नहीं, बल्कि यह सराहनीय है कि शहर के बड़े व्यापारी समाजसेवा में आगे आए हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या जनहित के नाम पर सड़क की जमीन पर कब्जा जायज हो जाता है?

अगर यही नियम है, तो शहर में दर्जनों संस्थाएं हैं जो जनसेवा करती हैं—क्या सभी को सड़कों पर कब्जा करने की छूट दी जाएगी?

संविधान की नजर में अमीर और गरीब एक समान हैं, फिर दुर्ग में यह भेदभाव क्यों?

क्या नगर निगम की कार्रवाई सिर्फ गरीबों के लिए है और प्रभावशाली लोगों के लिए नियम बदल जाते हैं?

इतना ही नहीं, निगम कर्मचारियों से मिली जानकारी के अनुसार महापौर अलका बाघमार ने नगर निगम के व्यावसायिक परिसरों के बरामदों में व्यापार करने की अनुमति भी दे दी है। बड़ा सवाल यह है कि—

➡️ क्या किसी महापौर को यह संवैधानिक अधिकार है कि वह आम जनता के लिए बने बरामदों को दुकानों में तब्दील करने की अनुमति दे?

➡️ क्या दुर्ग नगर निगम क्षेत्र में संविधान चलेगा या महापौर का निजी आदेश?

दुर्ग। शौर्यपथ। भारतीय जनता पार्टी पर “दागदार नेताओं को सर्फ से धोकर राजनीति में शामिल करने” का आरोप लगाने वाली कांग्रेस अब खुद उसी आरोपों के घेरे में नजर आ रही है। दुर्ग ग्रामीण कांग्रेस की नई कार्यकारिणी समिति के गठन के बाद महामंत्री पद पर लक्ष्मी साहू की नियुक्ति ने संगठन के भीतर और बाहर राजनीतिक बहस को तेज कर दिया है।

हाल ही में घोषित ग्रामीण कांग्रेस की जंबो कार्यकारिणी में पूर्व जिला पंचायत सदस्य लक्ष्मी साहू को महामंत्री बनाया गया। जैसे ही उनका नाम सूची में सामने आया, राजनीतिक गलियारों में चर्चाओं का दौर शुरू हो गया। सवाल उठने लगे—क्या दुर्ग ग्रामीण कांग्रेस में साफ-सुथरी छवि वाले नेताओं की कमी हो गई है? या फिर कांग्रेस भी अब उसी “वाशिंग मशीन” राजनीति की राह पर है, जिसका वह विरोध करती रही है?

नियुक्ति पर उठे सवाल, संगठन में असंतोष की आहट

वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में जब कांग्रेस पहले से ही बैकफुट पर मानी जा रही है, ऐसे समय में यह नियुक्ति पार्टी के भीतर असहजता का कारण बन गई है। सूत्रों के अनुसार, कुछ कांग्रेसी सदस्य ही इस निर्णय पर सवाल उठा रहे हैं। चर्चा का केंद्र दुर्ग ग्रामीण कांग्रेस अध्यक्ष राकेश ठाकुर की कार्यशैली भी बन गई है।

लक्ष्मी साहू का नाम हाल ही में एक विवाद के कारण भी सुर्खियों में रहा है। रसमड़ा निवासी संतोष रामटेक ने पुलिस अधीक्षक को शिकायत सौंपकर लक्ष्मी साहू, उनके पति यशवंत साहू और मोनिका साहू पर गंभीर आरोप लगाए हैं। शिकायत में आरोप है कि कांग्रेस पार्टी के नाम पर नौकरी दिलाने का झांसा देकर पैसे लिए गए और कार्य न होने पर रकम वापस मांगने पर कथित रूप से धमकी दी गई। संतोष रामटेक ने यह भी दावा किया है कि उनकी मां के साथ मारपीट की गई, जिसका वीडियो उन्होंने सबूत के तौर पर प्रस्तुत करने की बात कही है।

हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि या पुलिस द्वारा किसी निर्णायक कार्रवाई की जानकारी अभी सार्वजनिक रूप से स्पष्ट नहीं है, लेकिन राजनीतिक चर्चा में इन आरोपों का उल्लेख प्रमुखता से हो रहा है।

क्या संगठन को अंधेरे में रखा गया?

लक्ष्मी साहू की नियुक्ति के बाद यह भी चर्चा उठी कि क्या राकेश ठाकुर ने संगठन के वरिष्ठ पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं को विश्वास में लिया था? क्या यह निर्णय सर्वसम्मति से हुआ या शीर्ष स्तर पर तय कर दिया गया?

राकेश ठाकुर की ग्रामीण कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में नियुक्ति के समय भी संगठन के भीतर विरोध के स्वर सुनाई दिए थे। ऐसे में अब यह नया विवाद उनके नेतृत्व पर दोबारा सवाल खड़े कर रहा है। यह भी कहा जा रहा है कि हाल ही में लक्ष्मी साहू का रामटेक परिवार से विवाद सामने आया था, जिससे यह मुद्दा और संवेदनशील बन गया है।

‘काबिलियत या सेटिंग’ की बहस

संगठन के भीतर यह भी फुसफुसाहट है कि क्या नियुक्तियां काबिलियत के आधार पर हो रही हैं या “सेटिंग” के जरिए? क्या कांग्रेस में सर्वसम्मति और सामूहिक निर्णय की परंपरा कमजोर पड़ रही है?

पूर्व में भी राकेश ठाकुर पर दुर्ग में कांग्रेसी नेताओं के फोटो पोस्टरों से हटवाने को लेकर विवाद खड़ा हो चुका है। ऐसे में यह नया घटनाक्रम उनकी कार्यप्रणाली को लेकर आलोचनाओं को और बल दे रहा है।

कांग्रेस की छवि पर असर?

राजनीति में आरोप-प्रत्यारोप और चर्चा होना सामान्य बात है, लेकिन जब हर चर्चा नकारात्मक दिशा में जाए तो उसका असर संगठन की छवि पर पड़ना स्वाभाविक है। दुर्ग ग्रामीण कांग्रेस अब अपनी जंबो टीम के साथ राजनीतिक मुकाबले के लिए मैदान में उतर चुकी है, लेकिन यह देखना दिलचस्प होगा कि यह चयन प्रक्रिया भविष्य में संगठन को मजबूती देती है या आंतरिक असंतोष को और बढ़ाती है।

फिलहाल, लक्ष्मी साहू की नियुक्ति ने दुर्ग की राजनीति में नई बहस को जन्म दे दिया है। आने वाले समय में पुलिस जांच और संगठनात्मक प्रतिक्रिया किस दिशा में जाती है, यही तय करेगा कि यह विवाद अस्थायी राजनीतिक शोर है या कांग्रेस के लिए दीर्घकालिक चुनौती।

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