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धर्म संसार / शौर्यपथ / प्रभु यीशु के जन्म की ख़ुशी में मनाया जाने वाला क्रिसमस का त्योहार पूरी दुनिया में मनाया जाता है। यह त्योहार कई मायनों में बेहद खास है। क्रिसमस को बड़ा दिन, सेंट स्टीफेंस डे या फीस्ट ऑफ़ सेंट स्टीफेंस भी कहा जाता है। प्रभु यीशु ने दुनिया को प्यार और इंसानियत की शिक्षा दी। उन्होंने लोगों को प्रेम और भाईचारे के साथ रहने का संदेश दिया। प्रभु यीशु को ईश्वर का इकलौता प्यारा पुत्र माना जाता है। इस त्योहार से कई रोचक तथ्य जुड़े हैं। आइए जानते हैं इनके बारे में।
क्रिसमस ऐसा त्योहार है जिसे हर धर्म के लोग उत्साह से मनाते हैं। यह एकमात्र ऐसा त्योहार है जिस दिन लगभग पूरे विश्व में अवकाश रहता है। 25 दिसंबर को मनाया जाने वाला यह त्योहार आर्मीनियाई अपोस्टोलिक चर्च में 6 जनवरी को मनाया जाता है। कई देशों में क्रिसमस का अगला दिन 26 दिसंबर बॉक्सिंग डे के रूप मे मनाया जाता है। क्रिसमस पर सांता क्लॉज़ को लेकर मान्यता है कि चौथी शताब्दी में संत निकोलस जो तुर्की के मीरा नामक शहर के बिशप थे, वही सांता थे। वह गरीबों की हमेशा मदद करते थे उनको उपहार देते थे। क्रिसमस के तीन पारंपरिक रंग हैं हरा, लाल और सुनहरा। हरा रंग जीवन का प्रतीक है, जबकि लाल रंग ईसा मसीह के रक्त और सुनहरा रंग रोशनी का प्रतीक है। क्रिसमस की रात को जादुई रात कहा जाता है। माना जाता है कि इस रात सच्चे दिल वाले लोग जानवरों की बोली को समझ सकते हैं। क्रिसमस पर घर के आंगन में क्रिसमस ट्री लगाया जाता है। क्रिसमस ट्री को दक्षिण पूर्व दिशा में लगाना शुभ माना जाता है। फेंगशुई के मुताबिक ऐसा करने से घर में सुख समृद्धि आती है। पोलैंड में मकड़ी के जालों से क्रिसमस ट्री को सजाने की परंपरा है। मान्यता है कि मकड़ी ने सबसे पहले जीसस के लिए कंबल बुना था।
देबी ने सात साल की उम्र में ही अपने माता-पिता को खो दिया था, इसके बाद उन्हें अपने चाचा-चाची के साथ रहना पड़ा और आर्थिक मुश्किलों का सामना करना पड़ा
बोकाखात में 'खेलो इंडिया सेंटर' के एक कोच के कहने पर साल 2022 में देबी ने पावर लिफ्टिंग छोड़कर कुश्ती को अपनाया
रायपुर /'जब हालात मुश्किल होते हैं, तो मजबूत लोग आगे बढ़ते हैं- यह एक मशहूर कहावत है जो खेलों में बेहतरीन प्रदर्शन करने की ललक को बयां करती है। असम की महिला पहलवान देबी डायमारी की कहानी बाधाओं को पार करने की इच्छाशक्ति और दृढ़ संकल्प का प्रतीक है। आखिरकार देबी को उन सभी प्रयासों का फल तब मिला, जब उन्होंने यहां 'खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स' में महिलाओं की 62 किलोग्राम वर्ग में रजत पदक जीता।
असम के गोलाघाट जिले के सिसुपानी स्थित दिनेशपुर गांव की रहने वाली 28 वर्षीय देबी ने सात साल की उम्र में ही अपने माता-पिता को खो दिया था। इसके बाद उन्हें अपने चाचा-चाची के साथ रहना पड़ा और आर्थिक तंगी के चलते अपनी ट्रेनिंग जारी रखने के लिए उन्हें छोटे-मोटे काम भी करने पड़े। बोडो ट्राइब से आने वाली देबी कहती हैं, '' इस पदक के पीछे मेरी कड़ी मेहनत है। मैंने चार साल पहले ही 2022 में गोलाघाट जिले के बोकाखात में काजीरंगा के बगल में खेलो इंडिया सेंटर में कुश्ती शुरू की थी। इसमें प्रैक्टिस करने के लिए मुझे सेंटर के आसपास रूम लेकर रहना पड़ा। रूम का 1000 रुपया किराया देने के लिए मेरे पास पैसे नहीं थे, इसलिए मुझे एक साल तक पार्ट टाइम जॉब भी करना पड़ा।''
वह आगे कहती हैं, '' पहले तो मुझे 2022 में 2500 रुपये मासिक वेतन पर ईजी बाजार (बोकाखात) स्टोर में काम करना पड़ा और फिर 2023 में काजीरंगा में स्थित बोन विला रिसॉर्ट में करीब 7000 रुपये के मासिक वेतन पर जॉब करना पड़ा। वहां पर मैं स्वीमिंग पूल की देखभाल और सफाई करती थीं।'' उन्होंने आगे कहा, ''सारा दिन काम करने के बाद शाम को सिर्फ दो घंटे के लिए मैं कुश्ती की प्रैक्टिस कर पाती थी। मैंने जितना भी किया, उसके बदले मुझे ये रजत मिला। लेकिन मैं इससे संतुष्ट नहीं हूं और मैं अब और कड़ी मेहनत करके आगे गोल्ड जीतना चाहती हूं।''
कुश्ती में मैट पर उतरने से पहले देबी पॉवरलिफ्टिंग और आर्म रेसलिंग करती थीं। लेकिन साल 2022 में उनकी मुलाकात असम टीम के कोच अनुस्तूप नाराह (ANUSTUP NARAH) से हुई, जिनके मार्गदर्शन में रहकर वह कुश्ती की दांव पेंच सीखी हैं। कोच अनुस्तूप कहते हैं, '' 2022 में जब बोकाखात में पंजा टूर्नामेंट हुआ था तो उस दौरान वह मुझे मिली और मैंने उन्हें देखते ही कह दिया कि तुम रेसलिंग करो। उसने सोच विचार के बाद मुझे हां- कह दिया और फिर मैंने उन्हें सबसे पहले सेंटर के पास ही रहने के लिए कहा ताकि ट्रेनिंग के लिए पर्याप्त समय मिल सके। वह बोली कि सर यहां तो रूम लेकर रहना पड़ेगा और मेरे पास इतने पैसे तो नहीं है। फिर मैंने गोलाघाट जिले के कुश्ती सहायक सचिव से कहकर देबी को काम दिलवाया और एक साइकिल भी दिलवाई। देबी उसी साइकिल से जॉब करने लगी और फिर वह सेंटर के पास रहकर ही प्रैक्टिस भी करने लगी।''
देबी डायमारी ने 2022 में अपने ही जिले के बोकाखात में काजीरंगा स्थित खेलो इंडिया सेंटर में कुश्ती शुरू की थी और उसी साल उन्होंने विशाखापत्तनम में हुए सीनियर चैंपियनशिप के लिए क्वालीफाई कर लिया। इसके बाद साल बाद ही उन्होंने 2024 में स्टेट चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक जीता। देबी की पिछले साल ही शादी हुई है और उनका पति बेंगलोर में प्राइवेट नौकरी करता है। वह कहती हैं, '' ससुराल वाले मुझे हर तरह से बहुत सपोर्ट करते हैं। पति भी मुझे बहुत सपोर्ट करता है और वह बेंगलुरु से बराबर पैसा भेजता रहता है ताकि मुझे कोई चीज की दिक्कत ना हो।''
देबी डायमारी ने कहा, '' मेरा अगला लक्ष्य सीनियर लेवल पर और पदक जीतना है ताकि मैं उसके बाद इंटरनेशनल लेवल पर भाग ले सकूं। ये सब करने के लिए मैं दिन-रात कड़ी मेहनत कर रही हूं। यहां से जाने के बाद अब देखेंगे कि कोच साहब क्या प्लानिंग करते हैं और फिर हम उसी के हिसाब से काम करेंगे।''
रायपुर / गाँव में कभी बस की पहुँच नहीं थी, आज वहाँ बस के आते ही बच्चों के चेहरे खिल उठते हैं। सड़क पर बस दिखते ही बच्चे हाथ हिलाकर खुशी जाहिर करते हैं और हॉर्न की आवाज़ सुनते ही लोग घरों से बाहर निकल आते हैं—एक नई उम्मीद के साथ। यह उम्मीद अब शहर मुख्यालय, नगर मुख्यालय और विकासखंड मुख्यालय तक आसान पहुँच की है।
यात्री बस में बैठकर लोग उन दिनों को याद करते हैं, जब उन्हें पैदल या किसी निजी वाहन के सहारे दूसरे स्थानों तक जाना पड़ता था। अब हालात बदल चुके हैं। स्कूल के बच्चे समय पर स्कूल पहुँच रहे हैं, वहीं अधिकारी-कर्मचारी भी समय पर अपनी ड्यूटी पर पहुँच पा रहे हैं। यह बदलाव सिर्फ़ सुविधा का नहीं, बल्कि उन ग्रामीण परिवारों के सपनों का है जो विकसित भारत की कल्पना को अपने जीवन में साकार होते देख रहे हैं। यह परिवर्तन मुख्यमंत्री विष्णु देव साय की महत्वाकांक्षी मुख्यमंत्री ग्रामीण बस योजना से संभव हो पाया है। इस योजना के तहत आज बसें उन गाँवों तक पहुँच रही हैं, जहाँ पहले कभी बस नहीं पहुँची थी।
पहाड़ी अंचल की महिलाओं को मिली राहत
जशपुर जिला के बगीचा विकासखंड के सन्ना निवासी आंगनबाड़ी कार्यकर्ता श्रीमती सुनीता निकुंज बताती हैं कि पहले उन्हें पास के गाँव स्थित आंगनबाड़ी केंद्र तक पहुँचने के लिए किसी से लिफ्ट लेनी पड़ती थी, निजी वाहन या पैदल जाना पड़ता था। पहाड़ी क्षेत्र होने के कारण यह बहुत कठिन था। अब ग्रामीण बस से उनकी यह समस्या दूर हो गई है। वे कहती हैं, “यह बस मेरे लिए बहुत बढ़िया साधन बन गई है।”
ग्रामीणों के चेहरे पर लौटी मुस्कान
बस में सफर कर रहे ग्राम मरंगी निवासी श्री दशरथ भगत हँसते हुए बताते हैं कि पहले इस सड़क पर बस नहीं चलती थी, इसलिए पैदल ही आना-जाना करना पड़ता था। बस का नाम लेते ही उसका चेहरा खिल गया l उन्होंने बताया कि “अब मुख्यमंत्री जी की पहल से बस शुरू हो गई है। हम आसानी से बगीचा जाते हैं और समय पर वापस भी लौट आते हैं।”
यात्री श्री मंगलराम बताते हैं कि पहले वे छिछली और चंपा जैसे बाजारों तक पैदल जाया करते थे। “अब बस आने से बहुत सुविधा हो गई है। हम सब बहुत खुश हैं।”
मुख्यमंत्री ग्रामीण बस योजना से न केवल यात्रा सुगम हुई है, बल्कि ग्रामीणों को स्वास्थ्य, शिक्षा और प्रशासनिक कार्यों के लिए शहर तक पहुँचने में भी बड़ी सुविधा मिली है। यह योजना ग्रामीण जीवन को मुख्यधारा से जोड़ने की दिशा में एक सशक्त कदम साबित हो रही है और जशपुर जैसे पहाड़ी व दूरस्थ क्षेत्रों में विकास की नई राह खोल रही है।
किरण भारत के लिए खेल चुकी हैं और क्रोएशियन महिला लीग में डिनामो ज़ाग्रेब के लिए भी खेली हैं
किसी भी पोज़िशन पर खेलने की क्षमता उनकी सबसे बड़ी ताकत
रायपुर / जब खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स के सेमीफाइनल में अरुणाचल प्रदेश के खिलाफ पेनल्टी शूटआउट के दौरान किरण पिस्दा ने गोलकीपिंग के दस्ताने पहने, तब वह अपने अब तक के अनुभवों पर भरोसा कर रही थीं। उन अनुभवों पर, जिन्होंने चुनौतियों और निराशाओं के बीच उन्हें और अधिक मजबूत बनाया।
24 साल की उम्र में किरण अपने खेल कौशल के शिखर पर नजर आती हैं। वह यूरोप में लीग फुटबॉल खेल चुकी हैं और अब बड़े अंतर्राष्ट्रीय टूर्नामेंटों के लिए भारतीय टीम में जगह बनाने की दहलीज पर हैं।
हालांकि, उनका यह सफर बिल्कुल आसान नहीं रहा, भले ही उन्हें स्कूल और परिवार से शुरुआती समर्थन मिला। उनके भाई गिरीश पिस्दा, जो खुद राष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी हैं, उनके लिए प्रेरणा बने।
किरण ने साई मीडिया से कहा, “मुझे स्कूल में काफी सपोर्ट मिला। वहीं से मुझे राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर खेलने के मौके मिले और हर चयन के साथ मेरा आत्मविश्वास बढ़ता गया।” इसके बाद किरण शारीरिक शिक्षा में डिग्री हासिल करने के लिए रायपुर आईं। छत्तीसगढ़ महिला लीग के दौरान उन्होंने चयनकर्ताओं का ध्यान खींचा और उन्हें राष्ट्रीय शिविर के लिए बुलावा मिला।
किरण बताती हैं, “उस समय मैं शारीरिक रूप से उतनी फिट नहीं थी और मेरा मानसिक स्तर भी सीनियर खिलाड़ियों के साथ प्रतिस्पर्धा करने के लिए तैयार नहीं था।” यही कारण रहा कि उस राष्ट्रीय शिविर में उन्हें भारतीय टीम के लिए चयन नहीं मिला। वह कहती हैं, “मुझे एहसास हुआ कि वहां जो अनुभव मिला है, उस पर मुझे काम करना होगा।”
इसके बाद उनके जीवन में आत्म-सुधार का एक कठिन दौर शुरू हुआ। उन्होंने अपनी फिटनेस पर काम किया, मैचों का विश्लेषण करना शुरू किया और अपनी पोज़िशनल समझ को बेहतर बनाया। लेकिन सबसे बड़ा बदलाव उनकी मानसिकता में आया।
वह कहती हैं, “मैंने खुद से कहा कि चाहे कुछ भी हो जाए, मैं नकारात्मक नहीं सोचूंगी। अगर आप नकारात्मक हो जाते हैं, तो उसका सीधा असर आपके प्रदर्शन पर पड़ता है।” इस बदलाव में उनके मेंटर और कोच योगेश कुमार जांगड़ा की महत्वपूर्ण भूमिका रही। किरन ने कहा,“जब भी मुझे लगता है कि मैं अच्छा प्रदर्शन नहीं कर रही हूं या मन खराब होता है, तो मैं उनसे बात करती हूं। वह हमेशा मुझे सकारात्मक रहने और आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करते हैं।”
किरण की मेहनत का असर धीरे-धीरे दिखने लगा। घरेलू स्तर पर उनके प्रदर्शन ने केरल ब्लास्टर्स जैसे क्लबों के दरवाजे खोले, जहां उन्होंने खुद को और निखारा। उनकी सबसे बड़ी ताकत उनकी बहुमुखी प्रतिभा बन गई। वह कहती हैं, “मैंने स्ट्राइकर के रूप में शुरुआत की, फिर मिडफील्ड में खेली और अब राष्ट्रीय टीम के लिए फुल-बैक के रूप में खेलती हूं। एक फुटबॉलर के रूप में आपको अपनी टीम के लिए कई पोज़िशन पर खेलने के लिए तैयार रहना चाहिए।”
किरण कई बार भारत का प्रतिनिधित्व कर चुकी हैं। वह 2022 के सैफ़ चैंपियनशिप स्क्वाड का हिस्सा रही हैं और क्रोएशियन महिला लीग में डिनामो ज़ाग्रेब के लिए भी खेल चुकी हैं। फिर भी, इस मुकाम पर भी असफलताएं उनके सफर का हिस्सा रही हैं। हाल ही में ऑस्ट्रेलिया में आयोजित एएफसी (AFC) महिला एशियन कप जैसे बड़े टूर्नामेंट के लिए चयन न होना उनके लिए एक और परीक्षा थी।
किरण कहती हैं, “बड़े टूर्नामेंट के लिए चयन न होना दुख देता है। हर खिलाड़ी इसे महसूस करता है। लेकिन अब मैं इसे अलग नजरिए से देखती हूं। इसे मैं और मेहनत करने और मजबूत वापसी करने की प्रेरणा मानती हूं।” दबाव को संभालना उनकी पहचान बन चुका है। चाहे टीम में जगह के लिए प्रतिस्पर्धा हो या अहम मैचों में प्रदर्शन, उन्होंने खुद को संयमित रखना सीख लिया है। वह कहती हैं, “ऊंचे स्तर पर खेलते समय दबाव हमेशा रहता है। आपको उसे संभालना सीखना पड़ता है।”
किरण टीम के प्रदर्शन की भूमिका को भी महत्वपूर्ण मानती हैं। उन्होंने कहा, “अगर टीम अच्छा कर रही होती है, तो हर खिलाड़ी आत्मविश्वास से भरा होता है। लेकिन जब टीम हार रही होती है, तो व्यक्तिगत प्रदर्शन भी प्रभावित होता है।” जनजातीय पृष्ठभूमि से आने वाली किरण दूर-दराज के इलाकों के खिलाड़ियों की चुनौतियों को अच्छी तरह समझती हैं। उनका मानना है कि खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स जैसे मंच इस अंतर को पाटने में अहम भूमिका निभा रहे हैं।
वह कहती हैं, “जनजातीय इलाकों में बहुत प्रतिभा है, लेकिन खिलाड़ियों को हमेशा मौके नहीं मिलते। खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स ने उन्हें अपनी प्रतिभा दिखाने का मंच दिया है। इससे उन्हें आत्मविश्वास और राज्य तथा देश के लिए खेलने का सपना देखने की प्रेरणा मिलती है।” जहां तक किरण का सवाल है, उनका फोकस फिलहाल इंडियन वुमेंस लीग जैसी घरेलू प्रतियोगिताओं में लगातार अच्छा प्रदर्शन करने और राष्ट्रीय टीम में नियमित जगह बनाने पर है। लेकिन उनका लक्ष्य इससे कहीं बड़ा है।
वह कहती हैं, “मैं लगातार खुद को बेहतर बनाना चाहती हूं, नियमित प्रदर्शन करना चाहती हूं और बड़े टूर्नामेंट में भारत का प्रतिनिधित्व करना चाहती हूं। अगर आपका चयन नहीं होता, तो इसका मतलब यह नहीं कि आप अच्छे खिलाड़ी नहीं हैं—इसका मतलब है कि आपको और मेहनत करनी होगी।”
अजय चंद्राकर की खास रिपोर्ट
सुकमा, शौर्यपथ। ग्राम जगरगुंडा जिला सुकमा क्षेत्र अंतर्गत खसरा नंबर 386 पर प्रस्तावित सड़क निर्माण कार्य को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। संबंधित भूमि के भू-स्वामी माड़वी सत्यानारायण ने आरोप लगाया है कि उनकी असहमति के बावजूद उनकी निजी भूमि पर सड़क निर्माण से संबंधित प्रारंभिक कार्य किया गया।
प्राप्त जानकारी के अनुसार, सड़क निर्माण कार्य से जुड़े ठेकेदार द्वारा भूमि की सफाई एवं मुरूम डालने का कार्य किया गया, जबकि भू-स्वामी का दावा है कि उन्होंने पूर्व में ही इस पर आपत्ति दर्ज कराई थी। भू-स्वामी ने मामले में स्थानीय राजस्व अधिकारियों की भूमिका पर भी सवाल उठाए हैं। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है।
मामले को लेकर यह प्रश्न भी उठ रहा है कि क्या निर्माण कार्य से पूर्व नियमानुसार भूमि का सर्वे एवं आवश्यक अनुमति की प्रक्रिया पूरी की गई थी। यदि प्रक्रिया का विधिवत पालन हुआ होता, तो विवाद की स्थिति से बचा जा सकता था।
इस संबंध में पटवारी बुधराम बघेल ने बताया कि संबंधित दिन वे कार्यालयीन कार्य से तहसील कार्यालय में थे और उन्हें मौके पर चल रहे कार्य की जानकारी नहीं थी।
इस सम्बन्ध मे तहसीलदार योपेंद्र पात्रे से फ़ोन पे जानकारी चाही गई तो उन्होंने स्पष्ट किया है कि यदि संबंधित भू-स्वामी भूमि उपलब्ध कराने के लिए सहमत नहीं हैं, तो वैकल्पिक रूप से अन्य शासकीय भूमि पर सड़क निर्माण कार्य किया जायेगा।
इधर, यह मुद्दा भी उभरकर सामने आया है कि यदि सड़क निर्माण अंततः अन्य भूमि पर किया जाना है, तो निजी भूमि पर किए गए प्रारंभिक कार्य में हुए व्यय की जवाबदेही किसकी होगी। इस संबंध में अब तक कोई आधिकारिक स्पष्टता सामने नहीं आई है।
भू-स्वामी का कहना है कि उनकी भूमि का सीमांकन पूर्व में किया जा चुका है और बिना अनुमति किसी भी प्रकार का कार्य किया जाना उचित नहीं है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि वे अपनी भूमि सड़क निर्माण हेतु देने के पक्ष में नहीं हैं।
फिलहाल, यह मामला प्रशासनिक प्रक्रिया, पारदर्शिता एवं नागरिक अधिकारों से जुड़ा विषय बन गया है। संबंधित अधिकारियों द्वारा मामले की जांच के बाद ही स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।
जगदलपुर, शौर्यपथ । विश्व हिंदू परिषद बजरंग दल द्वारा हनुमान जन्मोत्सव के पावन अवसर पर एक भव्य एवं दिव्य आयोजन किया गया। कार्यक्रम की शुरुआत सिरासार भवन में दीप प्रज्वलित कर की गई। इसके पश्चात सभी पदाधिकारी एवं बजरंगी कार्यकर्ता रैली के रूप में टेकरी स्थित हनुमान मंदिर पहुँचे, जहाँ सामूहिक रूप से हनुमान चालीसा का पाठ किया गया।
प्रांत सह मंत्री रवि ब्रह्मचारी ने कहा कि हमारी संस्कृति ही हमारी पहचान है, और हम सभी को मिलकर सनातन एकता का परिचय देना आवश्यक है। जिलाध्यक्ष शंकर लाल गुप्ता ने कहा कि हमारे बजरंगी ही हमारी सबसे बड़ी ताकत हैं। उन्होंने धर्मांतरण कानून का समर्थन करते हुए सरकार का धन्यवाद किया और कहा, "यह कानून हमारी संस्कृति और धर्म की रक्षा के लिए आवश्यक है, और हम इसका स्वागत करते हैं।" उन्होंने आगे कहा कि बजरंग दल इस कानून को लागू करने में सरकार का हर संभव सहयोग करेगा।
अरविंद नेताम ने संबोधन करते हुए कहा कि धर्मांतरण आज हमारे समाज के लिए सबसे बड़ा खतरा बना है, "हम अपनी संस्कृति और धर्म की रक्षा के लिए हमेशा तत्पर हैं, और किसी भी प्रकार के धर्मांतरण को बर्दाश्त नहीं करेंगे।"सरकार द्वारा लाए गए कानून का समर्थन कर स्वागत करते हैं।
कार्यक्रम में राजा राम तोड़ेम, दशरथ कश्यप, जागेश्वर साहू, प्रेम चालकी, जविता मंडावी, जिला संयोजक विष्णु ठाकुर, सहसंयोजक योगेश, सेवा प्रमुख अनिल अग्रवाल, अर्चक पुरोहित पंकज मिश्रा, सेवा प्रमुख पवन राजपूत, योगेंद्र कौशिक, विभाग सह मंत्री श्रीनिवास रेड्डी विक्रम सिंह ठाकुर, प्रतिक गुरु,मनोज कुमार ठाकुर, प्रेमसागर ठाकुर ,सहित अनेक कार्यकर्ता एवं सनातनी उपस्थित रहे। कार्यक्रम का समापन योगेंद्र कौशिक द्वारा सभी अतिथियों का आभार व्यक्त कर किया गया।
भिलाई / शौर्यपथ
दुर्ग जिले में हनुमान जन्मोत्सव इस वर्ष आस्था, ऊर्जा और सामाजिक जागरूकता के अद्भुत संगम के रूप में मनाया गया। जिले के कोने-कोने में “जय श्री राम” और “जय बजरंगबली” के जयघोष गूंजते रहे, जिससे पूरा वातावरण भक्तिमय हो उठा। सुबह से ही मंदिरों में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ी, जहाँ बजरंगबली को सिंदूर का चोला अर्पित कर सुख-समृद्धि की कामना की गई।
इसी क्रम में भिलाई के कोहका स्थित “बीरा के अंगना” में समाजसेवी इंद्रजीत सिंह के नेतृत्व में भव्य, अनुशासित और प्रेरणादायक कार्यक्रम का आयोजन किया गया, जो पूरे क्षेत्र में आकर्षण का केंद्र बना रहा।
कार्यक्रम की सबसे विशेष झलक 51 पंडितों के सानिध्य में हनुमान चालीसा का सस्वर पाठ रहा, जिसने पूरे वातावरण को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर दिया। मंत्रों की गूंज और भक्ति की लहर ने उपस्थित श्रद्धालुओं को भावविभोर कर दिया।
धार्मिक आयोजन के साथ-साथ सामाजिक सरोकारों को भी प्रमुखता दी गई। बच्चों के लिए कराटे डेमो क्लास का आयोजन किया गया, वहीं बच्चियों को विशेष आत्मरक्षा प्रशिक्षण देकर उन्हें आत्मनिर्भर और सशक्त बनने का संदेश दिया गया।
इस अवसर पर समाजसेवी इंद्रजीत सिंह ने सभी के सुख-शांति और समृद्धि की कामना की। कार्यक्रम में उपस्थित गणमान्य अतिथियों ने कहा कि हनुमान जी के साहस, सेवा और समर्पण के भाव को अपने जीवन में उतारना ही सच्ची भक्ति है।
पूरे जिले में निकली भव्य शोभायात्राएं, भंडारे और सामूहिक आयोजन इस पर्व को जन-जन का उत्सव बना रहे हैं। खासकर युवाओं और महिलाओं की बढ़ती सहभागिता ने धार्मिक आयोजनों को एक नई सकारात्मक दिशा दी है, जिससे समाज में ऊर्जा और एकता का संदेश प्रसारित हो रहा है।
? कोहका का यह आयोजन न केवल आस्था का प्रतीक बना, बल्कि समाज को सशक्त और जागरूक बनाने का प्रेरणास्रोत भी साबित हुआ।
? धमतरी / शौर्यपथ
✍️ संभाग प्रमुख: कुमार नायर
धमतरी पुलिस द्वारा अवैध जुआ-सट्टा के विरुद्ध चलाए जा रहे अभियान के तहत सिटी कोतवाली पुलिस ने एक बड़ी कार्रवाई करते हुए बनियापारा क्षेत्र में सट्टा खिलाने वाले खाईवाल को रंगे हाथ गिरफ्तार किया है।
पुलिस से प्राप्त जानकारी के अनुसार, पेट्रोलिंग के दौरान कोतवाली पुलिस टीम को मुखबिर से सूचना मिली कि बनियापारा में एक व्यक्ति अवैध रूप से सट्टा संचालित कर रहा है। सूचना को गंभीरता से लेते हुए पुलिस ने तत्काल टीम गठित कर बताए गए स्थान पर घेराबंदी कर दबिश दी।
कार्रवाई के दौरान आरोपी दिनेश ढीमर उर्फ चिकु (40 वर्ष) को लोगों से पैसे लेकर सट्टा लगवाते और अंकों वाली सट्टा पट्टी लिखते हुए रंगे हाथ पकड़ लिया गया।
पुलिस ने आरोपी के कब्जे से गवाहों की उपस्थिति में 1000 रुपये नगद, तीन सट्टा पट्टी एवं एक डॉट पेन जब्त किया। जब्त सट्टा पट्टियों में विभिन्न नामों के सामने अंकों में रकम दर्ज पाई गई, जो अवैध सट्टा संचालन की पुष्टि करती है।
इस कृत्य को छत्तीसगढ़ जुआ प्रतिषेध अधिनियम 2022 की धारा 6(क) के तहत अपराध पाए जाने पर आरोपी के खिलाफ वैधानिक कार्रवाई करते हुए उसे गिरफ्तार कर न्यायिक रिमांड पर जेल भेज दिया गया है।
? आरोपी का विवरण:
दिनेश ढीमर उर्फ चिकु
पिता – लक्ष्मीनारायण
उम्र – 40 वर्ष
निवासी – बनियापारा, धमतरी
थाना – सिटी कोतवाली, जिला धमतरी
? धमतरी पुलिस ने स्पष्ट किया है कि जिले में जुआ, सट्टा एवं अन्य अवैध गतिविधियों के विरुद्ध इसी प्रकार सख्त और निरंतर कार्रवाई आगे भी जारी रहेगी।
? धमतरी / शौर्यपथ
✍️ संभाग प्रमुख: कुमार नायर
धमतरी जिले के मगरलोड थाना अंतर्गत चौकी करेलीबड़ी क्षेत्र के ग्राम हरदी में नवविवाहिता की संदिग्ध मृत्यु का मामला अब सनसनीखेज हत्या में बदल गया है। पुलिस की गहन विवेचना में चौंकाने वाला खुलासा हुआ है कि महिला की हत्या उसके ही पति ने गला घोंटकर की, जबकि सास ने सच्चाई छुपाने का प्रयास किया।
प्राप्त जानकारी के अनुसार, 30 मार्च 2026 को ग्राम हरदी में नवविवाहिता की मृत्यु की सूचना मिलते ही करेलीबड़ी पुलिस टीम तत्काल मौके पर पहुंची। प्रारंभिक जांच में मामला संदिग्ध प्रतीत होने पर मर्ग कायम कर गंभीरता से जांच शुरू की गई। घटनास्थल का बारीकी से निरीक्षण, परिस्थितिजन्य साक्ष्य एकत्रण और गवाहों के बयान के आधार पर पुलिस ने हर पहलू की सूक्ष्म जांच की।
शव परीक्षण रिपोर्ट ने पूरे मामले का रुख बदल दिया। रिपोर्ट में स्पष्ट हुआ कि महिला की मृत्यु श्वास अवरुद्ध (गला घोंटने) से हुई है और इसकी प्रकृति हॉमीसाइडल यानी हत्या है। इसके बाद पुलिस ने जांच का दायरा और तेज कर दिया।
विवेचना के दौरान एफएसएल टीम की तकनीकी जांच और लगातार पूछताछ में यह तथ्य सामने आया कि मृतिका और उसके पति चन्द्रशेखर यादव के बीच संतान को लेकर अक्सर विवाद होता था। घटना वाले दिन भी इसी बात को लेकर दोनों के बीच कहासुनी हुई, जो हिंसक रूप ले बैठी। गुस्से में आकर आरोपी पति ने रस्सी से गला दबाकर अपनी पत्नी की हत्या कर दी।
पुलिस की सख्त पूछताछ और निगरानी के चलते आरोपी चन्द्रशेखर यादव (26 वर्ष) ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया। उसकी निशानदेही पर घटना में प्रयुक्त काले रंग की नोई रस्सी भी बरामद कर ली गई। आरोपी को 1 अप्रैल 2026 को विधिवत गिरफ्तार कर लिया गया।
जांच में यह भी सामने आया कि आरोपी की मां रिना बाई यादव (46 वर्ष) ने घटना को छुपाने के लिए मृतिका की मौत को सीने में दर्द से होना बताया और पुलिस को गुमराह करने की कोशिश की। साक्ष्य छुपाने के इस प्रयास के चलते पुलिस ने उन्हें भी गिरफ्तार कर लिया।
पुलिस ने दोनों आरोपियों के खिलाफ अपराध क्रमांक 51/2026 के तहत धारा 103(1) और 238(क) भारतीय न्याय संहिता में मामला दर्ज कर न्यायिक रिमांड पर जेल भेज दिया है।
? आरोपीगण:
? यह घटना एक बार फिर पारिवारिक विवादों के भयावह परिणाम को उजागर करती है, जहां रिश्तों की नींव ही हिंसा में बदल गई।
नरेश देवांगन की खास रिपोर्ट
जगदलपुर, शौर्यपथ। राज्य सरकार द्वारा रेत माफियाओं पर लगाम कसने के लिए लगातार सख्त निर्देश जारी किए जा रहे हैं। अवैध उत्खनन, परिवहन और पर्यावरणीय क्षति को रोकने के उद्देश्य से समय-समय पर समीक्षा और निगरानी भी की जा रही है। शासन की मंशा स्पष्ट है कि प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग नियमों के दायरे में हो और किसी भी प्रकार की अनियमितता पर कठोर कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।
इसके बावजूद ताज़ा मामला ग्राम पंचायत बेलगांव का है, जहां शासन की मंशा के विपरीत गतिविधियों के सामने आने के आरोप लग रहे हैं। प्राप्त जानकारी और सूत्रों के अनुसार, क्षेत्र में कथित रूप से अवैध रेत उत्खनन जारी है, जहां नियमों की अनदेखी करते हुए रेत निकासी की जा रही है।
बताया जाता है कि माइनिंग विभाग द्वारा पूर्व में कार्रवाई करते हुए एक पोकलेन मशीन को सील किया गया था, लेकिन इसके बाद भी संबंधित मशीन के उपयोग में आने की बात सामने आई है। मामले की गंभीरता को देखते हुए जब विभागीय टीम पुनः मौके पर पहुंची और मशीन को जब्त कर थाना ले जाने का प्रयास किया गया, तब कुछ ग्रामीणों द्वारा विरोध किए जाने की सूचना है।
सूत्रों के हवाले से यह भी जानकारी मिल रही है कि कुछ बाहरी प्रभावशाली लोगों द्वारा ग्रामीणों को प्रलोभन देकर अपने पक्ष में करने की कोशिश की जा रही है। कथित तौर पर ग्रामीणों से यह कहा जा रहा है कि गांव में होने वाले बाली पर्व धार्मिक आयोजन का खर्च उठाया जाएगा, जिसके बदले रेत निकालने की अनुमति दी जाए। वहीं, कार्रवाई के दौरान ग्रामीणों को आगे कर यह प्रस्तुत किया जाता है कि रेत का उपयोग गांव के निजी कार्यों के लिए किया जा रहा है।
बुधवार को हुई कार्रवाई के दौरान स्थिति उस समय और जटिल हो गई, जब माइनिंग विभाग की टीम सील मशीन को अपने कब्जे में लेने पहुंची और विरोध के चलते मौके पर भीड़ एकत्रित हो गई। सूचना पर तहसीलदार, एसडीएम एवं नगरनार थाना की टीम भी मौके पर पहुंची, जहां अधिकारियों द्वारा समझाइश दी गई कि यदि ग्रामीण अपने सीमित उपयोग के लिए रेत निकालते हैं तो वह नियमों के अनुरूप हो, लेकिन किसी भी स्थिति में मशीनों का उपयोग न किया जाए।
हालांकि, सूत्रों के अनुसार, इसके बाद भी कथित रूप से रात के समय मशीनों के जरिए नदी से रेत उत्खनन और बाहरी परिवहन की गतिविधियां जारी रहने की बातें सामने आ रही हैं। यदि यह तथ्य जांच में सही पाए जाते हैं, तो यह न केवल नियमों का उल्लंघन होगा बल्कि प्रशासनिक कार्रवाई को भी चुनौती माना जाएगा।
टेंडर प्रक्रिया पर भी मंडराया संकट, राजस्व नुकसान की आशंका
इसी बीच सूत्र यह भी संकेत दे रहे हैं कि संबंधित क्षेत्र की रेत खदान को लेकर विभाग द्वारा आगामी समय में टेंडर प्रक्रिया प्रस्तावित है। ऐसे में यदि वर्तमान में कथित रूप से अवैध उत्खनन इसी प्रकार जारी रहा और रेत का अत्यधिक दोहन होता रहा, तो भविष्य में खदान का वास्तविक भंडार प्रभावित हो सकता है। इससे न केवल संभावित ठेकेदार को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ सकता है, बल्कि शासन को मिलने वाली रॉयल्टी पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की आशंका जताई जा रही है।
ऐसी स्थिति में आवश्यक है कि प्रशासन पूरे मामले को गंभीरता से लेते हुए तथ्यों की निष्पक्ष जांच कराए और यदि अनियमितताएं पाई जाती हैं तो नियमानुसार सख्त कार्रवाई सुनिश्चित करे, ताकि शासन की मंशा, पर्यावरणीय संतुलन और राजस्व हितों की प्रभावी सुरक्षा हो सके।
राजनांदगांव/शौर्यपथ / कर्तव्य न्याय भागीदारी आंदोलन भारत संगठन द्वारा राजनांदगांव में पांच दिवसीय “संविधान मंथन” कार्यक्रम का आयोजन किया गया। यह आयोजन सांस्कृतिक अभिव्यक्ति और संवैधानिक मूल्यों के समन्वय का एक अनूठा उदाहरण बनकर उभरा, जिसमें समाज के विभिन्न वर्गों की सक्रिय भागीदारी देखने को मिली। कार्यक्रम के दौरान समाज, पत्रकारिता, कला, खेल, शिक्षा एवं जनकल्याण के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य करने वाले लोगों को सम्मानित किया गया। आयोजन में संविधान कथा वाचक आचार्य सूरज राही ने गीत, संगीत और सरल भाषा के माध्यम से संविधान के मूल सिद्धांतों को जन-जन तक पहुंचाने का प्रभावशाली प्रयास किया। उनकी प्रस्तुति ने संस्कृति और संविधान के संगम को जीवंत रूप दिया।
आयोजन के संबंध में राष्ट्रीय अध्यक्ष शिवशंकर सिंह एवं प्रदेश अध्यक्ष शशिकांत देवांगन ने बताया कि “संविधान मंथन” केवल एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि जन-जागरूकता का सशक्त अभियान बन चुका है। इसमें जटिल संवैधानिक विषयों को सहज और रोचक तरीके से प्रस्तुत किया जा रहा है, जिससे हर वर्ग का व्यक्ति आसानी से जुड़ सके। कार्यक्रम में भगवान गौतम बुद्ध के करुणा, शांति और मानवता के संदेश तथा डॉ. भीमराव आंबेडकर के समानता, न्याय और अधिकारों पर आधारित विचारों को प्रमुखता से प्रस्तुत किया गया। इस समावेशी दृष्टिकोण ने समाज को नई सोच और समझ की दिशा प्रदान की। आयोजकों के अनुसार इस पहल का उद्देश्य केवल जानकारी देना नहीं, बल्कि नागरिकों में अपने अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति जिम्मेदारी की भावना विकसित करना है। उनका मानना है कि जब तक आम जनता संविधान को नहीं समझेगी, तब तक सशक्त लोकतंत्र की परिकल्पना अधूरी रहेगी। कार्यक्रम में युवा, बुजुर्ग, महिलाएं और विद्यार्थी सभी ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया।
प्रभावशाली प्रस्तुतियों और प्रेरणादायक विचारों के माध्यम से यह आयोजन समाज में सकारात्मक परिवर्तन की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। इस अवसर पर राष्ट्रीय अध्यक्ष शिवशंकर सिंह, प्रदेश अध्यक्ष शशिकांत देवांगन, प्रदेश प्रभारी रूपेश जोशी, प्रदेश महासचिव सलमान खान, प्रदेश सचिव मनीष जैन, प्रदेश उपाध्यक्ष तुलसी गौतम, उमेश साहू, बलविंदर सिंह, कोषाध्यक्ष सेवाराम, प्रयाग साहू, संगठन मंत्री राजेश तोमर, संरक्षक एस.के. ओझा, एस.के. नायक, श्याम शर्मा, एम.बी. अनोखे सहित गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे।
रामावतार जग्गी हत्याकांड में बड़ा मोड़: बिलासपुर हाईकोर्ट ने अमित जोगी को दोषी ठहराया, 3 सप्ताह में सरेंडर के निर्देश
? दुर्ग/बिलासपुर | शौर्यपथ समाचार
छत्तीसगढ़ के बहुचर्चित रामावतार जग्गी हत्याकांड में आज एक अहम न्यायिक मोड़ सामने आया है। बिलासपुर हाईकोर्ट ने लंबे समय तक चली सुनवाई के बाद अमित जोगी को दोषी करार देते हुए 3 सप्ताह के भीतर सरेंडर करने के निर्देश दिए हैं। इस फैसले ने प्रदेश की राजनीति और न्यायिक हलकों में नई चर्चा छेड़ दी है।
? क्या है पूरा मामला?
यह मामला 4 जून 2003 का है, जब एनसीपी नेता रामावतार जग्गी की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। इस हत्याकांड में कुल 31 आरोपियों को शामिल किया गया था।
इनमें से बल्टू पाठक और सुरेंद्र सिंह सरकारी गवाह बन गए थे।
निचली अदालत के फैसले में अमित जोगी को दोषमुक्त कर दिया गया था, जबकि अन्य 28 आरोपियों को सजा सुनाई गई थी।
सीबीआई द्वारा इस फैसले को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में अपील दायर की गई थी, जिस पर अब यह महत्वपूर्ण निर्णय सामने आया है।
? हाईकोर्ट का फैसला
हाईकोर्ट ने सीबीआई की अपील को स्वीकार करते हुए अमित जोगी को दोषी माना और उन्हें 3 सप्ताह के भीतर आत्मसमर्पण (सरेंडर) करने का निर्देश दिया है।
यह फैसला लंबे समय से लंबित इस मामले में निर्णायक माना जा रहा है।
? अमित जोगी की प्रतिक्रिया
फैसले के तुरंत बाद अमित जोगी ने सोशल मीडिया के माध्यम से अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की। उन्होंने कहा—
“माननीय उच्च न्यायालय ने मेरे विरुद्ध CBI की अपील को मात्र 40 मिनट में स्वीकार कर लिया, बिना मुझे सुनवाई का अवसर दिए।
जिस व्यक्ति को पहले दोषमुक्त किया गया था, उसे बिना सुनवाई के दोषी ठहराया जाना अत्यंत अप्रत्याशित है।”
उन्होंने आगे कहा—
उन्हें 3 सप्ताह में सरेंडर करने का समय दिया गया है
वे इस निर्णय को ‘गंभीर अन्याय’ मानते हैं
उन्हें सर्वोच्च न्यायालय से न्याय मिलने का पूर्ण विश्वास है
वे शांति, आस्था और धैर्य के साथ आगे बढ़ेंगे
अंत में उन्होंने समर्थकों से प्रार्थना और आशीर्वाद की अपील करते हुए “सत्य की जीत अवश्य होगी” का विश्वास जताया।
? राजनीतिक और कानूनी महत्व
यह फैसला न केवल एक पुराने आपराधिक मामले में बड़ा मोड़ है, बल्कि इसका राजनीतिक असर भी व्यापक हो सकता है।
जहां एक ओर यह निर्णय न्यायिक प्रक्रिया की दिशा को दर्शाता है, वहीं दूसरी ओर अब सभी की नजरें इस बात पर टिक गई हैं कि क्या मामला सुप्रीम कोर्ट में नई दिशा लेगा।
? सार
करीब दो दशक पुराने इस हत्याकांड में आया यह फैसला न्यायिक प्रक्रिया के एक अहम पड़ाव को दर्शाता है। अब आगे की कानूनी लड़ाई और संभावित अपील पर पूरे प्रदेश की नजरें टिकी रहेंगी।
दुर्ग / शौर्यपथ
दुर्ग शहर, जो कभी निष्पक्ष पत्रकारिता और मजबूत संवाद परंपरा के लिए जाना जाता था, इन दिनों एक अजीब विडंबना का गवाह बन रहा है। यहां अब सिर्फ राजनेता ही राजनीति नहीं कर रहे—बल्कि पत्रकारों के बीच भी सियासत अपने चरम पर है। और इससे भी अधिक चिंताजनक बात यह है कि इस ‘कलम की लड़ाई’ में अब राजनीतिक दलों के मीडिया प्रभारी भी खुलकर भूमिका निभाते नजर आ रहे हैं।
? प्रेस क्लब की दीवारों के भीतर ‘दो खेमों’ की कहानी
वरिष्ठ पत्रकारों के पुराने प्रेस क्लब में लंबे समय से चल रहे आंतरिक मतभेद ने आखिरकार एक नए प्रेस क्लब के जन्म को जन्म दिया। सामान्यतः इसे लोकतांत्रिक विकल्प के रूप में देखा जा सकता था, लेकिन यहां कहानी कुछ और ही है।
नए प्रेस क्लब के अस्तित्व में आते ही पुराने क्लब के कुछ सदस्यों की सक्रियता संगठन मजबूती की दिशा में नहीं, बल्कि नए मंच को नीचा दिखाने की प्रवृत्ति में बदलती दिखी।
परिणाम—पत्रकारों के बीच संवाद की जगह अब अविश्वास और आरोपों की दीवार खड़ी हो गई है।
? भाजपा कार्यालय की प्रेस कॉन्फ्रेंस: ‘मीडिया मैनेजमेंट’ या ‘मीडिया विभाजन’?
हाल ही में भाजपा कार्यालय में मंत्री गजेंद्र यादव की प्रेस कॉन्फ्रेंस ने इस अंदरूनी खींचतान को सार्वजनिक कर दिया।
बताया जाता है कि भाजपा की मीडिया टीम ने बिना स्पष्ट सूचना के पत्रकारों को दो हिस्सों में बांटकर अलग-अलग प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित कर दी।
यह कोई तकनीकी चूक नहीं लगती—क्योंकि प्रेस विज्ञप्तियां तो सभी पत्रकारों तक नियमित रूप से पहुंचती हैं।
सवाल यह है कि जब सूचना भेजी जा सकती है, तो समान मंच क्यों नहीं दिया गया?
इस घटना के बाद जो बहस और विवाद सामने आए, उसने यह स्पष्ट कर दिया कि यह सिर्फ ‘समन्वय की कमी’ नहीं, बल्कि सुनियोजित विभाजन भी हो सकता है।
? कांग्रेस भी पीछे नहीं: ‘भेदभाव की नीति’ सर्वदलीय?
यदि यह माना जाए कि यह समस्या केवल भाजपा तक सीमित है, तो यह अधूरी सच्चाई होगी।
कांग्रेस के मीडिया प्रबंधन पर भी ऐसे ही आरोप लगते रहे हैं—जहां प्रेस कॉन्फ्रेंस में चयनात्मक आमंत्रण और ‘पसंदीदा पत्रकारों’ को प्राथमिकता देने की प्रवृत्ति खुलकर सामने आती है।
इससे यह संकेत मिलता है कि पत्रकारों के बीच की दरार को राजनीतिक दल अपने-अपने तरीके से साधने में लगे हैं।
? ‘पत्रकार’ की परिभाषा भी विवाद में
स्थिति का एक और चिंताजनक पहलू यह है कि प्रेस क्लब की सदस्यता और ‘पत्रकार’ की पहचान भी सवालों के घेरे में है।
ऐसे कई नाम सामने आते हैं जो नियमित प्रकाशन भी नहीं कर पाते, लेकिन किसी अन्य पत्र की एजेंसी लेकर ‘पत्रकार’ कहलाने की होड़ में शामिल हैं।
इस प्रवृत्ति का असर सिर्फ संगठन तक सीमित नहीं—यह वरिष्ठ और गंभीर पत्रकारों की साख पर भी प्रश्नचिन्ह खड़ा करता है।
? ‘3-4 एकड़ जमीन’ का शिगूफा: हकीकत या हास्य?
इसी बीच एक कथित दावे ने पूरे शहर में चर्चा का विषय बना दिया—कि शासन द्वारा प्रेस क्लब के लिए 3-4 एकड़ जमीन मुफ्त में दी गई है, जहां पत्रकारों की कॉलोनी बनाई जाएगी।
हालांकि, यह दावा अब तक किसी ठोस आधार पर खरा नहीं उतरा और शहर में इसे अधिकतर लोग मजाक या ‘राजनीतिक गुब्बारा’ ही मान रहे हैं।
ऐसे बयानों ने गंभीर मुद्दों को भी हल्का बना दिया है।
? बड़े आयोजन, छोटी सोच: सरोज पांडे कार्यक्रम भी विवादों में
देश-प्रदेश की वरिष्ठ नेता सरोज पांडे के हालिया कार्यक्रम में भी यही तस्वीर दोहराई गई।
इतने बड़े आयोजन में प्रेस कॉन्फ्रेंस का दो हिस्सों में बंट जाना न केवल मीडिया प्रबंधन की विफलता को दर्शाता है, बल्कि यह भी सवाल उठाता है कि क्या जानबूझकर ऐसा किया गया?
परिणाम—कार्यक्रम को वह व्यापक प्रचार नहीं मिल सका, जिसका वह हकदार था।
? ‘कलम’ अगर बंट गई, तो सवाल कौन पूछेगा?
दुर्ग में पत्रकारों के बीच बढ़ती यह खाई केवल व्यक्तिगत या संगठनात्मक विवाद नहीं है—यह लोकतांत्रिक संवाद के लिए खतरे की घंटी है।
जब पत्रकार ही आपसी खेमेबाजी में उलझ जाएंगे,
जब राजनीतिक दल उन्हें अपने हिसाब से ‘मैनेज’ करने लगेंगे,
और जब मंच संवाद का नहीं, बल्कि शक्ति प्रदर्शन का बन जाएगा—
तब सबसे बड़ा नुकसान होगा सच्चाई और जनता के अधिकार का।
दुर्ग को यह तय करना होगा—
पत्रकारिता ‘प्रतिस्पर्धा’ रहेगी या ‘प्रतिशोध’?
रायपुर / राजधानी रायपुर में आयोजित खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स 2026 के अंतर्गत स्वामी विवेकानंद एथलेटिक्स स्टेडियम, कोटा में खेले गए पुरुष फुटबॉल के सेमीफाइनल मुकाबलों में छत्तीसगढ़ और पश्चिम बंगाल ने शानदार जीत दर्ज करते हुए फाइनल में प्रवेश किया।
खेले गए एक रोमांचक सेमीफाइनल मुकाबले में छत्तीसगढ़ ने अरुणाचल प्रदेश को 3-2 से हराया। मैच की शुरुआत से ही छत्तीसगढ़ टीम ने आक्रामक खेल दिखाया और पहले हाफ की समाप्ति तक 2-0 की बढ़त बना ली। दूसरे हाफ में अरुणाचल प्रदेश ने वापसी की कोशिश की, लेकिन छत्तीसगढ़ ने बढ़त कायम रखते हुए मैच 3-2 से अपने नाम किया।
इसी प्रकार पहले खेले गए सेमीफाइनल मैच में पश्चिम बंगाल ने गोवा को 5-2 से हराकर फाइनल में अपनी जगह सुनिश्चित की।
इस अवसर पर केन्द्रीय युवा कार्य एवं खेल राज्य मंत्री श्रीमती रक्षा निखिल खडसे ने खिलाड़ियों से मुलाकात कर उनका उत्साहवर्धन किया। उन्होंने खिलाड़ियों के उत्कृष्ट प्रदर्शन की सराहना करते हुए उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना की। इस अवसर पर भारतीय खेल प्राधिकरण के उप महानिदेशक श्री मयंक श्रीवास्तव एवं खेल विभाग के सचिव श्री यशवंत कुमार, खेल विभाग के अधिकारी, आयोजन समिति के सदस्य, बड़ी संख्या में खिलाड़ी तथा अन्य गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे।
श्रीमती खडसे ने खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स-2026 के दौरान जगदलपुर का दौरा किया और 2500 से अधिक आदिवासी एथलीटों को 'भविष्य का ओलंपियन' बताया
खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स-2026 में अस्मिता लीग के पूर्व छात्रों ने हॉकी, वेटलिफ्टिंग, फुटबॉल और तैराकी में पदकों पर अपना दबदबा बनाया
रायपुर / युवा मामले और खेल राज्य मंत्री श्रीमती रक्षा खडसे ने 'खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स-2026' के दौरान बुधवार को रायपुर का दौरा किया। इस दौरान उन्होंने यहां के माहौल को ऊर्जा, आशा और बदलाव से भरपूर बताया। उन्होंने इस आयोजन को सफल बनाने में भारतीय खेल प्राधिकरण (साई) टीम के प्रयासों की सराहना की और कहा कि एथलीटों, स्थानीय समुदाय और इस क्षेत्र के लोगों की ओर से मिली प्रतिक्रिया बेहद उत्साहजनक रही है।
देशभर के सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से 2,500 से ज्यादा एथलीट अलग-अलग खेलों में खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स 2026 में हिस्सा ले रहे हैं। श्रीमती खडसे ने कहा कि खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स 2026, केंद्र सरकार की उस प्रतिबद्धता को दिखाता है जिसके तहत आदिवासी युवाओं को अपना भविष्य बनाने के लिए एक मंच दिया जा रहा है। उन्होंने कहा कि इस क्षेत्र के लोगों के लिए यह खेल एक नई उम्मीद हैं और यह संकेत कि उनकी काबिलियत को पहचाना जा रहा है और उस पर सबसे ऊंचे स्तर पर निवेश किया जा रहा है।
युवा मामले एवं खेल राज्य मंत्री ने कहा, '' एक समय था जब छत्तीसगढ़ को नक्सलवाद के लिए जाना जाता था, और यहां के लोगों को एक पिछड़ा समुदाय माना जाता था। आज, मुझे लगता है कि इस क्षेत्र के लिए एक नई दिशा खुल रही है। नक्सलवाद का खात्मा हो चुका है और खेल के माध्यम से, इस धरती के युवा अब अपनी ऊर्जा और क्षमता को सामने ला सकते हैं और देश के लिए खेल सकते हैं।''
खेल राज्य मंत्री ने खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स-2026 को एक ऐतिहासिक पहल बनाने का श्रेय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के विजन, गृह मंत्री श्री अमित शाह (जिन्होंने पूरे देश से नक्सलवाद के खात्मे की घोषणा की है), कैबिनेट मंत्री डॉ. मनसुख मंडाविया और पूरी साई टीम को दिया। उन्होंने पूरा भरोसा जताया कि इन खेलों में हिस्सा लेने वाले कई एथलीट आगे चलकर ओलंपिक, एशियाई खेलों और राष्ट्रमंडल खेलों में भारत का प्रतिनिधित्व करेंगे और पदक जीतेंगे।
युवा मामले और खेल राज्य मंत्री, श्रीमती रक्षा खडसे ने 'अस्मिता लीग' के परिवर्तनकारी प्रभाव पर भी प्रकाश डाला। इस लीग को 2021 में प्रधानमंत्री मोदी के उस विज़न के तहत शुरू किया गया था, जिसका उद्देश्य ग्रामीण भारत की महिलाओं को प्रतिस्पर्धी खेलों में लाना और उन्हें एक पहचान व अवसर प्रदान करना है।
युवा मामले एवं खेल राज्य मंत्री, श्रीमती रक्षा खडसे ने कहा, '' खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स-2026 में, नतीजे ज़बरदस्त रहे हैं। हॉकी, वेटलिफ्टिंग और फुटबॉल में हिस्सा लेने वाली लगभग 60 से 70 प्रतिशत लड़कियां ‘अस्मिता लीग’ खेल चुकी हैं और पदक जीत चुकी हैं। इनमें अंजली मुंडा जैसी बेहतरीन खिलाड़ी भी शामिल हैं। तैराकी में जीते गए सभी पांचों स्वर्ण पदक भी ‘अस्मिता लीग’ की खिलाड़ियों ने ही हासिल किए हैं। उन्होंने कहा, '' हमारा प्रयास जारी है कि हम ‘अस्मिता लीग’ को और भी निचले स्तर तक यानी के गांवों तक ले जाएं ताकि खेलों में महिलाओं की भागीदारी लगातार बढ़ती रहे।''
Feb 09, 2021 Rate: 4.00
